परशुराम के प्रचंड क्रोध के बाद क्या हुआ? इस विशेष एपिसोड में, हम महर्षि जमदग्नि की दुखद हत्या और परशुराम के न्याय के लिए उठे भयानक संकल्प को देखते हैं। सहस्रार्जुन के पुत्रों के प्रतिशोध और परशुराम द्वारा पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की उनकी प्रतिज्ञा की कहानी। फिर देखिए, कैसे परशुराम ने अपनी विजय भूमि महर्षि कश्यप को दान कर महेंद्र पर्वत पर तपस्या के लिए प्रस्थान किया। इसके बाद कथा मुड़ती है चंद्रवंश के महान राजा ययाति की ओर, जहाँ उनकी इंद्रियों की अतृप्ति और अपने पुत्रों से युवावस्था माँगने की अनोखी गाथा सामने आती है। उनके पुत्र पुरू का महान त्याग और ययाति की अंततः वैराग्य की प्राप्ति, जो हमें इच्छाओं के क्षणभंगुर स्वभाव का दर्शन कराती है। यह एपिसोड धर्म, त्याग, और मोह के चक्र को गहराई से दर्शाता है। #Parashuram #Jamadagni #Yayati #Puru #ChandraVansha #BhagavataPurana #HinduMythology #MythologicalStories #Tyag #Moh #Santana #AncientIndia #MahabharatEra #DivineJustice #Renunciation #SrimadBhagavatam #PauranicKathayen #VishnuAvatars #SpiritualJourney #Dharma
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00:00श्री शुकदेव जी महाराज राजा परीच्षित को बताते हैं कि सहसरार जुन के वद के उपरांत किस प्रकार शांती का
00:07वातावर्ण अचानक भयंकर संकट में बदलने वाला था।
00:12महर्शी जमदगनी का तपोवन प्रातहकाल की वेला में अत्यंत दिव्य और शांत प्रतीत हो रहा था जहां रिशिकुमार वेदमंत्रों का
00:20सस्वर गान कर रहे थे।
00:42उन्हें सफलता का आशिरवात प्रदान किया।
00:45अपने माता-पिता की आग्या लेकर परशुराम जी भारी मन से सुदूर परवतों और पवित्र नदियों की ओर अपनी यात्रा
00:53पर निकल पड़े।
00:55उधर महिश्मती नगरी में राजा सहसरार जुन के दंभी और क्रूर पुत्र अपने पिता के मृत शरीर के समक्ष प्रतिशोध
01:03की भीशन ज्वाला में जल रहे थे।
01:06सहसरार जुन के जेश्ट पुत्र ने तलवार लहराते हुए अपने भाईयों को ललकारा की वे बिना विलम परशुराम के निर्दोष
01:14पिता का रक्त बहा कर बदला लेंगे।
01:18अंधभक्ती और क्रोध में अंध होकर उनक्षत्रिय राजकुमारों ने अस्त्रशस्त्रों से लैस होकर आश्रम की ओर कूच कर दिया।
01:26आश्रम में महर्शी जमदगनी बाह्य संसार से पूर्णता बेखबर, यग्यवेदी के समीट समाधिस्थ होकर परमेश्वर के ध्यान में लीन थे।
01:36माता रेनु का जब नदी तट से पवित्र जल और पूजा के पुष्प लेकर लोट रही थी, तो अचानक अमंगलकारी
01:44पशुपक्षियों के क्रंदन से उनका हृदय काम्प उठा।
01:48शांत तपोवन की निस्तब्धता को भंग करते हुए सहसरार जुन के पुत्रों के रथों की घडगडाहट और घोडों की टापों
01:56का विक्राल शोर गूंज उठा।
01:58धर्म और मर्यादा की सभी सीमाओं को लांग कर उन पापी राजकुमारों ने पवित्र आश्रम में प्रवेश कर हवन कुंडों
02:06और रिशियों की कुटियों को तहसनहस करना शुरू कर दिया।
02:11अस्त्रशस्त्रहीन छोटे-छोटे रिशिकुमार और तपस्वी भयभीत होकर प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे।
02:19माता रेनु का दौरती हुई कुटिया में पहुची और अपने पती को दुष्ट राजकुमारों से घिरा देख चीतकार कर उठी।
02:28महर्शी जमदगनी ने नेत्र खोल कर बिना किसी भय या क्रोध के उन आक्रमन कारियों को देखा और उन्हें शांत
02:36रहने का निवेदन किया।
02:38प्रतिशोध के अंधकार में डूबे उन निर्दई कुमारों ने महर्शी की शांतिपून वानी को ठुकराते हुए अपनी नंगी तलवारे हवा
02:46में उठा ली।
02:48असहाय माता रेनुका अपने पती की रक्षा के लिए उनके आगे आ गई और अपनी चाती पर 21 बार हाथ
02:56मार कर विलाप करने लगी।
02:59क्रूर्ता की पराकाश्ठा पार करते हुए उन राक्षसी प्रवरित्ती के राजाओं ने माता रेनुका को धक्का देकर महर्शी जमदगनी पर
03:07कायरता पूर्ण वार कर दिया।
03:10निर्पराध और महान महर्शी जमदगनी का पवित्र शरीर यग्यवेदी के निकट धराशाई हो गया और वे वीरगती को प्राप्थ हुए।
03:19हत्यारेक शत्रिय कुमार वहां से पलायन कर गए जबकि माता रेनुका के उच्छ चीतकार और विलाप ने सुदूर यात्रा पर
03:27गए परशुराम के हृदय को जखजोर कर रख दिया।
03:30अपने पती के निश्प्रान देह को देख कर माता रेनुका अत्यंत व्याकुल हो उठीन और उन्होंने विलाप करते हुए अपनी
03:39च्छाती को पीटना आरंभ कर दिया।
03:42माता रेनुका ने अत्यंत दुख में डूब कर अपने पती के पार्थिव शरीर के समीप बैठ कर पूरे 21 बार
