ध्रुव महाराज के दिव्य शासन के बाद, उनके वंश में जन्म लेता है एक क्रूर और अधर्मी राजा, वेन! ✨ उसकी निरंकुशता और धर्म-विरोधी कार्यों से पृथ्वी पर हाहाकार मच जाता है। ऋषि-मुनियों के अथक प्रयासों के बावजूद, वेन अपने पापों से विमुख नहीं होता, जिसके कारण उसका दुःखद अंत होता है। लेकिन क्या पृथ्वी पर फैली अराजकता का अंत हो पाएगा? देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, स्वयं भगवान विष्णु राजा पृथु के रूप में अवतरित होते हैं, जो धरती को एक गौ माता के रूप में दोहन कर समस्त प्रजा के लिए अन्न और समृद्धि प्रदान करते हैं। यह कथा है एक नए युग की शुरुआत की, जहां धर्म और न्याय पुनः स्थापित होता है। #BhagavataPurana #MaharajaPrithu #KingVena #PrithuAvatar #HinduMythology #Purana #MythologicalSeries #Devotion #Spirituality #YouTubeIndia #Dharma #EarthStory #AncientIndia
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00:00महाराज उत्तानपाद के सेवानिवरित्थ होने के बाद माता सुनीती के पावन मार्क दर्शन में युवा ध्रुव ने अलकापुरी के वैभवशाली
00:08राजसिनहासन को सुशोभित किया
00:11माता सुनीती ने प्रतिदिन ध्रुव को राजधर्म और प्रजापालन के सुक्ष्म रहसियों से अवगत कराया, जिससे उनके हृदय में न्याय
00:19की अखंड जोती प्रजवलित हुई
00:22राज्या भिशेक के शुब अवसर पर संपूर्ण सामराज्य को स्वर्ण और पुश्पों से सजाया गया, जहां रिशियों ने ध्रुव के
00:30मस्तक पर पवित्र राज्मुकुट स्थापित किया
00:34ध्रुव ने अपने न्याय पूर्ण शासन से प्रजा के हर वर्ग को समान सुख प्रदान किया, जिससे उनके राज्य में
00:41कभी कोई दुखी या भूखा नहीं रहा
00:44महाराज ध्रुव के पुन्य प्रताप से संपून प्रकृती अत्यंत प्रसन्न थी, जिसके कारण फसलों में अभूतपूर्व वृध्धी हुई और नदिया
00:53अमृत्तुल्य जल प्रवाहित करने लगी
00:56धर्म की रक्षा के लिए महाराज ध्रुव ने अनेक विशाल यग्यों का आयोजन किया, जिसमें स्वयन देवगन हविर्भाग ग्रहेन करने
01:05के लिए यग्य भूमी पर प्रकट हुए
01:08जब यक्षों ने ध्रुव के भाई उत्तम का वध कर दिया, तब ध्रुव ने अपनी विशाल सेना के साथ अलकापुरी
01:15पर आक्रमन कर अपनी अदमे वीर्था का परिचय दिया
01:19युद्ध भूमी में जब यक्षों का विनाश होने लगा, तब स्वयन स्वायं भूव मनु ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए और
01:27उन्हें क्रोध त्याग ने तथा क्षमा का मार्ग अपनाने की सलाह दी
01:32अपने परम पूर्वज मनु के वचनों को शिरोधार्य करते हुए ध्रुव ने ततकाल युद्ध को रोक दिया, जिससे स्रिष्टी में
01:39पुनह शांती और न्याय की स्थापना हुई
01:43ध्रुव की इसक्षमाशीलता से अत्यंत प्रसन होकर धन के देवता कुबेर प्रकट हुए और उन्होंने ध्रुव को अमर्यश और अनंत
01:52आध्यात्मिक वैभव का वर्दान दिया
01:55ध्रुव ने अगले 36 सहसर वर्षों तक इस प्रित्वी पर धर्म, नीती और मर्यादा का पालन करते हुए एक छत्र
02:03राज्य किया
02:04जीवन के अंतिन पड़ाव पर पहुँचकर महाराज ध्रुव के मन में संसार के प्रती पूर्ण वैराग्य उत्पन हो गया और
02:12उन्होंने अपने जेश्ट पुत्र को राजपाट सौंपने का निर्णय लिया
02:17अपने पुत्र उत्कल को राजमुकुट पहना कर महाराज ध्रुव ने राजसी वस्त्रों का त्याग किया और केवल वलकल वस्त्रधारण कर
02:26वन की ओर प्रस्थान किया
02:29हिमाले की पवित्र कंदराओं में स्थित बद्रिक आश्रम पहुँचकर ध्रुव ने भगवान विश्णु के परम स्वरूप का ध्यान करते हुए
02:36घोर तपस्या प्रारंभ की
02:39ध्यान की पराकाश्था में ध्रुव का मन भगवान श्रीहरी के चर्णों में ऐसा लीन हुआ कि उनका संपून अस्तित्व ही
02:46दिव्य जोती में विलीन होने लगा
02:49तभी आकाश से एक अत्यंत दिव्य और देदी प्यमान विमान प्रकट हुआ जो वैकुंट के अधिपती भगवान विश्णु के दूतों
02:58द्वारा लाया गया था
03:00विमान से भगवान विश्णु के दो प्रिय पार्शद नंद और सुनंद अत्यंत सौमय रूप धारन कर प्रकट हुए और उन्होंने
03:08ध्रुव को सादर प्रणाम किया
03:11जब ध्रुव विमान पर सवार होने लगे तब स्वय मृत्यु देव वहां उपस्थित हुए और ध्रुव ने उनके मस्तक पर
03:18अपना पैर रख कर मृत्यु को पराज़ित किया
03:22स्वर्ग के देवता और गंधर्व ध्रुव पर पुश्पों की वर्शा करने लगे और संपून ब्रहमांड उनके इस अलोकिक गमन का
03:30साक्षी बना
