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महाराजा पृथु, जिन्होंने पृथ्वी का दोहन कर जीवन का नव-निर्माण किया, अब धर्मपरायण शासन के शिखर पर हैं। इस भाग में, हम जानेंगे कैसे उनके अश्वमेध यज्ञों ने इंद्र के अहंकार को चुनौती दी और कैसे परम ऋषिगणों के ज्ञान ने उन्हें वैकुण्ठ का मार्ग दिखाया। सत्ता का त्याग कर, पृथु अपनी पत्नी अर्ची के साथ गहन तपस्या में लीन होते हैं और अंततः परमगति को प्राप्त करते हैं। यह गाथा हमें निष्काम कर्म, त्याग और मोक्ष के सार से परिचित कराती है। #BhagavataPurana #MaharajaPrithu #Indra #Moksha #Sanatkumara #HinduMythology
Transcript
00:00जब महर्शियों ने पापी राजा वेन की भुजाओं का मन्थन किया, तब भगवान विश्णु के आंशिक अवतार के रूप में
00:07महान धनुर्धर महाराजा प्रिथु और उनकी पतनी अर्ची का दिव्य प्राकट्य हुआ.
00:13रिशियों और देवताओं ने जय जयकार करते हुए महाराजा प्रिथु का भव्य राज्या भिशेक किया और उन्हें रत्नजडित सिनहासन पर
00:21विराजमान करके समस्ट अस्त्रशस्त्र सौंपे.
00:25वेन के शासनकाल में फैले भयानक अकाल के कारण संपूर्ण प्रिथवी बंजर हो चुकी थी और प्रजा भूख तथा तडप
00:33से त्राहित्रा ही कर रही थी.
00:36अपनी प्रजा का दुख देखकर क्रोधित महाराजा प्रिथु ने अपने अजय धनुष पर विनाशकारी बान चड़ाया और अन्न को अपने
00:44भीतर चुपाने वाली प्रिथवी देवी का पीछा करने लगे.
00:49राजा प्रिथु के कालसमान, रूद्र रूप और प्रजवलित बान से भैभीत होकर प्रिथवी देवी एक गाय का रूप धारन करके
00:56तीनों लोकों में रक्षा के लिए भागने लगी.
01:00जब तीनों लोकों में कहीं भी शरण न मिली, तब प्रिथवी देवी ने महाराजा प्रिथु के चर्णों में गिरकर प्रान
01:07रक्षा की गुहार लगाई और अन्न प्रदान करने के नियम बताए.
01:12प्रिथवी के निवेदन पर महाराजा प्रिथु ने अपने धनुष की कोटी से विशाल परवतों को समतल कर दिया, जिससे क्रिशी
01:20और निवास के योग्य विशाल भूभाग का निर्मान हुआ
01:24महाराजा प्रिथु ने स्वायंभोव मनु को बच्छरा बना कर अपने पावन हाथों से प्रिथवी रूपी गाय का दोहन किया और
01:32समस्त मानव जाती के लिए विभिन प्रकार के अन्न और और औश्धिया प्राप्त की
01:38तकपश्चात देवर्शियों और महर्शियों ने देवगुरु ब्रिहस्पती को बच्छरा बना कर प्रिथवी से समस्त वेदों, पवित्र मंत्रों और परम ज्यान
01:46का दोहन किया
01:48देवराज इंद्र को बच्छडा बनाकर समस्त देवताओं ने प्रिथवी से असीन बल, ओज और अमरित का दोहन करके अपने स्वर्ण
01:57पात्रों को भर लिया
01:59दैत्यों और दानवों ने परम भक्त प्रहलाद को आगे करके प्रिथवी से विभूती, मायावी शक्तियों और रसका दोहन लोहे के
02:07पात्रों में किया
02:09गंधर्वों और अपसराओं ने विश्वावसु को बच्छडा बनाकर प्रिथवी से संगीत, मधुर्वानी, सौंदर्य और कलाओं का रस्पान रूपी दोहन किया
02:19समतल की गई भूमी पर महाराजा प्रिथु ने सुन्दर नगरों, ग्रामों, दुर्गों और व्यवस्थित क्रिशी क्षेत्रों की स्थापना करके एक
02:27नए यूग की नीव रखी
02:30प्रिथवी का पुनह उद्धार करने और प्रजा का पोशन करने के कारण राजा प्रिथु ने प्रिथवी को अपनी पुत्री के
02:37रूप में स्विकार किया, जिससे उनका नाम प्रिथवी प्रसिद्ध हुआ
02:42महाराज प्रिथु ने समाज में धर्म का पुनह स्थापन करते हुए चार वर्नों और आश्रमों की मर्यादा को सुग्रिड किया,
02:50जिससे चारों और न्याय का सामराज जिस्थापित हुआ
02:54महाराजा प्रिथु के निस्वार्थ और पुत्रवत वादसल्य से गदगद होकर प्रजाजन उनका पिता की भाती आदर और पूजन करने लगी
03:15महाराजा प्रिथु ने विशाल यग्यशालाओं का निर्मान कराकर ऐसे दिव्य यग्य किये जहां देवता प्रत्यक्ष उपस्थित होकर अपनी आहुतिया स्विकार
03:24करते थे
03:26संपूल्न भूमंडल स्वर्णिम कांती से जग्मगा उठा और सभी प्राणी भय शोक तथा व्याधियों से मुक्त होकर परमसुख का अनुभव
03:34करने लगे
03:36महाराजा प्रिथू के इस स्वर्णिम और आदर्ष शासन की गाथा तीनों लोको में गूंजने लगी जिसने उनके आगामी सौ अश्वमेध
03:45यग्यों का मार्ग प्रशस्थ किया
03:48महाराजा प्रिथु ने धर्म की स्थाई स्थापना और समस्थ प्रजा के आत्यंतिक कल्यान हेतु पवित्र नदी तट पर सो अश्वमेध
03:56यग्य करने का महान संकल्प लिया
03:59यग्य के पवित्र संकल्प के साथ ही सुवर्ण भूशनों से सुसजजित एक अत्यंत दिव्य और कांतिमान अश्व को उन्मुक्त विचर्ण
04:08के लिए छोड़ा गया
04:09उस पवित्र यग्य अश्व की रक्षा के लिए महाराजा प्रिथु के परम पराक्रमी पुत्रों की विशाल सेना अस्त्रशस्त्रों से सुसजजित
04:18होकर उसके पीछे पीछे चली
04:20एक के बाद एक यद्य सफलता पूर्वक संपन होने लगे और महावेदी से उठती हुई सुगंधित आहुतियों का धूम्र समस्त
