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इस अद्भुत एपिसोड में, हम सूर्यवंश की गाथा को आगे बढ़ाएंगे, जहाँ चक्रवर्ती सम्राट अम्बरीष के बाद एक और महान शासक, राजा मांधाता का उदय होता है। जानें कैसे राजा युवनाश्व के शरीर से एक अद्वितीय जन्म हुआ और मांधाता ने अपनी शक्ति से समस्त पृथ्वी पर राज किया। इसके पश्चात्, एपिसोड गोता लगाता है एक ऐसे रहस्यमय ऋषि, सौभरि मुनि की गाथा में, जिन्होंने जल के भीतर हजारों वर्षों तक तपस्या की। एक साधारण घटना कैसे उनकी तपस्या भंग करती है और उन्हें सांसारिक मोह के मायाजाल में फंसाती है, जब वे राजा मांधाता की पचास पुत्रियों से विवाह करते हैं। क्या सौभरि इस माया से निकल पाएंगे? क्या उन्हें वैराग्य का सच्चा मार्ग मिलेगा? देखें कैसे इच्छाएँ हमें बांधती हैं और कैसे उनसे मुक्ति मिलती है। #भागवतपुराण #सूर्यवंश #मांधाता #सौभरिमुनि #वैराग्य #माया #हिन्दूकथाएँ #महाभारत #विष्णुकथा #पौराणिककथाएँ #यूट्यूबसीरीज #भारतीयसंस्कृति #आध्यात्मिकज्ञान #सनातनधर्म #ज्ञान #मोक्ष
Transcript
00:00भयानक सुदर्शन चक्र के भय से व्याकुल क्रोधित दुर्वासा रिशी अंत्य समराट अंबरीश के चर्णों में आगिरे अपने अहंकार का
00:08परित्याग कर क्षमा याचना करने लगे.
00:11अपने परम भक्त के हरिदय में करुना का सागर उमड पड़ा और अंबरीश ने बिना किसी दुर्वेश के रिशी दुर्वासा
00:19को सहर्श क्षमा कर दिया.
00:21अंबरीश की ख्षमावानी सुनते ही भगवान विश्नु का प्रचंड सुदर्शन चक्र जो दुर्वासा का पीछा कर रहा था, शान्थ होकर
00:30अपनी दिव्य जोती समेटते हुए आकाश में विलीन हो गया.
00:35भयमुक्त हुए दुर्वासा को देख, अंबरीश ने विनमर्ता पूर्वक उन्हें अनेकों प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन और फल अर्पित किये, जिससे
00:44रिशी की क्षुधा शान्थ हो सके.
00:46त्रिप्थ होकर दुर्वासा ने अंबरीश की असाधारन भक्ती, असीम धैर्य और उदार्ता की मुक्तकंट से प्रशंसा की, उन्हें विश्नु भक्तों
00:56में श्रिष्ट बताया.
00:58अंबरीश ने विनमर्ता से सारा श्रेय भग्वान विश्नु को दिया, यह दर्शाते हुए कि वे तो केवल उनके एक तुछ
01:06सेवक मात रहें.
01:08फ्रिदय में अंबरीश के प्रती अपार श्रद्धा और शांती लिए दुर्वासा रिशी अंता वहां से विदा हुए, स्वयं को धन्य
01:16महसूस करते हुए.
01:17इस अध्भुत कथा के समापन पर शुकदेव जी ने महाराजा परीक्षित की ओर देखा और सुर्यवन्ष की आगे की गौरवशाली
01:27गाथा सुनाना पुनहा आरंभ किया.
01:30अंबरीश ने दीर्गकाल तक धर्म प्रायंता और न्याय के साथ पृत्वी पर शासन किया, अपनी प्रजा को सुक सम्रिधी प्रदान
01:38करते हुए.
01:40अंबरीश के बाद उनके धर्मनिष्ट पुत्र सुम्ती ने सुर्यवन्ष की पवित्र गद्दी संभाली और पिता के पच्चहनों पर चलते हुए
01:48राज्य का संचालन किया.
01:51महाराजा सुम्ती ने भी अपने पिता के समान ही धर्म और नीती के अनुसार शासन किया, प्रजा के हित को
01:58सर्वोपरी मानते हुए.
02:00सुम्ती के बाद भी अनेक पराक्रमी और धर्म प्रायन राजाओं ने सूर्यवन्ष की पता का फहराई, जिन्होंने अयोध्या की महिमा
02:08को अक्षुन रखा.
02:10इस महान परमपरा में आगे चलकर एक और प्रतापी राजा युवनाश्व हुए, जिनकी ख्याती दूर-दूर तक फैली हुई थी.
02:20राजा युवनाश्व अपनी प्रजा को पुत्रवत प्यार करते थे और स्वयभी धर्म प्रायन होकर भगवान विश्नु के परम भक्त थे.
02:29किन्तु इस प्रतापी राजा के हरिदय में एक गहरा दूहक था, क्योंकि उनके कोई पुत्र नहीं था जिससे वे अपना
02:36वंश आगे बढ़ा सकें.
02:39इस चिन्ता से ग्रस्त युवनाश्व ने अपने मंत्रियों और राज्य के परम ज्यानी रिशिमुनियों को अपनी समस्या बताने के लिए
02:46आमंत्रित किया.
02:49रिशियों ने युवनाश्व की व्यथा सुनकर उन्हें पुत्र प्राप्ती हेतु एक विशेश यग्य, पुत्र कामिष्टी यग्य करने का परामर्श दिया.
02:58राजा युवनाश्व ने तुरंथी यग्य की विशाल तैयारियां आरंभ करवा दी, पवित्र स्थल का चयन किया गया और सामगरी जुटाई
03:07जाने लगी.
03:08अनेक सिद्ध रिशिमुनियों के मार्ग दर्शन में, राजा युवनाश्व ने स्वयं अत्यंत श्रधापूर्वक पुत्र कामिष्टी यग्य का अनुष्ठान आरंभ किया.
