विष्णु पुराण S2 Ep58 में हम चंद्रवंश की गहराई में उतरते हैं, जहाँ राजा यदु को जीवन के परम रहस्यों का सामना करना पड़ता है। इस विशेष कड़ी में, हम भगवान विष्णु के अवधूत अवतार, दत्तात्रेय की अलौकिक गाथा का अन्वेषण करेंगे। कैसे एक अवधूत ने 24 साधारण गुरुओं से सीखकर परम ज्ञान प्राप्त किया और राजा यदु को मोक्ष का मार्ग दिखाया? पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश से लेकर एक कबूतर, मधुमक्खी और मकड़ी तक, हर जीव और तत्व में छिपे गहरे दार्शनिक पाठों को जानें। यह एपिसोड आपको आत्म-खोज और अनासक्ति के मार्ग पर ले जाएगा, जो जीवन के हर पहलू में दिव्य ज्ञान को प्रकट करता है। #VishnuPurana #Dattatreya #AvadhutaAvatar #KingYadu #24Gurus #HinduMythology #SpiritualJourney #Moksha #Chandravamsha #Yaduvansh #AncientWisdom #MysteriesOfLife #SelfRealization #YogaPhilosophy #DivineKnowledge
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00:00चंद्रवन्ष की पावन धारा में समराट यदू का समरिध राज्य चारों और समरिध्धी, शान्ती और अपार वैभव का प्रतीक बनकर
00:08चमक रहा था.
00:10रत्नजरित सिनहासन पर विराज मान होते हुए भी राजा यदू का चित्त संसार की नश्वर्ता को देखकर वैराग्य की ओर
00:18बढ़ने लगा था.
00:20अपने पूर्वज समराट ययाती के जीवन से प्रेना लेते हुए यदू समझ गये की क्षणिक सांसारिक सुख आत्मा को स्थाई
00:28शान्ती प्रदान नहीं कर सकते.
00:30चंद्रमा से प्रारम्ध हुए इस प्रतापी वंश की महानता का स्मरण करते हुए राजा यदू ने जीवन के अंतिम और
00:38सर्वोच लक्ष का विचार किया.
00:41राजसभा में नरित्य और संगीत के अध्भुत आयोजनों के बीच भी समराट का मन आत्म ज्यान की प्यास में व्याकुल
00:48रहने लगा.
00:50संध्या समय महल के शांत कमलगंड सरोवर के किनारे तहलते हुए यदू ने प्रकृती के नियमों में छिपे गूड रहसियों
00:58को महसूस किया.
01:00अपार स्वर्ण मुद्राओ और अमूल्य रत्नों से भरे राजकोश को देख कर भी यदू का मन जान गया कि भौतिक
01:07धन आत्मा का कल्यान नहीं कर सकता.
01:10अंतिम सत्य की प्राप्ती के लिए राजा यदू ने महान, राजसूवे और महायध्यों का आयोजन करवा कर रिशियों का आशिरवाद
01:18मांगा.
01:20महायध्य के पश्चात यदू ने कुलगुरू और विद्वान ब्राहमनों से जीवन के परम अर्थ और मोक्ष का मार्ग पूछने की
01:27इच्छा जताई.
01:29अमावस्या की शान्त रात में महल के उच्चतम शिखर पर खड़े होकर राजा यदू ने अनत ब्रहमांड और नक्षत्रों को
01:36निहारा.
01:38राजसी वस्त्रों और आभूशनों का त्याग कर समराट यदू ने साधारण वस्त्रधारण किये और सत्य की खोज में वन की
01:46ओर प्रस्थान किया.
01:48घने पवित्र और प्राचीन वनों में प्रवेश करते ही यदू को प्रकृती के शांत वातावर्ण में एक अलौकिक स्पंदन का
01:56अनुभव हुआ.
01:58पवित्र सरिता के बहते निर्मल जल के तट पर बैठ कर यदू ने ध्यान लगाया और इश्वर से ज्ञान प्राप्ती
02:05की प्रार्थना की.
02:07एक राजा के रूप में अपने कर्तवियों और आत्मा के परम कल्यान के बीच के संतुलन को खोजने के लिए
02:14उनका मन गहराई से मन्थन कर रहा था.
02:18वन में रहने वाले तपस्वियों और रिशियों को जब समराथ यदू की इस कठिन ज्यान साधना का समाचार मिला, तो
02:25वे भी चकित रह गए.
02:27रिशियों द्वारा बताये गए शास्त्र ज्यान से आगे बढ़कर राजा यदू प्रत्यक्ष अनुभूतियों वाले जीवंत ज्यान की लालसा करने लगे.
02:37प्रकृती के कणकण में ईश्वर की उपस्थिती का आभास होने लगा, जहां बहती पवन और व्रिक्ष भी यदू को गुप्त
02:44संदेश देने लगे.
02:46यदू समझ गए की केवल गुरू की अहेतु की कृपा और सही दिशानिर देश से ही अज्यान का अंधकार समाप्थ
02:53हो सकता है.
02:56उन्होंने हाथ जोड कर उस परम गुरू का आहवान किया जो उन्हें संसार रूपी भवसागर से पार उतारने वाला अमर
03:03ज्यान दे सके.
03:05तभी सुदूर वनमार्ग से एक अत्यन्त तेजस्वी अवधूत शिरोमनी सन्यासी का आगमन हुआ, जिनके मुख पर असीन ज्यान का प्रकाश
03:14चमक रहा था.
03:16तटक्षन वन की गहन शांती चीरती हुई, दिव्य प्रकाश से उतप्रोत एक अवधूत शिरोमनी का आगमन हुआ, जिनके मुख पर
03:25असीन ज्यान का तेज़ चमक रहा था और जिनकी उपस्थिती मात्र से समस्थ वातावर्ण पावन हो उठा.
03:32यह द्रिश देख, राजा यदू के हरिदय में एक अलोकिक पुलकन उत्पन हुई और उन्हें अपने प्रशनों का उत्तर मिलने
03:40की आशा की एक नई किरन दिखाई दी.
03:44अवधूत की शांत, गंभीर द्रिश्टी ने जैसे समस्थवन, परवत और आकाश को अपने भीतर समेट लिया था, हर कण में
03:52परमात्मा का ही अनुभव करते हुए.
