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इस रहस्यमय यात्रा में, शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को ब्रह्मांड की गहराईयों में ले जाते हैं! 🌌 सप्तद्वीपों से परे, जानिए अगाध पाताल लोकों की अलौकिक सुंदरता और वहाँ रहने वाले दैत्यों, नागों के विस्मयकारी जीवन। फिर हम उतरेंगे नरक के भयानक लोकों में, जहाँ कर्मों के अनुसार आत्माएं दंड पाती हैं। जड़ भरत को आत्मज्ञान देने के बाद, यह भागवत पुराण का अध्याय 33 आपको सृष्टि के उस गूढ़ विधान से परिचित कराएगा, जहाँ हर कर्म का फल निश्चित है। क्या हैं पाताल की भव्यता के रहस्य? नरक के विभिन्न द्वार कौन से हैं? और यमराज का विधान कैसे काम करता है? इस महागाथा को देखने के लिए तैयार हो जाइए! #BhagavataPurana #ShukadevGoswami #MaharajParikshit #PatalaLoka #NarakaLoka #KarmaPhilosophy #HinduMythology #CosmicGeography #SpiritualJourney #Puranas #VishnuPurana #AncientIndia #Dharma #Moksha #YouTubeMythology #EpicStories #DivineKnowledge #S3E33
Transcript
00:00महर्शी सुकदेव गोस्वामी गंगा तट पर बैठे मुमुक्षु राजा परीक्षित को ब्रहमांड की असीम गहराईयों का बोध कराते हुए अपना
00:08दिव्य उपदेश आगे बढ़ाते हैं।
00:12व्यास्पुत्र सुकदेव अपने दाहिने हाथ को आकाश की ओर उठाकर परीक्षित को समझाते हैं कि यह दिखाई देने वाला संसार
00:20अनंत लोकों का केवल एक अल्प अंश मात्र है।
00:24ज्यानी सुकदेव के शब्दों के साथ ही संपूर्ण भूमंडल एक विशाल कमल के पुष्प की भांती अंतरिक्ष में तैरता हुआ
00:32द्रिशमान होने लगता है।
00:35राजा परीक्षित अत्यंत नमरता पूर्वक अपने हाथ जोड कर मुनी से प्रश्न करते हैं कि इस प्रित्वी लोक के उपर
00:43और नीचे कौन-कौन से अज्यात शेत्र स्थित हैं।
00:47सुकदेव गोस्वामी वर्णन करते हैं कि भूमंडल के उपर क्रमश उर्ध्वलोक फैले हुए हैं, जहां देवताओं का जगमगाता हुआ स्वर्गलोक
00:56स्थित है।
00:59ब्रहमांड की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए सूर्यदेव अपने साथ घोडो वाले दिव्यस्वन रत पर सवार होकर काल चक्र
01:06को निरंतर गती प्रदान करते हैं।
01:10इस विशाल खगोलिय तंत्र के शीर्ष पर ध्रुवतारास्थेर रहकर समस्थ तारामंडलों और नक्षत्रों को एक अखंड व्यवस्था में बांधे रखता
01:19है।
01:21ततपश्चात शुकदेव मुने राजा को सचे करते हैं कि ब्रहमांड की इस अद्भुत रचना में धरातल के नीचे भी रहस्यमई
01:29और विशाल अतलवितल आदी लोग समाहित हैं।
01:33भुलोग के धरातल के नीचे स्थित इन साथ बिलासवर्गों में सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता, किन्तु वहां के विशाल मनियों
01:42की कांती से संपूर्ण अंधकार नश्ट हो जाता है।
01:47महाराज परीच्षित अत्यन्त तनमयता से सुकदेव जी के वचनों को सुनते हुए कर्म और उनके फल से जुड़े इन लोकों
01:54के महत्व को समझने का यत्न करते हैं।
01:58मुनी बताते हैं कि प्रिथवी के निचले भाग में अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, प्रसातल और पाताल नाम के साथ
02:06रहस्य में बिलस्वर्ग स्थित हैं।
02:09प्रथम अधोलोक अतल में दानव मय के पुत्र बल का आधिपत्य है, जहां मायावी विलास और सुवर्ण की आभाचारों और
02:17बिखरी रहती है।
02:20दूसरे लोक वितल में भगवान शिव हाटकेश्वर रूप में निवास करते हैं, जहां उनके गणो द्वारा सुवर्ण की बहती हुई
02:28नदियां रची गई है।
02:31तीसरे लोक सुतल में दानवीर राजा बली का शासन है, जिसे स्वय भगवान नारायन ने उनकी भक्ती से प्रसन्न होकर
