महाराजा पृथु के वैकुण्ठ गमन के पश्चात, उनके वंशज किस मार्ग पर चले? इस एपिसोड में देखें कैसे महाराजा प्राचीनाबर्हि अपने यज्ञों में लीन थे, और कैसे देवर्षि नारद उन्हें कर्मकांड के मायाजाल से बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। कहानी एक नया मोड़ लेती है जब प्राचीनाबर्हि के दस तेजस्वी पुत्र, प्रचेताओं को भगवान शिव का अद्भुत दर्शन प्राप्त होता है। महादेव स्वयं उन्हें 'रुद्र-गीत' का ज्ञान प्रदान करते हैं, जो विष्णु भक्ति का परम मार्ग दिखाता है। क्या है यह रहस्यमय मंत्र और कैसे यह प्रचेताओं के जीवन को बदल देगा? जानिए इस रोमांचक आध्यात्मिक यात्रा में! #BhagavataPurana #Prachetas #LordShiva #RudraGita #VishnuBhakti #HinduMythology #S3Ep15 #Puranas #SpiritualJourney
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00महान समराट पृत्व के वैराग्य धारण कर परमधाम गमन के पश्चात उनके जेश्ट पुत्र विजिताश्व ने आर्यावर्थ के सिनहासन का
00:08धर्म पूर्वक कार्यभार संभाला।
00:12विजिताश्व जिन्हें अपनी अंतरधान होने की असीन विद्या के कारण अंतरधान भी कहा जाता था ने प्रजाकी रक्षा को ही
00:20अपना सर्वोच कर्तव्य बनाया
00:23महाराज अंतरधान ने अपने भाईयों को सामराज्य के विभिन समरिध प्रांतों का स्वामी बनाकर प्रिथवी पर अखंड सुख और शांती
00:32की स्थापना की
00:33समय के साथ महाराज अंतरधान ने अपनी धर्म पत्नी शिखंडिनी के साथ ग्रिहस्थ जीवन बिताते हुए अत्यंत तेजस्वी पुत्र हविर्धान
00:43को जन्म दिया
00:44जब राजा अंतरधान ने अपना राजकाज पूर्ण कर लिया तब उन्होंने योग्य और धर्मनिष्ट हविर्धान को संपूर्ण प्रित्वी का नया
00:54राजा घोशित किया
00:56महाराज हविर्धान ने अपने पूर्वजों की भांती ही न्याय, दान और तपस्या द्वारा अपनी प्रजा का पालन पोशन करना प्रारंभ
01:04किया
01:06हविर्धान के कुल में छै अत्यंत श्रेष्ट पुत्रों का जन्म हुआ, जिन में से प्राचिनाबरही अपनी तीवर मेधा और कर्मकांड
01:14के प्रती समर्पन के लिए प्रसिद्ध हुए
01:17राजकुमार प्राचिनाबरही ने अलपायु में ही वेदों का गेहन अध्ययन किया और यग्यनुष्ठानों की समस्तगूर विद्याओं पर पूर्ण अधिकार प्राप्त
01:27कर लिया
01:28हविर्धान के पश्चात प्राचिनाबरही का राज्या भिशेक हुआ और उन्होंने संपूर्ण धर्ती पर अपने चक्रवर्ती शासन का शंखनाद किया
01:38राजा प्राचिनाबरही को यह नाम इसलिए मिला क्योंकि वे पूरे भूमंडल पर पूर्व दिशाकी ओर अग्रभाग करके पवित्र कुशा घास
01:47बिछाकर लगातार यग्य करते थे
01:51महाराज प्राचिनाबरही ने प्रित्वी के कोने-कोने में अंगिनत भव्य यग्यों का आयोजन कर संपूर्ण धर्ती को यग्यवेदियों से आच्छा
01:59दित कर दिया
02:01सैक्डों यग्यों से निकलने वाले होम के काले धुए ने आकाश को ऐसे ढख लिया कि सूर्य देव की किरने
02:08भी धर्ती तक कठिनाई से पहुँच पाती थी
02:12यद्यपी राजा का उद्देश्य धर्म का पालन था परंतु अत्यधिक पशुबली वाले कर्मकांडों में लीन होने के कारण उनके पुन्य
02:20में दोश उत्पन्न होने लगा
02:21इसी काल में महाराज प्राचिनाबरही का विवाह समुद्र देव की कन्या अत्यंत सुन्दरी शतदृती के साथ महान वैदिक रितिरिवाजों से
02:31संपन्न हुआ
02:33शतदृती के अपूर्व सौन्दर्य और दिव्य गुनों को देखकर वहां उपस्थित देवता और गंधर्व भी मंत्र मुग्ध हो गए
02:42प्राचीनाबरही और शतदृती के योग से दस परम ज्यानी और गुनवान पुत्र उत्पन हुए जो इतिहास में प्रचेता नाम से
02:50विख्यात हुए
02:52ये दस प्रचेता बालेकाल से ही एक समान विचार, एक ही धर्म और परस्पर अटूट प्रेम की भावना से उत्परोत
03:00थे
03:01जब प्रचेता युवा हुए, तब उनके पिता प्राचीनाबरही ने उन्हें आदेश दिया कि वे स्रिष्टी के विस्तार हेतु भगवान विश्नु
03:10की तपस्या करें
03:12पिता की आग्या को सर्वोप्री मान कर दसों प्रचेता राजसी वस्त्रों का त्याग कर पश्चिमोत्तर दिशा की ओर तपस्या के
03:20लिए निकल पड़े
03:22घने जंगलों और पर्वतों को पार करते हुए प्रचेता एक अत्यंत विशाल और दिव्य सरोवर के तट पर पहुँचे जहां
03:30एक महान घटना उनका इंतजार कर रही थी
