ऋषभदेव के परम मोक्ष के बाद, उनके महान पुत्र भरत चक्रवर्ती ने संभाली पृथ्वी की बागडोर! 👑✨ इस एपिसोड में हम देखेंगे कैसे एक परम प्रतापी राजा ने राज-पाट का त्याग कर वैराग्य का मार्ग अपनाया। लेकिन गंगा तट पर एक मृग-शावक से हुई आसक्ति ने कैसे उनके तप को भंग किया और उन्हें लेना पड़ा मृग का जन्म! 🤔 यह कहानी हमें आसक्ति के भयानक परिणाम और कर्म के अटल सिद्धांत का गहरा पाठ पढ़ाती है। क्या भरत अपनी पिछली गलतियों से सीख पाएंगे? जानने के लिए देखें यह दिव्य गाथा! #भरतचक्रवर्ती #भागवतपुराण #जड़भरत #मृगजन्म #आसक्ति #कर्मफल #श्रीमद्भागवतम् #पुराण #हिंदूधर्म #वैराग्य #आध्यात्मिकज्ञान #मोक्ष #रीबर्थ #स्पिरिचुअलस्टोरीज #bhagavatapurana #chakravartibharata #jadabharata #deerreincarnation #hindumythology
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00:00कुटकाचल के घने वनों में विचरते हुए, भगवान रिश्भदेव भौतिक संसार के समस्त बंधनों और देहा भिमान से पूरी तरह
00:08मुक्थ हो चुके थे।
00:09तभी प्रचंड वायु के वेग से सूखे बास के व्रिक्ष आपस में टक्राएं और एक भीशन दावानल ने संपून परवत
00:17शेनी को अपनी ज्वालाओं में घेर लिया।
00:20उस भयानक अगनी के मध्यभी रिश्भदेव निश्चल भाव से योग निद्रा में लीन रहे, मानो उनका भौतिक शरीर मात्र मिट्टी
00:29का एक पात्र हो।
00:31योगगनी और वन की ज्वालाओं का अद्भुत मिलन हुआ और भगवान रिश्भदेव का नश्वर देह भस्म होकर परंब्रम में विलीन
00:39हो गया।
01:02रिश्भदेव ने राजपाट छोड़ने से पूर्व अपने सौ पुत्रों को राजसभा में एकत्रित कर जीवन के सर्वोच लक्षय का ज्यान
01:10दिया था।
01:33उनके असी पुत्रों ने कर्मकांड और वेजशास्त्रों का गेहन अध्ययन कर ब्राहमनत्व स्विकार किया और समाज को धर्म के पत्थ
01:41पर अग्रसर किया।
01:44जबकी जेश्ट पुत्र भरत को जो परम ज्यानी और वीर थे। रिश्भदेव ने इस विशाल सामराज्य का नया चक्रवर्ती समराट
01:52नियुक्त किया।
01:54रिश्भदेव ने स्वय अपने हाथों से भरत के मस्तक पर मुकुट रखा और अपने वस्त्र तथा आभूशन उतार कर अवधूत
02:02रूप धारण कर लिया।
02:05पिता के इस महान वैराग्य और वन्गमन को देख कर युवराज भरत का हृदय भक्ती और विछोह की अश्रूओं से
02:12भर उठा।
02:14ततपश्चात राजधानी में अत्यंत भव्यता और वैदिक रीति रिवाजों के साथ महाराजा भरत का राज्याभिशेक संपन्न हुआ।
02:23पवित्र नदियों के जल से भरे स्वर्ण कल्षों से भरत का स्नान कराया गया और विशियों ने वेदमंत्रों की ध्वनी
02:30से संपूर्ण सभा को गुंजाय मान कर दिया।
02:33राजा भरत ने विश्वरूब की सुलक्षणा पुत्री पंचजनी से विवाह किया और अपने धर्म पालित जीवन की शुरुआत की
02:43समराट भरत ने अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान की भाती किया और राज्ज में धर्म न्याय तथा समरिध्धी का
02:51स्वर्ण युग स्थापित किया
02:53उन्होंने भगवान नारायन को प्रसंद करने के लिए अनेक महान वैदिक यग्यों और अगनी होत्रों का पूर्ण निष्ठा से अनुष्ठान
03:01किया
03:03भरत के इस अभूत पूर्व शासन, धार्मिक आचर्ण और प्रताप के कारण ही इस पूरे भूखंड को भारतवर्ष का अमर
03:11नाम प्राप्थ हुआ
03:13अपने विशाल सामराज्य के वैभव के शिखर पर होते हुए भी, महाराजा भरत के हृदय में पिता रिश्भदेव द्वारा बोया
03:20गया वैराग्य का अंकुर धीरे धीरे पनप्रहा था
03:25संसार के नश्वर वैभव को भली भानती समझते हुए, महाराज भरत के मन में राजसी सुक्सुविधाव के प्रती तीवर वित्रिशना
03:33जागरित हो उठी
03:35उन्होंने अपने विशाल राजदर्बार में अपने सभी प्रतापी पुत्रों को आमंत्रित किया ताकि वे सामराज्य का गुरुतर दायत्व उन्हें सौंप
03:44सके
03:45महाराज भरत ने न्याय पूर्वक अपने विशाल सामराज्य भारतवर्ष को अपने सुलोग्य पुत्रों में विभाजित कर दिया