02:39प्रदान किया था।
02:40राजा बली की अनन्य निष्ठा से बंध कर स्वय भगवान वामन गदाधारी रूप में सुतल के द्वारपाल बनकर उनकी रक्षा
02:49करते हैं।
02:51चौथे लोक तलातल में महान असुर शिल्पी मय दानव का अधिकार है, जिसकी रचनाएं दिव्यस्थापत्यकला और मायावी तकनीक का अध्धुत
03:00संगम हैं।
03:03पाँचवे लोक महातल में क्रोधित और विशालकाय बहुफनी नाग निवास करते हैं, जो अपने मस्तक की मनियों से पाताल की
03:11गुफाओं को आलोकित करते हैं।
03:14छठे लोक रसातल में दैत्य और दानव निवास करते हैं, जो अत्यंत शक्तिशाली होते हुए भी श्रीहरी के भैसे गुफाओं
03:22में शान्त रहते हैं।
03:25अंतिम अधोलोक पाताल में नाग राज वासुकी अपनी नाग सभा के साथ विराजते हैं, जहां उनकी मनियों की किर्णे पाताल
03:33के अंधकार को पूर्णत नश्ट कर देती हैं।
03:37इन सुखमई बिलस्वर्गों का वर्णन पूर्ण करने के पश्चात सुखदेव गोस्वामी अब परिच्षित को कर्मफल के कठोर स्थान यानि नरक
03:46लोकों की ओर ले जाने की तैयारी करते हैं।
03:49सुखमई बिलस्वर्गों के वर्णन के बाद शांत और गंभीर मुद्रा में बैठे हुए सुखदेव गोस्वामी ने महाराज परिच्षित को कर्मफल
03:59के कठोर और भयानक नरक लोकों के विशय में बताना प्रारंब किया।
04:04उन्होंने समझाया कि ये नरक लोक उन पापियों के लिए बनाए गए हैं जो अपने जीवनकाल में धर्म और नैतिक्ता
04:11का उलंगन करते हैं, जहां यमराज स्वयन न्याय के देवता के रूप में विराजते हैं।
04:18मृत्यू के पश्चात पापी आत्माय सुक्ष्म रूप में अपने भौतिक देह से निकल कर भयानक यमदूतों द्वारा बलपूर्वक यमलोक के
04:27मार्ग पर खींची जाती हैं।
04:30यह मार्ग अत्यंत दुर्गम और कश्ट दायक होता है, जहां आत्माओं को भूख, प्यास और भयंकर धूप की पीड़ा से
04:38गुजरना पड़ता है।
04:41यमलोक पहुँचने से पूर्व उन्हें भयावः वैतर्नी नदी पार करनी पड़ती है, जो रक्त पीब, मल और केशों से भरी
04:48हुई होती है।
04:50इसके बाद पापी आत्माओं को तामिश्र नामक नरक में फेंका जाता है, जहां उन्हें गहरी काली रात के समान अंधकार
04:59और भयानक भय का अनुभव होता है।
05:03अंधतामिश्र इससे भी भयावः है, जहां अत्यंत घोर अंधकार में पापी आत्माओं को अकलपनिय पीड़ा और भ्रम का सामना करना
05:11पड़ता है।
05:13फिर उन्हें रौरव नरक में भेजा जाता है, जहां रूरू नामक क्रूर सर्प जैसे जीव दूसरों को पीड़ा पहुचाने वाले
05:21पापीओं को जीवित ही नोचते हैं।
05:25महारौरव में वही रूरू जीव और भी भयंकर रूप धारण कर पापी के मास के साथ साथ उसकी आत्मा को
05:32भी विदीन करते हैं।
05:35जो लोग पशुओं की हत्या करते हैं, उन्हें कुम्भी पाक में खौलते हुए तेल के कडाहों में डाला जाता है,
05:42जहां वे तिल-तिल कर जलते हैं।
05:46असिपत्रवन नरक में पापियों को ऐसे जंगल में प्रवेश करना पड़ता है, जहां पेडों की पत्तियां तलवार की तरह धारदार
05:54होती हैं, जो उनके शरीर को काटती हैं।
05:58जो लोग दूसरों की संपत्तिया सम्मान चुराते हैं, उन्हें संदंश नरक में ले जाया जाता है, जहां उनके अंगों को
06:06दहकते हुए चिम्टों से खीचा जाता है।
06:10काल सूत्र उन लोगों के लिए है, जो अपने माता-पिता या बड़ों का अनादर करते हैं, जहां उन्हें दहकते
06:17हुए तामबे की भूमी पर जलना पड़ता है।
06:21जो लोग गरीबों और असहायों का शोशन करते हैं, उन्हें वजरकंटक में तीखे कांटों पर घसीटा जाता है, जिससे उनके
06:29शरीर छिन्नभिन हो जाते हैं।
06:33भरष्ट शासकों और न्यायाधीशों के लिए सुकरमुख नरक है, जहां उन्हें एक विशाल सुवर के समान मुह वाले राक्षस द्वारा