04:30दिशाओं को पवित्र करने लगा
04:32जब 99 अश्वमेध यग्य निर्विघन पूरे हो गए तब महाराजा पृत्व का तपोबल और दिव्य प्रभाव तीनों लोकों में अध्वितिय
04:41रूप से प्रजवलित हो उठा
04:44पृत्वी लोक से उठती इस अभूत्पूर्व आध्यात्मिक उर्जा के आघात से स्वर्गलोक कापने लगा और देवराज इंद्र का सिनहासन थर्थराने
04:53लगा
04:55अमरावती की भव्य देव सभा में बैठे देवराज इंद्र अपनी सर्वोच सत्ता और पद के संकट में पढ़ने की आशंका
05:02से अत्यंत व्यथित हो उठे
05:05इंद्र को यह भय सताने लगा कि यदि प्रिथु ने सोवा यग्य पूर्ण कर लिया तो वे शतक्रतु का सर्वोच
05:12पद प्राप्त कर इंद्र का वर्चस्व समाप्त कर देंगे
05:16इश्या और अहंकार के वशीभूत होकर देवराज इंद्र की बुद्धी भरष्ट हो गई और उन्होंने धर्मराज होकर भी छलकपट का
05:25मार्ग चुनने का निश्चय किया
05:28महाराजा प्रिथु के सोवे अश्वमेध यग्य को छलकपट से भंग करने की योजना बनाकर इंद्र गुप्त रूप से भूलोग की
05:35ओर प्रस्थान कर गए
05:38प्रिथ्वी पर सोवे महायध्य का शुभारंब अभूत पूर्व भव्यता के साथ हुआ जहां महर्शिगन पवित्र वेद मंत्रों का सस्वर गान
05:46कर रहे थे
05:48किसी की दृष्टी में न आते हुए देवराज इंद्र ने सधन काली घटाओं का माया भी आवर्ण ओडलिया और यग्यशाला
05:56के निकट आपहुँचे
05:58देवराज इंद्र ने एक पाखंडी सन्यासी का छद्म वेश धारण किया, सिर पर जटाए बांधी और भस्म लगाकर यग्यप्रांगण में
06:07प्रवेश किया
06:09जब सभी रित्विज और प्रजाजन मंत्रो चार में लीन थे, तब इंद्र ने चुपके से बंधे हुए दिव्ययगी अश्व की
06:16रस्सी खोल ली
06:18अश्व चुराकर इंद्रदृत गती से उस पर सवार हुए और काले बादलों तथा अंधकार की आड में आकाश की ओर
06:26उर चले
06:28महान ब्रहमर्शी अत्री ने इंद्र की इस नीच कर्तूत को तुरंत देख लिया और उच्चस्वर में चिल्ला कर प्रिथु के
06:35पुत्र को सचेत किया
06:37पिता के यग्य की रक्षा के लिए महाराजा प्रिथु का शूरवीर पुत्र प्रिथु प्राक्रमी धनुश्बान संभाल कर आकाश मार्ग की
06:45ओर जप्टा
06:47आकाश में चोर को सन्यासी के वेश में देख कर राजकुमार संभरम में पढ़ गया और धर्म शास्त्र के अनुसार
06:55साधु पर बान चलाने से रुप गया
06:58महर्शी अत्री ने तुरंत पुकार कर कहा कि यह कोई सच्चा साधु नहीं बलकी धर्मच्युत इंद्र है इसलिए बिना हिच्चाए
07:06इसका सहार करो
07:09रिशिवर का आदेश पाते ही राजकुमार ने अपना विक्राल बान इंद्र पर साध लिया और चोरी गए अश्व को मुक्त
07:16कराने हेतु भीशन संग्राम छिड़ गया
07:20रनभूमी में सन्यासी वेशधारी इंद्र ने राजकुमार पर मायावी शक्ती का प्रयोग कर उसे भ्रमित करने का प्रयास किया किन्तु
07:28राजकुमार अपने लक्षे से विचलित नहीं हुआ
07:32इंद्र ने अपने दिव्य अस्त्रों से राजकुमार पर प्रहार किया पर राजकुमार ने अपनी वीर्ता और धर्म निष्ठा से हर
07:39वार को विफल कर दिया
07:42यह देख महर्शी अत्री ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से इंद्र की कपट चाल को भांप लिया और राजकुमार को सही
07:49दिशा में युद्ध करने का संकेत दिया
07:53राजकुमार ने महर्शी अत्री के संकेत को समझा और अपनी पूरी शक्ती से इंद्र के मायावी रूप पर आक्रमन कर
08:00दिया, जिससे इंद्र को अपनी चाल बदलनी पड़ी
08:04अचानक इंद्र का मायावी रूप बिखर गया और वह अपने असली दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गये जिससे राजकुमार क्षन
08:12भर के लिए आश्चर्यच्कित रह गया
08:15किन्तु धर्मयुद्ध के पवित्र सिध्धान्त को याद कर राजकुमार ने अपनी आत्मनियंत्रन बनाये रखा और बिना संकोच अपने बानों को
08:24इंद्र की ओर साधा
08:26इंद्र राजकुमार की अटूट निष्ठा और पराक्रम से भैभीत होकर युध त्याक कर आकाश मार्ग से पलायन कर गए अश्व
08:35को पीछे छोड़ते हुए
08:38विजी राजकुमार ने अश्व को लेकर यग्यशाला में प्रवेश किया जहां महाराज प्रिथु और रिशिमुनिगन उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे
08:46उनके चहरों पर गर्व और संतोश की चमक थी
08:51अपने दिव्य लोक में अपमानित इंद्र प्रिथु के बढ़ते यश से क्रोधित होकर सोवे यग्य को किसी भी कीमत पर
08:58रोकने का संकल्प लेने लगे
09:01महाराज प्रिथु ने पुनह अश्वमेध यग्य आरंभ किया और यग्य अश्व को विश्व कल्यान हेतु धर्ती पर विचर्ण के लिए
09:09छोड़ दिया
09:11परंतु इस बार इंद्र एक भयानक कपालिक के वेश में जंगल में विचर्ण करते हुए अश्व का अफ़रन करने में
09:18सफल हो गए
09:20स्वर्गिय रक्षकों द्वारा सूचित किये जाने पर राजकुमार ने तत्क्षन कपालिक वेश्धारी इंद्र का पीछा करना शुरू कर दिया उनकी
