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महाराज परीक्षित को ब्रह्मांड का पूर्ण ज्ञान देते हुए, शुकदेव गोस्वामी इस एपिसोड में पाताल और नरक लोक के बाद, ऊपरी ग्रहों के अद्भुत रहस्यों का अनावरण करते हैं। इस दिव्य यात्रा में हम स्वर्गलोक के ऐश्वर्य, महर्लोक, जनलोक और तपलोक के पवित्र आयामों को समझेंगे, जहाँ ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं। ब्रह्मा जी के सत्यलोक से लेकर ध्रुवलोक के स्थायी केंद्र तक, प्रत्येक लोक का विस्तृत वर्णन किया जाएगा। अंत में, हम ब्रह्मांड को धारण करने वाले अद्भुत शिशुमार चक्र (भगवान विष्णु का विराट स्वरूप) और शेषनाग (अनंत देव) के दिव्य स्वरूप का दर्शन करेंगे, जो समस्त सृष्टि का आधार हैं। यह एपिसोड आपको कर्म के फल, उच्च लोकों की प्राप्ति और भक्ति के परम महत्व को गहराई से समझने में मदद करेगा। #भागवतपुराण #श्रीमद्भागवतम् #स्वर्गलोक #ब्रह्मांड #शिशुमारचक्र #शेषनाग #ऊर्ध्वलोक #VedicCosmology #HinduMythology #ShukaParikshit
Transcript
00:00महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए, शुकदेव गोस्वामी ने ब्रहमांड के निचले लोकों की भयाभता का समरण कराया और अब
00:08उन दिव्य उर्ध्व लोकों की भव्यता का वर्णन करने को ततपर हुए जहां पुनियात्माएं अपने शुब कर्मों का फल भो�
00:17परीक्षित की आखे जिग्यासा और श्रध्धा से चमक उठीन, मानोवे हर शब्द को अपने हृदय में आत्मसात करने को लालायत
00:26हो, जैसे कोई प्यासा यात्री अमरित की प्रतीक्षा करता है
00:31शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि जैसे दुशकर्म नरक के द्वारों की ओर ले जाते हैं, वैसे ही धर्म प्रायनकार्य, निस्वार्थ
00:39सेवा और यग्यों का अनुष्ठान आत्माओं को स्वर्ग और उससे भी उचे लोकों की ओर उन्मुख करता है, जो कर्म
00:47के अटल
00:47विधान का प्रमाण है, द्रिश बदलता है और एक प्राचीन पवित्र यग्यशाला में वैदिक रिशियों का समूह अग्नी में आहुतिया
00:57अर्पित कर रहा है, जिनकी मंत्रों चार से ब्रहमांड गूंज रहा है और वायुमंदल दिव्य उर्जा से भर गया है,
01:04जैसे ही
01:07यग्यपूर्ण होता है, एक तेजस्वी सुक्ष्म आत्मा अगनी से उत्पन होकर एक स्वर्णिम कुंदलिनी आकार के ब्रहमांडिय पत पर उपर
01:16की ओर उठने लगती है, दिव्य प्रकाश में लिप्थ होकर
01:20आत्मा स्वर्ग के भव्य बादलों से बने प्रवेश द्वार पर पहुँचती है, जहां तेजस्वी द्वारपाल उसे सम्मान पूर्वक मार्ग देते
01:29हैं, उनके मुख पर दिव्य शांती का भाव है
01:33स्वर्ग के भीतर इंद्र की भव्य सभा में, स्वर्णिम सिनहासन पर आसीन देवराज इंद्र अपनी पूरी महिमा में विराजमान हैं,
01:42जिनके चारों और देवगन, अपसराय और गंधर्व दिव्य संगीत और निरित्य में लीन है
01:49शुकदेव गोस्वामी ने स्वर्ग की अविश्वसनिय सुन्दर्टा का वरणन किया, ऐसे उद्ध्यानों का जहां कलीों से सुगंधित हवा चलती है,
01:58ऐसे जरनों का जहां अमरित तुल्य जल बहता है, और ऐसे व्रिक्षों का जहां हर पत्ती पर रक्न जिल मिलाते
02:04हैं
02:46जिससे वातावर्ण आनंद से भर गया है।
02:48नारद मुनी अपनी वीना के साथ मधुर स्तुतिया गाते हुए इस दिव्य सभा में उपस्थित हैं। उनकी उपस्थिती से ज्ञान
02:57और भक्ती का संचार हो रहा है।
03:00कल्पवरिक्ष अपनी टहनियों पर इच्छा पूर्ती के फलधारन किये हुए खड़ा है और कामधेनु गौ अपनी दिव्य उपस्थिती से सभी
03:08कामनाओं को पूर्ण करती हुई दिखाई देती हैं। जो स्वर्ग के असीम एश्वर्य का प्रतीक है।
03:15शुकदेव गोस्वामी ने धीरे से समझाया कि स्वर्ग भी शाश्वत नहीं है। यह केवल पुन्य कर्मों का अस्थाई प्रतिफल है
03:24जहां आत्माए अपने संचित पुन्यों के एक्षय होने तक वास करती हैं।
03:29एक रूपक के रूप में एक तेजस्वी पात्र जो पहले स्वर्णिम प्रकाश से परिपूर्ण था, धीरे धीरे अपनी चमक्खो रहा
03:38है। जैसे जैसे पुन्य कर्मों का भंडार रिक्थ होता जाता है।
03:43पुन्यक्षीन होने पर वही आत्मा जो स्वर्ग में सुख भोग रही थी, एक धूमिल पत्थ पर पुन्ह पृत्वी लोग की
03:50ओर उतरने लगती है, एक नए जन्म के लिए।
03:55ततपश्चात शुकदेव ने स्वर्ग से भी उपर के लोकों की चर्चा आरंभ की विशेशकर महर लोक का जहां ज्यानवान रिशी
04:03और सिध्ध पुरुष तपस्या करते हैं।
04:07उन्होंने तपो लोक और जनलोक का वर्णन किया, वे लोक जहां अत्यधिक तपस्या और निहस्वार्थ सेवा के माध्यम से आत्माय
04:15वास करती हैं, जो इंद्रियों के भोग से परे हैं।
04:20इन उर्धव लोकों में महान सिध्ध और योगी गेहन तपस्या और ध्यान में लीन रहते हैं, ब्रहमांडिय सत्य की खोज
04:28में अपनी आत्मा को समर्पित करते हुए.