06:41कुछला जाता है।
06:44जो लोग दूसरों को बिना कारण कष्ट देते हैं, उन्हें अंधकूप में डाला जाता है, जहां उन्हें सर्प, बिच्छु और
06:51अन्य जहरीले जीव डस्ते हैं।
06:55जो बिना अतिथी या देवताओं को अर्पित किये भोजन करते हैं, उन्हें क्रिमि भोजन में लाखों की डेन कोड़ो द्वारा
07:02खाया जाता है।
07:04छल से दूसरों को पीडा पहुचाने वाले शूल प्रोत नरक में नुकिले शूलों पर लटका दिये जाते हैं, जहां वेधीमी
07:12और आगनेजिंग मृत्यु का अनुभव करते हैं।
07:17व्यभिचारी पापियों को वजरकंटक शालमली नरक में लाया जाता है, जहां उन्हें तीखे कांटों वाले शालमली व्रिक्ष से जकड कर
07:25खीचा जाता है।
07:27खाद्य पदार्थों में विश मिलाने वाले या हत्यारों को सार्मे भक्षन नरक में हिंसक कुत्तों द्वारा खाया जाता है।
07:36ततपश्चात सुकदेव गोस्वामी ने अंधकूप नरक का भयावः वर्नन किया, जहां दूसरों को बंदी बनाने वाले या उनके प्रीजनों को
07:45कष्ट पहुचाने वाले पापियों को अंधेरे कुए में धकेल दिया जाता है, जहां उन्हें भूख और प्यास से तड�
07:52अंगिनत पीडादायक जीव नोचते रहते हैं। इस पावन प्रसंग में स्वर्गिये ग्रहों की दिव्यगती और काल्चक्र की महिमा का वर्नन
08:02किया गया है।
08:29पावन प्रसंग में स्वर्गिये ग्रहों की दिव्यगती और काल्चक्र की महिमा का वर्नन किया गया है।
09:04इस प्रकार सुपदेव गोस्वामी ने नरकों की भयावता का विस्तार पूर्वक वर्नन समाप्त करते हुए।
09:11महाराज परीक्षित को समझाया कि ये सभी यातनाय केवल उन पापों का फल हैं जो जीव अपने भौतिक जीवन में
09:18करते हैं।
09:19और कर्मों का यह हिसाब ब्रहमांड के अटल नियम का एक अनिवार्य अंग है।
09:25इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिव्यगती और काल्चक्र की महिमा का वर्नन किया गया है।
09:33महाराज परीक्षित इन भयानक वर्ननों से विचलित होकर भी संसार के गूढ नियमों को समझने की अपनी तीवर जिग्यासा को
09:42शांत न कर सके और उन्होंने ब्रहमांड की विस्तरित संरचना, विशेशकर स्वर्गिय ग्रहों और उनकी गतियों के बारे में जानने
09:50की इ�
10:23और कालचक्र की महिमा का वर्नन किया गया है।
10:28उन्होंने भूमंडल की अवधारना का अनावरन किया, जो प्रित्वी के विभिन द्वीपों और महासागरों को दर्शाता है, और बताया की
10:37कैसे इसके उपर मध्य और उच्छतर ग्रह मंडल स्थित हैं, जो जीव के कर्मों के अनुसार विभिन जन्मों का निर्धारन
10:45करत
11:13हैं.
11:19उन्होंने सूर्य के विशाल रत का वर्नन किया, जिसे अरोन नामक सार्थी संचालित करता है, जो साथ घोडों द्वारा खीचा
11:27जाता है, और जो मेरू परवत के चारों और निरंतर चक्कर लगाते हुए दिन और रात का स्रिजन करता है.
11:35इस पावन प्रसंग में स्वर्गिये ग्रहों की दिव्यगती और काल्चक्र की महिमा का वर्नन किया गया है.
11:43इसके उपरांत सुकदेव ने चंद्रमा की शीतल और मनमोहक गती को समझाया, जो अपनी कलाओं से प्रिथवी पर और और
11:51वनस्पतियों को पोशन देता है, और सभी प्राणियों के मन पर गहरा प्रभाव डालता है.
11:58इस पावन प्रसंग में स्वर्गिये ग्रहों की दिव्यगती और काल्चक्र की महिमा का वर्नन किया गया है.
12:06उन्होंने मंगल, बुध, ग्रिहस्पती, शुक्र और शनी सहित अने ग्रहों की विशिष्ट गतियों और उनके ब्रहमांडिये प्रभाव का विस्तार से
12:15वर्नन किया, जो सभी अपने निर्धारित पत पर अनंतकाल से भ्रमन कर रही हैं.
12:21इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिवयगती और कालचकрь की महिमा का वर्नन किया गया है.