09:29मायावी चाल को पहचानते हुए
09:32आकाश में एक भीशन पीछा जारी रहा जहां राजकुमार के बान कपालिक के आसपास बिजली की गती से जपटते रहे
09:41अश्व को मुक्त कराने हेतू राजकुमार ने अपनी पूरी शक्ती से वार किया, जिससे कपालिक वेश्धारी इंद्र को अंत्ध अश्व
09:49को त्यागना पड़ा और वह वायू में विलीन हो गए
09:54राजकुमार ने एक बार फिर अश्व को सकुषल यग्यशाला लोटा दिया और विश्यमुनिगन इंद्र के बार-बार के व्यवधानों और
10:02माया के स्वरूप पर गंभीर चर्चा करने लगे
10:06ब्रहम लोक में बैठे परम्पिता ब्रहमा ने इंद्र के लगातार बढ़ते अहंकार और प्रिथु के यग्यों में विधन डालने की
10:13घटनाओं को गंभीरता से देखा
10:16उन्होंने समझा कि यह केवल इंद्र का भय नहीं बलकि ब्रहमांडिय संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती है और भगवान
10:25विश्नु से मार्ग गर्शन हेतु संपर्क साधा
10:28भगवान विश्नु ने ब्रहमदेव को आश्वस्त किया कि वे हस्तक्षेप करेंगे ताकि धर्म का मार्ग प्रशस्थ हो और इंद्र को
10:37भी कोई हानी न पहुँचे
10:39महाराज प्रिथु इंद्र के बारबार के व्यवधानों के बावजूद अपनी अटल निष्ठा और विश्व कल्यान की भावना से विचलित नहीं
10:48हुए
10:49अत्तह महरशी अत्री महाराज प्रिथु के समीप आये और उन्हें इंद्र को चतुराई से परास्त कर अंतिम यग्य को सफलता
10:57पूर्वक संपन्न करने की योजना बताई
11:01महर्शी अत्री के गहन मार्ग गर्शन से प्रेरित होकर, महाराज प्रिथु ने अपने अंतिम अश्वमेध यग्य की तैयारी में अपनी
11:09समस्त उर्जा और ग्रिड़ता को जोक दिया, मानो यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संग्राम हो
11:16अत्री ने प्रिथु को एक ऐसी जटिल रणनीती समझाई, जिसमें इंद्र की हर संभावित चाल को नाकाम करने के लिए
11:24एक मायावी जाल बिछाना था, जो प्रत्यक्षत है सरल प्रतीत होती थी पर भीतर से अत्यंत गूर थी
11:32अपने दिव्य लोक में विराजमान इंद्र ने प्रिथवी पर चल रही गतिविधियों को सुक्षमता से देखा, और प्रिथु के अंतिम
11:40यग्य को देखकर उनके मन में एक नई बाधा उत्पन करने की दुष्ट इच्छा जागरित हुई
11:46एक छद्म रूप धारण कर इंद्र ने स्वयं को एक मायावी साधु के वेश में बदल लिया, जिसका उद्देश यग्य
11:54के अश्व को पुनह चोरी कर प्रिथु की तपस्या को भंग करना था
11:59किन्तु प्रिथु के सतर्क योध्धा, महर्शी अत्री की बुद्धिमत्ता पूर्ण योजना का पालन करते हुए उस मायावी साधु को देखते
12:07ही पहचान गए और उसे अश्व चुराने से पहले ही रोक लिया
12:13जैसे ही इंद्र का पाखंड उजागर हुआ, प्रिथु के सैनिकों ने उसे घेर लिया और दिव्य वजर्धारी देवराज को पहली
12:21बार अपने चल के विफल होने का गहरा एहसास हुआ
12:25इस बार प्रिथु का धैर्य तूट गया और अपने युद्ध कौशल से पूर्ण उन्होंने इंद्र के वध का संकल्प लेते
12:32हुए अपना दिव्य धनुष उठाया और एक तेजस्वी बान उस पर चढ़ाया
12:38प्रिथु के क्रोध की प्रचंड उर्जा से स्वर्ग लोक भी काप उठा और समस्त देवताओं ने आने वाले प्रल्यंकारी युद्ध
12:46के संकेट से अपनी आखें बंद कर ली
12:49जब इंद्र और प्रिथु के बीच युद्ध लगभग निश्चित हो गया तब समस्त ब्रहमांड के रक्षक भगवान ब्रहमा अपनी अनुपम
12:58दिव्य प्रभा के साथ अचानक प्रकट हुए
13:01ब्रहमा के दिव्य प्रकाश और शान्त मुखमंडल ने युद्ध के लिए तैयार दोनों युद्धाओं को स्तब्ध कर दिया और उनकी
13:09प्रचंड उर्जाक्षन भर के लिए शान्त हो गई
13:13ब्रहमा ने मृदु स्वर में प्रिथु से कहा कि वह इंद्र को क्षमा कर दें क्योंकि अत्यधिक यग्यों से स्वर्ग
13:20का संतुलन बिगड सकता है और उनका क्रोध धर्म के मार्ग से विचलित कर रहा है
13:26फिर उन्होंने अत्यंत कठोर्ता से इंद्र को उनके बार-बार के अनुचित हस्तक शेप और छलकपट के लिए फटकार लगाई
13:34जिससे स्वर्ग के अधिपती का मस्तक शर्म से जुग गया
13:38इंद्र को अपनी गलतियों का गेहन एहसास हुआ और उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और देवत्व के बावजूद अपने अधर्म पूर्ण कारियों
13:47के लिए पश्चाताप किया
13:50ब्रह्मा ने समझाया कि यग्यों का उद्देश केवल स्वार्थपूर्ती नहीं बलकि धर्म की स्थापना और विश्व का कल्यान है और
13:58किसी भी पवित्रकार्य में बाधा डालना घोर पाप है
14:03उन्होंने पृथू को उपदेश दिया कि वह अपने यग्यों की संख्या को सीमित करें क्योंकि प्रकृती में हर वस्तु का
14:10संतुलन आवश्चक है अन्यथा अत्यधिक शक्ती ब्रहमांड को भी अस्तव्यस्थ कर सकती है
14:17ब्रहमा ने आगे विस्तार से बताया कि यग्यों से उत्पन दिव्य उर्जा का अत्यधिक संख्य देवों के अधिकारों को कम
14:25कर सकता है और प्रिथ्वी वस्वर्ग के बीच के सामनजस्य को भंग कर सकता है