03:56राजा यदूने ततकाल धर्ती पर दंडवत प्रणाम कर उस परम ज्यानी के चर्णों में स्वयन को पूर्ण रूप से समर्पित
04:03कर दिया, मानो वर्षों की प्रतीक्षा आज समाप्थ हुई हो.
04:08अवधूत जिनका नाम दत्तात्रे था, अपनी अहेतु की करुणा और असीन वैराग्य से पूर्ण एक शांत आभालिये वहां खड़े थे,
04:17जो हर जिग्यासु आत्मा को आकर्षित करती थी.
04:21राजा यदू ने धीरे से उठकर अत्यंत विनमर्भाव से हाथ जोडते हुए अपनी मुक्ती की गहन इच्छा को अवधूत के
04:29समक्ष प्रस्तुत किया.
04:32दत्तात्रे ने कुछ क्षन मौन रहकर अपनी गहन, शांत आखों से यदू की आत्मा की गहराई को मापा, मानों उनके
04:40हर प्रश्न का उत्तर मौन में ही छुपा हो.
04:43उनकी चुप्पी में ब्रहमांड का सार और समस्त ज्यान का मौन प्रतिध्वनित हो रहा था, जो यदू के हृदय में
04:50एक अज्ञात जिग्यासा जगा रहा था.
04:53फिर राजा यदू ने अधीरता और व्याकुलता के साथ मोक्ष के मार्ग और सांसारिक बंधनों से मुक्ती का निवेदन करते
05:02हुए अपनी आत्मा का क्रंदन व्यक्त किया.
05:06दत्तात्रे ने धीरे से अपना सिरहिलाया, मानो यदू की तपस्या और उनके द्रिड संकल्प को स्विकार करते हुए एक अद्रिश्य
05:14अनुमोदन दे रहे हुँ.
05:16और फिर उस मौन के भंग होते ही उनके मुक्ष से पहला शब्द निकला, जो ब्रह्मांड की प्राचीनतम प्रतिध्वनी जैसा
05:24गूर और शक्तिशाली था.
05:27यदू ने महसूस किया कि उनके द्वारा मांगा गया ज्यान अब उनके सामने साक्षात खड़ा था, बस उसे ग्रहेन करने
05:35की पात्रता अर्जित करनी थी.
05:38दत्तात्रे एक विशाल वट्वरिक्ष के नीचे पदमासन में बैठ गए, उनकी आभाने समूचे क्षेत्र को एक पवित्र उर्जा से भर
05:46दिया.
05:48राजा यदू ने भी सम्मान पूर्वक कुछ दूरी पर विनमर भाव से आसंग रहेन किया, उनकी आखें अवधूत के दिव्य
05:55मुख मंडल पर टिकी हुई थी.
05:59दक्तात्रे के नेत्र खुले थे, परंतु उनकी द्रिष्टी असीम अंतरिक्ष में खुई हुई थी, मानो वह समस्त स्रिष्टी के रहस्य
06:07एक साथ देख रहे हुँ.
06:10उनकी गहरी शांत श्वास प्रश्वास में ब्रहमांड का आदिन स्पंदन सुनाई दे रहा था, जो हर जिग्यासु को सत्य की
06:17ओर खींच रहा था.
06:20अवधूत दक्तात्रे ने अपनी गंभीर और मधुर वानी में ज्यान की गंगा प्रवाहित करनी आरंभ की, उनके शब्द कनकन में
06:28सत्य का संचार कर रहे थे.
06:31यदू ने महसूस किया कि उनके वर्षों का अज्यान अब अवधूत के हर शब्द के साथ पिघर रहा था, जैसे
06:38सूर्योदय से अंधकार मिटता है.
06:42दक्तात्रे ने समझाया कि सच्चा गुरु केवल मनुष्य नहीं, बलकि स्वयन प्रकृती भी हो सकती है, यदि हृदय ग्रहनशील हो.
06:51उन्होंने राजा यदु को अपने स्वयन के जीवन से प्राप्त उन 24 अद्वितिय गुरुओं की कथा सुनानी आरंभ की, जिन्होंने
06:59उन्हें मुक्ती का मार्ग दिखाया था.
07:02दत्तात्रे ने अपनी द्रिष्टी अनंत आकाश की ओर उठाई और शांत स्वर में अपने पहले गुरु धैर्यवान प्रित्वी की कथा
07:10सुनानी आरंभ की, जो सब भार सहती है, पर विचलित नहीं होती.
07:16उन्होंने समझाया कि प्रित्वी हमें सिखाती है कि कैसे दूसरों के कृत्यों को सहन करें, अपनी शांती बनाये रखें और
07:24बिना किसी शिकायत के हर जीव का पोशन करें.
07:28राजा यदू ने अपनी आखों में एक नई समझ के साथ दत्तात्रे की बात सुनी, उनके शाही वस्त्रों के नीचे
07:36उनके हृदय में प्रित्वी की तरह सहन शीलता का बीज बोया जा रहा था.
07:41फिर दत्तात्रे ने अपनी उंगली हवा की ओर उठाई, अपने दूसरे गुरु, सर्वव्यापी और निरलिप्त वायू की ओर संकेत करते
07:50हुए, जिसने उन्हें स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया.
07:54उन्होंने समझाया कि वायू हर जगह उपस्थित रहकर भी किसी भी स्थान या वस्तु से लिप्त नहीं होती, वह केवल
08:02स्पर्श करती है, और आगे बढ़ जाती है, यही सच्चा वैराग्य है.
08:08यदू ने महसूस किया कि उनके वर्षों के राजसी मोहमाया के बंधन अब वायू के हर जोके के साथ धीले
08:15पढ़ रहे थे, जिससे मन की स्वतंत्रता का एक नया द्वार खुल रहा था.
08:21दक्तात्रे ने अब अपनी द्रिष्टी आकाश की अनन्त नीलिमा पर टिकाई और अपने तीसरे गुरु सभी को समाहित करने वाले
08:29आकाश के बारे में बताना शुरू किया.
08:33उन्होंने कहा कि आकाश हर वस्तु को स्थान देता है, फिर भी स्वयं किसी से बंधा नहीं होता, वह हर
08:40जगए है और फिर भी निर्गुन है, यही आत्मा का स्वरूप है.