03:32अंतर ध्रुव महाराज ब्रहमांड के सर्वोच्चक और अविनाशी धाम ध्रुव लोक में स्थापित हुए जो आज भी ध्रुवतारे के रूप
03:40में आकाश में चमकता है
03:43ध्रुव लोक में ध्रुव के प्रतिष्थित होने के बाद प्रित्वी पर उनके वंश ने धर्म के पत का अनुसर्ण करते
03:50हुए शासन करना जारी रखा जिससे राज्ज में शांती और सम्रिध्धी बनी रही
03:56इस प्रतापी वंश में उनके पुत्र उत्कल ने अपने पिता के आदर्शों को धारन करते हुए न्याय और धर्म की
04:04धोजा को और भी उचा उठाया
04:07उन्होंने अपनी प्रजा को पुत्रवत पालन किया जिससे राज्ज में सुक्षान्ती और सम्रिध्धी की अविरल धारा प्रवाहित हुई
04:16उत्कल के पश्चात उनके वंश में अनेक धर्मी राजाओं ने जन्म लिया जिन में से एक थे प्रतापी महाराज वत्सर
04:23जिन्होंने अपने पूर्वजों के यश को अक्षुन बनाय रखा
04:29महाराज वत्सर ने अपने काल में न्याय और सुशासन की ऐसी मिसाल पेश की जिसने राज्य की नीन्व को और
04:36भी सुद्रिड किया
04:38समय का चक्र निरंतर घूमता रहा और पीढी दर पीढी ध्रूव के वंशच प्रित्वी पर धर्म की पता का फहराते
04:45रहे
04:46इसी क्रम में एक तेजस्वी राजा अंका उदे हुआ जो अपने धार्मिक स्वभाव और प्रजाप्रेम के लिए विख्यात थे
04:56उन्होंने अनेक अश्वमेध, यग्य और अन्यधार्मिक अनुष्ठान कर देवताओं को प्रसन्न किया और धर्म के सिध्धान्तों को द्रिड़ता से स्थापित
05:05किया
05:06उनके शासनकाल में राज्य धन्धान्य से परिपूर्ण था और प्रजा सुखमय जीवन व्यतीत कर रही थी
05:14परंतु समय के साथ साथ इस महान वंश की पवित्रता में धीरे-धीरे कमी आने लगी और नैतिक मुल्यों का
05:21हरास होना शुरू हो गया
05:24इसी पतनशील काल में राजा अंग के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम वेन था और जो अपने
05:31पूर्वजों के विप्रीत अत्यंत क्रूर और अधर्मी स्वभाव का था
05:36बच्पन से ही वेन में कुरूरता और असिशनुता के बीज पनपने लगे थे जो धीरे-धीरे एक विशाल विशवरिक्ष का
05:44रूप ले रहे थे
05:46अपने पुत्र के इस दुष्ट स्वभाव को देखकर महाराज अंग अत्यंत व्यथित और चिन्तित रहने लगे उनके मन की शांती
05:54भंग हो चुकी थी
05:56उन्होंने वेन को धर्म और नीती का मार्ग सिखाने का हर संभव प्रयास किया
06:01किन्तु वेन ने अपने पिता के सभी उपदेशों को तिरसकार पूर्वक ठुकरा दिया
06:07वेन की उद्दंडता और अहंकार दिनों दिन बढ़ता गया
06:11और वह अपनी इच्छाओं की पूर्ती के लिए किसी भी सीमा को पार करने को ततपर रहता था
06:18अपने पुत्र की दुष्टता से निराश होकर महाराज अंगने राज्य के भविश्य के बारे में गंभीर चिंता करना प्रारंभ कर
06:25दिया
06:27अंतह उन्होंने यह स्विकार कर लिया कि ऐसा पुत्र सिनहासन के योग्य नहीं है और उन्होंने राज्य के भार से
06:35स्वयं को मुक्त करने का निर्णे लिया
06:38अपने समस्त राज्य सी वैभव को त्याग कर दुखी हरिदय से महाराज अंग शांत वन की ओर प्रस्थान कर गए
06:45अपने पुत्र वेन को राज्य का उत्तराधिकारी बना कर
06:50महाराज अंग के वन्गमन के पश्चात अहंकारी वेन ने बलपूर्वक सिनहासन पर अधिकार कर लिया जिससे राज्य में एक अंधकार
06:58में युग का आरंभ हुआ
07:01सिनहासन पर बैठते ही वेन ने सभी धार्मिक अनुष्थानों और यग्यों पर प्रतिबंध लगा दिया
07:07स्वयं को एक मात्र इश्वर घोशित कर समस्थ प्रजा को अपने अधीन कर लिया
07:14अत्याचारी राजा वेन के कुशासन में समस्थ यग्य और अनुष्थान बंध हो जाने के कारण
07:19यग्यभाग न मिलने से देवता निर्बल हो गए और धर्ती माता ने भी अपनी अनुथ पादन की शक्ती को समेट
07:26लिया जिससे प्रजा भूख से तडपने लगी
07:30स्रिष्टी में बढ़ते अधर्म और हाहाकार को देख कर रिशी भ्रेगु के नेत्रित्व में समस्थ तेजस्वी रिशिमुनी इस घोर संकट
07:38का समाधान निकालने के लिए एक स्थान पर एकत्रित हुए
07:43संसार के कल्यान की इच्छा से प्रेरित होकर सभी रिशिमुनी अत्यंत शांत और गंभीर भाव से अत्याचारी वेन की राजसभा
07:52में पहुँचे ताकि उसे धर्म का मार्ग दिखाया जा सके
07:56रिशि भ्रिगुने अत्यंत विनमरता पूर्वक राजा वेन को समझाया की राजा का परम धर्म प्रजा का पालन करना और यग्यों
08:04द्वारा भगवान विश्नु को प्रसन्न कर राज्य में समरिध्धी लाना है
08:10सज्जनों के उपदेश को धिकारते हुए अहंकारी वेन क्रोध से लाल हो गया और उसने स्वयंको ही समस्त देवताओं से
08:18श्रिष्ट और एक मात्र पूजनिय घोशित कर दिया