03:50अपनी च्छाती पीट कर क्रंदन किया।
03:52सुदूर परवतियक शेत्रों में यात्रा कर रहे भगवान परशुराम के दिव्यकानों में अपनी माता का यह हरिदय विदारक विलाप अचानक
04:01गूंज उठा।
04:03अपनी माता की चीक सुनते ही परशुराम का हरिदय किसी अनिष्ट की आशंका से काम उठा और वे तीवर गती
04:10से आश्रम की ओर दोड़ पड़े।
04:13जब वे अपने आश्रम की सीमा में प्रविष्ठ हुए तो वहाँ पसरा हुआ भयानक सन्नाटा और यग्यशाला से उठता काला
04:21धुआ उनके मन को विचलित करने लगा।
04:25यग्यशाला में कदम रखते ही परशुराम की दृष्टी अपने पिता के लहूलुहान शरीर और विलाप करती माता पर पड़ी जिससे
04:33उनका हृदैस तब्ध रह गया।
04:36माता रेनुका ने जब अपने तेजस्वी पुत्र को देखा तो वे अपनी सुधबुध खोकर उनके चर्णों में गिर पड़ी और
04:43रोते हुए पिता के वध की गाथा सुनाने लगी।
04:47परशुराम अपने पिता के शांत किंतु निश्परान मुख को देखकर घुटनों के बल बैठ गए और उनकी आँखों से अशुरुधारा
04:55बह निकली।
04:56माता रेनुका ने बिलखते हुए बताया कि किस प्रकार कार्तवीर यारजुन के दुष्ट पुत्रों ने निहत्थे और समाधिस्थ महर्शी पर
05:05अनेक कायरता पूर्ण प्रहार किये।
05:07पिता के शरीर पर लगे घावों को देखकर परशुराम का शोक अचानक प्रल्यंकारी क्रोध में परिवर्तित हो गया। मानो रुद्रस्वयं
05:17प्रकट हो रहे हुँ।
05:19वे महाबली परशुराम प्रिथवी को कपाते हुए उठ खड़े हुए और उनके भीतर से निकलने वाले तेज से सम्पूर्ण वन
05:27के जीवजन्तु भयभीत होकर भागने लगे।
05:30उन्होंने अपने दाहिने हाथ में चम्चमाते हुए फरसे को उठाकर आकाश की ओर देखा, जिसकी तीक्षनधार सूर्य की किर्णों को
05:39भी मात दे रही थी।
05:41क्रोध से थर्थराते हुए स्वर्मे परशुराम ने अंतरिक्ष को गुंजाय मान करते हुए पिता के हत्यारों के विनाश की भीशन
05:49प्रतिज्याली।
05:51माता की छाती पर पड़े 21 आधातों को देखकर उन्होंने प्रण लिया कि वे इस प्रित्वी को 21 बार अत्याचारी
06:00क्षत्रियों से विहीन कर देंगे।
06:02उन्होंने अपने पिता की आत्मा को साक्षी मान कर घोशना की की वे अधर्म के मार्ग पर चलने वाले किसी
06:09भी राजा को जीवित नहीं छोडेंगे।
06:13परशुराम ने अपने पिता के पार्थिव शरीर को अंतिन विदाई देने से पूर्व उनके चर्णों का स्पर्ष किया और तुरंत
06:20रणभूमी की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया
06:24उन्होंने अपने विशाल धनुष और अचूक बानों को धारण किया तथा मस्तक पर भस्म का त्रिपुन्द लगा कर वे एक
06:31संहारक योध्धा के रूप में तयार हो गए
06:35जैसे ही वे आगे बढ़े आकाश का रंगरक्त के समान लाल हो गया जो आगामी महा संग्राम और दुष्टों के
06:43रक्तपात का संकेत दे रहा था
06:46परशुराम के प्रत्येक क्रोध पूर्ण चरण के साथ प्रित्वी के भीतर से तप्त ज्वालाएं उठने लगी, मानो स्वयंकाल उनके पीछे
06:54चल रहा हो
06:56अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने के लिए वे महा बली परशुराम महिश्मती नगरी की ओर अकेले ही काल
07:03बनकर निकल पड़े
07:05वे अपनी दिव्य परशु को कंधे पर धारण किये, क्रोध की अगनी से प्रजवलित नेत्रों के साथ अपने लक्षे की
07:13ओर अविचल गती से बढ़ रहे थे
07:16जैसे ही उनके महिश्मती की ओर बढ़ने की खबर वायू की गती से फैली, राजा सहसरारजुन की नगरी में भय
07:23का सन्नाटा चा गया
07:25यह भयानक सूचना अंतह महाराज सहसरारजुन के भव्य राजगर्बार में पहुँची, जहां वे अपने सिनहासन पर बैठे अपनी शक्ती के
07:35अभिमान में लीन थे
07:37अपनी हजारों भुजाओं और अद्वितिय पराक्रम के मद में चूर सहसरारजुन ने क्रोधित परशुराम को एक साधारन ब्राहमन बालक समझ
07:46कर उनकी प्रतिग्या का उपहास किया
07:49अंतह काल के समान परशुराम महिश्मती नगरी के विशाल और अलंकरित द्वारों के सामनेया खड़े हुए उनके आगमन से धर्ती
07:58थर्थरा उठी
08:00नगरी के द्वारपालों ने उन्हें रोकने का असफल प्रयास किया परशुराम के दिव्य तेज के समक्ष उनकी सारी शक्ती क्षीन
08:08पड़ गई
08:09एक ही प्रबल आगहात से विशाल द्वार तूट गए और परशुराम ने क्रोधित सिंग की तरह महिश्मती नगरी में प्रवेश
08:17किया जिससे चारों और हाहाकार मच गया
08:21नगरी के निवासी अपने जीवन की रक्षा हेतू भईभीत होकर सडको पर भागने लगे परशुराम के क्रोध की ज्वाला से
08:29बचने के लिए
08:32सहस्रार जुन के पराक्रमी सेनाप्तियों का एक दल अपने राजा का आदेश मान कर परशुराम को रोकने के लिए आगे