08:45राजा यदू ने अपने भीतर के विशाल आकाश को अनुभव किया, जहां विचार तारे की तरहे चमकते थे, लेकिन स्वयं
08:54आत्मा सदा निर्मल और अप्रभावित रहती थी.
08:58दत्तात्रे ने फिर अपने हाथ पास के एक स्वच जलकुंद की ओर बढ़ाए और अपने चौथे गुरु, जीवंदाइनी और पवित्र
09:06जल की कहानी सुनाई.
09:09उन्होंने बताया कि जल कैसे सदैव शुद्ध रहता है, दूसरों को भी शुद्ध करता है, और हमेशा अपनी प्रकृती के
09:16अनुसार नीचे की ओर बहता है, विनमर्ता का प्रती.
09:21यदू ने अपने अंतर्मन में उस पवित्रता और अनुकूलन शीलता को महसूस किया, जैसे जल हर आकार में ढल जाता
09:29है, पर अपनी पहचान कभी नहीं खोता.
09:31फिर दक्तात्रे ने अपनी द्रिष्टी एक दूर जलते हुए यग्यकुंड की ओर घुमाई और अपने पांचवे गुरु उर्जावान और रुपांतरकारी
09:42अगनी का रहस्य उजागर किया.
09:45उन्होंने समझाया कि अगने सब कुछ भस्म कर देती है, स्वयं को शुद्ध करती है, और उपर की ओर उठती
09:52है, जो इच्छाओं के त्याग और ज्यान की उर्ध्वगामी यात्रा का प्रतीक है.
09:58यदु ने अपने भीतर एक अगनी की चिंदारी महसूस की, जो उनके अग्यान को भस्म कर उन्हें एक नई दीप्तिमान
10:07चेतना की ओर प्रेरित कर रही थी.
10:10दक्तात्रे ने फिर अपने छठे गुरु चंद्रमा की ओर इशारा किया, जो कलाओं से घट्ता बढ़ता है, पर अपनी प्रकृती
10:18को कभी नहीं त्यागता, यह नश्वर्ता में शाश्वत्ता का पाठ है.
10:24उन्होंने समझाया कि चंद्रमा की कलाए बढ़ती और घट्ती है, पर चंद्रमा स्वयंग वही रहता है, वैसे ही शरीर बदलता
10:32है, पर आत्मा अप्रिवर्तित रहती है.
10:36यदू ने अपनी नश्वर्काया और अविनाशी आत्मा के बीच के अंतर को समझा, जैसे चंद्रमा की चमक बदलती है, पर
10:45उसका सार नहीं बदलता.
10:48दत्तात्रे ने एक शांत मुसकान के साथ यदू की ओर देखा, मानो कह रहे हो कि यह तो केवल शुरुवात
10:55है, प्रकृती में ज्ञान के और भी अनमोल रतनी छिपे हैं.
11:00राजा यदू का चेहरा गेहन श्रद्धा और अगली शिक्षाओं के लिए उच्सुकता से चमक उठा, उनके हृदय में ज्ञान की
11:08जोती अब प्रजवलित हो चुकी थी.
11:12दक्तात्रे ने यदू को बताया कि ज्ञान का प्रवाह केवल ग्रंथों या रिशियों तक सीमित नहीं है, बलकि यह प्रकृती
11:19के हरकण में गहराई से नहित है, जिसे बस अनुभव करने की आवर्शक्ता है.
11:25फिर उन्होंने यदू से अपने पहले गुरू प्रित्वी माता के बारे में बताया, जिन्होंने उन्हें बिना किसी अपेक्षा के निरंतर
11:33सेवा और असीमित धैर्य का गहरा पाठ पढ़ाया.
11:38दत्तात्रे ने समझाया कि कैसे प्रित्वी, चाहे उस पर कुछ भी क्यों न किया जाए, निरंतर जीवन का पोशन करती
11:45है, कभी शिकायत नहीं करती, हमेशा सभी को समान रूप से धारन करती है.
11:52उन्होंने बताया कि इस धर्ती से ही मैंने सीखा कि कैसे हर प्रकार के जीवों का पालन पोशन करना चाहिए,
11:59अपने उपर पढ़ने वाले हर प्रहार को सहते हुए भी अचल और स्थिर रहना चाहिए.
12:05यदुने महसूस किया कि एक राजा के रूप में उन्हें भी प्रित्वी की तरहे ही अपनी प्रजा के प्रती असीन
12:12धैर्य और निहस्वार्थ सेवा भाव रखना चाहिए, चाहे परिस्थितिया कितनी भी विशम क्यों नहों.
12:20दक्तात्रे ने आगे कहा कि मेरा दूसरा गुरु वायुदेव हैं, जो अपनी पवित्रता और अनासक्ती के साथ हर जगह मौजूद
12:28रहकर भी किसी से लिप्त नहीं होते.
12:32उन्होंने समझाया कि वायु, चाहे सुगंध को सपर्श करेक या दुर्गंध को स्वयं कभी किसी से दूशित नहीं होती, और
12:40सभी में समान रूप से अपना जीवन शक्ती भरती है.
