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राज-पाट और मोह माया का त्याग कर, जब एक चक्रवर्ती सम्राट ने चुना परम वैराग्य का मार्ग! 🤯 श्रीमद्भागवतम् के पांचवें स्कंध में हम ऋषभदेव के अद्भुत जीवन के अंतिम पड़ाव को देखते हैं। इस एपिसोड में जानिए कैसे भगवान ऋषभदेव ने 'अवधूत' का रूप धारण कर, वस्त्रहीन और दिगंबर होकर संसार में विचरण किया। उनके विचित्र व्यवहार, गहन तपस्या और भरत जैसे पुत्रों को दिए गए आत्मज्ञान के उपदेशों को समझें। कैसे उन्होंने शरीर के मोह को त्याग कर परम मोक्ष प्राप्त किया? यह गाथा आपको वैराग्य, अनासक्ति और सच्ची मुक्ति का अर्थ समझाएगी। एक ऐसा राजा जिसने अपने जीवन से सिखाया कि असली धन, असली सत्ता, आत्मज्ञान में निहित है। #Rishabhdev #Avadhuta #BhagavataPurana #S3E29 #VaibhavAgarwal #HinduMythology #Moksha #Renunciation #SpiritualJourney #Detachment #आत्मज्ञान #वैराग्य #भागवतपुराण #ऋषभदेव
Transcript
00:00राजसिनहासन का त्याग कर भगवान रिश्भदेव ने अपने विशाल सामराज्य की सीमाओं से परे एक नए अज्यात मार्प पर चलने
00:08का द्रिड संकल्प किया, जहां उन्हें परम वैराग्य का अनुभव करना था.
00:14उन्होंने एक एक कर अपने शरीर से राजसी परिधान और बहुमुल्य आभूशन उतारने आरंभ किये, मानो भौतिक बंधनों को त्याग
00:23कर मुक्ती की ओर पहला कदम बढ़ा रहे हूँ.
00:27समस्त सांसारिक वस्त्रों और अलंकर्णों से मुक्त होकर, उनका दिव्य शरीर पूर्णतह नगनता में खड़ा था, जो आध्यात्मिक स्वतंत्रता और
00:36निर्भैता का प्रतीक बन गया.
00:39उन्होंने जानबूच कर स्वयं को धूल और मिट्टी में लपेट लिया, जिससे उनका दिव्य शरीर पृत्वी के कणों से आच्छादित
00:47हो गया, यह परम विनमर्ता और त्याग का सर्वोच प्रदर्शन था.
00:52अपनी इस नई धूलधूसरित अवधूत वेशभूशा में वे राजसी नगर के भव्यद्वार से बाहर निकले, पीछे छोड़ते हुए सभी परिचित
01:01सुख और सामाजिक अपेक्षाएं.
01:04उनकी एका की यात्रा अब दुर्गम भूभागों से होकर गुजर रही थी, जहां उनके नंगे पैर पत्थरों पर ग्रिड़ता से
01:12टिके थे, और उनका संपूर्ण ध्यान भीतर की ओर केंद्रित था.
01:17खेतों में काम करते ग्रामेन उन्हें देखकर ठिठक गए, उनके चहरों पर भ्रम और भय के भाव स्पष्ट थे, क्योंकि
01:25वे धूल से ढखे इस आकरिती को पागल समझ रहे थे.
01:30उनके चहरे पर एक अटूट शांती और हलकी मुस्कान थी, जो बाहरी भय और भ्रम के विप्रीत उनके गहरे आंतरिक
01:38संतोष और आत्मग्यान को दर्शाती थी.
01:42वह एक विशाल बर्गद के वरिक्ष की घनी शाखाओं के नीचे विश्राम करते थे, जहां जंगल की शांती उनके नए
01:49घर का सुकून बन गई थी.
01:52एक हलचल भरे बाजार से गुजरते हुए भी, उन्होंने स्वादिष्ट भोजन की लुभावनी सुगंध को अन्देखा कर दिया, उनका मन
02:01भूख से पूरी तरहे निरलिप्ट था.
02:04जंगली जानवर, हिरन और खरगोश बिना किसी भय के उनके पास आजाते थे, उनकी दिव्य और अहानिकारक उपस्थिती को महसूस
02:13करते हुए.
02:14वे एक आकस्मिक मूसलाधार वर्षा में भी अडिक खड़े रहे, अपने धूल्ज में शरीर पर बारिश को बहने देते हुए,
02:22पूरी तरह असुविधा से अप्रभावित.
02:25कुछ शरार्ती युवक उन पर छोटे पत्थर और ताने फैंकते थे, उनकी इस पागलपन जैसी अवस्था में मनोरंजन धूंडते हुए.
02:35वे अपनी धीनी जानबूचकर की गई चाल पर अटल रहे, उपहास और मामूली शारिरिक पीडा से पूरी तरह अप्रभावित, उनकी
02:44आखें एक अंदेखे क्षितिच पर टिकी थी.
02:48महीनों बीट गए, उनकी जटाएं एक घने, उल्जे हुए जहरने में बदल गई, और उनका शरीर अब धूल और मिटी
02:56की मोटी परतों से पूरी तरह धका हुआ था.
03:00एक दूरस्थ गुफा में बैठकर वे गहन ध्यान में लीन थे, उनके भीतर से एक मंद सुनहरा प्रकाश फूट रहा
03:07था, जो उनके गहरे आत्मिक बोध को दर्शाता था.
03:12देवलोक से देवगण और गंधर्व उनके अद्वितिय त्यात पर विस्मय करते हुए, पृत्वी पर रिश्भदेव की ओर श्रग्धापूर्वक देख रहे
03:21थे.
03:22अस्थोते सूर्य के विरुद्ध उनकी आकरिती एक अध्भुत अवधूत के रूप में उभी, जिसकी बाहरी धूलमिक्टी के बावजूद गेहन आध्यात्मिक
03:31उर्जा हर दिशा में प्रसारित हो रही थी.