08:39बढ़ा अपनी चमकती हुई तलवारे लहराते हुए
08:44परशुराम के दिव्यक्रोध के आगे उन सभी सेनाप्तियों का शौर्यक्षन भर में धूल चाट गया और वे एक एक कर
08:51धराशाई हो गए
08:54परशुराम का परशु काल के दंड की भांती दुष्ट क्षत्रियों के रक्ट से रंजित होता गया जैसे जैसे वे शाही
09:01महल की ओर बढ़ते गए
09:03अपने प्रमुख योध्धाओं के पतन की खबर सुनकर आंकारी सहस्रारजुन का क्रोध चरम पर पहुँच गया और उसने स्वयन युद्ध
09:12भूमी में उतरने का निर्णे लिया
09:15अपने दिव्यवर्दान का स्मरन करते हुए सहस्त्रारजुन ने अपनी हजार भुजाओं को प्रकट किया प्रत्येक भुजा में एक चमकता अस्त्रधारन
09:24किये हुए
09:26राजमहल के प्रांगण में परशुराम और सहस्रारजुन आमने सामने आये दोनों के नेत्रों में भयंकर प्रतिशोध की ज्वाला जल रही
09:34थी
09:36परशुराम ने अपने दिव्य परशु के साथ बिजली की गती से प्रहार किये, सहसरार जुन की असंख्य भुजाओं के बीच
09:43भी वे अप्रत्याशित रूप से वार कर रहे थे
09:48सहसरारजुन ने अपनी हजार भुजाओं से परशुराम को चारों और से घेरने का प्रयास किया, एक साथ हजारों अस्त्रों का
09:55वर्षा करते हुए
09:57परंतु परशुराम अपने दिव्यकवच और भगवान विश्नु के आशिर्वाद से पूर्णत सुरक्षित थे, सहसरारजुन के सभी प्रहार उन पर निश्प्रभावी
10:07हो रहे थे
10:09परशुराम के परशुने तब रुद्र रूप धारन कर लिया और उसने एक-एक करके सहसरारजुन की असंख्य भुजाओं को काटना
10:17आरंभ कर दिया
10:19अपनी भुजाओं को कटते देख सहसरार्जुन का अभिमान तूट गया और उसने अपनी मृत्यु को निकट आते हुए महसूस किया
10:28भय और वेदना से चीखते हुए
10:31अंतर परशुराम ने एक निर्नायक और प्रचन प्रहार से सहसरार्जुन के सिर को धड़ से अलग कर दिया जिससे प्रिथवी
10:39अपने दुष्ट बोच से मुक्त हुई
10:42सहसरार्जुन का वध करने के बाद जब परशुराम अपने कंधे पर रक्तरंजित परशु रखे कुटिया लोटे तो उन्हें चारों और
10:50एक भयानक और रहस्य में सन्नाटा महसूस हुआ
10:54आश्रम के भीतर प्रवेश करते ही परशुराम ने देखा कि उनके पिता महर्शी जमदगनी का निश्परान शरीर भूमी पर पड़ा
11:02था और उनकी माता रेनुका उनके समीक बैठकर विलाप कर रही थी
11:08अपनी माता को अत्यंत व्याकुल होकर 21 बार छाती पीटते देख परशुराम के भीतर शोक का स्थान एक महाविनाशकारी क्रोध
11:17ने ले लिया
11:19क्रोध से कापते हुए परशुराम ने अपने दिव्य परशु को आकाश की ओर उठाया और प्रित्वी को दुष्ट क्षतरियों से
11:2721 बार विहीन करने की घोर प्रतिग्याली
11:30अपने पिता के अंतिन संसकार के पश्चात परशुराम अपनी प्रतिग्या को पूरा करने के लिए रुद्र रूप धारण कर आश्रम
11:38से बाहर निकल पड़े
11:41परशुराम सबसे पहले सहसरारजुन के जीवित बचे पुत्रों के महल में पहुँचे जो उनके आने के समाचार से ही भैसे
11:49काम उठे थे
11:51बिना किसी दयाके, परशुराम ने अपने प्रचंड परशु के वार से सहसरारजुन के सभी अभिमानी पुत्रों का अंत कर दिया
11:59और उनके महलों को नश्ट कर दिया
12:02जब अन्यदुष्ट शत्रिय राजाओं को इस सहार का पता चला, तो उन्होंने परशुराम का सामना करने के लिए एक विशाल
12:10और अजे सेना का गठन किया
12:13रंधुमी में अकेले खड़े परशुराम का तेज किसी प्रचंड सूर्य के समान था, जिसे देखकर शत्रूं के रथों के घोडे
12:21भैभीत होकर पीछे हटने लगे
12:24युद्ध का शंकनाद होते ही परशुराम ने शत्रू सेना पर धावा बोल दिया, और उनके परशु की गती इतनी तीवर
12:32थी की केवल बिजली की चमक दिखाई दे रही थी
12:36एक अभिमानी राजा ने अपने विशाल युद्ध हाथी को परशुराम की ओर बढ़ाया, परंतु उन्होंने एक ही चलांग में हाथी
12:44और राजा दोनों के दो टुकडे कर दिये
12:48परशुराम किसी महाविनाशकारी दावानल की भांती सेनाओं को भस्म कर रहे थे और उनके मार्ग में केवल तूटे हुए रत
12:56और परास्त योध्धा ही शेश बचते थे
12:59प्रथम विजय के बाद परशुराम ने संपून आर्यावर्त में घूम घूम कर उन सभी दुष्ट राजाओं का अंत किया जो
13:07धर्म की सीमाओं का उलंगन कर रहे थे
13:10एक दुर्गम पहाडी किले के निकट दस क्रूर राजाओं के समूह ने परशुराम पर मायावी शस्त्रों से आक्रमन किया परंतु
13:18उनके तेज ने सभी माया को क्षण भर में नश्ट कर दिया
13:23एक के बाद एक परशुराम ने उन सभी अत्याचारी शासकों के गढ़ों को ध्वस्ट कर दिया जिन्होंने प्रजापर अत्याचार किये