12:44यह वायू हमें सिखाती है कि कैसे संसार के सुख दुख माना अपमान में भी अनासक्त रहना चाहिए, केवल अपने
12:52शुद्ध स्वरूप को बनाए रखना चाहिए
12:56यदू ने अनुभव किया कि एक शासक के रूप में उसे भी अपनी प्रजा के हर वर्ग के प्रती निश्पक्ष
13:02और पवित्र भाव रखना चाहिए, भले ही उनकी स्थितिया कर्म कुछ भी हो
13:09दक्तात्रे ने अपने तीसरे गुरु आकाश की ओर संकेत किया, जो सर्वव्यापी है, सब कुछ समाहित करता है, फिर भी
13:17स्वयं किसी बंधन से रहित है
13:20उन्होंने समझाया कि आकाश में मेघाते हैं, वर्षा होती है, तारे जग्मगाते हैं, पर आकाश स्वयं कभी गीला नहीं होता,
13:29कभी धूमिल नहीं होता, हमेशा अपनी विशालता में स्थिर रहता है
13:35दत्तात्रे ने यदू को बताया कि एक सच्चे साधक को भी आकाश की तरह ही अपने अंतर्मन में सभी विचारों,
13:42भावों और अनुभवों को समाहित करते हुए भी स्वयं को इनसे अचूता रखना चाहिए
13:49यदू को आकाश की यह शिक्षा एक दरपनसी लगी, जिसमें उसने अपने मन की अनंत गहराईयों और असीन संभावनाओं को
13:57देखा, जो किसी भी बंधन से परे थी
14:01दत्तात्रे ने तब अपने चौथे गुरु पवित्र जल की बात की, जिसकी शुद्धी और शुद्ध करने की क्षमता ने उन्हें
14:09जीवन के गहन रहस्य सिखाए
14:12उन्होंने समझाया कि जल स्वयन स्वच्छ होकर दूसरों को भी शुद्ध करता है, अपनी प्रकृती में सदैव गतिमान रहता है,
14:20और हर पात्र का आकार ग्रहन कर लेता है
14:24यह जल की पवित्रता और सरलता ही है, जो हमें सिखाती है कि कैसे अपने स्वभाव को शुद्ध रखना चाहिए
14:32और सभी के साथ घुलमिल कर रहना चाहिए बिना अपनी पहचान खोए
14:37यदू ने जल की शिक्षा को आत्म साथ किया, यह समझते हुए कि एक न्यायपूर्ण राजा को भी अपनी प्रजा
14:45के हर सदस्य को शुद्ध हरिदै से स्विकार करना चाहिए और उनके कष्टों को दूर करना चाहिए
14:52अंत में दक्तात्रे ने अपने पांचवे गुरु अगनिदेव के बारे में बताया, जिनकी प्रखर्ता और निश्पक्ष उपभोग की क्षमता ने
15:01उन्हें गहन आध्यात्मिक अंतरग्रिष्टी दी
15:04उन्होंने समझाया कि अगनि सब कुछ ग्रहन करती है, चाहे वह शुद्ध हो या अशुद्ध पर स्वयन कभी दूशित नहीं
15:12होती, बलकि हर वस्तु को भस्म कर शुद्ध करती है
15:17अगनि की यह शिक्षा हमें सिखाती है कि कैसे सभी भेदों को जलाकर अपने भीतर की दिव्यता को प्रज्वलित करना
15:24चाहिए और सभी के प्रती समान भाव रखना चाहिए
15:29दत्तात्रे ने आगे कहा कि जिस प्रकार अगनि सब कुछ ग्रहन कर शुद्ध करती है, ठीक वैसे ही हमें चंद्रमा
15:37के बदलते स्वरूप से शरीर की क्षनभंगुर्ता को समझना चाहिए
15:42उन्होंने समझाया कि चंद्रमा के घट्टे बढ़ते चरण शरीर के नश्वर स्वभाव का प्रतीक हैं, जबकि भीतर की आत्मा हमेशा
15:50अविनाशी और शाश्वत रहती है
15:54राजकुमार यदु मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे, जैसे दक्तात्रे उनके सामने कालचक्र का रहस्य खोल रहे हों, जिसमें चंद्रमा एक
16:03मौन गुरु बन गया था
16:05इसके बाद दत्तात्रे ने अपने अगले गुरु तेजस्वी सूर्यदेव का परिचय दिया, जो निस्वार्थ कर्म और अनासक्ती के सर्वोच्च उदाहरण
16:15है
16:17सूर्य बिना किसी स्वार्थ या लगाव के अपनी रोश्णी और गर्मी संपूर्ण ब्रहमांड को प्रदान करता है, स्वयं कभी प्रभावित
16:25नहीं होता
16:27अनासक्ती की यह शिक्षा, जो सूर्य से मिलती है, हमें अपने कर्मों के फल से विरक्त रहकर भी अपना करतव्य
16:35निभाने की प्रेणा देती है
16:38दक्तात्रे ने समझाया कि जैसे सूर्य हर वस्तु को प्रकाश देता है, पर स्वयं कभी किसी से चिपकता नहीं, वैसे
16:46ही ज्ञानी को भी संसार में अनासक्त रहना चाहिए
16:50इसके बाद दक्तात्रे ने अपने अगले गुरु कभूतर की दुखत कहानी सुनाई, जो संसारिक लगाव से होने वाले गहन दुख
16:59को उजागर करती है
17:01एक कभूतर और कभूतरी का अपने बच्चों के प्रती अत्यधिक प्रेम इतना गहरा था, कि उन्होंने अपनी जान की परवाह
17:09किये बिना उन्हें बचाने का प्रयास किया, जिससे उनकी दुखत मित्यु हुई
17:15यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे तीवर सांसारिक लगाव विशेशकर अपने प्रियजनों के प्रती, दुख और बंधन का कारण
17:23बन सकता है, यदि उस पर विवेक का नियंत्रण न हो
17:28इसके उपरांथ दत्तात्रे ने अपने गुरु अजगर की ओर संकेत किया, जो जीवन में संतोष और बिना प्रयास के स्विकार्यता
17:36का प्रतीक है
17:39अजगर बिना किसी प्रयास के जो कुछ भी उसे सहस्ता से प्राप्थ होता है, उसी से संतुष्ट रहता है, यह
17:46हमें जीवन की सरलता और संतोष का पाथ सिखाता है
17:51दक्तात्रे ने समझाया कि अजगर की यह प्रवरित्ती मनुष्य को सिखाती है कि जीवन में अनावश्यक लालसाओं और भागदौर से