03:35उनकी यात्रा अब निरंतर आत्मखोज और परम मुक्ती के शाश्वत्पत का प्रतीक बन गई थी, जो वैराग्य के हर पल
03:43को गहराई से जी रहे थे.
03:46रिश्भदेव एक परवत चोटी पर खड़े थे, उनकी आकरिती एक ब्रह्मांडिय आकाश के विरुद्ध उभी थी, जो परमत्याग और दिव्य
03:54स्वतंत्रता का एक कालातीत प्रतीक थी.
03:59रिश्भदेव ने अपनी एकांत साधना पूर्ण कर उस परवत से उतरना आरंभ किया, उनके पीछे स्वर्निम सूर्य की किर्ने एक
04:07दिव्य आभा बिखेर रही थी.
04:10नीचे घाटी में उनके पुत्र, जिन में भरत प्रमुख थे, अत्यंत श्रद्धा और उच्सुक्ता से अपने पिता की प्रतीक्षा कर
04:18रहे थे, उनके आगमन की दिव्यता से अभिभूत थे.
04:23एक विशाल वट व्रिक्ष के नीचे, जिसकी शाखाय अनंत ज्यान की प्रतीक थी, रिश्भदेव शांती पूर्वक आसंग रहें कर बैठे
04:32और उनके पुत्र सम्मान पूर्वक चारों ओर बैठ गए.
04:36भरत एक अत्यंत श्रधालू पुत्र, अपने पिता, एक दिव्य, शांत आकृती के रूप में एक गहन आत्मिक प्यास और पूर्ण
04:45समर्पन के साथ देख रहे थे.
04:48रिश्भदेव ने अपनी शांत, गहरी आवाज में उपदेश देना प्रारंब किया, जिससे वातावर्ण दिव्य ज्यान से भर गया, उन्होंने मानव
04:57जीवन के परम उद्देश की व्याख्या की.
05:01उन्होंने समझाया कि यह नश्वर शरीर और संसार के समस्थ सुख अस्थाई हैं, पल भर के लिए भ्रमित करने वाले
05:08और अंत्ध दुखदाई हैं.
05:11इंद्रियों की क्षणिक मोहक शक्ती पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने उनके आकर्षण में फंसने के खत्रों से आगाह किया, जो
05:20आत्मा को बांधे रखते हैं.
05:23रिश्भदेव ने मैं और मेरा के मायावी भ्रम को सभी कष्टों का मूल बताया, जिससे जीव सांसारिक बंधनों में फंस
05:31जाता है.
05:33उन्होंने अपने पुत्रों को सभी भौतिक पहचान से परे परम आत्मा को खोजने का आगरह किया, जहां सच्ची स्वतंत्रता निवास
05:41करती है.
05:43उन्होंने वैराग्य के महत्व को समझाया, सभी इच्छाओं और आसक्तियों से पूर्ण विरक्ती ही परम आनंद और मुक्ती का मार्ग
05:51है.
05:53एक सच्चे अवधूत के लक्षनों का वर्नन करते हुए, उन्होंने बताया कि वह कैसे सभी बंधनों से मुक्त, किसी भी
06:01वस्तु से अनासक्त और पूर्णत स्वतंत्र होता है.
06:06भरत अपनी आखों में गहरी एक आगरता लिये, हर शब्द को आत्मसात कर रहे थे, उनका चहरा एक गंभीर चिंतन
06:14में लीन था, जैसे वे स्वयं को बदल रहे हुँ.
06:18रिश्भदेव ने समझाया कि अटूट भक्ती, भक्ती ही आत्मसात्षातकार की गोर ले जाती है, जो हृदय को शुद्ध करती है,
06:26और आत्मा को परमात्मा से जोडती है.
06:31उन्होंने सभी प्राणियों में इश्वर को देखने के महत्व पर जोर दिया, जिससे करुणा और समान्ता की भावना स्वाभाविक रूप
06:39से विट्सित होती है.
06:42उन्होंने उन लोगों की संगती से बचने की चेतावनी दी, जो पूरी तरह से भावतिकवादी परस्यूट्स में लीन थे, क्योंकि
06:49यहां आध्यात्मिक प्रगती में बाधा डालता है.
06:54रिश्भदेव ने एक मुक्त आत्मा के गुनों का विस्तार से वर्णन किया, जो सुखदुख, मानअपमान जैसे द्वंद्वों से उपर उठकर
07:02स्थितप्रज्य हो जाती है.
07:05उन्होंने निश्कान कर्म योग के पत्पर चलने का निर्देश दिया, जहां कर्म फल की आसकती के बिना किये जाते हैं,
07:13जिससे कोई नया बंधन नहीं बनता.
07:16भरत ने अपने भीतर एक गहरा परिवर्तन महसूस किया, एक ऐसी स्पष्टता और शांती जो उन्होंने पहले कभी अनुभव नहीं
07:25की थी, उनका हृदय ज्ञान से भर गया था.
07:29रिश्भदेव ने अपने उपदेश का समापन किया, ब्रह्मा के साथ विलय के अंतिम लक्षे पर जोर दिया, जो परम सत्य
07:36और अस्तित्व का अंतिम उद्देश है.
07:40उनके पुत्रत विशेशकर भरत, कृतग्यता और एक नवप्राप्त उद्देश से अभिभूत होकर उनके चर्णों में नत्मस्तक हुए, जबकि रिश्भदेव ने
07:50उन्हें दिव्यप्रेम और ज्यान से भरपूर अपनी कृपा द्रिश्टी से आशिरवाद दिया.
07:56पुत्रों को अपने उप्देशों के सार में लीन देखकर, रिश्भदेव ने एक अंतिम क्षन का विचार किया, जहां उनकी द्रिश्टी
08:04में संसार के सभी संबंधों का बंधन शिथिल पड़ रहा था.
08:09उनकी आत्मा ने सांसारिक मुहमाया के अंतिम धागों को भी तोड़ने की पुकार सुनी, एक पूर्ण विरक्ती की ओर खीचते
08:17हुए जो परम स्वतंत्रता की प्राप्ती का मार्ग था.