03:18यग्य की पूर्णा हुती पर मुख्य रिशी ने मंत्रों से सिद्ध एक दिव्य अमरित्मय पायस तयार किया, जो पुत्र प्राप्ती
03:26का वर्दान था.
03:48राजा युवनाश्व ने उस दिव्य पायस को दोनों हाथों में ग्रहन किया, उनकी आखों में संतान प्राप्ती की गेहन अभिलाशा
03:57और पवित्रता का भाव था.
04:00रात्री होने पर राजा ने उस चमतकारी पायस को अपनी रानी के लिए अपने शयनकक्ष में एक उचे पीठा सीम
04:08पर अत्यंत सुरक्षित स्थान पर रखा.
04:11अर्धरात्री में राजा युवनाश्व गहरी नीन से जागे, उनका कंट प्यास से सूख रहा था और वे जल की खोज
04:18में उठ खड़े हुए.
04:20नीन्द के मद में ध्रमवश उन्होंने जल के स्थान पर रानी हेतु रखे हुए उस अमरित्मय पायस को अंजाने में
04:28ही पी लिया.
04:30पायस उनके कंट से उतरते ही उसके दिव्यकन राजा के शरीर में समाहित हो गए, जिससे एक अलौकिक उर्जा का
04:38संचार हुआ.
04:39प्रभात होते ही, जब उन्हें अपने कृत्य का बोध हुआ, तो राजा का हृदय पश्चाताप और विस्मय से भर उठा.
04:48रानी ने जब खाली स्वर्ण पात्र देखा और घटना का वृत्तान्त सुना, तो उनकी आखों में निराशा के आसु छलक
04:56उठे.
04:57चिंतित राजा ने ततकाल सभी पूजय रिशियों को अपने समक्ष बुलाया और उन्हें अपनी अंजाने में हुई भूल बताई.
05:06रिशियों ने गंभीर मुख मुद्रा में राजा की बात सुनी और फिर आपस में इस अभूत पूर्व घटना के परिणामों
05:13पर गेहन विचार विमर्ष किया.
05:16गेहन चिंतन के पश्चात मुख्य रिशी ने घोशना की की अब राजा के उदर से ही पुत्र का जन्म होगा,
05:23क्योंकि दिव्यपायस का प्रभाव निश्पल नहीं हो सकता.
05:26इस असाधारन भविश्यवानी को सुनकर राजा युवनाश्व पहले तो स्तब्ध रह गए, किन्तु शीध्र ही उन्होंने दैविय इच्छा को सहर्ष
05:36स्विकार कर लिया.
05:38समय के साथ राजा युवनाश्व के शरीर में दैविय लक्षनों का प्रकट होना आरंभ हुआ, जो एक गर्भवती स्त्री के
05:46समान थे, परंतु अधिक सुक्ष्म और अलौकिक.
05:50दर्बार में उपस्थित सभी दर्बारी और सेवक इस अप्रत्याशित घटना को देखकर विस्मय से भरे हुए थे, उनकी फुस्फुसाहटें और
05:59प्रश्न गूंज रहे थे.
06:02रानी ने इस अनोखे समय में राजा का पूर्ण समर्थन किया, उनकी सेवा में रत रही और उनके अध्वितिय गर्भधारन
06:10का सम्मान किया.
06:12आकाश से सुक्ष्म रूप में देवताओं ने इस विचित्र गर्भधारन पर पुश्पवर्शा की, जो उनकी स्विक्रिती और आशिरवात का प्रतीक
06:21था.
06:22शुभ महूर्थ पर रिशियों के मार्क गर्शन में एक विशेश मंडब तैयार किया गया, जहां राजा युवनाश्व के अध्वितिय प्रसव
06:30की तैयारी की गई.
06:33अलौकिक उर्जा के मध्य एक अध्भुत और पीडा रहित प्रसव हुआ, जिसने दैविय शक्ती के अप्रत्याशित रूपों को सिद्ध किया.
06:42राजा के दाहिनी पार्श्व से एक तेजस्वी और पूर्णत विक्सित शिशु प्रकट हुआ, जिसकी कांती सूर्य के समान दीप्तिमान थी.
06:52रिशियों ने तुरंत ही शिशु का नाम मांधाता रखा, और इंद्रदेव ने स्वया कर अपनी तरजनी उंगली से उसे पोशन
07:00देने का आश्वासन दिया.
07:02देवराज इंद्र ने अपनी तरजनी उंगली से अमरित समान दूध की धारा प्रवाहित की, जिसने शिशु मांधाता के मुख में
07:10प्रवेश करते ही उसे अलौकिक पोशन प्रदान किया.
07:15उस देविय अमरित पान से शिशु का शरीर असाधारन गती से बढ़ने लगा, जैसे बीज से एक विशाल व्रिक्ष क्षन
07:22भर में अंकुरित हो जाएं.
07:25राजा युवनाश्व और उपस्थित सभी रिशिमुनी इस अद्भुत द्रिश्य को देख विस्मय और हर्ष से भर उठे, उनके मुख से
07:33सहसा जैकार निकल पड़ी.
07:35कुछ ही क्षणों में वह शिशु एक तेजस्वी बालक के रूप में परिवर्तित हो गया, जिसकी आखों में दिव्यता और
07:42बुद्धी का प्रकाश जग्मगा रहा था.
07:45गुरु वशिष्ट सहित सभी महापंडितों ने तुरंत उस दिव्यबालक को शास्त्रों और शस्त्रों की शिक्षा प्रदान करना आरंभ किया, जिसकी
07:54ग्रहन शील्ता अध्भुत थी.
07:57मानधाता ने अलपायू में ही चारों वेदों, उपनिश्दों, धनुर्विद्या और राजधर्म की समस्त कलाओं में निपुन्ता प्राप्त कर ली, जिसने
08:06देवताओं को भी अचम्भित कर दिया.
08:08पुत्र की असाधारण मेधा और पराक्रम को देखकर राजा युवनाश्व को विश्वास हो गया कि यही बालक अयोध्या का अगला
08:17चक्रवर्ती समराट बनेगा.