04:31अंतह शुकदेव गोस्वामी ने ब्रहम लोक का उल्लेख किया, जिसे तप और ज्यान से प्राप्ट सर्वोच लोक माना जाता है,
04:39जहां आत्माए ब्रहमाजी के साथ कल्प के अंत तक वास करती हैं.
04:45ब्रहमांड के सर्वोच लोकों से उतरते हुए, शुकदेव गोस्वामी ने अब भुवर लोक के दिव्य विस्तार की ओर ध्यान आकरशित
04:53किया, जो आत्मा के सुक्ष्म शरीरों का अगला पड़ाव है.
04:58यह भुवर लोक, प्रित्वी और सूर्य के उर्जावान मंडल के मध्यस्थित एक विशाल अद्रिशिक शेत्र है, जहां सुक्ष्म आत्माए भौतिक
05:07और आध्यात्मिक लोकों के बीच यात्रा करती है.
05:12इस दिव्यक्षेत्र में सिध्धगन वास करते हैं, जो अपनी गहन तपस्या और योगिक शक्तियों से अलौकिक शमताय प्राप्त कर चुके
05:21हैं.
05:22वे अनिमा, महिमा, लगिमा और गरिमा जैसी अश्ट सिध्धियों से संपन्न हैं, जिससे वे सुक्ष्म और विशाल, हलके और भारी
05:31हो सकते हैं, और इच्छा अनुसार रूप बदल सकते हैं.
05:37अपनी उन्नत्चेतना के माध्यम से ये सिध्धगन अंतरिक्ष में स्वतंत्र रूप से विचर्ण करते हैं, बिना किसी बाधा के एक
05:45लोग से दूसरे लोग तक यात्रा करते हुए.
05:48भुवर लोग में ही चार्णों का निवास है, जो अपनी तीवर गती और दिव्य गायन से देवताओं के संदेश वाहक
05:56का कार्य करते हैं.
05:58वे तीवर वेग से अंतरिक्ष में विचर्ण करते हैं, स्वर्गिय समाचारों और दिव्य ज्यान को विभिन लोकों तक पहुँचाते हैं.
06:08इसके अतिरिक्त धुवर लोक गंधर्वों का भी क्रिडास्थल है, जो अपनी मधूर संगीत और मनमोहक गायन से समस्त ब्रह्मांड को
06:16आनंदित करते हैं.
06:19गंधर्व अपनी अपसरा पत्नियों के साथ दिव्य मंचों पर निर्ट्य और गायन करते हैं, स्वर्गिक वातावर्ण को संगीत्मय माधुर्य से
06:28भर देते हैं.
06:30विद्याधर भी इस लोक में निवास करते हैं, जो अपनी असीमित ज्ञान और गूड विद्याओं के लिए विख्यात हैं.
06:39ये विद्याधर प्राचीन शास्त्रों, ब्रहमांडिय रहसियों और गुप्त योगिक तकनीकों पर गहन चर्चा करते हुए ज्यान के प्रकाश को प्रसारित
06:48करते हैं.
06:50सिद्धों की तपस्या, चार्णों की गती, गंधर्वों का संगीत और विद्याधरों का ज्यान मिलकर इस भुवरलोग को ब्रहमांडिय संतुलन का
06:59एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं
07:02ये दिव्य प्राणी सुक्ष्म रूप में प्रित्विवासियों के जीवन को प्रभावित करते हैं, उनकी प्रेणा और मार्ग गर्शन का स्रोत
07:10बनते हैं, यद्यपी वे अद्रिश्य रहते हैं
07:15भुवरलोग के निवासी ब्रहमांडिय उर्जा के साथ सीधे अन्तहक्रिया करते हैं, ग्रहों की गतियों और तारों के प्रभाव को महसूस
07:23करते हुए
07:25शुकदेव गोस्वामी समझाते हैं कि भुवरलोग उन आत्माओं के लिए एक अस्थाई पड़ाव भी है, जो पुन्य कर्मों के फल्स्वरूप
07:33यहां आती हैं और फिर कर्मचक्र अनुसार आगे बढ़ती हैं
07:39सूर्य की रश्मिया न केवल प्रित्वी को प्रकाशित करती हैं, बल्कि भुवरलोग को भी जीवंदायनी उर्जा से सीचती हैं, इसकी
07:47सुक्ष्म प्रकृती को पोशित करती हैं
07:51यद्यपी यहां अंतरिक्षी एक्षेत्र है, भुवरलोक में दिव्य पर्वत, नदिया और उद्यान भी हैं, जो सुक्ष्म रूप में अत्यंत रमनिय
08:00और मनमोहक हैं
08:03महाराज परीच्षित शुकदेव गोस्वामी के मुख से ब्रहमांड के इन अध्भुत रहसियों को सुनते हुए, विस्मय और श्रद्धा से भरे
08:11हुए थे, उनके मुख पर गहन चिंतन के भाव स्पष्ट थे
08:16शुकदेव गोस्वामी अपनी दिव्यवानी से ब्रहमांड के इन सुक्ष्म लोकों का वर्णन करते हुए, समस्त सभा को मंत्र मुख्ध कर
08:24रहे थे, जैसे वे स्वयं उन्हीं लोकों में विचर्ण कर रहे हुँ
08:29इस प्रकार भुवरलोक स्वर्ग और प्रिथवी के बीच एक जीवंत पुल का कार्य करता है, जहां पुन्य आत्माएं अपने कर्मों
08:38का फल भोगती हैं और आगे की यात्रा के लिए तैयार होती हैं
08:43अब भुवरलोक के उस जीवंत पुल से पार होकर, शुकदेव गोस्वामी ने स्वर्गलोक की ओर अपनी दिव्यद्रिष्टी मोडी, जहां देवताओं
08:52का भव्य सामरा जिस्थित है
08:55उन्होंने उस मार्ग का वर्णन किया, जो पुन्य आत्माओं को अपने शृष्ट कर्मों के फल स्वरूप इस स्वर्गिय धाम तत
09:03ले जाता है, जहां हर कण में दिव्यता का वास है
09:07यह पत असंख्य चमकदार तारों और ब्रहमांडिय उर्जा से सराबोर था, जो पवित्रता और शुभता का प्रतीक था
09:16जैसे ही आत्माएं इस दिव्य मार्ग से गुजरती हैं, स्वर्गलोग के द्वार खुलते हैं, एक ऐसा वैभव प्रकट होता है,
09:25जिसकी कल्पना भी कठिन है