03:34उस दिव्य सरोवर का जल इतना निर्मल था कि उसमें आकाश के तारे और नक्षत्र स्पष्ट प्रतिबिम्बित होते थे जैसे
03:42वे स्वयन धर्ती पर उतर आये हुँ
03:46प्रचेता उस अलौकिक सौंदर्य में डूब कर परमशांती का अनुभव कर रहे थे जब अचानक एक अध्भुत ध्वनी ने बातावर्ण
03:54में कमपन उत्पन कर दिया
03:57सरोवर के मध्य से एक तीवर प्रकाश पुझ उठा जो सहस्र सूरियों के समान तेजस्वी था जिसने चारों और की
04:04निशा को दिन में परिवर्तित कर दिया
04:07उस प्रकाश के गर्ब से स्वया भगवान शिव प्रकट हुए जिनकी महीमा और सौंदर्य ने प्रचेताओं को विस्मय से भर
04:15दिया
04:17दसों प्रचेता उनके अलौकिक रूप को देखकर स्वता ही घुटनों के बल बैठ गए उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहनिकली और
04:25मुक से स्थुती के शब्द फूट पड़े
04:28महादेव ने अपनी शांत करोणामई द्रिष्टी से प्रचेताओं को देखा और उनके मन के भय को क्षन भर में शांत
04:36कर दिया
04:37उनकी गंभीर और मधुरवानी आकाश में गूझ उठी जिसने प्रचेताओं के हिड़य को अमरित से भर दिया
04:45महादेव ने उनके पिता प्राचिनाबरही के विशाल यग्यों का उल्लेख किया, जो कर्मकांड में लीन होकर शाश्वत सुख की खोज
04:53कर रहे थे
04:55उन्होंने समझाया कि केवल बाहरी कर्मकांडों से नहीं, बलकि आंतरिक शुद्धी और सच्ची भक्ती से ही परम तत्व की प्राप्ती
05:04संभव है
05:06फिर करुणामई महादेव ने उन्हें वह गुप्त महामंत्र सिखाया, जो साक्षात भगवान विश्णु की अहेतु की कृपा प्राप्त करने का
05:14दिवे साधन था
05:16महामंत्र के प्रत्येक अक्षर से असीम शान्ती और शक्ती का अनुभव हुआ, जो उनके अंतरात्मा को पूर्णत है पवित्र कर
05:25रहा था
05:26प्रचेता उस मंत्र को अपने हृदय में अंकित कर रहे थे, जैसे कोई प्यासा यात्री अमरित के जरने से त्रिप्थ
05:33हो रहा हो
05:35भगवान शिव ने तब भगवान विश्णु की अनंत महिमा और उनके विश्वव्यापी स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया
05:43उन्होंने सिखाया कि कर्मों के फल की इच्छा छोड़कर केवल प्रेम और समर्पन से की गई भक्ती ही सर्वोच मार्ग
05:51है
05:53महादेव ने प्रचेताओं को उनकी तपस्या में अडिग रहने और इस महामंत्र का निरंतर जाप करने का निर्देश दिया
06:01शिव के वचनों ने प्रचेताओं के हरिदय को दिव्यग्यान से भर दिया उनकी आत्माएं प्रकाशित हो उठीन और वे एक
06:09नए उद्देश से उत्प्रोथ हो गए
06:13महादेव ने उन्हें सभी प्रकार के विघनों से रक्षा और उनकी तपस्या की सफलता का आशिरवात प्रदान किया
06:21फिर अध्भुत प्रकाश के साथ भगवान शिव धीरे धीरे सरोवर के मध्य में विलीन होने लगे उनकी छवी आकाश में
06:29घुलती चली गई
06:31महादेव के अंतरध्यान होने के बाद भी वातावर्ण में उनकी दिव्य उर्जा और शान्ती का अनुभव देर तक बना रहा
06:40गुरु के रूप में शिव द्वारा दिये गए महामंत्र और मार्ग दर्शन को हृदय में धारण कर प्रचेता अपनी तपस्या
06:47के अगले चरण के लिए आगे बढ़ चले
06:51शिव के परम ज्ञान को हृदय में संजोय प्रचेता वन की गहन शान्ती में अपनी एकाग्र तपस्या में लीन हो
06:58गए मानो समय और संसार की सुध भूल बैठे हूँ
07:03उसी क्षन स्वर्गलोग के दिव्य नभमंडल से देवर्शी नारत की तेजस्वी द्रिष्टी प्रित्वी के विस्त्रित भूभाग पर पड़ी जहां अनेकों
07:12यग्यों की अगनिशिखाएं आकाश को भेद रही थी
07:16उनकी द्रिष्टी महाराजा प्राचीनाबरही के विशाल सामराज्य पर्टी की जहां निरंतर अश्वमेध यग्यों की धूम मची थी और प्रित्वी पर
07:25हर ओर यग्यवेदिया सुशोगित थी
07:29राजा प्राचीनाबरही स्वयं उन यग्यों में इतने तल्लीन थे कि उनके आसपास की पूरी भूमी कुशा घास से ढख गई
07:37थी जो अनवरत बली और अनुष्ठानों का प्रतीक थी
07:42देवर्शी नारद ने देखा कि राजा केवल कर्मकांड के बाहरी आवर्ण में खो गए हैं और उनकी आत्मा भौतिक यग्यों
07:49की भीड में वास्तविक आध्यात्मिक्ता से दूर होती जा रही है
07:55उनके हृदय में गहरी चिन्ता उभर आई कि यह अनवरत यागिक क्रियाय राजा को मोक्ष के मार्ग से विमुख कर
08:02केवल क्षण भंगुर स्वर्ग सुखो की ओर धकेल रही हैं
08:07उन्होंने तक्षण निश्चय किया कि वे प्रित्वी पर जाकर राजा प्राचीनाबरही को वास्तविक ज्ञान का मार्ग दिखाएंगे जो केवल कर्मकान