08:20उन्होंने सभा में उपस्थित मंत्रियों और रिशियों के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की की अब समया गया है कि मांधाता
08:28को राजसिन हासन सौपा जाएं.
08:31सभी ने एक स्वर में राजा के निर्नै का समर्थन किया और मांधाता के राज्याभिशेक की भव्य तयारी आरंभ करने
08:39का प्रस्ताव रखा.
08:41अयोध्या नगरी को दुलहन की तरह सजाया जाने लगा, हर मार्ग, हर घर उत्सव के रंगों और सुगंधों से भर
08:48गया.
08:50दूर दूर से राजा, महाराजा और संतम हात्मा राज्याभिशेक समारोह में भाग लेने के लिए अयोध्या पधारने लगे.
08:58एक शुभ महूर्त में, गुरु वशिष्ट के मंत्रोचारण के मध्य, मानधाता ने अयोध्या के गौरवशाली सिनहासन पर विराज्मान होकर राज्मुकुट
09:08धारन किया.
09:10उनके राज्याभिशेक के साथ ही, अयोध्या में धर्म, न्याय और सम्रिध्धी का एक नया युग आरंभ हुआ, जिसने चारों दिशाओं
09:18में शांती स्थापित की.
09:21राजा मानधाता ने अपने प्रजा के हित में अनेक न्याय पून और दूरदर्शी निर्णे लिए, जिससे उनकी ख्याती सर्वत्र फैल
09:29गई.
09:30उनके शासनकाल में प्रकृती भी अत्यंत उदार हो गई, वन हरे भरे रहे, नदिया निर्मल बहती रही, और धर्ती ने
09:38सोने सी फसले उगाई.
09:41मानधाता ने अपने शौर्य और धर्म प्रायनता से अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त की, किन्तु उनका सामराज्य विस्तार सदैव न्याय
09:50और शान्ती के सिध्धान्तों पर आधारित था.
09:53उनकी कीरती तीनों लोकों में फैल गई, और देवता, मनुष्य तथा रिशिमुनी सभी उनकी महिमा का गुनगान करने लगे.
10:03मानधाता ने अपने शासनकाल में अनेक अश्वमेध और राजसुई जैसे विशाल यग्यों का सफलता पूर्वक आयोजन किया, जिससे धर्म की
10:12पताका और भी उंची फहरी.
10:15देवताओं और रिशियों ने उनकी धर्म प्रायंता और न्याय प्रियता से प्रसन्न होकर उन्हें अनंत आशिर्वात प्रदान किये, जिससे उनकी
10:24शक्ती और यश और भी बढ़ गया.
10:27इस प्रकार अपने राज्य को समरिध और धर्म के मार्ग पर स्थापित कर, चक्रवर्ती समराट मानधाता एक दिवेशासक के रूप
10:35में अपनी नेती के लिए ततपर खड़े थे.
10:39प्राचीन काल में इक्षवाकु वन्ष के प्रतापी राजा युवनाश्व सभी एश्वरियों से संपन्न होते हुए भी संतान हिंता के दुख
10:47से व्याकुल थे, जिससे उनका मन राजसी सुखों से विमुख होने लगा था.
10:53संतान प्राप्ती की तीवर अभिलाशा लिये, राजा युवनाश्व ने महान रिशियों की शरण ली, जिन्होंने उनके लिए पुत्र कामिष्टी यग्य
11:02का अनुष्ठान करने का निश्चय किया.
11:05यग्य के समापन पर, रिशियों ने दैविय मंत्रों से अभिमंत्रित एक पवित्र जलपूर्ण कलश तयार किया, जिसका पान महारानी को
11:14करने से एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ती होनी थी.
11:18एक रात, यग्यशाला के पास अत्यंत प्यास से व्याकुल युवनाश्व ने अंधेरे में भटकते हुए, अंजाने में वही अभिमंत्रित जल
11:27पी लिया, जो पुत्र प्राप्ती के लिए रखा गया था.
11:31सुर्योदय के समय, जब रिशियों ने कलश को खाली देखा और राजा युवनाश्व के मुख पर जल पीने के चिनह
11:38पाए, तो वे इस रहस्यमय घटना से अचम्भित रह गए.
11:43अद्भुत शक्ती वाले रिशियों ने ततकाल अपनी दिव्यद्रिष्टी से सब जान लिया और हसी से विस्मित होकर बोले, राजा ने
11:51स्वयही यह दैविये गर्भ धारन कर लिया है.
11:55इस अप्रत्याशित घटना से युवनाश्व का शरीर धीरे-धीरे एक अद्भुत गर्भ को धारन करने लगा, जिससे राजमहल में एक
12:03अनोखा रहस्य और विस्मय छा गया.
12:07समय बीतने के साथ राजा का उदर बढ़ता गया, जिससे राज्य भर में यह अलोकिक समाचार बिजली की तरह फैल
12:15गया और सभी प्रजाजनों को आश्चर यच्कित कर दिया.
12:19पूर्ण नौ मास के बाद शुभ मुहूर्त में राजा युवनाश्व को प्रसव पीडा हुई, जो प्रकृती के नियमों के विप्रीत
12:27एक अद्वितिय और चमतकारिक घटना थी.
12:30अद्भुत रूप से राजा के दाहिने पार्श्व, पेट के दाहिने भाग से एक तेजस्वी और पूर्ण विक्सित बालक का जन्म
12:38हुआ, जिसकी काया दिव्य आभा से देदी प्यमान थी.
12:43इस अलोकिक जन्म को देखकर सभा में उपस्थित सभी रिशी, मंत्री और परिजन विस्मय और हर्श से अभिभूत हो गए,
12:51उनकी आखें इस अकल्पनिय द्रिश्य पर टिकी थी.
12:56नवजात शिशु अपनी दैविय काया के साथ अब भूख से व्याकुल होकर रुदन करने लगा, जिससे सभी उपस्थित जनों के
13:04हृदय में उसके पोशन की चिंता जाग उठी.
