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श्रीमद्भागवत पुराण के ६ठे स्कंध से जानिए देवराज इंद्र के अहंकार, महर्षि दधीचि के अमर बलिदान और दानव वृत्रासुर की अद्भुत भक्ति की अमर गाथा। जब इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति का अनादर किया, तो स्वर्ग लोक पर घोर संकट छा गया। त्वष्टा ऋषि के यज्ञ कुंड से प्रगट हुए महाकाय राक्षस वृत्रासुर को परास्त करने के लिए महर्षि दधीचि ने अपने देह का त्याग कर अपनी अस्थियां दान कर दीं। जानिए कैसे बना भगवान शिव और विश्वकर्मा का सबसे शक्तिशाली अस्त्र 'वज्र' और कैसे एक असुर ने युद्धभूमि में दिखाया परम वैकुण्ठ भक्ति का अलौकिक दृश्य! Watch Bhagavata Purana Episode 24.
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00:00अमरावती की स्वर्णन सभा में देवराज, इंद्र का दर्बार, असीन वैभव, अलौकिक संगीत और अपसराओं के नृत्य से गुझायमान हो
00:08रहा था।
00:10एरावत हाथी के स्वामी इंद्र अपने उच्च सिनहासन पर विराजमान होकर सर्वव्यापी सत्ता और संपत्ती के अहंकार में पूरी तरह
00:18डूबे हुए थे।
00:20रंभा और उर्वशी के मनमोहक नृत्य और गंधर्वों के मधुर गायन ने स्वर्ग के वातावर्ण को पूरी तरह से कामुक
00:28और सम्मोहित कर दिया था।
00:30सभी देवगण और सिद्ध पुरुष इंद्र की चाटुकारिता में लीन थे, जिससे देवराज का अभिमान आकाश की उचाईयों को छू
00:39रहा था।
00:41उसी क्षण, समस्त वेदों के ग्याता और देवताओं के परम पूज्य गुरु महर्शी ब्रहस्पती शांत भाव से उस देवसभा में
00:50पधारे।
00:51मस्तक पर त्रिपुंड, गले में रुद्राक्ष और हाथों में कमंडल धारण किये गुरु ब्रहस्पती के अलोकिक तेज से संपून देवसभा
00:59आलोकित हो उठी।
01:01गुरु ब्रहस्पती का आगमन देखते ही सभा में उपस्थित समस्थ देवता और रिशिमुनी अपने अपने स्थानों से आदर पूर्वक खड़े
01:10हो गए।
01:12परंतु एश्वर्य के मद में अंधे देवराज इंद्र ने अपने परम पूजे गुरु को आते देख कर भी न तो
01:18उनका स्वागत किया और नहीं सिन्हासन से उठे।
01:22इंद्र ने गुरु ब्रहस्पती की ओर देखा तक नहीं और अपसराओं के नरीति में लीन रहकर अपने गुरु का घोर
01:30अनादर किया।
01:31सभा के मध्य खड़े गुरु ब्रहस्पती ने इंद्र के इस दंभ और अहनकार पूर्ण आचरण को अपनी गंभीर और शांत
01:40द्रिश्टी से देखा।
01:42गुरु ब्रहस्पती समझ गए कि अत्यधिक धन और सक्ता के अहनकार ने इंद्र की बुद्धी को पूरी तरह ध्रश्ट कर
01:49दिया है।
01:51बिना कोई क्रोध प्रकट किये या शब्द बोले महर्शी ब्रहस्पती दुखित हृदय से चुपचाप उस राजसभा से बाहर निकल गए।
02:01देव सभा से बाहर आते ही गुरु ब्रहस्पती ने अपनी योगशक्ती से स्वयं को अग्रिश कर लिया और स्वर्गलोग का
02:08त्याग कर दिया।
02:10गुरु के प्रस्थान करते ही नृत्य और संगीत अचानक थम गया और इंद्र का भ्रम वमोभंग पल भर में तूट
02:18गया।
02:18जब इंद्र का ध्यान अपने सिनहासन के सम्मुख पड़ा, तो गुरु ब्रहस्पती को वहा न पाकर उनका हृदय पश्चाताप और
02:27भय से काम उठा।
02:29अपनी इस अक्षमय भूल का अहसास होते ही देवराज इंद्र अपने उच्च सिनहासन से उतर कर गुरु की खोज में
02:37व्याकुल होकर दोडे।
02:39इंद्र और अन्य सभी देवताओं ने स्वर्ग के उपवनों, आश्रमों और दिशाओं में गुरु ब्रहस्पती को खोजा, परंतु वे कहीं
02:47नहीं मिले।
02:48गुरु संरक्षन के समाप्थ होते ही स्वर्ग लोग पर अमंगल की काली चाया चाने लगी और दिव्यधवज स्वतह ही जुप
02:56गए।
02:58असुरों के गुप तचरों ने तुरंत यह समाचार अपने दानव राजाओं तक पहुँचाया कि स्वर्ग अब गुरु की सुरक्षा से
03:05वंचित हो चुका है।
03:07अपने गुरु का अनादर करके स्वर्ग को संकट में डालने वाले पश्चाताप से भरे इंद्र सिर जुका कर अत्यंत चिंता
03:15में डूब गए।
03:16अवसर का लाब उठाकर असुरों की विशाल सेना अस्त्रशस्त्रों से सुसजित होकर अमरावती के स्वर्ण द्वारों पर भूचाल की तरह
03:25तूट पड़ी।
03:27बिना गुरु के दिशानिर देश के देवराज इंद्र और अन्य देवता असंगठित हो गए जिससे दानवों के भयंकर बानों और
03:35प्रहारों के सामने वे टिक न सके।