13:31थे जिससे निर्धनों को भय से मुक्ती मिली
13:35अपनी प्रतिग्या को पूर्णत ह सत्य सिद्ध करने के लिए परशुराम ने दुष्ट क्षत्रिय राजाओं के रक्त को एकत्रित करने
13:43का एक अत्यंत कठोर संकल्प लिया
13:46कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी पर परशुराम ने खशत्रियों के रक्ठ से पाँच विशाल सरोवरों का निर्मान किया, जिन्हें समंत पंचक
13:54के नाम से जाना गया
13:56उन्रक्त सरोवरों के तटपर बैठकर परशुराम ने अपने दिवंगत पिता महर्शी जमदगनी को श्रधापूर्वक तरपन अर्पित किया और उनकी आत्मा
14:06की शांती की कामना की
14:09आकाश से महर्शी रिचीक और पित्रों ने परशुराम के इस महान पुरुशार्थ को देखा और उन्हे धर्म की पुनहस्थापना करने
14:17के लिए आशिश प्रदान किया
14:19अपनी प्रतिग्या पूर्ण होने पर परशुराम ने अपने अस्त्रों का त्याग कर दिया और जीती हुई संपूर्ण पृत्वी को महर्शी
14:27कश्यप को दान देकर स्वयन तपस्या के लिए प्रस्थान किया
14:32अपनी प्रतिग्या पूर्ण करने के उपरांत महर्शी परशुराम ने संपूर्ण पृत्वी का स्वामी महर्शी कश्यप को बनाने हेतु उन्हें अपने
14:40महायग्य मंडप में आमंत्रित किया
14:44हाथों में पवित्र गंगाजल और कुशा लेकर परशुराम ने मंत्रोट चार के साथ 21 बार जीती गई इस विशाल वसुन्धरा
14:52को महर्शी कश्यप के हाथों में संकल्पित कर दिया
14:56महर्शी कश्यप ने अत्यंत विनमर्ता और सम्मान के साथ इस महान भूदान को स्विकार करते हुए परशुराम के इस अभूत
15:04पूर्व त्याग की भूरी-भूरी प्रशंसा की
15:08रक्तपात और अधर्म के बोज से मुक्त होकर साक्षात प्रिथवी देवी भी एक दिव्य स्वरूप में प्रकट हुई और भगवान
15:16परशुराम को प्रणाम किया
15:19ततपश्चात महर्शी कशप ने धर्म की मर्यादा बनाए रखने के लिए परशुराम से प्रार्थनाकी की वे इस दान की गई
15:26प्रिथवी की सीमा से बाहर प्रस्थान करें
15:30महर्शी कश्यप के इन धर्मयुक्त वचनों को सुनकर परशुराम ने मंद मुस्कान के साथ स्विकार किया कि उनका प्रित्वी पर
15:38क्षत्रे सनहार का कार्य अब पूर्ण हो चुका है
15:42परशुराम ने अपने अमोग बान के प्रहार से समुद्र को पीछे धकेलते हुए दक्षिन दिशा में एक नवीन पवित्र भूमी
15:50का निर्मान किया
15:51इसके पश्चात उन्होंने अपने भयानक युद्ध पर्शु और धनुशबान को देवों की साक्षी में त्याग कर सदैव के लिए शांत
16:00स्वरूप धारन कर लिया
16:02राजसी आभूशनों और योध्धा के वस्त्रों को उतार कर पर्शुराम ने केवल वलकल वस्त्र और रुद्राक्ष की मालाएं धारन कर
16:10ली
16:12सांसारिक मोहमाया और विजय के अहंकार से परे होकर महात्पस्वी पर्शुराम ने महेंद्र पर्वत की दिशा में अपने कदम बढ़ा
16:20दिये
16:21उनके मार्ग में वन के हिंसक पशुभी शान्त होकर उनके सामने नत्मस्तक हो गए और व्रिक्षों ने अपने पुष्प बरसा
16:29कर उनका स्वागत किया
16:31प्रित्वी के विद्वान रिशिमुनी और जीवित धर्मनिष्ट क्षत्रिय दूर खड़े होकर इस महान अवतार के प्रस्थान को अश्रुपूर्ण नेत्रों से
16:40देखते रहे
16:42बादलों को चूमती महेंद्र परवत की सर्वोच शिखरों पर पहुँच कर परशुराम ने उस परमशांति प्रद स्थान को अपनी भावी
16:50तपस्या के लिए चुना
16:52एक निर्मल जल प्रपात के समीप पवित्र दर्ग धास का आसन बिचा कर परशुराम ध्यानमगन होने की तयारी करने लगे
17:01पदमासन सिध करके और नेत्र बंद करके परशुराम ने अपनी समस्थ चेतना को भगवान श्री हरी विश्नु के चरण कमलों
17:09में लीन कर दिया
17:11उनके ध्यानस्त होते ही उनके भाल से एक अलौकिक नीली और स्वर्ण जोती प्रस्पुटित हुई जिसने संपूर्ण महेंद्र परवत को
17:19आच्छा दित कर लिया
17:22देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने आकाश से इस महान भारगव श्रिष्ट पर पारिजात के पारमार्थिक पुष्पों की अन्वरत वर्शा
17:30की
17:32कैलाश परवत पर विराजमान भगवान शिव ने अपने प्रिय शिष्ष के इस अभूत पूर्व वैराग्य को देख कर उन्हें परम
17:39सिध्धी का वर्दान दिया
17:42परशुराम के इस महात्याग के फलस्वरूक संपूर्ण पृत्वी पर शान्ती, न्याय और सत्ययुक की भानती धर्म का सामराज्य पुनह स्थापित
17:51हो गया
17:51श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को बताया कि भगवान परशुराम का यह चरित्रत्याग शौर्य और पूर्ण समर्पन की सर्वोच
18:01मिसाल है
18:03परशुराम जी की पावन गाथा के पश्चात श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को चंद्रवंश के सूर्य के समान तेजस्वी