09:27इस स्वर्गिय धाम का हरिदय देवराज इंद्र की राजधानी अमरावती नगरी थी, जो अपने अतुलनिय एश्वर्य और दिव्यकला के लिए
09:37विख्यात है
09:39उमरावती के केंद्र में इंद्र का अध्भुत महल वैजन्त सुशोभित था, जिसकी भव्यता तीनों लोकों में अध्विती थी
09:48उस भव्य सिनहासन पर देवों के अधिपती देवराज इंद्र विराज मान थे, उनका तेज सूर्य के समान प्रखर और उनका
09:57एश्वर्य समस्त लोकों पर भारी था
10:00उनके चारों और देवर्शी, गंधर्व, अपसराएं और अन्य दिव्य प्राणी एकत्रित थे, जो उनकी महिमा का गुनगान करते और स्वर्गिये
10:09कार्यों में सहायता करते थे
10:12वैजन्त महल से परे स्वर्ग का अध्भुत नंदन्वन फैला हुआ था, जहां हर पुष्प में सुगंध और हर व्रिक्ष में
10:20जीवन का दिव्य संगीत था
10:23नंदन्वन की हरीतिमा के बीच, अपसराएं अपने दिव्य सौंदर्य और मोहिनी नृत्य से वातावर्ण को जीवन्त कर रही थी, उनकी
10:31हर मुद्रा में एक कहानी थी
10:34उनके नृत्य के साथ गंधर्व अपनी वीना और बासुरी की मधुर धुनों से वातावर्ण को संगीत मैं बना रहे थे,
10:42जिससे स्वर्ग की हर दिशा गूंज रही थी
10:46देवगण अमरित पान करते हुए अपनी अमर्ता और युवावस्था का आनंद लेते थे, उनके चहरे पर शाश्वत संतोष और आनंद
10:54का भाव था
10:57देवराज इंद्रस्वयं इन समस्थ सुखों और आश्वर्य के केंद्र में थे, अपने स्वर्गिय सामराज्य के हर पल का भोग करते
11:05हुए
11:06परंतु शुकदेव गोस्वामी ने अपनी दिव्यवानी में यह स्पष्ट किया कि यह स्वर्गिक सुख भी कर्मों के क्षय के साथ
11:14समाप्थ होने वाला है और यहां का एश्वर्य भी अस्थाई है
11:19उन्होंने समझाया कि पुन्य कर्मों का फल स्वर्ग में भोगने के बाद आत्मा को पुन्ह प्रित्वी लोग पर लोटना पड़ता
11:27है जैसे धन समाप्थ होने पर कोई यात्री लोटता है
11:32स्वर्ग में आनन्दित होते हुए भी इन पुन्य आत्माओं को अन्तह अपने कर्मों के क्षय का बोध होने लगता है
11:39एक अप्रिहार्य सत्य जो उनके सुख में घुल मिल जाता है
11:44पुन्य समाप्थ होते ही एक अद्रिश शक्ती आत्मा को स्वर्ग से नीचे की ओर खीचने लगती है एक यात्रा जो
11:52सुख से विच्छो और पुनरजन्म की ओर ले जाती है
11:57महाराज परीक्षित इस रहस्य को सुनकर गहरे चिंतन में डूब गए उनके मुख पर क्षणिक सुखों की व्यर्थता का बोध
12:05स्पष्ट जलक रहा था
12:07शुकदेव गोस्वामी ने आगे समझाया कि यह ब्रहमांडिये चक्र का महाविधान है जहां हर कर्म का फल मिलता है और
12:16हर आत्मा अपनी यात्रा पूर्ण करती है
12:19इस प्रकार उन्होंने स्वर्गलोक के एश्वर्य और उसके अस्थाई स्वभाव का वर्णन समाप्त किया अब उच्छतर लोकों के और भी
12:28गूढ रहसियों को प्रकट करने की तैयारी में
12:31तक पश्चात शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अमरित्मई वानी से महाराच परीक्षित को स्वर्गलोक की अस्थिर्ता से उपर उठकर उर्ध्व लोकों
12:41के गूढ रहसियों की ओर अग्रसर किया जहां आत्मा का असली उठ्थान होता है
12:48उन्होंने महरलोक का वर्णन आरंभ किया जहां पुन्य कर्मों और तपस्या से शुद्ध हुए महात्मागन कल्पों तक सुखमय जीवन व्यतीत
12:57करते हैं भौतिक इच्छाओं से पूर्णता विरक्थ
13:01यह वह पवित्रधाम है जहां पृत्वी के अंत्पर महाप्रलय के समय रिशिमुनी अपने सुख्षम शरीरों में प्रवेश कर ब्रहमांड के
13:10लैह होने तक प्रतीक्षा करते हैं
13:13महरलोग के निवासी अत्यंत दीरधायू होते हैं उनका जीवनकाल ब्रहमा के एक दिन के बराबर होता है जो कई युगों
13:22के बराबर है यह तपस्या और वैराग्य का फल है
13:26यहां केवल वही आत्माएं पहुँचती हैं जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंतरन प्राप्त कर लिया है और जिनका चित्त सांसारिक
13:35मोहमाया से पूर्णता मुक्त हो चुका है
13:39महरलोक की वायू में निरंतर वेद मंत्रों और दिव्यस्तुतियों की गूंच सुनाई देती है जो वातावर्ण को पवित्रता और शांती
13:47से परिपूर्ण करती है
13:50शुकदेव ने अब जनलोक का रहस्य उदगाटित किया जो महरलोक से भी उच्चतर है और जहां ब्रह्मा के पुत्रगण सनक
13:58सनंदन आदी निवास करते हैं
14:02जनलोक के वासीगण संसार के समस्त द्वंद्वों से मुक्ठ होकर केवल आत्म ज्यान और परमात्मा के ध्यान में लीन रहते
14:10हैं
14:12ये ब्रह्मा के मानस पुत्र अश्ट सिध्धी और नव निधियों से परे शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित रहते हैं
14:21उनके मुखमंडल पर चिरंतन बालपन की निर्दोष्टा और अनन्त ज्यान का तेज एक साथ चमकता है जो किसी भी भौतिक