18:00मुक्त होकर शान्ती कैसे प्राप्त की जा सकती है
18:04राजा यदू ने संतोष के इस अनमोल पाठ को अपने हिदय में ग्रहन किया यह समझते हुए कि सच्ची मुक्ती
18:12आंतरिक शान्ती में नहित है
18:15फिर दक्तात्रे ने अपने अंतिन गुरु विशाल और शान्त समुद्र की ओर ध्यान दिलाया जिसकी अडिक्ता समता का शक्तिशाली सबक
18:23है
18:25समुद्र अपनी अगाध गहराई और स्थिर्ता के साथ चाहे कितनी भी नदिया आकर मिले या वाश्पी करण हो अपनी मूल
18:33प्रकृती में हमेशा शान्त और अडिक रहता है
18:37यह शिक्षा हमें सिखाती है कि जीवन के उतार चढ़ावों और बाहरी प्रभावों के बावजूद हमें अपनी आंतरिक शान्ती और
18:46संभाव को कैसे बनाए रखना चाहिए
18:49दत्तात्रे ने समझाया कि ज्यानी पुरुष को समुद्र की तरह अपनी गहराई और शान्ती बनाए रखनी चाहिए चाहे जीवन में
18:58कितनी भी चुनोतिया क्यों ना आए
19:00इन पाँच गुरुओं के पाठ सुनकर राजा यदू के हरिदय में ज्यान का प्रकाश और भी प्रजवलित हो उठा और
19:08उन्हें मुक्ती का मार्ग स्पष्ट दिखने लगा
19:11प्रत्येक गुरु ने अपनी अनूठी शिक्षा के माध्यम से राजा यदू को जीवन की क्षनभंगुर्ता और आत्मा की शाश्वत प्रकृती
19:19के गहरे रहसियों से अवगत कराया
19:22इन सभी गुरुओं के पाठ से प्रेरित होकर राजा यदू ने अपने सामराज्य को और अधिक धार्मिक्ता और न्याय के
19:30साथ शासित करने का संकल्प लिया
19:34दत्तात्रे के इन गहन उपदेशों ने राजा यदू के जीवन को एक नई दिशादी और उन्हें आत्मज्यान के मार्ग पर
19:41अग्रसर किया
19:43इस प्रकार अवधूत दत्तात्रे ने राजा यदू को प्रकृती के गूढ रहसियों के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाया, जो
19:51हर जीवात्मा के लिए एक शाश्वत सत्य है
19:56अवधूत दत्तात्रे ने राजा यदू को अपने अगले गुरु के रूप में पतंगे के बारे में बताते हुए कहा कि
20:02कैसे वह तीवर आकर्शन के कारण स्वयं को नश्ट कर लेता है
20:08एक धने अंधकार्मय वन में जलती हुई अगनी की ओर खिंचा चला जाता वह छोटा सा पतंगाक्षनिक आकर्शन के भयानक
20:16अंध का जीवन्त उदाहरन प्रस्तुत करता है
20:20इस पतंगे के माध्यम से दत्तात्रे ने समझाया कि किस प्रकार इंद्रियों के वश में होकर मनुष्य अपनी बुद्धिक हो
20:28बैठता है और विनाश की ओर बढ़ता है
20:32आगे बढ़ते हुए दत्तात्रे ने बारहवे गुरु के रूप में मधुमक्षी का वर्णन किया जो फूलों को बिना कोई हानी
20:40पहुचाए बड़ी कुशलता से रस एकत्र करती है
20:44रंग बिरंगे और सुगंधित फूलों के बगीचे में उर्ती हुई वह सुनहरी मधुमक्षी केवल आवश्यक मिठास ग्रहन करती है और
20:53संचय की प्रवरित्ती से दूर रहती है
20:56इस अद्भुत जीव से योगी ने सीखा की कैसे एक सच्चे साधक को सभी शास्त्रों से केवल उनके सार को
21:04ग्रहन करना चाहिए बिना उनमें उलजे
21:07फिर दत्तात्रे ने तेरहवे गुरु उस विशालकाय और शक्तिशाली हाथी की कथा सुनाई जो अपनी ही कामिच्छा के कारण मानव
21:16जाल में फंस जाता है
21:19एक विशाल नर हाथी, एक कृत्रिम मादा हाथी के मोह में आकर शिकारियों द्वारा खोदे गए गहरे गड़े में विवश
21:27होकर गिर जाता है
21:29दक्तात्रे ने राजा यदू को सचेट किया कि शारिरिक वासनाए कितनी भी बलवान बुद्धी को भी कैसे आसानी से नश्ट
21:37और बंधक बना सकती है
21:40इसके बाद उन्होंने चौधवे गुरु के रूप में शहद इकठा करने वाले उस चतुर व्यक्ती का उल्लेख किया जो मधुमक्खियों
21:49के संचित कोश को ले जाता है
21:52एक उचे और प्राचीन व्रिक्ष पर बने चत्ते से शहद इकठा करने वाला व्यक्ती बड़ी आसानी से उस मीठे शहद
22:00को निकाल लेता है
22:01जिसे मधुमक्खियों ने संचित किया था
22:04इस उदाहरन से दत्तात्रे ने सिखाया कि संचय की गई संपत्ती अंत्त दूसरों के काम आती है
22:11इसलिए योगी को केवल अपनी तातकालिक आवशक्ताओं के लिए ही भिक्षा लेनी चाहिए
22:18तत्पश्चात पंद्रवे गुरु के रूप में उन्होंने सुन्दर और चंचल हिरन का परिचय दिया
22:24जो मधुर संगीत के प्रती अपनी अत्यधिक समवेदन शीलता के कारण पकड़ा जाता है
22:31सुन्हरे वन के बीच शांत खड़ा वहम रिगर एक शिकारी की बासुरी से निकलने वाली अत्यंत मीठी तान को सुनकर
22:39पूरी तरह सुधबुध खो बैठता है
22:42दक्तात्रे ने स्पष्ट किया कि बाहरी प्रशंसा, मीठे शब्द या आलोचना कैसे साधक को उसके आध्यात्मिक मार्ग से पूरी तरह
22:51विचलित कर सकती है
22:54इन पांचों गुरुओं के गहन और रहस्य में उपदेशों को सुनकर राजा यदू के मन में छिपे अज्ञान के सारे
23:01अंधकार में बादल धीरे-धीरे छटने लगे
23:05दक्तात्रे के मुख से निकलती इस दिव्य ज्यान गंगा ने राजा यदू को इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने और वैराग्य
23:12के सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेणा दी