13:08सभी ने एक दूसरे की ओर देखा, क्योंकि एक पुरुष द्वारा जन में बालक को स्तनपान कराना असंभव था, और
13:15कोई नहीं जानता था कि इस शिशु का पोशन कैसे किया जाएं.
13:20ठीक उसीक्षन आकाश से एक तेजस्वी प्रकाशपुंज उतर आया और देवताओं के राजा, इंद्रदेव अपने एश्वर्यपूर्ण स्वरूप में सभा में
13:30प्रकट हुए.
13:32इंद्रदेव ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ नवजात शिशु और चिंतित सभा की ओर देखा, और अपने अमरित में स्पर्ष
13:40से सभी को आश्वस्त किया.
13:43उन्होंने इस नहपूर्वक शिशु की ओर अपना तरजने अंगूठा बढ़ाया, जिससे अमरित की धारा बहने लगी, और कहा, मामधाता, अर्थात
13:52मुझे धारन करो या मेरा दूध पियो.
13:56शिशु ने तुरंट इंद्र के अमरित में अंगूठे का पान करना शुरू कर दिया, और जैसे ही वह अमरित उसकी
14:02काया में समाया, बालक का शरीर दिव्य शक्ती से भर उठा.
14:07शन भर में ही वह नवजात शिशु अध्भुत रूप से पुष्ट और बलिष्ट हो गया, उसकी काया में एक अलौकिक
14:15तेज और शक्ती स्पष्ट रूप से जलकने लगी.
14:18इंद्र के मामधाता कहने और शिशु द्वारा उसे धारन करने के कारण रिशियों और देवताओं ने सर्वसम्मती से उस्तेजस्वी बालक
14:27का नाम मानधाता रखा.
14:30इस प्रकार देवों के आशिर्वाद और अलौकिक पोशन से पुष्ट चक्रवर्ती समराथ मानधाता का दैविय जीवन आरंभ हुआ, जो भविश्य
14:39में धर्म और न्याय का प्रतीक बनने वाला था.
14:43बालक मानधाता ने गुरुकुल में प्रवेशकर, वेद, उपनिशद और धर्म शास्त्रों का गेहन अध्ययन किया, उनके मेधावी मस्तिश्क ने ज्ञान
14:52की हर धारा को सहच्ता से आत्म साथ कर लिया.
14:57उन्होंने शस्त्रविद्या में भी महारत हासिल की, गुरुजनों के मार्क दर्शन में हर अस्त्रशस्त्र को इतनी कुशलता से साधा की
15:05रणभूमी में कोई भी उनका सामना नहीं कर सकता था.
15:09उनकी असाधारन बुद्धी और पराक्रम की गाथाए दूर-दूर तक फैलने लगी, जिससे प्रजा और राजदर्बारी दोनों ही उनके भविश्य
15:18के नेत्रित्व को लेकर आशानवित्थे.
15:21उन्होंने न केवल धर्म, नीती और युद्धत्ला में श्रेष्ठता प्राप्त की, बलकी एक कुशल शासक के रूप में प्रजा के
15:29कल्यान के प्रती भी गहरी प्रतिबधता दर्शाई.
15:33युवा मानधाता ने धर्म और न्याय के सिध्धानतों को अपनाते हुए अयोध्या के सिहासन को सुशोभित किया, उनके राज्याभिशेक से
15:42प्रजा में हर्ष की लेहर दोड़ गई.
15:45अयोध्या का राज्य उनके न्यायपून और प्रज्यावान शासन में फलाफूला, जहां प्रत्येक नागरिक सम्रिध्धी और शान्ती का अनुभव कर रहा
15:54था.
15:55अपनी प्रजा की सुख्षानती सुनिश्चित करने के बाद, समराट मानधाता ने धर्म और सत्य की स्थापना के लिए दिगविजय यात्रा
16:03का संकल्प लिया.
16:06उन्होंने अपनी विशाल सेना को एकत्रित किया, जिसमें शक्तिशाली योध्धा, रत, हाथी और अश्वदल शामिल थे, जो विजय के लिए
16:14आतुर थे.
16:16धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने अपने विशाल सैन्य बल के साथ दिगविजय यात्रा आरंभ की, जिसकी गर्जना से प्रित्वी
16:25काप उठी.
16:27उनके दिव्यशस्त्रों और अद्वितिय युद्ध कौशल के समक्ष कोई भी राजा टिक नहीं पाता था, और उन्होंने एक के बाद
16:34एक राज्यों को आसानी से अपने अधीन कर लिया.
16:38उनकी सेनाने परवतों, नदियों और घनेवनों को पार करते हुए अथक रूप से आगे बढ़ना जारी रखा, हर दिशा में
16:46उनकी विजय पताकाई फहराई जाने लगी.
16:50कई राजाओं ने उनके शौर्य और धर्म प्रायंता को देखकर स्वेच्छा से उनके सामने मस्तक जुका दिया, उनकी संप्रभुता को
16:59स्वीकार करते हुए.
17:01उन्होंने जिन भी भूभागों पर विजय प्राप्त की, वहा धर्म, न्याय और सुशासन की स्थापना की, जिससे प्रजा में उनके
17:09प्रती अगाद श्रधा उत्पन हुई.
17:13समराट मानधाता का यश चारों दिशाओं में फैल गया, और वे एक ऐसे चक्रवर्ती समराट के रूप में पूजे जाने
17:20लगे, जिनके न्याय और पराक्रम की कोई सीमा न थी.
17:24उनकी दिग्विजय यात्रा इतनी सफल हुई की सम्पूण प्रित्वी उनके एक चत्र शासन के अधीना गई, और कोई भी शक्ती
17:33उनके सम्मुख खड़ी नहीं हो पाई.
17:36देवलोक में भी उनके पराक्रम और धार्मिक शासन की चर्चाए होने लगी, जिससे इंद्र सहित अन्य देवता भी उनके बढ़ते
17:44प्रभाव से विस्मित थे.