03:54सामराज्य का विभाजन पूर्ण करके राजा भरत ने अपने मस्तक से रत्नजडित स्वर्ण मुकुट और शरीर से राजसी वस्त्र उतार
04:02फेंके
04:04तपस्वी के वलकल वस्त्र धारन कर रोती हुई प्रजा और बिलखते परिवार को सांत्वना देकर भरत ने राजमहल की देली
04:12सदा के लिए लांग दी
04:15सांसारिक बंधनों को छिन्न भिन्न कर पूर्व चक्रवर्ती समराट अकेले ही उत्तर दिशा में हिमालय की पवित्र पावन उपत्यकाओं की
04:23ओर चल पड़े
04:25निरंतर मार्ग चलने के पश्चात वे गंड की नदी के तट पर स्थित परम पावन पुलह रिशी के आश्रम में
04:31पहुँचे
04:33गंड की नदी का वह रमनिय तट शालिग्राम शिलाओं से सुशोभित था जहां चारों और शांती और दिव्य उर्जा का
04:41प्रवाह था
04:42भरत ने नदी किनारे एक कुटिया बना कर वहीं रहकर केवल प्रभु नारायन की अनन्य भक्ती करने का द्रिड संकल्प
04:50लिया
04:51वे नित्य प्रातहकाल गंड की के शीतल और पवित्र जल में सनान कर अपनी संध्यावंदन और वैदिक क्रियाएं संपन्न करते
05:00थे
05:01सनान के पश्चात भरत पूजा के लिए ताजे पुष्प, तुलसी पत्रक, कुशा और पवित्र जल एकत्र करते थे
05:09कुटिया में आसीन होकर वे पदमासन में बैठते और भगवान वासुदेव के मनमोहक स्वरूप का हृदय में ध्यान लगाते थे
05:18भक्ती के परम आनंद में डूब कर भरत के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती और वे पूर्णता सुधबुधखो बैठते थे
05:27उनका रोमरोम पुलकित हो उठता और उनका चित्त केवल और केवल परंब्रहम श्री हरी के चरण कमलों में लीन रहता
05:35था
05:36एक दोपहर अपनी नित्य पूजा समाप्त कर महाराज भरत गंड की नदी के किनारे एक शिला पर शांत भाव से
05:43बैठे थे
05:45उसी समय एक गर्भिनी हिरनी जल पीने की इच्छा से बड़ी सहचता से नदी के तट पर आई
05:52सहसा उस शांत वन में एक भयंकर सिंह की भीशन और कपकपा देने वाली दहार गूंड उठी
06:00सिंह की दहार से भयभीत होकर वह गर्भिनी म्रिगी प्राण बचाने हेतु उफंती नदी को लांगने के लिए छलांग लगा
06:08बैठी
06:10अतिशय भय और छलांग के आघात से नदी के बीच ही उस म्रिगी के गर्भ से नवजात म्रिग छौना जल
06:16में गिर पड़ा
06:18वह म्रिगी नदी के दूसरे तट पर गिर कर म्रिध्यू को प्राप्थ हो गई जबकि असहाय नवजात छौना नदी की
06:25तेज धारा में बहने लगा जिसे भरत ने देख लिया
06:29करुणा से ओतपरोत भरत ने बिना एक क्षण गवाए अपनी तपस्या भूल कर शीतल जल में छलांग लगा दी और
06:37नवजात म्रिग छौने को अपनी शक्तिशाली भुजाओं में थाम लिया
06:42उन्होंने उसकंपकंपाते हुए नवजात को सावधानी से बाहर निकाला और अपने एकांट आश्रम की ओर चल पड़े जहां उन्होंने उसे
06:51बचाने का निश्चय किया था
06:53अपने आश्रम में पहुँचकर भरत ने म्रिग छौने को सूखे पत्तों के बिस्तर पर धीरे से लिटाया और उसकी भूख
07:01मिटाने के लिए जड़ी बूटियों से दूध तयार किया
07:05धीरे धीरे म्रिग छौना भरत की देख भाल में स्वस्थ होने लगा और जल्द ही उसकी निश्चल आखें और चंचल
07:13हरक्तें रिशी के हरिदय में एक अनकही भावना जगाने लगी
07:17म्रिग छौने के प्रती भरत का स्नेह बढ़ने लगा और वे अपने नियमित ध्यान और तपस्या के समय में भी
07:24उसके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने लगे
07:29उनकी एक आगरता भंग होने लगी और मन अक्सर म्रिग के चारों और घूमता रहता यह सुनिश्चित करते हुए कि
07:36उसे कोई खत्रा न हो
07:39अब भरत को म्रिग चौने के साथ खेलना उसे पुछकारना और उसे निहारना ही सबसे बड़ा सुख लगने लगा जिससे
07:47उनका वेराग्य का मार्ग विचलित होने लगा
07:51उन्होंने स्वयं को समझाया कि इस असहार प्राणी की रक्षा करना उनका धर्म है परन्तु यह धर्म कब आसकती में
07:58बदल गया उन्हें आभास ही नहीं हुआ
08:02धीरे धीरे उनके होठोन पर मंत्रों का जाप कम होता गया और मन में मृग के प्रती प्रेम की ध्वनी