23:15उस पवित्र तपोवन का कणकन इस दिव्य समवाज से गुंजाय मान हो उठा और प्रकृती ने भी जैसे इस महान
23:23उकदेश को अपनी गोद में समेट लिया
23:26राजा यदू ने परम आदर के साथ अपने त्रिमूर्ती गुरु के चर्णों में मस्तक जुकाया और अपनी अंतरात्मा में एक
23:34अपूर्व शान्ती और दिव्यता का अनुभव किया
23:38अवधूत दत्तात्रे के इन 24 गुरुओं की यह गाथा राजा यदू के साथ साथ संपूर्ण मानव जाती को शाश्वत मुक्ती
23:46और परम सत्य का मार्ग दिखाती है
23:50अवधूत दत्तात्रे ने अपनी अमर कथा को आगे बढ़ाते हुए मिथिला नगरी की पिंगला नाम की वेशा का वृत्तान्त राजा
23:58यदू के समक्ष प्रस्तुत किया
24:01पिंगला सुन्दर वस्त्र आभूशन पहन कर रात भर धनाध्य कामुक पुरुशों की प्रतीक्षा में व्याकुल होकर अपने द्वार पर तहलती
24:09रही
24:10भोर की पहली किरण फूटने तक जब कोई ना आया तब निराशा की उस विक्राल अगनी में पिंगला के भीतर
24:18अचानक परम वैराग्य का प्रादुर्भाव हुआ
24:21उसने अनुभव किया कि नश्वर पुरुशों की लालसा दुख का कारण है और हृदय में निवास करने वाले शाश्वत नारायन
24:29ही सच्चे सुखदाता है
24:32इच्छाओं का त्याग कर परमशान्ती प्राप्त करने वाली पिंगला को अवधूत दत्तात्रे ने अपनी अनासक्ती का नवम गुरु स्विकार किया
24:42तत्पश्चात अवधूत ने अपने दशम गुरु कुरारी पक्षी की गाथा सुनाई जिसने आकाश में एक बड़ी मचली को अपनी चोच
24:50में दबा रखा था
24:53मचली के लोब में अन्य विशाल और हिंसक पक्षियों ने कुरारी पर प्रांधा तक हमला कर उसे चारों ओर से
24:59घेर लिया
25:01जैसे ही कुरारी पक्षी ने भयभीत होकर वह मचली नीचे गिरा दी, सभी हमलावर पक्षी उस मचली के पीछे जपट
25:09पड़े और कुरारी भयमुक्त हो गया
25:11इस घटना से अवधूत ने सीखा कि भौतिक वस्तूओं का परिग्रही भय और संकट का मूल कारण है और उनका
25:20त्याद ही शान्ती प्रदान करता है
25:24अध्याय को आगे बढ़ाते हुए अवधूत ने अपने एकादश गुरु एक छोटे निर्दोश बालक का वर्णन किया, जो मानापमान से
25:32परे होकर धूल में खेल रहा था
25:35वह अबोध बालक चिन्ता, अहंकार और भविश्य की आशंकाओं से पूरी तरह मुक्त होकर केवल वर्तमान क्षण के आनंद में
25:43मगन था
25:45अवधूत ने सपश्ट किया कि ज्ञानी पुरुष को भी बालक की भानती अहंकार शून्य होकर परमानंद की अनुभूती में लीन
25:53रहना चाहिए
25:55इसके बाद दत्तात्रे जी ने अपने द्वादश गुरु की कथा बताई जो अपने घर में अतिथियों के लिए धान कूट
26:02रही एक एका की युवती थी
26:05धान कूटते समय युवती की कांच की सुन्दर चूडिया आपस में टक्रा कर बार-बार तेज खनक पैदा कर रही
26:12थी जिससे अतिथियों का ध्यान भटक रहा था
26:16उस बुद्धिम्ती युवती ने दोनों हाथों की एक एक चूड़ी छोड़ कर बाकी सब तोड़ दी जिससे बिना किसी शोर
26:24के धान कूटने का कार्य समपन हुआ
26:27इस घटना से अवधूत ने पाठ सीखा की जहां दो या अधिक लोग होते हैं वहां कला होती है आथ
26:34एकांत ही साधना का श्रिष्ठ मार्ध है
26:38फिर अवधूत ने अपने त्रयोदश गुरु एक कुशल बान बनाने वाले तीरंदाज का द्रिष्टान्त दिया जो अत्यंत तनमयता से बान
26:47की नोक को तेज कर रहा था
26:49उसी समय उस तीरंदाज की कुटिया के बाहर से राजा की विशाल सेना, हाथी घोडे और धोलन दाडों का जुलूस
26:57बड़ी धूमधाम से गुजरा
27:00परंतु अपने कार्य में पूर्णत लीन तीरंदाज को यह भी आभास न हुआ कि उसके पास से समराट की इतनी
27:08बड़ी सेना निकली है
27:10अवधूत दत्तात्रे ने राजा यदू से कहा कि जो साधक तीरंदाज की भांती अपना मन केवल परमात्मा में एकागर करता
27:19है, वह परंपद को प्राप्त करता है
27:22इसके पश्चात अवधूत दत्तात्रे ने राजा यदू का ध्यान अपने 22 गुरु एकांत वासी सर्प की ओर आकर्शित किया
27:32उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार सर्प कभी स्वयें के लिए बिल्या घर नहीं बनाता, बलकि दूसरों द्वारा छोड़े गए स्थानों
27:40में शांती पूर्वक निवास करता है
27:43एक शांत और दिव्यवन में एक सुनहरे और तेजस्वी आवर्ण वाला विशाल सर्प अत्यंत सहजता से निश्प्रिय होकर एक पुरानी
27:52बांबी में प्रवेश कर रहा है
27:55ठीक उसी प्रकार ज्यानी सन्यासी को भी अपने जीवन में स्थाई भौतिक भवनों के निर्मान का व्यर्थ प्रयास छोड़कर अनिकेथ
28:04होकर विचरना चाहिए
28:06महाराज यदू ने यह सुनकर गहराई से विचार किया कि कैसे विशाल राजमहलों का मो मनुष्य को सांसारिक बंधनों और
28:14भय में जकड कर रखता है
28:17इसके बाद भगवान दक्तात्रे ने प्रकृती के 23 गुरु के रूप में एक सुक्षम परंतु अध्भुत प्राणी मकडी का वर्णन
28:25आरंभ किया
28:27प्रातयकाल की स्वर्णन किर्णों के बीच एक मकडी अपने ही शरीर के भीतर से महीम चमकदार वेश्मी धागे निकाल कर
