इस भागवत पुराण एपिसोड में, द्वारका के युवराज अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री ऊषा की अलौकिक प्रेम कहानी का साक्षी बनें। कैसे मायावी चित्रलेखा ने अनिरुद्ध को ऊषा के लिए हर लिया? जब बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बनाया, तब कैसे हुआ शिव और कृष्ण का भयंकर हरि-हरा युद्ध? देखिए प्रेम, युद्ध और भक्ति की यह अविस्मरणीय गाथा, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी योगमाया से असंभव को संभव करते हैं। #BhagavataPurana #ShivaKrishnaWar #AniruddhaUsha #Dwarka #KrishnaLeela #HariHaraYuddha #Pradyumna #Banasura #LordShiva #LordKrishna
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00:00शंभासुर का वध करके प्रद्युम्न और मायावती जब द्वारका पहुँचे तो पूरे नगर ने उनका भव्य स्वागत किया।
00:07अपने प्रिय पुत्र प्रद्युम्न को जीवित देख कर माता रुक्मिनी और भगवान श्री कृष्ण की आखों में आनंद के अश्रुचल
00:16काए।
00:17द्वारका की प्रत्येक गली और राज महल दीपकों की दीपती और ताजे फूलों के तोर्नों से सजीव हो उठी।
00:25प्रद्युम्न के पुन्रागमन के उपरांत यादव कुल के संबंध को सुद्रिड करने हेतु भोजकट की राजकुमारी रुक्मवती के साथ उनका
00:34विवाह तय हुआ।
00:35राजसी ठाटबाट के साथ प्रद्युम्न और राजकुमारी रुक्मवती का वैदिक रितिरिवाजो द्वारा पवित्र विवाह संपन्न हुआ
00:44इस पावन अफसर पर देवर्शी नारद ने अपनी वीना की मधूर जंकार से द्वारकापुरी को भावी पीधी के महान सौभाग्य
00:53का वर्दान दिया
00:55समय के चक्र के साथ द्वारका में सुख, समरिध्धी और शान्ती का एक नया स्वर्णिम अध्याय प्रारंब हुआ
01:03शीघरही रुक्मवती के गर्भ धारन करने पर द्वारका के वातावर्ण में शुब शकुन और सुगंधित हवाई बहने लगी
01:12एक शुब नक्षत्र में राजमहल के भीतर एक अत्यंत तेजस्वी और दिव्य बालक का जन्म हुआ, जिसने चारों दिशाओं को
01:20प्रकाशित कर दिया
01:22नवजात बालक को गोद में लेकर माता रुकमिनी का हरिदय अपार्सने और आनन्द से भर उठा
01:30भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पौत्र के मुखमंडल पर दमकते अलोकिक प्रभाव को देख कर उसे अपना पूर्ण आशिर्वात प्रदान किया
01:39दाउ बल्राम और महारानी रेवती ने इस समाचार को सुनते ही संपूर्ण यादव सेना और प्रजा में उच्सव की घोशना
01:47कर दी
01:49कुलगुरु गरगाचार्य ने वेदमंत्रों के उच्चारण के मध्यबालक का नाम अनिरुध रखा जिसका अर्थ है जिसे कोई रोक न सके
01:59आकाश से देवताओं और गंधर्वों ने द्वारकापुरी पर पारिजात के पुश्पों की वर्षा करके उच्सव को और भी पावन बना
02:06दिया
02:08राजकुमार अनिरुध धीरे धीरे बड़े होने लगे और उनमे कमल्नियन और अद्वितिय वीर योध्धा के लक्षन सपष्ट दिखने लगे
02:17बालक अनिरुध राज महल के आंगन में सोने के छोटे रथों और धनुशों के साथ खेलता हुआ सबका मन मोह
02:24लेता था
02:26प्रद्युम्न अपने बालक अनिरुध को अस्त्रशस्त्र विद्या के प्रथम पाठ पढ़ाते जबकी श्रीकृष्ण दूर से मुस्कुराते हुए देखते
02:36उग्रसेन, अकरूर और यादव कुल के श्रिष्ट बुजुर्गों ने अनिरुध को बहुमूल्य आभूशन और अपने आशिर्वाद समर्पित किये
02:45समुद्र तटपर स्थित द्वार का नगरी रात्री में सहस्त्रों दीपों की माला से ऐसी चमक्ती मानो आकाश गंगा धरा पर
02:53उतर आई हो
02:55अनिरुध का यह तेजस्वी बचपन अब एक महान भविश्य और उस अमिट प्रेन कथा की ओर बढ़ रहा था जो
03:02जल्द ही तीनों लोकों को हिलाने वाली थी
03:06उधर द्वार का से बहुत दूर पूर्व दिशा के विशाल और अत्यंत शक्तिशाली क्षेत्र में स्थित था दैत्यराज बानासुर का
03:14भव्य एवं अभेद्य सामराज्य शोनितपुर
03:16इस विशाल नगरी पर राज्य करता था महाबलशाली दैत्यराज बानासुर जिसकी सहस्र भुजाओं का असीम बल तीनों लोकों में भय
03:26उत्पन्न करता था
03:29बानासुर देवाधिदेव महादेव का अनन्य भक्त था और निरंतर भगवान शिव की कठोर साधना में लीन रहना ही उसके जीवन
03:37का मुख्य आधार था
03:38अपनी सहस्र भुजाओं से मृदंग और अनेक वाध्ययंत्र बजाकर जब बानासुर शिवतांडव स्तोत्र का गायन करता तो संपून शोनितपुर भक्तिरस
03:49में डूग जाता
03:51बानासुर की इस अनन्य भक्ती से प्रसन्न होकर भगवान शिवने स्वयं प्रकट होकर उसे और उसकी नगरी को सदा सुरक्षित
03:59रखने का अभय वर्दान दिया था
04:02परंतु इस अपार शक्ती और महादेव के संरक्षन ने बानासुर के भीतर अहंकार भर दिया जिससे वह अपने समकक्ष किसी
04:11महायोधा से युद्ध के लिए तडपने लगा
04:14इसी शोनितपुर के भव्य राज महल के सबसे सुन्दर और शांत अंतहपुर में निवास करती थी बानासुर की परम सुन्दरी
04:22पुत्री उशा
04:24उशा न केवल अग्वितिय सुन्दर्ता की स्वामिनी थी बलकि उसके निश्पाप हृदय में अत्यंत कोमल प्रेम और स्वपनिल अभिलाशाय पलती
04:33थी
04:34एक शीतल रात्री में जब संपूर्ण शोनितपुर निद्रा के आगोश में समाया हुआ था तब उशा अपने शयनकक्ष में एक
04:42अलोकिक स्वपन के संसार में प्रवेश कर गई
04:46स्वपन की उस जादूई दुनिया में उसने देखा कि वह एक अलोकिक दिव्यवाटिका में खड़ी है जहां स्वर्ण तुल्य पुष्प
04:54खिले हैं और सुगंधित पवन बह रही है
04:58तब ही उस स्वर्ण स्रोवर के समीप एक अत्यन्त तेजस्वी और परमसुंदर राजकुमार प्रकट हुआ जिसका रूप साक्षात कामदेव से