08:09गूंजने लगी जिससे उनकी आध्यात्मिक प्रक्ती बाधित हुई
08:13मृग चौना अब उनके जीवन का केंद्र बन गया था उसकी अनुपस्थिती में उन्हें बेचैनी होती और उसकी वापसी पर
08:22ही उन्हें शान्ती मिलती
08:24वह मृग उनके ध्यान, भोजन और विश्राम हर गतिविधी का अभिन्न अंग बन गया था जैसे कोई पुत्र अपने पिता
08:32के साथ रहता हो
08:34भरत के मन में संसार की नश्वर्ता का बोध लुप्थ हो गया था और केवल मृग के प्रती प्रेम ही
08:41शेश रह गया जो उनके संपूर्ण अस्तित्व पर हावी हो गया
08:46अपनी तपस्या और आत्म ज्यान की तीवर इच्छा को त्याग कर उन्होंने अपनी आत्मा के लिए इस म्रिग को ही
08:53अपना एक मात्र आश्रे मान लिया
08:56जंगलों में अन्य पशुओं से म्रिग की रक्षा करना, उसे चराना और उसकी हर छोटी मोटी आवश्शक्ता का ध्यान रखना
09:04ही उनका एक मात्र कार्य बन गया
09:07वन्य जीवों के डर से भरत कभी म्रिग को अकेले नहीं छोड़ते थे और सदैव उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के
09:15लिए उसके साथ रहते
09:17यह अटूट आ सकती इतनी गहरी हो गई कि उन्होंने अपनी मृत्यू का भी आभास नहीं किया, उनका मन केवल
09:25म्रिग के भविष्य की चिन्ता में डूबा हुआ था
09:29जब मृत्यू निकट आई तो भवरत ने अन्तिम सांस तक उसी मृग को निहारा, उसके बिना भविष्य की कलपना भी
09:36उन्हें असहनिय प्रतीत हुई
09:39अन्तिम क्षणों में उनका हृदय केवल उस मृग के प्रेन से भरा था, जिससे उनकी आत्मा ने शरीर त्यागते समय
09:46भी उसी का ध्यान किया
09:49फल्स्वरूप अपनी अत्यधिक आसकती के कारण भरत को अगले जन्म में एक मृग के रूप में पुनरजन्म लेना पड़ा
09:57वह म्रिग एक पवित्र ब्राहमन परिवार के आश्रम में पैदा हुआ था, जहां उसे सुरक्षा और प्रेन मिला, जिससे उसे
10:06अपने पिछले जीवन की स्मृती को धीरे-धीरे प्राप्त करने में मदद मिली
10:11म्रिग योनी में रहते हुए भी, भरत को अपने पिछले जन्म की गलतियों का भान हुआ और उन्होंने उस आसक्ती
10:18को त्याग कर मोक्ष के मार्ग पर लोटने का द्रिढ निश्चय किया
10:23म्रिग भरत ने अपने पूर्व जन्म की आसक्ती को पहचानते हुए ब्राहमन आश्रम की सुरक्षा और प्रेम के बावजूद मोक्ष
10:31मार्ग पर लोटने का द्रिढ संकल्क लिया
10:35धीरे धीरे म्रिग भरत ने आश्रम के भोजन और दैनिक क्रियातलापों से विमुक होकर एकांतवास और आत्मचिंतन की ओर अग्रसर
10:43होना आरंभ किया
10:46भीतर से आई गेहन पुकार पर म्रिगभरत ने संसार के सुखों को त्याग कर घने वन की ओर प्रस्थान किया
10:53जहां वह अपनी तपस्या को निर्विधन रूप से कर सके
10:58अंतहक वह गण की नदी के निर्मलतट पर स्थित परमशांत पुलहा आश्रम के रमनिय वातावर्ण में पहुँचा जो तपस्या के
11:06लिए आदर्श स्थल था
11:08पुलहा आश्रम में पहुँचकर मृद्भरत ने एक एकांत स्थान पर अपनी शारिरिक अवस्था के अनुरूप भगवान विश्नु के ध्यान में
11:17स्वयं को लीन कर लिया
11:20प्रारंभ में मृद्भरत को अपनी मृग्योनी के सहजभाय और भोजन की स्वाभाविक इच्छाओं से जूजना पड़ा जो उसकी तपस्या में
11:28बाधा डाल रहे थे
11:30उसने धीरे धीरे भूखप्यास और शारिरिक कष्टों पर विजय प्राप्त करना सीखा अपने मन को इंद्रियों की दास्ता से मुक्त
11:38कर आत्मनियंत्रन साधा
11:41अपने पूर्व जन्म के मृगशावक से आसक्ती की वेदनादाई स्मृती ही उसकी प्रेणा बनी जिसने उसे इस बार मोहमाया से
11:49पूर्णत्ह मुक्त होने का बल दिया
11:52दिन प्रति दिन मृगभरत का ध्यान गहरा होता गया और वह अपनी चेतना को भौतिक शरीर से उपर उठा कर
12:00परम ब्रहमा से जुड़ने का प्रयास करने लगा
12:03कभी कभी बन में विचरते अन्य तपस्वी और पक्षी भी इस असाधारन मृग की अलोकिक एकागरता को देखकर विस्मय से
12:12भर जाते थे
12:14ग्रीश्म वर्षा और शीत रित्वे उसके चारों और आती जाती रहीं किन्तु मृग भरत अविचल भाव से अपनी तपस्या में