08:22वेन के मुख से भगवान विश्नु और धर्म के प्रती ऐसे घोर अपमानजनक शब्द सुनकर क्रोधित रिशियों ने अपनी तपोबल
08:30की शक्ती से उसे भस्म करने का संकल्प लिया
08:34रिशियों द्वारा उच्चारित हुंकार मंत्र की तीवर ध्वनी और उनके क्रोध की अगनी से अधर्मी राजा वेन के प्रान पकेरू
08:42उड़ गए और वह निश्प्रान होकर भूमी पर गिर पड़ा
08:46पुत्र की मृत्यू का समाचार पाकर विलाप करती हुई माता सुनिता वहां पहुँची और उसने अपने विशेश तांत्रिक मंत्रों और
08:55औशधियों के बल पर वेन के शरीर को सड़ने से बचा कर सुरक्षित रख लिया
09:01बिना राजा के राज्ज में अराजकता फैल गई चारों और डकैतों और लुटेरों का आतंक बढ़ गया और निरील प्रजारक्षा
09:08की पुकार करने लगी
09:11राज्य को पूरी तरह नश्ट होने से बचाने के लिए रिशियों ने वेन के शरीर का मन्थन कर एक नए
09:18और योग्य शासक को जन्द देने का निर्णय लिया
09:22जब रिशियों ने सबसे पहले वेन की जंगाओं का मन्थन किया, तो उससे काले कोईले जैसी त्वचावाला एक बौना पुरुष
09:30उत्पन हुआ, जिसने वेन के सारे पापों को अपने भीतर समाहित कर लिया
09:36रिशियों ने उस पापी पुरुष को निशाद नाम दे कर वन में चले जाने का आदेश दिया, जिसके बाद वह
09:42घने जंगलों की ओर प्रस्थान कर गया
09:46ततपश्चात, जब रिशियों ने वेन की दाहिनी भुजा का मन्थन किया, तो उसमें से साक्षात भगवान विश्नु के अंश से
09:53अत्यंत तेजस्वी और दिव्यबालक महाराजा प्रिथु का प्राकट्य हुआ
09:58उसी दिव्यक्षन में प्रिथु के साथ ही माता लक्ष्मी के अंश से उत्पन हुई उनकी परम सुन्दरी और पतिवर्ता अर्ची
10:06नामक कन्या का भी जन्म हुआ, जो उनकी अर्धांगिनी बनी
10:11रिशिमुनियों और देवताओं ने हर्शोल लास के साथ प्रिथु और अर्ची का राज्या भिशेक किया और उन्हें इस प्रिथवी का
10:19पहला धर्म प्रायन समराट घोशित किया
10:23सिन्हासन पर बैठते ही भूख से व्याकुल प्रजा महाराजा प्रिथु के पास आई और उनसे जीवन रक्षा के लिए अन्न
10:30प्रदान करने की करोन गुहार लगाने लगी
10:34प्रजा की दुर्वशा देखकर क्रोधित होकर समराट प्रिथु ने अपने दिव्य धनुष और बान उठा लिये ताकि वे धर्ती माता
10:42को दंडित कर उनसे पुनह अन्न प्राप्त कर सके
10:46प्रिथु के क्रोध से भैभीत होकर प्रिथवी देवी एक गाय का रूप धारन करके ब्रहमांड के तीनों लोकों में अपनी
10:53रक्षा के लिए भागने लगी
10:56जब प्रिथवी को यह एसास हुआ कि वे स्वयन साक्षात विश्नु अवतार प्रिथु के बानों से नहीं बच सकती तो
11:04उन्होंने भैभीत होकर आत्मस्मरपन कर दिया और राजा के समक्ष हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई
11:11प्रिथवी माता के परामर्ष पर महाराजा प्रिथु ने स्वयंभू मनु को बच्छडा बनाकर धर्ती रूपी गाय का दोहन किया जिससे
11:19समस्ट जीवंदाइनी ओश्धिया अन्न और वनस्पतिया पुन्ह उत्पन्न हो गई
11:25प्रिथु के अनुसर्ण में महर्शियों ने देवगुरु ब्रिहस्पती को बच्छडा बनाकर धर्ती रूपी गौसे परम पवित्र वेद ज्ञान, तपस्या और
11:33ब्रहम तेज का दोहन किया
11:36इसके पश्चात समस्थ देवगणों ने देवराज इंद्र को बच्छडा बनाकर पृत्वी से अमरित, शक्ती और असीम मानसिक बल रूपी दूध
11:44प्राप्त किया
11:46दानवों और दैतियों ने भक्त प्रहलाद को बच्छडा बनाकर पृत्वी डेडी से मदिरा, लौर धातु और मायावी आसुरी शक्तियों का
11:54दोहन किया
11:56गंधर्वों और अपसराओं ने विश्वावसु को बच्छडा बनाकर धर्ती माता से दिव्य संगीट, अनुपम सौंदर्य और मनमोहक सुगंध का रसनिकाला
12:07पित्रिग्णों ने अर्यमा को बच्छडा बनाकर अपनी आत्मा की संतुष्टी के लिए धर्ती से परम पवित्र स्वधारूपी अन्न प्राप्त किया
12:16नागों और सर्पों ने तक्षक नाग को बच्छडा बनाकर प्रित्वी से अत्यंत तीवर विश और मस्तक पर धारन करने वाली
12:24मनिया प्राप्त की
12:26समस्त जीवों की त्रिप्ती देखकर महाराजा प्रित्व का हृदय वात्सल्य से भर गया और उन्होंने प्रित्वी को अपनी पुत्री स्विकार
12:34करके उन्हें प्रित्वी नाम दिया
12:37प्रिथवी को मानव निवास के योग्य बनाने के लिए महाराजा प्रिथु ने अपने विशाल धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर उचे-उचे
12:46परवतों को सम्तल कर दिया
12:48इसके बाद महाराज प्रिथु ने नगरों, ग्रामों, दुर्गों और सुन्दर बस्तियों का निर्मान करवाकर व्यवस्थित मानव समाज की नीव रखी
12:58प्रिथु के धर्मनिष्ट शासन में प्रिथवी के समतल मैदानों पर क्रिशी, पशुपालन और व्यापार का अभूतपूर्व विकास होने लगा
