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इस अद्भुत एपिसोड में, हम सूर्यवंश की उस महान गाथा को देखते हैं जो सगर के 60,000 पुत्रों के उद्धार के लिए शुरू हुई थी! महाराजा भागीरथ की अटूट तपस्या और उनके पुरखों के प्रति समर्पण ने कैसे स्वर्ग की पवित्र गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया? महादेव शिव ने कैसे अपने जटाओं में गंगा के प्रचंड वेग को समाहित किया? जानिए इस युग बदलने वाली कथा के हर रहस्य को! 🔥 मोक्षदायिनी गंगा का प्राकट्य! #BhagavataPurana #GangaAvataran #LordShiva #KingBhagiratha #HinduMythology #Purana #SpiritualJourney
Transcript
00:00महर्शी कपिल के आश्रम में सगर के साथ हजार पुत्रों के भस्म होने के महान शोक के बीच वीर अन्शुमान
00:07ने अयोध्या के संरक्षन का भार संभाला।
00:10पूजय गुरु वशिष्ठ द्वारा अन्शुमान का मुकुट धारन कराते ही संपूर्ण राजसभा अपने नए समराट के जैकारों से गुझ गुठी।
00:20सिन्हासन पर विराजमान होकर भी अन्शुमान का ध्यान केवल महर्शी कपिल की उस भविश्यवानी पर था कि केवल गंगा जलही
00:28उनके पूर्वजों का उध्धार कर सकता है।
00:32राजा अन्शुमान ने धर्म और न्याय पूर्वक अपनी प्रजा की रक्षा की, जिससे अयोध्या में चारों ओर समरिध्धी और शान्ती
00:41छा गई
00:42राज्य की अपार समरिध्धी के बाद भी, अन्शुमान के हृदय में अपने पूर्वजों के उध्धार की तडप दिन प्रति दिन
00:49बढ़ती ही चली गई
00:52अन्ता अन्शुमान ने अपने योग्य पुत्र दिलीप को राजकाज सौंक दिया और स्वयन तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान
01:00किया
01:01हिमाले की हिमाच छादित चोटियों पर पहुँचकर अन्शुमान ने कठोर तप आरंभ किया, जहां घोर ठंड भी उनके संकल्प को
01:09नडिगा सकी
01:11दशकों तक ग्रीश्म की चिलचिलाती धूप और शीत की बर्फीली हवाओं को सहते हुए अन्शुमान अन्वरत प्रभु ध्यान में लीन
01:19रहे
01:21वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भी अन्शुमान को आकाशवानी द्वारा ग्यात हुआ की गंगा का अवतरण उनके जीवनकाल में
01:29संभव नहीं है
01:31भारी हृदय के साथ अन्शुमान अयोध्या लोटे जहां अपने अंतिम च्षणों में उन्होंने दिलीप को सूर्यवंश की मर्यादा का रक्षक
01:40बनाया
01:41पिता के देवलोक गमन के बाद राजा दिलीप ने अयोध्या का सिनहासन संभाला और पूर्वजों के उद्धार का प्रण लिया
01:50राजा दिलीप ने राजगुरु वशिष्ट के चर्णों में बैठ कर गंगा को पृत्वी पर लाने के गुप्त विधानों पर परामर्श
01:57किया
01:59महर्शी वशिष्ट ने समझाया कि इसके लिए केवल असाधारन तपस्या और सर्वस्व निछावर करने वाली भक्ती ही मार्ग प्रशस्त कर
02:08सकती है
02:09गुरु की आग्या पाकर राजा दिलीप ने अयोध्या में अनेक महान अश्वमेध और पुन्य यग्यों का अनुष्ठान प्रारंब किया
02:18यग्यों के पश्चात राजा दिलीप ने अपने राजसी वस्त्रों का त्याग किया और घोर तपस्या के लिए तपोवन की ओर
02:26प्रस्थान किया
02:28घने जंगलों में राजा दिलीप ने पंचागनी तपस्या करते हुए भगवान शिव और ब्रहमाजी का ध्यान किया
02:36दिलीप के उग्रतप से उत्पन्न उर्जा ब्रहमांड में व्याप्त होने लगी, जिससे देवलोक के देवता भी उनके द्रिड संकल्प से
02:44चकित रह गए
02:46निरंतर वर्षों की कठोर साधना के बाद भी, राजा दिलीप का शरीर धीरे-धीरे क्षीन होने लगा पर गंगा का
02:54आगमन न हो सका
02:56जब शरीर ने साथ देना छोर दिया, तब निराश लेकिन अडिग राजा दिलीप ने भगवान विश्नु से प्रार्थना कर अपने
03:04वन्शच की रक्षा मांगी
03:06अपने अंतिन सासों में, राजा दिलीप ने अपने तेजस्वी पुत्र भगीरत को बुलाकर सूर्यवन्श के इस महान संकल्प की धरोहर
03:15सौंप दी
03:17पिता के अंतिन संसकार के पश्चात, राजकुमार भगीरत के हरिदय में अपने पूर्वजों की मुक्ती और गंगा अवतरण की प्रतिग्या
03:25और भी अधिक सुद्रेड हो गई
03:28भगीरत ने राजा के रूप में राज्याभिशेक स्विकार तो किया, परंतु उनका चित्त राजसिनहासन के सुखों में नहीं, बल्कि सूर्यवन्श
03:37के उस अधूरे धर्मकार्य में ही अटका रहा
03:41सूर्यवंश के महान धर्म का पालन करते हुए भगीरत ने राज्य का संचालन योग्य मंत्रियों को सौपा और स्वयं कठोर
03:49तपस्या हेतु वनों की ओर प्रस्थान किया