08:16से परे हैं
08:18अपनी दिव्यवीना महाती को साधते हुए, नारद मुनी आकाश गंगाओं के मध्य से होते हुए, प्रित्वी की ओर तीवर गती
08:26से अग्रसर हुए
08:28वे सीधे प्राचीनाबरही के विशाल यग्यस्थल पर पहुँचे, जहां सैक्डों रिशी और पुरोहित मंत्रों चारण करते हुए यग्य की पवित्र
08:37अग्नी को प्रजवलित कर रहे थे
08:40यग्य की अग्नी से उठते धुआ और घी की सुगंध से पूरा वातावर्ण व्याप्ट था, जो कर्मकांड की चरम सीमा
08:48को दर्शाता था
08:50राजा प्राचिनाबर ही यद्यवेदी के समक्ष आसन ग्रहेन किये, पूर्ण एकाग्रता से आहुतिया दे रहे थे, उनके चहरे पर संतुष्टी
08:59और ग्रिड़ता का भाव था
09:02यग्य की गर्जना और मंत्रों के बीच ही, राजा की द्रिष्टी नारद मुनी पर पड़ी, जो शांत और स्थिर खड़े
09:09थे, उनके मुख पर एक दिव्य मुस्कान थी
09:13राजा ने ततकाल अपने आसन से उठकर देवर्शी का आदरपूर्वक स्वागत किया, उनके आगमन को एक महान सौभाग्य मान कर
09:23नारद मुनी ने राजा को आशिरवाद दिया, किन्तु उनकी आखों में एक गहरी चिंता की छाया थी, जिसे राजा तुरंत
09:31भाप न सके
09:33शांत भाव से नारद ने राजा से उनके निरंतर यग्यों और उनकी अनवरत कर्मकांडिय व्यस्तता के बारे में पूछा
09:42राजा प्राचिनाबरही ने गर्व से अपने असीमित यग्यों के फल, स्वर्ग के सुख और धर्म की स्थापना का बखान किया
09:50नारद मुनी ने गंभीर स्वर में कहा कि केवल कर्मकांड से आत्मा की वास्तविक शांती नहीं मिलती, बलकि वह तो
09:58क्षन भंगुर फलों की ओर ले जाती है
10:02उन्होंने समझाया कि वास्तविक ज्ञान भौतिक सुखों की आसकती से मुक्ती और आत्म बोध में नहित है, न की केवल
10:10बाहरी अनुष्ठानों में
10:12राजा प्राचीना बरही के चहरे पर पहली बार एक विचार की रेखा उभरी, जैसे ज्ञान का एक नया बीज उनके
10:20मन में बोया जा रहा हो
10:22नारद मुनी ने राजा की उचसुक्ता को भापते हुए उन्हें एक प्राचीन कथा सुनाने का निश्चे किया, जो उन्हें धर्म
10:30के गूड रहस्य से अवगत कराती
10:33देवर्शी नारद ने राजा प्राचीनाबर्ही के भ्रम को मिटाने के लिए उन्हें राजा पुरंजन की एक अत्यंत रहस्यमई और सांकेतिक
10:42कथा सुनाना आरंब किया
10:44पुरंजन नाम का एक विवेखीन राजा अपने लिए एक सर्वगुन संपन्न और सुन्दर नगर की तलाश में संपूर्ण संसार में
10:53निरंतर भटक रहा था
10:55अनेक स्थानों पर भटकने के पश्चात उसे हिमालय के दक्षिन में नौ द्वारों से सुसज्जित एक परम वैभवशाली और अध्भुत
11:03नगर दिखाई दिया
11:05उस नगर के मनियुक्त राजमलों, स्वर्ण के द्वारों और सुगंधित पुष्पों से लदे उपवनों को देखकर पुरंजन का मन पूर्णता
11:14मोहित हो गया
11:16वहां उसकी भेंट एक अत्यन्त रूप वती स्त्री से हुई, जिसकी सुरक्षा में एक विशाल पांच फनो वाला सर्प और
11:23दस बलवान सेवक तैनात थे
11:26कामातुर पुरंजन ने उस सुन्दरी के पास जाकर उसका परिचय पूछा और उसके साथ उसी नगर में रहने की तीवर
11:34इच्छा प्रकट की
11:36उस स्त्री की सहमती मिलने के बाद राजा पुरंजन उस नगर के नौ द्वारों से संचालित होने वाले विश्यभोगों में
11:43पूरी तरहे लीन हो गया
11:46आसक्ती के वशी भूत होकर पुरंजन अपनी आत्मचेतना भूल बैठा और अपनी रानी के प्रत्येक संकेत पर नाचने वाला दास
11:54बन गया
11:56वर्षों बीत जाने के बाद काल का प्रतीक चंडवेग नामक एक शक्तिशाली गंधर्व तीन सौ साथ बलवान योधाओं के साथ
12:05नगर पर आक्रमण करने आया
12:08चंडवेग की विनाशकारी सेना ने नौ द्वारों वाले उस नगर को चारों और से घेर कर भयंकर तबाही मचानी शुरू
12:15कर दी
12:16नगर का एक मात्र रक्षक वह पाँच फनो वाला महासर्प शत्रूं से निरंतर युद्ध करते करते अत्यंत क्षीन और शक्तिहीन
12:25हो गया
12:26उसी समय जार नामक वृद्धावस्था की देवी और भयभीत करने वाले ज्वर ने पुरंजन के शरीर रूपी नगर पर सीधा
12:34धावा बोल दिया
12:36सम्पूर्ण नगर को भयंकर लप्टों ने घेर लिया और राजा पुरंजन अपने सुन्दर महल को नश्ट होते देखकर अत्यंत व्याकुल
12:44और भयभीत हो उठा
12:47मृत्यू के अंतिम ख्षणों में भी पुरंजन परमात्मा का स्मरण करने के स्थान पर अपनी पत्नी और सांसारिक सुखों का
12:55ही चिंतन करता रहा