03:38देवराज इंद्र का एरावत हाथी और दिव्य अस्त्रक गुरु कृपा के अभाव में निश्प्रभ होने लगे जिससे रणभूमी में असुरों
03:46का पलड़ा भारी होता चला गया।
03:48दानवी सेनापती के प्रचंड गदा प्रहार से पराजित होकर दुखी और भयभीत देवता रणभूमी छोड़कर दसों दिशाओं में भागने लगे।
03:58विजय के अहंकार में डूबे असुरों ने अमरावती के रतनों से जड़े राजसिनहासन पर अपना आधिपत्य जमाया और स्वर्ग पर
04:07असुर ध्वर्च फहरा दिया।
04:09निशकासित और श्रीहीन होकर इंद्र, अगनी, वायू तथा अन्य देवता ब्रहमांड के अंधेरे कंदराओं में शरण लेने को विवश हो
04:18गए।
04:19गेहन संकट में घिरे देवताओं को बोध हुआ की बिना आध्यात्मिक शक्ती और गुरु के मार्ग दर्शन के उनका समस्त
04:27वैभव और बल निरर्थक है।
04:29अपनी रक्षा का अन्य कोई मार्ग न देखकर समस्त देवता सर्वलोग पितामा भगवान ब्रहमा की शरण में जाने का द्रिड
04:38संकल्प लेते हैं।
04:40दुखी और लजजित देवता ब्रहमांडिय मार्गों से होते हुए अत्यंत कांतिमान और अलौकिक सत्यलोग की ओर बढ़ चले।
04:49सत्यलोग पहुँचकर देवताओं ने देखा कि भगवान ब्रहमा अपने चार मुखों से वेदों का पाठ करते हुए दिव्यकमल पुष्प पर
04:58आसीन है।
05:00देवराज इंद्र ने लज्या और भै से कापते हुए भगवान ब्रहमा के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया और अपनी दुर्धशा
05:08कह सुनाई।
05:09जगत्पिता ब्रहमा ने देवताओं की व्यथा सुनकर अत्यंत गंभीर स्वभाव से उनके कर्मों के परिणाम का आकलन किया।
05:19ब्रहमा जी ने इंद्र को उनके अहंकार की याद दिलाते हुए कहा कि पूजे गुरु ब्रिहस्पती का अपमान ही इस
05:26विनाशकारी पराजय का मूल कारण है।
05:30पितामा ब्रहमा ने देवताओं को सांत्वना देते हुए मार्ग बताया कि उन्हें अविलंब किसी महान तपस्वी और ज्यानी महापुरुष को
05:38अपना गुरु बनाना होगा।
05:41ब्रहमा जी ने प्रजाप्ती त्वष्टा के परम विद्वान और तेजस्वी पुत्र विश्वरुप को देवताओं के पुरोहित पद के लिए सर्वता
05:49योग्य बताया।
05:51ब्रहमा जी ने समझाया कि तीन मुखों वाले ज्यानी विश्वरुप अत्यंत कठोर तपस्या में लीन है और उनके पास असीम
05:59मंत्र शक्ती विद्यमान है।
06:02ब्रहमा जी के अमरित्तुल्य वचनों से नवजीवन पाकर समस्त देवताओं ने उन्हें नमन किया और महर्शित वश्टा के आश्रम की
06:11और प्रस्थान किया।
06:13महर्शी त्वश्टा के शांत और तपोमय आश्रम में देवताओं ने युवा विश्वरूप को घोर ध्यान साधना में लीन देखा
06:20इंद्र ने अत्यंत नमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर तपस्वी विश्वरूप के सामने अपनी विपत्ती रखी और उनसे देवगुरू का पद
06:30स्विकार करने की प्रार्थना की
06:33राजकिय प्रलोभनों से परे देवताओं की रक्षा और धर्म की पुनरस्थापना के लिए ज्यानी विश्वरूप ने उनका पुरोहित बनना स्विकार
06:41कर लिया
06:43देव पुरोहित का पद स्वीकार करने के पश्चात तेज़स्वी विश्वरूप ने देवराज इंद्र को आचमन करा कर परम पवित्र नारायन
06:51कवच की दीख्षा देनी प्रारंभ की
06:55रिशी विश्वरूप ने समझाया कि किस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग पर भगवान विश्णु के विभिन न अवतारों के नामों
07:02का नियास करके इस अभेद्य कवच को धारण किया जाता है
07:07इंद्र ने पूर्ण भक्ती भाव से अपने हाथों और अंगों पर बीजाक्षरों की स्थापना करते हुए स्वयं को चक्रपाणी नारायन
07:15के चर्नों में समर्पित कर दिया
07:18मंत्रों के प्रवाह के साथ जल के भय और अगाद सागर की गहराईयों में रक्षा हेतु भगवान मत्स्य का स्मरण
07:26किया गया
07:28पाताल और अंधकार्मय गर्थ से सुरक्षा के लिए विश्व के आधार रूप भगवान कूर्म के रूप का ध्यान केंद्रित किया
07:35गया
07:37शत्रों के भयंकर प्रहारों और प्रित्वी को हिला देने वाले संकटों से रक्षा के लिए महा प्रतापी वाराह देव का
07:44आहवान किया गया
07:46समस्त दिशाओं से होने वाले मायावी आक्रमनों का विनाश करने के लिए उग्र और कृपालु श्री निरिसिंह भगवान की सर्वव्यापी
07:54उर्जा का ध्यान किया गया
07:57चलकपट और भ्रम उत्पन करने वाली असुरी शक्तियों के प्रभाव को नश्ट करने के लिए भगवान वामन के दिव्यरूप का
08:04स्मरण किया गया