12:30सुक्देव ने समझाया कि इन सभी ग्रहों की सुक्ष्म गतियों से ही कालचक्र का निर्मान होता है जो समय के
12:37सुक्ष्मतम ख्षन से लेकर महायुगों तक की गणना को निर्धारित करता है जो ब्रहमांड की प्रतेक घटना का आधार है
12:46इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिव्यगति और कालचक्र की महिमा का वरनन किया गया है उन्होंने जोर दिया
12:55कि यह कालचक्र ही रितुओं के परिवर्तन, फसलों के चक्र और सभी प्राणियों के जीवनकाल को नियंत्रित करता है प्रतेक
13:03जीव के भाद्य को
13:04ब्रहमांडिय लए के साथ जोरता है
13:08इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिव्य गती और काल्चक्र की महिमा का वर्णन किया गया है
13:16प्रत्येक ग्रह की स्थिती और उसकी गती जीव के कर्मों के अनुसार उसके भविश्य को आकार देती है
13:22जो दर्शाता है कि ब्रहमांड का प्रत्येक कन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है और दिव्य व्यवस्था के तहट कार्य
13:29करता है
13:31इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिव्य गती और काल्चक्र की महिमा का वर्णन किया गया है
13:39इस प्रकार सुकदेव गोस्वामी ने महाराच परीक्षित को समझाया कि ब्रहमांड का यह जटिल और पूर्ण क्रमबध विध्यान जिसमें नरक
13:48से लेकर स्वर्गिय ग्रहों तक सब कुछ शामिल है
13:51केवल परम पुरुशोत्तम भगवान की अध्भुत शक्ती और बुद्धी का प्रमाण है
13:57इस पावन प्रसंग में स्वर्गिय ग्रहों की दिव्य गती और काल्चक्र की महिमा का वर्णन किया गया है
14:06ब्रहमांड के इस विशाल विस्तार में सुकदेव गोस्वामी ने अब महाराज परीक्षित को उन साथ निचले लोकों का रहस्यमय विवर्ण
14:14देना आरंभ किया जो प्रिथवी के नीचे गहराई में स्थित हैं जिन्हें पाताल लोक के नाम से जाना जाता है
14:22ये साथ पाताल लोक अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, प्रसातल और पाताल अपनी अदमे सुन्दर्ता और अध्वितिय एश्वर्य से भरे
14:32हुए हैं जो स्वर्गिय लोकों से भी कहीं अधिक रमनिय प्रतीत होते हैं
14:39सर्वप्रथम अतल लोक का वर्णन करते हुए सुकदेव गोस्वामी ने बताया कि यह दैत्यराज बली के पुत्र महाबली बाला का
14:47निवास स्थान है जो अपनी मायावी शक्तियों के लिए विख्यात है
14:53बाला ने अपनी मायावी शक्तियों का उप्योग कर अतल में मायावी स्त्रियों का निर्मान किया जो अध्भुत सुन्दर्ता से संपन्न
15:01थी और पुरुषों को मोहपाश में बांधने में निपुन थी
15:06जो कोई पुरुष इन मोहक्तियों के संपर्क में आता वहक्षन भर में ही अपनी बुद्धि खो बैठता और मायावी आनंद
15:14के भंवर में फंसकर अपनी सारी चेतना गवा देता था
15:18अतल लोक में इन मायावी स्त्रियों के प्रभाव से उत्पन तीवर मानसिक पीड़ा, जिसे हाटिका कहा जाता है, पुरुषों को
15:27पागलपन की ओर धकेल देती थी, जिससे वे अपनी सुधबुधखो बैठते थे
15:33इसके पश्चात सुकदेव गोस्वामी ने वितल लोक का वर्णन किया, जो भगवान शिव और उनकी पत्नी भवानी के आदिम रूप
15:41हटकेश्वर और हटकेश्वरी का निवास स्थान है, जहां वे अपने गणों के साथ क्रीडा करते हैं
15:49वितल लोक में जब भगवान शिव अपनी पत्नी भवानी के साथ आनन्दित अवस्था में वीर्य का त्याग करते हैं, तो
15:57उनकी शक्ती से एक विशेश प्रकार का स्वर्णन पदार्थ प्रित्वी की सतह पर प्रकट होता है
16:04यह स्वर्णन स्राव, जिसे हाट की कहा जाता है, वितल की भूमी से फूट कर गहरी नदियों के रूप में
16:11बहता है, जहां अन्य जीव इसे प्राप्त कर अग्धुत गहने और आभूशन बनाते हैं
16:18तत्पश्चात सुकदेव गोस्वामी ने सुतल लोक का वर्णन किया, जिसे परम भक्त और दानवीर राजा बली महाराज के पवित्र निवास