12:57मृत्यू कालीन आसकती के कारण राजा पुरंजन का अगला जन्म विदर्भ देश के राजा की एक सुन्दर राजकुमारी के रूप
13:05में हुआ
13:06तभी उसके पूर्वजन्म का एक अनाम और सच्चा मित्र जो वास्तव में परमात्मा रूपी गुरु था एक ब्राहमन के रूप
13:14में उसके समक्ष आया
13:16उस परमज्यानी मित्र ने राजकुमारी को बोध कराया कि तुम न तो राजा पुरंजन हो और न यहस्त्री बलकि तुम
13:24एक अजर्मर दिव्या आत्मा हो
13:27इस रूपक कथा का गूर आध्यात्मिक अर्थ समझकर राजा प्राचीनाबरही की चेतना जागरित हुई और उनका अज्यान रूपी अंधकार दूर
13:36हो गया
13:38देवर्शी नारद ने राजा को उपदेश दिया कि निरर्थक पशुबली और भौतिक कामनाओं को छोड़ कर केवल भगवान विश्नु के
13:46चर्णों में समर्पित हो जाओ
13:48ज्यान का यह महामंत्र प्राप्त कर राजा प्राचीनाबरही ने अपने आडमबर्युक्त कर्मकांडों का त्याग कर दिया और पूर्ण वैराग्य के
13:57साथ भक्ती मार्ग अपना लिया
14:00ज्यान के प्रकाश से उत्परोथ होकर राजा प्राचिनाबरही ने राजसी सुखों का त्याग कर परम वैराग्य को अपना लिया और
14:08स्वयं को प्रभू श्रीहरी के चरनों में समर्पित कर दिया
14:12उन्होंने अपने राजसी कर्तवियों से विमुख होकर वन की ओर प्रस्थान करने का द्रिड संकल्प लिया, जहां प्रकृती के शांत
14:21आंचल में वे आत्म ज्यान की खोज कर सकें
14:25राजा के वैराग्य ग्रहन करने से राज्य पर एक गहरा सन्नाट आचा गया, क्योंकि कोई भी योग्य उत्तराधिकारी राजगद्धी संभालने
14:33के लिए तत्पर नहीं था
14:36राजमहल में अकेली महारानी शिवांगी जिन्हें मारिशा भी कहा जाता था, पती के विरह में तपस्यारत थी, किन्तु उन्हें संतान
14:45प्राप्ती की तीवर कामना भी थी
14:48उनकी निष्ठापूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर स्वय भगवान ब्रहमा ने उन्हें दर्शन दिये और एक तेजस्वी पुत्रियों के समुह का
14:57वर्दान प्रदान किया, जो वंश की वृद्धी करेंगे
15:01ब्रहमा के आशिरवाद से रानी शिवांगी का गर्भाशय दस देजस्वी पुत्रों को धारन करने के लिए तैयार हुआ, जो भविश
15:09में महान विश्नु भक्त कहलाएं
15:12शुभ मुहूर्त में रानी शिवांगी ने एक एक करके दस तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया, जो सभी देवताओं के अंश
15:20के समान अध्भुत और कांतिमान थे
15:23इन दस पुत्रों को प्रचेता नाम दिया गया और वे बच्पन से ही अध्भुत गुनों और अलोकिक तेज से युक्त
15:30थे, जैसे स्वयन देवगन धरापर अवत्रित हुए हूँ
15:34जन्म से ही प्रचेता भगवान विश्नु के परम भक्त थे, जिनके हृदय में बच्पन से ही श्रीहरी के प्रती अगाध
15:42प्रेम और अटूट श्रधा विद्यमान थी
15:46अपने वैराध्यपूर्ण वनवास के दोरान भी, राजा प्राचीना बरही को दिव्यद रिष्टी से अपने तेजस्वी पुत्रों के जन्म और उनके
15:54अध्भुत गुनों का ज्यान हुआ
15:56पुत्रों के तेज और भक्ती को देखकर उन्होंने विचार किया कि राज्य को अब एक धर्मनिष्ट और न्यायप्रिय शासक की
16:05आवश्शकता है जो प्रजा का कल्यान करे
16:08अपने मन में उत्पन हुए कर्तव्य बोध से प्रेरित होकर राजा प्राचिनाबरही ने अपने पुत्रों को अपने पास बुलाने का
16:16निरनय किया ताकि वे उन्हें उचित मार्ग गर्शन देशकें
16:21पिता के बुलावा प्राप्त कर युवा प्रचेता अत्यंत विनय और श्रद्धा के साथ अपने पिता प्राचिनाबरही के समक्ष उपस्थित हुए
16:30जिनके मुख पर अब तपस्या का तेज था
16:34पिता प्राचिनाबर ही ने अपने पुत्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि राज्य की बागदोर संभालने से पूर्व उन्हें अपने
16:42सर्वोच धर्म का पालन करना होगा
16:45उन्होंने समझाया कि राजकाज चलाने से पहले सबसे महत्वपूर्ण है भगवान विश्नु को प्रसन्न करना क्योंकि उनकी क्रिपा के बिना
16:54कोई भी कार्य सफल नहीं होता
16:57आथ उन्होंने प्रचेताओं को आज्यादी की वे संसार का पालन करने और वंश की व्रिद्धी के लिए घोर तपस्या करें
17:05जिससे समस्त विघ्ण दूर हो जाएं
17:08पिता की गंभीर आज्या को सुनकर प्रचेताओं ने बिना किसी प्रश्न के उसे सहर्ष स्विकार किया और तपस्या के लिए
17:16तुरंट तयार हो गए
17:18पिता से आशिर्वाद लेकर सभी प्रचेता राजकुमारों ने अपनी तपस्या के मार्क पर चलने के लिए वन में आगे बढ़ना