08:07अस्त्रशस्त्रों और बानों की वर्षा से शरीर की रक्षा हेतू परशुराम और मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम के अतुलनिय स्वरूपों का
08:15आवान हुआ
08:17मंत्रों की पूर्णाहुती के साथ ही भगवान नारायन की परमशक्ती इंद्र के चारों और एक अलोकिक स्वर्ण में ढाल बनकर
08:25प्रकट हुई
08:25इस अमोग नारायन कवच को धारन करते ही देवराज का संपून अस्तित्व दिव्यकिर्णों से आच्छादित होकर पूर्णत है अभेद्य हो
08:35गया
08:36कवच की शक्ती से नए उत्साह से भरकर देवराज इंद्र ने रणभेरी बजवाई और समस्त देवगन युद्ध के लिए संगठित
08:44हो गए
08:46अभर्पद प्राप्त कर देवताओं का विशाल सैन्य बल अंधकार से घिरे हुए असुरी छेत्र की ओर महाप्रस्थान करने लगा
08:55जैसे ही देव सेना समीग पहुँची असुरों के विशाल जुंड ने अपनी भयंकर गर्जना के साथ विशैले अस्त्र और ज्वाला
09:03मुख्ये पत्थर बरसाने प्रारंभ कर दिये
09:06किन्तु जैसे ही असुरों के घातक बान और मायावी अस्त्र इंद्र के पास पहुँचे वे नारायन कवच की स्वर्ण किर्णों
09:14से टकरा कर तिनके के समान भस्म हो गए
09:18अपने अस्त्रों को निश्फल होते देख असुरों में खलबली मच गई और इंद्र ने अपनी अलौकिक गदा से उनकी पंक्तियों
09:26को छिन्न भिन्द कर दिया
09:28इंद्र के अभेद्य प्रभाव से प्रेरित होकर अगनी वायू और वरुन देव ने भी अपनी प्रचंड शक्तियों से दैतियों पर
09:36भीशन प्रहार किया
09:38नारायन के नाम के समक्ष अपने सारे तंत्र और माया को अस्फल देख पराजित असुरी सेना मैदान छोड़कर भागने पर
09:46विवश हो गई
09:48युद्ध भूमी पर विजय की दुन्दुभी बजी और देव गणों ने पुश पवर्शा करते हुए श्री हरी नारायन और अपने
09:55रक्षक कवच की जैजैकार की
09:58विजय के अनंतर देवराज इंद्र ने परम ज्यानी विश्वरूप के चर्णों में नत्मस्तक होकर इस अमर ज्यान और रक्षाकवच के
10:06लिए उनका कोटी-कोटी धन्यवाद किया
10:10देवराज इंद्र के विनम्र आगरह पर परम ज्यानी और शांतचित महर्शी विश्वरूप ने देवों के पुरोहित का पद स्विकार कर
10:18यग्यकी वेदी पर अपना स्थान ग्रहन किया
10:22मंत्रों की अत्यंत तीवर और पवित्र ध्वनी के बीच विश्वरूप के तीनों मुखों ने अलग-अलग वेद मंत्रों का गान
10:29करते हुए यग्य की दिव्य अगनी को प्रजवलित रखा
10:33यग्य की इस परम पवित्र बेला में विश्वरूप के मन में अपनी माता रचना के प्रतीस नह जागा, जो दैत्य
10:40वंश से संबंध रखती थी
10:43पुत्रधर्म और मात्रिपक्ष के गुप्त मोह के कारण विश्वरूप देवों के समक्ष तो मंत्र पढ़ते रहे, परन्तु गुप्त रूप से
10:51उन्होंने आहुती का एक भाग दैत्यों को अर्पित करना आरंभ कर दिया
10:57अंधकार्मई पाताल लोग की गहराईयों में दुर्बल हो चुके असुरों ने जैसे ही इस गुप्त आहुती की शक्ती को प्राप्त
11:04किया, उनके निर्जीव शरीरों में पुनह बल का संचार होने लगा
11:09स्वर्ग के स्वर्ण सिनहासन पर विराजे इंद्र ने अनुभव किया कि देवताओं का तेज बढ़ने के बजाय क्षीन हो रहा
11:16है, जिससे उनके मन में गहरा संदेह उत्पन हुआ
11:21संदेह के वशी भूत होकर, देवराज इंद्र ने यग्यशाला की ओर अपनी पैनी द्रिश्टी घुमाई और वेदी से बहने वाली
11:29उर्जा के प्रवाह को ध्यान से देखने लगे
11:32इंद्र ने देखा कि विश्वरूप का एक मुख चुपचाप ऐसे मंत्रों का उच्चारण कर रहा है, जो देवताओं के शत्रों
11:40को बली प्रदान कर रहे थे, जिससे उनका क्रोध भड़क उठा
11:45अपने ही पुरोहित द्वारा किये गए इस भयनकर विश्वासघात को देख, इंद्र का धैर्य पूरी तरह से तूट गया और
11:53उनकी आँखे क्रोध से लाल हो गई
11:56इंद्र ने चिल्लाते हुए विश्वरूप से इस अक्षमय अपराध और देवताओं के पीठ पीछे किये गए इस शड्यंत्र का उत्तर
12:04मांगा
12:06परंतु ज्ञानी विश्वरूप ने तनिक भी भयभीत न होकर स्पष्ट कर दिया कि मात्रिकुल के प्रती उनका कर्तव्य भी उतना
12:14ही सत्य है जितना देवताओं के प्रती
12:17अपने अपमान और सामराज्य के छिन जाने के भय से अंधे होकर इंद्र ने मर्यादाओं को भुला कर अपनी चमचमाती
12:25तलवार म्यान से खींच ली
12:28बिना किसी दया या विचार के देवराज इंद्र ने एक ही भीशन प्रहार से शांत बैठे तपस्वी विश्वरूप के तीनों
12:36सिर धड़ से अलग कर दिये