13:07संपूर्ण धर्ती भाय, दरिद्रता, अकाल और रोगों से मुक्त हो गई और चारों और केवल सुख और समरिधी की गूंच
13:15सुनाई देने लगी
13:17परमिश्वर श्री हरी विश्णू की प्रसन्नता के लिए महाराजा प्रिथु ने एक सौ अश्वमेध यग्यों का महान अनुष्ठान प्रारंभ किया
13:27जब 49 यग्य सफलता पूर्वक संपन हो गए तो देवराज इंद्र अपने सिनहासन के छिन जाने के भैसे इर्ष्या में
13:35जलने लगे
13:37अन्तिम सोवे यग्य के समय इंद्र ने एक पाखंडी सन्यासी का छद्मवेश धारन करके यग्य के पवित्र अश्व को चुपके
13:44से चुरा लिया
13:47महाराज पृथु के वीर पुत्र ने इंद्र का पीछा करके उन्हें ललकारा और उस पाखंडी वेश को उजागर करते हुए
13:54पवित्र घोडे को मुक्त कराया
13:57इंद्र ने बार-बार विभिन चलकपट भरे रूप बदल कर घोडे को चुराने का प्रयास किया जिससे क्रोधित होकर राजा
14:05पृथु ने अपना धनुष उठा लिया
14:08धर्म का अनादर करने वाले देवराज का अंत करने है तु प्रिथु जैसे ही बान चलाने वाले थे संपून ब्रहमांड
14:15उनके क्रोध से काम उठा
14:18तब ब्रहमा जी स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने प्रिथु को समझाते हुए इंद्र का वध करने से रोका कि उनका
14:25यश पहले ही अमर हो चुका है
14:28इसके पश्चात साक्षात भगवान विश्नु प्रकट हुए और उनके साथ आये इंद्र ने लजजित होकर महाराजा प्रिथु से अपने अपराध
14:38की ख्षमा मांगी
14:40प्रिथु ने इंद्र को उदार्ता पूर्वक्ट शमा कर दिया और भगवान विश्नु के वर्दान से कई युगों तक एक आदर्ष
14:47और न्यायप्रिय समराठ के रूप में राज्य किया
14:51महाराज प्रिथु के न्यायपूर्ण शासन के कई युगों के पश्चात धर्म की सुनहरी आभा धीरे-धीरे क्षीन होने लगी और
14:59प्रिथवी पर एक बार फिर अंधकार का सामराठ जिछाने लगा
15:04तब अंग्देश में वेन नामक एक क्रूर शासक का उदे हुआ जिसकी आत्मा अहंकार और अधर्म से दूशित थी और
15:12उसने अपनी प्रजा पर अत्याचारों का तांडव शुरू कर दिया
15:17वेन ने समस्त यग्यों और धार्मिक अनुष्ठानों पर प्रतिबंध लगा दिया घोषणा की की केवल उसी की पूजा की जाएगी
15:25और किसी अन्य देवता का नाम लेना भी अपराध होगा
15:30राजा की कुरूरता से त्रस्ट प्रजाभूक, भय और अधर्म के अंधकूप में धकेल दी गई, जहां हर दिन मृत्यू एक
15:37भयावह सक्य बन गई थी
15:40प्रकृती का संतुलन बिगडने लगा, नदिया सूखने लगी और धर्ती पर अकाल का भयंकर साया मंदराने लगा, जिससे सभी जीव
15:49त्राहित्राही करने लगे
15:51इस विकट स्थिती को देख कर, दूर तपस्या में लीन महान रिशिमुनियों के हृदय में भी करुणा और क्रोध की
15:58ज्वाला धधक उठी
16:01ज्ञान और तपस्या के पुंच, महर्शी अत्री, वशिष्ट और नारत सहित सभी प्रमुख रिशिमुनी एक विशाल सभा में एकत्र हुए
16:09ताकि इस आपदा का समाधान खोज सके
16:13गेहन विचार विमर्ष के बाद उन्होंने निर्णै लिया कि वे स्वयन वेन के समक्ष उपस्थित होंगे और उसे धर्म के
16:21मार्ग पर लोटने का अंतिम अफसर प्रदान करेंगे
16:25रिशियों का समोह अपने अलौकिक तेज से प्रकाशित होता हुआ वेन के भव्य किन्तु अंधकार में राजमहल की ओर बढ़ा
16:33जहां हर पत्थर पर अत्याचारों की गाथा लिखी थी
16:38वेन अपने राजदर्बार में बैठा था जहां चाटुकारों की भीड उसे निरंकुष सत्ता के भ्रम में लिप्त रखे हुए थी
16:45और उसके मुख पर अहंकार की भयावः चाया थी
16:50जैसे ही रिशियों ने राजदर्बार में प्रवेश किया एक अलौकिक शान्ती चागई और वेन के दर्बारी भय तथा विसमय से
16:58मौन हो गए
17:00महर्शी अत्री अपने दिव्यतेज और गंभीर वानी के साथ वेन के सम्मुख खड़े हुए और उसे धर्म के सनातन सिध्धान्तों
17:08का स्मरण कराया
17:11रिशियों ने वेन से प्रजा काहित करने यग्यों को पुनह आरंभ करने और देवताओं के प्रती श्रढधा रखने का आग्रह
17:18किया ताकि प्रिथवी पर पुनह शान्ती स्थापित हो सके
17:23उन्होंने वेन को उसके पाप कर्मों के भयावः परिनामों से अवगत कराया, चेतावनी दी की अधर्म का मार्ग अंत्त विनाश
17:31की ओर ही ले जाता है
17:34परंतु वेन अपनी निरंकुष सत्ता के नशे में चूर रिशियों की बातों पर उपहास करते हुए मुस्कुराया, जैसे उनकी दिव्यचेतावनी
17:43का उस पर कोई प्रभाव न पढ़ा हो
17:46उसने गर्जनाकी की वह ही एक मात्र इश्वर है, उसी की पूजा होनी चाहिए और यग्यव्यर्थ के अनुष्ठान है जो
17:54उसकी सत्ता को चुनौती देते हैं