14:32प्रिथु ने ब्रह्मा के ज्ञान और दिव्य आदेश को स्विकार करते हुए श्रद्धा पूर्वक अपना मस्तक जुकाया और उनके उपदेश
14:40का पालन करने का वचन दिया, जिससे उनका क्रोध पूर्णत है शान्त हो गया
14:46अपनी तुटियों का अनुभव कर देवराज इंद्र ने भी पश्चाताप के साथ प्रिथु और ब्रह्मा दोनों से अपने अपराधों के
14:54लिए क्षमा याचना की
14:56महाराज प्रिथु ने अपने हृदय में उदारता धारण कर इंद्र को क्षमा कर दिया और उन्हें भविश्य में धर्म के
15:04मार्ग पर चलने का उपदेश दिया
15:06इस प्रकार ब्रह्मा के हस्तक्षेप और उनकी अद्वितिय बुद्धमत्ता से एक महान युद्ध को टाला गया और प्रिथु तथा स्वर्ग
15:16के बीच पुनह शांती और सामंजस्य स्थापित हुआ
15:20इंद्र के साथ शांती स्थापित होने के उपरांत महाराज प्रिथु अपने विशाल सामराज्य की क्षनभंगुर्ता और सांसार वैभव की सीमाओं
15:29पर विचार करने लगे
15:31उन्होंने अनुभव किया कि समस्त प्रिथवी का एक्षत्र राज्य और भौतिक सुख भी आत्मा को परम शांती तथा अंतिम मोक्ष
15:39प्रदान नहीं कर सकते
15:41इस आध्यात्मिक तृष्णा को शांत करने के लिए महाराज प्रिथु ने अपने भव्य राजस भागरह में महान रिशियों, विद्वानों और
15:50प्रजाजनों की एक विशाल सभा बुलाई
15:54नमरता पूर्वक जुपकर राजा प्रिथु ने विद्वान रिशियों के समक्ष अपनी यह इच्छा व्यक्त की की वे जन्म और मृत्यू
16:01के चक्र से मुक्ती दिलाने वाले मार्ग का दर्शन कराएं
16:06प्रिथु की इस पवित्र जिग्यासा के क्षण में ही सहसा राजसभा के उपर का आकाश सहसरों सूरियों के समान एक
16:13दिव्य और अलौकिक प्रकाश से जग्मगा उठा
16:17उस दिव्य जोती पुंच के मध्य से ब्रहमा के चार मानस पुत्र, सनक, सनातन, सनंदन और सनतकुमार धरा पर मंदमंद
16:25अवतरित होने लगे
16:27बालक समान प्रतीत होने वाले ये चारों पर महन्स रिशी अपने मुख पर अनंत ज्यान, निर्मल मुस्कान और अगाध ब्रहम
16:35तेज धारन किये हुए थे
16:38उनके चरण कमल रखते ही समस्त राजसभा एक अभूत पूर्व आध्यात्मिक शांती, सुगंधित वायू और अलौकिक तरंगों से परिपूर्ण हो
16:47गई
16:48सनत कुमारों का दिव्य आगमन देखते ही महाराज प्रिथु अपने रतनों से जड़े सिनहासन से तुरंत खड़े हुए और अपार
16:56भक्ती से भर गए
16:58वे अती शीघ्रता से रिशियों की ओर बढ़े और बिना किसी हिचकी चाहट के उनके पवित्र चर्णों की धूली में
17:06अपना सिर जुका कर गंडवत प्रणाम किया
17:10महाराज प्रिथु के इस अनुपम भक्तिभाव को देख कर सभा में उपस्थित समस्त मंत्री, मुनी और नागरिक भी अत्यंत श्रद्धा
17:18से भूमी पर जुक गए
17:20प्रिथु ने परम आदर के साथ चारों रिशियों के लिए कमलों के चितरकारियों से सजे उच्च स्वर्ण आसनों का प्रबंध
17:27किया
17:28इसके पश्चात उन्होंने स्वर्ण के कल्षों से गंगाजल लेकर अत्यंत निष्ठापूर्वक चारों महान ज्यानियों के चरण प्रक्षालन किये
17:38अश्रुपूरित नेत्रों और जुडे हुए हाथों के साथ महाराज प्रिथु ने अपने राज्य में इन अमर सनतकुमारों का भावपूर्ण अभिनन्दन
17:47किया
17:48प्रिथु ने कहा कि आप जैसे निष्काम ब्रहमग्यानियों का दर्शन मात्र ही मनुष्य के समस्थ पापों को धोकर परमपद का
17:56द्वार खोल देता है
17:58महाराजा की यह निष्चल भक्ती और जिग्यासा देखकर चारों सनतकुमार अती प्रसन्न हुए और उनके मुखमंडल पर मंद मुस्कान छा
18:07गई
18:09महर्शी सनतकुमार ने मधुरवानी में कहा कि भगवान विष्णु के आशिक अवतार होने के बाद भी प्रिथु की यह नमरता
18:17ही उनके महान चरित्र की वास्तविक पहचान है
18:21उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रित्रवी का पालन करना ही परियाप्त नहीं है अपितु आत्मग्यान और श्रीहरी की भक्ती ही
18:29जीवन का अंतिन लक्ष है
18:32तकपश्चात महाराज प्रित्रुने हाथ जोड कर रिशियों से विंती की कीवे उन्हें और उनकी प्रजा को मोक्षग्यान का वह परम
18:40उपदेश प्रदान करें
18:43पूरी राजसभा में पूर्ण स्तब्धता और परम शान्ती चा गई और सभी उच्सुकता से सनतकुमारों के मुख से अमर ब्रहमज्यान
18:51सुनने की प्रतीक्षा करने लगे
18:54तब सनतकुमारों ने अपने दिव्यतेश से राजसभा को प्रकाशित करते हुए अत्यंत गंभीर और शान्त स्वर में मोक्ष के अमरित्मय
19:03ज्यान का प्रथम सूत्र उच्चारित किया
19:06उन्होंने समझाया कि प्राणी की सच्ची शान्ती और आनंद बाहरी वस्तुओं धन सम्पत्तिया सांसारिक सुखों में नहीं
19:14अपितु केवल अपने हृदय में स्थित अविनाशी आत्मा के साक्षातकार में नहित है
19:21जैसे सूर्य अपनी किर्णों से संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है
19:25वैसे ही आत्मा अपने अंतरनिहित प्रकाश से शरीर और मन को चेतनता प्रदान करती है