12:38वध के तुरंत बाद विश्वरूप के वे तीन कटे हुए सिर अत्यन्त रहस्यमे रूप से तीन अलग-अलग पक्षियों के
12:46रूप में परिवर्तित होकर आकाश में उड़ गए
12:49तभी यज्यकी पवित्र अगनी से एक अत्यन्त भयानक, काली और दरावनी आकरिती प्रकट हुई जो ब्रहमहत्या के महापाप का साक्षात
12:59रूप थी
13:00वह डरावनी ब्रहमहत्या की छाया चीखती हुई इंद्र की ओर बढ़ी और उनके डैविय शरीर से चिपक गई जिससे उनका
13:09सारा तेज नश्ट होने लगा
13:12ब्रहमहत्या की इस भीशन पाप के प्रभाव से इंद्र का मस्तक जुक गया और वे अत्यंत दुर्बल तथा गलानी से
13:19भरे हुए यज्यवेदी के पास भूमी पर गिर पड़े
13:23पूरे एक वर्ष तक इंद्र ने इस भयानक पाप की प्रताड़ना को सहा और अपने महल में एकांतवास करते हुए
13:31शुद्धी का मार्ग खोजने का प्रयास किया
13:34अंतह इस असहनिय भार से मुक्ती पाने के लिए इंद्र ने अपने पाप को चार समान भागों में बाटकर प्रित्वी,
13:42जल, व्रिक्ष और स्त्रियों को सौंपने का निर्णय लिया
13:47वर्दानों के बदले इस पाप को स्वीकार करने पर प्रित्वी में मरुस्थल, जल में फेन, व्रिक्षों में गोंद और स्त्रियों
13:54में मासिक धर्म के रूप में वह ब्रहम हत्या का पाप आज भी दिखाई देता है
14:00अपने निर्पराध पुत्र विश्वरूब की छलपूर्वक हत्या का समाचार सुनते ही महर्शी त्वष्टा का हृदय अपार शोक और प्रतिशोध की
14:09तीवर अगनी से जल उठा
14:12देवराज इंद्र के अहंकार और पाप दंड का न्याय करने के लिए महर्शी त्वष्टा ने एक ऐसे अविनाशी शत्रू को
14:19उत्पन करने का कठोर संकल्प लिया
14:22महर्शी त्वष्टा ने अतिभ्यानक अभिचार यग्य प्रारंब किया और वेद मंत्रों का तीवर स्वर में उच्चारन करते हुए हवनकुंड में
14:31विशेश आहुतियां देनी शुरू की
14:34यग्य की अगनी में दुरलब औश्धियां, समिधाएं और तांत्रिक मंत्रों से अभिमंत्रित आहुतियां डाली गई जिससे यग्यकुंड में भयंकर ज्वालाएं
14:44धधकने लगी
14:46त्वश्टा रिशी ने उच्चस्वर में मंत्र पढ़ते हुए प्रार्थनाकी की है यग्यपुरुष
14:51इंद्र को मारने वाला महाबली पुत्र इस कुंड से प्रकट हो
14:56किन्तु उच्चारण के एक सुक्षम स्वर्दोष के कारण इंद्र का संहारक बनने के स्थान पर वह यग्य जिसका संहारक इंद्र
15:04हो ऐसे जीव की उत्पत्ती का कारक बन गया
15:08अचानक पूरा भूमंडल कांप उठा और आकाश से कड़कती हुई आसुरी बिजलिया सीधे उस विशाल यग्यकुंड पर गिरने लगी
15:18यग्यकुंड के भीतर से भयंकर अंधकार और प्रल्यंकारी अग्नी का ज्वालापुंच बाहर उबलने लगा जैसे कोई सोता हुआ ज्वालामुखी फट
15:27पड़ा हो
15:27उस विशाल अग्निकुंड से वृतरासुर नाम का अत्यंत भयानक और विशालकाय असुर प्रकट हुआ जिसका शरीर अंधकार और ज्वालाओं से
15:37धका था
15:39उसका परवताकार शरीर इतना विशाल था कि ऐसा लगता था मानो वह सिर उठाकर पूरे आकाश और नक्षत्रों को स्पर्श
15:48कर रहा हो
15:49उसका भयानक मुख लाल तपे हुए तामबे की भांती चमक रहा था और उसकी सांसों से निकलने वाली अगनी दिशाओं
15:57को सुखाने लगी
15:59वृतरासुर की गर्जना से तीनों लोकों की धर्ती कामपने लगी और समुद्रों में विशाल अशांत लहरें उठने लगी
16:08उसके हाथों में प्रलेकारी अस्त्र और एक विशाल नुकीली गदा थी जो किसी भी परवत को क्षण भर में चूर्ण
16:16करने की क्षमता रखती थी
16:19वृत्रासुर की तृष्णा इतनी तीवर थी कि वह अपने विशाल मुक से बादलों और जलसरोतों को निगलने लगा जिससे सर्वत
16:27रहाहाकार मच गया
16:29महर्शित वश्टा ने उस भयंकर असुर को आदेश दिया कि है पुत्र जाओ और मेरे शत्रु इंद्र का उसके स्वर्ग
16:37सहित समूल नाश कर दो
16:39अपने पिता की आग्या पाकर वृत्रासुर ने स्वर्गलोग की ओर बढ़ना प्रारंब किया और उसके प्रतेक कदम से संपूर्ण प्रिथवीध
16:49हसने लगी
16:50दिशाओं में फैल्ती उसकी भयानक कांती और संहारक शक्ती को देखकर सभी देवता भय से कांप उठे और त्राहित्रा ही
16:59पुकारने लगे
17:01वृत्रासुर का प्रभाव इतना प्रचंड था कि उसने सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों के तेश को भी अपने अंधकार में तेश
17:09से ढख लिया
17:11स्वर्गलोग की सीमाओं में अंधकार चा गया और सभी देवगन अपनी राजधानी अमरावती को छोड़ कर सुरक्षित स्थानों की ओर