03:52गोकर्ण खेत्र की परम पवित्र भूमी पर पहुँचकर भगीरत ने अपने शरीर और मन को पूर्नत है एकागर करते हुए
04:00ब्रह्मा जी की आराधना प्रारंब की
04:04भगीरत ने पंचागने तपस्या का कठिन मार्ग चुना जहां चारों और प्रजवलित अगने की लप्टों और उपर जलते सूर्य के
04:12मध्यवे एक पाव पर खड़े होकर जब करने लगे
04:16न तो भीशन ग्रीश्म की तपन और नहीं शीतकाल के बरफीले थपेडे भगीरत के इस अटूट संकल्प को रंचमात्र भी
04:24डिगा सके
04:26भगीरत के प्रचंड तपोबल की उर्जा तीनों लोकों में व्याप्थ होने लगी जिससे देवलोक के प्राणी और महरशिगन भी विस्मित
04:34रह गए
04:36भगीरत के अभूत पूर्व त्याग और अडिक भक्ती से संतुष्ट होकर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा अपने हंस पर सवार
04:44होकर स्वयम प्रकट हुए
04:46भगवान ब्रहमा ने मधुर और गंभीर स्वर में भगीरत की तपस्या की सराहना करते हुए उनसे मनोवांचित वर मांगने के
04:54लिए कहा
04:56भगीरत ने हाथ जोड कर विनैकी की वे अपने पूर्वजों की भस्म के उधार हेतु देवन्दी गंगा को प्रित्वी लोग
05:03पर भेजने की क्रिपा करें
05:06ब्रह्मा जी ने वर्दान तो दे दिया परंतु सचेत किया कि गंगा का वेग इतना प्रचंड है कि प्रित्वी उसे
05:14प्रत्यक्ष रूप से सहन नहीं कर सकती
05:17ब्रह्मा जी ने भगीरत को परामर्ष दिया कि केवल देवाधिदेव महादेव ही अपनी जटाओं में गंगा के उस प्रचंड प्रवाह
05:25को रोकने में सक्षम है
05:28ब्रह्मा जी से मार्ग प्राप्त कर भगीरत ने बिना विलम किये भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पुनह कठोर
05:36तपस्या आरंभ की
05:38अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर केवल वायू का भख्षन करते हुए भगीरत का संपूर्ण अस्तित्वों नमह शिवाय के
05:46महामंत्र से गुन्जायमान हो उठा
05:49कैलाश परवत की पवित्र उंचाईयों पर विराजमान अपने भख्ष की निश्चल भख्ती से भगवान शिव का आशुतो श्रिदय द्रविथो उठा
05:59संसार के कल्यान और अपने अनन्य भख्त के मनोरत को पूर्ण करने हेतु महादेव ने गंगा के वेग को अपनी
06:06जटाओं में धारन करने का निर्णय लिया
06:09भगवान शिव भगीरत के सम्मुख अपने अत्यंत भव्य, सौमय और कल्यानकारी रूप में प्रकट हुए
06:17महादेव ने भगीरत को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे स्वर्ग से उतरती गंगा के प्रचंड प्रवाह को अपनी जटाओं
06:25में रोक कर प्रित्वी को विनाश से बचाएंगे
06:28शिव जी की इस अपार अनुकमपा से भगीरत का हृदय कृतग्यता के अश्रूओं से भर गया और उनका पहला महान
06:36उद्देश पूर्ण हुआ
06:38वही ब्रहम लोक में देवनदी गंगा अपनी अपार धाराओं के साथ प्रित्वी की ओर अवतरित होने के लिए तैयार हो
06:46गई
06:47शुकदेव जी ने कहा हे राजन परीक्षित
06:50गंगा मया के इस अद्भुत अवतरण से पूर्व भागिरत के जन्म की वह दिव्य और अलोकिक गाथा सुनना अत्यंत आवश्चक
06:59है जो महाराज दिलीप की गोसेवा से प्रारंभ होती है
07:04अयोध्या के प्रतापी राजा दिलीप और उनकी परम पतिवर्ता पत्नी सुलक्षिना संतान हीनता के गहरे शोक में डूबे हुए अपने
07:12कुलगुरु महर्शी वशिष्ठ के पावन आश्रम पहुँचे
07:16त्रिकाल दर्शी महर्शी वशिष्ठ ने ध्यान लगा कर राजा को बताया कि पूर्व में इंद्रलोक से लोटते समय उन्होंने कामधेनु
07:24गाय का अनादर किया था
07:25जिसके निवारण हेतु उन्हें कामधेनु की पुत्री नंदिनी की सेवा करनी होगी
07:31गुरु की आग्या शिरोधार्यकर राजा दिलीप और रानी सुदक्षिना ने अपनी समस्त राजसी सुखसु विधाव को त्याग दिया और नंदिनी
07:40गाय की सेवा के लिए वन की ओर प्रस्थान किया
07:44महाराज दिलीप प्रति दिन सुभा उठकर नंदिनी गाय को हरे भरे मैदानों में चराने ले जाते और उसकी छाया बनकर
07:52दिन रात उसकी रक्षा करते थे
07:55उधर आश्रम में रानी सुदक्षिना बड़ी ही श्रध्धा और भक्ती के साथ नंदिनी का तिलक करती उसे ताजे फूलों की
08:03माला पहनाती और स्वादिष्ट ग्रास अर्पित करती थी
08:07कई दिनों तक राजा दिलीप ने बिना थके, बिना विचलित हुए नंदिनी की सेवा की और उनका सारा ध्यान केवल
08:15उस दिव्यगाय की सुरक्षा पर ही केंद्रित रहता था
08:19एक दिन जब नंदिनी चरते-चरते एक घने जंगल की गुफा के पास पहुँची, तो अचानक एक विशालकाय और भयानक