17:26आरंभ किया जहां उन्हें अपनी साधना करनी थी
17:31वे गहन वनों, परवतों और नदियों को पार करते हुए एक ऐसे पवित्रस्थल की ओर अग्रसर हुए जहां भगवाद शिव
17:39ने स्वयन तपस्या का महामंत्र उन्हें सिखाया था
17:43उनके हृद्यों में भगवान विश्नु के प्रती अदम्य भक्ती और पिता की आग्या का पालन करने का द्रिड संकल्प था,
17:51जो उन्हें हर बाधा से उपर उठने की शक्ती दे रहा था
17:55गहन वन के भीतर वे तपस्वी राजकुमार अज्यात पकडंडियों पर द्रिडता से चलते रहे, जहां केवल साधना की पुकार ही
18:04सुनाई पड़ती थी
18:06मार्ग में आने वाली हर बाधा को वे अपने इश्वर भक्ती के बल से पार करते रहे, जैसे कोई पवित्र
18:13नदी अपने तटबंधों को भेदती है
18:17जैसे जैसे वे आगे बढ़ते गए, वन की गहराया और भी रहस्यमे होती गई, परन्तु उनके संकल्प की जोती मंद
18:25नहीं पड़ी
18:27धीरे धीरे उन्हें वातावर्ण में एक अनुपम शान्ती और दिव्य उर्जा का अनुभव होने लगा, जो किसी पवित्रस्थल के समीप
18:35होने का संकेट था
18:38उनके हृद्यों में एक रोमाच और उत्सुपता का संचार हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी तपस्या का लक्ष अब
18:46निकट ही था
18:48अचानक वन के मध्य में एक विशाल और अत्यंत निर्मल सरोवर उनके सामने प्रकट हुआ, जिसके जल में आकाश के
18:55तारे जिल मिला रहे थे
18:58सरोवर का जल इतना शान्त और पवित्र था कि मानो स्वयन देवताओं ने उसमें सनान कर उसे दिव्य बना दिया
19:05हो
19:07वातावर्ण में एक अद्भुत सुगंध फैल रही थी, जो कमल के फूलों और आशधिय जडी बूटियों के मिश्रन से उत्पन
19:14हुई लगती थी
19:17पक्षियों का मधूर कलरव भी वहाँ एक अलौकिक संगीत की भाती सुनाई पड़ रहा था, जो हृदय को परम शांती
19:24प्रदान कर रहा था
19:26प्रचेता राजकुमार उस दिव्यद्रिश्य को अपलक निहारते रहे, उनके मन में अब केवल एक ही प्रश्न था, क्या यहां स्वयं
19:34भगवान प्रकट होने वाले हैं?
19:37तभी सरोवर के मध्य से एक अध्भुत प्रकाश पुंज उपर उठने लगा, जिसने पूरे वातावर्ण को अपनी स्वर्णिम आभा से
19:46प्रकाशित कर दिया
19:48उस प्रकाश के भीतर, उन्हें धीरे धीरे एक अलौकिक आकरिती के दर्शन हुए, जो अपनी अनुपम शोभा से ब्रहमांड को
19:56भी मोहित कर सकती थी
19:58और फिर अपनी समस्थ भव्यता और शान्ती के साथ, स्वय देवों के देव भगवान महादेव वहाँ प्रकट हुए साक्षात कल्यानकारी
20:07रूप में
20:09महादेव के उस अद्भुत दर्शन से प्रचेता राजकुमारों की आखें श्रधा से भर गई और वे तुरंत उनके चर्णों में
20:17नत्मस्तक हो गई
20:19भगवान शिव का तेजस्वी रूप इतना मनमोहक था कि समय और स्थान की चेतना लुप्थ हो गई, केवल उस दिव्य
20:26उपस्थिती का ही भान शेष था
20:29हवा में चंदन और धूप की दिव्य सुगंध घुल गई और एक अद्रिश्य संगीत उनके कानों में मधुर्ता घुलने लगा
20:39महादेव ने अपनी शांत और करुणामई द्रिश्टी से प्रचेताओं की ओर देखा, मानों उनके हृदय की हर कामना को वे
20:46पहले ही जान गए हो
20:49उनकी आखों में असीन करुणा थी, जो बिना एक भी शब्द कहे, समस्थ जगत को आशिरवाद प्रदान कर रही थी
20:58उसक्षन्क ब्रह्मांड का हर कन थमसा गया था, जैसे प्रकृती भी उस अध्वितिय संगम की साक्षी बनने को उच्शुक थी
21:07और फिर महादेव ने अपने होंट खोले, जैसे वे अब प्रचेताओं को स्रिष्टी के गूढ रहसियों और विश्नुभक्ती के महामंत्र
21:15से अवगत कराने वाले हों
21:18महादेव ने अपनी गंभीर और मधुरवानी में प्रचेताओं को सम्बोधित करते हुए उनके शुद्ध अंतहकरण और कठिन तपस्या की सराहना
21:27की
21:29उन्होंने कहा कि जो भी मनुष्य अपने धर्म का पालन करते हुए भगवान विश्नु के चर्णों में समर्पित होता है
21:35वह मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है
21:40शिव के मुख से ऐसे करुणामई वचन सुनकर दसों प्रचेता अत्यंत भाव विभोर हो गए और उनके नेत्रों से भक्ती
21:48के अश्रु बहने लगे
21:50अगरच प्रचेता ने जल में ही श्रधापूर्वक जुपकर महादेव को साश्टान प्रणाम किया और इस अप्रत्याशित दर्शन के लिए अपनी
21:59कृतग्यता व्यक्त की
22:01उन्होंने विनीत भाव से महादेव को अपनी यात्रा का उद्देश बताते हुए कहा कि वे अपने पिता के आदेशानुसार स्रिष्टी
