श्रीमद्भागवत महापुराण के इस अध्याय में देखिए सती के आत्मदाह और वीरभद्र द्वारा दक्ष के यज्ञ विध्वंस के बाद की महागाथा। जब भयभीत देवता ब्रह्माजी की शरण में गए, तो ब्रह्माजी उन्हें लेकर कैलाश पर्वत पहुँचे। भगवान शिव ने अपनी असीम कृपा से क्रोध त्याग कर दक्ष को बकरे के सिर के साथ पुनर्जीवित किया। यज्ञ पूर्ण हुआ और स्वयं भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए, जिन्होंने त्रिदेवों की एकता का परम रहस्य समझाया। जानिए कैसे सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। #BhagavataPurana #LordShiva #LordVishnu #DakshaYajna #Kailash #SpiritualHindi #SrimadBhagavatam #DakshaRebirth #ParvatiBirth
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00दक्ष के यग्य के विध्वन्स और वीर्भदर के भयंकर तांडव से किसी तरह अपनी जान बचाकर भैभीत, देवता और रिशिमुनी
00:08अत्यंत आकुल होकर भागने लगे।
00:36अकाश मार्ग घायल गंधरवों, अपसराओं और यक्षों के करोन करंदन से गूंज रहा था, जो वीर्भदर की सेना के तीखे
00:44बानों और प्रहारों से लहुलुहान हो चुके थे।
01:00भैसे कापते हुए सभी देवता और रिशि सत्यलोक के विशाल प्रवेश द्वार पर पहुँचे, जहां के रक्षकों ने उनकी दैनिय
01:08स्थिती देखकर तुरंट द्वार खोल दिये।
01:12देवता हाहाकार करते हुए ब्रहमाजी की दिव्य सभा में प्रविष्ठ हुए, जहां चारों और वेदों के उच्चारण की शांत तरंगे
01:20प्रवाहित हो रही थी।
01:23सभा के मध्य में स्रिष्टिकर्ता ब्रहमाजी अपने विशाल गुलावी कमल के आसन पर विराजमान थे, जिनके चारों मुखों से असीम
01:31शांती और तेज जलक रहा था।
01:35देवराज इंद्र ने व्याकुल होकर ब्रहमाजी के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया और थर्थराते हुए स्वर में दक्ष के यग्य
01:42के विनाश का सारा वृत्तान सुनाया।
01:46रिशी भेगु ने अपने हाथ जोड कर और सिर जुका कर स्विकार किया कि महादेव का अनादर करके उन सभी
01:53ने घोर पाप किया है, जिसका परिणाम यह विनाश है।
01:58अगनेदेव यमराज और अन्यघायल लोगपालों ने अपने जले हुए अंगों और शस्त्रों को दिखाते हुए महादेव के क्रोध से रक्षा
02:07की भीख मांगी।
02:08ब्रहमाजी ने अपने चारों मुखों से एक साथ गहरी सास ली और उनके चहरों पर महादेव के प्रती किये गए
02:17इस अपराद के लिए गंभीर चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
02:22स्रिष्टिकर्ता ने कुछ क्षणों के लिए अपनी आखे मूंद ली और ध्यानमग्न होकर कैलाश परवत पर विराजमान महादेव के गहरे
02:30शोक और क्रोध का साक्षात कार किया।
02:33पूरी सभा में सन्नाटा चा गया और सभी देवता उच्सुकता वभय के साथ ब्रहमाजी के नेत्र खुलने और उनकी दिव्यवानी
02:42सुनने की प्रतीक्षा करने लगे।
02:45जब ब्रहमाजी ने अपने नेत्र खोले तो उनके शांत मुख मंडल से एक आश्वासन देने वाली स्वर्ण में प्रकाश की
02:53तरंग निकली जिसने देवताओं के भय को कुछ कम किया।
02:57ब्रहमाजी ने गंभीर वानी में कहा कि यद्य के भाग के अधिकारी और जगत के स्वामी महादेव का अपमान करके
03:05दक्षने स्वयं अपने सर्वनाश को आमंत्रित किया था।
03:10रिशिमुनियों ने गलानी से अपने सिर जुका लिए क्योंकि वे समझ गए थे कि सती के आत्मदाह के समय उनका
03:17मौन रहना भी उनके पतन का कारण बना था।
03:21ब्रहमाजी ने मार्ग दिखाते हुए कहा कि अब केवल एक ही उपाय बचा है, हमें बिना देर किये महादेव के
03:29चर्णों में जाकर पूर्न आत्मस्मर्पन करना होगा।
03:33यह कहते हुए ब्रहमाजी अपने भव्य कमल आसन से खड़े हो गए और उनका विशाल दिव्य रूप देवताओं का नेत्रित्व
03:41करने के लिए तैयार हुआ।
03:43इस प्रकार ब्रहमाजी के नेत्रित्व में समस्त भयभीत देवगन और रिशिमुनी महादेव को प्रसन्न करने और क्षमा मांगने के लिए
03:52कैलाश परवत की और प्रस्थान करने लगे।
03:55ब्रहमाजी के नेत्रित्व में देवों और रिशियों का वह विशाल दल सत्यलोग की सीमाओं को पार कर दिव्य अंतरिक्ष मार्ग
04:03से आगे बढ़ने लगा।
04:06यात्रा के दौरान ब्रहमाजी के चारों मुखों से निरंतर वेदमंत्रों का पाठ हो रहा था ताकि शिव के क्रोध की
04:13तपन से इस ब्रहमांड को बचाया जा सके।
04:16भयभीत इंद्रदेव अपने एरावत हाथी का त्याग कर सामान्य याचक की भांती हाथ जोडे ब्रहमाजी के ठीक पीछे चल रहे