16:26स्थान के रूप में जाना जाता है, जो भगवान वामन के परम अनुग्रह से धन्य है
16:33राजा बली अपनी अटूट भक्ती और दानशीलता के कारण भगवान वामन द्वारा इतनी कृपा प्राप्त कर चुके हैं कि स्वय
16:41भगवान विश्नु उनके महल के द्वारपाल के रूप में विराजमान रहते हैं
16:47भगवान विश्णों के साक्षात द्वारपाल के रूप में उपस्थित होने के कारण सुतल लोग के निवासी कभी भी किसी भई
16:54या बाधा से ग्रसित नहीं होते, वे पूर्ण शांती और समरिध्धी में जीते हैं
17:01इसके बाद तलातल लोग का वर्णन किया गया, जो मायावी वास्तुकला के महान आचार्यक असुर्राज माया का निवास स्थान है,
17:10जिसकी मायावी शक्तिया अप्रतिम है
17:14माया की अध्भुत वास्तुकला और इंजिनेरिंग की ख्षमता इतनी विक्सित थी कि उसने तलातल में ऐसे दुर्ग और नगर निर्मित
17:22किये, जहां साधारंत्ह प्रवेश करना असंभव था
17:27हालांकी सुदर्शन चक्र के भय से मुक्त होने के कारण माया और उसके अनुयाई निश्चिन्थ होकर तलातल में निवास करते
17:34थे, जहां उन्हें किसी भी दैविय हस्तक शेप का डर नहीं था
17:39इसके बाद महातल लोग का वर्णन किया गया, जो अनेक सिरवाले, शक्तिशाली सर्पों और नागमनियों से सुशोभित नागों का निवास
17:48स्थान है, जो अपनी भव्यता और विश के लिए जाने जाते हैं
17:54महातल के ये शक्तिशाली नाग, जिनमें कुहक, तक्षक, कालिय और सुशेन जैसे प्रमुक सर्प शामिल हैं, सदैव अपनी माताओं के
18:03साथ निवास करते हैं और अपने फणों पर जगमगाती नागमनिया धारन करते हैं
18:10ततपश्चात रसातल लोग का विवर्ण दिया गया, जो अदमें वीर दैतियों और दानवों का घर है, जिनके पराक्रम और कुरूरता
18:18के किस्से तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं
18:22ये दैतिय और दानव, जिनहें निवात कवच और काले जैसे शक्तिशाली समूह भी शामिल हैं, अपनी अदमें शक्ती और देवों
18:31के प्रती घ्रिना के लिए जाने जाते हैं, जो सदैव युद्ध के लिए ततपर रहते हैं
18:37अंतिम और सबसे निचला लोक पाताल लोक है, जहां महान नागराज वासुकी और अन्य शक्तिशाली नागों का निवास है, जो
18:46अपने फणों पर प्रित्वी का भार धारण करते हैं
18:50इन सभी भयानक लोकों के नीचे पाताल लोक की असीन गहराईयों में स्थित है सुतल लोक, जो अपनी भव्यता और
18:58सुक्षान्ती के लिए प्रसिद्ध है, और नरक की सामान्य धारणा से बिलकुल भिन है
19:05यह वह अद्भुत धाम है, जहां स्वर्ग की समस्थ शोभा और एश्वर्य सहेज ही उपलब्ध हैं, जिसे देखकर इंद्रलोक भी
19:14फीका पड़ जाएं
19:15इस अद्वितिय लोक पर महान समराट बली महाराज का शासन है, जिनके प्रताप और धर्मनिष्ठता से यह रियन सदैव आनंद
19:24और समरिध्धी से परिपूर्ण रहता है
19:28स्वय भगवान विश्णू अपने अनुग्रह से सुतल लोक के द्वारपाल बनकर इस पवित्रस्थान की रक्षा करते हैं और बली को
19:37अपनी छत्रचाया प्रदान करते हैं
19:40यहां के निवासी रोग, वृध्धावस्था या किसी भी प्रकार के भय से मुक्थ होकर अलौकिक सुख और चिरस्थाई शान्ती का
19:48अनुभव करते हैं
19:51सुतल के प्रत्येक महल और संरचना को दिव्य शिल्पकला से गढ़ा गया है, जहां रतनों से जड़े स्तंभ और सोने
19:59से ढखी दीवारें हर कोने में अध्भुत सौंदर्य बिखेरती हैं
20:04यहां के उध्यानों में कल्प व्रिक्ष जैसे दिव्य व्रिक्ष हैं जो इच्छा पूर्ण करते हैं और अमरित समान जल वाली
20:12नदिया निरंतर बहती हैं जो समस्त पापों का नाश करती हैं
20:17सुतल के निवासी अत्यंत सुंदर, शांतचित और धर्म प्रायन हैं जो महाराज बली और भगवान विश्णू के प्रती अगाद श्रधा
20:26रखते हैं
20:28इसकी अतुलनिय सम्रिध्धी और सौंदर्य के कारण कई बार स्वर्गलोग के देवता भी सुतल की शोभा देखने के लिए यहां