17:47मानधाता का तेज और उनकी यश्कीर्ती इतनी प्रबल हो गई की स्वर्ग लोक तक उनका प्रभाव स्थापित होने लगा, जिससे
17:55देवराज इंद्र कुछ चिंतित हुए.
17:58इंद्र ने मानधाता के अध्भुत पराक्रम और धर्म प्रायनता को पहचानते हुए, उन्हें देवलोक में आमंत्रित किया और उनका उचित
18:07सम्मान किया.
18:09मानधाता ने अपनी शक्ती और धर्म के बलपर इंद्र लोक के कुछ भागों पर भी अपना प्रभाव स्थापित किया, बिना
18:16किसी युद्ध के देवताओं का आदर प्राप्त करते हुए.
18:19इस प्रकार सम्राट मानधाता पूरी प्रित्वी और देवलोक तक अपना प्रभाव स्थापित कर एक सच्चे चक्रवर्ती सम्राट के रूप में
18:29चिर्काल के लिए पूजे गए.
18:32सम्राट मानधाता के गौरवशाली युग के पश्चात कथा अब एक अन्यमहान आत्मा की ओर मुर्ती है, जिनका नाम था सौभरी
18:41रिशी.
18:42सौभरी मुनी, संसार के मोह माया से विरक्त, गेहन आध्यात्मिक ज्यान की खोज में लीन एक अध्वितिय तपस्वी थे.
18:51अपने चित्त को परम शांती में स्थापित करने हे तू, उन्होंने यमुना नदी के पवित्र जल को अपनी तपस्या का
18:58स्थल चुना.
19:00वे बिना किसी संशय के, शीतल यमुना के गहरे जल में प्रवेश कर गए, अपनी तपस्या का संकल्प लेकर.
19:08जल के भीतर शांत मुद्रा में बैठ कर, उन्होंने अपनी श्वास पर नियंत्रन करना आरंभ किया, संसार से स्वयं को
19:16पूर्णता विच्छेट करते हुए.
19:19सैकडों वर्ष बीट गए, और वे जल के भीतर एक अडिक परवत के समान स्थिर रहे, समय के प्रवाह से
19:26अप्रभावित.
19:28उनकी तपस्या केवल शारिरिक नहीं थी, अपितु वे अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रन स्थापित कर रहे थे, मन को एकाग्र
19:36कर.
19:37यमुना के जीवजन्तु उनके चारों और निर्भय होकर विचर्ण करते थे, मानोवे स्वय नदी का ही एक अभिन्न अंग बन
19:45गए हूँ.
19:47उनकी अदमय तपस्या की उर्जा इतनी प्रबल थी कि देवलोक में भी देवतागन इसे अनुभव कर रहे थे.
19:55जल के भीतर उनकी तपस्या से उत्पन उर्जा ने यमुना के प्रवाह को भी शांट कर दिया था, प्रकृती उनके
20:02तप में लीन सी प्रतीत होती थी.
20:05उनका मन इतना एकाग्र हो चुका था कि बाहरी संसार का कोई भी आकर्शन या बाधा उन्हें विचलित नहीं कर
20:13सकती थी.
20:15जैसे जैसे सदिया बीटती गई, उनकी साधना और भी गेहन होती गई, उनके संकल्प की अगनी प्रजवलित होती रही.
20:24उनका शरीर सूख कर कंकाल मात्र रह गया था, किन्तु उनकी आत्मा की जोती इतनी प्रखर थी कि वह जल
20:31के भीतर भी आभा बिखेर रही थी.
20:35स्वय यमुना माता अपनी दिव्य लहरों से उन्हें स्पर्श कर, उनकी तपस्या को और भी उर्जा प्रदान करती हुई प्रतीत
20:43होती थी.
20:44स्वर्ग लोक में देवर्शी नारद और अन्य महान रिशियों ने सौभी की अद्वितिय तपस्या पर चर्चा की, जो ब्रहमांड में
20:52विस्मय भर रही थी.
20:55तीनों लोक स्वर्ग, प्रित्वी और पाताल उनकी अविचल तपस्या की प्रचंड शक्ती को अनुभव कर रहे थे, एक मौन कमपन
21:03के रूप में.
21:05हजारों वर्षों की तपस्या के बावजूद, जल के भीतर एक भी जीव उनके कारण भयभीत नहीं हुआ, सभी उनके आभा
21:13मंडल में शांती से रहते थे.
21:16वे अब समाधी की उस परम अवस्था में पहुँच शुके थे, जहां मन और आत्मा एकाकार होकर ब्रहमांडिये चेतना में
21:24विलीन हो जाते हैं.
21:27सांसारिट इच्छाएं और मोह माया उनसे हजारों योजन दूर थी, उनका चित अब केवल परमानंद और वैराध्य में लीन था.
21:36इस प्रकार सौभरी रिशी ने हजारों वर्षों तक जल में रहकर अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली और
21:43एक अद्वितिय तपस्वी के रूप में स्थापित हुए.
21:47जल के अतल गहराईयों में सौभरी रिशी अपने योग स्माधी में लीन थे, जहां समय की कोई अवधार्ना नहीं थी
21:55और उनका अस्तित्व केवल ब्रहमांडिये चेतना का विस्तार था.
22:01हजारों वर्षों की इस अविचल तपस्या ने उन्हें एक ऐसी दिव्य अवस्था में पहुँचा दिया था, जहां भौतिक संसार की
22:08कोई भी शक्ती उनके मन को विचलित नहीं कर सकती थी.
22:13किन्तु एक दिन इसी जल समाधी के दौरान एक ननहा, रंग बिरंगा मचली का जोड़ा उनके समक्ष आया और प्रेन
22:21क्रीडा में लीन हो गया.
22:23उनकी मधुर चपलता और एक दूसरे के प्रती अटूट्स नह रिशी के अंतर्मन को धीरे-धीरे स्पर्श करने लगा, जैसे
22:31शांत जील में पढ़ती हुई कोई छोटी ले है.