05:07भी अधिक मोहक था
05:09उस अज्यात राजकुमार के मुख मंडल पर एक ऐसी सम्मोहक मुस्कान थी जिसने प्रथम द्रिष्टी में ही उशा के हृदय
05:17को पूर्ण रूप से मोह लिया
05:20स्वप्न में दोनों ने एक दूसरे का हाथ थामा और अलोकिक चंद्रमा की शीतल चांदनी तले अनंत प्रेम के पावन
05:27सूत्र में बंधने लगे
05:30किन्तु जैसे ही प्रेम का वह क्षण अपने चर्मोत कर्ष पर पहुँचा घोर की पहली किरण के साथ वह मनमोहक
05:37स्वपन अचानक ओजल होने लगा
05:40उशा सहसा चौक कर जागी और आखें खोलते ही उसने स्वयं को अपने सूने शयनकक्ष में बिलकुल अकेला पाया
05:49उसने व्याकुल होकर अपने आसपास देखा परन्तु वह सुन्दर राजकुमार कहीं नहीं था वह केवल एक सपना था जो सुभा
05:58होते ही तूट चुका था
06:00जिसके नाम और ठिकाने का भी उसे ज्ञान न था उस अज्यात प्रेमी के विरह में उशा का हृदय असहय
06:07वेदना से भर उठा
06:09उसी क्षन उसकी प्रिय सक्खी और मंतरी कुम्भांड की तंत्रविद्या में निपुन पुत्री चित्रलेखा ने कक्ष में प्रवेश किया
06:17उशा को इस प्रकार अश्रु बहाते और अत्यंत व्यथित देख, चित्रलेखा तुरंट उसके समी पाई और प्रेम पूर्वक उसकी इस
06:27पीडा का कारण पूछा
06:29उशा ने हिचकिचाते हुए अपनी सखी के समक्ष अपने उस दिव्यस्वपन का रहस्य खोला और बताया कि कैसे एक अग्यात
06:38राजकुमार ने उसका हृदय चुरा लिया है
06:42चित्रलेखा ने अपनी सखी उशा को धांधस बंधाते हुए प्रतिज्या की कि वह अपनी योगशक्ती और चित्रकला के बल पर
06:49तीनों लोकों के देवों, गंधर्वों और राजकुमारों के चित्र बनाकर उस अग्यात प्रेमी को खोज निकालेगी
06:57अपने तपोबल का आहवान करते हुए चित्रलेखा ने अपने सम्मुख एक दिव्य वस्त्र का पट और मायावी तूलिका प्रकट की,
07:05जिससे वह किसी भी प्राणी का जीवन्त रेखा चित्र उकेर सकती थी
07:11सबसे पहले चित्रलेखा ने स्वर्गलोग के तेजस्वी देवताओं, इंद्र, अगनी, वरुन और चंदरदेव के अत्यंत सुन्दर चित्र पट पर उकेरे
07:21उशा ने बड़े ध्यान से उन देवों के चित्रों को देखा, किन्तु निराशा में अपना सिर हिलाते हुए कहा कि
07:28इन में से कोई भी उसका स्वपन पुरुष नहीं है
07:32ततपश्चात चित्रलेखा की जादूभरी तूलिका ने संगीत और सौंदर्य के स्वामी गंधरवों तथा किन्नरों के मनोहर मुखमंडल चित्रित करना आरंभ
07:41किया
07:43गंधरवों के अत्यंत कमनिय और लुभावने रूपों को देखने के बाद भी उशा के हृदय में प्रेमानुभूती की वह विशेश
07:50तरंग उत्पन्द नहीं हुई
07:53इसके बाद चित्रलेखा ने पाताल और धंधाने के लोकों के पराक्रमी नागों तथा यक्षों के सुन्दर चित्र एक एक करके
08:01पट पर उतारे
08:03परंतु नागपतियों और यक्षराज कुमारों का भव्य रूप भी उशा के मन में रची बसी उस विशेश छवी से मिल
08:10नखा सका
08:12निराश न होते हुए चित्रलेखा ने अब प्रित्वी लोग के महान सूर्यवन्शी और चंद्रवन्शी क्षत्रिय राजाओं तथा पराक्रमी राज कुमारों
08:21को चित्रित करना प्रारंभ किया
08:24उसने इक्षवा को कुरू और मगध वन्श के विख्यात और बलशाली शासकों के तेजपूर्ण चित्र अपनी जादूई तूलिका से सजीव
08:32कर दिये
08:34उशा ने प्रित्वी के एक से एक सुन्दर और शक्तिशाली योध्धाओं को देखा परन्तु उसकी आखें अब भी उस अजन्बी
08:42प्रेमी की एक जलक पाने को तरस रही थी
08:45उशा की छट-पटाहट देख चित्रलेखा समझ गई कि वह राजकुमार अवश्य ही अत्यंत दिव्य द्वारका के महान यादव वंच
08:54से संबंध रखता होगा
08:56चित्रलेखा ने द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का परम अलोकिक और तेजस्वरूप पट पर उकेना शुरू किया जिनका श्याम वर्ण अत्यंत मनमोहक
09:06था
09:07श्रीकृष्ण के चित्र को देखते ही उश्या ने अत्यंत श्रद्धा से जुखकर नमन किया किन्तु संकेत दिया कि वे उसके
09:14पूज़ हैं उसके प्रेमी नहीं
09:18ततपश्चात चित्रलेखा ने कामदेव के अवतार और श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्यूम्न का अतिसुंदर और कांतिमान रूप अनकित किया
09:27उश्या ने प्रद्यूम्न के रूप को ध्यान से देखा उसमें उसे अपने स्वपन पुरुष की जलक तो दिखाई दी पर
09:34वह पहचान गई कि यह उसके प्रियतम नहीं है
09:38तब चित्रलेखा ने अपनी तूली का घुमाकर प्रद्यूमन के पुत्र, युवा और अतिनोहर राजकुमार अनिरुध का चित्र बनाना प्रारंब किया
09:48जैसे ही अनिरुध का परम सुन्दर मुख मंडल, उनकी कमल जैसी आखें और दिव्य मुस्कान पट पर उकेरी गई, उशा
09:56का हृदय हर्शतिरेख से उचल पड़ा
09:59लज्जा से लाल होती हुई उशा ने कापती उंगली से अनिरुध के चित्र की ओर इशारा किया और खुशी से
10:06चहकते हुए कहा कि यही उसके सपनों का राजकुमार है
10:11सखी की पुष्टी मिलते ही चित्रलेखा ने विजय की मुस्कान के साथ संकर्ट लिया कि वह आज ही अपनी योगविद्या
10:19से द्वार का जाकर अनिरुध को यहां ले आएगी
10:23अपनी सखी की व्याकुलता को समझ कर चित्रलेखा ने तुरंत अपनी योगविद्या का आहवान किया, जिससे उसकी शक्ती से बायुमंदल
10:32में एक दिव्य चमक फैल गई
10:34पलक जपकते ही, एक अती सुंदर सलेस्टियल मेडन अथेरियल बीटी, slender yet graceful, with radiant, slightly golden skin that shimmers
10:45softly,
10:45her large and expressive eyes, the color of twilight, reflecting wisdom and mystic power, her long, dark, wavy hair adorned