14:29सुख से परे हैं
14:32जनलोक में वास करने वाले महात्मा ब्रह्मांड के लए और सर्जन के चक्र को समझते हैं फिर भी उसमें लिप्ट
14:39नहीं होते केवल साक्षी भाव से देखते हैं
14:44इसके उपरांत शुकदेव ने तपलोक का वर्णन करना आरंभ किया जो तीनों लोकों में सर्वोच्च है और जहां अत्यंत तीवर
14:52तपस्या से सिध्ध हुए योगी निवास करते हैं
14:57तपलोक वह परम पवित्रस्थान है जहां इंद्रियों को पूर्णता वश्मे करके केवल आत्मा के उत्थान के लिए कठोर्तम तपस्या की
15:06जाती है
15:08इस लोक के निवासी शरीर और मन की समस्थ सीमाओं से उपर उठकर केवल अपनी शुद्ध चेतना में स्थित रहते
15:16हैं
15:17यहां के सिध्ध योगी अपनी तपस्या के बल पर ब्रहमांड की सुक्षम से सुक्षम शक्तियों को भी नियंत्रित करने की
15:25क्षमता रखते हैं
15:27तप लोक के वातावर्ण में एक विशिष्ट प्रकार की उर्जा का अनुभव होता है जो अनंत काल तक चलने वाली
15:35तपस्या से उत्पन हुई है
15:38शुकदेव ने समझाया कि ये उर्ध्व लोक आत्मा की यात्रा के विभिन पड़ाव हैं जहां प्रत्येक लोक अपने से नीचे
15:46वाले लोक से अधिक शुद्ध और सुक्षम होता है
15:50इन लोकों की प्राप्ती केवल निश्काम कर्म, वैराग्य और अन्वरत ध्यान से ही संभव है जो जीव को जन्मुमृत्यू के
15:58चक्र से मुक्त करता है
16:01महाराज परीक्षित इन अध्भुत वर्णनों को सुनकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आत्मा की अनंत यात्रा के प्रती गहरी श्रद्धा
16:10में डूब गए
16:12शुकदेव गोस्वामी ने अब ब्रहमांड के सर्वोच लोक, सत्यलोक या ब्रहमलोक की ओर अपनी कथा मोडी जो स्रिजन के परम
16:20स्रोत का धाम है
16:23शुकदेव गोस्वामी ने अपनी अमरित्वानी में सत्यलोग के अकलपनिय सौंदर्य का चितरन आरंभ किया, जो भौतिक ब्रहमांड का सर्वोच और
16:32सबसे पवित्र धाम है
16:35यह वह लोग है जहां चतुर मुखी भगवान ब्रहमा निवास करते हैं, जो स्रिजन के अधिश्ठाता देव हैं और समस्थ
16:43ब्रहमांडिय व्यवस्था के पालक हैं
16:46सत्यलोग के निवासी अत्यंत शुद्ध आत्माय होती हैं, जो जन्म मृत्यू के चक्र से लगभग मुक्तक दिव्य शरीर धारण कर
16:54अनंतकाल तक ज्ञान और आनंद में लीन रहती हैं
16:59इस परम धाम में कोई शोक, व्रिधावस्था, रोग या मृत्यू नहीं है, यहां केवल शाश्वत, शांती, पूर्न ज्ञान और परम
17:07ब्रहमा के साथ एकत्व का अनुभव होता है
17:12सत्यलोक की प्राप्ती केवल गेहन तपस्या, निस्वार्थ सेवा, भक्ती और ज्यान के मार्ग से संभव है, जो आत्मा को शुद्ध
17:20कर सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है
17:24ब्रहमा के इस लोक का अस्तित्व स्वयम ब्रहमा के एक दिन के बराबर होता है, जो पृत्वी के करोडों वर्षों
17:31के बराबर है, और यह कल्प के अंत तक बना रहता है
17:36जो जीव सत्य लोक में अपने भौतिक जीवन का अंत करते हैं, वे ब्रह्मा के साथ ही महाप्रलय के समय
17:43परम ब्रह्मा में विलीन हो जाते हैं और परम मोक्ष प्राप्त करते हैं
17:49जब ब्रहमा का दिवस समाप्थ होता है, तब महाप्रलय की भयावा रात आती है, जिसमें तीनों लोग स्वर्ग, प्रित्वी और
17:57पाताल, गेहन, अंधकार और जल में विलीन हो जाते हैं.
18:02इस महाप्रलय की रातरी में, स्वयम ब्रहमा भी अपनी चेतना को संकुचित कर परम पुरुशोत्तम भगवान विश्नु में लीन हो
18:10जाते हैं, अगले स्रिजन की प्रतीक्षा करते हुए.
18:14संपूर्ण ब्रहमांड तब केवल एक अथांग, अनंतकारण सागर में परिवर्तित हो जाता है, जहां सब कुछ अप्रकट रूप में विद्यमान
18:23रहता है.
18:25इस असीम सागर के उपर भगवान विश्नु अपनी दिव्य शेशनाग शया पर अनंत शेश पर योग निद्रा में लीन होते
18:33हैं, संपूर्ण ब्रहमांड को अपने भीतर समेटे हुए.
18:37फिर भगवान विश्नों की नाभी से एक विशाल सुनहरा कमल प्रकट होता है, और उस पर से पुना ब्रहमाजी का
18:45प्राकट होता है, जो नए स्रिजन के लिए तयार होते हैं.
18:50ब्रहमा अपनी स्रिजनात्मक शक्ती को जागरित करते हैं और अपनी इच्छा शक्ती से पहले सुक्ष्म तत्वों और फिर स्थूल जगत
18:59की रचना का कार्य आरंभ करते हैं
19:02वे क्रमशा विभिन्न लोकों स्वर्ग, मध्य और पाताल की रचना करते हैं, प्रत्येक लोक को उसके विशिष्ट गुणों और निवासियों
19:11के लिए उप्युक्त बनाते हुए.
19:14तदुप्रांत, ब्रह्मा जीव जन्तूओ, देवताओं, मनुश्यों, दानवों और अन्य सभी प्रकार की प्रजातियों का स्रिजन करते हैं, प्रत्येक को उनके
19:23कर्मों के अनुसार उप्युक्त शरीर प्रदान करते हैं.