04:25थे।
04:26जैसे जैसे यह दिव्यदल प्रिथवी के धरातल की ओर बढ़ा, बादलों के बीच से विशाल और श्वेत हिमालय की परवत
04:34श्रिंखलाएं दिखाई देने लगी।
04:37महान रिशी भेगु और मरीची जो दक्ष के यग्य में शामिल थे, अत्यंत पश्चाताप के साथ अपने कमंडल्था में मौन
04:45खड़े मार्ग पर बढ़ रहे थे।
04:48प्रकृती ने भी अपनी चंचलता छोड़ दी थी और हवाओं का वेग थल पर अत्यंत शांत और गंभीर हो गया
04:55था।
04:57देवताओं ने मार्ग में बहती दिव्य नदियों को पार किया, जिनकी गर्जना अब महादेव के नाम की मंद ध्वनी में
05:04बदल चुकी थी।
05:06उचाई पर पहुँचते ही बरफीली चोटिया कैलाश की दिव्य और रहस्य में रजक आभा से चमकने लगी, जिससे सबका हृदय
05:14श्रद्धा से भर गया।
05:16शितिजपर अंतह परम पवित्र कैलाश परवत का विशाल शिखर दिखाई दिया, जो घने और अलोकिक बादलों से घिरा हुआ था।
05:26कैलाश की सीमाओं पर पहुँचते ही उनका सामना महादेव के उन भयानक शिवगणों से हुआ, जो मौन रहकर अपनी करूर
05:34दृष्टी से देवों को देख रहे थे।
05:36द्वार पर साक्षात नंदी महाराज अपने विशाल और तेजस्वी बैल रूप में खड़े थे, जिनके मस्तक पर चंद्रमा की हलकी
05:45किरने खेल रही थी।
05:48ब्रहमाजी ने आगे बढ़कर अत्यंत विनमर्ता से नंदी और द्वारपालों को नमन किया और महादेव से मिलने की अनुमती मांगी।
05:57नंदी की स्वीकृती मिलते ही कैलाश के दिव्यद्वार धीरे-धीरे खुले और भीतर का अलौकिक ग्रिश्ट देवों के सामने प्रकट
06:05हुआ।
06:07देवगन जमे हुए जहरनों और प्राचीन देवदार के व्रिक्षों के बीच से होकर गुजरे जहां पत्तों पर जमी बर्फ भी
06:14मोतियों की तरहे चमक रही थी।
06:17मार्ग में उन्हें कल्पवरिक्ष मिले जिनकी दिवे शाखाओं से मधुर और शांत करने वाली सुगंधित वायू प्रवाहित हो रही थी।
06:26कैलाश के इस अत्यंत पावन शेत्र में पहुँचते ही देवताओं के मन का सारा भय और संशय दूर होने लगा
06:33और वे शांती का अनुभव करने लगे।
06:37उन्होंने मानसरोवर जील के तटको छुआ जिसका स्थेर और निर्मल जल रात के आकाश और तारों को अपने भीतर समेटे
06:45हुए था।
06:47कुबेर और अन्य दिकपाल भी इस यात्रा के अंत में देवों के साथ जुड़ गए जिससे यह मिलन और भी
06:54भव्य बन गया।
06:56सामने ही एक विशाल और प्राचीन वटवरिक्ष के नीचे उन्हें महादेव का वह दिव्य रूक दिखाई देने लगा जो समाधी
07:04में लीन था।
07:06ब्रहमाजी ने सभी को एक निश्चित दूरी पर रोक दिया और स्वय महादेव के चर्णों में साष्टान प्रणाम करने के
07:13लिए आगे बढ़े।
07:15ब्रहमाजी ने महादेव के चर्णों में साश्टान प्रणाम करने के बाद अपने चारों मस्तक जुकाकर परम शांती का अनुभव किया
07:24और धीरे-धीरे उठकर खड़े हुए।
07:27तभी अनन्त समाधी में लीन भगवान शिव ने धीरे-धीरे अपनी शांत और करुणामई आखें खोली, जिससे पूरे कैलाश परवत
07:36पर एक अलौकिक दिव्य प्रकाश फैल गया।
07:39ब्रहमाजी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रस्वर में कहा कि दक्ष के यग्यका विनाश स्रिष्टी के संतुलन को बिगाड रहा है,
07:48इसलिए महादेव को अपनी क्षमा प्रदान करनी होगी।
07:52इंद्रक वरोन और अगने सहित सभी देवताओं ने भी शिवजी के सामने सिर जुका कर अपने अहमकार और मुकदर्शक बने
08:00रहने की भूल के लिए क्षमा मांगी।
08:02उसी क्षन एक अत्यंत दीप्तिमान नीली और सुनहरी आभा के साथ, जगत के पालनहार भगवान विश्णु भी वहाँ प्रकट हुए
08:11और उनके दर्शन मात्र से कैलाश धन्य हो उठा।
08:16भगवान विश्णु ने महादेव की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ कहा कि संसार की व्यवस्था बनाए रखने के लिए
08:23प्रजाप्ती दक्ष का जीवित होना और यग्य का पूर्ण होना अत्यंत आवश्चक है।
08:30विश्णु और ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर महादेव के मुख पर एक परमशांट और क्रिपालु मुस्कान तैर गई जिसने देवताओं के
08:39मन के सारे भय को क्षण भर में मिटा दिया।
08:42शिवजी ने अत्यंत गंभीर परंतु मधुरवानी में कहा कि वे कभी किसी से द्वेश नहीं रखते और दक्ष का दंड
08:50क्रोध के कारण नहीं बलकि उनके अहंकार के शोधन के लिए था।
08:55महादेव ने आदेश दिया कि दक्ष के धड़ पर एक यगिय बक्रे का सिर लगा कर उन्हें पुनर जीवित किया