10:55with delicate celestial flowers and strands of pearls,
10:59flowing down to her waist, wearing exquisite, flowing silk robes in shades of deep indigo and shimmering silver, embroidered with
11:08intricate golden patterns that resemble
11:12constellations around her neck, a delicate moonstone pendant, and her wrists adorned with slender golden bangles,
11:19her expression serene but focused, embodying the potent grace of a yogini, चित्रलेखा ने अपनी काया को अद्रिश कर लिया,
11:28जैसे वह वायू में विलीन हो गई हो, केवल एक सुक्षम आभाशेश रह गई
11:34अद्रिश होकर वह तीवर गती से आकाश मार्ग से निकली, बादलों को चीरती हुई और तारों से बातें करती हुई,
11:42मानो एक स्वर्गिय किरन द्वारका की ओर बढ़ रही हो, उसकी यात्रा में कोई बाधा नहीं थी
11:49शीघर ही, उसने दूर क्षितिच पर द्वारका नगरी के स्वर्णमंडित शिखर देखे, जो सूर्य की अंतिम किरनों में दमक रहे
11:57थे, जैसे स्वय देवों का निवास हो
12:01द्वारका के भव्य महलों और विस्तृत उध्यानों के बीच से होकर, चित्रलेखा अपनी योगद्रिष्टी से अनिरुध के कक्ष का पता
12:09लगाने लगी, जैसे कोई कुशल शिकारी अपने शिकार को ढूंडता है
12:15अन्तह उसे एक अत्यंत भव्य कक्ष में एक युवा प्रिंस, youthful and exceptionally handsome, with a robust yet graceful physique,
12:24embodying divine strength and charm, his skin illuminous, clear golden bronze, glowing with an inner vitality, his eyes large, dark
12:33and captivating like lotus petals, reflecting courage and nobility, framed by thick, dark eyebrows,
12:41his dark, wavy hair neatly coughed, falling just above his shoulders, adorned with a simple yet elegant gold circlet, wearing
12:50fine, rich, silk garments in vibrant shades of sapphire blue and crimson, embellished with subtle gold embroidery, heavy golden armlets
13:01gracing his biceps, and a multi-stranded pearl necklace resting on his broad chest, peacefully sota hua mila
13:09परम शान्त निद्रा में डूबे हुए अनिरुद्ध का मुखमंडल चंद्रमा के समान उजवल था, उनके अध्रों पर एक हलकी मुस्कान
13:18खेल रही थी, मानो वे मधुर स्वपन देख रहे हूँ
13:23चित्रलेखा ने सावधानी से अपने योगबल का प्रयोग किया, और अद्रिश्य हाथों ने सोय हुए अनिरुद्ध को कोमलता से उठा
13:31लिया, जैसे कोई शिशु को उसकी पालना से उठाता है
13:36बिना किसी को आभास हुए, चित्रलेखा ने अनिरुद्ध को अपनी भुजाओं में लिये हुए, उसी अलौकिक गती से द्वारका से
13:44सोनितपुर की ओर अपनी वापसी यात्रा प्रारंभ कर दी
13:48जैसे ही रात घनी हुई, वह अद्रिश्य रूप से उशा के निजी महल में प्रवेश कर गई, जहां प्रतीक्षा करती
13:56हुई उशा की आखें आशा से चमक रही थी
14:00Chitralekha ne dhire se prince, youthful and exceptionally handsome, with a robust yet graceful physique, embodying divine strength and charm,
14:09his skin luminous, clear golden bronze, glowing with an inner vitality, his eyes large, dark, and captivating, like lotus petals,
14:20reflecting courage and nobility, framed by thick, dark eyebrows, his dark, wavy hair neatly coughed, falling just above the
14:28his shoulders, adorned with a simple yet elegant gold circlet, wearing fine, rich silk garments in vibrant, shades of sapphire
14:38blue and crimson, embellished with subtle gold embroidery, heavy golden armlets gracing his biceps, and a multi-stranded pearl necklace
14:48resting on his broad chest, prince Aniruddh ko उशा के शयनकक्ष में एक कोमल शया पर लिटा दिया,
14:55जैसे कोई अनमोल रक्न सहेज कर रखा जाता है
15:00धीरे धीरे अनिरुद्ध ने अपनी आखें खोली, उनके माथे पर भ्रम की हलकी रेखाए थी, क्योंकि वह एक अप्रिचित दिव्य
15:08महल में स्वयन को पाकर चकित थे
15:11अपनी शया पर अपने सपने के राजकुमार को देख कर प्रिंसेस अफ ब्रेथतेकिंग ब्यूटी,
15:17with delicate features and a graceful, slender form, her skin possessing a soft, pearlescent glow,
15:24reminiscent of moonlit ivory, her eyes large, almond-shaped and dark, conveying both innocence
15:31and deep emotion, often framed by long, dark lashes, her long, lustrous black hair cascading in soft
15:39waves, frequently adorned with fresh jasmin or delicate golden ornaments, wearing exquisite,
15:46flowing silk lehengas and cholies. In vibrant hues like emerald green, ruby red or deep violet
15:54intricately embroidered with gold thread and precious gems, delicate gold jewelry, earrings,
16:01necklaces, bangles and a small nose ring enhancing her ethereal charm, उशा का हृदय धड़क उठा,
16:08उसकी आखें अविश्वास और असीम आनन से चौडी हो गई। लज्या और अचरच से लाल होती हुई,
16:16उशा ने अनिरुद्ध की ओर देखा, उसके अध्रों पर एक मधुर मुस्कान खिंच गई, जैसे हजारों फूल एक साथ खिल
16:24उठे होुँ.
