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भागवत पुराण के 45वें अध्याय में देखिये अमृतपान के तुरंत बाद देवों और असुरों के बीच छिड़ा अब तक का सबसे भीषण 'देवासुर संग्राम'! ⚔️ जब असुरराज बलि और कालनेमी ने मायावी अस्त्रों से देवलोक को हिला दिया, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने कैसे बदला युद्ध का रुख? जानिये कैसे गुरु शुक्राचार्य ने मृतसंजीवनी विद्या से दानवों को जीवित किया, 14 मन्वन्तरों का सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय काल-चक्र क्या है, और कैसे हुई सूर्यवंश (Surya Vamsha) एवं वैवस्वत मनु के महान राजवंश की स्थापना!
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00:00मुहिनी के मायावी जाल से मुक्त होते ही जब असुरों को ग्यात हुआ कि उन्हें अम्रित से सर्वता वंचित कर
00:07दिया गया है, तो उनका प्रचंड क्रोध संपून ब्रहमांड में गूंज उठा.
00:12असुर्राज बली ने क्रोध से तम्तमाए चहरे के साथ अपनी विशाल गदा हवा में लहराई और देवताओं के समूल विनाश
00:20के लिए महायुध की घोशना कर दी.
00:24असुर्सेना के सेनापती राहु का सिर्विहीं धड़ और विप्रचित्ती जैसे भयानक दानव अपने हाथों में सहारक अस्त्र लेकर बली के
00:32पीछे उठ खड़े हुए.
00:35दूसरी और देवराज इंद्र ने अमरितपान के प्रभाव से अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली होकर देवताओं को युद्ध की व्यूह रचना
00:43का आदेश दिया.
00:45असुर्राज बली ने देवताओं के घमंड को चूर करने के लिए अपनी चाती पर विजय कवच धारण किया और उनकी
00:53आखों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी.
00:57देवराज इंद्र अपने विशालकाए एरावत हाथी पर सवार होकर युद्ध भूमी के मध्य पहुँचे जिनकी आभासे दिशाएं प्रकाशित हो रही
01:06थी.
01:07जब दोनों महाशक्तियां आमने सामने आई, तो असुरों की भयंकर गर्जना से धर्ती डोलने लगी और समुद्र की लहरें आकाश
01:15को छूने लगी.
01:18दानवों की पैदल सेना ने विशालकाय समुद्री जीवों और जंगली भैंसों पर सवार होकर देवताओं की रक्षा पंक्ती पर भीशन
01:26हमला कर दिया.
01:28देवताओं ने भी अपनी ढालों को एक साथ मिलाकर एक अभेद्य स्वर्णिन दीवार खड़ी की, जिससे टक्राकर असुरों के वार
01:36विफल होने लगे.
01:38दोनों पक्षों के बीच पहला भीशन प्रहार हुआ, जिससे उठने वाली उर्जा की चिंगारियों से संपूर्ण रनभूमी आलोकित हो उठी.
01:48असुर्राज बली और देवराज इंद्र एक दूसरे के सम्मुखाए, और दोनों के नेत्रों में एक दूसरे को परास्त करने का
01:56तीवर संकल्प दिखाई दे रहा था.
01:59बली ने अपनी गदा को पूरे बल से घुमा कर इंद्र पर प्रहार किया, जिससे भूमी में गहरी दरारे पड़
02:06गई और धूल का गुबार उठ खड़ा हुआ.
02:09देवराज इंद्र ने अपने वजर से उस प्रहार को हवा में ही रोक दिया, जिससे निकले विद्यक पुंजने बादलों को
02:17चीर कर रख दिया.
02:19भयानक दानव नमुची ने अपने त्रिशूल से देवताओं की अगरिम पंक्ती पर हमला कर हाहाकार मचा दिया.
02:26इस भयानकर विनाश को देखकर भगवान विश्नु अपने चतुर्भुज रूप में आकाश मार्ग में प्रकट हुए, जिनके हाथों में सुदर्शन
02:35चक्र घूम रहा था.
02:38देव वैद्यों और योध्धाओं ने आकाश से मंत्रपूत बानों की वर्शा कर असुरों की उन्मत सेना को पीछे हटने पर
02:45विवश कर दिया.
02:47प्रतापी सूर्य देव ने अपने स्वर्णिम रथ पर सवार होकर दानव विप्रचित्ती के अंधकार में अस्त्रों को तेज प्रकाश से
02:56नश्ट कर दिया.
02:58चारों और बहते लहू और गिरते शस्त्रों से क्शीर सागर का तट किसी महाप्रलय की रणभूमी में परिवर्थित हो गया.
03:06पराज़ के भय से असुर्राज बली ने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान किया, जिससे रणभूमी में विशाल काए अंधकार में
03:15साय उभरने लगे.
03:17देवराज इंद्र ने भी अपनी संपूर्ण शक्ति को समेट कर बादलों को गर्जना का आदेश दिया, जिससे यह महायुध अपने
03:25चरम बिंदु पर पहुँच गया.
03:28असुर्राज बली के गुप्ट मंत्रों के उच्चारन करते ही नीले गगन में एक भयानक काला अंधकार छा गया और दिन
03:35के उजाले को निगल गया.
03:37उसी अंधकार के भीतर से जलते हुए उलकापिंड और आग में धधकते भाले देव सेना के उपर प्रल्यंकारी वर्षा की
03:45भाती गिरने लगे.
03:47प्रित्वी के सीने को चीर कर सहसरों विशैले और जलते हुए नेत्रों वाले मायावी सर प्रकट होकर देव सैनिकों को
03:55डसने लगे.
03:57तभी विशालकाय दानव सेनाप्ती कालनेमी ने अपने भीमकाय रूप का विस्तार किया और क्षितिच तक अपने लंबे साय को फैला
04:05दिया.