08:21एक शांत किन्तु द्रिड स्वर में, रिश्भदेव ने अपने परिवार और दर्बारियों के समक्ष अपनी इस अलौकिक यात्रा की घोशना
08:29की, जो उन्हें राज्य और समस्त भौतिक बंधनों से दूर ले जाने वाली थी.
08:36भरत हाला की अपने पिता के आध्यात्मिक पत को समझते थे, फिर भी विदाई की गहरी वेदना अनुभव कर रहे
08:43थे, पर उन्होंने अपने हृदय में उनके निर्णय को स्विकार किया.
08:48राज्य की महिमा और भौतिक्ता का प्रतीक माने जाने वाले अपने राजसी वस्त्रों को उतारते हुए, रिश्भदेव ने अपने लौकिक
08:56पहचान के प्रत्येक निशान को त्याग दिया.
09:00अब एक सन्यासी के साधारण वस्त्रधारण कर, उन्होंने अपने अध्यात और गेहन आध्यात्मिक पत्थ पर पहला कदम बढ़ाया, जो उन्हें
09:09परम सत्य की ओर ले जाने वाला था.
09:13महल के भव्यद्वारों से बाहर निकलते हुए, उन्होंने एक बार भी पीछे मुड कर नहीं देखा, जो भौतिक संसार के
09:20प्रती उनकी पूल्न विरक्ती और अटूट संकल्प का प्रतीक था.
09:25राज्य की प्रजा, अपने प्रिय राजा को इस अनोखे रूप में जाते हुए देखकर, श्रद्धा और विस्मय के साथ स्तब्ध
09:33खड़ी थी, उनकी आखों में अश्रु और हृदय में एक गेहन उदासी थी.
09:39घने और शांत वनों में प्रवेश करते ही, रिश्भदेव ने स्वयं को प्रकृती की गोद में पाया, जहां उन्होंने गेहन
09:47एकांत और आत्मचिंतन का अभ्यास चुरू किया.
09:51उन्होंने सामाजिक सम्मान और अपमान की सीमाओं से उपर उठते हुए, स्वयं को सभी प्रकार के बाहरी प्रभावों से मुक्त
09:59करना शुरू कर दिया, जो एक अवधूत के लक्षणों में से एक था.
10:04सूर्य की तीखी गर्मी और बर्फीली ठंड को समान रूप से स्विकार करते हुए, उनका शरीर और मन प्रकृती के
10:12चरम बदलावों के प्रती पूर्णत अप्रभावित रहा, जो उनकी गेहन वैराग्य की स्थिती को दर्शाता था.
10:19वन में हिंसक वन्य जीवों का सामना करते हुए भी, रिश्भदेव भयमुक्त और अत्यंत करुनावान बने रहे, क्योंकि वे सभी
10:28जीवों में ब्रह्मा के ही अंश को देखते थे.
10:32उन्होंने कोई निश्चित निवास स्थान नहीं रखा, नहीं भोजन का कोई संग्रह किया, जो कुछ भी अनायास प्राप्थ होता, उसी
10:40से अपना जीवन निर्वाह करते, पूर्ण अनासक्ती का जीवन जीते रहे.
10:46लोग उन्हें मूर्ख या पागल समझने लगे, उन पर हनस्ते और उनका तिरस्कार करते, परंतु रिश्भदेव इन सबसे पूर्णत्ह अप्रभावित
10:55रहे, अपनी अवधूत अवस्था में अटल बने रहे.
10:59उन्होंने भीतर ही भीतर परम आनंद का अनुभव किया, एक ऐसी गहरी शान्ती जो सभी बाहरी परिस्थितियों से परे थी
11:07और उनकी आत्मा को दिव्य प्रकाश से भर देती थी.
11:12उनका शरीर, मन और बुद्धी केवल इश्वर की इच्छा के साधन मात्र रह गए थे, बिना किसी व्यक्तिगत आसक्तिया परिनाम
11:20की चिंता के कार्य करते हुए.
11:23दुहक और सुख प्रशंसा और निंदा जैसे द्वंद्वों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था, वे इन सभी से
11:31उपर उठकर परम समता भाव में स्थित थे.
11:35यद्यपी उनका बाहरी रूप साधारन और धूलधूसरित था, फिर भी कुछ शुद्ध आत्माएं उनके दिव्यतेश को सुक्ष्म रूप से अनुभव
11:43कर सकती थी.
11:45कभी कभी वे समाज के स्थापित मानदंडों से परे विचित्र और अप्रत्याशत कार्य करते थे, जो उनकी पूल्ण स्वतंत्रता और
11:54आत्म जागरूकता से मुक्ती को दर्शाता था.
11:58इस प्रकार रिश्भदेव एक सच्चे अवधूत के रूप में अपनी यात्रा जारी रखते रहे, परम आनन्द और संभाव के एक
12:06जीवित प्रतीक बन गये, उनका मार्ग एक शाश्वत पाठ बन गया.
12:11अपनी वानी पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए भगवान रिश्भदेव ने पूर्ण मौन धारन कर लिया और किसी भी
12:19शब्द का उच्चारन करना बंद कर दिया.
12:22जब ग्रामवासी उनसे अनेक जटिल प्रशन पूछते, तब भी वे पत्थर की प्रतिमा की भाती अचल और शांत बने रहते
12:30थे.
12:32अज्यानी लोग उन्हें गुंगा समझ कर उनका उपहास करते, किन्तु उनके तेजों में मुख पर ब्रहम अज्यान की अनुपम कांती
12:39चाई रहती थी.
12:42संसार के कोलाहल, प्रशनसा और अपमान के शब्दों से परेहटकर उन्होंने स्वयन को बधिर की भांती प्रस्तुत किया.
12:51लोग उनके कानों के पास जाकर उचे स्वर में चिलाते, किन्तु उनका मन पर ब्रहम की अनंत गहराई में लीन
12:58रहता था.
12:59उनकी इस असीम निस्प्रहता को देखकर ज्यानी मुनी समझ गए कि उन्होंने श्रवन की इंद्रिय पर पूर्ण विजय पाली है.