19:31जो समस्थ चेतना का मूल स्रोत है
19:35उन्होंने माया के आवर्ण का भेद खोलते हुए बताया कि सांसारिक सुखरुख, मान अपमान और जैपराजय केवल मन के विकार
19:44हैं
19:44जो आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप से भटकाते है
19:49सनत कुमारों ने भक्ती योग को मोक्ष का सरल और सर्वोत कृष्ट मार्ग बताया
19:54जहां निस्वार्थ प्रेन और पूर्ण समर्पन से ही प्राणी श्रीहरी के चर्णों में सहच्ता से स्थान प्राप्त कर लेता है
20:03उन्होंने सिखाया कि अनासक्ती वह दिव्य कवच है जो मन को संसार के क्षण भंगुर आकर्शनों से बचाता है और
20:11उसे अविचलित शान्ती की ओर अग्रसर करता है
20:15सनत कुमारों ने कर्मयोग का मर्म समझाया कि बिना फल की इच्छा किये अपने कर्तव्यों का पालन करना ही वास्तविक
20:23मुक्ती का मार्ध है जहां कर्म बंधन नहीं बलकी मोक्ष का साधन बन जाता है
20:30उन्होंने गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा कि एक सच्चा गुरु ही अज्ञान के अंधकार को मिटाकर शिश्य
20:37को आत्म ज्ञान के शाश्वत प्रकाश की गोर ले जाने वाला दिव्य सेतु है
20:43महाराज प्रिथु ने अपने हृदय में सनत कुमारों के एक-एक शब्द को गहरे तक आत्म साथ किया
20:49उनके मन में सत्य की एक अलौकिक ज्वाला प्रजवलित हो उठी जिसने सभी संशों को भस्न कर दिया
20:57सनत कुमारों ने जोर दे कर कहा कि वास्तविक शांती और संतोष बाहरी परिस्थितियों के बदलने से नहीं आता
21:04बलकि यह स्वयन के भीतर स्थित परमात्मा से अटूट संबंध स्थापित करने से प्राप्थ होता है
21:12उन्होंने समझाया कि जैसे समुद्र की लहरें स्वयन समुद्र से भिन नहीं
21:16वैसे ही प्रत्येक आत्मा परम ब्रह्मा का ही अविभाज अंश है जो अपने मूल स्वरूप को भूल कर भ्रम में
21:23रहता है
21:25इस गहन ज्यान के स्पर्ष से महाराज प्रिथु के मन से भय, मोह और चिंता के बादल छंट गए
21:32और उन्होंने एक अभूत पूर्व आंतरिक स्वतंत्रता और मुक्ती का अनुभव किया
21:38उन्होंने परम आत्मा को निराकार, निर्गुन, अनन्त और सर्वव्यापी बताते हुए कहा कि वह एक ही समय में सभी में
21:46व्याप्त है और सभी से परेभी है
21:48हर कण में उसका स्पंदन है
21:52सनत कुमारों ने कहा कि जीवन का अंतिन लक्ष आत्मा का परमात्मा में विलय होना है
21:58जैसे एक बून सागर में मिलकर स्वयन सागर बन जाती है यही वास्तविक मोक्ष है
22:05इस परम ज्यान को सुनकर महाराज प्रिथू के भीतर की सभी ग्रंथिया खुल गई
22:10उनके मुख पर एक दिव्य आभा फैल गई और उनकी आखें आनंद के आसुओं से भराई
22:17अंत में सनत कुमारों ने महाराज प्रिथू को संबोधित करते हुए कहा कि इस ज्यान को केवल सुनने से नहीं
22:25अपितु इसे अपने जीवन में उतारने और प्रत्येक कर्म में साकार करने से ही परम सिध्धी प्राप्थ होती है
22:33पूरी राज सभाने सनत कुमारों के इस अधवितिय ब्रहम ज्यान को सुनकर गेहन श्रधा और विस्मय के साथ सिर जुकाया
22:41मानो हर आक्मा ज्यान के प्रकाश से आलोकित हो गई हो
22:46महाराज प्रिथु ने उठकर नत्मस तक होकर सनत कुमारों के चर्णों में प्रणाम किया
22:52और मौन रूप से अपने शेश जीवन को इस परम ज्यान के सिध्धानतों पर समर्पित करने का संकल्प लिया
22:59सनत कुमारों ने महाराज प्रिथु को अपने दिव्य आशिरवाद से अभिसिंचित किया
23:05जिससे उनके हिदय में संतोष और द्रिडता का एक अभूत पूर्व संचार हुआ
23:10जो उनके भावी पत को प्रकाशित करने वाला था
23:13उस दिन से महाराज प्रिथु का शासन केवल प्रिथवी का नहीं
23:18बलकि आत्मग्यान और वैराग्य के प्रकाश से आलोकित एक आध्यात्मिक सामराज्य बन गया
23:24जहां प्रतेक प्रजाजन ने भी शान्ती का अनुभव किया
23:29सनत कुमारों के उपदेशों से प्रजवलित ज्यान की अगनी ने महाराज प्रिथु के अंतर्मन को आलोकित कर दिया
23:36जिससे उनके हृदय में संसार की क्षनभंगुरता का बोध गहरा होता चला गया
23:42उन्होंने अपने विशाल सामराज्य और असीमित सत्ता को केवल एक शनभंगुर स्वपन के समान देखा
23:49जिसकी चमक अस्थाई थी और जिसका अंत निश्चित था
23:54राजसी वैभव और भौतिक सुखों की चकाचौंध अब उन्हें एक मिथ्या आवर्ण सी प्रतीत होती थी
24:00जो आत्मा को परमात्मा से विमुख कर रही थी
24:05यह बोध एक शांत नदी की तरह उनके अंतर्मन में प्रवाहित हो रहा था
24:10जो धीरे धीरे उनके सांसारिक मोह के बंधनों को धीला करता जा रहा था
24:16उनके भीतर एक गहन शांती और वैराग्य का बीज अंकुरित हो चुका था
24:21जो अब एक विशाल व्रिक्ष बनने को आतुर था
24:25उन्होंने अनुभव किया कि वास्तविक मुक्ती केवल त्याग और आत्मज्यान से ही संभव है
24:31न कि राजसी एश्वर्य या सांसारिक उपलब्धियों से
24:36यह निर्णय न केवल उनके लिए बल्कि उनके वन्ष और समस्त प्रजा के लिए भी एक नए आध्यात्मिक युग की