19:27इस प्रकार, प्रत्येक कल्प में सत्युग, त्रेतायुग, द्वापर्युग और कल्युग के चक्र बार-बार दोहराए जाते हैं, जो धर्म और
19:36अधर्म के उतार-चढ़ाव का विधान करते हैं.
19:40प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन योनियों और लोकों में भटकता रहता है, जन्मुमृत्यु के इस अंथीन चक्र में,
19:49जब तक कि वह मुक्ती प्राप्त न कर ले.
19:52इन सभी चक्रों में मनुष्य जन्म को विशेश महत्व दिया गया है, क्योंकि यह एक मात्र योनी है, जहां जीव
19:59अपने कर्मों को सुधार कर मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है.
20:05आथध धर्म का पालन, सदाचार और निशकान कर्म ही इस ब्रह्मांड चक्र से बाहर निकलने और शाश्वत शांती प्राप्त करने
20:13का एक मात्र मार्ध है.
20:16शुकदेव गोस्वामी ने अपनी कथा का समापन करते हुए, महाराज परीक्षित को समझाया कि सत्यलोखी वह अंतिम गंतव्य है, जहां
20:25से परम ब्रह्मा की अनुभूती होकर जीव आवागम्न के चक्र से पूर्णत्य मुक्थ होता है.
20:33तत्पश्चात शुकदेव गोस्वामी ने काल के अगमे विस्तार का वर्णन करते हुए समझाया कि कैसे यह परमचक्र स्वयन ब्रह्मा जी
20:41की प्रत्येक्ष्वास के साथ ही चलता है.
20:45उन्होंने बताया कि कैसे यह महाकाल सत्युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग नामक चार प्रमुख युगों में विभाजित है, जिन में
20:53धर्म का स्तर क्रमशय घटता जाता है.
20:57सत्युग में धर्म अपने चारों चर्णों पर स्थित रहता है, जहां सभी प्राणी परोपकारी, सत्यनिष्ठ और ध्यानमगन होते हैं, प्रकृती
21:06अपने पूर्ण वैभव में होती है.
21:10त्रेता युग में धर्म एक चरण खो देता है, जिससे तपस्या और यद्यों का महत्व बढ़ जाता है, यद्यपी लोग
21:17अभी भी सत्य और न्याय के प्रती समर्पित रहते हैं.
21:22द्वापर युग में धर्म दो चरणों पर आता है, जहां मनुष्य कर्मकांडी बन जाते हैं और व्यक्तिगत उपासना तथा मंदिरों
21:30की स्थापना पर अधिक बल दिया जाता है.
21:34कलियुग में धर्म अपने अंतिम एक चरण पर लडखडाता है, जहां अधर्म, पाखंड और भौतिकवात चरम पर होते हैं, और
21:42सत्य का लोप होता जाता है.
21:46शुकदेव ने समझाया कि ये चारों यूग मिलकर एक महायूग का निर्माण करते हैं, जिसकी अवधी देवताओं के हजारों वर्षों
21:54में मापी जाती है.
21:56ऐसे अनेक महायुग मिलकर एक मनवंतर का निर्मान करते हैं जो स्वयन 14 मनुओं के शासनकाल को समाहित करता है
22:05जहां प्रत्येक मनुओं एक नए युग का सूत्रपात करते हैं
22:10और ऐसे चौदह मनवंतर ब्रहमा जी के एक दिन का निर्मान करते हैं, जिसे एक कल्प कहा जाता है, जिसमें
22:18स्रिजन और लै का अध्भुत निरित्य समाहित है
22:22यह एक कल्प मानव वर्षों में अर्बों-खर्बों की संख्या में होता है, जो हमारी कल्पना से परे असीम समय
22:29का दियोतक है
22:32ब्रहमा जी के दिन के अंत में, जिसे नैमित्तिक प्रलय कहते हैं, निचले और मध्यवर्ती लोकों का जल प्रलय द्वारा
22:39आंशिक विलय हो जाता है
22:42इस काल में समस्थ भौतिक ब्रहमांड ब्रहमा जी के साथ ही गहन निद्रा में लीन हो जाता है, जब केवल
22:49सुक्ष्म तत्व ही शेश रहते हैं
22:53और जब ब्रहमा जी अपनी निद्रा से जागते हैं तो पुन्ह एक नए कल्प की उशा में समस्त ब्रहमांड अपने
23:00पूर्व रूप में पुन्ह प्रकट होता है
23:03ऐसे सौ ब्रहमा वर्षो की अविश्वसनिय अवधी तक ब्रहमा जी का जीवंचक्र चलता है जिसके बाद उनका महाप्रलय के साथ
23:12अंतिम विलय होता है
23:14इस महाप्रलय में केवल ब्रहमा जी ही नहीं, बलकि सम्पूर्ण भौतिक ब्रहमांड अपने समस्थ तत्वों के साथ परम सक्ता में
23:23विलीन हो जाता है
23:26अंतर समस्थ स्रिष्टी श्री हरी के विराट रूप में समाहित हो जाती है, जहां वे अपनी योगनिद्रा में लीन होकर
23:33अनंतकाल तक विश्राम करते हैं
23:37श्रिष्टी के समस्थ सुक्ष्म और स्थूल तत्व धीरे-धीरे अपनी मूल प्रकृती प्रधान में विलीन हो जाते हैं, जहां वे
23:44अगली स्रिष्टी की प्रतीच्षा करते हैं
23:47यह प्रधान जिसमें स्रिजन की समस्थ क्षम्ता निहित है, परम ब्रहमा के गर्भ में 20 रूप में स्थित रहता है,
23:55जो अनंत्शक्तियों का स्रोत है
23:59इस प्रकार परम ब्रह्मा इस समस्त काल चक्र और प्रलै से परे अपनी अविनाशी, शाश्वत महिमा में अप्रभावित और अचर
24:07रहते हैं
24:09आथ्व शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को समझाया कि इस नश्वर भौतिक ब्रह्मांड से मुक्ती केवल परम सत्य की शरण
24:18में ही संभव है, जहां काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
24:23शुकदेव गोस्वामी ने आगे बताया कि इस नश्वर भौतिक ब्रह्मांड में रहते हुए भी कुछ दिव्य लोक ऐसे हैं जो