09:02जाएं जो उनके विनष्ठ हो चुके अहंकार और समर्पन का प्रतीक होगा।
09:07देवशिल्पी विश्वकर्मा और अश्विनी कुमारों ने तुरंत महादेव की आग्या को शिरोधार्य किया और उस दिव्य यग्यक्षु के मस्तक को
09:17तैयार करने की तैयारी शुरू कर दी।
09:19भगवान शिव ने अपने दाहिने हाथ से संजीवनी उर्जा का एक अलौकिक प्रवाह उत्पन किया जो सीधे कंखल के यग्यकुंड
09:29की ओर बढ़ने लगा।
09:31वह दिव्य प्रकाश पुंज आकाश मार्ग से होता हुआ कंखल के उस विध्वनसित यग्यमंडप में पहुँचा जहां दक्ष का निश्प्रान
09:39शरीर पढ़ा हुआ था।
09:42कैलाश पर उपस्थित सभी देवगण और रिशिमुनी विस्मय से भर गए जब उन्होंने शिवजी के हृदय से निकलती हुई इस
09:50परमदयालुता की तरंगों को महसूस किया।
09:53महादेव अपनी समाधी के आसन को छोड़ कर धीरे धीरे उठ खड़े हुए, जिससे उनकी जटाओं से बहने वाली गंगा
10:01की धाराएं और भी अधिक वेग से प्रवाहित होने लगी।
10:05तभी स्वर्ग से देवताओं ने कल्पवरिक्ष के सुगंधित फूलों की वर्षा शुरू कर दी, जिससे पूरा कैलाश परवत हरी और
10:13हर के इस महामिलन की सुगंध से सराबोर हो गया।
10:17शिव और विष्णू ने एक दूसरे की ओर देखकर मौन में ही एकात्मता का वह संदेश दिया कि दोनों में
10:25कोई भेद नहीं है और वे एक ही परम सत्य के दो रूप हैं।
10:31ब्रहमाजी ने प्रसन्न होकर अपने चारों मुखों से वेद मंत्रों का सस्वर पाठ शुरू किया, जिससे समस्त ब्रहमाण में एक
10:38पवित्र और दिव्यस पंदन गूझ उठा।
10:42देवर्शी नारद ने अपनी महती वीना की तारों को जंकृत करते हुए महादेव की दया और क्षमाशील्ता के गीतों से
10:50पूरे वातावर्ण को भक्तिमय बना दिया।
10:53महादेव ने मुस्कुराते हुए सभी को आदेश दिया कि अब समया गया है कि वे सभी मिलकर कंखल चलें और
11:01दक्ष के यग्य को पूर्ण कर इस स्रिष्टी का कल्यान करें।
11:05इस प्रकार प्रिदेवों और समस्त देवों का वह भव्य और अलौकिक दल कैलाश की बरफीली चोटियों से नीचे की और
11:13प्रस्थान करने लगा, जिससे चारों और विजय और शांती का प्रकाश फैल गया।
11:19प्रिदेवों और समस्थ देवताओं का दल कैलाश से प्रस्थान कर अलकापुरी के अत्यंत शांत और अलोकिक वनों में प्रवेश करने
11:27लगा
11:28उस पावन वन के मध्य में एक अत्यंत विशाल और प्राचीन वटवरिक्ष दिखाई दिया जिसकी विशाल शाखाएं चारों और फैली
11:37हुई थी
11:38उस दिव्य वटवरिक्ष की शीतल चाया में महादेव शिव परम शांत मुद्रा में विराजमान थे जिनके मुख पर क्रोध का
11:46कोई चिनहशेश नहीं था
11:49महादेव का दिव्य स्वरूप एक परम योगी के रूप में अत्यंत देदी प्यमान था जिससे चारों और असीम शांती और
11:57ज्ञान की किरने फूट रही थी
12:00उनके चर्णों के समीट सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार नामक परम ज्ञानी रिशी मौन रहकर आत्म ज्ञान का अनुभव
12:08कर रहे थे
12:10शिव के परम भक्त गण जो पहले अत्यंत संहारक रूप में थे, अब अपने अस्त्रशस्त्रों को त्याग कर शांत भाव
12:17से शिवस्तुती में लीन थे
12:20भगवान विश्णु और ब्रहमा जी ने शांत रूप धरे महादेव के इस अलोकिक और सौमे स्वरूप को देखकर अत्यंत आदर
12:28के साथ अपने हाथ जोड लिए
12:31महादेव ने अपनी ध्यानमगन आखे धीरे-धीरे खोली, जिन में संपूर्ण ब्रहमांड की करुणा और असीन प्रेम स्पष्ट जलक रहा
12:40था
12:41देवर्शी नारद ने अपनी सुरीली वीना को मौन कर उस दिव्य शांती के वातावर्ण में महादेव के चर्णों में अत्यंत
12:49आदर पूर्वक शीष जुकाया
12:51उसी क्षण वटवरिक्ष की कोमल पत्तियों से होकर दिव्य पवन बहने लगी और शांत वातावर्ण में देवताओं पर सुगंधित पुष्पों
13:00की वर्शा होने लगी
13:02स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा जी ने आगे बढ़कर महादेव की असीम महिमा और उनके परम कल्यानकारी स्वरूप की भावपूर्ण वंदना
13:11की
13:12शिव ने मौन रहकर ही अपनी अंगुलियों से चिनमुद्रा प्रदर्शित की जिससे वहाँ उपस्थित सभी रिशियों को परम सत्य का
13:20साक्षात ज्यान प्राप्थ हुआ
13:23महर्शि भेगू और अन्य रिशियों का पूर्व संचित अहंकार और अज्यान महादेव के उस करुणामई शांत कटाक्ष मात्र से पूरी
13:32तरह नश्ठ हो गया
13:34जगत के पालनहार भगवान विश्णु ने महादेव से स्रिश्टी के संतुलन के लिए दक्ष के अधूरे यग्य को पुनह प्रारंभ