22:09के कल्यान और नारायन की प्रसन्ता के लिए तप कर रहे हैं
22:15भगवान शिव ने उनकी सरलता और निश्कपट भक्ती को देखकर अत्यंत मंद मुस्कान बिखेरी जिससे संपूर्ण वातावर्ण दिव्यकांती से सराबोर
22:25हो उठा
22:27महादेव ने उन्हें समझाया कि भगवान विश्णू और मुझ में कोई भेद नहीं है और हरी की आराधना ही इस
22:34संसार के समस्त बंधनों से मुक्ती का एक मात्र मार्ग है
22:39उन्होंने परमेश्वर विश्णों की महिमा का गान करते हुए उन्हें संपूर्ण ब्रहमांड के आधार, पालक और अंतह लएके परमकारण के
22:48रूप में वर्णित किया
22:50प्रचेताओं के अहंकार विहीन स्वभाव और निश्चल सेवाभाव से परम प्रसन्न होकर सदाशिव ने उन्हें एक अमुल्य आध्यात्मिक उफार देने
22:59का निश्चय किया
23:01महादेव ने कहा कि वे उन्हें एक अत्यंत गुप्त और परम पावन स्थोत्र प्रदान करेंगे, जिसे वे स्वयन सदा भगवान
23:09विश्णू की आराधनामे गाते हैं
23:12उन्होंने इस दिव्यस्तोत्र को रुद्रगीत नाम दिया और बताया कि इसका पाठ करने से साधक को अत्यंत सुगमता से नारायन
23:21की परम भक्ती प्राप्त होती है
23:24उसक्षन संपूर्ण गगन स्वर्णिम आभा से दीप्थो उठा और स्वर्ग के देवगण इस अध्भुत ज्यानदान के साक्षी बनने के लिए
23:32मेगों के पीछे एकत्र होने लगे
23:36महादेव ने अपने दक्षिन हस्त को अभय मुग्रा में उठाया जिससे पूरे सरोवर और वन में एक गेहन, शांत और
23:44ब्रहमांडिय स्पंदन गुँझ उठा
23:47फिर भगवान शिव ने अपनी दिव्य और गंभीर ध्वनी में रुद्रगीत के प्रथम मंत्रों का उच्चारण आरंभ किया, जिसकी प्रतिध्वनी
23:55से जल की लहरें भी स्थिर हो गई
23:58सभी प्रचेताओं ने अपनी आखें बंद करी और वे अत्यंत एका ग्रचित होकर महादेव के मुख से प्रवाहित होती उस
24:06पावन उर्जा को अपने हृदय में ग्रहन करने लगे
24:11रुद्रगीत के दिव्य शब्दों से वहाँ एक अलौकिक द्रिश निर्मित हुआ, जिसमें प्रचेताओं को क्शीर सागर में शेशनाग पर शयन
24:19करते भगवान नारायन की अध्भुत छवी दिखाई देने लगी
24:23महादेव ने अत्यंत सुन्दर शब्दों में भगवान विश्णु के चतुर्भुज रूप का वर्णन किया, जिनके हाथों में शंक, चक्र, गदा
24:32और पद्म सुशोभित थे
24:34उन्होंने प्रचेताओं को निर्देश दिया कि वे इस पावन स्तोत्र का निरंतर गान करते हुए इसी परम्मनोहारी रूप का अपने
24:42हृदय में ध्यान करें
24:45जैसे जैसे रुद्रगीत का ज्यान उनके भीतर उतर रहा था, प्रचेताओं को अपने शरीर और आत्मा में एक अपूर्व शान्ती
24:53और असीम आनंद की लहर महसूस होने लगी
24:57अंत में महादेव ने उन्हें पूर्ण सफलता का वर्दान देते हुए कहा कि जो कोई भी इस रुद्रगीत का श्रद्धा
25:05पूर्वक पाठ करेगा, वह अंत्ता वैकुंठ धाम को प्राप्त करेगा
25:10महादेव के अंतिम शब्दों से प्रेरित होकर प्रचेताओं ने हृदय में द्रिड संकल्प लिया कि वे इस दिव्य मार्ग का
25:17अनुसर्ण कर परम लक्षे को प्राप्त करेंगे
25:21भगवान शिव ने तब असीम करुणा से प्रचेताओं को भगवान विश्णु की सर्वव्यापकता का गूढ रहस्य समझाया, जो कणकण में
25:30विद्यमान है
25:32उन्होंने वर्णन किया कि कैसे अनादी देव भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया शक्ती से संपूर्ण ब्रहमांड की रचना की जिसमें
25:40असंख्य लोक और जीव समाय हुए है
25:45महादेव ने स्पष्ट किया कि वही परम पुरुशोत्तम भगवान विश्णु अपनी अध्भुत लिलाओं से समस्ट चर्रचर प्राणियों का पालन पोशन
25:53करते हैं और संतुलन बनाये रखते हैं
25:57उन्होंने धर्म की स्थापना और दुश्टों के सहार हेतु भगवान विश्णु के अनेक दिव्य अवतारों का विस्तार से वर्णन किया
26:05जिन में मत्स्यक, कूर्म और वराह प्रमुख थे
26:09महादेव ने भगवान राम और कृष्ण जैसे अवतारों की मनमोहक लीलाओं और उनके परोपकारी स्वभाव का वर्णन करते हुए प्रचेताओं
26:18के हृदय को भक्ती से सराबोर कर दिया
26:22प्रचेताओं ने विस्मय और श्रद्धा से भरे नेत्रों से महादेव को निहारा, जिनके मुख से निकलने वाली हर कथा उनके
26:29अंतर्मन को स्पर्ष कर रही थी
26:32तब महादेव ने स्वयन यह रहस्योद घाटन किया कि वे भी त्रिकालदर्शी होने के बावजूद सदा भगवान विश्णु का ही