22:34यह द्रिश्य उनके हजारों वर्षों के वैराग्य की द्रिड चटान में एक सुक्ष्म दरार पैदा करने लगा, जो धीरे-धीरे
22:42भीतर ही भीतर बढ़ती जा रही थी.
22:46रिशी के मन में पहली बार यह विचार कौनधा की क्या उनका यह एका की जीवन पूर्ण है, जब प्रकृती
22:53का हर जीव युगम में अपनी स्रिष्टी को आगे बढ़ा रहा है.
22:58उस प्रेमिल जोडे को देखकर, उनके अवचेतन मन में ग्रिहस्थ जीवन की दबी हुई इच्छा, संतानोत पत्ती का सुख और
23:06पारिवारिक स्नेह की कलपना जागरित होने लगी.
23:10हजारों वर्षों की तपस्या से अरजित वैराग्य अब मोहमाया की इस अनूठी लहर के सामने डग्मगाने लगा था.
23:18उनकी इंद्रियों पर पूर्ण विजय अब भंग होती दिख रही थी, क्योंकि उनके मन में सांसारिक सुखों की मधुर स्मृती
23:26ने स्थान ले लिया था.
23:28उन्होंने स्वयं को उस मचली जोडे की निश्चल प्रसन्नता से तुलना करते हुए पाया, और उनके हृदय में एक अजीब
23:36सी रिक्टता का अनुभव हुआ.
23:38यह मात्र एक शनिक विचार नहीं था, बलकि एक तीवर, ज्वलन्त इच्छा थी जो उनके संपूर्ण अस्तित्व को भीतर से
23:47जगजोर रही थी.
23:49हजारों वर्षों की कठोर तपस्या अब उन्हें बंधन प्रतीत होने लगी थी, एक ऐसा बंधन जो उन्हें प्रकृती के स्वाभाविक
23:57प्रवाह से दूर कर रहा था.
24:00उन्हें लगा कि उन्होंने जीवन के एक महत्वपूर्ण पहलू, प्रेम और परिवार के आनंद को त्याग कर एक बड़ी भूल
24:07की है.
24:09जल के भीतर जहां उन्हें पर्मानंद मिलता था, अब उन्हें अपने वेराग्य का एकाकीपन भयावह लगने लगा था.
24:18उनका मन अब केवल एक ग्रिहस्ट के रूप में जीवन जी ने संतान सुख प्राप्त करने और माया के इस
24:25अग्भुत खेल का अनुभव करने को आतुर था.
24:29इस तीव्र मोह ने उनकी सदियों की तपस्या को क्षण भर में भस्म कर दिया, जैसे एक छोटी चिंगारी सुखे
24:36वन को जला देती है.
24:39अचानक उनका समाधी भंग हो गया और उनके भीतर का योगी एक सांसारिक व्यक्ती में रुपान्तरित होने की राह पर
24:47चल पड़ा.
24:49उनके मन में अब कोई द्वंद्व नहीं था, उन्होंने निर्नय ले लिया था कि वे ग्रिहस्ट आश्रम में प्रवेश करेंगे
24:56और वंश्वृद्धी कर जीवन के इस चक्र का अनुभव करेंगे.
25:01सहसरों वर्षों तक जिस वेराग्य को उन्होंने साधना था, वह अब उनके लिए एक विस्मृत अतीत मात्र बन गया था.
25:10एक नए उद्देश, एक नए मोह और एक नई आशा के साथ सौभरी रिशी ने जल की गहराईयों से उपर
25:18की ओर यात्रा आरंभ की.
25:20जल की अतल गहराईयों से उपर आते हुए, सौभरी मुनी का मन अब सासारिक कामनाओं के नवोदित प्रकाश से प्रकाशित
25:28हो रहा था, उनके वैराग्य की छाया कहीं दूर विलीन हो चुकी थी.
25:34जल से बाहर निकल कर उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या की ओर आरंभ की, जहां चक्रवर्ती समराट मांधाता का भव्य सामराज
25:43जिस्थित था, उनके कदम अब एक नवीन ग्रिहस्थ जीवन की ओर बढ़ रहे थे.
25:49अंत्र कई दिनों की यात्रा के पश्चात, रिशी सौभरी अयोध्या के विशाल और अलंकरित स्वर्ण द्वारों के सम्मुख खड़े थे,
25:57जिनकी भव्यता उनके मन में भी मोह जगा रही थी.
26:01उन्होंने राजप्रहरी से समराट मांधाता से मिलने की अनुमती मांगी, उनकी आवाज में वर्षों की तपस्या की शांती के साथ
26:10साथ एक नई दबी हुई आतुर्ता भी थी.
26:14समराट मांधाता अपने स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान अपने राजसी दर्बार में न्याय और नीती पर विचार विमर्ष कर रहे थे,
26:23उनका चहरा राजोचित गंभीरता से परिपूर्ण था.
26:27अनुमती मिलने पर सौभरी रिशी ने धीरे-धीरे दर्बार में प्रवेश किया, उनकी उपस्थिती ने ततकाल राजसी भव्यता के बीच
26:35एक शांत तपस्वी विरोधाभास उत्पन्न कर दिया.
26:40समराट ने रिशी का सम्मान पूर्वक स्वागत किया और उन्हें उचित आसन ग्रहन करने का अनुरोध किया, अपने चहरे पर
26:48एक अनुभवी शासक की विनमर्ता बनाये रखते हुए.
26:52आसन ग्रहन करने के पश्चात, सौभरी मुनी ने अपनी आखों में एक अप्रत्याशित चमक के साथ अपनी ग्रिहस्थ जीवन की
27:00इच्छा को समराट के समक्ष व्यक्त किया.
27:04रिशी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे विवाह कर ग्रिहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहते हैं. अपनी वानी में
27:11वर्षों के वैराग्य के बाद जन्मी एक नई ग्रिड इच्छा शक्ती लिए.