12:22लीन रहा
12:24शरीर निरंतरक्षीन होता जा रहा था परन्तु आत्मा की लौ अधिकाधिक प्रदीप्थ हो रही थी जो उसके द्रिड संकल्प का
12:32प्रमार था
12:34अब उसे न अपनी योनी का भान था न किसी शारिरिक सुख की इच्छा बस एक ही लक्ष था इस
12:41जन्दम मृत्यू के चक्र से मुक्ती
12:44अपनी गहन तपस्या के परिणामस्वरूप उसे कभी कभी दिव्य प्रकाश और अंतरद्रिश्की के क्षण प्राप्थ होते जो उसके मार्ग को
12:52और प्रकाशित करते
12:55अपनी अंतिम सासे गिनते हुए भी मृगभरत ने अपने चित को पूर्णता भगवान विश्नु के चर्णों में समर्पित कर दिया
13:03सभी आसक्तियों को त्याग कर
13:06उसी क्षण उसकी आत्मा ने इस मृगशरीर को शान्ति पूर्वक त्याग दिया
13:11अब कोई आसक्ति या भय उसे रोक नहीं सका
13:15अब वह आत्मा अपने पिछले दो जन्मों के अनुभवों से परिपक्व होकर
13:20आसक्ति के बंधन से मुक्त अत्यंत निर्मल और शुद्ध हो चुकी थी
13:26आसक्ति के गंभीर परिणामों को स्वय भोग कर
13:29भरत ने अंत्य यह गेहन सत्य आत्म साथ कर लिया था
13:33कि मोक्ष का मार्ग केवल अनासक्ति में ही नहित है
13:37यह शुद्ध आत्मा अब एक नए जन्म की ओर अग्रसर थी
13:41जो उसे उसके परम लक्ष भगवान विश्नु के चर्णों में स्थान दिलाने में सहायक होगा
13:59हो सके वह पवित्र आत्मा जो अपने पूर्व जन्मों की आसक्ति के दुश्परिनामों से सीख चुकी थी
14:06अब एक ऐसे मार्ग की तलाश में थी जहां वह अपने अंतिम और सर्वोच लक्षे को प्राप्त कर सके
14:14अद्रिश्य दिव्य उर्जाओं के प्रभाव में वह आत्मा अपने पुनर्जन्म के लिए उप्युक्त एक शांत और पवित्र स्थान की ओर
14:22खिंची चली जा रही थी
14:24जहां उसे शुद्धता और प्रकृती का साननिध्य मिल सके
14:29इसी शांत वातावर्ण में एक विशाल नदी के किनारे स्थित एक घनेवन में प्रकृती अपने सबसे मधुर रूप में प्रस्पुटित
14:37हो रही थी जहां जीवन अपने शुद्धतम रूप में पनपता था
14:42इसी सुरमस्थल पर एक गर्भवती म्रिगी अपनी शांत चाल से घास चर रही थी जिसके गर्भ में नया जीवन पल
14:50रहा था और उसका मन आगामी मात्रित्व की कोमल आशाओं से भरा था
14:56अचानक वन की शांती को भंग करती हुई एक भयानक सिंग की गर्जना से पूरा वातावर्ण काप उठा जिसने प्रकृती
15:04की चिर्निद्रा को क्षन भर में तोड़ दिया
15:07उस भयावा गर्जना से म्रिगी का हृदय तीवर गती से धड़कने लगा और भय से कापते हुए उसने अपने प्राण
15:15बचाने के लिए आसपास देखा जहां हर दिशा में खत्रा मंदरा रहा था
15:20प्राणों के संकट को भामपते हुए म्रिगी ने भयभीत होकर नदी के तीवर प्रवाह में चलांग लगा दी जहां वह
15:28सिंह से बच निकलने की अंतिम आशा के साथ संघर्ष करने लगी
15:33कुछ ही दूरी पर अपनी परनकुटी के बाहर ध्यानमगन बैठे भरत ने म्रिगी की इस हृदय विदारक स्थिती को देखा
15:41और उनके हृदय में करुणा की एक लेहर उमड पड़ी
15:46उन्होंने तुरंट अपने ध्यान से विचलित होकर उस असहाई जीव को बचाने के लिए उठ खड़े हुए क्योंकि उनके भीतर
15:54की असीन करुणा उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही थी
15:58बिना एक पल गवाए भरत तेजी से नदी की ओर गौड़े उनके मन में केवल उस असहाई म्रिगी को बचाने
16:06का द्रिड संकल्प था जिसके जीवन पर संकट मंदरा रहा था
16:11उन्होंने बिना किसी हिचकी चाहट के नदी के तेज बहाव में प्रवेश किया जल की शितलता उनके शरीर को भेद
16:18रही थी पर उनके मन में केवल जीवन बचाने का उच्साह था
16:23अथक प्रयास के बाद भरत अंता भैभीत और संघरशरत म्रिगी तक पहुँच गए जिसने जीवन की अंतिम उम्मीद के साथ
16:31उनकी ओर देखा
16:34बड़ी सावधानी और शक्ती से भरत ने म्रिगी को नदी के तेज बहाव से खीच कर सुरक्षित किनारे तक पहुँचाया
16:41जहां वह थकी और भैभीत पड़ी रही