13:41करने का निवेदन किया
13:44महादेव ने बिना किसी संकोच या रोश के अत्यंत उदारता पूर्वक मुस्कुराते हुए यग्य को पूर्ण करने के प्रस्ताव पर
13:52अपनी सहमती दे दी
13:54भगवान शिव के परमस ने ही वाहन नंदी ने अपने स्वामी के चर्णों के पास बैठ कर अपनी बड़ीब्री आखों
14:01से उन पर अगाथ प्रेम बरसाया
14:05अलकापुरी के उस पावन वन के हिंसत पशु और पक्षी भी अपनी स्वाभाविक शत्रुता भूलकर उस वट्वरिक्ष के नीचे अत्यंत
14:13शांती से एकत्रित हो गए
14:15उपस्थित सभी देवताओं को यह भली भानती आभास हो गया कि महादेव का क्रोध केवल कल्यानकारी था और उनका वास्तविक
14:24स्वरूप केवल अनंत प्रेम ही है
14:27परम आदर और श्रद्धा से भरे सभी देवगण महादेव के साथ कंखल की ओर प्रस्थान करने के लिए पूरी तरह
14:35सज्ज और आतुर हो उठे
14:38वटवरिक्ष की शीटल छाया से उठकर जैसे ही महादेव आगे बढ़े संपूर्ण स्रिष्टी में कल्यान, शांती और परम ज्यान की
14:46एक नई लहर दोड़ गई
14:49जैसे ही महादेव कंखल के भस्म हुए यज्यमंडप के निकट पहुँचे, ब्रहमाजी अत्यंत विनय और भावुक्ता के साथ उनके सम्मुक
14:58हुपस्थित हुए
15:00ब्रहमाजी ने अपने चारों मस्तक जुका कर और चारों हाथ जोड कर परमपिता महादेव की करुणा का आहवान करते हुए
15:08अपनी स्तुती आरंभ की
15:11ब्रहमाजी ने कहा कि है सर्वेश्वर आप स्रिष्टी के सहारक होकर भी इसके परम सनरक्षक और परम सत्यका साक्षात स्वरूप
15:19है
15:21उन्होंने महादेव को स्मरण कराया कि आपका क्रोध कभी विनाशकारी नहीं बलकि केवल अग्यान और अहंकार को मिटाने वाला परम
15:30कल्यानकारी दंड है
15:33ब्रहमाजी ने अत्यंत संताप के साथ स्वीकार किया कि प्रजाप्ती दक्ष का घमंड और अग्यान ही इस विनाशकारी आपदा का
15:41मूल कारण बना
15:43ब्रहमाजी की आखों में अश्रु भरकर उन्होंने प्रार्थनाकी की है आशुतोष अपनी करुणा की द्रिष्टी इस उजडे हुए यग्यस्थल पर
15:52डाले
15:53उन्होंने महादेव की महिमा गाते हुए कहा कि आप तो मात्र भक्ती से प्रसन्न होने वाले भोलेनाथ हैं जो अपने
16:01शरंगत को कभी निराश नहीं करते
16:05ब्रहमाजी ने महादेव से याचना की की वे वीर्भदर के क्रोध का शिकार बने निर्दोष देवों और रिशियों को पुनह
16:12जीवन दान दे
16:14उन्होंने याद दिलाया कि आपके आशिरवाद के बिना कोई भी यग्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता क्योंकि आप ही यग्य
16:22के असली स्वामी है
16:25ब्रहमाजी ने निवेदन किया कि दक्ष के इस अधूरे यग्य को पूरा करने की अनुमती देकर ब्रहमाण्डिय संतुलन को पुनह
16:32स्थापित करें
16:35ब्रहमाजी ने शिव के सनातन स्वरूब की स्थुती करते हुए उन्हें समस्त वेदों, काल और धर्म की मर्यादा का परम
16:42स्रोत बताया
16:44उन्होंने उपस्थित सभी सभास्दों को समझाया कि हरी और हर में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही परम सत्ता
16:52के रूप हैं
16:54ब्रहमाजी के इन ज्यान भरे और करुनावर्धक वचनों को सुनकर वहां उपस्थित सभी महर्शी और देवता भाव विभोर हो उठे
17:04ब्रहमाजी ने आगे बढ़कर महादेव के पावन चर्णों में अपना शीश नवाया और संपूर्ण ब्रहमांड की ओर से क्षमायाचना की
17:13ब्रहमाजी की भावुक स्तुती की तरंगों से कन्खल का वह विनाश्युक्त वातावर्ण अचानक परमशान्ती और पवित्रता से भर गया
17:22महादेव की तीसरी आख की ज्वाला शान्त हो गई और उनके मुख पर एक अलोकिक अत्यंत सौमय और क्षमाशील मुस्कान
17:31तैराई
17:32ब्रहमाजी ने आगे कहा कि हे प्रभु आपकी क्रिपा से ही इस स्रिष्टी की मर्यादा और धार्मिक व्यवस्था पुनह संचालित
17:40हो सकती है
17:43उन्होंने महादेव से दक्ष को एक नया जीवन और एक नया विवेक प्रदान करने का विशेश अनुग्रह किया
17:51समस्त देवगण और रिशिमुनी भी ब्रहमाजी के पीछे पंक्ति बद्ध होकर महादेव के समक्ष नत्मस्तक हो गए
17:59ब्रहमाजी की निश्चल भक्ती और स्तुती से संतुष्ठ होकर महादेव ने संपून ब्रहमांड के कल्यान हेतू क्षमा प्रदान करने का
18:07संकल्प लिया
18:09ब्रहमाजी और देवगणों की करुण पुकार सुनकर परम दयालू महादेव के मुख पर असीम करुणा की एक मंद मुस्कान बिखर
18:17गई
18:19सदाशिव ने अत्यंत मधूर और गंभीर स्वर में कहा कि वे अज्यानी बालकों के प्रती कभी भी अपने मन में