24:30काल के प्रभाव से पूर्णता मुक्त हैं और परम सत्य से अविच्छिन रूप से जुड़े हैं
24:37इन दिव्य लोकों में से एक है धुवलोक जो समस्थ ब्रहमांड का अविचल केंद्र है और जहां से सभी ग्रह
24:44वतारे अपनी निश्चित गती में संचालित होते हैं
24:49यह लोक स्वयंपरम भगवान विश्णू का एक प्रत्यक्ष रूप है जो अनंत काल तक स्थिर रहता है चाहे निचले लोक
24:57प्रलय के अगनी में भस्म हो जाएं
25:00यह वह धुरी है जिस पर ब्रह्मांड का विशालकाय चक्र घूमता है हर ग्रह हर नक्षत्र अपनी यात्रा इसी के
25:08आलोक में पूरी करता है
25:11इस अविचल लोक की स्थापना एक बालक की अटूट भक्ती का परिणाम है जिसका नाम था ध्रूव जिसने अपनी निश्था
25:19से भगवान विश्णू को प्रसन्न किया
25:22महाराज उत्तानपाद के पुत्र ध्रूव को एक बार अपनी विमाता सुरुची ने अपने पिता की गोद में बैठने से रोक
25:30दिया था
25:30जिससे बालक के हरिदय में तीवर अपमान की अगनी प्रजवलित हो उठी
25:36इस अपमान से आहत होकर बालक ध्रूव ने प्रतिज्याकी की वह ऐसी उच्च पदवी प्राप्त करेगा जो न तो उसके
25:44पिता के पास है और नहीं किसी अन्य राजा के पास
25:48अपनी माता सुनीती की प्रेणा से ध्रूव ने भगवान की खोज में राजमहल छोड़ दिया और रास्ते में उसे देवर्शी
25:56नारद मिले
25:58नारद मुनी ने पहले तो बालक की आयू देख उसे राजमहल लोटने का परामर्श दिया किन्तु ध्रूव की द्रिड़ता देख
26:06वे अन्तह प्रभावित हुए और उसे ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उपदेश दिया
26:12नारद मुनी से उपदेश पाकर ध्रूव बालक ने मधुवन में प्रवेश किया और अपनी तपस्या प्रारंभ की जहां वह केवल
26:21फल और जल पर ही जीवित रहा
26:24जैसे जैसे समय बीटता गया ध्रूव ने अपनी तपस्या को और कठोर बनाया केवल पत्तों और फिर अंत में केवल
26:32वायू पर ही अपना जीवन निर्वाह करने लगा
26:36उसकी गहन तपस्या की शक्ती से तीनों लोकों में कमपन होने लगा अगनी की ज्वालाए ब्रहमांड में फैलने लगी और
26:43देवता भी व्याकुल हो उठे
26:46देवताओं की प्रार्थना पर स्वय भगवान विश्नु अपने शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये हुए अपने दिव्यवाहन गरुर पर आरूड
26:56होकर ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए
26:59भगवान को अपने सामने देख ध्रुव बालक भाव विभोर हो गया, उसके मुख से सहज ही अग्भुत स्तुतिया निकलने लगी,
27:07जो केवल भगवान की महिमा का गुनगान कर रही थी
27:11भगवान विश्णों ने उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर उसे ऐसा लोग प्रदान करने का वर्दान दिया, जो ब्रहमांड में सबसे
27:19उचा और अविनाशी होगा, जहां काल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा
27:25इस प्रकार भगवान के आशिरवाद से ध्रुग ने वह सर्वोच पदवी प्राप्त की और वह ध्रुवलोग के रूप में ब्रहमांड
27:33का स्थाई ध्रुव तारा बन गया
27:36यह लोग केवल एक तारा नहीं, बलकी मोक्ष प्राप्त सिद्ध पुरुशों और महान रिशियों का शाश्वत निवास भी है, जहां
27:44वे भगवत दर्शन का आनंद लेते हैं
27:48ध्रुव लोग ही वह अटल केंद्र है, जो समस्त सौरमंडल को स्थिर्ता प्रदान करता है और मोक्ष मार्ग पर अग्रसर
27:56जीवों को निरंतर मार्ग दर्शन देता है
28:00आथक ध्रुव लोग केवल एक भागोलिक बिंदु नहीं, बलकि ध्रुव महाराज की अटूट भक्ती और स्वय भगवान विश्नु की असीम
28:08क्रिपा का एक शाश्वत प्रतीक है
28:12महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी के वचनों को सुनकर ब्रहमांड के इस महाविधान और भक्ती की पराकाष्ठा को गहराई से
28:20समझा, उनका हृदय कृतग्यता और विस्मय से भर गया
28:26ततपश्चात शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को उस परम आश्चर्यजनक ब्रहमांडिये चक्र का वर्णन आरंभ किया, जिसे शिशुमार चक्र के
28:35नाम से जाना जाता है
28:38शुकदेव जी ने बताया कि समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारागन एक विशालकाय काल चक्र की भाती इसी शिशुमार रूपी दिव्य
28:46संरचना के आश्रे में निरंतर भ्रमन करते हैं
28:50यह ब्रहमांडिय व्यवस्था साक्षात भगवान श्री हरी का ही एक विराट जल्चर शिशुमार अर्थात दिव्य डॉल्फिन के आकार का स्वरूप
28:59है, जो अनंत अंतरिक्ष में तैरता हुआ प्रतीत होता है
29:04इस शिशुमार चक्र की पूँच के उपरी छोर पर स्वय धुरुव महाराज विराजमान हैं, जो सम्पूर्ण ब्रहमांडिय चक्र के अविचल
29:13धुर के रूप में इसे स्थिर्ता प्रदान करते हैं
29:17पूँच के निचले भाग में प्रजाप्ती, अगनी, इंद्र और धर्म जैसे महान देवताओं का स्थान निर्धारित है, जो ब्रहमांड की
29:25व्यवस्था को संतुलित रखते हैं
29:28इस विशालकाय शिशुमार रूपी विश्णु स्वरूप के कटी भाग में धाता और विधाता नामक देवगन स्थित हैं, जो स्रिष्टी के