16:45किनारे पर आते ही म्रिगी को तीवर प्रसव पीडा होने लगी उसका शरीर का प्रहा था और आखों में दर्द
16:53और जीवन म्रिट्यू के संघर्श का भाव स्पष्ट था
16:57पीडा के अंतिम ख्षणों में म्रिगी ने अंतह एक छोटे असहाय म्रिग शावक को जन्म दिया जिसने गीली घास पर
17:05गिरते ही अपनी पहली सांस ली
17:08अपने नवजात शावक को एक अंतिम कोमल द्रिष्टी और भरत की और कृतज्यता भरी आखों से देखते हुए
17:15म्रिगी ने शांत भाव से अपने प्राण त्याग दिये जीवन का चक्र पूरा कर लिया
17:21मा के मृत शरीर के पास वह असहाय मृत शावक का प्रहा था
17:26अपनी मा की गर्मी और सुरक्षा से बंचित अपने नए जीवन के आरंभ में ही अकेला पड़ गया था
17:34म्रिगी की मृत्यू और शावक की असहायता ने भरत के हृदय में गहरी वेदना भर दी
17:39और उन्होंने स्वयन को इस नवजात जीवन के लिए उत्तरदाई महसूस किया
17:45जैसे ही भरत ने उस छोटे से जीव को देखा उनके मन में एक अजीव सी आसक्ती और स्नेह का
17:52भाव जागरित हुआ
17:53जिसे वे चाहकर भी रोक नहीं पाए
17:57भरत ने अत्यंत कोमलता से उस कापते हुए मृजशावक को अपनी बाहों में उठा लिया
18:02अंजाने में ही अपने मोक्ष के मार्ग पर एक और आसक्ती का बीज बोते हुए
18:09भरत उस कापते हुए मृजशावक को अपने आश्रम की ओर ले चले
18:13उसके छोटे से शरीर को अपनी भुजाओं में सुरक्षित महसूस करते हुए
18:19आश्रम पहुचकर भरत ने शावक को बड़े प्यार से घास और जल पिलाया
18:24उसकी कोमलता और असहायता पर उनका हृदय पिघल उठा
18:29रात में जब शावक सो रहा था, भरत घंटों उसे निहारते रहे
18:34उसकी निर्दोष्टा में अपने पुराने वैराग्य को विस्मृत करते हुए
18:39प्रातहकाल भरत अपने नित्यकर्म से पहले शावक को जंगल में चराने
18:44और उसकी देखभाल करने में लीन हो जाते
18:48कभी-कभी जब भरत ध्यान में लीन होते, शावक आकर उनके पास बैठ जाता और भरत का ध्यान उसकी ओर
18:56खिंच जाता
18:58भरत अब शावक से बाते करने लगे थे, उसे अपने विचारों और एकांट के साथी के रूप में देखने लगे
19:05थे
19:07आश्रम से बाहर जाते समय भी, भरत शावक की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते, हर ख्षन उसका ध्यान रखते
19:15एक दिन जब शावक कुछ देर के लिए द्रिश्टी से उजल हो गया, भरत का हृदय भैसे काप उठा
19:23शावक को वापस देखकर भरत की आखों में खुशी के आसु छलक आये, और उन्होंने उसे अपनी बाहों में भर
19:30लिया
19:32धीरे धीरे भरत की दिन चर्या अब शावक की जरूरतों के इर्दगिर्द घूमने लगी, उनकी आध्याक्मिक साधना पीछे चूटती गई
19:41पवित्र ग्रंथों का अध्ययन, जो कभी उनका परम आनंद था, अब धूल फाकने लगा था, शावक के साथ समय बिताना
19:49अधिक महत्वपूर्ण हो गया था
19:52जब भरत ध्यान में बैठते भी थे, उनका मन शावक की चिंता में लगा रहता, जिससे उनकी एकागरता भंग हो
20:00जाती
20:01कभी कभी भरत को अपनी इस बढ़ती आसकती का भान होता, पर वे उसे त्यागने में असमर्थ पाते
20:10रात्री में जब जंदली जानवरों का खत्रा होता, भरत शावक की रक्षा के लिए जागते रहते, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करते
20:19आश्रम में अब शावक ही उनका एक मात्र साथी था, और भरत का संसार उसी के इर्दगिर्थ सिमट गया था
20:28चक्रवर्ती राजा भरत के रूप में उनके भव्य अतीत की यादें अब धूमिल पढ़ चुकी थी, वर्तमान में केवल शावक
20:35ही सत्य था
20:37जिस तपस्या ने उन्हें मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर किया था, वह अब ख्षीन पढ़ने लगी थी, उसकी तीवर्ता और
20:45गहराई लुप्ठ हो गई थी
20:48शावक अब बड़ा हो रहा था, और उसके साथ भरत की आसकती भी और अधिक गहरी और अटल होती जा
20:55रही थी
21:08अंतहप भरत के लिए वह म्रिग्षावक केवल एक प्राणी नहीं, बल्कि उनका संपूर्ण संसार, उनका अस्तित्व और उनकी पहचान बन
21:17चुका था