18:11राजाओं का इतिहास सुनाना प्रारंभ किया
18:13इसी महान चंद्रवंश में चक्रवर्ती राजा नहुश हुए जिन्होंने अपने अतुल्य शौर्य और धर्म प्रायंता से तीनों लोकों में अपनी
18:23कीर्ती पता का फहराई थी
18:26राजा नहुश के पश्चात, उनके परम ज्यानी और शूर्वीर पुत्र ययाती ने हस्तिनापुर के वैभवशाली सिन्हासन का भार संभाला
18:36महर्शियों के वेद मंत्रों के गूँजते स्वर और पुश्पवर्शा के बीच राजा ययाती का राज्याभिशेक बड़ी ही धूमधाम के साथ
18:44संपन्न हुआ
18:46राजा ययाती ने अपने पराक्रम और न्यायप्रियता से राज्य की सीमाओं का विस्तार करते हुए प्रजा को धर्म और सुख
18:53के मार्ग पर अग्रसर किया
18:56एक दिन दैत्यगुरु शुक्राचार्य की रूपवती पुत्री देव्यानी अपनी सक्खियों के साथ उपवन के सरोवर पर क्रीडा करने के लिए
19:04गई
19:05उसी उपवन में असुर्राज व्रिशपर्वा की राजकुमारी शर्मिष्ठा भी अपनी अनेक दासियों के साथ जल विहार के लिए उपस्थित हुई
19:15सरोवर में स्नान के पश्चात वस्त्र बदलते समय वायुदेव के प्रभाव से दोनों के वस्त्र बदल गए जिससे देव्यानी और
19:23शर्मिष्ठा में उग्र विवात छिड़ गया
19:26क्रोध से अंधी होकर राजकुमारी शर्मिष्ठा ने देव्यानी को एक गहरे सूखे कुए में धकेल दिया और उसे वहीं छोड़कर
19:35महल लोट गई
19:36निर्जन वन के सूखे कुए में गिरी देव्यानी अत्यन्त दुखी होकर किसी रक्षक की प्रतीक्षा में इश्वर से प्रार्थना करने
19:44लगी
19:45उसी समय राजा ययाती म्रिग्या करते हुए प्यास से व्याकुई होकर उसी निर्जन कुए के समीट पहुँचे
19:53कोई से आती रुदन की ध्वनी सुनकर राजा ययाती ने नीचे देखा और देव्यानी का दाहिना हाथ पकड़ कर उसे
20:01सुरक्षित बाहर निकाला
20:03बाहर आते ही देव्यानी ने राजा ययाती से कहा कि उनका हाथ पकड़ने के कारण अब शास्त्रा नुसार वे ही
20:11उनके स्वामी और पती बन चुके हैं
20:14राजा ययाती देव्यानी को सादर उनके पिता महर्षी शुक्राचार्य के आश्रम लेकर गए और संपूर्ण घटना का वृत्तान्त सुनाया
20:24अपनी पुत्री का अपमान जानकर क्रोधित हुए शुक्राचार्य को शांत करने के लिए दैत्यराज व्रिश परवा ने एक बड़ा निर्ने
20:32लिया
20:34शुक्राचार्य के क्रोध से बचने हेतू राजकुमारी शरमिष्ठा ने देव्यानी की आजीवन दासी बनकर उसकी सेवा करने का वचन स्विकार
20:42कर लिया
20:43तत्पश्चात महर्शी शुक्राचार्य के आशिर्वाद से राजा ययाती और देव्यानी का विवाह अत्यंत दिव्यरीती से संपन्न हुआ
20:53विवाह के पश्चात देव्यानी के साथ राजकुमारी शर्मिष्ठा भी दासी के रूप में राजा ययाती के विशाल राजमहल में आई
21:02कालांतर में राणी देव्यानी ने दो तेजस्वी पुत्रों को जन दिया जिन में बड़े पुत्र का नाम यदू रखा गया
21:10वही शर्मिष्ठा से भी राजा ययाती के तीन पुत्र हुए जिन में सबसे छोटे पुत्र पुरू थे जो आगे चलकर
21:18महाप्रतापी राजा बने
21:20जब महारानी देव्यानी को राजा ययाती और दासी शर्मिष्ठा के गुप्त संबंधों तथा उनके तीन पुत्रों का सत्यग्यात हुआ, तो
21:29संपूर्ण राजमहल में तीवर हडकंप मच गया
21:32क्रोध से व्याकुल होकर देव्यानी ने ययाती के समक्ष धर्म और विवाह मर्यादा के उलंधन का कड़ा आरोक लगाते हुए
21:41भीशन विरोध व्यक्त किया
21:44अपमान और छल की अगनी में जलती हुई देव्यानी राजमहल के समस्त वैभव को त्याग कर अपने पिता महर्शी शुक्राचार्य
21:52के आश्रम की ओर प्रस्थान कर गई
21:55अपनी गंभीर भूल का भान होने पर राजा ययाती अत्यंत व्याकुल होकर महारानी देव्यानी को रोकने के लिए उनके पीछे
22:03-पीछे वन की ओर दोडे
22:06देव्यानी ने अपने पिता के आश्रम पहुँचकर अश्रुपूरित नेत्रों से राजा ययाती द्वारा किये गए विश्वास घात की पूरी कथा
22:14कह सुनाई
22:16अपनी प्रिय पुत्री का अश्रुपूर्ण चहरा देखकर महर्शी शुक्राचार्य का हृदय तीवर क्रोध से भर गया और उनका स्वरूप अति
22:24उग्र होने लगा
22:26इसी बीच राजा ययाती वहाँ पहुँचे और महर्शी शुक्राचार्य के चर्णों में गिरकर अत्यंत दीन भाव से क्षमा की याचना
22:34करने लगे
22:36परंतु अपने दिये वचनों को तोरने और देव्यानी को दोहखी करने के कारण शुक्राचार्य का क्रोध शांत न हुआ और
22:44उन्होंने हाथ में पवित्र जल ग्रहन किया
22:47महर्शी शुक्राचार्य ने प्रचंड गर्जना करते हुए याती को श्राप दिया कि वे इसी क्षन अपनी संपूर्ण युवावस्था खोकर जरजर
22:56व्रिधावस्था को प्राप्थ होंगे