18:26कोई वैर या क्रोध नहीं रखते
18:29महादेव के इन अमरित्मई वचनों को सुनकर देवराज, इंद्र, रिशिमुनी और समस्त देवता राहत की एक गहरी सांस लेने लगे
18:39भगवान शिव ने अपने परम भक्त वीरभदर को आदेश दिया कि यग्यशाला में जाकर उस यग्ये बक्रे के सिर को
18:46ढूंध निकाला जाए
18:48शिवजी की आग्या पाकर वीरभदर और नंदी तुरंत विध्वन्स हुई यग्यशाला के मलबे और भस्म के ढेर में उस बक्रे
18:56के सिर की खोच करने लगे
18:59यग्यकुंड के समीप बिखरी हुई राख और सुलक्ते कोयलों के बीच से वीरभदर को वह दिव्य यग्ये बक्रा प्राप्थ हुआ
19:08अत्यंत आदर और भक्ती के साथ वीरभदर ने उस बक्रे के सिर को लाकर महादेव और ब्रहमाजी के चर्णों में
19:15समर्पित कर दिया
19:17महादेव ने अपनी करुणामई द्रिष्टी से उस कटे हुए बकरे के सिर को देखा और उसे अपने दिव्यतेश से अभिमंत्रित
19:25कर दिया
19:27इसके बाद महादेव के संकेत पर सभी देवता और विशिमुनी दक्ष के उस निर्जीव सिर्विहीं शरीर के समीक पहुँचे
19:46उने जैसे ही अपनी उंगलियों से दक्ष के कंठ का स्पर्श किया उनके भीतर से एक दिव्य प्राणमई उर्जा प्रवाहित
19:54होने लगी
19:55देखते ही देखते दक्ष के उस निश्परान शरीर की धमनियों में रक्त का संचार होने लगा और त्वचा पर एक
20:03स्वर्णिम आभा चमक उठी
20:06एक गहरी और भारी सांस लेते हुए प्रजाप्ती दक्ष अपनी नई बक्रे के सिर्वाली आकृती के साथ पुना जीवित हो
20:14उठे
20:15जीवित होते ही दक्ष ने व्याकुलता से अपने शरीर और नए चेहरे को छुआ जिससे उनका पुराना अहंकार क्षन भर
20:23में नश्ट हो गया
20:25उनका पुराना अभिमान पूरी तरह तूट चुका था और उनकी बुद्धी में अब परमज्ञान, विवेक और आत्मसाक्षातकार का उदे हो
20:34गया था
20:36आसुओं से भरी आँखों के साथ बकरे के सिरवाले राजा दक्ष तुरंत महादेव के चर्णों में गिर पड़े और बार
20:43-बार उनसे क्षमा मांगने लगे
20:45उसी क्षन यग्यशाला के उपर आकाश मार्ग से एक अत्यंत तीवर और अलौकिक प्रकाश पुन्च प्रकट हुआ, जिससे पूरा वातावर्ण
20:55आलोकित हो गया
20:57उस परम जोती के बीच से स्वय जगत के पालनहार भगवान श्री हरी विश्णू अपने पूर्ण वैभव के साथ वहां
21:04अवत्रित हुए
21:06शिव और विश्णू ने एक दूसरे की ओर देखकर अत्यंत आदर और प्रेम से भरी मुस्कान बिखेरी, जिससे यह सिद्ध
21:14हुआ की वे दोनों एक ही है
21:17ब्रह्मा, विश्णू और महेश के इस त्रिमूर्ती स्वरूप के महामिलन को देखकर समस्त ब्रह्मांध हर्शित हो उठा और चारों और
21:26जैजैकार होने लगी
21:28भगवान, शिव, श्री हरी, विश्णू और ब्रह्माजी की सहमती पाकर महर्शि भ्रिगू और देवगण नश्ठ हुए यग्यमंड़क के पुरुद्धार की
21:37तैयारी करने लगे
21:39वीर्भद्र और शिवगणों ने अत्यंत आदर पूर्वक प्रजाप्ती दक्ष के सिरहीन धड को यग्यवेदी के मध्यभाग में लाकर स्थापित किया
21:49महादेव के निर्देशानुसार रिशियों ने यग्यवख्रे का शीश लाकर प्रजाप्ती दक्ष के कटे हुए धड से सन्युक्त कर दिया
21:58त्रिलो की नाथ शिव ने अपने करुणामय नेत्रों से उस निश्प्रान धड की ओर देखा और अपनी दिव्य संजीवनी द्रिश्टी
22:05उस पर डाल दी
22:08शिवक्रिपा की परम चेतना प्रवाहित होते ही प्रजाप्ती दक्ष की छाती में हृदय पुनह धड़कने लगा और शरीर में प्राणों
22:15का संचार हो गया
22:17अजामुख धारन की ये प्रजाप्ती दक्ष ने जैसे ही अपनी आखें खोली उनके समक्ष साक्षात महादेव परम तेजस्वी रूप में
22:26विराजमान दिखाई दिए
22:28जिस शिव का उन्होंने सार्वभावमिक तिरसकार किया था उन्हें ही अपने सामने क्षमा और प्रेम की मूर्ती बने देखकर दक्ष
22:37के बक्रे रूपी नेत्रों से आसुओं की धारा बहन निकली
22:41दक्ष का बरसों पुराना मिथ्या अहंकार और अभिमान क्षन भर में भस्म हो गया और उनका सम्पून अस्तित्व केवल भक्ती
22:49और समर्पन में बदल गया
22:52पश्चाताप से भरे दक्ष तुरंत महादेव के श्रीचर्णों में साष्टान प्रणाम कर गिर पड़े और अपने अपराधों की क्षमा मांगने
23:00लगे
23:02रुन्धे हुए गले और आसों से भीगे मुख से प्रजाप्ती दक्ष ने शिवजी की स्तुती करते हुए उनके अनंत गुनों
23:09का गान प्रारंब किया
23:11दक्ष ने अपने मुख से स्वीकार किया कि शिव ही समस्थ जगत के आदी और अंत हैं तथा उनके बिना
23:19कोई भी यग्यया धर्म पूल्ण नहीं हो सकता