04:07कालनेमी ने अपनी चार विशाल भुजाओं से धधकते हुए परवतों को उखाड कर देवराज इंद्र के एरावत हाथी की सेना
04:15पर दे मारा.
04:17देवराज इंद्र ने अपने दिव्य वजर को चला कर उरते हुए परवत को हवा में ही चूर-चूर कर दिया,
04:23जिससे दमकते हुए अंगारे चारों और फैल गए.
04:27असुर सेनाप्ती नमुची ने अपने तपोबल से एक भयानक विशैली काली आंधी छोड़ी, जिसने देव्योध्धाओं की आखों को पूरी तरह
04:36से अंधा कर दिया.
04:38उस धने विशैले धुए में कुछ न देख पाने के कारण, घबराए हुए देव सैनिक माया के जाल में फसकर
04:45आपस में ही अस्त्र चलाने लगे.
04:48रत पर खड़े दानवराज बली ने अपनी असुरी माया का चक्र घुमाते हुए देवताओं की इस दुर्गती पर अट्टहास किया.
04:57शुन्य से प्रकट होकर भयानक नुकीले दानतों वाले मायावी राक्षसों और पंख वाले दानवी पशुओं ने आकाश को भेर लिया.
05:06तभी जल के देवता वरुन ने आगे आकर एक विशाल दिव्य जल की दीवार खड़ी की ताकि उन धधक्ती ज्वालाओं
05:14को बुझाया जा सके.
05:16किन्तु कालनेमी ने अपनी चार भुजाओं से लाल रंग की भयानक अगनिजवालाए निकाल कर वरुन के जलप्रपात को सुखाना शुरू
05:24कर दिया.
05:26पवंदेव वायू ने अपने प्रचंड स्वर्ण बवंडर का आहवान कर असुरों की काली विशैली आंधी को दूर उड़ाना प्रारंभ किया.
05:35यह देख नमुची ने तुरंट एक नया माया जाल बुना और पवंदेव के चारों और विशाल सिंहमुखी राक्षसों का धेरा
05:43बना दिया.
05:44धर्ती में गहरी घरी धधकती दरारे पड़ने लगी, जिससे भैभीत होकर देव सेना पीछे हटने पर विवश हो गई.
05:53असुर्राज बली ने अपनी अंतिम माया का प्रयोग कर पूरे युद्धक शेत्र में अपने हजारों नकली प्रतिरूप खड़े कर दिये.
06:02बली के अंगिनत सायों से घिरे देवराज इंद्र अपनी दमक्ती तलवार उठा कर सत्य और असत्य का भेद समझने का
06:10प्रयास करने लगे.
06:12कालनेमी ने आकाश में छलांग लगा कर सूर्यदेव के प्रकाश को अपने विशाल आकार से पूरी तरह धक लिया.
06:20माया भी काले पाशों ने देवताओं के दिव्य रथों के पहियों को भूमी में जकर दिया, जिससे देवसेना असहाय होने
06:28लगी.
06:29देवता जब असुरी माया के आगे हार के कगार पर थे, तभी सुदूर्क शितिजपर एक अत्यंत उजजवल दिव्य स्वर्णिन प्रकाश
06:38उदित होने लगा.
06:40शितिजपर उभरता वह स्वर्णिन दिव्य प्रकाश अचानक अत्यंत तीव्र हो गया, जिसने कालनेमी के विशाल अंधकार में शरीर की छाया
06:48को पीछे धकेलना शुरू कर दिया.
06:51उस दैविय प्रकाश के केंद्र से पक्षी राज गरुड अपने अत्यंत विशाल स्वर्णिन पंखों को फैला कर प्रकट हुए, जिनकी
06:59प्रत्येक उडान से अंतरिक्ष की हवाएं गूंज रही थी.
07:04गरुड देव की पीठ पर स्वयं जगत के पालनहार भगवान श्रीहरी विश्नु अत्यंत शांत और तेजस्वी मुद्रा में विराजमान दिखाई
07:12दिये.
07:14भगवान विश्नु के चतुर्भुज स्वरूप में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे, जिन में से सुदर्शन चक्र अपनी प्रल्यंकारी
07:23अगनी से दमक रहा था.
07:25जैसे ही श्रीहरी की दयालू और शांत द्रिष्टी युद्ध भूमी पर पड़ी, भगवीत देवताओं के व्याकुल हृदय में अपूर्व शान्ती
07:33और साहस का संचार हो गया.
07:36गरुर्देव ने अपनी विशाल पूँच और पंखों को जोर से हिलाया, जिससे उत्पन्न प्रचंड पवन ने असुरों द्वारा फैलाए गए
07:44काले बादलों को छिन्न भिन कर दिया.
07:48महान असुर कालनेमी ने अपनी मायावी शक्ती से श्रीहरी के प्रकाश को रोकने का प्रयास किया, परंतु नारायन के तेज
07:56से उसके हाथ जुलसने लगे.