17:58वेन ने रिशियों को अपमानित किया, उनके ज्ञान को तुछ बताया और उन्हें अपने राज्ज से चले जाने का आदेश
18:05दिया, अपनी निरंकुष सत्ता का प्रदर्शन करते हुए
18:10वेन की हटधर्मिता और अपमान्जनक शब्दों से रिशियों का दिव्य तेज क्रोध की अगनी में परिवर्तित होने लगा और उनके
18:18मुख मंडल पर प्रचंड रोश जलक उठा
18:21क्रोधित होकर रिशियों ने वेन को अंतिम चेतावनी दी कि यदि वह तुरंट अपने मार्क से नहीं लोटा तो उसे
18:29अपने दुशकर्मों का विनाशकारी फल भोगना पड़ेगा
18:33परंतु वेन अपनी हठ धर्मिता पर अडिग रहा उसने रिशियों की बातों को अंसुना कर दिया और अपनी निरंकुष सत्ता
18:41को ही सर्वोप्री माना
18:43आथर रिशियों ने यह समझ लिया कि वेन को समझाना असंभव है और अब उसे उसके पापों के लिए दंडित
18:51करना ही एक मात्र मार्क शेश है
18:55रिशियों ने देखा कि वेन की आखों में पश्चाताप की एक भी किरन नहीं थी बलकि उसके मुख पर अहंकार
19:02और उपहास की गहरी छाया थी
19:05उनके मन में वेन की अधार मिक्ता के प्रती गहरा क्षोब और क्रोध उमर पड़ा जैसे शांत सागर में अचानक
19:13प्रचंड लहरेंग उठने लगी हो
19:16उनकी योगशक्ती जिसे उन्होंने युगों की तपस्या से अरजित किया था अब उस अधर्मी राजा को दंडित करने के लिए
19:24जागरित हो उठी
19:26वेन अपनी मूर्खता और सत्ता के मद में चूर रिशियों की बढ़ती हुई शक्ती को केवल एक निरर्थक प्रदर्शन समझ
19:34कर उपहास करता रहा
19:36तब रिशियों ने अपनी योग शक्ती को केंद्रित करते हुए वेन को उसके पापों का अंतिम और अवश्यमभावी दंड देने
19:44का संकल्क लिया
19:46उनकी सामुहिक शक्ती से एक अग्रिश्य प्रचंड उर्जा का स्रोत उत्पन हुआ जिसने वातावर्ण को कमपन से भर दिया
19:55वेन भले ही क्षन भर के लिए विचलित हुआ अपनी हटधर्मिता पर अड़ा रहा यह सोचकर की कोई भी उसे
20:02सिनहासन से नहीं हटा सकता
20:05रिशियों के नेत्रों से अब सिर्फ करुणा नहीं बलकी न्याय की प्रचंड अग्नी प्रजवलित हो रही थी जो वेन के
20:13अंत की ओर संकेट कर रही थी
20:16आथख एक स्वर में उन्होंने अपनी समस्थ तपस्या का बल एकत्रित कर हुंकार का महानात किया जिसने ब्रहमांड को भी
20:24हिला दिया
20:25वह हुकार कोई साधारन ध्वनी नहीं थी बलकी साक्षात काल का गर्जन था जो वेन के पापी अस्तित्व को जड़
20:33से मिटाने आया था
20:36शन भर में वेन के शरीर में तीवर कमपन उत्पन हुआ उसकी आखे भय और पीड़ा से फटी रह गई
20:44उसके भीतर की सारी शक्ती अहंकार और प्रान उर्जा एक साथ बिखरने लगी जैसे रेट का महल गिर रहा हो
20:53वेन ने एक अंतिन भयावः चीख मारी जो उसकी सत्ता के अंत और उसके दुशकर्मों के भयावः परिनाम का प्रतीक
21:01थी
21:02उंकार की प्रचन शक्ती ने वेन के प्रानों को उसके शरीर से ततकाल प्रिथक कर दिया जिससे वहक्षन भर में
21:10निश्प्रान हो गया
21:12महाराजा वेन का विशाल अहंकारी शरीर एक भारी निश्प्रान बोज की तरह उस भव्य सिनहासन के समक्ष भूमी पर गिर
21:20पड़ा
21:21उनकी योग शक्ती से वेन के शरीर से उत्पन हुई अगने की लप्ते धीरे धीरे शान्त हुई और एक गहरी
21:29भयावः शान्ती चागई
21:31वेन के वद से प्रित्वी पर एक शनिक शान्ती चागई जैसे किसी भयंकर तूफान के बाद समुद्र शान्त हो गया
21:39हो
21:41किन्टु यह शान्तीक शन्भंगुर थी क्योंकि राजाविहीन प्रिथवी पर अब अराजक्ता और असुरक्षा का भयानक शूनि उत्पन्न हो गया था
21:50बिना किसी शासक के धर्म और व्यवस्था भंग होने लगी जिससे डाकू और दुष्ट आत्माए निर्भय होकर विचर्ण करने लगी
22:00प्रिथवी माता जो स्वयं एक गाय का रूप धारन किये थी अपने दुखों से त्रस्थ होकर फिर से रिशियों से
22:08सहायता की याचना करने लगी
22:11प्रित्वी माता की करोन पुकार से द्रवित होकर सब्तर्शियों सहित समस्त्रिशिगन एक गहन सभा में एकत्र हुए, जहां उनके माथे
22:19पर चिन्ता की लकीरें और आखों में लोककल्यान का द्रिड संकल्प स्पष्ट जलक रहा था
22:26उन्होंने मन्थन किया कि किस प्रकार वेन के दुष्ट शासनकाल से उत्पन हुए अंधकार को मिटा कर पुन्ह धर्म की
22:34स्थापना की जा सके और प्रित्वी को एक योग्य शासक प्रदान किया जा सके
22:40अनेक विचार विमर्ष के बाद रिशियों ने वेन के वंश को पूर्णतह नश्ट न करने का निर्णय लिया बलकि उसके
22:47शरीर के भीतर से ही एक शुद्ध और धर्मात्मा उत्तराधिकारी को उत्पन करने का असाधारन उपाय खोज निकाला
22:56इसलिए उन्होंने वेन के मृत शरीर को एक पवित्र अनुष्ठान के लिए तैयार किया जहां उसकी अशुद्धियों को दूर करने