08:27मायावी सिंह ने उस पर हमला कर दिया
08:31नंदिनी की करोन पुकार सुनकर राजा दिलीप ने तुरंत अपने तरकश से बान निकालना चाहा, लेकिन उनका हाथ किसी अद्रिश्य
08:39दैविय शक्ती के कारण वही जड़वत हो गया
08:43उस भयानक सिंह ने मनुष्य की वाणी में गरस्ते हुए कहा कि वह महादेव का सेवक कुम्भोदर है और इस
08:50गाय का वद करना उसका अधिकार है
08:54अस्त्रशस्त्र से असमर्थ होने पर राजा दिलीप ने नंदिनी की प्रान रक्षा के लिए सिंह के सामने अपनी पराजय स्विकार
09:02की और स्वयं को उसका भोजन बनाने का प्रस्ताव रखा
09:06राजा दिलीप ने अत्यंत विनमरता पूर्वक सिंग के चर्णों में अपना मस्तक रख दिया और नंदिनी को छोड़ देने की
09:14आचना करते हुए स्वयं के शरीर का बलिदान देने को तत्पर हो गए
09:19जैसे ही राजा दिलीप ने सिंग के प्रहार की प्रतीक्षा की तभी आकाश से देवताओं द्वारा पुश्पवरिष्टी होने लगी और
09:27वह भयानक सिंग हवा में विलीन हो गया
09:31नंदिनी गाय ने प्रसन्न होकर कहा हे राजन यह सिंह केवल मेरी रची हुई एक माया थी मैं तुम्हारी इस
09:39अगवितिय भक्ती और निस्वार्थ त्याग की परीक्षा ले रही थी
09:44प्रसन्न होकर नंदिनी ने राजा दिलीप को वर्दान दिया कि उन्हें एक ऐसा परम तेजस्वी और प्रतापी पुत्र प्राप्थ होगा
09:52जो संपूर्ण विश्व में ख्याती अर्जित करेगा और उनके पूर्वजों का उद्धार करेगा
09:58इस महान वर्दान को प्राप्थ करने के बाद राजा दिलीप और रानी सुदक्षिना अत्यंत हर्षित मन से नंदिनी के दुग्ध
10:07का प्रसाद ग्रहन कर अपनी राजधानी अयोध्या लोट आए
10:10कुछ समय पश्चात रानी सुदक्षिना ने एक अती सुन्दर और ओजस्वी बालक को जन्म दिया जिसके अलौकिक तेज से संपूर्ण
10:20राजमहल प्रकाशित हो उठा
10:23महर्शी वशिष्ठ ने उस बालक का नामकरण करते हुए उसका नाम भागेरत रखा और भविश्यवानी की की यह बालक इतिहास
10:31में एक असाधारन की इर्थिमान स्थापित करेगा
10:35जैसे जैसे भागेरत बड़े हुए वे एक अत्यंत पराक्रमी बुद्धिमान और नीतिवान राजकुमार बने जिन्होंने अपने पूर्वजों के तरपन के
10:45लिए गंगा को प्रिथवी पर लाने का संकल्क लिया
10:49शुकदेव जी कहते हैं हे परीक्षित इसी महान भागेरत ने कठिन तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया है जो अब
10:58गंगा के प्रचंड वेक को अपनी जटाओं में समेटने के लिए तत्पर खड़े हैं
11:04अयोध्या की भव्य राज सभा में चारों और बज्ते मांगलिक शंकनाद और वैदिक मंत्रों चार के बीच युवा राजकुमार भागेरत
11:13के राज्याभिशेक की दिव्यत अयारिया प्रारंभ हुई
11:17कुलगुरु वशिष्ठ ने जैसे ही भागेरत के मस्तक पर सूर्यवंश का दिव्य स्वर्ण मुकुट सुशोभित किया वैसे ही पूरी सभा
11:25महाराज भागेरत की जैके गगनभेदी उद्गोश से गूँच उठी
11:30सिनहासन पर विराज मान होकर महाराज भागेरत ने प्रजा के कल्यान, न्याय और सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प लेते
11:38हुए अपने न्यायप्रिय शासन की स्वर्णिन नीव रखी
11:41एक संध्या अपने महल के एकांत मंत्रणा कक्ष में महाराज भागिरत ने कुलगुरु वशिष्ट से अपने पूर्वजों के अधूरे तरपन
11:51और उनके मोक्ष के मार्ग के विशय में अत्यंत व्याकुल होकर पूछा
11:56कुलगुरु वशिष्ट ने अत्यंत गंभीर स्वर में महाराज सगर के साथ हजार पुत्रों के कपिल मुनी के दिव्यकोप से क्षन
12:04भर में भस्म होने की उस दारोन गाथा को पुनह सुनाया
12:09महाराज भागेरत की बंद आखों के सामने उनके पूर्वजों की भस्म के वे विशाल धेर तैरने लगे जो युगों से
12:16पाताल लोग के अंधकार में बिना किसी मुक्ती के पड़े थे
12:21महर्शी वशिष्ठ ने बताया कि केवल स्वर्गलोग से बहने वाली परम पावन गंगा ही अपनी दिव्यधाराओं से उन भस्म अवशेशों
12:29को स्पर्ष कर उन्हें मोक्ष प्रदान कर सकती है
12:34अपने पूर्वजों की इस दैनिय स्थिती को सुनकर राजा भागेरत का हरिदय करुणा से भर गया और उन्होंने उसी क्षण
12:41गंगा को प्रिथवी पर लाने का अटल संकल्प लिया
12:45अगले ही दिन महाराज भागेरत ने मंत्रियों की आपात सभा बुलाई और अपने इस महान संकल्प की पूर्ती के लिए
12:53राजपाट छोड़कर वन जाने की अपनी द्रेड इच्छा प्रकट की