21:18ध्यान लगाने के लिए जब भी भरत अपनी आखे मूंदते, उनका मन इश्वर के चर्णों में न लगकर सामने चर
21:26रहे म्रिग्षावक की सुरक्षा में भटकने लगता
21:30अगनिहोत्र यग्य की वेदी को सुलगने देने के बजाए, भरत अपना समय जंगल से मृट के लिए कोमल और मिठी
21:37घास चुनने में गंबाने लगे
21:40मंत्रों के जब के समय भी उनके कान केवल उस शावक के पैरों की सुरीली और हलकी आहट पर ही
21:46टिके रहते थे
21:48एक दिन जब शावक कुछ क्षणों के लिए जाडियों के पीछे ओजल हो गया, तो भरत का हृदय किसी भयानक
21:55अनिष्ट की आशंका से काम उठा
21:59अपने आश्रम को असुरक्षित छोड़ कर वे व्याकुल होकर घने जंगलों की ओर भाग पड़े और म्रिग का नाम पुकारते
22:06हुए भटकने लगे
22:08जंगली भेडियों और हिंसक पशुओं के भय से भरत की आत्मा थर्थरा रही थी, जैसे उनका अपना ही कोई प्रियसंतान
22:16विपत्ती में हो
22:18जब अन्तह उन्होंने शावक को एक विशाल व्रिक्ष की छाया में सुरक्षित पाया, तो उनके नित्रों से राहत के अश्रुबह
22:26निकले
22:27उस छोटे से जीव को अपने कंधों पर उठा कर, जब वे आश्रम की ओर वापस लोटे, तो वे परम
22:34आध्यात्मिक विजय जैसी प्रसन्नता महसूस कर रहे थे
22:39प्राणायाम की क्रिया करते समय भी, जब वायू को रोकने का प्रयास होता, तो ध्यान भगवान पर न होकर हिरन
22:46के चंचल स्वभाव पर तिकता
22:49वह अगनिहोत्र की पवित्र वेदी, जो कभी निरंतर मंत्रो चार से प्रजवलित रहती थी, अब बुझकर ठंडी राख में बदल
22:57चुकी थी
22:59नदी के पवित्र जल में स्वयन स्नान करने के स्थान पर भरत उस शावक को दुलार से नहलाने में घंटों
23:06व्यतीत कर देते
23:08जिस समराट ने कभी विशाल सामराज्य और चक्रवर्ती पद को तिनके के समान त्याग दिया था, वहां आज एक हिरन
23:16के मोह में पूर्णता बंध चुका था
23:19रात को सोने से पहले वे अपने हाथों से घास की एक कोमल शया बनाते ताकि उनका प्रिय शावक बिना
23:27किसी कश्ट के सो सके
23:29म्रिग जब अपनी ननहें सिर से भरत की देह को सहलाता तो वे अलौकिक आनंद का भ्रम पाकर गगध हो
23:36उठते
23:38उनके जटा जूट बिखरने लगे और तपस्या की तेजस्विता धीरे-धीरे उनकी कांतिहीन आँखों के पीछे चुपने लगी
23:47आश्रम के निकट से गुजरने वाले अन्यमुनी और सिद्ध पुरुष भरत की इस दशा पर अत्यंत दुरहक और आश्चर्य व्यक्त
23:54करते
23:56भगवान विश्णों की माया अत्यंत सुक्ष्म है जिसने महाज्यानी भरत के विवेक पर भी अज्यान का आवर्ण डाल दिया था
24:05भरत अब उस मूख प्राणी से इस तरह बाते करते जैसे वह उनकी अपनी भाशा समझता कोई अत्यंत आत्मिय मनुष्य
24:13हो
24:14मुकुंद का वह पावन नाम जो कभी भरत की हर सांस में गूँजता था अब हिरन के विचार मात्र से
24:21विस्थापित हो गया था
24:23इस प्रकार भरत का महान तपस्वी जीवन मोह के एक छोटे से जाल में उलचकर अपनी दिशा से पूर्णता भटक
24:31गया
24:32देखते ही देखते वह नन्हा म्रिग शावक अब एक सुन्दर युवा म्रिग में परिवर्तित हो चुका था जिसके शरीर में
24:40नैसरगिक वन के आहवान की चंचलता स्पष्ट जलकती थी
24:45भरत जो अब भी उसे अपने पुत्र समान मानते थे उसके हर बदलते स्वभाव को बड़े प्रेम और चिंता से
24:52निहारते रहते थे
24:55किन्तु उस म्रिग की आखों में अब एक नई चमक थी, एक ऐसी पुकार जो उसे वन के गहन एकांत
25:02से बाहर अपने समवयस्क साथियों की ओर खीचती थी
25:06वह म्रिग धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र प्रकृती के वशीभूत होकर आश्रम के परिसर से दूर वन की गहरायों में विचर्ण
25:14करने लगा था
25:16भरत अपने मोहपाश में जक्डे हुए, दिनरात उसके पीछे-पीछे घूमते, उसे अपने पास रखने का हर संभव प्रयास करते
25:26एक दिन उस म्रिग ने दूर वन में अपने ही जैसे कई म्रिगों के समूह को देखा, जिनकी आखों में
25:33एक अनूठी चमक और स्वतंत्रता थी