23:04और एक नया जीवन अंकुरित करने का संकल्प लिया गया
23:09ततपश्चात उन्सिध रिशियों ने अपने हाथों से वेन की जांगों का मन्थन करना आरंभ किया जैसे सागर का मन्थन हुआ
23:17था ताकि उसके शरीर में समाहित समस्थ पाप और अधर्म बाहर निकाले जा सकें
23:24जैसे जैसे मन्थन गहराता गया वेन के शरीर से काला, दुर्गंधमय और भयावह मेल निकलना शुरू हुआ जो उसके जीवन
23:33भर के पापों और दुष्ट कर्मों का घनीभूत रूप था
23:37उस मेल से एक भयंकर, काले रंका, ठिगना और विक्रित प्राणी प्रकट हुआ, जिसकी आखे लाल और शरीर पापों से
23:46लिप्ट था, जो वेन के सभी दुर्गुनों का प्रतीक था
23:50इस विक्रित प्राणी को देखकर, रिशियों ने उसे निशीद अर्थात बैठ जा कहा, जिससे वह निशाद नाम से जाना गया,
23:58और उसने समस्थ पापों को अपने में समाहित कर लिया
24:02इस प्रकार, निशाद ने वेन के शरीर से सभी पापों का मैल ग्रहन कर लिया, जिससे वह शरीर अब शुद्ध
24:09और पवित्र हो गया, जैसे किसी गहन शुद्धी यग्य के बाद
24:15पापमुक्त वेन के शरीर को देख, रिशियों ने एक बार फिर उसे अत्यंत श्रद्धा से मन्थना प्रारंब किया, इस आशा
24:23से कि अब कोई दिव्य और धर्मात्मा स्वरूप प्रकट होगा
24:27इस बार मन्थन से कोई अंधकार नहीं, बलकि एक अद्भुत और तेजस्वी प्रकाश पुंज वेन के शरीर से फूट पड़ा,
24:35जो पूरे वातावर्ण को दैविय आभा से भर रहा था
24:40धीरे धीरे उस प्रकाश पुंज ने एक दिव्य आकार लेना शुरू किया, जिसमें एक शक्तिशाली भुजाए और एक तेजस्वी काया
24:48के सपष्ट संकेट दिखाई देने लगे
24:51और फिर सभी की आखों के सामने वेन के शरीर से महाराजा प्रिथु का दिव्य अवतार प्रकट हुआ, जिनकी काया
24:59सूर्य के समान तेजस्वी और भुजाए विशाल थी
25:03प्रिथु का स्वरूप इतना अलौकिक था कि उनके एक हाथ में दिव्य धनुष और दूसरे में बानशो भायमान थे, मानों
25:12वे धर्म की रक्षा के लिए ही अवतरत हुए हूँ
25:15उनके आगमन पर आकाश में देवताओं के वाद्य यंत्रबज उठे, अपसराओं ने निरित्य किया और गंधर्वों ने स्तुती गान किया,
25:24जिससे तीनों लोग पुलकित हो उठे
25:28रिशियों ने प्रिथु के दिव्यतेज और राजसी लक्षणों को देख कर तुरंट उन्हें प्रिथवी का नया समराट घोशित किया, जिनके
25:36आगमन से युगों का अंधकार छंटने वाला था
25:40उन्होंने प्रिथु को वेन के राज्य का अधिपती बना कर सभी लुटेरों और अधर्मियों को चेतावनी दी कि अब धर्म
25:47का नया रक्षक अवतरित हो चुका है
25:51महाराजा प्रिथु के मात्र अस्तित्व से ही धर्ती पर फैली अराजकता और भय की काली छाया स्वतह ही विलीन होने
25:59लगी, जैसे सूर्य के उदे से अंधकार मिट जाता है
26:04प्रिथवी माता, जो अब तक एक दुर्बल गाय के रूप में विलाप कर रही थी, महाराजा प्रिथु के दिव्यतेज को
26:11देखकर एक नई आशा से भर उठीन, उनके आखों में कृतग्यता के अश्रुच छलक आए
26:18महाराजा प्रिथु ने अपने दिव्य धनुष को उपर उठाया, और उनकी आखों में धर्ती को पुनह समरिध करने तथा धर्म
26:26की पुनस्थापना करने का द्रिड संकल्प चमक रहा था, जैसे कोई महान योध्धा अपने मिशन पर निकलता है
26:35महाराजा प्रिथु ने जब अपने विशाल धनुष की प्रत्यंचा को खीचा, तब उपस्थित रिशिगन उनके इस अध्भुत और अलौकिक रूप
26:43को देखकर श्रधा से नत्मस्तक हो गए
26:47महर्शी भेगु ने अपने तपोबल से महाराजा प्रिथु के दिव्य मस्तक पर तिलक लगाया और उन्हें प्रिथवी के कल्यान के
26:54लिए विजय का आशिरवाद दिया
26:57अपने गंभीर और मेग के समान गरचते हुए स्वर में महाराजा प्रिथु ने रिशियों को आश्वस्त किया कि वे इस
27:05त्रस्थ और भूखी मानवता को पुनह खुशाल बनाएंगे
27:09उसी क्षन गाय का रूप धारन किये हुए प्रिथवी देवी का पती हुई महाराज प्रिथु के निकट आई और उनके
27:17चर्णों में गिरकर अभायदान की याचना करने लगी
27:21महाराज प्रिथु ने अत्यंत करुणा और द्रिड़ता के साथ प्रिथवी माता के पीठ पर हाथ फेरा और उनसे संसार के
27:29पोशन के लिए अपने अन्न और आश्धियों को पुनह प्रकट करने को कहा
27:34प्रिथवी माता ने कमपित स्वर में उत्तर दिया कि दुष्ट राजा वेन के अत्याचारों के कारण उन्होंने सारे बीज और
27:42वनस्पतियां अपने गर्भ में छुपा ली थी
27:46महाराज प्रिथु ने प्रिथवी का दोहन करने का निश्चय किया और अपने अलौकिक धनुष पर एक तेजस्वी बान चड़ाया जिससे
27:54संपून स्रिष्टी में प्रकाश फैल गया