13:09उन्होंने अपनी द्रिष्टी को बाह्य रूपरंग से हटा कर अर्धुन मिलित नेत्रों से देखना प्रारंभ किया, जैसे वे अंधी द्रिष्टी
13:17वाले हों.
13:18उनके समक्ष सुन्दर ग्रिष आये या धूलिधूसरित भूमे उनकी द्रिष्टी में सब कुछ केवल एक समान ब्रहम मैं ही था.
13:27माया के अनेक प्रलोभन और आकरशक ग्रिष भी उनकी अंतरमुखी द्रिष्टी को डगमगा न सके.
13:35काटों और पत्थरों से भरे कठिन मार्गों पर वे बिना किसी भय के चलते रहे, क्योंकि उनकी यात्रा आत्मिक आलोक
13:43में हो रही थी.
13:44जैसे कच्छुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही उन्होंने अपनी सभी इंद्रियों को अंतरात्मा के भीतर समेट लिया
13:53था.
13:54वानी, श्रवन और द्रिष्टी के निरोध से भगवान रिश्भदेव ने अपने भीतर एक अटूट शान्ती का सामराज्य स्थापित किया.
14:03जंगल के हिंसक पशु भी उनके इस परम शान्ती के वातावर्ण में आकर अपना स्वाभाविक वैर त्याग देते थे.
14:11रंग बिरंगे पक्षी बिना किसी डर के उनके कंधों पर आबैठते, मानों वे किसी व्रिक्ष की निश्चल शाथा पर विश्राम
14:19कर रहे हूं.
14:21अनेक सत्य के शोधक उनके निकट विशाल प्रवचन की आशा में आते, परन्तु उनके मौन से ही सबसे बड़ा ज्यान
14:28प्राप्त कर लेते.
14:30उनका केवल सानिध्य ही चंचल और अशान्त मनों को क्षन भर में परम शान्ती से भर देता था.
14:38रिश्भदेव ने सिद्ध कर दिया कि सच्चा योग केवल शारिरिक क्रियाये नहीं, बलकि समस्त इंद्रियों का आत्मानुसंधान में विसर्जन है.
14:48बाह्य संसार का कोलाहल और उनके आंतरिक मन का सन्नाटा मिलकर एक जीवन्त उपनिशत का रूप ले रहे थे.
14:56इस प्रकार गुंगे, बहरे और अंधे होने का छद्म व्यवहार करके उन्होंने समाज के जूठे अभिमान और आडंबरों को छिन्न
15:05भिन्न कर दिया.
15:06इस अगाध वैराग्य और मौन में लीन होकर भगवान रिश्भदेव आत्मसाक्षातकार की वह अमर जोती बने जो युगो युगो तक
15:16मानव चेतना को प्रेरित करती रहेगी.
15:19इसके पश्चात भगवान रिश्भदेव घने जंगलों की ओर निकल पड़े, जहां उन्होंने अपनी देह के प्रती तनिक भी मोहन रखते
15:28हुए अवधूत वृत्ती धारन कर ली.
15:31चिल्चिलाती जेट की धूप में जब प्रित्वी अगनी की भाती तप रही थी, तब भी वे किसी निशकंप व्रिक्ष की
15:38भाती अडिक खड़े रहे.
15:40शीतल भयंकर रातों में जब बरफीली हवाए शरीर को कमपा देती थी, रिश्भदेव अपनी चेतना को केवल परमात्मा में लीन
15:49रखते थे.
15:51मुसलाधार मानसूनी वर्षा में जब आकाशिय बिजली चमकती थी, तब वे बिना किसी आश्रय के नगन भूमी पर शांत लेटे
15:59रहते थे.
16:01भूख लगने पर वे कभी सूखे पत्ते, तो कभी व्रिक्षों से गिरी चाल ही बिना किसी स्वाद या शिकायत के
16:08ग्रहेन कर लेते थे.
16:10जब पत्ते भी सुलब न होते, तब वे केवल छोटे कंकडों को अपने मुख में रख भौतिक शुधा की सीमा
16:17से परे निकल जाते थे.
16:20उनके आसपास विशैले सर्प और हिंसक पशु निर्भय होकर घूमते थे, क्योंकि उनके अगाध शांत तपोबल ने वन के वातावर्ण
16:29को अहिंसक बना दिया था.
16:31निरंतर कठोर तपस्या से उनका शरीर अत्यंत क्रिशकाय हो गया था और पसलिया स्पष्ट दिखने लगी थी, किन्तु उनके चहरे
16:40का ओज निरंतर बढ़ता गया.
16:43अज्यानवश मार्ग से गुजरने वाले संसारी लोग उन्हें उनमत समझकर उन पर धूल और कंकर फेंकते, परंतु वे अविचलित बने
16:51रहते.
16:53रिश्भदेव ने अपमान और सम्मान दोनों को समान द्रिश्टी से देखा और समाज के जूठे मापगंडों को अपने मौन से
17:01निरस्ट कर दिया.
17:03उन्होंने अजगर वृत्ती को स्वीकार किया, जिसमें वे बिना कोई प्रयास किये केवल उसी स्थान पर रहते जहां दैव्योग से
17:11जो मिल जाए, वही परियाप्त था.
17:14यद्यपी उनका शरीर धूलधूसरित था, परन्तु उनके मलमूत्र से भी एक दिव्य और मधूर सुगंध निकल कर पूरे वन को
17:22महका देती थी.
17:24स्वर्ग लोग के देवता आकाश में एकत रहोकर इस अद्वितिय देहातीत स्थिती को देखकर विसमें से भरकर पुष्पवर्शा करने लगे.
17:34जैसे मिट्टी के मट्के के भीतर ढका हुआ दीपक प्रकाश बिखेरता है, वैसे ही उनके जरजर शरीर के भीतर से
17:42ब्रहमग्यान की दीप्ती चमकती थी.