07:59देवताओं के रथों को जक्डे हुए काले पास श्रीहरी के चर्णों से निकली स्वर्णिम किर्णों के स्पर्ष मात्र से ही
08:05भस्म होकर भूमी पर गिर पड़े
08:08मायावी बंधनों से मुक्थ होकर इंद्रदेव ने अपने विशाल एरावत हाथी पर बैठ कर श्रीहरी को श्रधा पूर्वक नमन किया
08:17श्रीहरी के इस अलोकिक रूप को देखकर असुर राज बली और कालनेमी की विशाल असुर सेनाभय से थर्थर कामपने लगी
08:27भगवान नारायन ने मंद मुस्कान के साथ अपने एक हाथ से देवताओं को अभयदान दिया और दूसरे हाथ से सुदर्शन
08:35चक्र को सक्रिय किया
08:37अत्यंत तीवर गती से घूमते हुए सुदर्शन चक्र से ऐसी ध्वनी उत्पन हुई जिससे संपूर्ण ब्रहमांड और सातों पाताल लोग
08:46कांप उठे
08:48नारायन के संकेट करते ही वह सुदर्शन चक्र उनके करक्मलों से छूटकर आकाश में एक महासूर्य की भांती दैदी प्यमान
08:56हो उठा
08:58सुदर्शन चक्र ने आकाश मार्ग में बढ़ते हुए असुरों द्वारा रची गई सभी काली माया और कृत्रिम अंधकार को पल
09:06भर में भस्न कर दिया
09:08क्रोधित कालनेमी ने चक्र को रोकने के लिए एक मायावी परवत फेंकना चाहा परंतु सुदर्शन ने उस परवत के क्षण
09:16भर में सहसरों टुकडे कर दिये
09:18यह देखकर अन्यमायावी असुर अपने प्राण बचाने के लिए युद्ध भूमी से दिशाहीन होकर भागने लगे
09:25परंतु दिव्य चक्र उनका पीछा करता रहा
09:29सुदर्शन चक्र के प्रचंड ताप से असुरों के शस्त्र पिघलने लगे और उनके रत धूधू करके जलने लगे
09:36जिससे पूरी असुर सेना में त्राहित्रा ही मच गई
09:41आकाश में गरोर पर सवार भगवान विश्नु इस द्रिश्य को अत्यंत प्रशांत भाव से देख रहे थे
09:47उनका मुकुट और दिव्य पीतांबर सूर्य की भांती चमक रहा था
09:52असुरी माया के समोल नाश होने पर देवताओं ने हर्शित होकर हरी बोल के जैगोश से संपूर्ण दसों दिशाओं को
10:00गुणजायमान कर दिया
10:03युद्धभूमी अब पूर्णत अंधकार मुक्त और पवित्र हो चुकी थी और देवसेना श्रीहरी के संरक्षन में एक अंतिन निर्नायक आक्रमन
10:11के लिए तैयार खड़ी थी
10:14श्रीहरी विश्नु और अम्रित की शक्ती से परम ओजस्वी होकर देवराज इंद्र अपने दिव्य एरावत हाथी पर सवार होकर युद्धभूमी
10:23के मध्यगर्जना करने लगे
10:26देवराज का उत्साह देखकर संपूर्ण देवसेना ने अपने शस्त्र उठा लिए और एक तीवर वेग के साथ असुर सेना पर
10:34प्रहार करने के लिए आगे बढ़ी
10:37देवताओं को अपनी ओर आते देख महाबली असुर सेनाप्ती जंभासुर अत्यंत क्रोधित होकर अपनी गदा घुमाते हुए युद्ध के मैदान
10:46में आगे आया
10:48जंभासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान किया और आकाश से धधकते हुए तीरों और विशैले शस्त्रों की वर्षा देवराज
10:57इंद्र पर आरंभ कर दी
11:00देवराज इंद्र ने अत्यंत शांत भाव से अपने वजर को आकाश की ओर किया जिसने पल भर में उन सभी
11:07मायावी असुर अस्त्रों को भस्म कर दिया
11:10इसके बाद इंद्र का एरावत हाथी अत्यंत वेग से आगे बढ़ा और उसने सीधे जंभासुर के विशाल लोहे के रत
11:18को अपनी टक्कर से हिला कर रख दिया
11:21क्रोध से पागल होकर जंभासुर ने अपनी भारी गदा सीधे इंद्र पर फेंग की लेकिन कुशल सार्थी और एरावत की
11:29सूझबूज से इंद्र उस वार से बच निकले
11:33बचने के तुरंत बाद इंद्र ने अपने दिव्य वजर से एक ऐसा प्रहार किया कि जंभासुर का रत तिनकों की
11:41भांती जल कर राख हो गया
11:43रत विहीन होने पर भी जंभासुर ने उन्हा अपनी असुरी माया रचने का प्रयास किया परंतु भगवान विश्णू की पावन
11:51उपस्थिती ने उसकी माया को निश्फल कर दिया
11:55इंद्र ने तनिक भी विलंब न करते हुए अपने तीवर प्रहार से अभिमानी असुर सेनापती जंभासुर का मस्तक धड़ से
12:03अलग कर दिया
12:05जंभासुर के गिरते ही असुर सेना में हाहाकार मच गया
12:09तभी दूसरा पराक्रमी असुर सेनाप्ती पाकासुर अपनी सेना को संभालने के लिए आगे आया
12:16पाकासुर ने अपनी गदा और फर्सा लहराते हुए सीधे इंद्र के एरावत हाथी के मस्तक पर आक्रमन करने के लिए
12:24एक लंबी छलांग लगाई
12:27देवराज इंद्र ने फुर्ती से अपने स्वर्ण कवच और धाल से उस भारी प्रहार को रोका जिससे एक तीवर धमाका
12:34हुआ और चारों और चिंगारिया फैल गई