26:40ध्यान करते हैं और उनकी भक्ती में लीन रहते हैं
26:45उन्होंने बताया कि सभी देवी देवता, रिश्यमुनी और स्वयन ब्रहमाभी भगवान विश्णु की ही परम सत्ता को स्विकारते और उनकी
26:54पूजा करते हैं
26:56महादेव ने द्रिड़ता पूर्वक घोशित किया कि भगवान विश्णु की अहेतु की भक्ती ही परम कल्यान का मार्ग है जो
27:04आवागम के चक्र से मुक्ती दिलाती है
27:08उन्होंने समझाया कि शुद्ध और निस्वार्थ भक्ती से ही हृदय में दिव्य प्रेम और आनंद का अनुभव होता है जो
27:15सभी दुखों को हर लेता है
27:18जैसे जैसे महादेव का उपदेश उनके भीतर गहराता गया प्रचेताओं ने अपने शरीर और आत्मा में एक अद्भुत आध्यात्मिक परिवर्तन
27:28महसूस किया
27:30भगवान शिव ने उनके द्रिड विश्वास और सची निश्था को देखकर अत्यंत प्रसन्नता से उन्हें उनकी साधना में पूर्ण सफलता
27:38का आशिरवाद दिया
27:41उन्होंने प्रचेताओं को निर्देश दिया कि वे अब पश्चिमी समुद्र तट पर जाकर कठिन तपस्या करें जहां उन्हें भगवान विश्णु
27:49का साक्षात दर्शन प्राप्थ होगा
27:52महादेव के आदेश को शिरोधार्य करते हुए प्रचेताओं ने परमश्रद्धा और कृतग्यता के साथ उन्हें प्रणाम किया
28:00उनके हृदय में भक्ती का नववत्सव उमड रहा था
28:04महादेव ने अपनी दिव्यद रिष्टी से प्रचेताओं को देखा
28:08उनके मुख पर एक शांट और संतोशुप्रत मुस्कान थी
28:12जैसे वे उनके भावी सफल तपस्या को पहले ही जानते थे
28:17जिस पावन वन में यह दिव्य समवाद हुआ था
28:20वह अब महादेव की उपस्थिती और उनके उपदेशों की पवित्र उर्जा से और भी अधिक जागरत और दैदी प्यमान हो
28:28उठा था
28:30रुद्रगीत का महामंत्र उनके हृद्यों में गूंज रहा था
28:34और प्रचेताओं ने पश्चिन दिशा की ओर अपनी लंबी और पवित्र यात्रा आरंभ की
28:40महादेव की दिव्य उपस्थिती की अनुभूती अभी भी वायुमंडल में व्याप्ट थी
28:45एक अद्रिश शक्ती की तरह उनकी यात्रा को निरंतर मार्ग गर्शन प्रदान करती हुई
28:52अंत्य वैकुंठ धाम के परम लक्षे की प्रतिग्या लिये हुए
28:56प्रचेताओं के रूप धीरे धीरे उस पवित्रवन की गहराई में विलीन हो गए
29:02रुद्रगीत के दिव्यस पंदन से प्रेरित होकर दस प्रचेता राजकुमार उस विशाल और अत्यंत पवित्रवन के हृदय स्थल की ओर
29:10अग्रसर हुए
29:12सघन व्रिक्षों को पार करते हुए वे उस अनन्त और शांत महासागर के तट पर पहुँचे जहां उनकी कठोर तपस्या
29:20का महान स्थल प्रतीक्षा कर रहा था
29:23समुद्र की विशालता के सामने खड़े होकर उन्होंने भगवान शिव द्वारा प्रदान किये गए पावन रुद्रगीत का एक स्वर में
29:31स्मरण किया
29:33अपनी परम निष्ठा का परिचय देते हुए दसों ध्राताओं ने एक साथ उस पवित्र शीतल जलराशी में प्रवेश किया
29:40जल में स्थिर होकर उन्होंने अपनी आखे मूद ली और सर्वव्यापी विश्नुभक्ती के महामंत्रों का सुम्धुर उच्चारण प्रारंभ किया
29:51जल की गहराईयों में जाकर उन्होंने ध्यान की सिध्धासन मुद्रा धारन की और भौतिक जगत से अपना ध्यान पूरी तरह
29:59हटा लिया
30:00जल के भीतर उनके योगबल से एक अलौकिक सुरक्षा कवच निर्मित हो गया जिसने पूरे वातावर्ण को दिव्य प्रकाश से
30:08भर दिया
30:10उनके हृद्यों से प्रकट होने वाली तीवर तपस्या की अगनी ने अंधकार में समुद्र तल को स्वर्णिम दीप्ती से नहला
30:17दिया
30:19समुद्र की भीशन धाराओं और अथाह दबाव को दरकिनार करते हुए वे अपने द्रिड संकल्प पर अडिग रहे
30:27प्रचेताओं का प्रत्येक श्वास और ध्यान का हर क्षण केवल भगवान नारायन के चतुर्भुज रूप को समर्पित हो गया
30:35वर्षों का समय बीटता गया किन्तु जल के भीतर समाधिस्थ प्रचेताओं के शरीर पत्थर की भाती निश्चल बने रहे
30:44महासत्य की खोज में लीन इन भ्राताओं पर सत्थी मौसम के तूफानों और भयंकर गर्जनाओं का कोई प्रभाव न पड़ा
30:53महासागर के विशाल और भयानक जलचर भी उनके शांत वपवित्र तपोबल से प्रभावित होकर उनके समीक विनमर्ता से तैरने लगे
31:02उनके अंतर्मन से निकलती रुद्रगीत की प्रतिध्वनी समस्त ब्रहमाण में उंकार के पवित्र नाद के रूप में गूंजने लगी
31:11दस प्रिथक शरीरों वाले इन राज कुमारों की आत्माय भक्ती के एक अटूट सूत्र में बंध कर एकाकार हो गई