16:26जैसे ही अनिरुद्ध की दृष्टी उशा पर पड़ी, उसके मन में यह सहज ज्ञान आयात की यही वह अलौकिक सुन्दरी
16:33है, जिसे उसने अपने स्वपनों में देखा था, और उसका हृदय प्रेम से भर गया।
16:39दोनों ने पहली बार एक दूसरे की आखों में देखा, एक मौन समवाद स्थापित हुआ, जिसमें उनके हृदय एक दूसरे
16:47के प्रती गहन आकर्शन और विस्मय से भर उठे।
16:52इस प्रकार सोनितपुर के महल में उशा और अनिरुध का गुप्ट प्रेम पनपने लगा, जहां वे हर दिन एक दूसरे
16:59में खोए रहते थे, सांसारिक चिन्ताओं से दूर।
17:03किन्तु यह रहस्य अधेक समय तक छिपा न रह सका, और एक दिन बानासुर के पहरेदारों ने महल के भीतर
17:11एक अंजान पुरुष की उपस्थिती का पता लगा लिया।
17:15Rajsi Aadesh par, कई वेल-trained warriors, typically human or low-level Asura, with muscular builds and weathered, stern faces,
17:24their skin tones varying from earthy brown to slightly greenish hues for the Asura guards, wearing practical yet formidable armor,
17:33consisting of hardened leather cuirasses adorned with metal studs and plates, heavy iron armlets, and leg guards, their helmets simple
17:43conical or ball-shaped,
17:44with minimal decoration, carrying various standard weapons such as sharp iron, spears, broad swords, and round shields, always vigilant, their
17:56expressions grim and disciplined,
17:58राजा के पहरेदार गरचते हुए उशा के कक्ष की ओर बढ़े, उनके हाथों में तलवारे चमक रही थी, उनकी आखों
18:06में प्रतिशोध की आग थी।
18:08अचानक हुए इस प्रहार से अनिरुध क्रोधित हो उठे और अपने अदमय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, उन्होंने अपनी मुठिया
18:17भींच ली, मानों वे अकेले ही पूरी सेना का सामना करने को तैयार हों।
18:23अनिरुध ने बिना किसी अस्त्र के पास पड़े एक विशाल लोहे के परिग को उठा कर आक्रमनकारी असुर सैनिकों पर
18:31प्रचन प्रहार कर दिया।
18:33अपनी अतुलनिय वीर्ता का परिचय देते हुए, अनिरुध ने क्षन भर में दर्जनों बलशाली पहरेदारों को धूल चाटने पर विवश
18:41कर दिया।
18:43महल के कक्ष में अस्त्रों की भयंकर टंकार और असुरों की चीतकार सुनकर राजकुमारी उशा अत्यंत भयभीत हो उठी।
18:52बचे हुए सुरक्षा गार्ड घबराकर तुरंत सोनितपुर के राजा बानासुर के राजगरबार की और भागेता की इस अन्होनी की सूचना
19:00दे सकें।
19:02उशा के कक्ष में गुप रूप से उपस्थित युवक्का समाचार सुनते ही बानासुर की सहसरों भुजाय क्रोध से फड़कने लगी।
19:11प्रचंड गर्जना करते हुए राजा बानासुर अपने सबसे क्रूर असुर सेनाप्तियों के साथ उशा के महल की ओर तेजी से
19:19बढ़ा।
19:20जब तक बानासुर वहां पहुँचा अनिरुध महल के बाहरी प्रांगण में खड़े होकर असुर सैनिकों के छक्के छुड़ा रहे थे।
19:29अपनी विशाल सेना को इस नौजवान योद्धा के आगे धराशाई देखकर बानासुर के क्रोध का ठिकाना न रहा।
19:37बानासुर ने गर्जना करते हुए पूछा कि उसकी पुत्री के महल में प्रवेश करने वाला यह दोहसाहसी युवक कौन है।
19:46अनिरुद्ध ने निर्भीक होकर घोशना की की वेद्वार काधिश भगवान श्री कृष्ण के पौत्र और प्रद्युम्न के वीर पुत्र अनिरुद्ध
19:55है।
19:56श्री कृष्ण का नाम सुनते ही बानासुर का अहंकार भड़क उठा और उसने अपनी समूची सेना को एक साथ अनिरुद्ध
20:04पर तूट पड़ने का आदेश दिया।
20:07किन्तु जब बानासुर ने देखा कि उसकी सेना अनिरुद्ध के सामने असहाय है तो उसने छलकपट का सहारा लेने का
20:15निर्नय किया।
20:17बानासुर ने अपनी आसुरी विद्या का प्रयोग करते हुए परम विनाशकारी नागपाश अस्त्र का आहवान किया।
20:25आकाश और हवा से अचानक अंगिनत जहरीले और चमकीले सर्प प्रकट होकर अनिरुद्ध की ओर जपते।
20:33अनिरुद्ध ने अंत तक डटकर मुकाबला किया, किन्तु नागपाश की मायावी शक्ती ने उन्हें चारों ओर से कसना शुरू कर
20:41दिया।
20:43नागपाश के अटूट बंधन में बंध कर वीर अनिरुद्ध भूमी पर घुटनों के बल बैठने पर विवश हो गए।
20:50अपने प्रिये को संकट में बंधा देख राजकुमारी उशा बिल्ख बिल्ख कर रोने लगी और अपने पिता से उनके प्राणों
20:58की भीख मांगने लगी।
21:01घमंडी बानासुर ने अपनी बेटी की करुण पुकार को अनसुना कर दिया और सैनिकों को अनिरुद्ध को काल कोठरी में
21:08डालने का आदेश दिया।
21:11नागपाश की भारी जंजीरों में जक्डे अनिरुद्ध को सोनितपुर की सबसे अंधी और भयावः पाताल कालकोठरी में बंदी बना लिया
21:19गया
21:21उधर द्वारका में महर्शी नारद ने पहुँचकर भगवान श्री कृष्ण और बलभदर को अनिरुद्ध के बंदी बनाये जाने का समाचार
21:29दिया
21:30महर्शी नारद के मुख से अनिरुद्ध के बंदी होने का समाचार सुनकर द्वार काधीश भगवान श्री कृष्ण और बलभदर के