23:23आशुतोष शिव ने अत्यन्त दयालुता से अपने भक्त दक्ष को उठा कर गले से लगाया और उनके समस्थ पापों को
23:30ततकाल क्षमा कर दिया
23:33शिव और दक्ष के इस पावन मिलन को देख कर भगवान विश्नु और ब्रहमाजी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अंतरिक्ष से
23:40पुषपवर्शा की स्वीकृती दी
23:43दक्ष की पत्नी प्रसूती ने अपने पती को पुनर जीवित देख कर अश्रु पुरुष नेत्रों से महादेट के चर्णों में
23:50अपना मस्तक जुका दिया
23:53महाज्यान की प्राप्ती के पश्चात सभी रिशियों ने यग्य मंडप को पुनस्वच कर मंत्रों चार के साथ पवित्र अगनी को
24:01प्रजवलित किया
24:03पुनर्जन्म पाय प्रजाप्ती दक्षने स्वया हाथों में सुवा और आज्य पात्र लेकर यग्य की पूर्णाहुती देने का पावन संकल्क लिया
24:12दक्षने सर्वोच यग्यभाग सबसे पहले देवाधिदेव महादेव शिव को अर्पित किया जिससे संपूर्ण यग्यभूमी दिव्य तेज से जग्मगा हुठी
24:23भग्वान शिव और भग्वान विश्नु दोनों ने एक साथ यग्य का हविश्य स्विकार करके यह सिद्ध कर दिया कि वे
24:31दोनों अभिन्न है
24:33यग्य की पूर्णा हुती होते ही देवताओं ने दुन्दुभी बजाई और आकाश से मंदाकिनी के दिव्य पुष्पों की वर्षा होने
24:41लगी
24:43धर्म और भक्ती की विजय स्थापित कर परम दयालू भग्वान शिव समस्थ देवों से विदाले कर कैलाश परवत की ओर
24:50प्रस्थान कर गए
24:52यग्य की पूर्णाहुती के पश्चात समस्थ देवगणों के हिदय में भक्ती की मंद धुन गुम्ज रही थी फिर भी यग्यशाला
25:00में हुई पिछली भयावा घटना की चाया अभी भी शेश थी
25:05देवगणों के मध्य बैठे ब्रहमा जी के चारों मुखों पर शान्ती और चिंता का मिलाजुला भाव स्पष्ट जलक रहा था
25:13क्योंकि दक्ष प्रजाप्ती के भविश्य का प्रश्न अभी भी अनुत्तरित था
25:18ठीक उसी क्षण आकाश में एक तीवर शंकनाद हुआ जिसकी प्रतिध्वनी संपूर्ण ब्रहमांड में व्याप्त हो गई और उसने सभी
25:27उपस्थित देवगणों का ध्यान अपनी और आकर्शित कर लिया
25:32शंकनाद के साथ ही शितिज से एक अध्भुत स्वर्णिम प्रकाश पुन्च प्रकट हुआ जिसने धीरे धीरे पूरे आकाश को अपनी
25:40भव्यता से भर दिया
25:43दिव्य प्रकाश इतना तीवर था कि वह क्षण भर के लिए सभी की आखों को चौनधिया गया जो यह संकेत
25:50था कि कोई परम सक्ता प्रित्वी पर अवत्रित हो रही है
25:55और फिर उस अग्भुत प्रकाश के भीतर से भगवान विष्णु अपने भव्य वाहन गरूर पर विराजमान होकर प्रकट हुए जिनकी
26:03आभासे संपूर्ण यग्यशाला प्रकाशित हो उठी
26:08गरूर धीरे धीरे यग्यशाला के केंद्र में अवत्रित हुए जहां श्री हरी के आगमन से प्रत्येक कन दिव्य उर्जा से
26:15स्पंदित होने लगा
26:17ब्रहमा सहित समस्त देवगन और रिशियों ने परमश्रधा और आदर के साथ भगवान विश्नु के समक्ष साष्टान प्रणाम किया
26:26मानो संपून स्रिष्टी उनके चर्णों में नत्मस्तक हो
26:30भगवान विश्नु ने अपनी शांत नीली आखों से यग्यशाला का अवलोकन किया
26:36और उनकी द्रिश्टी दक्ष प्रजापती के कटे हुए धड़ पर जाकर टिक गई
26:41ब्रहमा जी अत्यंत विनमर्ता से अपने हाथों को जोडे हुए
26:46श्री हरी के समीप आये और दक्ष के अहंकार और उसके विनाश की पूरी कथा सुनाने लगे
26:53भगवान विश्नु ने गहन गंभीरता से ब्रहमा जी के शब्दों को सुना
26:57उनके मुख पर दिव्यशांती और ब्रहमांडिय संतुलन के प्रती उनकी अटूट प्रतिबधता जहलक रही थी
27:05तब श्री हरी ने अपनी दिव्यवानी में घोशनाकी की यग्य को पूर्ण करना और दक्ष को पुना जीवित करना ब्रहमांडिय
27:13व्यवस्था के लिए अनिवार्य है
27:16भगवान विश्णु ने उपस्थित देवगणों को निर्देश दिया कि वे शीघरता से दक्ष के धड़ के लिए उप्युक्त मस्तक की
27:24खोच करें ताकि यग्य की बाधा दूर हो सके
27:28आग्या पाकर एक दिव्य प्राणी ने त्वरित गती से एक बक्रे का सिर लाकर भगवान विश्णु के समक्ष प्रस्तुत किया
27:37अपनी असीन दिव्य शक्ती से श्री हरी ने बकरे के सिर को दक्ष प्रजापती के धर से जोड़ दिया जिससे
27:44एक अध्वितिय और विस्मयकारी द्रिश निर्मित हुआ
27:48जैसे ही बकरे का सिरजुडा, दक्ष प्रजाप्ती पुनह जीवित हो उठे, किन्तु उनके मुख पर विस्मय, पश्चाताप और गहरी आत्मगलानी
27:57के भाव थे
27:59श्री हरी ने दक्ष पर अपना आशिर्वाद बरसाया और उन्हें भविश्य में महादेव के महत्व को समझने और उनका आदर