12:38पराक्रमी एरावत ने भी अपने विशाल सून्ड और नुकीले दान्तों के प्रहार से पाकासुर को हवा में उच्छाल दिया और
12:46भूमी पर पटक दिया
12:48भूमी पर गिरकर पाकासुर पुनह उठा और उसने अत्यंत क्रोध में आकर इंद्र पर विश से बुझे हुए अनेक तीखे
12:56बानों की वर्शा कर दी
12:58इंद्र अपने एरावत से नीचे उतरे और अपनी दिव्य तलवार से उन सभी बानों को काटते हुए पाकासुर की ओर
13:06बढ़ चले
13:08दोनों योध्धाओं के बीच तलवार और फरसे का ऐसा भीशन युद्ध हुआ कि उनके टक्राने की ध्वनी से समस्त ब्रहमांड
13:16कांप उठा
13:18अंत्र इंद्र ने अपनी फुर्ती का परिचय देते हुए पाकासुर के शस्त्र को काट दिया और अपनी तलवार सीधे उसके
13:25वक्षस्थल के पार कर दी
13:28पाकासुर के प्राणहीन होकर गिरते ही दानवों की सेना भयभीत हो गई और वे युद्ध भूमी छोड़कर चारों दिशाओं में
13:35भागने लगे
13:37धूल और धुए से भरी युद्ध भूमी में विजी देवराज इंद्र ने अपने दिव्य वजर को उठा कर देवताओं की
13:44विजय का शंकनाद किया
13:47रणभूमी के एक कोने में खड़े दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने जब अपने पराजित और क्षत्विक्षत असुरों के विशाल धेर को देखा
13:55तो उनका हृदय अत्यंत दुख और तीवर संकल्प से भर गया
14:00अपने प्रिय शिश्यों और दानवराज बली की दुर्दशा देख कर शुक्राचार्य बिना किसी भय के रक्तरंजित युद्ध भूमी के मध्य
14:08में तेजी से आगे बढ़े
14:11दैत्यगुरु शुक्राचार्य सीधे निश्चेत और गंभीर रूप से घायल पड़े दानवराज बली के समीग पहुँचे और उनके वक्षस्थल पर अपने
14:20हस्ट का स्पर्श किया
14:22भगवान शिवद्वारा प्राप्त परम रहस्य में इम्रित संजीवनी विद्या का ध्यान करते हुए शुक्राचार्य ने अपने दिव्य कमंडल को उठा
14:30कर मंत्रों का जाप आरंभ कर दिया
14:34शुक्राचार्य के मुख से निकलते ही उन अलौकिक वैदिक मंत्रों की गूंच से संपून आकाश और धर्ती हरे और स्वर्निम
14:42दिव्य प्रकाश से आच्छादित होने लगे
14:45शुक्राचार्य ने अपने कमंडल से मंत्रपूत जल की बूंदों को जैसे ही धाराशा ही हुए असुरों के शरीरों पर छिड़का
14:53वैसे ही एक अद्भुत अलौकिक चमतकार घटित हुआ
14:57मृत संजीवनी मंत्र की शक्ती से मारे गए असुरों के प्राणगा तक घाव स्वतह ही भरने लगे और उनके ठंडे
15:05पड़े शरीरों में पुनह जीवन का संचार होने लगा
15:09एक ही क्षण में दान्वराज बली की बंद आखें खुल गई और उनके वक्षस्थल का गहरा घाव दिव्य जोती के
15:16साथ पूरी तरह ठीक हो गया
15:20देखते ही देखते संपूर्ण युद्ध भूमी में पड़े हजारों असुर योध्धा जीवित होकर पुनह चेतना में आये और अपने अपने
15:28अस्त्रशस्त्र उठा कर खड़े होने लगे
15:31पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर दानवराज बली अत्यंत भक्ती और श्रग्धा के साथ अपने परम पूजय गुरु शुक्राचार्य के चर्णों
15:39में नत्मस्तक हो गए
15:42शुक्राचार्य ने राजा बली के मस्तक पर आशिरवाद का हाथ रखा और उन्हें वर्तमान परिस्थिती की गंभीरता समझाते हुए धैर्यधारन
15:51करने का परामर्श दिया
15:54शुक्राचार्य ने समझाते हुए कहा कि इस समय समय चक्र और भगवान विश्णु का समर्थन देवताओं के पक्ष में हैं,
16:02आथ इस समय युध जारी रखना बिनाशकारी होगा
16:06दैत्य गुरु ने राजा बली को आदेश दिया कि वे अपनी समस्थ सेना को लेकर तुरंट पाताल लोक लोट जाएं
16:13और वहां तपस्या करके पुनः शक्ती अरजित करें
16:17अपने गुरु देव के दूरगर्शी नीतिवचनों को शिरोधार्य करते हुए राजा बली ने तुरंथ ही युद्ध विराम करने और पाताल
16:25प्रस्थान करने का निर्णै लिया
16:29दानवराज बली के एक ही संकेत पर पुनरजीवित असुर सेनाप्तियों ने अपनी सेना को पीछे हटने का स्पष्ट निर्देश दे
16:36दिया
16:38दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपने मंत्र सिध्ध गंड को प्रिथवी पर प्रहार किया जिससे भूमी पर पाताल लोग की ओर
16:45जाने वाला एक विशालकाय स्वर्णिन द्वार प्रकट हो गया
16:50समस्ट अनुशासित असुर सेना अपने गुरु शुक्राचार्य के संरक्षन में उस दिव्य और सुरक्षित मार्ग से पाताल लोग की गहराईयों
16:58में प्रवेश करने लगी