20:36आते हैं, आश्चर्यचकित होकर इसके वैभव को निहारते हैं
20:41वामन अवतार के पश्चात भगवान विश्णू ने बली महाराज को उनके परमधर्म और दानवीरता के लिए यह श्रिष्ठ लोग प्रदान
20:50किया, जहां वे सदैव आननदित रहें
20:54अपनी महान शक्ती और प्रभुता के बावजूद बली महाराज, सदैव, विनमर और ज्ञानी रहते हैं, अपने प्रजा का पुत्रवत पालन
21:03करते हैं
21:05भगवान विश्णो का शाश्वत निवास इस लोग को और भी पवित्र बनाता है, जहां उनकी उपस्थिती से हर क्षन दिव्यता
21:13और उर्जा का अनुभव होता है
21:16सुतल के निवासी उत्सवों और त्योहारों में लिप्त रहते हैं, जहां संगीत, नरीत्य और आध्यात्मिक आनंद का प्रवाह निरंतर चलता
21:25रहता है
21:27यहां के अमरित समान भोजन और दिव्य औश्धिया निवासियों को दीरधायू और पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती हैं, जिससे मृत्यू का
21:35भय भी दूर रहता है
21:38इस लोग की अध्वितिय शान्ती और सुन्दर्ता को देखने के लिए कई देवर्शी और गंधर्व भी आकाशमार्ग से यहां आते
21:46हैं, इसके वैभव की प्रशनसा करते हैं
21:50श्री शुकदेव गोस्वामी महाराच परीक्षित को समझाते हैं कि सुतल लोग का वैभव अन्य किसी भी निम्नलोग से अतुल्निय है
21:59और यह भगवान की विशेश कृपा का प्रतीक है
22:03महाराच परीक्षित इस अध्भुत विवर्ण को सुनकर अत्यंत विस्मित होते हैं और उन्हें समझ आता है कि भगवान की लिलाएं
22:12कितनी अप्रत्याशित और महिमामई हैं
22:16यह लोक जहां समस्थ सुख और आनंद व्याप्त हैं उन भयानत नरकों से बिलकुल विप्रीथ है जिनका वर्णन आगे किया
22:24जाएगा जो पापियों को उनके कर्मों का फल भुगतने के लिए बनाए गए हैं
22:30सुतल लोक वास्तव में भगवान के असीम प्रेम और उद्धार की कहानी कहता है जहां एक महान भक्त को उसकी
22:38भक्ती के कारण शाश्वत सुख प्राप्त होता है
22:42इस प्रकार सप्थ पाताल लोकों के बीच सुतल एक उजजवल रत्न की भानती चमकता है जो ब्रहमांड की जटिल और
22:50विविद सनरचना का एक अध्भुत उदाहरन प्रस्तुत करता है
22:55सुख देव गोस्वामी ने आगे बताते हुए कहा कि इन सप्थ पाताल लोकों के भी अत्यंत नीचे समस्थ ब्रहमांड की
23:04नीम पर एक अध्भुत और अकलपनिय सत्ता विद्यमान है जो इस संपूर्ण स्रिष्टी को अपनी शक्ती से धारण किये हुए
23:11है
23:13यह विराठ सत्ता और कोई नहीं बलकि स्वय भगवान विश्णु के अंश अनंत शेष्णाग है जो अपने सहस्त्रफणों पर समस्थ
23:22लोकलो कांतरों को धारण किये हुए है
23:25उनके विशालकाई शरीर का अनुमान लगाना भी मानविय बुद्धी के परे है क्योंकि वे अनंत हैं और उनकी महिमा अवर्णनिय
23:34है
23:36अनंत शेष्णाग के सहस्त्रफण अत्यंत देदी प्यमान है जिनसे निकलने वाली जोती ब्रहमांड के गहन अंधकार को भी प्रकाशित कर
23:45देती है
23:47प्रत्येक फन पर एक दिव्य मनी जड़ी है जिससे निरंतर दिव्य प्रकाश और उर्जा प्रवाहित होती रहती है जो स्रिष्टी
23:55के संतुलन में सहायक है
23:58वे अपने विशाल मस्तक पर समस्त ग्रहतारों सहित ब्रहमांड को एक छोटे से सर्सों के दाने की भाती अनायास ही
24:06धारन किये रहते हैं
24:08अनन्त शेशनाग का प्रत्येक श्वास ही काल का चक्र निर्धारित करता है और उनकी हर हल्चल से ब्रहमांड में बड़े
24:16परिवर्तन होते हैं
24:19वे असीन धैर्य और सहनशील्टा के प्रतीक हैं क्योंकि वे युगों-युगों से इस अविश्वसनिय भार को बिना किसी क्लेश
24:27के वहन कर रही हैं
24:29स्वय भगवान ब्रहमा भी उनके हजारों फनों की संख्या का पूर्णत्या अनुमान नहीं लगा पाए हैं जो उनकी अननत्ता का
24:38प्रमान है
24:40अनंत शेशनाग निरंतर भगवान श्रीहरी विश्नु की स्तुती में लीन रहते हैं, उनके प्रत्येक फन से दिव्य मंत्रों की ध्वनी