12:58मंत्रियों और राज्य के व्रिद्ध सभासदों ने महाराज को रोकने का बहुत प्रयास किया
13:04परंतु भागेरत के मुख पर अपने कुल के उद्धार की अटूट निष्ठा देखकर वे मौन हो गए
13:11सामराज्य की स्थिर्ता और प्रजा के सुख को सुनिष्चित करने के लिए राजा भागेरत ने राजकाज का सम्पून दायत्व अपने
13:19अत्यंत योग्य मंत्रियों के परिशत को सौंक दिया
13:23राजसी वैभव अमूल्य रत्नों से जड़े आभूशनों और रेश्मी वस्त्रों का त्याग कर महाराज भागेरत ने अत्यंत साधारन तपस्वी के
13:32वेश को स्वीकार किया
13:34मस्तक पर पवित्र भस्म का त्रिपुंद लगाए और हाथों में केवल एक कमंडल धारन किये भागेरत का रूप अब एक
13:42प्रतापी राजा से बदल कर एक परम तपस्वी का हो चुका था
13:47जैसे ही भागेरत राज महल के मुख्यद्वार से बाहर निकले अयोध्या की अश्रुपूर्ण प्रजा ने अपने प्रिय राजा को विदाई
13:54देने के लिए मार्ग के दोनों और कतारे लगा ली
13:58बिना पीछे मुडे अत्यंत द्रिड कद्मों से महाराज भागेरत ने अयोध्या की सीमाओं को पार किया और उनकी द्रिष्टी केवल
14:07और केवल उत्तर दिशा के हिमाले पर टिकी थी
14:11मार्ग में आने वाले घने और भयानक जंगलों, उफंती जंगली नदियों और हिंसक पशुओं के भय को पीछे छोड़ते हुए
14:19भागेरत अपनी कठिन यात्रा पर निरंतर बढ़ते रहे
14:23हिमाले की बरफीली हवाओं और हाड कमपा देने वाली प्रचंड ठंड के बीच भी तपस्वी भागेरत के भीतर कुलुद्धार की
14:31तीवर तपोगने धधक रही थी
14:34अंतह महाराज भागेरत हिमाले की उस पवित्र घाटी में पहुँचे जहां प्रकृती अत्यंत शांत थी और चारों और देवत्व का
14:42अनुभव हो रहा था
14:44एक विशाल शिलाखंड पर सुखासन में बैठकर महाराज भागेरत ने अपनी आखे बंद कर ली और ब्रहमाजी को प्रसंद करने
14:53के लिए घोर तपस्या प्रारंब कर दी
14:57भागेरत की इस अखंड तपस्या से उत्पन होने वाले तपोबल का तेज धीरे-धीरे संपूर्ण दसों दिशाओं और ब्रहमाजी में
15:05फैलने लगा
15:07महाराज भागेरत ने अपने शरीर के सभी सुखों का परित्याग करते हुए स्वयं को केवल एक पैर के अंगुठे पर
15:14संतुलित कर लिया और अपना संपूर्ण ध्यान स्विष्टिकर्ता ब्रहमाजी में केंद्रित कर दिया
15:21वर्षों बीतने लगे और भागेरत ने अन्न और जल का पूर्ण रूप से त्याग कर केवल वायु का आहार करते
15:28हुए अपने प्राणों को स्थिर कर लिया
15:32उनके इस महान संकल्प को देख कर हिमालय के शांत वन भी विस्मय से भर गए और व्रिक्षों की शाखाएं
15:39उनके सम्मान में नत्मस्तक होने लगी
15:42रितुय बदलती रही, वसंत की बहार आई और पच्जड के सूखे पत्ते गिरे, किन्तु भागिरत पाशान की भांती अडिग रहे
15:52ग्रिश्म रितु की भीशन तपन में जब सूर्य की किरने प्रिथवी को जुलसा रही थी, तब भागिरत के शरीर से
15:59तपोबल की दिव्य अगने निकलने लगी
16:02वर्शा रितु की मूसलाधार बूंदे और गड़गडाते मेग भी उनके अखंड ध्यान में तनिक भी बाधा उत्पन्न नहीं कर सके
16:12शीतकाल के भीशन पाले और बर्फ बारी ने जब पूरे हिमालय को श्वेट चादर से ढख दिया, तब उनके तपोबल
16:19की उश्मा से चारों ओर की बर्फ पिघलने लगी
16:23स्वर्ग लोग से देवर्शी नारद ने जब भागिरत की इस असाधारन तपस्या को देखा, तो वे अपनी वीना बजाकर उनके
16:31अटूट विश्वास का गुनगान करने लगे
16:35धीरे धीरे भागिरत के मस्तक से ज्ञान और श्रधा का एक प्रचंड सुनहरा प्रकाश पुन्च फूट पड़ा, जो आकाश की
16:42ओर बढ़ने लगा
16:44वह दिव्य प्रकाश बादलों को चीरता हुआ, ब्रहमांड की सीमाओं को पार कर सीधे सत्य लोग की ओर बढ़ने लगा
16:52जहां ब्रहमा जी विराजमान है
16:55इस अत्यंत तीवर तपोबल की गर्मी से इंद्र आदी समस्थ देवता भयभीत हो उठे और वे व्याकुल होकर आपस में
17:03चर्चा करने लगे
17:06भागीरत के तपोबल के प्रभाव से सातों समुद्रों में लहरें उठने लगी और परवतों के शिखर डगमगाने लगे, जिससे स्रिष्टी
17:14का संतुलन हिल गया
17:17सत्यलोक में ब्रहमा जी का दिव्यदर्बार उस सुनहरे प्रकाश से पूरी तरह आलोकित हो उठा, जिसकी तीवरता सूर्य से भी
17:25अधिक थी
17:26अपने शांत स्वरूप में विराजमान स्रिष्टी के रचेता ब्रहमा जी ने अपनी आखें खोली और उस महान तपस्वी के निस्वार्थ
17:35भाव को जान लिया
17:37भागीरत के इस महान और पवित्र उद्देश को स्वीकार करते हुए ब्रहमा जी ने स्वयं प्रित्वी लोग पर जाने का