27:16फिर उन्होंने अपनी विशिष्ट अभिलाशा प्रकट की वे चक्रवर्ती समराट मांधाता की पचास पुत्रियों में से किसी एक से विवाह
27:25करना चाहते थे.
27:27जह सुनकर समराट मांधाता क्षन भर के लिए अवाक रह गए, उनके माथे पर चिन्ता की हलकी रेखाए उभराई, इस
27:35अप्रत्याशित अनुरोध ने उन्हें स्तब्ध कर दिया था.
27:39उनकी द्रिश्टी रिशी के व्रिद्ध और जीरन शरीर पर पड़ी, जिसने उनके मन में अपनी युवा पुत्रियों के भविश्य को
27:47लेकर गहरी दुविधा उत्पन्न कर दी.
27:50समराट के मन में रिशी के प्रती सम्मान और उनकी तपस्या के भय के साथ साथ अपनी पुत्रियों के लिए
27:57उचित वर चुन्ने की राजा की नैतिक जिम्मेदारी का द्वंद्व चल रहा था
28:02वे सीधे रिशी को मना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी क्रोधित तपस्या के भयानत
28:10परिणामों का ज्यान था
28:12आथक मानधाता ने बड़ी कूटनीती और सम्मान के साथ उत्तर दिया अपनी वानी में सावधानी और विनमृता का समन्वय करते
28:21हुए
28:22उन्होंने रिशी से कहा कि उनकी पुत्रिया स्वय ही अपने वर का चुनाव करती हैं यह उनके कुल की प्राचीन
28:30परंपरा थी
28:32राजा ने यह भी कहा कि वे किसी भी पुत्री को अंचाहे विवाह के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिससे
28:39रिशी को अपने प्रस्ताव पर पुनरविचार करने का अफसर मिल सके
28:44रिशी सौभे जिनकी वर्षों की तपस्या ने उन्हें मानव मन की सुक्षमताओं को समझने की अद्वितियक शमता प्रदान की थी
28:52ततकाल राजा की हिचकी चाहट को भाप गए
28:56रिशी की आखों में एक तीखी चमक आई उन्होंने राजा से स्पष्ट रूप से कहा कि वे चिन्ता न करें
29:03उनकी पुत्रिया उन्हें अवश्य स्विकार करेंगी
29:07राजा मानधाता रिशी के तपबल के संभावित परिणामों से भयभीत अंत्य उनकी बात मानने को विवश हो गए उनके चहरे
29:16पर चिन्ता की गहरी चाया थी
29:19राजा की चिन्ता को भापकर सौभरी रिशी ने अपनी तपस्या का स्मरण किया और अपनी योगमाया का प्रयोग करने का
29:27निश्चय किया
29:28पलक जपकते ही रिशी के जरजर शरीर पर योवन की चमक फूट पड़ी उनकी काया में अध्भुत परिवर्तन होने लगा
29:37देखते ही देखते तपस्वी रिशी एक परम आकर्शक युवा राजकुमार के रूप में प्रकट हुए जिनका सौंदर्य किसी देवपुत्र से
29:46कम न था
29:48राजा मानधाता ने अपनी सभी पचास पुत्रियों को जो अपनी अध्वितिय सुन्दर्ता के लिए विख्यात थी रिशी के समक्ष प्रस्तुत
29:57किया
29:58राजकुमार के रूप में सौभी को देख कर कन्याओं की आखों में आश्चर्य और मोह का अध्वुत मिश्रन उतर आया
30:07सौभी ने अपनी योगमाया और तप्बल से प्रत्येक राजकुमारी को यह अनुभव कराया कि वे ही उनकी एक मात्र इच्छित
30:15वर थी
30:16एक एक करके सभी पचास कन्याओं ने अपनी सहमती जताई उनके चेहरों पर प्रेम और स्विकार्यता की स्पष्ट जलक थी
30:26मानधाता अपनी पुत्रियों की इस अभूत पूर्व एक मत्ता और रिशी के मायावी प्रभाव को देखकर चकित रह गए उनके
30:34हृदय में विस्मय भर गया
30:37सौभरी मुनी ने अपनी योग शक्ती से प्रत्येक राजकुमारी के लिए अलग-अलग स्वर्गिय सौंदर्य से परिपूर्ण भव्य महल ततकाल
30:45निर्मित कर दिये
30:47प्रत्येक महल रतनों से जड़े हुए थे, स्वर्ण के खंभों से सुशोगित थे और उनमें अद्वितीर कलाकृतिया तथा सुगंधित पुष्पों
30:56के उद्यान थे
30:58अपनी योगमाया के प्रभाव से सौभरी ने एक ही समय में स्वयं के पचास अध्भुत रूप धारन किये, प्रत्येक महल
31:06में एक भव्य वैदिक विवाह समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें प्रत्येक राजकुमारी ने अपने वर के साथ अगनी के
31:16समक्ष साथ फेरे �
31:19यह एक अविश्वसनी द्रिश था, जहां पचास अलग-अलग महलों में, पचास अलग-अलग समारोहों में, पचास सुन्दर कन्याओं का
31:27विवाह एक ही समय में संपन्न हो रहा था
31:31विवा उप्रांट सौभरी ने प्रत्येक महल में अपनी राणी के साथ ग्रिहस्थ जीवन में प्रवेश किया, जहां सुख और समरिधी
31:40की कोई सीमा न थी
31:42हर महल में भोग विलास, मधुर संगीत, सुगंधित पुश्पों और स्वादिष्ट व्यंजनों की अनन्ता थी, जिससे रिशी इंद्रियों के सुख
31:51में डूपते चले गए
31:53वर्षों की तपस्या से अर्जित वैराग्य अब भोग की असीम गहराईयों में कहीं खोता जा रहा था, उनकी इच्छाय चरम
32:01पर पहुँच रही थी
32:03हर राजकुमारी को यह आभास था कि रिशी केवल उन्ही के प्रेम में लीन है और वे सभी अपने सौभाग्य
32:11पर अत्यंत प्रसन्न थी