21:38मुख मंडल पर गहरा चिंतन और क्रोध एक साथ जलक उठा
21:43भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय पोत्र के अपमान और बंदी बनाये जाने की बात सुनकर क्रोध से अपनी भौहें
21:51चड़ा ली और उसे मुक्त कराने का द्रिड संकल्क लिया
21:55ततकाल द्वारका में यादव कुल के सभी योध्धा सेनाप्ती और मंत्री युध परिशद में एकत्रित हुए जहां अनिरुध को बानासुर
22:04के चंगुल से छुडाने की रणनीती पर गंभीर विचार विमर्ष हुआ
22:10द्वारका के वायुमंडल में अब युध के नगाडों की गूंज और शंकनाद का स्वर सुनाई देने लगा क्योंकि यादव सेना
22:17ने अपने अदमई शौर्य और शक्ती के साथ संगठित होना शुरू कर दिया था
22:23युद्ध के लिए प्रस्थान करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र को धारन किया जबकि बलभदर ने
22:31अपने हल और मूसल को लेकर रणभूमी की ओर बढ़ने का संकेत दिया
22:37असंख्य रथों, हाथियों, घोडो और पैदल सैनिकों से सुसजजित द्वारका की विशाल सेना भगवान श्री कृष्ण और बलभदर के नेतरित्व
22:46में सोनितपुर की ओर गर्जना करते हुए आगे बढ़ी
22:50जैसे ही यादव सेना ने सोनितपुर की ओर कूच किया, धूल के बादल आकाश में छा गए और भूमी उनके
22:58भारी कदमों से थर्रा उठी, जो एक आसन्न महायुद्ध का संकेत था
23:04उधर सोनितपुर की अंधकार्मय पाताल कालकोठी में, नागपाश की भारी जन्जीरों में जक्रा अनिरुद्ध अपनी दिव्य आभा को बनाये रखते
23:13हुए, पीडा में भी अदमय साहस प्रदर्शित कर रहा था
23:18अपने कक्ष में, राजकुमारी उशा अपने प्रिय अनिरुद्ध के बंदी बनाये जाने से व्याकुल और असहाय होकर, आसुओं से भरी
23:26आखों से उदास बैठी थी, उसका हृदय शोक से भरा था
23:31अपनी सहेली उशा की दुर्दशा देखकर, चित्रलेखा ने उसे दिलासा दिया और अपनी मायावी शक्तियों का उप्योग करके अनिरुद्ध को
23:40धूंध निकालने और बचाने का वचन दिया
23:44अपनी दिव्य योगिक द्रिष्टी से चित्रलेखा ने सोनितपुर की गहराई में स्थित पाताल कालकोठरी में नागपाश में जक्डे हुए अनिरुद्ध
23:52को क्षन भर में धूंध निकाला
23:55चित्रलेखा ने अनुभव किया कि बानासुर को परास्ट करना सामान्य बात नहीं होगी क्योंकि उसे स्वय भगवान शिव का अद्वितिय
24:04वर्दान और रक्षा प्राप्त थी
24:07सुदूर कैलाश परवत की बरफीली चोटियों पर देवों के देव महादेव अपनी आखे बंद किये गहन समाधी में लीन थे
24:15ब्रह्मांड की चेतना में विली
24:19अपनी मित्र उशा को बचाने और बानासुर की शक्ती का सामना करने के लिए चित्रलेखा ने भगवान शिव और अन्य
24:26दिव्य सत्ताओं से सहायता मांगने का निर्णय लिया
24:31दूरक्षितिच पर सोनितपुर की विशाल और दुरभेद्य दीवारे दिखाई देने लगी जैसे एक अजे राक्षस अपनी सुरक्षा में अड़ा हो
24:39जब यादव सेना उसके पास पहुँची
24:43उधर सोनितपुर में बानासुर के गुपतचरों ने दुवारका की विशाल सेना के आगमन का समाचार उसे दिया जिससे असुर राजा
24:51के हंकार को गहरा आधात लगा
24:54अपने अभेद्य सोनितपुर और भगवान शिव के वर्दान पर घमंड करते हुए बानासुर ने क्रोधित होकर अपनी सेना को युद्ध
25:03की तयारी के लिए ततकाल आदेश दिया
25:06बानासुर के सेनाप्ती और मंत्री भईभीत होते हुए भी यादव सेना के अप्रत्याशित आगमन से उत्पन्न खत्रे पर गंभीर चर्चा
25:15करने लगे उनके चहरे पर चिंता की रेखाय थी
25:19अपने अजे होने का दावा करते हुए बानासुर ने अपनी राक्षस सेना को इकठा किया और उन्हें भगवान शिव के
25:27संरक्षन का हवाला देते हुए श्रीकृष्ण की सेना का सामना करने के लिए प्रेरित किया
25:34युद्ध भूमी के बाहर भगवान श्री कृष्ण ने अपने रत पर खड़े होकर सोनितपूर की विशाल और अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था
25:42का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया, जो बानासुर की शक्ती का प्रतीक थी
25:48भगवान श्री कृष्ण ने अपने दिव्यशंक पांच जन्य का उद्धोश किया, जिसकी गर्जना ने सोनितपूर के विशाल प्राचीरों और आसपास
25:57के परवतों में गूंच कर बानासुर के ह्रदय में एक अज्यात भाय का संचार कर दिया
26:03उनके आदेश पर यादव सेना के हर योधा ने अपनी धाले उठाई और शस्त्रों को कस कर पकड़ा, उनकी आखें
26:11सोनितपूर के दुरगम द्वारों पर टिकी हुई थी, जहां से युद्ध की भीशन लप्तें उठनी तय थी
26:19बलराम अपने हल और मूसल को कंधे पर उठाए, एक परवत की तरह अडिक खड़े थे, उनकी श्वेत काया पर
26:26युद्ध का आवेश स्पष्ट जलक रहा था, जो शत्रु के लिए विनाश का संकेत था
26:32प्रद्युम्न अपने पिता की छाया में एक युवा सिंह की भाती गर्व से खड़े थे, उनका धनुष उनके हाथों में
26:40उच्सुप्ता से जंजना रहा था, स्वर्ग से प्राप्त बानों से भरा तरकश उनकी पीठ पर शोभाय मान था