31:20उनकी अखंड साधना से उत्पन्न तपोगनी ने स्वर्ग लोग तक के देवों का ध्यान अपनी और आकर्शित कर लिया
31:28देवराज इंद्र और अन्य देवता आकाश में उपस्थित होकर प्रचेताओं के इस अकल्पनिय भक्ती संकल्प की सराहना करने लगे
31:38प्रचेताओं के हरिद्यरूपी मंदिर में भगवान श्री हरी का परम दिव्य और मनमोहक रूप और अधिक स्पष्ठ होकर प्रकट होने
31:45लगा
31:47उन्होंने अपने मन में यह अंतिम प्रतिग्या दोहराई की श्री हरी के प्रत्यक्ष दर्शन के बिनावे इस योगनिद्रा का त्याग
31:54नहीं करेंगे
31:56अब प्रचेता पूर्ण रूप से उस निर्विकल्प समाधी में लीन हो चुके थे जहां केवल भगवान विश्णु का नाम और
32:04स्वरूप शेश था
32:06अब उस गेहन समाधी की पूर्णता के साथ प्रचेता दिव्य संकल्प से उतप्रोथ होकर उस विशाल सागर की ओर बढ़े
32:14जहां उनकी अगनिप्रीक्षा और महान तपस्या की यात्रा आरंभ होनी थी
32:20शिव के महामंत्र से प्रकाशित उनके अंतर्मन के साथ उन्होंने निर्भय होकर सागर की अतल गहराईयों में स्वयं को समर्पित
32:28कर दिया जहां काल का बंधन भी अद्रिश्य हो जाता है
32:33जैसे ही जल की शीतलता ने उनके शरीर को भेरा उनके हृदय में विश्नु भक्ती की अगनी और प्रज्वलित हो
32:40उठी जो उन्हें हर बाधा से उपर उठने की शक्ती प्रदान कर रही थी
32:46सागर के हृदय में स्थित वे एक साथ अपने हाथों को जोड कर भग्वान विश्नु के ध्यान में एकाग्र हो
32:54गए मानो समय स्वया उनके तब के सामने ठहर गया हो
32:58शिव द्वारा प्रदान किया गया रुद्रगीत उनके कंट से अमरित की धारा के समान प्रवाहित होने लगा जो सागर की
33:06गहराईयों में एक पवित्र ध्वनिकम्पन उत्पन कर रहा था
33:10इस महामंत्र के प्रत्येक शब्द में वे भगवान विश्णों के विराट स्वरूप को अनुभव कर रहे थे जो तीनों लोकों
33:18में व्याप्थ होकर सभी स्रिष्टी का आधार है
33:22उनके मन की पवित्रता और एकागरता इतनी तीवर्थी की स्वयन सागर देवता भी उनकी तपस्या से चकित होकर शांत और
33:31स्थिर हो गए थे
33:33दिन महीने और फिर सदिया बीटती चली गई लेकिन प्रचेताओं की संकल्प शक्ती हिमालय के समान अडिग और अटल रही
33:42दस हजार वर्षों की अवर्णनिय अवधी में उन्होंने केवल उस दिव्य प्रकाश और ध्वनी पर ही जीवित रहकर अपने प्राणों
33:51को धारण किया
33:52उनके शरीर पर समुदरी जीवों ने अपना घर बना लिया था फिर भी उनका ध्यान अविचलित रहा मानो भौतिक संसार
34:01उनके लिए अद्रिश्य हो गया हो
34:04सागर के तूफानों और जलधाराओं ने उन्हें डिगाने का प्रयास किया परंतु प्रचेताओं के भीतर की द्रिड़ता ने उन्हें परवत्सा
34:12अटल बनाये रखा
34:14प्रत्येक श्वास के साथ उन्होंने ओम नमो भगवते वासुदेवाय के महामंत्र का स्मरण किया जिससे उनकी चेतना ब्रह्मान से जुर्ती
34:23चली गई
34:24उनकी तपस्या की प्रचेंड उर्जाने न केवल सागर को बलकी तीनों लोकों में एक अध्भुत दिव्यस पंदन उत्पन्न कर दिया
34:33जिससे देवताभी विस्मय में पड़ गए
34:36उनके मन के एकागरता से समस्त नकारात्मक शक्तिया क्षीन हो गई और प्रकृति स्वयन उनकी तपस्या की साक्षी बनकर शांत
34:45भाव से खड़ी रही
34:48उनकी आखों से जर्ती भक्ती की अश्रुधाराय जो सागर के जल में विलीन हो रही थी प्रत्येक बूंद में प्रेम
34:55और त्याग का संदेश लिये हुए थी
34:59हजारों वर्षों की इस अथाह तपस्या ने उनके शरीर को भले ही क्षीन कर दिया था लेकिन उनकी आत्मा और
35:06भी अधिक तेजस्वी और बल्वान हो गई थी
35:09वे जानते थे कि उनकी यह तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी भगवान विश्णु अवश्य ही अपनी दिव्यक्रिपा से उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन
35:19देंगे
35:21रुद्रगीत के मधूर स्वर उनकी चेतना में गूँचते रहे हर पल उन्हें उस परम सत्य की ओर अग्रसर करते हुए
35:28जिसकी वे इतने समय से तलाश कर रहे थे
35:32उन्होंने अपने आगामी जीवन और वन्ष के लिए अपनी इस कठोर तपस्या के माध्यम से दिव्य परिनामों का मार्ग प्रशस्त
35:40करना आरंभ कर दिया था
35:42इस प्रकार सागर की गहरायों में प्रचेता अपने अदमे विश्वास और एकाग्र तपस्या के साथ उस महानपल की प्रतीक्षा कर
35:52रहे थे
35:52जब स्वय भगवान श्री हरी उन्हें दर्शन देंगे
Comments