24:48गूंजती रहती है
24:50वे केवल ब्रहमांड के आधार ही नहीं, बलकि स्वय भगवान विश्नु के परम भक्त और उनके निट्य सेवक भी हैं,
24:58जो हर कल्प में उनके दिव्य लीलाओं का साक्षी बनते हैं
25:03उनके प्रत्येक फन की शक्ती ऐसी है कि यदि वे चाहें, तो अपनी इच्छा मात्र से ही समस्थ ब्रहमांड को
25:10पल भर में ध्वस्थ कर सकते हैं
25:14वे ही काल के अंत में महा प्रलय के समय अपने मुख से अगने निकाल कर संपून स्रिष्टी का सहार
25:20करते हैं, जिसका भए देवताओं को भी होता है
25:25परन्तु वे अपनी इस विनाशकारी शक्ती का प्रयोग केवल भगवान की इच्छा से ही करते हैं, अन्यथा वे सदैव, शांत
25:33और स्थिर बने रहते हैं
25:36महायोगी भी उनकी महिमा का पूर्णत्या वर्णन करने में असमर्थ हैं, क्योंकि उनकी लीलाएं और स्वरूप अनन्त हैं
25:45जो कोई भी अनन्त शेशनाग का ध्यान करता है, उसे सभी प्रकार के भय से मुक्ती मिलती है और आध्यात्मिक
25:53उन्नती प्राप्थ होती है
25:56उनकी महिमा का गायन करने से पाप नश्ठ होते हैं और हृदय में भक्ती का संचार होता है
26:04शेशनाग केवल एक सर्प नहीं, अपितु वे स्वय धर्म के अवतार और भगवान के आदिस्वरूपों में से एक हैं
26:12उनकी क्रिपा से ही यह ब्रहमांड अपनी धुरी पर स्थिर रहता है और समस्थ जीव अपने अपने कर्मानुसार फल भोगते
26:21हैं
26:22इस प्रकार अनन्त शेशनाग ब्रहमांड के परम आधार, भगवान के अनन्य भक्त और उनकी लीलाओं के शाश्वत साक्षी के रूप
26:31में प्रतिष्ठित हैं
26:33किन्तु हे राजन, इस विशाल ब्रहमांड की संरचना केवल सौंदर्य और स्रिजन तक ही सीमित नहीं, अपितु यह धर्म और
26:42न्याय के अटल सिध्धान्तों पर भी टिकी है, जहां प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता है
26:50और इस न्याय प्रणाली के सर्वोच अधिपती है, स्वय धर्मराजियम जो मृत्यू लोग के स्वामी और समस्त प्राणियों के कर्मों
26:59का निश्पक्ष लेखा जोखा रखने वाले देव हैं
27:03इस स्रिष्टी में कोई भी कर्म अग्रिश नहीं रहता, चाहे वह कितना भी सुक्ष्म क्यों न हो प्रत्येक क्रिया, चाहे
27:11पुन्य हो या पाप निश्चित रूप से अपने फल को आकर्शित करती है
27:16जब कोई जीव अपने नश्वर शरीर का त्याग करता है, तो उसकी आत्मा यम्दूतों द्वारा यमलोक के दुरगम मार्ग पर
27:24ले जाई जाती है, जहां उसके कर्मों का अंतिम लेखा जोखा होना निश्चित है
27:30वह मार्ग भयानक कठिनायों से भरा है, जहां तीवर वायू, जलती हुई रेट और तीक्षन शूलों की वर्शा होती है,
27:39जिससे पापी आत्माओं को अथा पीडा सहनी पड़ती है
27:44अंत्र ये आत्माय धर्मराज यम के भव्य किन्तु भयावह दर्बार में पहुँचती है, जहां न्याय का अंतिम निर्नय होता है
27:52और कोई भी जूठ नहीं तिक पाता
27:56धर्मराज यम अपने महिमामई और भयावह स्वरूप में वहां उपस्थित होते हैं, जिनकी एक द्रिष्टी मात्र से भी पापी आत्माओं
28:05काम उठती है
28:07उनके बगल में समस्थ प्राणियों के कर्मों का सूक्षम लेखा जोखा रखने वाले शांतचित चित्रगुप्ट अपने विशाल पोथो और लेखनी
28:16के साथ विराज मान होते हैं
28:20चित्रगुप्ट अपनी डैविय लेखनी से एक-एक पापी आत्मा के सम्पूर्ण जीवन के कर्मों को पढ़कर सुनाते हैं, जिसमें कोई
28:28भी गुप्ट पाप छिप नहीं पाता
28:31अपने कुकर्मों का विवर्ण सुनकर पापी आत्माय भय और पश्चाताप से काप उठती हैं, क्योंकि उन्हें अपने आने वाले दंड
28:39का अनुमान हो जाता है
28:42तब धर्मराज यम अपने न्याय के अटल सिध्धानतों के अनुसार प्रत्येक आत्मा के लिए उप्युक्त नरक लोग का निर्धारन करते
28:50हैं, जहां उसे अपने पापों का प्रायश्चित करना होगा
28:55इन नरक लोकों में से प्रथम है तमिस्र, जिसका अर्थ है घोर अंधकार, जहां उन लोगों को भेजा जाता है,