25:36इस दृष ने उस युवा म्रिग के मन में अपनी प्रजाती से जुड़ने की तीवर इच्छा जगा दी, मानो कोई
25:43अदृष शक्ती उसे अपनी और खीच रही हो
25:47भरत ने म्रिग की विचलित होती द्रिष्टी और उसके बदलते व्यवहार को महसूस किया, उनके हृदय में एक अन्जाना भय
25:55घर कर गया
25:57उन्होंने म्रिग को आवाज दी, उनका स्वर प्रेम और व्याकुलता से भरा था
26:03म्रिग एक पल के लिए रुका, उसकी आखे भरत और दूरवन में मौजूद अपने साथियों के बीच दोलती रही, मानो
26:10वह किसी द्वंधों में फंसा हो
26:13उसी क्षण वन से आती अन्यम्रिगों की मधुर ध्वनी ने उसे और भी आकरशित किया, जैसे कोई पुराना संबंध उसे
26:22अपने मूल की ओर बुला रहा हो
26:25बिना एक पल भी और सोचे, उस युवा म्रिग ने अपनी सहच प्रवृत्ती का अनुसर्ण किया और वन के उस
26:32विशाल समुह की ओर पहला कदम बढ़ाया
26:36भरत ने उसे रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ती से पुकारा, उनकी आखों से अश्रुधारा बह निकली
26:43किन्तु म्रिग ने एक भी पल भरत की ओर मुड कर नहीं देखा, अपनी पूर्ण गती से दौरते हुए वह
26:50वन के सघन अंधकार में विलीन हो गया
26:53भरत अपने घुटनों पर गिर कर उस दिशा में टकट की लगाय देखते रहे जहां उनका प्रियम्रिग हमेशा के लिए
27:00अद्रिश हो गया था
27:03उनके हृदय से एक करुण चीतकार निकली, जिसने शांत वन की हर शाखा और पत्ती को रुला दिया, मानो स्वयन
27:11प्रकृती उनके दुख में विलाप कर रही हो
27:14एक गहरा असहनी एकाकीपन उन्हें घेर चुका था, जिसने उनकी तपस्या के वर्षों को एक क्षण में व्यर्थ सिध कर
27:22दिया
27:24भरत वहीं पत्थर की मूरत बन बैठे रहे, उनकी आखों में अब कोई चमक नहीं थी, बस चून्य और अथाह
27:31पीड़ा थी
27:33उसक्षण उन्हें अपने आसक्ती की भीषण मूर्खता का एहसास हुआ, जिसने उन्हें अपने परम लक्षे से भटका दिया था
27:42आश्रम का वह पावन्स्थल, जो कभी उनकी तपस्या से आलोकित होता था, अब उनके हृदय के समान ही वीरान और
27:50अंधकार में प्रतीत हो रहा था
27:53उनकी आत्मा, जो कभी दिव्य आनंद में लीन रहती थी, अब आसक्ती की अगनी में जल कर राख हो रही
28:00थी
28:02म्रिग के चले जाने का द्रिश्य उनके मानस पटल पर एक तीखे शूल की तरह बार-बार चुब रहा था
28:09उन्हे भान हुआ कि उन्होंने अपने मोक्ष मार्ग को एक तुछ मोह के लिए तिलांजली दे दी है, जिसकी भरपाई
28:16असंभव थी
28:18उनकी प्रग्या, जो कभी हिमालय की चोटी सी उज्वल थी, अब शोक के घने बादलों से घिर कर धूमिल पड़
28:26गई थी
28:27आश्रम का शांत वातावर्ण भी अब उन्हें अपने हृदय की अशांती के समान बोजिल और असहनिय लगने लगा था
28:36उन्होंने अपने जीवन के उद्देश्य और वर्षों की तपस्या पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया, सब निरर्थक प्रतीत हो रहा था
28:44एक असहनिय आध्यात्मिक शून्यता उनके रोमरोम में समा गई थी, जिसने उन्हें भीतर से खोखला कर दिया
28:53तपस्या से पुष्ट उनका शरीर भी अब इस मानसिक वेदना के भार तले शिथिल और निस्तेज अनुभव कर रहा था
29:01उन्हें अपने पूर्व जन्म की याद आई जब वे चक्रवर्ती समराट थे, जिन्होंने राजपाट का त्याग कर सन्यास लिया था
29:10उस द्रिड संकल्प और वर्तमान की इस क्षणिक आसक्ती के बीच का विरोधाभास उन्हें भीतर तक कचोट रहा था
29:19वे स्वयं को एक पतित रिशी के रूप में देख रहे थे, जो माया के जाल में फंसकर अपना मार
29:25भटक गया था
29:27इस अज्यानी आसक्ती ने उन्हें स्वयं की नजरों में गिरा दिया था, जिससे एक गहरी लज्जा का अनुभव हुआ
29:35इस गहन पीडा के मध्य भी उनके मन में अपनी भूल सुधारने और इस आसक्ती के बंधन को तोड़ने का
29:43संकल्प जागा
29:45उन्हें कर्म के अटल नियम और अपनी आसक्ती के तत्काल परिनाम की कटु सत्यता का बोध हुआ
29:52उन्होंने अपनी आखे बंध कर ली, इस आंतरिक तूफान के बीच स्वयं में शक्ती और शांती खोजने का प्रयास करते