17:44निश्चय किया
17:46अचानक हिमालय की उस शांत घाटी का आकाश एक अपूर्व सुनहरी और श्वेत रोशनी से जग्मगा उठा जिससे चारों और
17:55देवत्व बिखर गया
17:57अपने दिव्य वाहन हंस पर सवार होकर चार मुख वाले जगत्पिता ब्रहमा जी अत्यंत शांत और करुणामई मुद्रा में भागिरत
18:05के समीप उत्रे
18:06इस परम दिव्य उपस्थिती का अनुभव करते ही भागिरत ने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली और अपने समक्ष साक्षात ब्रहमांड
18:16के रचिता को पाया
18:18हर्ष और भक्ती के आसुओं से सराबोर होकर भागिरत ने ब्रहमा जी के चर्णों में साश्टान प्रणाम किया और अपनी
18:26पूरी देह को भूमी पर अर्पित कर दिया
18:29तब ब्रहमा जी ने अपना अभय हस्त उठाया और अत्यंत कोमल तथा गंभीर स्वर में कहा के भागिरत
18:37मैं तुम्हारी इस कठिन तपस्या से अत्यंत प्रसन नहूं मनोवाचित वर मांगो
18:44ब्रहमा जी के वचनों को सुनकर राजा भागिरत अपने स्थान पर उठ खड़े हुए और अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने दोनों
18:52हाथ जोड़ कर स्तुती करने लगे
18:55भागिरत ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा इस रिष्टी के रच्चिता कपिल मुनी के कोप से भस्म हुए मेरे साथ हजार
19:03पूर्वज आज भी बिना सद्गती के तड़प रहे हैं
19:08क्रिपाकर देवलोग की पावन नदी गंगा को प्रिथवी पर भेजने का वर्दान दीजिए ताकि उनके पवित्र जलके स्पर्ष से मेरे
19:16पूर्वजों का उध्धार हो सके
19:19भगवान ब्रह्मा ने अपनी चारों मुखमुद्राओं से गहन करुणा बरसाते हुए भागिरत की इस महान और निहस्वार्थ प्रार्थना को स्विकार
19:28किया
19:29ब्रह्मा जी ने मंद मुस्कान के साथ कहा ये भागिरत अपने पित्रों के प्रती तुम्हारा यह अनुराग और यह कठिन
19:37तपस्या इतिहास में सदा अमर रहेगी
19:40मैं तुम्हारी इस पवित्र इच्छा को पूर्ण करने का वर्दान देता हूँ और गंगा को स्वर्ग लोक से विदा करने
19:47की आध्या प्रदान करता हूँ
19:50परंतु वत्स जब गंगा स्वर्ग से तीवर वेग से पृत्वी की ओर प्रस्थान करेगी तो उसका वह प्रचंड बल सामाने
19:58स्रिष्टी सहन नहीं कर पाएगी
20:01यदि गंगा अपने पूर्ण वेग के साथ सीधे प्रित्वी पर गिरी, तो उसके प्रचन प्रहार से संपूर्ण भूमंडल छिन्नभिन होकर
20:09पाताल लोक में समा जाएगा
20:12इस चराचर जगत में केवल एक ही ऐसी परमसत्ता है, जो गंगा के उस असीमित वेग और भार को अपनी
20:20जटाओं में धारण कर सकती है
20:23वे देवों के देव महादेव हैं, जो कैलाश परवत पर समाधिस्थ होकर स्रिष्टी के कल्यान के लिए सदैव ततपर रहते
20:31हैं
20:32तुम महादेव की शरण में जाओ और अपनी अनन्य भक्ती से उन्हें प्रसंद कर गंगा को अपनी जटाओं में रोकने
20:40का अनुरोध करो
20:42ब्रह्मा जी की यह चेतावनी सुनकर भागिरत के मन में एक नया संकल्प जागा और उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से
20:50अपना मस्तक जुका लिया
20:52शिव अत्यंत दयालू और आशुतोष हैं सच्चे मन से की गई तुम्हारी आराधना से वे अवश्य ही तुम्हारी सहायता के
21:01लिए आगे आएंगे
21:03इतना कहकर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा धीरे धीरे एक अत्यंत तेजोमे और अलौकिक स्वर्णिन प्रकाश पुंज में विलीन हो
21:11गए
21:13भागीरत ने उस दिव्य प्रकाश को साश्टान प्रणाम किया और ब्रह्मा जी के वचनों को अपने हृदय में सदा के
21:20लिए संजो लिया
21:22अब अकेले उस शान्त तपो भूमी में खड़े होकर राजा भागीरत ने उत्तर दिशा की ओर देखा जहां बर्फ से
21:29धकी हिमालय की विशाल चोटिया दिखाई दे रही थी
21:34अपने पित्रों के उद्धार के लिए द्रेड संकल पित होकर भागीरत ने कठिन बर्फीले रास्तों और ठंडी हवाओं को पार
21:41करते हुए कैलाश की ओर प्रस्थान किया
21:45कैलाश के पावन आंचल में पहुँचकर उन्होंने शिव साधना के लिए एक शांट और पवित्र शिलाखंड का चयन किया
21:54कडाके की ठंड और बर्फीले तूफानों की परवाह किये बिना भागीरत ने अपनी आखे बंद कर ली और ओम नमः
22:01शिवाय मंत्र का जाप प्रारंभ कर दिया
22:05उधर कैलाश परवत की सर्वोच चोटी पर गेहन समाधी में लीन देवों के देव महादेव ने भागीरत की इस घोर
22:13तपस्या के स्पंदन को अपने हरिदय में महसूस किया