17:01राजा बली ने अन्तिमबार आकाश में स्थित विजी देवगणों की ओर देखा और धैर्य पूर्वक मुस्कुराते हुए पाताल द्वार की
17:09ओर कदम बढ़ा दिये
17:11अंतता दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने अपनी शक्तिशाली मायावी विद्या से पाताल लोग के द्वार को पूरी तरह सील कर भूमी को
17:20पुनह समतल बना दिया
17:22भयावध देवासुर संगरान के शान्त होते ही युद्ध भूमी में एक अलौकिक निरवता छा गई और देवराज इंद्र देवताओं संग
17:30विजय और शान्ती का अनुभव करने लगे
17:34शान्ती स्थापित होते ही स्वर्ग लोग के गगन से चतुर मुख ब्रहमाजी और महान रिशिगन अपने अलौकिक रथों पर सवार
17:42होकर समरांगन की ओर पधारे
17:45हंस की पीठ पर विराजमान, चारों मुखों पर वेदध्वनी संजोवे प्रजाप्ती ब्रहमाजी ने युद्ध भूमी के शांत धरातल पर अपने
17:53पावन चरण रखे
17:56ब्रहमाजी ने अपने चारों कमलों समान हाथों को जोड़ कर श्रीहरी विश्नु का ध्यान किया और उनके परम कल्यानकारी स्वरूप
18:04का स्तवन आरंभ किया
18:07महर्शी नारद अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ ब्रहमाजी के इस स्तोत्र गान में सम्मिलित हुए जिससे संपून अंतरिक्ष
18:15वेदध्वनियों से गुंजायमान हो उठा
18:19रिशियों की भक्तिपून पुकार सुनकर आकाश मंडल में सहसरों सूरियों की भांती तेजस्वी और दिव्य प्रकाश पुंच प्रकट होने लगा
18:28उस अप्रतिन जोती के मध्यगरूर पर आसीन चतुर्भुज रूप में भगवान नारायन प्रकट हुए जिनके हाथों में सुदर्शन चक्र, शंक,
18:37गदा और कमल सुशोगित्थे
18:40परमिश्वर विष्णों के श्रीचर्णों में मस्तक नवाकर ब्रहमा जी ने कृतग्यता व्यक्की, जिन्होंने अधर्म का नाशकर पुनह त्रिभुवन में धर्म
18:49की नीम सुदरिड की
18:52भगवान श्रीहरी के मुखारविंद पर एक अलोकिक मंधास तैर गया, जिसकी सौमय आभा ने समस्त देवताओं और मुनियों के हृदय
19:00से भय को सदा के लिए मिटा दिया
19:04देवराज इंद्र ने देवताओं संग भगवान नारायन पर मंदार पुष्पों की वर्षा की और उनके महान उपकारों का बारंबार नमन
19:12किया
19:14श्रीहरी विश्णू ने अभय मुद्राधारण कर समस्त देवताओं को आश्वस्त किया कि जब-जब धर्म की हानी होगी तब-ब
19:22वे अवतार लेकर स्रिष्टी की रक्षा करेंगे
19:25गंभीर एवं मेघस्मान गूजती वानी में भगवान विश्णू ने समझाया कि ब्रहमांडिय संतुलन बनाए रखने के लिए प्रकाश और अंधकार
19:35का संधर्ष प्राकृतिक नियम है
19:38उन्होंने स्पष्ट किया कि संकट और देवासुर संग्राम जैसी घटनाए देवताओं को अहमकार मुक्त कर सत्य एवन धर्म के पथपर
19:46बनाए रखने है तु आवश्चत है
19:50इसके पश्चात भगवान विश्णू ने कालचकर का गूड रहस्य उजागर करते हुए 14 मनवंतरों की विस्तृत व्यवस्था का ज्यान ब्रहमा
19:58जी को प्रदान किया
20:01श्रीहरी ने बताया कि प्रत्येक मनवंतर में एक प्रिथक मनु, इंद्र, सब्तर्शी और भगवान का विशेश अंशवतार स्रिष्टी का संचालन
20:10करेंगे
20:11समुद्र मन्थन और इस युद्ध के उद्देश को उजागर करते हुए प्रभू ने कहा कि यह संपून प्रपंच जगत को
20:19अमरित्व और वैराग्य का पाठ पढ़ाने के लिए था
20:23मन्थन से प्राप्त पवित्र अमरित और रत्नों को न्याय संगत व्यवस्था के साथ देवताओं के संरक्षन में स्वर्गिय धाम में
20:31स्थापित कर दिया गया
20:33भगवान विश्णूने ब्रहमा जी को नवस्रिष्टी कार्य जारी रखने और इंद्र को धर्म पूर्वक स्वर्ग का शासन चलाने का आशिर्वाद
20:41प्रदान किया
20:43प्रजाप्ती ब्रहमा ने अपने चारों मुखों से उन्हा नमो नारायनाय का उच्चारन करते हुए सर्वेश्वर के चर्णों में अंतिम साष्टां
20:52गंडवत प्रणाम किया
20:54ततपश्चात भगवान नारायन करुर्देव पर आरूढ होकर आकाश गंगा को चीरते हुए अपने परमधाम वैकुंठ लोक की ओर प्रस्थान कर
21:03गए
21:05भगवान के अंतरध्यान होते ही संपूर्ण देवलोक और प्रित्वी परशान्ती, सम्रिध्धी और सत्य का एक नया मनवंतर युग आरंभ हो
21:13गया
21:15महर्शी शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रहमांड का यह अनंत कालचक्र 14 मनवंतरों की
21:23दिव्य कालावधी में विभाजित है
21:27प्रथम मनवंतर के अधिपती स्वयन स्वायंभोव मनु थे, जिनकी रचना भगवान ब्रहमा ने स्रिष्टी का विस्तार और धर्म की स्थापना