26:47सैन्य रणभेरी की ध्वने आकाश को चीरती हुई गुंजी, जैसे किसी अग्रिश्य दैत्य ने अपनी भीशन गर्जना से धरा को
26:56हिला दिया हो, जो यादवों के अदमे साहस और विजय के संकल्प की घोशना थी
27:02हजारो रथ घोडे और पैदल सैनिक एक विशाल लहर की भाती, सोनितपुर के अभेद्य द्वारों की ओर बढ़े, उनकी गती
27:10से धर्ती थर्रा उठी और धूल के बादल आकाश में छा गए
27:15सोनितपुर के प्राचीरों पर बानासुर की विशाल राक्षस सेना युद्ध के लिए तैयार खड़ी थी, उनके काले और खुर्दुरे चहरे
27:24पर क्रूरता और चुनौती का भाव स्पष्ट था, हर एक राक्षस अपनी विक्राल शक्ती का प्रदर्शन कर रहा था
27:32जैसे ही यादव सेना प्राचीरों के निकट पहुँची, बानासुर की ओर से भी भीशन रन्भेरी बस उठी, जिसके साथ ही
27:40राक्षसों की भयावह गर्जनाय और शस्त्रों का टंकार वातावर्ण में भय और प्रतिशोध घोलने लगा
27:47दोनों सेनाय एक दूसरे से जाटकराईं, जैसे दो प्रल्यकारी समुद्र एक दूसरे पर गरचते हुए आगिरे हों, जिससे धर्ती डोल
27:56उठी और आकाश चीतकार से भर गया
28:00युद्ध भूमी रक्त और लोहे की गंद से भर गई, जहाँ वीर योध्धाओं और क्रूर राक्षसों के बीच भीशन द्वंद्व
28:07चल रहा था, हर ओर केवल मृत्यू और विनाश का तांडव दिखाई दे रहा था
28:13प्रध्युम्न अपने धनुष से बाणों की वर्षा करते हुए, शत्रूओं के गढ़ में घुस गए, उनके प्रत्येक बाणने कई राक्षसों
28:21को धराशाई कर दिया, जैसे तीवर हवा पत्जड के पत्तों को बिखेर देती है
28:28साम्ब अपनी गढ़ा के भयंकर प्रहारों से राक्षसों की पंक्तियों को चीरते हुए आगे बढ़े, उनका प्रत्येक वार वजर के
28:36समान था, जो शत्रू सेना में खलबली मचा रहा था
28:41बल्राम का हल और मूसल युद्ध भूमी में मृत्यु का तांडव रच रहा था, जहां भी वे प्रहार करते, शत्रू
28:48सेना के बड़ेब्डे योध्धा धूल चाटते दिखाई देते, उनकी शक्ती ने हर राक्षस के मन में आतंक भर दिया
28:56बानासुर अपने उचे दुर्ग पर खड़ा होकर, यादव सेना के विनाशकारी आक्रमन को देख रहा था, उसकी आखों में शुरू
29:04में अभिमान था, पर धीरे धीरे एक चिन्ता की रेखा उभरने लगी
29:10तभी भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युद्ध के केंद्र में प्रकट हुए, उनका सुदर्शन चक्र उनके हाथ में दैविय प्रकाश से जग्मगा
29:18रहा था, जो अंधकार को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था
29:23श्रीकृष्ण के आगमन से राक्षस सेना में भगदर मच गई, उनकी दिव्य शक्ती के सामने कोई भी शत्रु ठेहर नहीं
29:31पा रहा था, जैसे प्रचंड आंधी सूखे पत्तों को उड़ा देती है
29:37बानासुर के सेनाप्ती और मंत्री, जो पहले अपनी शक्ती पर इतराते थे, अब श्रीकृष्ण की अदमय शक्ती को देखकर भयभीत
29:45हो गए, उनके चहरे पर हार की सपष्ट छाया मंदरा रही थी
29:50बानासुर ने अपनी सेना के पतन को देखा और क्रोध से भर उठा, उसका अभिमान एक बार फिर जागा और
29:58उसने प्रतिग्याकी की वह स्वय युद्ध में उतर कर श्रीकृष्ण का सामना करेगा
30:03एक भीशन गर्जना के साथ बानासुर ने युद्ध भूमी में छलांग लगाई, उसके हजार हाथ शस्त्रों से सज्जित थे और
30:12उसका विशालकाई शरीर क्रोध की अगनी से देहक रहा था, जो स्वय शिव के भक्त की दुर्दमय शक्ती का प्रतीक
30:19था
30:20भगवान श्रीकृष्ण और बानासुर अब आमने सामने थे, दो महान शक्तिया, धर्म और अधर्म के प्रतिनिधी, जो एक ऐसे महायुध
30:29के लिए तयार थे, जिसकी गुंज युगों युगों तक सुनाई देगी
30:34जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण बानासुर का वध करने हेतु आगे बढ़े, तभी अपने भक्त की रक्षा का वचन निभाने के
30:42लिए भगवान शिव दिव्यतेज के साथ युद्धक्षेत्र में प्रकट हो गए
30:47भगवान शिव के साथ उनके स्वामी कार्ति के भगवान श्रीगनेश, नंदी और भयंकर प्रमत गणभी गर्जना करते हुए यादव सेना
30:56का सामना करनेया पहुँचे
30:59भगवान श्रीकृष्ण ने त्रिलोकीनाथ शिव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और नमरता पूर्वक कहा कि बानासुर के अन्याय का अंत
31:07करना ही धर्म की स्थापना के लिए आवश्चक है
31:12महादेव ने श्रीकृष्ण के अवतार कार्य को स्विकार किया परंतु अपने शर्नागत भक्त बानासुर की रक्षा करने की अपनी प्रतिग्या
31:20का स्मरण कराते हुए धनुष उठा लिया
31:24इस प्रकार शोनितपुर का मैदान हरी और हर के बीच होने वाले अभूत पूर्व महा संग्राम का प्रत्यक्षदर्शी बना जिससे
31:32तीनों लोग थर-थर कामपने लगे
31:35भग्वान शिव ने अपने पिनाक धनुष पर प्रल्यंकारी पाशुपतास्त्र का संधान किया जिससे पूरे आकाश में भीशन अग्नी के गोले
31:44बरसने लगे
31:46श्रीक्रिष्ण ने तुरंत अपने नारायन अस्त्र का प्रयोग किया जिसने महादेव द्वारा छोड़े गए पाशुपतास्त्र की भयंकर अग्नी को पल