22:17नेत्र मूदे ध्यानस्थ भागीरत के अंतर्मन से उठती ओम नमः शिवाय की पावन ध्वनी ने कैलाश पती महादेव की गेहन
22:25समाधी में मधूर स्पंदन उत्पन्न कर दिया
22:29जैसे जैसे समय बीटता गया भागीरत ने अपनी साधना को और उग्र करते हुए ग्रिश्म काल में चारों और प्रजवलित
22:37अगनी के मध्य एक पैर पर खड़े होकर पंचागनी तब प्रारंब किया
22:42सूर्य देव के प्रचंड ताप और चारों और धधकती ज्वालाओं के बीच भी भागीरत का संकल्प अडिग रहा और उनका
22:50संपूर्ण शरीर तपस्या के दिव्य तेज से दमकने लगा
22:55वर्षा रितु के आगमन पर मुसलाधार वर्षा और कड़कती आकाशिय बिजलियों के प्रहार को भी भागीरत ने सहेश स्विकार किया
23:03पर अपने ध्यान की लएको भंग नहीं होने दिया
23:07शीत रितु के हिंपातों ने जब उनके पूरे शरीर को बर्फ की परतों से ढख दिया तब भी भागीरत के
23:14हिर्दय में जल्ती भक्ती की अगनी तनिक भी मंद न हुई
23:19भागीरत के इस अभूत पूर्व और कठोर आत्मत्याग को देखकर स्वर्गलोग के देवता और गंधर्व भी स्थब्ध रह गए और
23:27आकाश मार्ग से उन पर कौतुक भरी द्रिश्टी डालने लगे
23:31कैलाश पर्वत पर विराजित माता पार्वती ने जब एक मृत्यू लोग के राजा के इस निस्वार्थ त्याग को देखा तो
23:39उनका ममतामई हृदय करुना से भर उठा
23:43भगवती पार्वती ने मंद मुस्कान के साथ महादेव की ओर देखा और उनसे इस अनन्य भक्त पर शीघर अनुग्रह करने
23:51की प्रार्थना की
23:53भक्त वक्सल शिवजी ने माता पार्वती के वचनों को स्विकार किया और उनके भाल पर सुशोभित चंद्रदेव की शितलता से
24:01संपूर्ण कैलाश आलोकित हो उठा
24:05महादेव अपनी व्याग्रचर्म की आसन स्थली से उठे और अपने तेजोमय त्रिशूल को धारण कर अपने भक्त को दर्शन देने
24:13के लिए प्रस्तुत हुए
24:15शन भर में भागिरत के तपस्या स्थल पर एक अलोकिक नीला और स्वर्निम प्रकाश छा गया जिसने चारों और जमी
24:23बर्फ को पिढ़ला कर पुश्पों में बदल दिया
24:26परमशान्ती का अनुभव करते हुए भागिरत ने धीरे धीरे अपनी आखे खोली और अपने समक्ष प्रत्यक्ष जगतगुरु शिव का स्वरूप
24:35पाया
24:35उनके सामने साक्षाद देवों के देव महादेव खड़े थे जिनका स्वरूप सूर्य के समान तेजस्वी और चंद्र के समान अत्यंत
24:46शीतल प्रतीत हो रहा था
24:49महादेव की जटाओं में चंद्रमा मंद मंद मुस्कुरा रहा था और उनके गले में लिप्ता सर्प भी इस पावन ख्षन
24:56का साक्षी बनकर शांत खड़ा था
24:59भगवान शिव को अपने सम्मुख पाकर भागीरत गदगद हो गए और भूमी पर साश्टान दंडवत होकर उनके श्रीचर्णों में गिर
25:07पड़े
25:09महादेव ने अत्यंत वात्सल्य पूर्वक अपना वर्देहस्त उठाया और भागीरत को सदा अभय रहने का आशिरवाद दिया
25:18शिवजी की असीन क्रिपा पाकर भागीरत उठे और अपनी आखों में भक्ती के अश्रुलिये हाथ जोड़ कर शिवस्तुती करने लगे
25:27त्रिपुरारी महादेव ने अपनी मेग गंभीर वाणी में कहा हे राजन तुम्हारी अनन्य साधना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ अपनी
25:36मनोकामना व्यक्त करो
25:39भागीरत ने अत्यंत नमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर कहा हे प्रभु
25:44ब्रहमाजी के आदेशानुसार माता गंगा को धर्ती पर लाने हेतु केवल आप ही उनके वेग को धारण कर सकते हैं
25:54भागीरत की यह लोक कल्यानकारी प्रार्थना सुनकर महादेव ने तकपरता से अपनी सहमती दी और गंगा की तीवर धारा को
26:02अपनी जटाओं में थामने का वचन दिया
26:05महादेव ने कैलाश के शिखर पर खड़े होकर अपनी विशाल जटाओं को खोलना आरंभ किया जिससे संपूर्ण ब्रहमांड में एक
26:14अलौकिक स्पंदन गूज उठा
26:17राजा भागिरत ने महादेव के इस अत्यंत क्रिपालो रूप को देखकर भूमी पर दंडवत प्रणाम किया और उनका हृदय अगाद
26:25श्रधा से भर गया
26:27शिव ने अपनी सौमय और गंभीर द्रिष्टी भागिरत पर डालते हुए उन्हें आदेश दिया कि वे अब गंगा का ध्यान
26:35कर उन्हें स्वर्ग से धर्ती पर आने का आहवान करें
26:39राजा भागिरत ने आखे मूद कर अपने दोनों हाथ स्वर्ग की ओर उठाए और पूर्ण एकागरता से आदि गंगा का
26:47स्मरण करना प्रारंब किया
26:49ब्रहम लोक में उपस्थित देवी गंगा ने जब भागिरत का आहवान सुना तो वे अपने तीवर और अदमय वेक के
26:57साथ प्रित्वी की ओर प्रस्थान करने के लिए उद्यत हुई