30:00हुए
30:01एक और अश्रुक पश्चाताप और विरक्ती से भरा हुआ, उनके गाल पर धीरे से लुढक गया
30:09वन की गहन चुप्पी उनके हरिदय में व्याप्त विराट शूने को और भी स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित कर रही थी
30:16अब उन्हें स्पष्ट रूप से समझ आया कि वास्तविक मुक्ती सभी प्रकार के बंधनों से पूर्ण स्वतंत्रता में ही नहित
30:24है
30:26इस अपार कश्ट की अगनी में तपी हुई आत्मा में अंत्य एक नई अडिक संकल्प की चमक उत्पन हुई
30:34वे अपने भावी नेती को स्विकार करने और अगले जन्म की तैयारी करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो
30:41रहे थे
30:43गंड की नदी के शीतल तट पर लेटे हुए व्रिध राजर्शी भरत की श्वासे धीरे-धीरे मंद पढ़ने लगी थी
30:51मृत्यू के अत्यंत निकट होने पर भी भरत का चित परमात्मा में लीन होने के बजाएं केवल अपने प्रियम रिग्षावक
30:59पर ही केंद्रित था
31:00वह छोटा म्रिग्षावक अपने रक्षक की ऐसी अवस्था देखकर अत्यंत कातर स्वर में ध्वनी करते हुए उनके निकट आबैठा
31:10भरत ने कापते हुए दुर्बल हाथों से अंतिम बार उस म्रिग्षावक के कोमल मस्तक को स्पर्ष किया और उनकी आखों
31:18से अश्रुबह निकले
31:20जो हृदय कभी सर्वत्याग और वैराग्य से परिपूर्ण था वह अब इस चिंता से व्याकुल था कि उनके जाने के
31:28पश्चात इस अनाथ हिरन की रक्षा कौन करेगा
31:32काल का चक्र निर्गैता से घूम रहा था और कर्म का वह सिध्धान्त प्रभावी होने जा रहा था जहां जीवन
31:39का अंतिम विचार ही अगले जन्म का स्वरूप तै करता है
31:44अपनी अंतिम सास छोड़ते समय राजर्शी भरत के नेत्र केवल उस म्रिजशावक के सजल और मासूम चहरे पर हीटिके रहे
31:53एक शान्त और दिव्य आलोक के साथ भरत का जीवात्मा उनके जरजर भौतिक शरीर का त्याग करके अंतरिक्ष की ओर
32:01विलीन हो गया
32:03पवित्र गंड की नदी के तट पर महान भरत का निश्प्रान शरीर शान्त पड़ा था और पास ही वह म्रिजशावक
32:10अत्यंत शोक में डूबा खड़ा था
32:13यन या वापिस मरन भावं के शाश्वत नियम के अनुसार अंतिम क्षणों की आसकती के कारण भरत की आत्मा एक
32:20म्रिगी के गर्भ में प्रविष्ठ हुई
32:23कुछ समय पश्चात, घने और रमनिय वन के मध्य एक अत्यंत सुन्दर म्रिग्षिशु ने जन्म लिया
32:30यह नवजात हिरण कोई साधारण जीव नहीं, बलकि स्वय पूर्ववर्ती चक्रवर्ती समराट और महान तपस्वी भरत का पुनरजन्म था
32:41अपने पूर्वजन्म में किये गए कठोर तप और भगवत भक्ती के प्रभाव से उस म्रिग रूपी भरत को अपने पिछले
32:48मनुष्य जन्म की सम्पूर्ण स्मृतिया पूर्ववत याद थी
32:53अपने चार पतले पैरों और चित्तीदार शरीर को देख कर उस ज्यानी म्रिग को अपनी एक मात्र आसकती के दुश्परिनाम
33:01का गहरा बोध हुआ
33:03पश्चाताप की अगनी में जलते हुए उस म्रिग ने स्मरण किया कि कैसे एक छोटे से स्नहबंधन ने उसकी मुक्ती
33:10के मार्ग में विशाल बाधा खड़ी कर दी थी
33:14पुन किसी मोहपाश में न बंधने का द्रेड संकल्प लेकर उस ननहे म्रिग ने अपनी माता और हिर्नों के जुंड
33:21का त्याग कर दिया
33:23वह अकेला म्रिग एकांत की खोज में उन्हा उसी पवित्र गंड की नदी के तट पर लोट आया जहां उसने
33:31अपने पिछले जन्म में तपस्या की थी
33:34केवल सूखे पत्ते और घास खाकर जीवन निर्वाह करते हुए वह म्रिग निरंतर मौन रहकर भगवान श्री हरी के नाम
33:42का मानसिक जाप करने लगा
33:45पवित्र नदी के जल में खड़े होकर वह म्रिग पूर्ण अनासक्ती और भक्ती भाव के साथ अपने पशुश्रीर का अंत
33:53होने की प्रतीक्षा करने लगा
33:55राजा भरत की यह गाथा समस्त साधकों के लिए एक अमर चेताबनी बनी की पूर्ण वैराग्य के बिना सूक्ष्म आ
34:03सकती भी आत्मा को पुनरजन्म के चक्र में बांध सकती है
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