29:03जो दूसरों की संपत्ती चुराते हैं या उनके अधिकारों का हनन करते हैं
29:09इस नरक में आत्माओं को पूर्णत अंधकार में रखा जाता है, जहां उन्हें भोजनजल से वन्चित कर अत्यंत कष्ट प्रत
29:17स्थितियों में लगातार प्रताडित किया जाता है
29:21यमदूत उन्हें रस्षियों से कसकर बांधते हैं, अंधेरे में धकेल देते हैं और फिर उन्हें अकेले ही इस असहनिय पीडा
29:29में चीखने के लिए छोड़ देते हैं
29:33तमिस्र से भी अधिक भयाव है अंधतामिस्र जहां वह आत्माए जाती हैं जो किसी भोले भाले जीव को छल कर
29:41उनका धन या पत्नी चीनती हैं, जिससे वे जीवन भर अंधेरे में भटकते रहते हैं
29:48यहां आत्माओं की द्रिष्टी, श्रवन और अन्य सभी इंद्रिया छीन ली जाती हैं, जिससे उन्हें शारिरिक पीडा के साथ साथ
29:56गेहन मानसिक यंत्रणा का अनुभव होता है
30:00इसके बाद रौरव नरक आता है, जहां इश्यालू और क्रोधी आत्माओं को भयंकर रुरू नामक विशैले अगनिमय सर्पों द्वारा निरंतर
30:10डसा जाता है
30:12इन पापी आत्माओं को अगनी और विश्च से जलती हुई पीडा में जुलसाया जाता है, जहां उनकी चीखें इस भयानक
30:20लोक में गुंजती रहती है
30:23रौरव से भी अधिक क्रूर है महा रौरव उन आत्माओं के लिए जहां जो दूसरों के मास का लोब करते
30:30हैं या जीवों को कश्ट पहुचाते हैं, जिन्हें स्वयं उन्हीं की भाती पीडा सहनी पड़ती है
30:37यहां आत्माओं के शरीर को जीवित रहते हुए भी लगातार चीर फाड़ कर खाया जाता है, जिससे उन्हें अपने पापों
30:45की भयावः पुन्रावृत्ती का अनुभव होता है, ठीक उसी तरहे जैसे उन्होंने दूसरों को सताया था
30:52जिन आत्माओं ने दूसरों के मास का लोब किया था, उन्हें महारोरव में भीशन अगनी के बीच उन्हीं के पापों
31:00के भार से उत्पन हुए रुरु नामक क्रूर प्राणी जीवित ही नोच-नोच कर खाते हैं, जिससे उनकी आत्माए भयावः
31:07पीडा में चीखती रहती
31:09हैं. इसके उपरांत आता है कुम्भी पाक, जहां जो मनुष्य निरीः पशुओं को मार कर उनके मास से अपने पेट
31:17भरते हैं, उन्हें यमदूत खोलते हुए तेल के कड़ाहों में तब तक उबालते हैं, जब तक उनके शरीर की एक
31:25-एक कोशिका नश्ट नहो जाएं.
31:28तामिस्र वह अंधकारमय लोक है, जहां पराई संपत्ती का हरण करने वाले पापी को यमदूतों द्वारा कसकर जकर दिया जाता
31:36है और घोर यातनाय दी जाती हैं, जिससे वह भूखप्यास से व्याकुल होकर मूर्चित हो जाता है.
31:44और भी अधिक भयानक है अंधता मिस्र उन अभागी आत्माओं के लिए जिन्होंने चल और विश्वासघात से दूसरों की पत्नियों
31:52और धन का हरण किया, जहां उन्हें असीम पीडा में अंधा करके जीवन भर तड़पाया जाता है.
31:59जो मनुष्य मातापिता, ब्राहमनों और गुरुओं का अनादर करते हैं, उन्हें कालसूत्र नामक नरक में गरम तामबे के तवे पर
32:08ओंधा लिटा कर असहनिय पीडा दी जाती है, जहां उनकी तवचा धीरे-धीरे जुलस्ती और गल जाती है.
32:16अपनी प्रतिग्याओं को भंग करने वाले और धर्म के मार्ग से विचलित होने वालों को असिपत्रवन में ले जाया जाता
32:23है, जहां उन्हें तलवार की धार जैसे नुकीले पत्तों वाले व्रिक्षों से आच्छादित वन में नग्न होकर दोड़ने पर विवश
32:31किया ज
32:34सुकर्मुखुन राजाओं या अधिकारियों के लिए है जो प्रजा को अन्याय पूर्ण तरीके से दंडित करते हैं, जहां उन्हें गन्ने
32:41की तरह निचोडा जाता है और उनकी चीखें इस वीभत स्लोक में गूंजती रहती हैं
32:48जो लोग जीवों को बिना कारण कश्ट पहुचाते हैं, उन्हें अंधकूप में फेंका जाता है, जहां उन्हें विभिन प्रकार के
32:56हिंसक जानवरों, सर्पों और कीडों द्वारा लगातार नोचा और काटा जाता है
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