27:02अपने प्रचन प्रवाह के मद में चूर होकर गंगा ने मन ही मन विचार किया कि वे अपने असीम वेक
27:08से महादेव को भी बहा कर पाताल लोक ले जाएंगी
27:13अचानक कैलाश परवत के उपर का आकाश काले और सुनहरे बादलों के घमासान से घिर गया और भयानक ब्रहमांडिय हवाई
27:21चलने लगी
27:23इस महाप्रल्यकारी द्रिश के बीच भी देवाधिदेव महादेव अत्यंत शांत भाव से मुस्कुरा रहे थे और उनके मुखमंडल पर एक
27:32अध्भुत तेज चमक रहा था
27:35राजा भागीरत ने आकाश में उठती हुई उन प्रल्यंकारी तरंगों को देखकर अत्यंत भाय और विस्मय के साथ अपनी आखें
27:43खोल दी
27:45शिव ने अपने दोनों पैरों को कैलाश की चट्टानों पर मजबूती से जमाया और अपनी असीमित जटाओं को आकाश में
27:53एक महाजाल की भाती फैला दिया
27:56अगले ही क्षण दिव्यमंदाकिनी गंगा का पहला महाप्रवाह अत्यंत तीवर गर्जना के साथ स्वर्ग की सीमा को लांग कर सीधे
28:05प्रित्वी की ओर जप्ता
28:07गंगा के उस अत्यंत भीशन वेग की ध्वनी से तीनों लोग धर्रा उठे और ऐसा लगा मानों प्रलै का समय
28:14अत्यंत निकट आ गया हो
28:17महादेव ने बिना विचलित हुए कैलाश के शिखर पर अपना पैर और भी कसकर दबाया जिससे पूरा परवत उनके अलोकिक
28:25भार से चमकने लगा
28:26और फिर गंगा का वह अनन्त सागर के समान विशाल और भयंकर जल प्रपात सीधे शिव के मस्तक पर अत्यंत
28:35तीवर गती से आगिरा
28:38आश्चर्य की बात यह हुई कि वह प्रचंद जलधारा शिव की घनी जटाओं के व्यूह में प्रवेश करते ही पूरी
28:44तरह से विलीन और लुप्थ हो गई
28:48गंगा को शीघर ही अपनी भूल का आभास हुआ क्योंकि वे शिव की जटाओं के उस अभेद्य चक्रवियू से बाहर
28:55निकलने का कोई मार्ग नहीं ढूंड पा रही थी
28:58इस अलोकिक और विस्मयकारी घटना को देख कर राजा भागिरत की आखों से हर्ष और कृतग्यता के अश्रु बहने लगे
29:06और उन्होंने महादेव की जयजयकार की
29:10शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को सुरक्षित रूप से बांध कर शांत मुद्रा धारन की और वे भागिरत की
29:17ओर मंदमंद मुस्कुराते हुए देखने लगे
29:21देवराज, इंद्र और अन्य सभी देवता बादलों के उपर प्रकट हुए और उन्होंने महादेव के इस महान त्याग और उपकार
29:29पर पुश्पों की वर्षा करना प्रारंब किया
29:32शिव ने भागिरत को आश्वस्त किया कि वे उचित समय पर गंगा को इस प्रकार मुक्त करेंगे कि उनका प्रवाह
29:40प्रित्वी के लिए वर्दान बन जाएं
29:43भागिरत ने महादेव के समक्ष करबध खड़े होकर विनम्रता पूर्वक प्रार्थना की हे त्रिलो की नाथ अब गंगा को प्रित्वी
29:51पर प्रवाहित कर हमारे पूर्वजों का उद्धार करें
29:56महादेव ने अपनी शांत ज्यानमई द्रिष्टी से भागिरत को देखा, उनके हृदय में बसी करुणा की असीम गहराई परिलक्षित हो
30:04रही थी
30:05फिर उन्होंने अपनी जटाओं को धीरे-धीरे खोलना प्रारंब किया, मानो कोई महान कलाकार अपनी अनुपम कृती को अंतिम रूप
30:14दे रहा हो
30:16उनकी एक जटा से गंगा की पवित्रधारा एक पतली रस्तरेखा के समान अवतरित हुई, जो पहले मंद और फिर शनैश
30:24नैह प्रबल होने लगी
30:26वह धारा कैलाश की उची चोटियों से उतरती हुई, शीतल और पवित्र जल से धर्ती को स्पर्ष करने को आतुर
30:34थी
30:35भागीरत ने ततकाल अपना रत आगे बढ़ाया और गंगा की पवित्रधारा उनके पीछे पीछे धर्ती पर बहने लगी, जैसे कोई
30:44दिव्य अनुयाई
30:46गंगा का जल हिमालय की घाटियों से होकर बहता हुआ, हर कण में दिव्यता और जीवन का संचार करता हुआ
30:53आगे बढ़ रहा था
30:55मार्ग में अनेक रिशिमुनियों और तपस्वियों ने गंगा के पवित्र आगमन पर अपने आश्रमों से निकल कर पुष्प वर्षा की
31:03और वंदना की
31:05जिस भूमी से गंगा गुजरती, वह बंजर भूमी भी हरियाली से खिल उठती, मानो प्रकृती स्वय नवजीवन का उच्सव मना
31:13रही हो
31:15स्वर्ख से देवतागन और गंधर्व वायुयान में सवार होकर पृत्वी पर गंगा के इस अद्भुत प्रवाह को निहारते हुए प्रसन्चित
31:23थे
31:25लंबी यात्रा के बाद गंगा अपने विशाल प्रवाह के साथ उस स्थान के निकट पहुँची जहां सगर के पुत्रों की
31:32अस्थिया शांत पड़ी थी
31:35भागीरत ने अपनी यात्रा जारी रखी उन्हें पता था कि उनका लक्ष अभी पूर्ण नहीं हुआ है जब तक गंगा
31:43उन अस्थियों तक न पहुँचे