29:37कारियों का संचालन करते हैं
29:40इसके वक्षस्थल और पसलियों के स्थान पर सब्तर्शिगन विराजते हैं, जो अपनी तपस्या से पूरे ब्रहमांड में ज्ञान और धर्म
29:49की रक्षा करते हैं
29:51भगवान के इस विराट शिशुमार स्वरूप के हरिदय स्थल में स्वयन सूर्य देव स्थित हैं, जो संपूर्ण ब्रहमांड को उर्जा
29:59और प्रकाश से परिपूर्ण करते हैं
30:03इसके मन और कंट के प्रदेश में चंद्रमा का स्थान है, जहां से समस्त नक्षत्रों और औश्धियों को शितलता और
30:11जीवन दायनी शक्ती प्राप्थ होती है
30:15शुक्रव बुध, मंगल, ब्रिहस्पती और शनी जैसे अन्य प्रमुख ग्रह भी इस दिव्य शरीर के विभिन अंगों में स्थित होकर
30:22अपने अपने प्रभाव का संचालन करते हैं
30:27उत्रायन और दक्षिनायन की सूर्य की गतिया इस विशाल शिशुमार के शरीर के मोडों और हलचलों से संचालित मानी जाती
30:35हैं
30:36इस दिव्य रूब के शरीर पर छिटके हुए अगनित तारागन ऐसे प्रतीत होते हैं
30:42मानो भगवान विश्नु के नीले और स्वर्णिन शरीर पर बहुमूल्य मनिया जड़ी हुई हो
30:48शिशुमार के मुख भाग मेराहु और केतु जैसे छाया ग्रह विद्यमान हैं
30:53जो ब्रहमान्ड में ग्रहें और उर्जा के परिवर्तनों का कारण बनते हैं
30:59इसके निचले अंगों में विभिन अधोलोक और भौतिक बलस्थित हैं
31:04जो यह दर्शाते हैं कि समस्त ब्रहमान्डिय शक्तियों का मूल आधार केवल सर्वेश्वर विश्नु है
31:12शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि इस शिशुमार चक्र का ध्यान करना साक्षात भगवान महा विश्नु के सर्वव्यापी विराट स्वरूप का
31:20प्रत्यक्ष साक्षात कार करने के समान है
31:24जो मनुष्य सायंग और प्रातहकाल इस शिशुमार रूपी विश्नु स्वरूप का ध्यान करता है उसके समस्थ पाप नश्ठ हो जाते
31:33हैं और उसे परमशान्ती प्राप्थ होती है
31:37ब्रहमांड की इस अद्भुत एक्ता और भगवान की असीन सामर्थे का विचार करके साधक का चित्त स्वतह ही भक्ती और
31:45समर्पण में लीन हो जाता है
31:48शुकदेव जी की यह अमरत्मई वानी सुनकर महाराज परीक्षित का हृदय भाव विभोर हो गया और उनके नेत्रों से आनंद
31:56के अश्रु बहने लगे
31:59परीक्षित ने अनुभव किया कि यह संपून ब्रह्मांड कोई जड़ वस्तु नहीं बलकि भगवान विश्नु का ही जीवित और चेतन
32:07स्वरूप है जो उनके इंगित पर संचालित हो रहा है
32:11इस प्रकार उर्ध्व लोकों और शिशुमार चक्र के रहस्यमई दर्शन के पश्चात शुकदेव जी ने अब परीक्षित को आगे की
32:19आध्यात्मिक यात्रा की ओर प्रवृत्त किया
32:23उर्ध्व लोकों के दिव्यदर्शन के पश्चात शुकदेव जी ने अब महाराज परीक्षित को स्रिष्टी के उस परम आधार की ओर
32:31ध्यान देने को कहा जो इन समस्त ब्रहमांडिय व्यवस्थाओं को अनन्त काल से धारण किये हुए है
32:38महाराज परीक्षित की जिग्यासा शांत करते हुए शुकदेव गोस्वामी ने कहा कि शिशुमार चक्र के भी नीचे पाताल लोकों से
32:47परे भगवान अनन्त देव अपनी अनन्त महिमा में विराजमान है
32:53उन्होंने बताया कि यह समस्थ ब्रहमांड इसके अंगिनत लोक, तारे और ग्रह एक अकलपनिय महासर्प के फनों पर टिके हुए
33:01हैं, जिसे भगवान अनन्त या शेशनात के नाम से जाना जाता है
33:06भगवान अनन्त देव अपने सहस्त्रों विशाल फनों से सुशोभित करोडों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, जिनकी आभासे समस्थ अंतरिक्ष आलोकित
33:16रहता है
33:18प्रत्येक फन पर एक दिव्यमनी जगमगाती है, जिसकी अलोकिक चमक ब्रहमांड के अंधकार को चीर कर दूर-दूर तक फैल
33:26जाती है
33:28वे अतल लोक के गहरे जल में स्थित होकर, अपने अनंत फनों के सहारे, उपरी, मध्य और निम्न सभी 14
33:36लोकों को धारण किये हुए है
33:39उनकी महिमा इतनी विशाल है कि बड़े से बड़े ज्ञानी और तपस्वी भी उनके गुनों का पूरा वर्णन करने में
33:47असमर्थ रहते हैं
33:50भगवान अनंत देव अनंत काल से स्रिष्टी का यह भारी बोज अपने सिर पर उठाए हुए हैं, फिर भी वे
33:57परमशान्ती और ध्यान की मुद्रा में लीन रहते हैं
34:01उनके प्रत्येक्ष्वास से स्रिष्टी के चक्र, काल के पहिये और महाप्रलय की तरंगे नियंत्रित होती हैं
34:10उनकी शक्ती का कोई आदी नहीं, कोई अंत नहीं, इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है, क्योंकि वे स्वयंकाल और स्थान
34:18से परे हैं
34:20वे भगवान विश्णों के प्रथम विस्तार हैं, जो समस्त ब्रहमांडिय अभिव्यक्ती के मूल कारण के रूप में प्रतिष्ठित हैं
34:29जब महाप्रलय का समयाता है, तब अनंत देव अपने मुख से भयंकर विशैली अगनी का उचसर्जन करते हैं, जो समस्त
34:38लोकों को भस्म कर देती है
34:41उसके पश्चात वे पुना आदिकारण जल पर शयन करते हैं, जब तक की भगवान ब्रहमा की स्रिष्टी का नया दिन
34:48प्रारंभ न हो जाएं