17:19भागने लगे
17:21देवराज इंद्र ने अपनी अमरावती की ओर बढ़ते इस महादैत्य को देखा और उनके मन में अपने अतीत के पापों
17:29का भयनकर भय समा गया
17:32व्रित्रासुर के महाविनाशकारी भय से कापते हुए देवराज इंद्र और समस्त भयभीत देवगन बादलों के मार्ग से होकर परमधाम वैकुंठ
17:41की ओर तीवर गती से पलायन करने लगे
17:45जैसे ही वैकुंठ के दिव्यद्वार खुले, वहां से निकलने वाले असीम और पावन प्रकाश ने देवताओं के मन के घोर
17:53अंधकार को क्शनभर में दूर कर दिया
17:55दिव्य सुगंध और अलौकिक शांती से परिपूर्ण वैकुंठ लोक में प्रवेश करते ही भैभीत देवगनों के व्याकुल हृदय को अपूर्व
18:04सांत्वना का अनुभव होने लगा
18:07शीरसागर के मध्य सहस्त्र फनो वाले शेशनाग के कोमल बिछोने पर विराजमान आदिपुरुष भगवान नारायन अपनी योग निद्रा में परम
18:16शांत प्रतीत हो रहे थे
18:19त्रिलोग के स्वामी को सम्मुख पाकर देवराज इंद्र व्याकुल होकर उनके चर्णों में गिर पड़े और रक्षा की भीख मांगते
18:27हुए अश्रु बहाने लगे
18:29इंद्र के पीछे खड़े सभी देवताओं ने भी परम्पिता नारायन के समक्ष अपने हाथ जोड लिये और एक स्वर में
18:37उनकी स्तुती करना प्रारंभ कर दिया
18:40देवताओं के आर्तनाद को सुनकर कृपालू भगवान श्री हरी ने अपनी कमल जैसी सुन्दर और शांत आखे धीरे-धीरे खोली
18:49शेशनाग की शया पर उठकर बैठते हुए जगतपालक नारायन ने भैभीत देवताओं की ओर अपना अभय हस्त उठाया जिससे चारों
18:58और आशा का संचार हो गया
19:01भगवान विश्णों की गंभीर और मधुरवानी वैकुंट के विशाल भवन में गूंच उठी जिसने देवताओं के व्याकुल हरिद्यों को शांत
19:10कर दिया
19:11श्री हरी ने देवराज से कहा कि व्रित्रासुर का यह प्रचंड तेज देवताओं के ही संचित पापों और अहंकार का
19:19परिणाम है जिसे साधारन शस्त्रों से पराजित नहीं किया जा सकता
19:24इसके पश्चात परमेश्वर ने देवताओं को एक अलोकिक उपाय बताते हुए अपनी दिव्य उंगली प्रित्वी लोग की एक पावन दिशा
19:33की ओर उठाई
19:34उस प्रकाश पुंच के मध्य गंगा तट पर स्थित एक शांट आश्रम में लीन परम तेजस्वी और ब्रहमग्यानी महर्शी दधीची
19:43दिखाई देने लगे
19:45भगवान नारायन ने प्रकट किया कि वृत्रासुर का सहार केवल महर्शी दधीची की वजर के समान सुद्रिध और पवित्र अस्थियों
19:53से बने अस्त्र से ही संभव है
19:56यह सुनकर इंद्र का हरिदय कांप उठा क्योंकि वे समझ गए थे कि एक जीवित और पूजनिय रिशी से उनकी
20:04अस्थियों का दान मांगना कितना कठिन कार्य था
20:08श्री हरी ने समझाया कि दधीची एक आत्म ज्यानी और परम भक्त हैं जिन्होंने मृक्यू पर विजय प्राप्त कर ली
20:16है और जिनका जीवन परोगकार के लिए समर्पित है
20:21भगवान ने इंद्र को आदेश दिया कि वे अपना सारा राजसी अहंकार त्याग कर एक याचक बनकर नमर्ता पूर्वक महर्शी
20:29दधीची की शरण में जाएं
20:32नारायन के इस परम आदेश को शिरोधार्य करते हुए समस्त देवताओं के मन में धर्म की विजय की एक नई
20:39किरन जागरित हो गुठी
20:42भगवान विश्नु को प्रणाम कर देवराज इंद्र और अन्य देवता वैकुंठ लोग से विदा होकर पृत्वी की ओर प्रस्थान करने
20:50लगे
20:51स्वर्ग के राजा होने के बाद भी आज इंद्र के मन में केवल एक विनमर याचक की भावना थी जो
20:58स्रिष्टी के कल्यान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तयार था
21:02इस प्रकार देवताओं का यह दल अपनी अमरावती की चिन्ता छोड़ कर सीधे नैमिशारने के घने जंगलों की ओर बढ़ने
21:11लगा जहां महर्शी दधीची निवास करते थे
21:16नैमिशारने के अतिपवित्र और शांत वातावर्ण में प्रवेश करते ही देवताओं को चारों और फैली अलोकिक आध्यात्मिक उर्जा की अनुभूती
21:25होने लगी
21:26एक विशाल वटवरिक्ष के तले दिव्य सूर्य की भांती तेजस्वी और शांतचित बैठे महर्शी दधीची का भव्य स्वरूप देवराज इंद्र
21:35और अन्य देवताओं के सामने प्रकट हुआ
21:39देवराज इंद्र ने बिना किसी अहंकार के अपना मस्तक महर्शी दधीची के चर्णों में टेक दिया और समस्त देवगण हाथ
21:47जोड़कर प्रणाम की मुद्रा में खड़े हो गए
21:51महर्शी दधीची ने मंद मुस्कान के साथ अपनी करुनापूर्ण आखें खोली और स्वर्ग के अधिपती इंद्र सहित समस्त देवताओं का