31:46गंगा ने अब अपना मार्ग पृत्वी के भीतर पाताल लोग की ओर बनाया जहां सगर के साथ हजार पुत्रों की
31:53अस्थिया पड़ी थी
31:55उस घोर अंधकारमय पाताल में जहां केवल अस्थियों का धेर था गंगा की धारा ने एक स्वर्गिय प्रकाश फैलाया
32:04जैसे ही गंगा का पवित्र जल उन राख पर पड़ा एक अध्भुत चमक उत्पन हुई और प्रत्येक अस्थिकन शुद्ध होने
32:12लगा
32:14ततकाल उन प्योरिफाइड अस्थियों से साथ हजार दिव्य आत्माय प्रकाश के रूप में उत्पन हुई और स्वर्ग की ओर उठने
32:21लगी
32:23भागीरत ने उपर प्रित्वी पर खड़े होकर आकाश की ओर उठते उन प्रकाश पुंजों को देखा और उनकी आखों से
32:31कृतग्यता के अश्रुबह निकले
32:34इस महान कार्य की सिध्धी के बाद गंगा सदा के लिए प्रित्वी पर प्रवाहित होने लगी, मोक्षदायनी और पाफारिनी के
32:42रूप में स्थापित हुई
32:44देवता, मनुष्य और यहां तक की नागलोग के प्राणी भी भागिरत के तप और गंगा के पवित्र अवतरण की महिमा
32:51का गुनगान करने लगे
32:54इस प्रकार भागीरत की द्रिडता और महादेव के अतुल्य त्याग से गंगा ने प्रिथवी पर अवतरण किया और युगों-लुगों
33:02तक समस्त मानवता का कल्यान करती रही
33:06महादेव ने अपनी विशाल जटाओं से गंगा की एक अत्यंत सुक्षम धारा को मुक्त किया जो हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों
33:14पर भागीरत ने हाथ में दिव्य शंक लेकर शंक नाद किया और आगे-ागे चलने लगे जबकि गंगा मा पवित्र
33:23गर्जना के साथ उन
33:34उतर कर मैदानी भागों की ओर प्रचंड वेक से बढ़ी मार्ग में स्थित रिशियों और मुनियों के आश्रमों के निकट
33:42से बहती हुई मा गंगा पर मुनियों ने वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ पुश पवर्शा की भागीरत बिना थके लगातार
33:51आगे बढ़ते
33:52रहे और उनके पीछे-पीछे गंगा का पुन्यसलिल पूरी धर्ती को उर्वर और पवित्र करता चला गया
33:59विशाल भूभाग को त्रिप्ट करती हुई गंगा की धारा आर्यवर्थ के समरिध मैदानों से होकर पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित
34:07होने लगी
34:09गंगा जल के पावन स्पर्ष से समस्त जीवजन्तु, वनस्पती और मानव जाती एक नवजीवन और मोक्षदाई शान्ती का अनुभव करने
34:18लगी
34:20भागीरत ने भक्तिभाव से पीछे मुड कर देखा, तो उन्हें गंगा नदी के प्रवाह के साथ साक्षात भगवती गंगा का
34:27अलौकिक रूप दिखाई दिया
34:30चली आ रही यह पवित्रधारा अंत्तह महर्शी कपिल के आश्रम वाले उस निर्जन स्थान पर पहुँची, जहां सगर के साथ
34:38हजार पुत्रों की राख बिखरी पड़ी थी
34:41युगों-युगों से उस बंजर भूमी पर पड़ी सगर पुत्रों की काली भस्म की विशाल धेरिया अपने उद्धार की प्रतीक्षा
34:48कर रही थी
34:50भागीरत ने महर्शी कपिल के चर्णों में प्रणाम कर उनसे अपने पूर्वजों के पूर्ण मोक्ष के लिए प्रार्थना की
34:58महर्शी कपिल ने अपनी तपस्वी द्रिष्टी उठाई और मंद मुस्कान के साथ गंगा के आगमन का स्वागत करते हुए भागीरत
35:07को आशिरवाद दिया
35:09गंगा की पहली पवित्र लेहर तीवर वेग के साथ उन साथ हजार सगर पुत्रों की भस्म की धेरियों पर आकर
35:16टकराई
35:18जैसे ही दिव्य गंगाजल ने भस्म को स्पर्श किया वहाँ एक अतिशे स्वर्णिम प्रकाश का विस्पोट हुआ और सदियों का
35:26श्राप भस्म हो गया
35:28उस पावन भस्म से सगर के साथ हजार पुत्रों के दिव्य रूप प्रकट हुए जिनके चहरे पर परमशान्ती और मुक्ती
35:35का भाव था
35:37सगर पुत्रों ने हाथ जोड कर राजा भागीरत और मा गंगा को कोटी कोटी धन्यवाद दिया और उनके कष्ट मिट
35:45गए
35:46आकाश से अलोकिक देविमान उत्रे और सगर के सभी पुत्र दिव्य शरीरों में विराजमान होकर सीधे वैकुंठ और स्वर्गलों की
35:55ओर प्रस्थान कर गए
35:57इसके पश्चात गंगा की वह अपार जलधारा प्रित्वी के विशाल गड़े में समा गई और उससे एक विशाल सागर महासागर
36:05का निर्मान हुआ
36:07समुद्र तट पर खड़े भागेरत की आखों में अश्रुआ गए क्योंकि उनका भीशन संकल्प पूरा हुआ था और उनके वंश्जों
36:16को परम्मोक्ष मिल गया था
36:19देवताओं ने आकाश से पुश्पों की वर्षा की और सूर्यवंश में सदैव के लिए शांती, गौरव और सर्वव्यापी पवित्रता का
36:27युग प्रारंभ हुआ

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