17:45उन्होंने मैं और मेरा की अनादी ग्रंथिल ग्रंथी को पूरी तरह काट कर यह सिद्ध किया कि आत्मा देह के
17:52विकारों से सर्वता प्रिथक है.
17:55कीट पतंगे और चीन्टिया उनके निश्चल शरीर पर रेंगती रहती थी, किन्तु वे अपने ध्यान की चरम अवस्था से रंचमात्र
18:04भी विचलित नहीं हुए.
18:06प्रकृती स्वयन उनके इस घोर वैराग्य के आगे नत्मस्तक होकर व्रिक्षों की शाखाओं को जुका कर उन्हें शीतल चाया प्रदान
18:15करने लगी.
18:17रिश्भदेव ने परम अवधूत अवस्था को प्राप्त कर, शीतवश्न और सुखदुख के सभी द्वंद्वों को सदास्दा के लिए समाप्त कर
18:25दिया.
18:25वन में निवास करने वाले महान रिश्मुनी दूर से आकर उनके चर्णों में प्रणाम करते हुए उन्हें साक्षात भगवान विश्नु
18:34का रूप मानकर पूझने लगे.
18:37भगवान रिश्भदेव की यह कठोर साधना युगों युगों तक समस्त मानव जाती के लिए देहाध्यास त्याग कर मोक्ष पाने का
18:45अमर संदेश बनी.
18:47अद्वैत भाव में पूर्णतह लीन होकर भगवान रिश्भदेव ने लोकलज्या का पूर्ण त्याग कर दिया और पशुओं के आचर्ण को
18:55अपना कर समद्रिष्टी का सर्वोच्य उदाहरन प्रस्तुत किया.
19:00सांसारिक मनुश्यों के दिरिश्टी गोचर होने पर उनका यह विलक्षन व्यवहार एक ओर जहां अज्ञानी जनों को भ्रमित कर रहा
19:08था, वहीं ज्ञानी मुनियों को अद्वैत तत्व का गहरा बोध करा रहा था.
19:13उन्होंने गोवरत, काकवरत और अजगरवरत जैसे पशुव्यवहारों को अंगिकार करके यह सिद्ध किया की देह मात्र एक नश्वर वस्त्र है,
19:22जबकी आत्मा सर्वव्यापी है.
19:26रिश्भदेव जी भूमी पर पड़े-पड़े ही बिना हाथों का प्रयोग किये, पशुओं की भांती वहीं पड़ा भोजन और जल्ग
19:33रहन करने लगे.
19:36आमकार और देहाध्यास को समूल नश्ट करने के लिए वे अपने ही शरीर के मलमूत्र में लोगते हुए क्रीडा करने
19:43लगे, जिससे भौतिक सुन्दर्ता का अभिमान भंग हो गया.
19:48परन्तु आश्चर्य की बात यह थी कि उनके शरीर से निकलने वाले मल से भी दूशित दुरगंध के स्थान पर
19:55एक अलोकिक सुगंध प्रवाहित होने लगी.
19:58वह दिव्य सुगंध पवन के वेग के साथ फैलती हुई अस्सी योजन के विस्तृत वन शेत्र को अत्यंत सुगंधित और
20:06पवित्र बनाने लगी.
20:08इस चमतकारी सुगंध का अनुभव करके दूर-दूर से नागरिक और तपस्वी दौडे चले आये और इस अलोकिक स्थिती को
20:16देखकर स्थब्ध रह गए.
20:18अज्यानी जनों ने उन्हें पागल और अवधूत मानकर उनका उपहास उडाया, परंतु रिश्भदेव जी नित्यत्रिप्ट आत्मा में स्थित होकर अविचलित
20:27रहे.
20:28वे कभी गाय की तरहे चलते, कभी कुत्ते की भांती बैठकर भोजन करते, तो कभी अजगर की तरहे निश्क्रिय होकर
20:37केवल इश्वर का ध्यान करते.
20:40उनका प्रत्येक आचर्ण यह शिक्षा दे रहा था, कि सुख दुख, मान अप्मान और पवित्रता अपवित्रता सब मन का भ्रम
20:47मात्र हैं.
20:50भगवान रिश्भदेव के इस कठोर पशुवरत ने सिद्ध कर दिया, कि परम सत्य को पाने के लिए सामाजिक मान मर्यादाव
20:57से उपर उठना अनिवार्य है.
21:01उन्हें न तो अपने नगन शरीर की सुध थी, और नहीं संसार के किसी नियम का भय, वे तो केवल
21:07परमेश्वर के आनंद में निमगन थे.
21:11स्वर्ग के देवता और गंधर्व आकाश मार्ग में स्थित होकर इस अध्वितिय योगी पर निरंतर पुष्पवर्शा कर रहे थे.
21:20रिश्भदेव जी का मौन आचर्ण वेदों के कठिंतम सूत्रों से भी अधिक स्पष्ट रूप से ब्रहम ज्यान की व्याख्या कर
21:27रहा था.
21:28जंगल के हिंसत पशु जैसे सिंह और सर्प उनके समीप आकर अपनी स्वाभाविक्ता भूलकर शान्त भाव से बैठ जाते थे.
21:38उन्होंने दर्शाया की सोना और मिट्टी, मित्र और शत्रु सब उस एक ही परंब्रहम के विभिन रूप हैं.
21:46भगवान रिश्भदेव की यह अवधूत अवस्था युगों युगों तक मानव जाती को देहाध्यास से मुक्ती दिलाने वाला अमर मार्ग बनी
21:54रही.
21:56समस्त वनवासी और मुनिगन समझ गए कि यह कोई सामान्य मनुष्य नहीं, अपितु साक्षात भगवान विश्णु का ही लिलावतार है.
22:05इस प्रकार रिश्भदेव जी महाराज ने संसार को अदवैत ज्यान की चरम सीमा का प्रत्यक्ष दर्शन कराते हुए अपनी अवधूत
22:14यात्रा जारी रखी.
22:17भगवान रिश्भदेव अपनी अवधूत यात्रा को आगे बढ़ाते हुए दक्षिन भारत के कोंकन, वेंकट और कुटक प्रदेशों की ओर शांत
22:25कदमों से बढ़ चले.