22:00आदर पूर्वक स्वागत किया
22:03महर्शी ने इंद्र की ओर देखते हुए कहा कि हे देवराज आपके चिंताग्रस्ट चहरे और देवताओं के इस व्याकुल रूप
22:10का क्या कारण है निसंकोच कहें
22:14इंद्र ने कापते स्वर में वृत्रासुर के भयंकर आतंक, अमरावती के पतन और तीनों लोकों पर छाए विनाश के संकट
22:22की व्यथा महर्शी के समक्ष व्यक्त की
22:25इंद्र ने भारी हृदय से बताया कि भगवान श्री हरी विश्नु के निर्देशानुसार केवल एक निश्पाप महर्शी की अस्थियों से
22:33बना अस्त्र ही उस महादैत्य का सहार कर सकता है
22:38लज्जा और गलानी से सिर जुका कर इंद्र ने महर्शी दधीची से स्रिष्टी की रक्षा हेतु उनकी पवित्र देह और
22:45अस्थियों का दान मांग लिया
22:47इस अभूत पूर्व और कठिन मांग को सुनकर भी महर्शी दधीची का चहरा तनिक भी विचलित नहीं हुआ बलकि उनके
22:55मुख पर एक अलोकिक आनंद की आभा चमक उठी
23:00महर्शी दधीची ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह नाशवान शरीर तो एक दिन मिट्टी में मिल ही जाना है
23:06यदि यह समस्त लोकों के कल्यान में काम आए तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा
23:13उन्होंने देवताओं को समझाते हुए कहा कि जो मनुष्य दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए अपने क्षण भंगुर
23:20शरीर का त्याग नहीं करता उसका जीवन व्यर्थ है
23:25महर्शी ने व्याकुल देवताओं को धैर्य बंधाया और सहर्ष घोषणाकी की वे स्रिष्टी की भलाई के लिए अपनी दे का
23:33त्याग करने को तत्पर है
23:36महर्शी दधीची ने भूमी पर पदमासन लगाया, अपनी रीड को सीधा किया और परमिश्वर के ध्यान में लीन होने के
23:44लिए अपनी आखे मूंद ली
23:47उन्होंने अपनी समस्ट इंद्रियों को संसार से समेट कर अपने चित्त को केवल सर्वव्यापी परब्रहम भगवान विश्णू के दिव्य स्वरूप
23:55में एकागर कर दिया
23:57योगविद्या के महान प्रभाव से उनके शरीर के भीतर कुंदलिनी शक्ती जागरित हुई और एक तीवर स्वर्णिन प्रकाश उनके मस्तक
24:06की और प्रवाहित होने लगा
24:09दधीची ने अपने प्राणों को ब्रहमरंध्र के मार्ग से उर्ध्वलोक में लीन कर दिया और अत्यंत शान्ति पूर्वक अपने भौतिक
24:17शरीर का त्याग कर दिया
24:18महर्शी के इस अध्वितिय महात्याग को देखकर आकाश से देवताओं ने पुषपवर्शा की और संपूर्ण नैमिशारणिय जय महर्शी दधीची के
24:29जयगोश से गूँझ गुठा
24:30अब वटवरिक्ष के नीचे महर्शी दधीची का प्राणहीन किन्तु असीम अलौकिक उर्जा से दधिप्यमान भौतिक शरीर योगनिद्रा की शांत अवस्था
24:40में विराजमान था
24:42देवराज इंद्र और अन्य सभी देवताओं ने महर्शी के उस परम पवित्र देह के समक्ष अश्रुपूरित नेत्रों से दंडवत प्रणाम
24:50किया
24:52स्रिष्टी के कल्यान का मार्ग प्रशस्थ होते ही विश्वकर्मा और देवतापरम पूज दधीची की दिव्य अस्थियों को प्राप्त करने की
25:00तयारी में लीन हो गए
25:03देवशिल्पी विश्वकर्मा ने अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ महर्शी दधीची की उन अलोकिक अस्थियों को एकत्र किया, जो तपस्या
25:12के तेज से प्रदीप्त हो रही थी
25:15तत्पश्चात विश्वकर्मा उन परम पवित्र अस्थियों को अपने दिव्य शिल्पस्थल पर ले आए, जहां ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली अस्त्र के
25:24निर्मान की प्रक्रिया आरंभ हुई
25:27भगवान विश्वकर्मा ने वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारण और संहारक दिव्य अगनी के बीच उन पवित्र अस्थियों को अजे धातु के
25:35साथ सन्योजित किया
25:38अथक्ष्रम और मंत्र शक्ती से अंत्य वजर का प्रक्ति करण हुआ, जो सहसरों सूर्यों के समान देधी प्यमान और अमोग
25:45विद्युप तरंगों से आविश्टित था
25:49देवशिल्पी विश्वकर्मा ने इस अजे वजर को अत्यंत आदर पूर्वक देवराज इंद्र को सौपा और उन्हें महर्शी दधीची के अमूल्य
25:57बलिदान का स्मरण कराया
26:00जैसे ही इंद्र ने उस वजर को अपने हाथों में धारण किया
26:04महर्शी के असीम तपोबल की प्रचंड उर्जा उनके संपूर्ण शरीर में प्रवाहित होने लगी
26:11अपनी शक्ती पुनह प्राप्त कर देवराज इंद्र अपने दिव्य चार दातों वाले विशाल श्वेथ हाथी एरावत पर आरूढ हुए और