24:43शुरुवात का संकेत था
24:45उनकी धर्मपत्नी महारानी अर्ची जो सदैव उनके हर निर्णय में साथ खड़ी रहती थी उन्होंने भी इस आध्यात्मिक मार्ग को
24:55स्विकार कर लिया
24:57ततपश्चात उन्होंने अपने जेश्ट पुत्र को राजपाट सौंपने का निश्चय किया
25:02ताकि राज्य का कार्य सुचारू रूप से चलता रहे और धर्म की स्थापना बनी रहे
25:08एक शुभ मुहूर्थ का चयन किया गया जब आकाश में तारे अपनी चमक बिखेर रहे थे और वायू में एक
25:16दिव्यशान्ती व्याप्त थी
25:18महाराज प्रिथु ने अपने पुत्र को एकांत में बुलाया और उसे राज्य के कर्तवियों और आध्यात्मिक्ता के महत्व का गेहन
25:26उपदेश दिया
25:28उन्होंने समझाया कि एक सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा के भौतिक कल्यान के साथ साथ उनके आध्यात्मिक उत्थान
25:37का भी ध्यान रखे
25:39पुत्र ने अपने पिता के हर शब्द को आत्म साथ किया और उनके त्याद एवं ज्यान के प्रती गहरी श्रद्धा
25:46व्यक्त की
25:48उसने वचन दिया कि वह धर्म के मार्ग पर चलते हुए प्रजा का पालन करेगा और पिता के आधर्शों को
25:55सदैव जीवित रखेगा
25:57अगले दिन राजसी दर्बार में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया जहां सभी मंत्री, सामंत, क्रिशी और प्रजाजन उपस्थित
26:06थे
26:07महाराज प्रिथु अपने राजसी वस्त्रों को अंतिम बार धारन कर शांत और तेजस्वी मुद्रा में सिनहासन पर विराजमान हुए
26:17उन्होंने अपनी गंभीर और प्रभावशाली वानी में अपनी प्रजा को अपने त्याग के निर्णय और आत्म ज्यान के महत्व के
26:25बारे में अवगत कराया
26:27प्रजाजन्क यद्यपी उनके जाने से दुहकी थे, फिर भी उनके त्याग और आध्यात्मिक उत्थान के प्रती गहरी श्रद्धा से नत्मस्तक
26:36थे
26:37महाराज प्रिथु ने अपने जेश्ट पुत्र को बुलाया, उसे अपने हाथों से राजमुकुट पहनाया और राजदंड सौपा, जिससे राज्यका भार
26:47आपचारिक रूप से उसे हस्तान्तरित हो गया
26:51राजपाट त्याग कर महाराज प्रिथु एक सरल सन्यासी के रूप में अपनी धर्म पत्नी के साथ वैकुंट गमन की दिशा
26:59में अपने आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े
27:03राजधानी की पक्की सीमाओं को पीछे छोड़ते हुए महाराज प्रिथु और महारानी अर्ची नंगे पैर सघन और पावन तपोवन के
27:11पथ पर आगे बढ़े
27:14विशाल व्रिक्षों की शीतल छाया और पक्षियों के मधुर कूक से गूंजता वन छेत्र उन राजसी योगियों का स्वागत करता
27:21हुआ प्रतीत हो रहा था
27:24रेश्मी वस्त्रों और आभूशनों को त्याग कर छाल और म्रिक्षाला धारन की हुई महारानी अर्ची के चहरे पर अपने पती
27:32के साथ का अनूठा संतोष छलक रहा था
27:35पवित्र नदी के तट पर पहुँचकर महाराज प्रिथु ने अपने हाथों से घास और कुशा की एक साधारन कुटिया का
27:43निर्मान किया
27:45दोनों ने मिलकर प्रातहकाल की पूजा के लिए सूखी लकडिया और पवित्र सामगरी एकत्र कर यग्यवेदी की स्थापना की
28:04अर्ची पतिवर्ता धर्म का पूर्ण पालन करते हुए कंदमूल, फल और शुद्ध जल से अपने स्वामी की निहस्वार्थ सेवा करती
28:12थी
28:14कठोर तपस्या का संकल्प लेकर महाराज प्रिथु ग्रीश मृतु की चिल्चिलाती धूप में चार और अगनी जलाकर एकाग्रचित खड़े हो
28:22गए
28:24भीशन शीत काल में वे रातरात भर थंडे जल में खड़े होकर निशकाम भाव से भगवान विश्णु के नाम का
28:31जाप करते रहे
28:33अर्चि ने भी अपने शरीर और आत्मा की शुद्धी के लिए केवल सूखे पत्तों और जल पर निर्भर रहकर कठोर
28:40व्रत अंगिकार किया
28:42वर्षों की निरंतर साधना से महाराज प्रिथु के तेज और आध्यात्मिक उर्जा से पूरा वन अलोकिक कांती से जग्मगा हुठा
28:52प्रिथु के तपोबल के प्रभाव से सिंह, तिरन और हाथी जैसे जन्मजात शत्रु जीव भी आपसी वैर भूल कर आश्रम
29:00के निकट साथ रहने लगे
29:01वन में निवास करने वाले महान रिशिमुनी महाराज प्रिथु के इस अगमे वैराग्य और तप को देखकर आश्चर यचकितो उठे
29:12प्रिथु रिशियों के साथ आध्यात्मिक समबाद करते हुए सांसारिक धन की नश्वर्ता और केवल भक्ती की शाश्वत सत्यता का उपदेश
29:21देते थे
29:22कठोर तपस्या के कारण महारानी अर्ची का शरीर अत्यंत शीन हो गया था किन्तु उनके मुख पर दिव्या आत्मिक आनंद
29:30चाया हुआ था
29:32धीरे-धीरे महाराज प्रिथु ने अपनी इंद्रियों और प्राणों को वश्मे कर अपना समस्त ध्यान भगवान श्री हरी के चतुर्भुज
29:40रूप पर केंद्रित किया
29:43उनके तपोबल और भक्ती से प्रसन्न होकर देवलोग से स्वर्गिक पारिजात पुष्पों की सुगंधित वर्षा होने लगी
29:51पूर्ण निर्विकल्प समाधी में लीन होकर प्रिथु का व्यक्तिगत चेतना तत्व सीधे परंब्रम की अनन्त उर्जा में विलीन हो गया