22:27उनके पावन चर्णों का स्पर्श पाते ही वह उबढखाबर भूमी अत्यंत पवित्रहो उठी और मार्क के कंकर पत्थर भी स्वन
22:36समान चमकने लगे.
22:38जब वे कोंकन के तटी वनों से गुजरे तो समुद्र की प्रचंड लहरें भी उनके शांत स्वरूप को देखकर मानो
22:45नत्मस्तक होने लगी.
22:47वन के हिंसक जीव जैसे भयंकर सिंह और जहरीले सर्प भी अपनी क्रूर्ता भोलकर इस महान अवधूत के पीछे-पीछे
22:56अत्यंत शांत भाव से चलने लगे.
22:59विंकटाचल परवत की उंची चोटियों पर जब भगवान रिश्भदेव के कदम पड़े तो पूरा परवत दिव्य जोती और अलोकिक सुगंध
23:08से सराबोर हो गया.
23:10वहां के स्थानिय वनवासी और ग्रामेन इस अलोकिक योगी को देखकर दूर से ही हाथ जोर कर श्रधावन्त हो गए.
23:19ग्रीश्न की तीवर तपन हो या शीत की कठोरता, रिश्भदेव जी शरीर भाव से परे होकर निरंतर अपनी ही आत्मचेतना
23:27में लीन रहे.
23:29करनाटक प्रदेश में प्रवेश करते ही पवित्र नदिया अपनी धाराओं को धीमा करके मानो इस अवधूत समराट के चर्णों को
23:37पकारने लगी.
23:39कुछ मुग्ध ग्रामेनों ने उन्हें सुन्दर वस्त्र और मिश्थान अर्पित करने का प्रयास किया, परंतु वे तो केवल निजानंद के
23:47अमरित पान में मगन थे.
23:49कुटक प्रदेश की विशाल पहाडियों के शिखर पर खड़े होकर उन्होंने शांत और निर्मल द्रिष्टी से समस्त दिशाओं को पाबन
23:57किया.
23:59घने जंगलों में तपस्या कर रहे रिशियों ने जब रिश्भदेव के निस्प्रह स्वरूप को देखा, तो वे समझ गये की
24:06यही परम ज्ञान की स्थिती है.
24:09सूर्य की स्वर्णिन किर्णे और व्रिक्षों से गिर्ती हुई पुष्पवरिष्टी मानो प्रकृती स्वयं अपने प्रभू की आर्ती उतार रही थी.
24:19जिग्यासु साधकों ने रिश्भदेव के चर्णों की रज को अपने मस्तक पर लगाकर जीवन की परम धन्यता का अनुभव किया.
24:26वे मलय परवत और कुर्ग के सघन एवन दुर्गम जंगलों के भीतर और भी अधिक गहराई में अपनी एकांत यात्रा
24:35पर आगे बढ़ते गए.
24:37उनके प्रत्येक सांस के साथ वन के शांत वातावर्ण में ओंकार की सुक्ष्म अलौकिक ध्वनी गूंजने लगी.
24:45कुटक देश के राजा ने दूर से इस दिगंबर महायोगी को विचर्ण करते देखा और उनके अध्भुत तेजोवले से स्तब्ध
24:53रह गया.
24:55संसार की किसी भी निंदा या स्तुती का रिश्भदेव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि वे संपूर्ण देहाध्यास से मुक्थ
25:03हो चुके थे.
25:03यह संपूर्ण भारतवर्ष का दक्षिनीक शेत्र उनके दिव्य विचर्ण से एक विशाल और जागरित तीर्थस्थल में परिवर्तित होने लगा.
25:14रिश्भदेव जी महाराज ने प्रत्येक पर्वत श्रिंखला, नदी के तट और कुंज को अपने चिन्मय रूप से पावन कर दिया.
25:22अंता वे अपनी लीला के अगले चरण की ओर बढ़ते हुए और अधिक गेहन एवन निर्जन वनखंड के भीतर समाहित
25:30होने लगे.
25:43उस वीरान वनखंड में चारों और फैली विशाल वनस्पतिया और वन्यजीव उनके चिन्मय उपस्थिती मात्र से अत्यंत शांत और आनंदित
25:52हो उठे.
25:54एक अती प्राचीन और छायादार न्यगरोध व्रिक्ष के तले पहुँचकर रिश्भदेव जी महाराज ने अपने अंतिम महासमाधी योग के लिए
26:03आसंध रहन किया.
26:06धूलिधूसरित गात उलजी हुई जटाएं और पूर्णता निशकाम द्रिश्टी धारण किये वह परमेहन्स अवधूत अपनी समस्थ शारिरिक चेतना से परे
26:15उठ चुके थे.
26:17जैसे ही उन्होंने अपनी सांसों को रोक कर चित को परंब्रम में विलीन किया, उनके मस्तक से एक आलोकित दिव्य
26:24जोती प्रस्फुटित होने लगी.
26:27स्वर्गलोक से देवगण और गंधर्व अपने अपने विमानों में सवार होकर इस अध्भुत और दुरलभ वैराग्य लीला का प्रत्यक्ष दर्शन
26:35करने उमड पड़े.
26:38भगवान ब्रह्मा और देवदेव महादेव ने आकाश मार्ग से रिश्भदेव के इस अध्वितिय त्यागमय पत की भूरी-भूरी प्रशन साकी.
26:47तभी कुटकाचल के शिखरों पर बहती प्रचंड पवन के प्रभाव से परस पर टकराती हुई शुष्क बास की शाथाए घर्शन
26:54करने लगी.
26:56उस घर्शन से प्रजवलित हुई अगनी की चिंगारियों ने देखते ही देखते सम्पूर्ण वनखंड में एक भीशन दावागनी का रूप
27:04ले लिया.
27:06चारों और लप्टों का विक्राल घेरा बनता जा रहा था, परंतु रिश्भदेव जी अपने आत्मस्वरूप में पूर्नत्ह अचल और स्थिर
27:14विराज मान रहे.