31:54भर में शांत कर दिया
31:57दूसरी और मयूरवाहन स्वामी कार्तिके ने अपने अमोध शक्ती अस्त्र से श्रीक्रिष्ण पुत्र प्रद्युम्न पर भीशन प्रहार किया
32:06कामदेव के पुनरजन्म प्रद्युम्न ने अत्यंत फूर्ती से बान चला कर कार्तिकेय के अस्त्र को हवा में ही काट गिराया
32:14और अध्भुत युद्ध कौशल दिखाया
32:17उधर बलराम जी अपने हल और गदा को घुमाते हुए बानासुर की विशाल राक्षस सेना और सेनाप्ती कुम्भांड पर कहर
32:25बनकर तूट पड़े
32:27अपने सेनाप्तियों को गिरते देख बानासुर अपनी हजार भुजाओं में अनेक खडग, बान और त्रिशूल लेकर स्वय युद्ध में कूद
32:35पड़ा
32:37श्री कृष्ण ने अत्यंत सुगमता से बानासुर के हजार हाथों से चलाए गए सभी शस्त्रों को अपने बानों से छिन्न
32:44भिन्न कर दिया
32:46युद्ध को लंबा खीचता देख भगवान शिव ने असहे गर्मी और दाह पैदा करने वाला अपना भयंकर माहेश्वर ज्वर प्रकट
32:54कर दिया
32:56अपने भग्तों और यादवों को माहेश्वर ज्वर के ताप से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने तुरंत परम शीतल वैशनव
33:03ज्वर का निर्मान किया
33:05आकाश मंडल में माहेश्वर ज्वर और वैशनव ज्वर आपस में टकरा गए जिससे अगनी और शीतलता का भयानक ब्रहमांडिय संघर्ष
33:14होने लगा
33:16वैशनव ज्वर के अतिशय प्रभाव और शीतलता से पराजित होकर माहेश्वर ज्वर काम पता हुआ सीधे श्री कृष्ण के चर्णों
33:24में गिर पड़ा
33:26भगवान श्री कृष्ण ग्वारा माहेश्वर ज्वर को जीवंदान देने पर महादेव शिव अपने प्रभु नारायन की अनंत करुणा देखकर मन
33:34ही मन मुस्कुरा उठे
33:36इसके उपरांत युद्ध की मर्यादा रखते हुए महादेव ने ब्रहमास्त्र चलाया, जिसे श्री कृष्ण ने शांत और निरर्थक करने वाले
33:45अस्त्र से वही समाप्त कर दिया
33:48स्रिष्टी के संतुलन को बनाय रखने के लिए श्री कृष्ण ने शिवजी पर ज्रिम्भनास्त्र का प्रयोग किया, जो केवल आलस्य
33:56और तंद्रा उत्पन करता है
33:59ज्रिम्भनास्त्र के प्रभाव में आकर महादेव योग निद्रा की मुद्रा में अचेत हो गए और बानासुर अब सर्वता असहाय होकर
34:07श्री कृष्ण के सामने खड़ा रह गया
34:11ज्रिम्भनास्त्र के प्रभाव से महादेव योग निद्रा में थे और बानासुर अपने सभी सेनाप्तियों और सैनिकों को खोकर अब पूरी
34:19तरह से अकेला और असहाय होकर युद्ध भूमी में श्री कृष्ण के सामने खड़ा था
34:24उसकी आखें प्रतिशोध और भय के द्वंद्व से जल रही थी
34:30बानासुर ने देखा कि उसके रक्षक महादेव भी अब अचेत अवस्था में थे जिससे उसकी रहीस ही आशा भी धूल
34:38में मिल गई और उसका हृदय गहन निराशा से भर गया
34:42भगवान श्री कृष्ण की आखें शांति पूर्ण थी फिर भी उनमें एक अटल संकल्प चमक रहा था जैसे वे अब
34:50इस लंबे और भीशन युद्ध को निरनायक रूप से समाप्त करने पर तुले हो
34:56उस भयावक्षण में बानासुर की समस्थ वीर्ता उसके भीतर से क्षीन होती जा रही थी और उसे अपनी आसन्न मृत्यू
35:04स्पष्ट दिखाई दे रही थी
35:07तभी भगवान श्री कृष्ण की दाहिनी तरजनी पर उनका अमोग दिव्यास्त्र सुदर्शन चक्र सूर्य के समान प्रदीप्थ होकर प्रकट हुआ
35:16उसकी सहस्त्र किरने समस्थ दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी
35:21सुदर्शन चक्र अपने तीवर वेग से घूमता हुआ
35:24जैसे समय और स्थान को भेदता हुआ
35:27शन भर में बानासुर की ओर तीवर गती से बढ़ चला
35:32बानासुर ने अपनी सभी भुजाओं को उपर उठाया
35:35हताशा में अपने अस्त्रों से सुदर्शन चक्र का सामना करने का व्यर्थ प्रयास किया
35:41लेकिन उसकी शक्ती अब चुक चुकी थी
35:44पलक जपकते ही सुदर्शन चक्र ने बानासुर की सहस्त्र भुजाओं को बिजली की गती से
35:50उसके शरीर से एक एक कर काट कर अलग करना शुरू कर दिया
35:54मानों वे सूखे पत्तों के समान ज़र रहे हूँ
35:59बानासुर की करुण चीखें युद्ध भुमी में गूंज उठीन
36:02जैसे जैसे उसकी प्रत्येक भुजा उसके शरीर से विच्छेदित होती जा रही थी
36:07वह अत्यंत पीडा से काप रहा था
36:11इस विनाशकारी द्रिश्य को देखकर महादेव की योग निद्रा भंग होने लगी
36:16उन्हें अपने प्रिय भक्त बानासुर की गेहन पीडा का आभास होने लगा
36:22महादेव ने आखें खोली और भीशन द्रिश्व देखा
36:25बानासुर अपने रक्त में सना हुआ
36:28अपनी अधिकाश भुजाओं को खो चुका था और मृत्यू के कगार पर था
36:33अपने भक्त की दैनिय अवस्था देखकर महादेव का हृदय करुणा से भर उठा
36:39और वे तुरंट श्री कृष्ण की ओर बढ़े उनके चहरे पर चिंता और याचना का भाव था
36:45महादेव ने श्री कृष्ण के सम्मुखा कर उन्हें प्रणाम किया
36:50और विनम्रता पूर्वक बानासुर के जीवन और शेश भुजाओं को बचाने की विंती की
36:56महादेव ने स्मरंग दिलाया कि बानासुर उनका परमभक्त है