28:35एक जटिल और सुन्दर जाल बुनती है
28:39अवधूत ने बताया कि मकडी अपने ही मुख से जाल का विस्तार करती है, उसमें विहार करती है और अन्ता
28:47उस पूरे जाल को पुनह अपने भीतर समेट लेती है
28:51ठीक इसी प्रकार परंब्रह्म पर्मात्मा अपनी ही त्रिगुनात्मक माया से इस अनंत संसार की स्रिष्टी करते हैं और प्रलै के
29:00समय इसे पुनह अपने स्वरूप में लीन कर लेते हैं
29:05राजा यदू उस मकडी के जाल को देखकर भाव विभोर हो गए और उन्हें ब्रहमांड के स्रिजन तथा सहार के
29:12सुक्ष्म चक्र का परम ज्यान प्राप्थ हुआ
29:16ततपश्चात गत्तात्रे मुनी ने अपने 24-वे और अंतिन गुरु के रूप में तीवर ध्यान का संदेश देने वाले भ्रिंगी
29:23कीट का रहस्य उदगाटित किया
29:26एक व्रिक्ष के कोटर में भ्रिंगी भाउना एक ननही इल्ली को लाकर अपने घोंसले में रखता है और उसके समक्ष
29:34निरंतर एक विशेश तीवर गुंजन करता है
29:38वह इल्ली भेंगी के उस भयंकर गुन्जन और स्वरूप के निरंतर ध्यान एवं भय में इतनी लीन हो जाती है
29:45कि उसे अपने पुराने अस्तित्व का कोई स्मरण नहीं रहता
29:51एकागरता के उस चरम प्रभाव से वह साधारन इल्ली धीरे धीरे परिवर्तित होकर स्वयं वही रूप धारन कर लेती है
29:58और पंख फैला कर उड़ जाती है
30:02अवधूत ने राजा यदू से कहा कि जो साधक निरंतर तन्मय होकर परमात्मा का ध्यान करता है वह अंत्ह अपने
30:10भौतिक भाव को त्याग कर ब्रह्मरूप ही हो जाता है
30:14इन 24 गुरूओं की अध्भूत गाथा सुनकर राजा यदू के हृदय में अज्ञान का अंधकार पूरी तरह मिट गया और
30:22परम जोती प्रजवलित हो उठी
30:25त्रिदेव स्वरूप भगवान दक्तात्रे का दिव्य आभामंडल अती प्रदीप्थो उठा और उन्होंने सिद्ध किया की संपूर्ण प्रकृती ही आत्मज्यान की
30:34महान पाथशाला है
30:37महाराज यदू परम कृतार्थ होकर अवधूत दक्तात्रे के चर्मों में दंडवत प्रणाम करने लगे और उनके नेत्रों से असीन भक्ती
30:46वा आनंद के अश्रुबह निकले
30:49अवधूत दक्तात्रे ने राजा यदू के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा और उन्हें निश्काम कर्म करते हुए राज्यसंचालन तथा परम
30:58मुक्ती का आशिरवाद प्रदान किया
31:01अंतह दक्तात्रे अवधूत अंतरध्यान हो गए और राजा यदू पूर्ण ज्यानी तथा जीवन मुक्त होकर अपने समरिध सामराज्यकी और प्रस्थान
31:10कर गए
31:12अवधूत दक्तात्रे के अंतरध्यान होने के पश्चात, महाराज यदू गेहन शांती और नवग्यान से उतप्रोथ होकर अपने सामराज्यकी और प्रस्थान
31:22करने लगे, उनके हृदय में परम सत्य की अनुगूंज गूंज रही थी
31:27उनके लिए अब संसार पहले जैसा नहीं रहा था, प्रत्येक परवत, नदी, व्रिक्ष और जीव उन्हें एक दिव्य शिक्षक प्रतीत
31:36हो रहा था, प्रकृती के कणकण में उन्हें ब्रहमा का आभास होने लगा
31:41महाराज यदु का मन अवधूत के अंतिम उपदेशों में गोते लगा रहा था, जहां अनासक्ती और समता को परम मुक्ती
31:49का द्वार बताया गया था
31:51उनकी आंतरिक द्रिष्टी में दत्तात्रे का शांत स्वरूप प्रकट हुआ, जो प्रित्वी को गुरु मानकर उसकी धैर्य और सहनशीलता के
32:00पाठ को राजा को समझा रहे थे
32:03फिर वायू की तरह निर्लिप्त, हर जगह उपस्थित रहते हुए भी कहीं न ठहरने का रहस्यमय सिध्धान्त उनके मन में
32:11गुमजा, जो दत्तात्रे ने समझाया था
32:15आकाश के समान असीमित और हर रूप को समाहित करने वाले परम ब्रह्मा की विशालता का बोध हुआ, जिसे अवधूत
32:22ने अपना अगला गुरु बताया था
32:25जल की निर्मलता, उसकी सहच प्रवाशीलता और सभी को जीवन देने की क्षमता ने उन्हें अपनी आत्मा को शुद्ध करने
32:33और करुणा से भरने की प्रेणा दी
32:37अगनी की तरह पवित्र, हर पदार्थ को रूपांतरित करने की उसकी शक्ती और बिना किसी बंधन के स्वय भस्म हो
32:44जाने का पाठ उनके लिए आत्मशुद्धी का प्रतीक बना
32:49महाराज यदू ने अनुभव किया कि ब्रहमांड का प्रत्येक तत्व एक महान ग्रंथ है जो मौन रहकर जीवन के गहंतम
32:57सत्यों का उद्गोश करता है
33:00जब वे अपने समरिध सामराज्य की राजधानी में लोटे तो द्वारपालों और प्रजाने उनके चहरे पर एक ऐसी अलौकिक चमक
33:09देखी जो पहले कभी नहीं थी
33:12उन्होंने सभा में प्रवेश किया जहां मंतरीगन उचसुकता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे और उनके हर निर्णय में अब
33:20एक दिव्य समता और निश्पक्षता जहलक रही थी
33:24एक साधारन नागरिक जो न्याय की तलाश में था राजा के समक्षाया और यदू ने उसके दुख को गहराई से
33:32समझा फिर भी बिना किसी आसकती के समस्या का समाधान किया
33:37महारानी ने भी अपने पती में एक गहन परिवर्तन देखा उनकी आखों में अब एक शाश्वत शान्ती थी और उनका
33:45स्पर्ष भी दिव्य प्रेंड से भरा हुआ प्रतीत होता था