27:16अगनी की लालस्वर्ण लप्टें उनके चारों और नाच रही थी, किन्तु उनके मुखमंडल की शांती और सौमयता में तिल मात्र
27:24का भी अंतर नहीं आया.
27:27उस पवित्र दावागनी ने रिश्भदेव के भौतिक शरीर को अपने भीतर समेट कर उसे परम तत्व में हों कर दिया.
27:35उनके नश्वर देह के त्यागते ही एक जाजवल्यमान स्वर्ण जोती उनके ब्रहमरंधर से निकल कर अनंत ब्रहमांडिये चेतना में एकाकार
27:44हो गई.
27:46कुटकाचल परवत के गगंचुम्बी शिखरों पर देवों ने गंधयुक्त पुष्पों की अविरल वर्षा करके इस महाप्रयान का अभिनंदन किया.
27:55आकाश में दुन्दुभियों की गूंज और वेदमंत्रों का सस्वर उच्चारन संपूर्ण दक्षिन दिशा में गूंजने लगा.
28:03दावागनी के शान्थ होने के पश्चात वह कुटकाचल की भूमी परम पवित्र तीर्थस्थल के रूप में सरवदा के लिए प्रतिष्थित
28:11हो गई.
28:12रिश्भदेव जी महाराज ने अपने इस निशकाम अवधूत आचरन से भावी मानव सभेता को परम वैराग्य का सरवोच्च आदर्श प्रदान
28:21किया.
28:23महर्शियों और योगियों ने उनके द्वारा दिखाए गए इस भागवत धर्म और ज्ञानमार को मोक्ष का प्रामानिक सोपान स्विकार किया.
28:32श्रीहरी के आठवें अवतार के रूप में रिश्भदेव जी का यह अवधूत चरित्र संसार को अनासक्ती और आत्मज्यान का शाश्वत
28:40संदेश दे गया.
28:41इस प्रकार कुटकाचल की पवित्र माटी में विलीन होकर भी भगवान रिश्भदेव की अमर गाथा संपूर्ण भारतवर्ष और ब्रहमांड में
28:51सदैव योगो योगो तक गूंजती रहेगी.
28:55कुटकाचल की शांत तपोमय भूमी में धगवान रिश्भदेव एक अविचल परवत की भांती गहन समाधी में लीन थे, जहां उनका
29:04चित्परम आत्मा में एक आकार हो चुका था.
29:08ग्रिश्मरितु अपने चरम पर थी, शुष्पतियां और टहनिया वन में सर्वत्र बिछी थी और हवा में एक अज्यात आशंका का
29:16मौन स्वर तैर रहा था.
29:19अचानक कहीं दूर से एक ननही सी चिंगारी ने अपना फन उठाया, जो सूखी हुई घास और जाडियों के बीच
29:26दबी थी, और धीरे-धीरे सुलगने लगी.
29:30चिंगारी देखते ही देखते एक क्षीन अगनी में परिवर्तित हो गई, जो वन की निचली परतों में सरकती हुई चुपचाप
29:38फैलने लगी, फिर भी ध्यानस्थ रिश्भदेव को उसका भान न हुआ.
29:43तब ही एक प्रचंड वायुवेग उठा, जिसने सुलगती हुई अगनी को भयंकर ज्वालाओं में बदलकर उसे चारों दिशाओं में तेजी
29:51से फैलाना आरंभ कर दिया.
29:54वह वनगनी अब एक भयावह दानव का रूप ले चुकी थी, जो क्षन प्रतिक्षन गरच्ती हुई, व्रिक्षों को निगलती हुई,
30:02रिश्भदेव के ध्यान स्थल की ओर बढ़ती जा रही थी.
30:06समस्त वन के प्राणी भयभीत होकर प्रानरक्षा हेतु इधर उधर भागने लगे, उनकी चीखें और गरजनाय अगनी की भयावह ध्वनी
30:15में विलीन हो रही थी, पर रिश्भदेव अडिग रहे.
30:19चारों ओर से उठती अगने की प्रचंड लप्टें उनके ध्यान स्थल को घेर चुकी थी, और तीवर उश्मा की लहरेन
30:27वातावर्ण में सपष्ट रूप से कमपकम पा रही थी.
30:31परम वैराग्य और आत्म ज्यान में लीन रिश्भदेव बिना किसी विचलित भाव के आखे बंद किये, अपने होठोन पर एक
30:39शांत मुस्कान लिए, समाधी में अडिक बैठे रहे.
30:44ज्वालाए अब उनके आसन को पूरी तरह से घेर चुकी थी, अत्यंत तीवर उश्मा हर ओर से प्रहार कर रही
30:51थी, फिर भी उनका दिव्य स्वरूप अक्षन बना हुआ था.
30:56उनके शरीर पर लिप्टा साधारन भगवा वस्त्र धीरे-धीरे सुलगने लगा, फिर देखते ही देखते जल उठा, पर उनके भौतिक
31:04देह पर किसी भी प्रकार के कष्ट या प्रतिक्रिया का कोई चिन्ह नहीं था.
31:09उनके देह से अब एक अध्भुत स्वर्निम प्रकाश निकलने लगा, जो बाहरी अगनी के प्रकोप का प्रतिरोध करते हुए उसे
31:17एक दिव्य रूपांतरन दे रहा था.
31:20बाहरी ज्वालाए अब उनके आंतरिक दैविये तेज में विलीन होने लगी, दोनों एक होकर एक अध्वितिय तीवर आध्यात्मिक अगनी का
31:29रूप धारन कर रहे थे.
31:32धीरे धीरे रिश्वदेव का भौतिक स्वरूप शुद्ध उर्जा में घुलने लगा, उनकी देह की रेखाय को मल होकर अद्रिश्य होने
31:40लगी, मानों वह भौतिक अस्तित्व से परे जा रहे हुँ.