34:50वे समस्त स्रिष्टी के अवशेश हैं, शेश नाम इसी लिए सार्थक है, क्योंकि प्रलय के उपरांथ केवल वे ही शेश
34:58रहते हैं
35:00शुकदेव जी ने बलपूरवक कहा कि भगवान अनन्त देव की शक्ती और महिमा ब्रहमांड के प्रत्येक अनों में व्याप्त है,
35:08फिर भी वे परम अनासक्त भाव से स्थित हैं
35:13अनन्त देव का यह वर्णन सुनकर महाराज परीक्षित का हरिदय विस्मय और भक्ती से भर गया और वे स्वयन को
35:20अत्यन्त धन्य अनुभव करने लगे
35:23उन्होंने समझा कि यह समस्त स्रिष्टी भगवान अनन्त देव की निस्वार्थ सेवा का ही प्रतिफल है, जो बिना किसी अपेक्षा
35:31के निरंतर ब्रहमांड का भार वेहन करते हैं
35:35उनकी विनमर्ता इतनी महान है कि इतने विशाल सामर्थ्य के स्वामी होते हुए भी, वे स्वयन को परम पुरुशोत्तम भगवान
35:44विश्णु का एक सेवक मात्र मानते हैं
35:47इस प्रकार भगवान अनन्त देव समस्त धर्म, तपस्या और ज्ञान के परम प्रतीक हैं, जो अपनी स्थिर महिमा से ब्रहमांड
35:56को धारन किये हुए हैं
35:59शुकदेव गोस्वामी ने अन्तह महाराज परीक्षित को समझाया कि भगवान अनन्त देव की यह शाश्वत लीला समस्त जीवों के लिए
36:07भक्ती और सेवा का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करती हैं
36:13ततपश्चात शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को समझाया कि जिस प्रकार भगवान अनन्त देव अपने विशाल रूप से ब्रहमांड के
36:21निचले लोकों को धारन करते हैं, उसी प्रकार उपर के लोकों में भी उनकी ही डिव्यशक्ती और व्यवस्था का �
36:57विस्तार है।
36:58शुकदेव गोस्वामी ने स्वर्गलोक का वर्णन किया, जो देवराज इंद्र और 33 करोड देवताओं का निवास स्थान है, जहां अमरित
37:07की नदिया बहती हैं और इच्छाओं की पूर्ती करने वाले कल्प विरिच्ष शोभायमान हैं।
37:28शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि इंद्र के लोक से भी उपर महरलोक है, जहां भिगु और मरिची जैसे महान रिशी
37:36निवास करते हैं, जो अपनी तपस्या और ज्ञान से ब्रहमांड को आलोकित करते हैं।
37:43इनसे भी उपर जनर लोक है, जो संकादी कुमारों और अन्य परम हंसों का निवास स्थान है, जहां केवल परम
37:50त्यागी ही पहुँच पाते हैं।
37:53इसके पश्चात शुकदेव गोस्वामी ने तपलोक का वर्णन किया, जहां कठोर तपस्या करने वाले जीव ब्रहमांड के प्रलय से भी
38:02अप्रभावित रहते हैं।
38:05और फिर सबसे उपर सत्यलोक है, जिसे ब्रहम लोक भी कहते हैं, जहां भगवान ब्रहमा स्वय निवास करते हैं और
38:13सम्पून ब्रहमांड के स्रिजन और नियमन का कार्य करते हैं।
38:18वहाँ भगवान ब्रह्मा चतुर मुखी रूप में विराजित हैं, जिनके प्रत्येक मुख से वेदों की दिव्यध्वनिया निरंतर प्रवाहित होती हैं
38:28शुकदेव गोस्वामी ने आगे बताया कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड अपने सभी लोकों और ग्रहों के साथ एक विशाल ब्रह्मांडंडे ब्रह्मांडा
38:37के भीतर स्थित है, जो भगवान विश्नु के एक रोंकूप से निकला है
38:43यह विराट ब्रह्मांडंडा अनन्त महा विश्नु के श्वास प्रश्वास से उत्पन होता है, जो कार्णोदक में शयन करते हैं और
38:51जिनसे समस्थ स्रिष्टिया प्रकट होती है
38:55फिर प्रत्येक ब्रहमांडंडे में गर्भोध क्षाई विश्नु प्रकट होते हैं, जिनकी नाभी से कमलनाल निकलता है, जिस पर भगवान ब्रहमा
39:05विराजमान होते हैं
39:07इसके अतिरिक्त प्रत्येक जीव के हरिदय में क्षीरोधक्षाई विश्नु या परमात्मा के रूप में निवास करते हैं जो समस्त स्रिष्टी
39:16के साक्षी और नियनता है
39:19शुकदेव गोस्वामी ने विस्तार से बताया कि कैसे यह संपूर्ण ब्रहमांड एक महाकल्प के चक्र में बार-बार प्रकट होता
39:27है, स्थित रहता है और फिर विलीन हो जाता है यह सब भगवान की अनंत लीला का ही एक अंश
39:34है
39:36उन्होंने महाराज परीच्षित को चेताया कि यह सभी लोग यहां तक की ब्रहम लोग भी नश्वर हैं और समय के
39:43चक्र में बंधे हुए हैं इसलिए उनमें वास्तविक और स्थाई सुख की तलाश व्यर्थ है
39:50सच्ची शांती और शाश्वत आनंद केवल उस परमधाम में है जो इस भौतिक स्रिष्टी से परे है और भगवान विश्णु
39:58का शाश्वत निवास है
40:01महाराज परीक्षित को उपदेश देते हुए शुकदेव गोस्वामी ने जोर दिया कि इस जन्मुम्रित्यू के चक्र से मुक्ती का एक
40:09मात्र मार्ग भगवान की अनन्य भक्ती ही है
40:13यह अनन्य भक्ती ही जीव को समस्त भौतिक बंधनों से मुक्त करके परमधाम भगवत प्राप्ती की ओर अग्रसर करती है
40:22इस प्रकार संपूर्ण ब्रहमांड का यह विराट वर्णन समाप्त करते हुए शुकदेव गोस्वामी ने महाराच परिक्षित को भक्ती के परम
40:31लक्ष्य और भगवान की अहेतु की क्रिपा का अनुपम संदेश प्रदान किया
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