28:07करने का निर्देश दिया
28:09इसके उपरांत भगवान विश्नु ने सभी उपस्थित जनों को शिव और अपनी अभिन्ता का परम ज्यान प्रदान किया
28:17यह समझाते हुए कि वे एक ही परम सत्ता के दो स्वरूप है
28:23उनके ज्यानपूर्ण वचनों के साथ ही आकाश में क्षन भर के लिए महादेव शिव का एक तेजस्वी दिव्यरूप प्रकट हुआ
28:30जो शिव विश्नु के महामिलन और उनकी शाश्वत एक्ता का प्रतीक था
28:36यग्य की सफलता पूर्वक समापती और ब्रहमांडिय व्यवस्था की बहाली के साथ भगवान विश्नु ने अपनी अंतिन क्रिपा बरसाई और
28:45सभी देवों को गेहन शान्ती में छोड़ कर वैकुंठ के लिए प्रस्थान करने लगे
28:51भगवान विश्नु के वैकुंठ प्रस्थान करते ही यग्यशाला में सुनहरी दिव्यधूली और ब्रहमांडिय प्रकाश की एक किरण शेश रह गई
28:59जिसने उपस्थित रिशियों को त्रिगुणमई एक्ता के गेहन ध्यान में लीन कर दिया
29:05अपने दिव्यकमल पर विराजमान सृष्टी के रचिता ब्रहमाजी ने अपनी आखें बंद कर ली और त्रिदेवों की शाश्वत एक्ता को
29:14अपने अंतर्मन में महसूस करते हुए सृष्टी, स्थिती और लएके स्पंदन को एक माना
29:21बक्रे का सिर्धारन की ये प्रजाप्ती दक्ष ने परम विनमर्ता से अपना मस्तक जुकाया क्योंकि उन्हें अब भलीभांती आभास हो
29:29चुका था कि उनका पूर्ववर्ती अहंकार शिव और विश्णु में भेद करने के अज्ञान से जन्मा था
29:37महर्शी भेगू और अन्य पुरोहितों ने यग्य की पवित्र अगनी को शांत करते हुए यह अनुभव किया कि इस यग्य
29:44की वास्तवित आहुती उनके स्वयंके अहंकार और भेद बुद्धी का समर्पन थी
29:50देवराज, इंद्र और अन्य लोगपालों ने एक दूसरे की ओर आत्मज्यान से भरी द्रिष्टी से देखा क्योंकि महादेव और नारायन
29:58के बीच के कल्पित भेद का भ्रम अब सदा के लिए तूट चुका था
30:04देवर्शी नारद ने अपनी महती वीना के तारों को जंकृत करते हुए हरीहर की एकात्मता का एक अत्यंत मधुर और
30:11दिव्यभजन गाना प्रारंभ किया जिससे संपूर्ण वातावर्ण भक्तिमय हो उठा
30:18हिमाले के धवल शिखर कैलाश परवतपर बाघंबर पर आसीन महादेव शिव ने अपनी समाधी से धीरे-धीरे नेत्र खोले और
30:26संसार में पुनह स्थापित हुए इस परम अग्वैत भाव को देख कर मंदमंद मुस्कुराएं
30:32शिव के प्रल्यंकारी गण जो पहले क्रोध से उद्वेलित थे अब भगवान विश्णों के पार्षदों के साथ प्रेम पूर्वक गले
30:40मिले और ब्रहमांडी मिलमिलाप के इस उत्सव में आनंद पूर्वक नरित्य करने लगे
30:47यग्यशाला में उपस्थित प्रक्तियक रिशी और देवता के हृदय में हरीहर का एक अत्यंत प्रकाशमान दिव्यरूप क्षन भर के लिए
30:55चमका जिसने अध्वैत दर्शन की सत्यता को उनके अंतहकरण में सदा के लिए अनकित कर दिया
31:02कंखल की वह यग्यभूमी जो कभी विध्वन्स और रक्तपात की गवाह बनी थी अब चमतकारी रूप से खिले हुए कमलों
31:10और दिव्य सुगंध से महकते हुए एक परम पवित्र तपोवन में परिवर्तित हो गई
31:16प्रजाप्ती दक्ष ने परम पावन गंदाजल को अपने मस्तक पर छिड़कते हुए स्वयन को शुद्ध किया जिससे उनका मन पूरी
31:24तरह निश्पाप होकर महादेव के प्रती अनन्य भक्ती से भर गया
31:29पितामा ब्रह्मा ने मौन को तोड़ते हुए सभा को संबोधित किया और कहा कि जो अज्यानी जन स्रिष्टी के करता,
31:37भरता और संहरता में अंतर देखते हैं, वे जनमुमृत्यू के चक्र में भटकते रहते हैं
31:44दिव्य लोग से इस द्रिष्य को देख रहे महर्शी दधीची का हरिदय अत्यंत हर्ष से भर गया, क्योंकि सनातन धर्म
31:51की मर्यादा और त्रिदेवों की एक्ता का यह संदेश ब्रहमांड में पुनरस्थापित हो चुका था
31:58पतित पावनी गंगा और यमुना की लहरें एक अलौकिक निर्मलता के साथ बहने लगी, मानो वे पृत्वी के कंकन को
32:06अध्वैत ज्यान के इस पावन संदेश से सिंचित कर रही हो
32:11संपूर्ण सभाने उठकर उस चुन्य आकाश की ओर अंतिम प्रणाम निवेदित किया जहां अभी कुछ समय पूर्व भगवान विश्नु खड़े
32:19थे, जिनकी दिव्य उपस्थिती अभी सबके हरिद्यों में स्पंदित हो रही थी
32:25कैलाश से महादेव शिव ने दक्ष और देवताओं की इस निश्कपट भक्ती को स्विकार करते हुए अपना अभय मुद्रा वाला
32:33हाथ उठाया, जिससे संपूर्ण चराचर जगत में शांती की शितलता फैल गई
32:39हिमाले की बरफीली चोटियों के ऊपर छाई हुई अज्ञानता की धुन्ध पूरी तरह चंट गई और सूर्य की सुनहरी किरने