32:13दिन सप्ताह और महीने ग्रहस्थी के सुखत चक्र में बीटते चले गए और सौभी का मोह और भी गहरा होता
32:21चला गया
32:23वे अपनी तपस्या, अपने वैराग्य और जीवन के उच्चतर उद्देश्यों को लगभग विस्मृत कर चुके थे, बस क्षणिक सुख में
32:31लीन थे
32:33इस प्रकार जो रिशी तपस्या से माया के बंधनों को तोड़ने निकले थे, वे स्वय ही माया के सबसे गहरे
32:40जाल में फंस्ते चले गए
32:43सौभरी मुनी अब अपनी पचास पत्नियों और अंगिनत पुत्रों के विशाल परिवार से घिरे एक भव्य महल में सुख में
32:50ग्रिहस्थ जीवन का आनंद ले रहे थे, जहां उनकी हर इच्छा तुरंत पूरी होती थी
32:57उनकी दिन्चर्या अब यग्य और तपस्या के बजाय पारिवारिक उत्सवों, पुत्रों के लालन-पालन और पत्नियों के साथ प्रेम भरी
33:05बातों में बीचती थी, जिसमें समय का भान भी नहीं रहता था
33:10पुत्रों के विवाह हुए, पौत्र हुए और धीरे-धीरे सौभी मुनी का परिवार इतना विशाल हो गया कि वह एक
33:17छोटे राज्य के समान प्रतीत होने लगा, जिससे उनका मोह और भी गहरा होता चला गया
33:24इस अपार भोग विलासिता और अन्थीन संबंधों के बीच एक शांत क्षण में, मुनी के हृदय में एक सुक्ष्म अशांती
33:32उठने लगी, जैसे किसी भूले हुए स्वर की हलकी गूंज
33:37उन्होंने देखा कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी उत्पन हो जाती है, और यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता,
33:45मानों मृगत्रशना के पीछे भागते ठक गए हूँ
33:49अपने ही पुत्रों और पौत्रों को देखकर, सौभरी ने उनके भीतर्भी वैसी ही वासना और आसकती के बीज पनपते देखे,
33:57जो कभी उनके अपने हृदय में थे
34:00एक संध्या, जब सारा महल सो रहा था, उन्होंने अपने कक्ष की खिर्की से आकाश में चमकते तारों को देखा
34:08और अपने अतीत की तपस्या का स्मरण किया
34:12उन्हें स्पष्ट आभास हुआ कि सांसारिक सुख केवल क्षनिक और भ्रामक हैं, और उनसे उत्पन होने वाला आनंद अंत्त दुहक
34:21और मोह में ही परिनत होता है
34:24मोह और आसक्ती ने उन्हें कैसे अपने मूल उद्देश से भटका दिया था, इस सत्य को समझते ही उनके हृदय
34:32में गहन पश्चाताप की अगनी प्रजवलित हुई
34:36उन्हें अपनी वह घोर तपस्यायाद आई, जब वे वर्षों तक जल के भीतर समाधिस्त रहे थे और उस समय की
34:43शांती वर्तमान की कोलाहल पूर्ण ग्रिहस्थी से कहीं अधिक वास्तवित लगी
34:49इस आत्मज्यान ने उन्हें एक अटूट संकल्प दिया, वे माया के इस बंधन को तोड़ कर पुनह अपने वैराग्यपत पर
34:57लोटने के लिए ग्रिड प्रतिज्य हो गए
35:00अगली सुबह, एक गंभीर और शांत मुख मंडल के साथ, सौभरी मुनी ने अपनी सभी पत्नियों को अपने सम्मुख बुलाया,
35:09उनके चहरों पर आने वाली घोशना की आशंका साफ जलक रही थी
35:14उन्होंने अपनी मधुरवानी में उन्हें समझाया कि जीवन का वास्तविक उद्देशिक शनिक सुखों में नहीं, बलकि शाश्वत शांती और आत्म
35:23ज्यान में नहित है, और कैसे माया उन्हें भ्रमित कर रही थी
35:28कई पत्नियों की आखों में आसु आ गए, यह सोचकर कि उन्हें यह महल और यह वैभव छोड़ना होगा, पर
35:36मुनी के सत्य वचनों ने धीरे-धीरे उनके हृद्यों को परिवर्तित करना शुरू कर दिया
35:42मुनी ने उन्हें अपने ही उदाहरन से समझाया कि वे कैसे माया के गहरे जाल में फस गए थे, और
35:48अब वे इस जाल को तोड़कर परम वैराग्य की ओर लोटना चाहते हैं
35:54उनकी सत्य निष्ठा और द्रिढ निष्चय को देखकर सभी पचास पत्नियों ने अपनी सभी सांसारिक इच्छाओं को त्याग कर अपने
36:03पती के साथ वैराग्य के पत्थ पर चलने का संकल्प लिया
36:07अपने समस्त वैभव को छोड़कर सौभी मुनी अपने पचास पत्नियों और उनके पुत्रों तथा पौत्रों के एक विशाल काफिले के
36:16साथ पुनह घने वन की ओर प्रस्थान कर गए
36:20वहाँ पहुचकर उन्होंने अपने परिवार को आध्यात्मिक मार्ग का उपदेश दिया और स्वयंपुनह अत्यंत घोर तपस्या में लीन हो गए
36:28मानों खोई हुई शक्ती को फिर से प्राप्थ कर रहे हूँ
36:33उनकी तपस्या इतनी तीवर थी कि उनका शरीर तेज से दमकने लगा और वे धीरे-धीरे सभी सांसारिक बंधनों और
36:41इच्छाओं से उपर उठकर परम वैराग्य को प्राप्थ हुए
36:45अंतह वैराग्य की पूर्नता में सौभरी मुनी ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया और परम ब्रह्मा में विलीन
36:53होकर मोक्ष को प्राप्थ किया जिससे माया और इच्छाओं की व्यर्थता का शाश्वत संदेश प्रतिध्वनित हुआ

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