30:00पतिवर्था अर्ची ने शांति पूर्वक समझ लिया कि उनके स्वामी अपनी नश्वर देह को त्याग कर व्यकुंठ की ओर प्रस्थान
30:08कर चुके हैं
30:11परंभक्ति और पवित्रता के बल पर राजा और रानी दोनों सांसारिक बंधनों को पार कर परमधाम व्यकुंठ गमन के लिए
30:18तयार हुए
30:20अपने पती राजा प्रिथु की पार्थिव देह के समीप रानी अर्ची ने अपने मन को गहरे ध्यान में लीन कर
30:28लिया
30:28उनकी आत्मा के अंतिन प्रस्थान के क्षणों को महसूस करती हुई जैसे एक नदी सागर में विलीन होने से पूर्व
30:36शांत हो जाती है
30:38उनकी इंद्रिया बाहरी संसार से पूरी तरह विमुख हो चुकी थी और उनकी चेतना अपने अंतिन गंतव्य की ओर अग्रसर
30:46थी जैसे एक दीपक की लौ अपने स्रोत की ओर लौटती है
30:52अंतिन श्वास के साथ उन्होंने अपनी काया को त्याग दिया जैसे एक सर्प अपनी पुरानी केंचुली को छोड़ देता है
31:00अपनी आत्मा को परमधाम की यात्रा के लिए मुक्त कर दिया
31:05वायुमंडल में एक स्वर्गिय सुगंध फैल गई और अद्रिश्य देवगणों ने पुश पवर्षा की अर्ची की आत्मा के पवित्र प्रस्थान
31:13का सम्मान करते हुए जैसे एक महान संत की यात्रा का स्वागत किया जाता है
31:20जैसे ही अर्ची की आत्मा उपर उठी उसे राजा प्रिथू की आत्मा एक तेजस्वी और शक्तिशाली जोतिपुंज के रूप में
31:28प्रतीक्षा करते हुए दिखाई दी जैसे दो पवित्र नदिया संगम पर मिलती है
31:35प्रेम और भक्ती के दिव्य बंधन से बंधे दोनों आत्माए एक शक्तिशाली एकी कृत जोतिपुंज में बिलीन हो गई जो
31:43अनंत ब्रहमांड में चमक रहा था जैसे दो लौ एक होकर मशाल बनती है
31:50यह एकी कृत जोतिपुंज तेजी से स्वर्गिय लोकों से उपर उठ रहा था प्रत्येक मंडल को पार करता हुआ जहां
31:58देवता और गंधर्व निवास करते थे परन्तु उन्हें छूटा नहीं था जैसे एक प्रकाश पुंज बादलों से गुजरता है
32:07इंद्र अपने भव्य स्वर्ग में विराजमान शन भर के लिए अपनी सिनहासन से उठ खड़ा हुआ जैसे ही उसने इस
32:15अभूत पूर्व दिव्य जोती को अपने लोकों से उपर जाते देखा उसके मुख पर विस्मय और एक सुक्ष्म अहंकार का
32:22भाव था
32:24असंख्य देवगन, गंधर्व और अपसराय जो स्वर्ग के भव्य सभागार में उपस्थित थे सभी ने श्रद्धा पूर्वक मस्तक जुकाया जैसे
32:34ही प्रिथु और अर्ची की सन्युक्त आत्मा उनके उपर से गुजरी
32:38वह जोति पुझ अनन्त आकाश में उचाई की ओर बढ़ रहा था, सभी ग्रहों, तारों और आकाश गंगाओं को पीछे
32:46छोड़ता हुआ, जैसे एक तीर अपने लक्षे की ओर बेधड़क बढ़ता है
32:53अंतरक दूरक्षितिच पर वैकुंट के दिव्यद्वार प्रकट हुए, जिनकी चमक लाखों सूरियों से भी अधिक थी, और जिनसे परम शांती
33:02और आनन्द की उर्जा प्रवाहित हो रही थी, जैसे स्वर्ग का प्रवेश द्वार
33:08जैसे ही आत्माय उन द्वारों के निकट पहुँची, वैकुंट का सम्पूर्ण गौरव धीरे-धीरे प्रकट होने लगा, जहां हर कन
33:16में भगवान विश्णों की उपस्थिती महसूस की जा सकती थी, जैसे एक भक्त के हृदय में उनके इष्ट का वास
33:23होता है
33:25वहां एक भव्य सिनहासन पर विराजमान, भगवान विश्णों अपनी चतुर्भुजी महिमा में सुशोभित थे, उनकी नीली देह ब्रहमांडिय उर्जा से
33:34चमक रही थी, जैसे एक नीलम का परवत चमकता है
33:39उनके पार्श्व में समस्थ सौंदर्य और एश्वर्य की प्रतिमूर्ती देवी लक्ष्मी अपने कमल पर विराजमान थी, उनकी स्वर्ण आभा वैकुंठ
33:49को प्रकाशित कर रही थी, जैसे पूनिमा का चंद्रमा रात्री को प्रकाशित करता है
33:56प्रिथु और अर्ची की सन्युक्ठ आत्मा, अब एक शुद्ध और तीवर जोती के रूप में भगवान विश्णू और देवी लक्ष्मी
34:03के दिव्य चर्णों की ओर बढ़ी, जैसे एक प्यासा यात्री जल स्रोत की ओर बढ़ता है
34:10भगवान विश्णू ने अपनी एक चार भुजा उठाकर उन्हें आशिर्वाद दिया, उनके चहरे पर एक कोमल मुस्कान थी, जैसे एक
34:19पिता अपने प्रिय पुत्रों का स्वागत करता है, जो घर लोटे हैं
34:25एक अंतिम तीवर चमक के साथ, राजा प्रिथू और रानी अर्ची की आत्माए स्वया भगवान विश्णू की अनंत उर्जा में
34:33विलीन हो गई, सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम मोक्ष को प्राप्थ हुई, जैसे एक बून सागर में मिल
34:41जाती है
34:43यह परमग्यान का क्षण था, जहां द्वैत का अंत हो गया, और आत्मा ने अपनी वास्तविक पहचान को पहचान लिया,
34:51जो स्वयं परमब्रम का एक अंश है, अनंत और अविनाशी सभी दुखों से परे
34:57राजा प्रिथु, जिन्होंने प्रिथवी को दुख्ध दिया और उसे समतल किया, और रानी अर्ची, जिन्होंने धर्म का पालन किया, दोनोंने
35:06अंत्त वैकुंट में अपना शाश्वत स्थान प्राप्त किया, उनकी कहानी अमर्ता का प्रतीक बन गई
35:13इस प्रकार प्रिथु का जीवन, त्याग और भक्ती का एक आदर्श उदाहरन बन गया, जो सभी जीवों को मोक्ष के