22:59श्राप लगते ही राजा ययाती का बलिष्ट और कांतिमान शरीर पल भर में जुर्रियों से भर गया, बाल श्वेथ हो
23:06गए और वे एक दुर्बल व्रिध में बदल गए
23:10अचानक आये इस भयानक शारिरिक पतन को देखकर राजा ययाती अत्यंत भयभीत हो गए और अपने कापते हाथों से स्वयन
23:19को संभालने का प्रयास करने लगे
23:22ययाती ने कातर स्वर में शुक्राचार्य से प्रार्थना की की उनकी सांसारिक और इंद्रिय सुखों की लालसा अभी त्रिप्ट नहीं
23:30हुई है इसलिए वे इस श्राप का निवारण करें
23:34राजा ययाती का सच्चा पश्चाताप और उनकी अत्यंत दीन अवस्था देखकर महर्शी शुक्राचार्य के हृदय में दया का भाव जागरित
23:43हुआ
23:44शुक्राचार्य ने कहा कि श्राप पूर्णत वापस नहीं हो सकता परन्तु यदि उनका कोई पुत्र स्वेच्छा से अपना योवन दे
23:52दे तो ययाती पुन्ह युवा हो सकते हैं
23:56महर्शी ने यह भी घोशित किया कि जो भी पुत्र अपने पिता को अपनी युवावस्था सौंपेगा वही आगे चलकर इस
24:04विशाल सामराज्य का एक मात्र उत्तराधिकारी बनेगा
24:09वृद्धावस्था के कारण अत्यंत शिथिल और जरजर हो चुके राजा ययाती भारी हृदय के साथ अपनी राजधानी की ओर पैदल
24:17प्रस्थान करने लगे
24:19राजमहल पहुचकर ययाती ने अपने सभी पाचों पुत्रों को राजसभा में आमंत्रित किया ताकि वे इस अभिशाप और उसके समाधान
24:28की चर्चा कर सके
24:30राजा ययाती ने सर्वप्रथम अपने जेश्ट पुत्र यदू से आग्रह किया कि वे अपनी तरुनाई देकर उनके वार्धक्य को स्विकार
24:39कर ले
24:41परंतुर जेश्ट पुत्र यदू ने पिता के प्रती आदर व्यक्त करते हुए भी अकाल व्रिधावस्था और इंद्रिय भोग की वासना
24:48के कारण अपना योवन देने से स्पष्ट इनकार कर दिया
24:53जेश्ट पुत्र यदू के इनकार से दुहकी होकर राजा ययाती ने अत्यंत आशाभी दृष्टी से अपने अन्य पुत्रों की ओर
25:01देखा, जिसने कुल के भावी इतिहास का आधार रखा
25:05यदू के मना करने के बाद राजा ययाती ने अपने दूसरे पुत्र तुर्वसु से अपनी व्रिधावस्था स्विकार करने और अपना
25:14बहुमूल्य यवन प्रदान करने की याचना की
25:17पिता के इस अनुचित आग्रह को सुनकर तुर्वसु का मुख संकोच से पीला पड़ गया और उन्होंने बुढ़ापे के कश्टों
25:25के भैसे इस प्रस्ताव को अत्यंत विनमृता पूर्वक अस्विकार कर दिया
25:31तुर्वसु के इनकार से अत्यंत शुब्ध और क्रोधित होकर व्रिद्ध ययाती ने अपनी कापती हुई उंगली उठाकर उन्हें श्राप दिया
25:39कि उनके वन्शच कभी भी धर्मनिष्ठ राजा नहीं बनेंगे
25:44इसके पश्चात अत्यंत व्याकुल और हताश होकर राजा ययाती अपने तीसरे पुत्र द्रुह्यू की ओर मुडे और उनसे अपने इस
25:53जरजर शरीर को कुछ समय के लिए अपनाने की भीख मांगी
25:57द्रुह्यू ने पिता के जरजर शरीर और इंद्रिय भोग की असमर्थता को देखते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह
26:05अपनी युवावस्था का बलिदान देकर इस अकाल बुढ़ापे को कभी स्विकार नहीं करेंगे
26:11अपने ही रक्ट से बार-बार तिरस्कृत होने पर महाराज ययाती का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने द्रुह्यू को श्राप
26:19दिया कि उनकी संतानों को कभी कोई व्यवस्थित राज्य प्राप्त नहीं होगा
26:24अत्यंत निराश ययाती ने अपनी धुंधली और कातर आखों से अपने चौथे पुत्र अनु की ओर देखा और उनसे अपनी
26:32योवन शक्ती दान देकर पिता के प्राण बचाने की गुहार लगाई
26:37अनु ने भी पिता के वासनायुक्त मोह को निरर्थक बताते हुए कहा कि एक वृद्ध शरीर न तो यग्य कर
26:44सकता है और नहीं जीवन का सुख ले सकता है इसलिए वह ऐसा त्याग नहीं कर सकते
26:51अनु की इस खरी बात से तिल मिलाकर ययाती ने क्रोध में आकर उन्हें श्राप दे दिया कि उनके वन्षज
26:58युवावस्था में ही मृत्यू को प्राप्थ होंगे और कभी सुखी नहीं रहेंगे
27:03अब ययाती पूर्णत हताश और तूटे हुए मन से अपने सबसे छोटे और परम आज्याकारी पुत्र पुरू की ओर देखने
27:12लगे जिनकी आखों में पिता के प्रती अगाद श्रद्धा थी
27:17अपने व्रिध पिता की अत्यंत दैनी दशा और अपने बड़े भाईयों की निश्थूर्ता को देखकर युवा राजकुमार पुरू का हृदय
27:25करुना और गलानी से भर उठा
27:28अत्यंत विनमरता पूर्वक हाथ जोड कर पुरू ने अपने पिता के चर्णों में मस्तक जुकाया और कहा कि जो पुत्र
27:35पिता की इच्छा को बिना कहे पूर्ण नहीं करता उसका जीवन व्यर्थ है
27:41पुरू ने सहर्ष घोषणा की कीवे अपने पिता के समस्थ शारिरिक कष्टों, जुर्रियों और श्वेत केशों को सहर्ष स्विकार करेंगे
27:49और अपनी तरुन अवस्था उन्हें सौंप देंगे