27:58देवर्शी नारद और अन्यरिशियों ने हर्शित होकर प्रिथवी के अमरित्मई दूध को एकत्र करने के लिए एक विशाल और चम्चमाता
28:06हुआ स्वर्ण पात्र तयार किया
28:09इस महान यग्य रूपी दोहन कार्य को आरंभ करने के लिए महाराज प्रिथु ने सर्वप्रथम आदी पुरुष स्वायंभोव मनु को
28:17एक बच्छडे के रूप में नियुक्त किया
28:20जैसे ही महाराज प्रिथु ने अपने हाथों से प्रिथवी रूपी गाय का दोहन शुरू किया
28:26वैसे ही प्रिथवी से पौश्टिक अन्न, दिव्यधान और जीवंदायनी औश्धिया प्रवाहित होने लगी
28:33इस अध्भुत द्रिश्य को देखकर देवराज इंद्र के नेत्रित्व में समस्त देवतागन स्वर्ग से उतर आये
28:40और अपने अपने दिव्यधात्रों में प्रिथवी का सार लेने के लिए उच्छुखो उठे
28:46देवगुरु ग्रिहस्पती ने बच्छडे का रूप धारन किया और देवताओं के लिए प्रिथवी से अमर्ता प्रदान करने वाला दिव्यसोम रस
28:54दुह लिया
28:55इसके पश्चात पित्रिग्णों के स्वामी अर्यमा आगे बढ़े और उन्होंने चांदी के पात्र में प्रिथवी से पित्रों की त्रिप्ती के
29:03लिए स्वधा नामक परम ऊर्जा प्राप्त की
29:07तपस्वी रिशियों और मुनियों ने महर्शी भेगु को बच्छरा बनाकर प्रिथवी से पवित्र वेद मंत्रों का दिव्यग्यान और आत्मिक तेज
29:15दुह लिया
29:17गंधर्वों और अपसराओं ने विश्वावसु को बच्छरा बनाकर कमलों के पात्र में संगीत, नृत्य और कलाका परम सौंदर्यमय रस प्राप्त
29:25किया
29:27दैतियों और असुरों ने भी महाध्यानी प्रहलाद को अपना बच्छरा बनाया और लोहे के पात्र में प्रिथवी से असीम शारिरिक
29:35शक्ती और धातु संपदा प्राप्त की
29:38नागों और सर्पों के राजा तक्षक ने बच्छडे का रूप लिया और मिट्टी के पात्र में प्रिथवी से दिव्यविश और
29:45बहुमुल्य मनियों का तेज एकत्र किया
29:49व्रिक्षों, पर्वतों और वन्य जीवों ने भी अपने अपने प्रतिनिधियों को बच्छडा बना कर प्रिथवी से जीवन जीने की शक्ती
29:56और प्राकृतिक सौंदर्य प्रात किया
29:59इस प्रकार संपूर्ण प्रिथवी का दोहन होने से बंजर भूमी अत्यंत हरी भी हो गई, नदिया बहने लगी और चारों
30:07और सुक्सम्रिधी की लेहर दोड़ गई
30:10अंत में देवताओं और रिशियों ने मिलकर महाराज प्रिथु और महारानी अर्ची का राज्या भिशेक किया, जिससे प्रिथ्वी पर पुनह
30:19सत्ययुक के समान धर्म की स्थापना हुई
30:22राज्या भिशेक के पश्चात महाराजा प्रिथु ने सम्पूर्ण सम्तल प्रिथवी पर मानव प्रजा के व्यवस्थित निवास और नगरों के निर्मान
30:31की दूरदर्शी योजना बनाई
30:34महाराज प्रिथु ने अपने धनुष की टंकार से विशाल परवतों को काट कर अत्यंत विस्त्रित और उपजाव मैदानों का निर्मान
30:42करवाया
30:44नवनिर्मित मैदानी क्षेत्रों में प्रजाजन ने अत्यंत सुरक्षित गावो, विशाल नगरों और अभेद्य दुर्गों की स्थापना आरंभ कर दी
30:53प्रिथु ने समाज में धर्म, व्यवस्था और आजिविका का संतुलन बनाए रखने के लिए उप्युक्त वर्ण व्यवस्था और आश्रम धर्म
31:01के नियम लागू किये
31:04प्रिथवी के नवजीवन के कारण चारों और सुनहरे अनाज, सुगंधित फल और मीठे गन्ने के खेतों से संपूर्ण राज्य लहलहा
31:12उठा
31:13महाराजा प्रिथु स्वय अपने अलोकिक स्वर्ण रत पर सवार होकर प्रजा के सुखलुक और क्रिशी की स्थिती का सुख्ष्म निरीक्षन
31:21करने निकले
31:23महारानी अर्ची ने महाराजा प्रिथु के साथ मिलकर राज्य के प्रत्येक निर्धन और असहाय नागरिक को अन्न, वस्त्र और स्वर्ण
31:31मुद्राय दान की
31:34एक शुभ दिन आकाश मार्ग से परम ज्यानी चार कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन और सनक कुमार प्रिथु के राजदर्बार में
31:42पधारे
31:44महाराजा प्रिथु ने परम भक्तिभाव से रिशियों के चरण धोए और उन्हें अत्यंत सुन्दर रत्नजडित सिन्हासन पर विराजमान किया
31:53महर्शी सनक कुमार ने महाराज प्रिथु को आत्मा के कल्यान, निश्काम भक्ति और भगवान विश्नु के शाश्वत स्वरूप का गूड
32:01ज्यान प्रदान किया
32:03रिशियों का दिव्य उपदेश सुनकर महाराजा प्रिथु का हरिदय प्रेमाश्रूओं और परम वैराग्य से परिपूर्ण हो गया
32:12आत्मज्यान प्राप्त करने के पश्चात प्रिथु ने भगवान श्री हरी विश्नु की प्रसन्नता के लिए एक सौ महान अश्वमेध यग्य
32:20आयोजित करने का संकल्प लिया
32:22दिव्य मंदक में स्वर्ण की वेदियों और रत्नों से सुसजित विशाल यग्य शाला का निर्मान किया गया जहां वेद मंत्र
32:30गूंजने लगे