31:44वह अब कोई ठोस प्राणी नहीं थे, बलकी प्रकाश का एक जिल मिलाता तेजों में रूप बन चुके थे, जो
31:52अगनी की प्रिश्थ भूमी के साथ सहच्ता से एकाकार हो रहा था.
31:57प्रकाश और अधिक तीवर हुआ, एक अत्यंत तेजस्वी स्तंभ का रूप धारण कर, अगनी के हृदय से स्वर्ग की ओर
32:04धीरे-धीरे उपर उठने लगा.
32:07देव लोग के अद्रिश्य जीव, मनुष्य आखों से ओजल रहते हुए भी, इस परम मुक्ती के क्षण के साक्षी बने,
32:15उनके चहरों पर विस्मय और श्रधा के भाव थे.
32:19प्रकाश का वह स्तंभ असीम आकाश में विलीन हो गया, अपने पीछे जलती हुई अगनी के भीतर एक अत्यंत शुद्ध
32:26और शान्त स्थान छोड़ गया.
32:29वनगनी अपना विनाशकारी पत जारी रखे हुए थी, पर वह विशिष्ट स्थान जहां रिश्भदेव ने ध्यान किया था, अचूता और
32:38आध्यात्मिक शान्ती से भरा रहा.
32:41अंत्य केवल एक महीन पवित्र भस्म उस पावन भूमी को चेहनित करती थी, जिससे एक सुक्ष्म दिव्य सुगंध निकल रही
32:49थी, जो उनके परम निर्वान की मूख साक्षी थी.
32:53उस पवित्र भस्म पर देवलोक से पारिजात के दिव्य पुष्पों की अनवरत वर्षा होने लगी, जिससे संपूर्ण वनक्षेत्र अलौकिक सुगंध
33:02से महक उठा.
33:04सत्यलोक में विराजमान परम्पिता ब्रह्मा और देवर्शी नारद ने भगवान रिश्भदेव के इस चरम वैराग्य को नमन करते हुए उनके
33:13वित्राग स्वरूप की स्तुती की.
33:16रिश्भदेव के इस अवधूत मार्ग ने संपूर्ण जगत को यह शाश्वत संदेश दिया कि वास्तविक सामराज्य प्रित्वी पर नहीं, अपितु
33:24अपनी ही इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने में हैं.
33:29उन्होंने संसार को यह प्रत्यक्ष दिखाया कि देहा भिमान से सर्वता मुक्ती ही परम स्वतंत्रता है और आत्मा ही संपूर्ण
33:37ब्रह्मान का एक मात्र अक्षय सत्य है.
33:41संपूर्ण आर्यावर्थ से महान रिशी और मुमुक्षु साधक उस पावन निर्वान स्थली पर पहुँचे और उस दिव्य भस्न को अपने
33:49मस्तक पर धारण कर कृतार्थ हुए.
33:53भगवान रिश्भदेव द्वारा अपने पुत्रों को दिये गए आत्मज्यान के दिव्य उकदेश सर्वदा के लिए मानव जाती का सर्वोच मार्गदर्शक
34:01बन गए.
34:03उनके जेश्ट पुत्र भरत ने अपने पिता के आदर्शों को शिरोधार्य करते हुए परम न्याय और धर्म के पथ पर
34:10राज्य का संचालन संभाला.
34:13राजा भरत के अत्यंत धर्म प्रायन और प्रजावत सल शासन के कारण यह विशाल अजनाब वर्ष संपून ब्रहमांड में शान्ती
34:21का प्रतीक बन गया.
34:24भरत के अग्वितिय चरित्र, सुशासन और महान भक्ती के कारण ही आगे चलकर इस पावन भूमी को भारतवर्ष के अमर
34:32नाम से जाना जाने लगा.
34:34भगवान विश्णो के इस लीलावतार ने यह सिद्ध किया कि परम पद की प्राप्ती के लिए बाह्य आडंबरों और अहंकार
34:42का त्याग अनिवार्य है.
34:45स्वर्ग में देवगन दुन्दुभी और वीना बजाकर रिश्भदेव के अनूठे त्याग और परम निर्वान की महिमा का गाथा गान कर
34:53रहे थे.
34:55देवर्शी नारद अपनी महिती वीना की मधूर तानों पर रिश्भदेव की इस वैराग्य गाथा को तीनों लोकों में गुंजायमान कर
35:03रहे थे.
35:04आगामी युगों के समस्त साधकों के लिए रिश्भदेव का अवधूत स्वरूप महमाया के जालों को काटने वाला एक प्रखर अस्त्र
35:12बन गया.
35:14उनका जीवन यह अमर संदेश देता है कि भगवान का सच्चा भक्त सभी भौतिक परिस्थितियों से परे रहकर सदैव आत्मानंद
35:22में लीन रहता है.
35:25भौतिक संपदा और विशाल सामराज्य के वलक्षन भंगुर स्वपन हैं, जबकि आत्मज्यान ही प्राणी का एक मात्र अविनाशी और वास्तविक
35:34धन है.
35:36राजा भरत भी राज्य के विशाल उत्तरदायत्वों को निभाते हुए अपने हृदय में पिता द्वारा रोपे गए वैराग्य के बीज
35:44को निरंतर सीच रहे थे.
35:47समस्त वेदों, शास्त्रों और पुराणों में रिश्भदेव के इस त्याग्मई जीवन को सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धी के रूप में प्रतिष्ठित किया
35:55गया.
35:56वह पावन वनक्षेत्र जहां रिश्भदेव ने अपनी दे का त्याग किया था, युगों-युगों तक ध्यान और घोर तपस्या का
36:04एक महातीर्थ बना रहा.
36:07अब यह महान गाथा रिश्भदेव के सुपुत्र राजा भरत के उस अध्भुत जीवन की ओर अग्रसर होती है, जिनका भक्ती
36:15पत्थ भी इतिहास में अमर हुआ.
36:17परम अवधूत भगवान रिश्भदेव के चर्णों में बारमवार प्रणाम, जिनका वैराग्य संदेश सदैव संपूर्ण मानवता को परम मुक्ती का मार्ग
36:27दिखाता रहेगा.
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