32:47प्रिथवी पर चारों और फैलकर ज्ञान के नए युग का शंखनात करने लगी
32:52महर्शि भेगु ने ताड के पत्तों पर श्रीमत भागवत के इस परम पावन प्रसंग को लिपिबध करना प्रारंब किया ताकि
33:00आने वाली पीढियां शिव और विश्नु की अभिनता के इस दिव्य सिधान्त को जान सके
33:07ज्यान की इस दिव्य जोती को अपने अंतह करण में समेटे हुए सभी रिशिमुनी और देवता शान्ति पूर्वक अपने अपने
33:15लोकों की ओर प्रस्थान करने के लिए सज्ज हुए
33:19संपूर्ण ब्रह्मांड में ओम की एक महाध्वनी गूज उठी जिसने ब्रह्मा, विश्नु और महेश की शक्तियों को पुनह एक अनंत
33:27और शाश्वत प्रकाशपुंज में विलीन कर दिया
33:31उसी ब्रह्मांडिय प्रकाशपुंज से सती का पावन अन्श एक अत्यंत तेजस्वी दिव्य जोती के रूप में हिमवान के हिमाच्छादित परवतों
33:39की ओर तीवर गती से प्रवाहित होने लगा
33:43परवत्राज हिमवान और उनकी धर्म पत्नी महारानी मेनावती ने आदिशक्ती को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने के लिए
33:51कठोर और निश्चल तपस्या प्रारंब की
33:54उनकी अगाध् भक्ती से प्रसंद होकर साक्षात जगदंबा आदिपराशक्ती अपने चतुर्भुज दिव्य रूप में महारानी मेनावती के समक्ष प्रकट हुई
34:06आदिपरा शक्ती के वर्दान के प्रभाव से मेनावती के गर्भ में दिव्य जोती का संचार हुआ और हिन्वान का संपूर्ण
34:13महल एक अपूर्व प्रकाश से आलोकित हो उठा
34:17शुभ नक्षत्रों के अत्यंत पावन संयोग में महारानी मेनावती ने एक परम सुन्दर और दिव्य आभा से युक्त कन्या को
34:25जन्म दिया जिसका मुखमंडल पूर्णिमा के चंद्रमा के समान दीप्तिमान था
34:31जगन माता के इस धरा पर शुभागमन से संपूर्ण हिमालय परवत प्रफुलित हो उठा नदिया निर्मल धारा बनकर बहने लगी
34:39और आकाश से दिव्य देवगणों ने पुश पवर्शा की
34:44परवतराज हिमवान ने अपनी प्रानप्रिय पुत्री को अपनी गोद में उठाया और उसका नाम पार्वती रखा जो आगे चलकर उमा
34:52के नाम से भी विख्यात हुई
34:55एक शुभ दिन देवर्शी नारद अपनी वीना बजाते हुए हिमवान के भव्य राजदर्बार में पधारे ताकी वे उस दिव्य बालिका
35:03को अपना मंगलकारी आशिर्वाद दे सके
35:07देवर्शी नारद ने रहस्योद घाटन करते हुए बताया कि यह कोई साधारन कन्या नहीं
35:13अपितुस्वयन सती का पुनरजन्म है जो घोर तपस्या के उपरांत पुनह महादेव को प्राप्त करेंगी
35:21जैसे जैसे पारवती बड़ी होने लगी उनके मन में शिव के प्रती अगाध प्रें स्वतह ही जागरत हो गया और
35:28वे दिनरात महादेव के ध्यान में मगन रहने लगी
35:32दूसरी और सती के वियोग से दुखी देवाधिदेव महादेव कैलाश परवत पर एकांत में भस्म लगाएं बाहरी संसार से विमुख
35:41होकर परम समाधी में लीन थे
35:44महादेव की इस घोर समाधी को देखकर समस्थ देवता चिंतित थे क्योंकि वे जानते थे कि केवल शिव और शक्ती
35:52के मिलन से ही स्रिष्टी का कल्यान संभव है
35:56अपने जीवन के एक मात्र लक्षे को प्राप्त करने के लिए युवा पार्वती ने अपने मातापिता से वन में जाकर
36:04महादेव के लिए कठोर तप करने की अनुमती मांगी
36:08मातापिता की आग्यापाकर पार्वती ने अपने समस्त राजसी वस्त्रों और आभूशनों का त्याग कर दिया और वलकल वस्त्र तथा रुद्राक्ष
36:17धारण कर लिये
36:19उन्होंने ग्रीश्म रितु के तप्त सूर्य के नीचे अपने चारों और प्रजवलित पंचगनी के बीच बैठकर महादेव की घोर तपस्या
36:28प्रारंब की
36:30वर्षा रितु के भीशन जंजावातों, गरस्ते बादलों और मूसलाधार वर्षा के बीच भी वे एक पैर पर खड़ी रहकर अविचलित
36:38भाव से शिव का नाम जबती रही
36:41शीत रितु के प्रचंड हिंपात में, जब साधारन जन का जीवन ठहर जाता है, तब पार्वती ठंडे बरफीले जल में
36:49आकंठ खड़ी होकर तपस्या करती रही
36:53अन्ता उन्होंने पेडों से गिरने वाले सूखे पत्तों को खाना भी छोड़ दिया, जिससे उनका नाम अपरना पड़ा, और वे
37:00केवल वायू का सेवन कर तप में लीन रही
37:04पार्वती की इस पराकोटी की तपस्या से उत्पन्न दिव्य आध्यात्मिक ताप संपूर्ण ब्रहमांड में फैलने लगा, जिससे देवगण चकित और
37:13हर्शित हो उठे
37:15अंत्र उस निश्चल और परम पावन प्रेम की उश्मा कैलाश तक पहुँची, जिसने महादेव के युगो पुराने ध्यान को भंकर
37:23उनके नयन धीरे-धीरे खोल दिये
Comments