27:54जैसे ही पुरू ने अपना संकल्प दोहराया, राजसभा के मध्य एक अलौकिक और दैविय प्रकाश पुंच प्रकट हुआ, जो दोनों
28:02के शरीरों को अपनी स्वर्णिम आभा में लपेटने लगा
28:07देखते ही देखते, युवा पुरू का वह सुख्थित, तेजस्वी और बल्शाली शरीर धीरे-धीरे ढलने लगा, उनकी त्वचा पर जुर्रियां
28:15उभराईं और काले घने बाल श्वेत हो गए
28:19दूसरी ओर, जरजर और अशक्त राजा ययाती के शरीर में एक अध्भुत उर्जा का संचार हुआ, उनकी कूबड गायब हो
28:27गई और उनका मुखमंडल पुन्ह नव्यवक की भांती कान्तिमान हो उठा
28:33अपनी नवप्राप्त वृद्धावस्था में खड़े होकर, दुर्बल शरीर वाले पुरु के चहरे पर किंचित मात्र भी दुहक नहीं था, बलकि
28:41उनके नेत्रों में संतोष और सेवा का अलौकिक तेज था
28:46महाराज ययाती ने जब अपने नव्यवन से परिपूर्ण, सुख्थित और बलिष्ट शरीर को देखा, तो वे अपनी इंद्रियों की तीवर
28:54उत्तेजना और अपार हर्ष से फूले नहीं समाए
28:58परम प्रसन होकर ययाती ने अपने परम त्यागी पुत्र पुरु को गले से लगाया और उन्हें वर्दान दिया की चंद्रवंश
29:06का वास्तविक उत्तराधिकारी और समराठ केवल वही बनेगा
29:11इस महान और अभूत पूर्व पैत्रिक त्याग को देखकर संपूर्ण राजसभा आश्चर यचकित रह गई और देवताओं ने भी स्वर्ग
29:19से राजकुमार पुरु के उपर दिव्य पुश्पों की वर्षा की
29:24युवावस्था वापस पाकर राजा ययाती ने अपनी रानियों देव्यानी और शर्मिष्ठा के साथ सुगंधित फूलों से महक्ते राज किये उपवनों
29:33में विलास्पूर्ण जीवन व्यतीत करना आरंभ किया
29:37सैक्डों वर्षों तक ययाती अपने भव्य स्वर्ण महलों में अपसराओं के नरीति, मधुर संगीट और अतिस्वादिष्ट व्यंजनों के बीच इंद्रिय
29:45सुखों में डूबे रहे
29:48उन्होंने अपने राज्य के सुन्दर परवतों, कल-कल बहती नदियों और सुरमय वनों की यात्रा की, फिर भी उनके मन
29:55की तीवर प्यास शांत नहीं हुई
29:58महारानी देव्यानी के साथ एकांत स्वर्ण मंडपों में बहुमूल्य रत्नों और रेश्मी शयाओं पर समय बिताने के बाद भी महाराज
30:07को आत्मिक शांती की प्राप्ती नहीं हुई
30:10शर्मिष्ठा के साथ बिताय गए सुखद क्षणों और उनके प्रेमपूर्ण वचनों ने भी याती के हृदय में धधक रही अत्रिप्ती
30:18की अगनी को शांत नहीं किया
30:21अपने भीतर उठने वाली व्याकुलता को दबाने के लिए उन्होंने राजधानी में विशाल उत्सवों का आयोजन किया जहां सोम्रस और
30:29सुराकी नदिया बहती थी
30:32वर्षों के बाद सदिया बीत गई परन्तु ययाती का युवा शरीर जितना अधिक भोग भोगता उनका मन उतना ही अधिक
30:40अत्रिप्त और अशांत होता जाता
30:43एक दिन जब उन्होंने एक दिव्यस्वर्ण दरपण में अपना मुख देखा तो उन्हें आभास हुआ कि उनका शरीर तो लुआ
30:51है परन्तु उनकी आत्मा अत्यंत व्रिद्ध हो चुकी है
30:56एक भव्यन रिट्य समारोह के मध्य में मधुर संगीत की धुनों के बीच राजा ययाती को अचानक संसार के इन
31:04क्षण भंगुर सुखों से तीवर वैराग्य का अनुभव हुआ
31:09अर्धरात्री के सन्नाटे में वे अकेले ही महल की छट पर तहलते हुए सोचने लगे कि वासनाओं की कोई सीमा
31:16नहीं है और वे कभी समाप्ट नहीं हो सकती
31:20तभी ययाती के अंतर्मन में परम सत्य का प्रकाश चमका और उन्होंने जाना की भोगों से वासना कभी शांत नहीं
31:28होती बलकि वह और तीवर होती है
31:32उन्होंने विचार किया कि वासनाओं को भोग कर शांत करने का प्रयास वैसा ही है
31:37जैसे धधकती हुई अगनी मेघी डाल कर उसे बुझाने की चेश्टा करना
31:43सिन्हासन पर बैठे महाराज ने पश्चाताप की अगनी में जलते हुए सोचा की उन्होंने अपने निर्दोश और परमत्यागी पुत्र पुरू
31:51के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है
31:55द्रिध निश्चय के साथ राजा ययाती ने अपनी रानियों देव्यानी और शर्मिष्ठा को सभा में बुलाया और उन्हें संसार के
32:03इस महामो और अपने वैराग्य के विशय में बताया
32:08दोनों रानिया राजा के इस कठोर सत्य को सुनकर अत्यन्त चकित और दुखी हो गई क्योंकि वे अब भी ययाती
32:15के प्रती गहरे मोहपाश में बंधी थी
32:19तत्पश्चात महाराज ययाती ने अपने सबसे छोटे और परम आज्याकारी पुत्र पुरु को राजसभा के मध्य आदर पूर्वक बुलवाया जो
32:28इतने वर्षों से व्रिध रूप में जी रहे थे
32:32अत्यंत भावुक होकर और आखों में आसू लिये ययाती ने अपने व्रिध पुत्र पुरु को गले लगाया और देव मंत्रों
32:40का उच्चारण करते हुए उन्हें उनकी युवावस्था लोटाने का संकल्प किया