21:35करने के लिए की थी
21:37द्वितिय स्वारोचिश मनवंतर में महर्शियों और देवताओं ने सत्य एवं वैदिक सिध्धानतों के प्रकाश से संपून जगत को अलौकिक सुख
21:46प्रदान किया
21:48त्रीतिय उत्तम मनवंतर में भगवान श्री हरी ने विभू रूप धारन करके ब्रहमांड के संतुलन और साधु पुरुषों की रक्षा
21:56का भार संभाला
21:58चतुर्थ तामस मनवंतर में जब गजेंद्र भयंकर संकट में पड़ा तब करुणासागर भगवान हरी ने प्रकट होकर ग्राह का वद
22:06किया और उसकी रक्षा की
22:08पंचम रैवत मनवंतर में भगवान वैकुंठ के दिव्य अवतार ने संपूर्ण देवताओं और लोगपालों को अधर्म के प्रभाव से सुरक्षित
22:18रखा
22:19छठे चाक्षुष मनवंतर में भगवान अजीत रूप में प्रकट हुए और समुद्र मन्थन के समय कच्छुए का कूर्म रूप धारण
22:27कर मंदराचल को आधार दिया
22:30वर्तमान सात्वे वैवस्वत मनवंतर में भगवान श्री विश्नुने वामन रूप धारण कर राजा बली से तीन पक भूमी मांग कर
22:38स्वर्गराज इंद्र को पुनह स्थापित किया
22:41इसी वैवस्वक मनवंतर में भगवान सूर्यदेव के तेजस्वी पुत्र मनुसे इक्षवाकु वंश अर्थात महान सूर्यवंश का गौरवशाली आरंभ हुआ
22:52आगामी आठवे सावर्ने मनवंतर में दानवीर राजा बली स्वर्ग लोग के परम शक्तिशाली इंद्र बनकर देवताओं का शासन संभालेंगे
23:01नवम दक्ष सावर्ने मनवंतर में पवित्र रिशियों की तपस्या और दिव्य विधिविधानों से दसों दिशाएं वैदिक ध्वनियों से गुंजायमान रहेंगी
23:12दशम ब्रहम सावर्णे मनवंतर में सर्वेश्वर भगवान विश्वाकसिन रूप में अवत्रित होकर धर्म और नीती के नियमों की रक्षा करेंगे
23:22एकादश धर्मसावर्णे मनवंतर के समय सत्य और धर्म का तेज अपनी चरम सीमा पर होगा, जिससे तीनों लोकों में पाप
23:30का सर्वनाश हो जाएगा
23:32द्वादश रुद्रसावर्णे मनवंतर में परम तपस्वी रिशियों और इंद्र के सनरक्षन में जगत निरंतर उन्नती और शान्ती की ओर अग्रसर
23:41रहेगा
23:43त्रयोदश देवसावर्ने मनवंतर में विशाल यग्यों और देवपासना से सम्पून प्रिथवी पर अन्न, जल और दिव्य उर्जा की प्रचुर्ता रहेगी
23:54चतुर्थदश इंद्रसावर्ने मनवंतर के पूर्ण होने पर ब्रह्मांड का एक महालुक चक्र समाप्थ होकर पुनह महाप्रलय के शांत चरण में
24:02प्रवेश करेगा
24:04महर्शी शुकदेव ने समझाया कि प्रत्येक मनवंतर में मनु, मनुपुत्र, सब्तर्शी, इंद्रक, देवता और हर्यवतार ये छे शक्तियां मिलकर स्रिष्टी
24:13का संचालन करती है
24:16काल के इस महाचक्र की गाथा सुनकर राजा परीच्षित का हृदय अतिशय भक्ती भाव और आत्मिक आनन्द से भर उठा
24:25अनन्त अंतरिक्ष में भगवान नारायन की नाभी से प्रकट यह काल चक्र अपनी दिव्यगती से सत्युग, त्रेता, द्वापर और कली
24:34का चक्र घुमाता रहता है
24:36इस प्रकार मनवंतरों के इस रहस्यमई ज्यान को पूर्ण कर महर्शी शुकदेव अब सूर्यवंश के प्रतापी राजाओं की अमर कथा
24:45सुनाने को तत्पर हुए
24:47महर्शी शुकदेव ने राजा परीक्षित को बतलाया कि वर्तमान समय में चल रहा यह सात्वा मनवंतर वैवस्वत मनवंतर के नाम
24:55से जाना जाता है
24:57इस दिव्यमनवंतर के अधिपती सूर्यदेव विवस्वान है जिनकी अपार आभा और तेज से सम्पून ब्रहमांड आलोकित रहता है
25:08सूर्यदेव के इस परमतेजस्वी अंश से ही महान ज्यानी और धर्मात्मा श्राद्ध देव का जन्म हुआ जो वैवस्वत मनु कहलाए
25:18वैवस्वत मनु ने अपने वन्श को आगे बढ़ाने और प्रित्वी पर धर्म की स्थापना के लिए कड़े नियम वधर्म पर
25:25चलते हुए महान तप का संकल्प लिया
25:29संतान प्राप्ती की तीवर इच्छा से मनु और उनकी महारानी श्रद्धा ने कुलगुरु महर्शी वशिष्ट की देखरेख में पुत्रकामिष्टी यग्य
25:38का आयोजन किया
25:40यग्य के दौरान महारानी श्रद्धा ने मन ही मन एक गुनवती पुत्री पाने की कामना की और होता पुरोहित से
25:47वैसी ही आहुती देने का निवेदन किया
25:51आहुती के प्रभाव से यग्यकुंड से एक अत्यंत सुन्दर कन्या प्रकट हुई जिसका नाम इला रखा गया
25:58पुत्र की अपेक्षा रखने वाले मनु ने जब कन्या को देखा तो उन्होंने महर्शी वशिष्ट से उस कन्या को पुत्र
26:06रूप में परिवर्तित करने की प्रार्थना की