26:19युद्ध की घोशना की
26:21इंद्र के आहवान पर अगनिदेव, वायुदेव, वरुन और मरुदगणो सहित संपूर्ण देवसेना चमकते हुए दिव्य अस्त्रशस्त्रों से सुसजित होकर एकत्र
26:31हो गई
26:33स्वर्गलोग के कपाट खुलते ही देवपुंच का यह अप्रतिम सैन्य दल शंकध्वनी और दुन्दुभी के नाद के साथ रणभूमी की
26:41ओर प्रस्थान करने लगा
26:43उधर विशालकाय असुर वृत्रासुर को जब देवताओं के पुनह सुसंगठित होकर आगमन की सूचना मिली तो उसका भीशन क्रोध भड़क
26:52उठा
26:54वृत्रासुर ने अपने सेनाप्तियों, नमुची, संभर और पुलोमा को तुरंथ ही अपनी पूरी दानवी सेना को युद्ध के लिए तयार
27:02करने का आदेश दिया
27:04शन भर में अंगिनत भयानक दानव, विशालकाय गदाय, भाले और विशैले बान लेकर गर्जना करते हुए रणभूमी में उमड़ पड़े
27:14दोनों विशाल सेनाय जब आपस में टकराई तो ब्रहमांड का वह महा संग्राम संपूर्ण दिशाओं को कम्पित करने लगा
27:23आकाश में दिव्य अस्त्रों और राक्षसी माया का ऐसा भयंकर टकराव हुआ कि तीनों लोकों के प्राणी थर-थर कामपने
27:31लगे
27:32व्रित्रासुर ने अपनी असीम शक्ती का प्रदर्शन करते हुए विशाल गदा से देवताओं के रथों और हाथियों को क्षन भर
27:40में ध्वस्त करना शुरू कर दिया
27:42असुरों के इस भीशन प्रहार से देवसेना में खलबली मच गई और कई वीर देवता पीछे हटने के लिए विवश
27:50हो गए
27:50यह देख देवराज इंद्र ने साहस समेटा और महर्शी दधीची तथा भगवान विश्नु के चर्णों का ध्यान करते हुए मोर्चे
27:59को संभाला
28:00इंद्र सीधे वृत्रासुर के समक्ष पहुँचे और दोनों महाबलियों के बीच सीधे द्वंदवयुद्ध का अंथीन सिलसिला शुरू हो गया
28:11वृत्रासुर के प्रचन प्रहार से एक बार तो एरावत घुटनों के बलगिर पड़ा लेकिन इंद्र ने सन्यम बना कर वजर
28:18को और अधिक तेज से प्रजवलित किया
28:22अब संपूर्ण ब्रहमांड की द्रिष्टी उस निनायक पल पर टिक गई जहां अजे वजर्धारी इंद्र और महाबल्शाली वृत्रासुर का महा
28:30संग्राम अपने चर्मोतकर्श की ओर बढ़ रहा था
28:34भीशन संग्राम के मध्य में अचानक वृत्रासुर का प्रहार धीमा पड़ गया और उसके विशाल मुखपर परम आध्यात्मिक शान्ती का
28:43अध्भुत प्रकाश छलकने लगा
28:46वृत्रासुर के अंतरमन में उसके पूर्वजन्म का चित्र कौंध गया, जहां वह राजा चित्रकेतु के रूप में भगवान नारायन की
28:54अनन्य भक्ती में लीन रहा करता था
28:58प्रतिशोध और क्रोध के स्थान पर अब वृत्रासुर के नेत्रों से श्रीहरी के चर्णों के प्रती विशुद्ध प्रेम और परम
29:05भक्ती की अश्रुधारा बहने लगी
29:08वृत्रासुर ने शांत और गंभीर वानी में इंद्र को संबोधित करते हुए ऐसा दार्षनिक ज्यान देना आरंभ किया की संपूर्ण
29:16युद्धभू में स्थब्ध रह गई
29:19उसने इंद्र से कहा कि संसार में जय पराजय, सुख दुख और जीवन मृत्यु केवल परमेश्वर की लीला के भिन्न
29:26भिन्न नियम मात रहें
29:29वृत्रासुर ने स्पष्ट किया कि महर्षि दधीची की पवित्र अस्थियों से निर्मित यह वजर भगवान श्रीहरी की ही इच्छा का
29:37क्रियान वयन कर रहा है
29:39एक असुर के मुख से वेदान्त और भक्ती के ऐसे गूढ रहस्य सुनकर देवराज इंद्र आश चर्यचकित होकर निर्निमेश द्रिष्टी
29:48से देखते रह गए
29:50वृत्रासुर ने घोशना की की उसका यह नश्वर शरीर तो केवल एक वस्त्र है परन्तु उसकी आत्मा सदैव श्रीहरी के
29:58चर्णों में ही लीन रहेगी
30:00उसने अपने हृदय में प्रार्थनाकी की चाहे वह किसी भी योनी में जन्म ले उसे सदा भगवान के दासों के
30:08दासों की सेवा का सौभाग्य प्राप्थ हो
30:11आकाश में उपस्थित सिध, गंधर्व और रिशिमुनी वृत्रासुर के इस परम वैराग्य और अनन्य भक्ती भाव को देखकर उसकी प्रशंसा
30:20करने लगे
30:22वृत्रासुर ने इंद्र को प्रेरित करते हुए कहा कि वे बिना किसी संकोच के अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करें
30:29और वजर का प्रहार करें
30:32देवराज इंद्र के मन में वृत्रासुर के प्रती शत्रुता मिट गई और उन्हें उसमें एक महाग्यानी भक्त के दर्शन होने
30:40लगे
30:42वृत्रासुर ने पुनस मरण कराया कि मोह और ममता ही आत्मा के बंधन हैं जिन्हें केवल ज्यान की तलवार से