37:00और उन्होंने उसे सहस्त्र भुजाओं का वरदान दिया था
37:04आथ उसके प्राणों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है
37:08श्री कृष्ण ने महादेव के प्रती अपने गहरे सम्मान और उनकी भक्त वतसलता को समझते हुए
37:15शन भर के लिए अपनी लीला को विराम दिया
37:19तब श्री कृष्ण ने महादेव को आश्वस्त किया कि वे बानासुर के प्राण नहीं लेंगे क्योंकि पूर्वकाल में महादेव ने
37:27ही असुरों के बीच अजेता के रूप में उन्हें जीवन का वर्दान दिया था
37:33महादेव की प्रार्थना स्वीकार करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया कि वह बानासुर की केवल
37:41चार भुजाय शेश रहने दे
37:44सुदर्शन चक्र ने ततपर्ता से श्री कृष्ण के आदेश का पालन किया और बानासुर की शेश सभी भुजाओं को काट
37:51डाला केवल चार भुजाओं को उसके शरीर पर रहने दिया जिससे वह जीवित रह सका
37:58बानासुर अब सहस्त्र भुजाओं वाला नहीं, बलकि चार भुजाओं वाला रह गया था, उसका अहंकार चूचूर हो चुका था और
38:06वह अपने जीवन के लिए आभारी था
38:10महादेव ने श्रीकृष्ण को धन्यवाद दिया और अपनी योग निद्रा से जागरित होने तथा अपने भक्त की रक्षा करने के
38:17लिए उनके प्रती असीन कृतग्यता व्यक्त की
38:21आमकार मुक्त बानासुर ने अपनी शेश चार भुजाओं को जोड़ कर भगवान श्रीकृष्ण के चर्णों में नत्मस्तक होते हुए अश्रुपूरत
38:30नेत्रों से अपने अपराधों की ख्षमा मांगी
38:34सर्वस्मर्थ श्रीकृष्ण ने बानासुर की सच्ची पश्चात्ताप की भावना से प्रसन्न होकर उसे अभैदान दिया और महादेव के प्रियभक्त के
38:43रूप में उसके यश को अमर कर दिया
38:46पश्चात ताप से भरे बानासुर ने अपने राजमहल के अंतहपुर में प्रवेशकर अत्यंत आदर और प्रेम से अपनी पुत्री उशा
38:54और यदुवंशी राजकुमार अनिरुद्ध को आमंत्रित किया
38:59बानासुर राजकुमार अनिरुद्ध और राजकुमारी उशा को सम्मान पूर्वक ले जाकर भगवान श्रीकृष्ण और महादेव की दिव्य उपस्थिती में ले
39:08आया
39:09नव्युगल अनिरुद्ध और उशा ने अत्यंत भक्तिभाव से श्री कृष्ण और महादेव के चरण स्पर्ष कर उनका पावन आशिर्वात प्राप्त
39:18किया
39:20बानासुर ने गदगद कंट से श्री कृष्ण से प्रार्थ नाकी की वे उशा को अपनी कुलवधु के रूप में स्विकार
39:26कर विवाह संपन्न करने की अनुमती प्रदान करें
39:30शन भर में शोनितपुर के प्रांगन को दिव्यस्वर्ण ध्वजों, मनियों और सुगंधित ताजे पुष्पों से राजसी विवाह हेतु सजा दिया
39:39गया
39:40रिशिमुनियों और वेडपाथी ब्राहमनों ने पवित्र अगनी प्रजवलित कर वेदोक्त मंत्रो चार के साथ अनिरुद्ध और उशा के भव्य विवाह
39:49का शुभारंभ किया
39:51बानासुर ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी प्रिय पुत्री उशा का हाथ राजकुमार अनिरुद्ध के हाथ में सौंक कर पवित्र कन्यादान
39:59की रस्म पूर्ण की
40:02अनिरुध और उशा ने प्रजवलित अग्निदेव के समक्ष साथ फेरे लेकर अपने आत्माओं को जन्मजन्मांतर के अमर प्रेमबंधन में बांध
40:10लिया
40:12भगवान श्रीकृष्ण और महादेव ने एक साथ नवदमपती पर पारिजात पुष्पों की वर्षा करते हुए उनके सुखी और समरिध जीवन
40:21का आशिर्वाद दिया
40:22विवा समारोह के पश्चात बानासुर ने अत्यंत भावुक होकर अपनी पुत्री उशा और जमाता अनिरुध को सजल नेत्रों से विदाई
40:32दी
40:33भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम, अनिरुध और उशा अपने विशाल दिव्यस्वर्णिम रत पर आरूढ होकर द्वारका की ओर प्रस्थान करने
40:42लगे
40:43बलराम जी की अगुवाई में पराक्रमी यदुवन्शी सेना विजय दुन्दुभी बजाते हुए सुन्दर प्राकृतिक परवतों और वनों से होती हुई
40:52द्वारका की दिशा में बढ़ी
40:54विजी श्रीकृष्ण और नवदमपती के आगमन का समाचार मिलते ही द्वारका नगरी को दीपों, उश्पमालाओं और वन्दनवारों से दुलहन की
41:03तरह सजा दिया गया
41:06जैसे ही श्रीकृष्ण का दिव्यरत द्वारका के स्वर्ण द्वारों पर पहुँचा, शंकध्वनी और नगाडों की गर्जना से पूराक्षितिज गुन्जायमान हो
41:15उठा
41:16महारानी रुकमिनी और राजा उग्रसेन हाथ में आर्ती की थाली लिए हर शश्रूओं के साथ अपने प्रिय प्रपात्र अनिरुद्ध और
41:25नई वधु उशा के स्वागत हेतु तत पर खड़े थे
41:29माता रुकमिनी ने प्रेम और दुलार के साथ अनिरुद्ध और उशा की उतारी आर्ती और उन्हें द्वारका के राजप्रासाद में
41:37सहर्ष प्रवेश कराया
41:40अनिरुद्ध और उशाने जेश्ठा रुक्मिनी, बलराम और उग्रसेन के चरण छुकर उनका आशिशलिया और द्वार का राजपरिवार में नए जीवन
41:49की शुरुवात की
41:51संपूर्ण द्वार का पुरी में धर्म, सत्य और पवित्र प्रेम की इस महान विजय पर कई दिनों तक भव्य उत्सव,
41:58संगीत और नृत्योत्सव का आयोजन होता रहा
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