26:09महर्शी वशिष्ठ ने राजा मनु के दोहक को दूर करने के लिए जगतपती भगवान श्री हरी विश्णू की कठिन स्थुती
26:17की
26:18भगवान विश्णू की परम क्रिपा से वह कन्या इला तुरंत एक तेजस्वी बालक सुध्यूम्न में परिवर्थित हो गई
26:26बड़ा होने पर सुध्यूम्न एक पराक्रमी योध्धा बना और एक दिन शिकार करते हुए रहस्य में शरद्वन में प्रवेश कर
26:34गया
26:35उस शरद्वन में भगवान शिव का एक गोपनिय श्राप सक्रिय था जिसके कारण वहां प्रवेश करने वाला कोई भी पुरुष्ष्ट्री
26:43बन जाता था
26:45जैसे ही सुध्यूम्न और उनके सैनिक उस वन में पहुएंचे शिवश्राप के प्रभाव सेवे सभी पल भर में सुन्दर नारियों
26:53में बदल गए
26:55सुन्दर स्त्री बनी इला जब वन में विचर्ण कर रही थी तब उनकी भेंट चंद्रमा के बुद्धिमान पुत्र बुध से
27:02हुई
27:04दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गए और बुध तथा इला का पवित्र गंधर विवाह संपन हुआ
27:11इस दिव्य योग के फलस्वरूप एक महा प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिनका नाम पुरूरवा पड़ा जिनसे सुमवंश की नीम
27:19पड़ी
27:21पश्चात भगवान शिव की दया से सुध्यूम्न को यह वर्दान मिला की वे एक माह पुरुष और एक माह स्त्री
27:27रूप धारन करेंगे
27:30उधर महर्शी वशिष्ट के पुनह किये गए महायग्य के प्रभाव से वैवस्वत मनु को इक्षवाकु सहित दस महाबली पुत्रों की
27:38प्राप्ती हुई
27:38इन्ही पुत्रों में जेश्ट इक्षवाकु ने पवित्र नगर अयोध्या को अपनी राजधानी बनाकर महान सूर्यवंश की स्थापना की
27:47इस प्रकार महर्शी शुकदेव ने वैवस्वत मनवंतर और धर्मनिष्ट सूर्यवंश की उत्पत्ती का पावन वृत्तान्त पूर्ण किया
27:57महर्शी शुकदेव राजा परीक्षित को पुत्रेश्टी यग्य की उस कथा की ओर ले जाते हैं, जहां वैवस्वत मनुने संतान प्राप्ती
28:06हेतु अगनिकुंड प्रज्वलित किया था
28:09यग्य के दौरान देवी श्रद्धा ने एक पुत्री की अभिलाशा से होता पुरोहित से छुपकर आहुती के मंत्रों में सुक्ष्म
28:16परिवर्तन करवा दिया
28:19यग्य की विशेश आहुती के प्रभाव से देदी प्यमान यग्यवेदी के मध्य से एक अत्यंत रूपवती दिव्य कन्या प्रकट हुई,
28:27जिसका नाम इला रखा गया
28:29पुत्र के स्थान पर कन्या के जन्म से विस्मेभीत होकर राजा वैवस्वत मनु ने अपने कुलगुरु महर्शी वशिष्ट से मार्ग
28:37दर्शन मांगा
28:39महर्शी वशिष्ट ने ध्यान मगन होकर अपने तपोबल से पुरोहित द्वारा किये गए आहुती के उस सुक्ष्म भेद को जान
28:47लिया
28:48महर्शी वशिष्ट ने वैवस्वत मनु की इच्छा पूर्ती हेतु सर्वसमर्थ भगवान श्रीहरी विश्णु की स्तुती करते हुए गेहन तपस्या आरंभ
28:57की
28:58भगवान विश्णु की असीन क्रिपा से वह दिव्यकन्या इलाततकाल सुध्युम्न नामक तेजस्वी राजकुमार के रूप में रूपान्तरित हो गई
29:07पराक्रमी राजकुमार सुध्युम्न शस्त्रविद्या और राज्य संचालन में पारंगत होकर एक सर्वगुन संपन्न धर्मिष्ट योध्धा बने
29:17एक समय राजकुमार सुध्युम्न अपने अश्व पर सवार होकर आखेट हेतु सघन एवन सुरमय वन की ओर प्रस्थान करते हैं
29:27आखेट करते हुए सुध्युम्न अंजाने में भगवान शिव और माता पार्वती के एकांत क्रीडास्थल शर्वन नामक सिध्ध वन में प्रवेश
29:36कर गए
29:37इस रहस्य में शर्वन वन में भगवान शिव का यह कठोर नियम था कि जो भी पुरुष इसमें प्रवेश करेगा
29:44वहस्त्री बन जाएगा
29:47जैसे ही सुध्युम्न और उनके सैनिकों ने वन की सीमा पार की दिव्य प्रभाव से वे सभीक्षन भर में रूपवती
29:54स्त्रियों में बदल गए
29:57अपने इस अकस्मात और अध्भुत रूप परिवर्तन को देखकर सुध्युम्न और उनके साथी वन में अत्यंत दुहखी होकर भटकने लगे
30:06उसी वन के समीब आश्रम में निवास कर रहे चंद्रपुत्र महर्शी बुध की दृष्टी अती सुन्दरी इला पर पड़ी और
30:14वे मोहित हो गए
30:16महर्शी बुध और इला के पवित्रधार्मिक मिलन के परिणामस्वरूख एक अत्यंत कांतिमान और महाप्रतापी पुत्र पुरूर्वा का जन्म हुआ
30:26अपने वास्तविक पुरुष रूप को पुनह प्राप्त करने के लिए इला ने महर्शी वशिष्ट की प्रेणा से देवाधिदेव महादेव की
30:33शरणली
30:35भगवान शिव ने इलाकी भक्ती से प्रसन्न होकर वर्दान दिया कि वह एक मास पुरुष सुद्यूम्न और अगले मास स्त्री