30:49ही काटा जा सकता है
30:52वृत्रासुर ने अपने अंतहकरण में भगवान चतुर्भुज नारायन के शंक, चक्र, गदा और पदमधारी स्वरूप का ध्यान केंद्रित किया
31:01उसके कठोर चहरे की रेखाए कोमल हो गई और नेत्रों से आनंद के आसु बहते हुए उसकी परम निष्ठा को
31:09प्रकट कर रहे थे
31:11उसने दोनों बाहें फैला कर नियती के उस अंतिम प्रहार का स्वागत ऐसे किया जैसे कोई भक्त अपने प्रभु के
31:19आलिंगन की प्रतीक्षा करता है
31:21युद्ध का भयानक को लाहल शान्थ हो गया और वायुमंडल में दिव्य सुगंध तथा शान्थ तरंगे प्रस्पुतित होने लगी
31:31इंद्र ने वृत्रासुर के इस अगाध भक्ती भाव को नमन करते हुए अपने वजर को पूर्ण सामर्थ्य के साथ प्रजवलित
31:38किया
31:40वृत्रासुर के अंतिम शब्द केवल भगवान श्रीहरी के पावन नाम का संकीर्तन और अपनी चेतना का पूर्ण समर्पन थे
31:49परमशान्ती और भक्ती में लीन होकर वृत्रासुर इंद्र के वजर प्रहार का सामना करने के लिए पूर्णत है तक पर
31:56खड़ा रहा
31:58भगवान श्रीहरी का ध्यान करते हुए वृत्रासुर पर देवराज इंद्र ने अपने दिव्य वजर से अंतिम प्रहार किया जिससे संपून
32:06आकाश भीशन विद्युक ज्वालाओं से प्रज्वलित हो उठा
32:11महर्शी दधीची की अस्थियों से निर्मित अत्यंत शक्तिशाली वजर ने वृत्रासुर के शीश को धड़ से विलग कर दिया जिससे
32:18वह विशालकाय असुर प्रित्वी पर आगिरा
32:22वृत्रासुर के गिर्ते ही विशाल भूखंड कांप उठा और समस्थ लोकों में असुर राज के अंतिन क्षणों का सन्नाट आचा
32:30गया
32:30उसी क्षण वृत्रासुर के भौतिक शरीर से एक अत्यंत देधी प्यमान स्वर्ण में दिव्य जोती निकली जो सम्पूर्ण ब्रहमांड को
32:39आलोकित करने लगी
32:42वह परम पवित्र जीवात्मा संसार के समस्थ भौतिक बंधनों को तोड़ कर भगवान श्रीहरी के परम धाम वैकुंठ की ओर
32:49अग्रसर होने लगी
32:52वैकुंठ लोक में चतुर्भुज रूप में विराजमान भगवान श्रीमन नारायन के समक्ष वह दिव्य जोती पूर्ण भक्ती भाव से उपस्थित
33:00हुई
33:02असुर्देह का त्याग कर वृत्रासुर की आत्मा सदास्दा के लिए भगवान श्रीहरी के पावन चरण कमलों में विलीन हो गई
33:10आकाश से देवताओं और गंधर्वों ने इस अद्भुत मोक्ष के द्रिशे को देखकर पुष्पवरिष्टी की और वृत्रासुर की अनन्य भक्ती
33:18की सराहना की
33:21समस्थ देवगण असुर कुल में जन में इस महान भक्त के परम निशकाम भाव और हरिभक्ती के गीतों का गायन
33:28करने लगे
33:29युद्ध भूमी में विजय प्राप्त करने के पश्चात भी देवराज इंद्र का मन एक अज्यात गलानी और स्तब्धता से भर
33:37गया
33:38इंद्र ने देखा कि जिस असुर को उन्होंने शत्रु मान कर मारा वह वास्तव में भगवान नारायन का परमश्रिष्ट और
33:46अनन्य भक्त था
33:48विजय के इसक्षण में भी इंद्र का हृदय ब्रहमहत्या के पाप के भय और अपने अहंकार के तूटने से भारी
33:55होने लगा
33:57दधीची रिशी की पवित्र अस्थियों से बना वजर अब इंद्र के हाथों में विजय का नहीं, बलकि महान त्याग और
34:04भक्ती की याद दिला रहा था
34:07महर्शी दधीची के सर्वोच आत्मत्याग और वृत्रासुर की परम भक्ती के सामने इंद्र स्वयन को अत्यंत छोटा अनुभव करने लगे
34:16ब्रह्मा जी और समस्त महर्शियों ने आकर इंद्र को सांत्वना दी और भगवान विश्नु के इस गूड लीलारहस्य का ज्यान
34:24कराया
34:26इंद्र ने वृत्रासुर के पावन स्थान को नमन किया जहां एक असुर ने अपने अनन्य प्रेम से परंपत प्राप्त किया
34:33था
34:35देवताओं ने भगवान श्रीहरी की स्तुती करते हुए स्विकार किया कि संसार में सर्वोच शक्ती केवल केवल भक्ती और शर्नागती
34:43ही है
34:45महर्शी शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को बताया कि कैसे चित्रकेतु का जीव अपनी पूर्व साधना और भगवान के अनुग्रह
34:53से वृत्रासुर के रूप में भी परम भक्त रहा
34:57शुकदेव जी ने समझाया कि भगवान श्रीहरी की भक्ती कुल जाती या रूप पर निर्भर नहीं करती बलकि केवल हृदय
35:05की पवित्रता पर निर्भर करती है
35:08यह सुनकर राजा परीक्षित का मन भगवान नारायन के चर्णों में और अधिक स्थिर हो गया और उनके भीतर से
35:16मृत्यू का भै सर्वता समाप्त हो गया
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