32:45शन्भर में ययाती के शरीर से एक दिव्य और तेजस्वी प्रकाश निकल कर पुरु में समा गया जिससे पुरुपुनह युवा
32:53हो गए और ययाती तुरंट एक अत्यंत व्रिध पुरुष में बदल गए
32:58अब व्रिध रूप में खड़े महाराज ययाती का चहरा वासना से मुक्त होकर परमशान्थ तेजस्वी और आध्यात्मिक आभा से चमक
33:07रहा था
33:09राजसभा के अशुरुपुन विदावचनों के बीच परमज्यानी देवर्शी के समान शांत ययाती ने राजपाट महाराज पुरु को सौंक दिया और
33:17वे तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान कर गए
33:22राजसी ठाट बाट को सदैव के लिए त्याग कर वृद्ध महाराज ययाती ने उस सघन और शांत वैदिक वन में
33:29प्रवेश किया जहां केवल पत्तों की सरसराहट और बहती नदी का संगीत गूँज रहा था
33:35वर्षों तक मखमली कालीनों पर चलने वाले उनके जीनशीन पैर जब सूखी पत्तियों और गीली मिट्टी के संपर्प में आए
33:43तो उन्हें प्रकृती के साथ एक गहरे और अटूट जुडाव का अनुभव हुआ
33:49वन के कोलाहल मुक्त वातावर्ण में चलते हुए ययाती एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी के तट पर पहुँचे जिसका
33:57शीतल जल सूर्य की किर्णों से स्वर्ण के समान चमक रहा था
34:02एक विशाल और प्राचीन वटवरिक्ष की चाव तले पहुँचकर उन्होंने अपनी कुशा का आसन बिछाया और अपनी काया को स्थिर
34:10करते हुए सिध्धासन धारण कर लिया
34:14जैसे ही उन्होंने अपनी आखें बंद की उनके मन के दरपण पर वासनाओं और भोगविलास के वे सारेक्षन तैर गए
34:22जिन्हें उन्होंने हजारों वर्षों तक भोगने के बाद भी अत्रिप्त पाया था
34:27अपनी श्वास को नियंत्रित करते हुए ययाती ने प्राणायाम का अभ्यास आरंभ किया जिससे उनके भीतर का मानसिक कोलाहल थम
34:36गया और बेकेवल ओमकार की सुक्ष्म ध्वनी पर ध्यान केंद्रित करने लगे
34:42समय का चक्र घूमता रहा वर्षा की भारी बूंदे गिरी और शीत रितू की बर्फीली हवाय चली किन्तु ययाती अपने
34:50स्थान पर अचल परवत की भांती अडिक बैठे रहे
34:54उनके भीतर से बहने वाली अहिंसा और परमशांती की तरंगों को महसूस कर वन के भैभी थिरन और मयूर भी
35:02उनके अत्यंत निकट आकर निर्भय होकर बैठने लगे
35:07निरंतर तपस्या के बल से ययाती के व्रिद्ध और जरजर शरीर से अब एक दिव्य स्वर्णिम आध्यात्मिक आभा निकलने लगी
35:14जो वन के अंधकार को दूर कर रही थी
35:18आकाश मार्ग से जाते हुए देवर्शी नारद ने जब इस राजा की अदमय वैराग्य साधना को देखा तो वे अपनी
35:26वीना बजाते हुए उनकी वंधना करने के लिए नीचे उतर आए
35:31देवर्शी की मधुर वीना की जंकार वन में गूंच उठी किन्तु ययाती का चित ब्रह्मा में ऐसा विलीन था कि
35:39वे बाहरी ध्वनियों से पूरी तरहे परे हो चुके थे
35:43साधना की पराकाश्ठा पर पहुँच कर ययाती के शरीर के भीतर पंच्तत्वों प्रिथवी, जल, अगनी, वायू और आकाश का संतुलन
35:52पूरी तरहे स्थापित हो गया
35:55स्वर्गलोक में सिनहासन पर बैठे देवराज इंद्र भी इस अभूतपूर्व वैराग्य को देखकर चकित रह गए और उन्होंने ययाती के
36:03इस परमत्याग को श्रधा पूर्वक नमन किया
36:07अब ययाती का मन मान अपमान, सुखदुख और शीतवश्न जैसे द्वंद्वों से सर्वता मुप्थ होकर उस अनंत सक्चिदानंद में स्थिर
36:15हो चुका था
36:17अचानक उनके मेरुदंड से एक तीवर और तेजस्वी प्रकाश की धारा उपर की ओर उठी जिसने उनके सभी चक्रों को
36:25जागरत करते हुए उन्हें परमचेतना से जोर दिया
36:29वन में कुटिया बनाकर रहने वाले अन्य तपस्वी और महर्शी भी ययाती की इस असाधारन आत्म ज्यान की अवस्था को
36:37देखकर चकित हो दूर से ही उन्हें प्रणाम करने लगे
36:41ययाती के हृदय के सुक्ष्म आकाश में चतुर भुजधारी भगवान नारायन का अत्यन्त मनमोहक और तेजो में स्वरूप प्रकट हुआ
36:50जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान से उन्हें कृतार्थ कर दिया
36:54उस परम जोतिर्मय दर्शन को पाकर ययाती निर्विकल्प समाधी की उस परम अवस्था में लीन हो गए जहां केवल अनंत
37:02आनंद और परम शांती शेश रहती है
37:06इस अलोकिक द्रिश से प्रसन्न होकर स्वर्ग के देवताओं ने अद्रिश रहकर वन के व्रिक्षों से ययाती के उपर दिव्य
37:14पारिजात पुश्पों की वर्शा आरंभ कर दी
37:17अतह अपने जीवात्मा को परमात्मा में विलीन कर महाराज ययाती ने सदा के लिए मोक्ष प्राप्त किया और संसार को
37:26यह अमर संदेश दिया कि वासना कभी भोग से शांत नहीं होती
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