35:21मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है, कि कर्म और भक्ती से परमधाम की प्राप्ती संभव है
35:28परम ज्ञान के प्रकाश में, महाराजा प्रिथु का नश्वर देह अब प्रिथवी पर छूट गया, पर उनकी आत्मा एक निर्मल
35:36अविनाशी जोती के रूप में उपर उठने लगी, जिसने अपने जीवन के सभी बंधनों को तोर दिया था
35:44उनकी परम भक्त पत्नी अर्ची, जो उनके जीवन की हर तपस्या और धर्म का सह्यात्री रही थी, अपने पती के
35:52पवित्र चिता के समीब अदमय संकल्प के साथ खड़ी थी, उनकी आखों में अश्रु नहीं, अपितु भक्ती का अटल तेज
35:59था
36:01महाराणी अर्ची ने धैर्य पूर्वक चिता पर आसंद रहें किया, उनके मुख पर कोई भय नहीं, अपितु परम संतोश का
36:09भाव था, मानो वह अपने प्रियतम से चिरकालिक मिलन की प्रतीक्षा कर रही हो
36:15जैसे ही पवित्र अगनी ने चिता को अपनी आगोश में लिया, अर्ची की आत्मा ने भी अपने पती के मार्ग
36:22पर चलते हुए उस नश्वर शरीर को त्याग दिया और एक और दिव्य जोती के रूप में आकाश की ओर
36:29प्रस्थान किया
36:31दोनों आत्माएं एक होकर अत्यंत तीवर गती से आकाश गंगाओं के पार नक्षत्रों और देवलोकों को भेदती हुई एक अभूत
36:40पूर्व स्वर्गीय यात्रा पर निकल पड़ी, मानो स्वय प्रेम और भक्ती का मार्ग प्रशस्थ कर रही हो
36:47स्वर्गलोक में बैठे देवगण और रिशिगण इस अलौकिक द्रिश्य को विस्मय से देख रहे थे, जब प्रिथु और अर्ची की
36:55सन्युक्त उर्जा उनके लोकों के उपर से गुजर रही थी, एक दिव्य प्रकाश पुन्ज के रूप में
37:02देवराज इंद्र अपने सिनहासन पर विराजमान, पहले तो इस अकल्पनिय तेश को देख कर कुछ भ्रमित हुए, क्योंकि ऐसा प्रबल
37:10पुन्य प्रताप उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था
37:15उनकी आत्माएं मेरू परवत के शिखरों को पार करती हुई, उन उच्चतर लोकों में प्रवेश कर गई जहां केवल अत्यंत
37:23शुद्ध और तपस्वी आत्माएं ही निवास कर सकती हैं, उनकी यात्रा अविचल और निडर थी
37:30जहां देवगणों का एश्वर्य भी फीका पढ़ जाता है, उन तपोलो और जनोलो के मौन विस्तार में प्रिथु और अर्ची
37:37की जोती बिना किसी बाधा के आगे बढ़ती रही, उनकी भक्ती ही उनका मार्ग गर्शक थी
37:44उनकी यात्रा केवल पुने कर्मों का फल नहीं थी, अपितु वैकुंट के प्रती उनकी अगाध भक्ती और स्वयंको परमात्मा में
37:52विलीन करने की उटकट इच्छा का साकार रूप थी
37:56अंतह एक स्वर्णिम क्षितिच प्रकट हुआ, जहां से दिव्य सुगंध और मधुर संगीत की लहरें आ रही थी, जो वैकुंट
38:04लोग के पावन द्वार का संकेट थी, एक ऐसी भूमी जो सभी कलपनाओं से परे थी
38:11वैकुंट के द्वारपालों, जय और विजय ने उन शुद्ध आत्माओं को श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया, जो बिना किसी बाधा के
38:20सीधे भगवान के धाम में प्रवेश करने के लिए अवतरित हुई थी
38:25वैकुंट का कणकन परम आनन्द से परिपून था, जहां शाश्वत बसंट का सामराज्य था और हर ओर दिव्य कमल खिल
38:33रहे थे, यह परमात्मा की अनन्द शोभा का साक्षात दर्शन था
38:38और फिर उन्होंने देखा भगवान विश्नु को जो अपनी अनन्त महिमा के साथ देवी लक्ष्मी के साथ शेशनात पर विराजमान
38:46थे, उनके मुख पर एक शांत करुणामय मुस्कान थी जो ब्रहमान को प्रकाशित कर रही थी
38:53प्रिथु और अर्ची की जोती बिना किसी विलम के सीधे भगवान विश्नु के चरण कमलों में समा गई, उनकी व्यक्तिगत
39:01पहचान परमात्मा के साथ एकाकार हो गई, यहीं मोक्ष का परम लक्ष था
39:07स्वर्ग से यह अध्भुत विलय देखते हुए, देवराज इंद्र के अहमकार की दिवारे ढह गई गई, और उन्हें पहली बार
39:15यह गेहन बोध हुआ कि सच्चा एश्वर्य और शक्ती भौतिक नहीं, बलकि आत्मज्यान में है
39:22प्रिथु और अर्ची के परमधाम गमन ने इंद्र को यह सिखाया कि पद और शक्तीक शनभंगुर हैं, जबकि भक्ती और
39:30धर्म प्रायंता शाश्वत मोक्ष की वोड ले जाती है, जो समस्त कामनाओं से परे हैं
39:37यह केवल दो आत्माओं का परमधाम गमन नहीं था, अपितु यह सभी जीवों के लिए एक प्रेना थी की निश्काम
39:44कर्म, अटूट भक्ती और स्वयन को परमात्मा में समर्पित करने से ही परम सत्य की प्राप्ती होती है
39:53महाराजा प्रिथु, जिन्होंने प्रिथवी को जीवन दिया, और रानी अर्ची, जिन्होंने अपने प्रेम से धर्म को प्रकाशित किया, उनकी अमर
40:01कहानी युगो युगो तक सभी भक्तों को परमधाम की ओर प्रेरित करती रहेगी
40:07इस प्रकार राजा प्रिथु ने एक महान शासक से एक परमेहंस तक का अपना जीवन चक्र पूर्ण किया और अपनी
40:15परम भक्त पतनी के साथ शाश्वत शांती एवा आनंद के वैकुंठ लोक में वास किया
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