30:43इलाके रूप में रहेगी
30:45पुरुष रूप के महीनों में राजा सुध्यूम्न धर्म पूर्वक राज्य शासन चलाते और स्त्री रूप में अंतहपुर में शांत निवास
30:53करते थे
30:55समय आने पर राजा सुध्युम्न ने अपने पराक्रमी पुत्र पुरूर्वा को सिनहासन सौंप कर स्वयमवन में तपस्या हेतु प्रस्थान किया
31:04महर्शी शुकदेव इस प्रकार इलाकी इस अलौकिक कथा का समापन करते हैं जिसने सूर्यवन्ष और चंद्रवन्ष दोनों की महान धाराओं
31:13को जोड़ा
31:15महर्शी शुकदेव राजा परीक्षित को बताते हैं कि इलाकी गाथा के उपरांत वैवस्वत मनु की वन्षप्रमपरा का वह दिव्य अध्याय
31:23आरंभ हुआ
31:24जिसने प्रित्वी पर धर्म का स्वर्णिन युग स्थापित किया
31:29प्रजाप्ती वैवस्वत मनु ने एक महान संतान कामिष्टी यग्य का आयोजन किया
31:34ताकि धर्म के संरक्षक और पराक्रमी पुत्रों की प्राप्ती से संपूर्ण प्रित्वी पर शासन सुद्रिध हो सके
31:42यग्य की पूर्णा हुती के फल्स्वरूप वैवस्वत मनु को दस अत्यंत तेजस्वी और अलौकिक पुत्र प्राप्त हुए जिन्होंने वैदिक नीती
31:51को धरातल पर चरितार्थ किया
31:53इन दस पुत्रों में जेश्ट पुत्र राजा इक्षवाकु थे जिनकी मुखकान्ती उदित होते सूर्य के समान दैदी प्यमान थी और
32:02जिनका नाम सुनते ही दसों दिशाएं गुन्जायमान हो उठती थी
32:07कुलगुरु महर्शी वशिष्ट के सनरक्षन में राजकुमार इक्षवाकु ने समस्त वेदों, धनुर विद्या और राजधर्म के गूढ रहसियों में पूर्ण
32:16निपुन्ता प्राप्त की
32:18समय आने पर वैवस्वत मनु ने अयोध्या के भव्य सिनहासन पर इक्षवाकु का राज़ाभिशेक करके उन्हें सम्पून भूमंडल का अधिपती
32:27घोशत किया
32:29राज़ा इक्षवाकु ने अयोध्या के रत्नजडित सिनहासन पर विराज मान होकर हाथ में धनुष और राज़गंड धारण किया और धर्म
32:37की रक्षा का अटूट संकल्प लिया
32:40राज़ा भिशेक के उसमांगलिक उत्सव पर स्वर्ग लोग से देवताओं ने पुश पवर्शा की और महर्शियों के शंकनाज से संपून
32:49अयोध्या पुरी गूंजूठी
32:51इक्षवाकू के शासन में सर्यू नदी के तटपर बसी अयोध्या नगरी सम्रिध्धी, सुरक्षा और सत्यनिष्ठा का ऐसा अनुपम केंद्र बनी
33:00जिसकी बराबरी संपून पृत्वी पर कोई न कर सका
33:04राजा इक्षवाकू अपने कुलगुरु महर्शी वशिष्ठ की प्रत्येक आग्या का पालन करते हुए प्रजा को अपने पुत्रों की भांती प्रेन
33:12और न्याय प्रदान करते थे
33:15उन्होंने राज्य में न्याय प्रणाली, यग्यों के अनुष्ठान और समाज के चारों वर्नों की सुरक्षा हेतु ऐसे द्रिध नियम बनाए
33:23जो सूर्यवंश की परंपरा बन गए
33:26इसी महान नेम्ड पर सूर्यवंश की वह पावन धारा आगे बढ़ी, जो आने वाले समय में संपूर्ण विश्व के लिए
33:34मर्यादा और धर्म का मानक बनने वाली थी
33:38धर्म को सर्वोच स्थान देने के लिए राजा इक्षवाकु ने सौ महायग्यों का आयोजन किया, जिससे दसों दिशाएं पवित्र वैदिक
33:46मंत्रों से गुंजायमान हो गई
33:49इंद्रदेव सहित समस्थ देवताओं ने इक्षवाकु के निशकाम भाव से प्रसन्न होकर उनके यग्यस्थल पर दिव्य आशिरवाद और पारिजात के
33:58पुश्पों की वर्षा की
34:01राजा इक्षवाकु के अन्य नौ भावयों जैसे नरिग, ध्रिष्ट, शर्याती और नभाग ने भी प्रित्वी के भिन्नभिनक शेत्रों में जाकर
34:09धर्मनिष्ठ राज्यों की स्थापना की
34:12राजा शर्याती ने आनर्क देश में अपने समरिध राज्य का निर्मान किया, जिनकी पुत्री सुकन्या के अद्भुत पतिवरत धर्म की
34:21कथा आगे चलकर अमर हुई
34:23नभाग और करुष जैसे अन्य पराक्रमी भाईयों ने अपनी प्रजाका पालन मातापिता की भांती किया और सम्पून आर्यावर्त में वैदिक
34:32संस्कृती की पता का फहराई
34:35महर्शी शुकदेव कहते हैं हे परीच्षित इस प्रकार सूर्यवंश की स्थापना से प्रिथवी को ऐसे रक्षक मिले जो सत्य वचन
34:45के लिए अपने प्राणों का भी त्याग कर सकते थे
34:47इसी महान इक्षवाको कुल में आगे चलकर हरिश्चंद्र, सगर, भगीरत, रग्व और अंतह मर्यादा पुरुशोत्तम भगवान श्री रामचंद्र का अवतार
34:58होना निश्चित हुआ
35:01राजा इक्षवाको की इस अमर नीम के साथ सूर्यवंश का यह नवप्रभात संपन हुआ, जिसने मानव इतिहास में धर्म और
35:09नीती का स्वर्णिम मार्ग प्रशस्त कर दिया