32:32महर्शी वशिष्ट और महान रिशियों ने वेद रिचाओं का गान करते हुए प्रजवलित यग्यकुंड में आहुतियां देनी प्रारंभ की
32:41महाराजा प्रिथु के 99 यग्य सफलता पूर्वक संपन्न होते देख देवराज इंद्र अपने पद के छिन जाने के भैसे अत्यंत
32:49चिन्तित हो उठे
32:51सोवे यग्य के अवसर पर इंद्र ने पाखंडी सन्यासी का छद्म रूप धारन करके यग्य के पवित्र अश्व को चुपचाप
32:59चुरा लिया
33:01महाराज पृथु के पराक्रमी पुत्र विजिताश्व ने आकाश में उर्ते हुए छद्मवेशी इंद्र का तीखे बानों से पीछा किया
33:10विजिताश्व के प्रचन प्रहारों से भैभीत होकर देवराज इंद्र यग्य के घोडे को वहीं छोड़कर छिपने पर विवश हो गए
33:18ब्रहम देव ने स्वयं प्रकट होकर महाराजा पृथु को समझाया कि सौवा यग्य पूर्ण न करके भी उन्हें परम पद
33:26की प्राप्ती होगी
33:28अंत्य भगवान श्री हरी विश्णु ने स्वयं प्रकट होकर महाराजा प्रिथु को गले लगाया और उनकी प्रजा को सदास्दा के
33:36लिए परम कल्यान का वर्दान दिया
33:39भगवान श्री हरी विश्नु के दिव्य आशिरवाद से विभूशित होकर महाराजा पृथु अपने राज्य की ओर लोटे जहां उनकी प्रजा
33:48उनकी प्रतीक्षा कर रही थी
33:51अपने सामराज्ज में कदम रखते ही, महाराजा पृथु ने देखा कि चारों और अकाल और भुखमरी से तरस्ट प्रजा का
33:58करोन करंदन गूंज रहा था
34:01अपनी प्रजा की दैनिय दशा को देख कर महाराजा पृथु का हृदय गेहन पीडा से भर गया, जैसे कोई पिता
34:08अपने भूखे बच्चों को देखता है
34:12प्रिथु ने गेहन विचार किया और समझा कि यह अकाल प्रिथवी के समस्त धंधाने को अपने गर्भ में छिपा लेने
34:19के कारण उत्पन हुआ है
34:22अपने प्रजाजनों को बचाने के लिए महाराजा पृथु ने ग्रिढ निश्चय किया कि वे स्वयं पृथवी से उनके धंधाने को
34:30पुनह प्राप्त करेंगे, भले ही इसके लिए बल का प्रयोग क्यों न करना पड़े
34:36अपनी भुजाओं में असीम शक्ती समेटे, महाराजा पृथु ने अपना दिव्य धनुष अजगव और अक्षय बानों से भरा तरकश उठाया,
34:45जो किसी भी चुनोती का सामना करने को तयार थे
34:49अपने द्रिड संकल्प से प्रेरित होकर, महाराजा पृथु ने पृथवी को उसके छुपे हुए धन्धान्य को वापस लोटाने के लिए
34:57एक प्रचंड शिकारी की भांती पीछा करना आरंभ किया
35:02महाराजा पृथु के प्रचंड क्रोध और द्रिड संकल्प को भांपते हुए, पृथवी देवी ने भैभीत होकर एक विशाल सुन्दर गाय
35:10का रूप धारन कर लिया और भागने लगी
35:14पृथवी एक भैभीत गाय के रूप में, पहाडों, जंगलों और विशाल मैदानों को पार करती हुई तीवर गती से भागने
35:22लगी, पृथु से बचने का हर संभव प्रयास कर रही थी
35:27महाराजा पृथु ने एक अटूट संकल्प और अथा शक्ती के साथ उस दिव्य गाय का पीछा जारी रखा, चाहे वह
35:34कहीं भी छिपी या भागी
35:37अंतह अपनी सारी शक्ती क्षीन होते देख और पृथु के अथक पीछा से ठक कर, पृथु देवी ने महसूस किया
35:45कि अब कोई भागने का मार्ग शेश नहीं है
35:49गाय रूपी पृथु ने पृथु के सम्मुख अपनी गती रोकी, अपने दिव्य नेत्रों में करुणा लेकर उनकी ओर मुरी और
35:57सहायता के लिए याचना की
36:11पृथु की पीडा को समझते हुए, महाराजा पृथु ने तुरंत उसकी शर्थ स्विकार कर ली और अपनी प्रजा के कल्यान
36:19के लिए हर संभव उपाय करने का बचन दिया
36:23प्रजा के कल्यान हे तु, महाराजा पृथु ने अद्वितिय संकल्प शक्ती से स्वायंभोव मनु को पृथवी के बच्छडे के रूप
36:30में प्रकट किया, जिससे दोहन की प्रक्रिया आरंभ हो सके
36:35स्वयं एक आदर्ष दोहन करता बनकर, महाराजा पृथु ने पृथवी का दोहन करने की तयारी की अपने हाथों में एक
36:43विशाल सुनहरा पात्र लेकर खड़े हुए
36:47जैसे ही महाराजा पृथु ने पृथवी का दोहन आरंभ किया, दिव्य दूध की धाराएं जो अन्न, औश्धियों और समस्त धंधाने
36:56का प्रतीक थी, स्वर्णिम पात्र में प्रवाहित होने लगी
37:00पृथवी के दोहन के परिणामस्वरूप, सूखे और बंजर खेट ततकाल हरीभरी फसल से लहलहा उठे और पूरे राज्य में समरिध्धी
37:09का स्वर्णिम युग लौट आया
37:12महाराजा प्रिथु के इस दिव्यकार्य ने न केवल प्रजा की भूख मिटाई, बल्की एक नवस्रिष्टी और समरिध्धी के एक नए
37:20युग का सूत्रपात किया, जहां जीवन हर रूप में प्रफुलित था
37:25संपूर्ण प्रजा ने महाराजा प्रिथु की जैजैकार की, उन्हें धर्ती का दिव्यपालक और अनदाता मान कर उनकी स्तुती की, जिसने
37:34उनकी दुनिया को फिर से जीवन से भर दिया
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