33:49यदु महाराज दिनरात अपनी जिम्मेदारिया निभाते परन्तु उनका मन सदैव उस परम सत्य में लीन रहता जिससे उन्हें अवधूत ने
33:58परिचित कराया था
34:00उनके भीतर 24 गुरुओं की शिक्षाओं का सार एक दिव्य प्रकाश पुन्च के रूप में प्रदीप्थ हुआ जिसने उनके संपूर्ण
34:08अस्तित्व को आलोकित कर दिया
34:11वे अपने राज किये कर्तवियों का पालन पूरी निष्ठा से करते किंतु परिणाम की चिंता से पूर्णत हमुक्थ होकर प्रतेक
34:20कर्म को एक यग्य के समान समर्पित करते थे
34:24उनके प्रबुध शासन में राज्ज में शांती, समरिध्धी और धर्म का अभूत पूर्व उतकर्ष हुआ, प्रजा सुखचैन से अपना जीवन
34:32व्यतीत करने लगी
34:35राजा यदू ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची मुक्ती संसार का त्याग करने में नहीं, बलकि संसार में रहते
34:42हुए भी उससे अनासक्त रहने में है
34:46दूर कहीं अद्रिश लोक में अवधूत दक्तात्रे मंदमंद मुस्कुराते हुए राजा यदू के इस परम जीवन को निहार रहे थे,
34:54उनके हृदय में अपने शिश के लिए गर्व था
34:58इस प्रकार राजा यदू ने दत्तात्रे के चौबीस गुरूओं की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतार कर एक जीवन मुक्त
35:05की तरह शासन किया और पीढियों तक ज्यान और धर्म का प्रतीक बने रहे
35:11राजा यदू ने अपने भव्य राजदर्बार में बैठे हुए, अपने पुत्रों को दत्तात्रे के चौबीस गुरूओं के दिव्य सिध्धानतों को
35:20आत्मसात करने का अंतिम उपदेश दिया
35:23यदू के वचनों से प्रभावित होकर उनके जेश्ट पुत्र क्रोष्टा ने श्रद्धा पूर्वक अपने पिता के चर्णों को स्पर्श किया
35:31और इस दिव्य विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया
35:35इस प्रकार याद्ववंश की नीम केवल सामराज्य विस्तार पर नहीं बलकि उस परम आध्यात्मिक सत्य पर रखी गई जो संसार
35:44के मोह से परे ले जाता है
35:47समय के चक्र के साथ राजा यदू ने अपने राज्य का कार्यभार योग्य उत्तराधिकारियों को सौंप कर वन की ओर
35:55प्रस्थान करने का निर्णे लिया
35:58घने जंगलों के बीच पत्तों की सरसराहट और बहती हुई नदियों के स्वर में राजा यदू को दत्तात्रे की वे
36:05दिव्य शिक्षाएं पुन्ह गूंजती हुई प्रतीत हुई
36:09वहां उन्होंने प्रित्वी, वायू, आकाश और जल जैसे पंच तत्वों में छिपे हुए गुरुओं के संदेशों का ध्यान करते हुए
36:17अपनी चेतना को अनंत ब्रह्मांड में विलीन कर दिया
36:21उधर अवधूत दत्तात्रे ने अपनी दिव्य दृष्टी से अपने प्रिय शिष्य की इस परमगती को देखा और अपनी योगमुद्रा में
36:29गहरे ध्यान में लीन हो गए
36:32याद्ववंश के महल में यदू के उत्तराधिकारियों ने दत्तात्रे के ज्ञान को अक्षुन रखने के लिए एक भव्य मंदिर और
36:40वेजशाला का निर्मान करवाया
36:43पीढी दर पीढी इस राजवंश के युवा राजकुमारों को शस्त्र विद्या के साथ साथ अवधूत के उन्ही 24 पाठों की
36:51दीक्षा दी जाने लगी
36:52इस महान ज्यान के प्रभाव से याद्ववंश में ऐसे प्रतापी और धर्म प्रायन राजा उत्पन हुए जिन्होंने प्रित्वी पर धर्म
37:01की पुनस्थापना की
37:04कालांतर में इसी पवित्र वन्ष की एक शाखा में शूरसेन नाम के प्रतापी राजा हुए जिन्होंने मथुरा नगरी को अपनी
37:12समरिध्धी और धर्म का केंद्र बनाया
37:16दत्तात्रे की आध्यात्मिक उर्जा इस वन्ष के कणकण में समाहित थी जो आने वाले युग के सबसे बड़े अवतरण की
37:23प्रतीक्षा कर रही थी
37:26देवर्शी नारद ने भी वीना बजाते हुए अंतरिक्ष से इस पावन भूमी को देखा और याद्ववन्ष की इस दिव्य नियती
37:33का गान किया
37:35यदुद्वारा स्थापित इस धर्म की सीमाएं केवल उनके वन्ष तक सीमित नहीं रही बलकि संपूर्ण चंद्रवन्ष के लिए एक प्रकाश
37:44स्तंभ बन गई
37:46अवधूत की शिक्षाओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि राजमुकुट का असली गौरफ प्रजा के कल्यान और स्वयन के
37:53अंकार के विसर्जन में है
37:56इस दिव्य संदेश को पाकर प्रित्वी के अन्य राज्यों के शासत भी याद्ववंश की इस शासन पद्धती से प्रेणा लेने
38:04के लिए उच्सुखो उठे
38:06स्वयन इंद्र आदी देवताओं ने भी स्वर्ग से पुष्प वर्षा करते हुए राजा यदू की इस महान आध्यात्मिक विजय का
38:14अभिनन्दन किया
38:16दत्तात्रे का यह अवधूत अवतार इस बात का शाश्वत प्रमान बना की गुरु केवल मनुष्य नहीं बलकि संपूर्ण प्रकृती ही
38:24ज्यान का अनन्द स्रोत है
38:27याद्ववन्ष का यह गौरवशाली इतिहास आगे चलकर उस महान गाथा की प्रिष्ठ भूमी बना जिसमे स्वयन पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान श्री
38:36कृष्ण अवतार लेने वाले थे
38:39इस प्रकार दत्तात्रे की अन्मोल विरासत को समेटे हुए चंद्रवश की यह गाथा सत्य, धर्म और मोक्ष के नए आयामों
38:48की ओर बढ़ती चली गई
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