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दक्ष प्रजापति के अहंकार ने बुलाया विनाश! 💔 अपनी तपस्या से प्राप्त दिव्य शरीर को सती ने क्यों त्यागा? शिव के अपमान से क्रोधित होकर सती ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, और इस आत्मदाह ने महादेव के रौद्र रूप को जन्म दिया। वीरभद्र और भद्रकाली ने कैसे किया दक्ष यज्ञ का विध्वंस? ब्रह्मांड में मची उथल-पुथल की यह गाथा, आपको महादेव के प्रेम और क्रोध की पराकाष्ठा दिखाएगी। #SatiDah #DakshaYagya #ShivaRudraRoop #Virabhadra #BhagavataPurana #HinduMythology #Mahadev #Sati #DivineRage #Puranas
Transcript
00:00कैलाश के शांत और बर्फीले शिकरों पर जब देवर्शी और अपसराओं के दल पिता दक्ष के भव्य यग्य की चर्चा
00:07करते हुए निकले, तब माता सती के कानों में उस विशाल उच्सव की गूँच पड़ी.
00:13अपने मायके में होने वाले इतने बड़े अनुष्ठान की बात सुनकर सती के हृदय में अपने पिता दक्ष और प्यारी
00:21बहनों से मिलने की व्याकुलता जाग उठी.
00:24माता सती अपनी उच्सुकता को रोक नहीं पाई और वे सीधे ध्यानमगन भगवान शिव के समीप पहुची, जहां चारों और
00:32दिवे शान्ती चाई हुई थी.
00:35सती ने अत्यधिक हर्शित होकर महादेव से कहा कि उनके पिता दक्ष एक महान ब्रिहस्पती यग्य का आयोजन कर रहे
00:43हैं, जिसमें समस्त चराचर जगत को आमंत्रित किया गया है.
00:49सती की बाते सुनकर महादेव ने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली और उनके दिव्यमुख पर एक अत्यंत गंभीर और चिंताजंक
00:57भाव उभर आया.
01:00महादेव ने सती को शांत स्वर में समझाया कि प्रजाप्ती दक्ष ने अपने अहंकार के वश में होकर उन्हें जानबूच
01:07कर इस यग्य में आमंत्रित नहीं किया है.
01:11परंतु सती ने हटपूर्वक तर्क दिया कि एक पुत्री को अपने पिता के घर जाने के लिए किसी आपचारिक निमंत्रन
01:19की कोई आवश्शक्ता नहीं होती.
01:22शिव जी ने उन्हें सचेट किया कि जब अहंकार किसी मनुष्य की बुद्धी को हर लेता है तो वहां बिना
01:29बुलाए जाने पर घोर अपमान और पीड़ा ही मिलती है.
01:33सती का पुत्री मो उनके विवेक पर हावी हो रहा था और उन्होंने अपने पिता के स्वभाव को सुधारने के
01:41विश्वास के साथ जाने का द्रिढ निश्चय कर लिया.
01:45महादेव ने पुनह स्मरण कराया कि दक्ष केवल उनसे ही नहीं, बलकि स्वयं परमसत्ता और धर्म के सिध्धानतों से भी
01:53इश्या और वैर रखते हैं.
01:56आंखों में आसू भरकर सती ने महादेव से प्रार्थना की की वे उन्हें अपनी संतानों के प्रती एक पिता के
02:03हृदय के प्रेन को देखने का एक अंतिम अफसर दें.
02:08शिव जी ने सती के नेत्रों में छिपे भविश्य के भयंकर चक्रवियू को देख लिया, और वे जान गए कि
02:14नेती के लिखे को अब कोई टाल नहीं सकता.
02:18भारी मन से और परम सत्य को स्वीकार करते हुए, देवाधिदेव महादेव ने अंत्तह माता सती को उनके पिता के
02:26यग्य में जाने की मौन अनुमती दे दी.
02:29सती की सुरक्षा को सुनिष्चित करने के लिए, शिव जी ने अपने सबसे प्रिय और परम निष्ठावान वाहन नंदी को
02:37ततकाल अपने समक्ष बुलाया.
02:40स्वामी की पुकार सुनते ही नंदी ने महादेव के चर्णों में शीष नवाया और माता सती की रक्षा के लिए
02:47अपने प्राणों की बाजी लगाने का संकल्प लिया.
02:51इसके बाद महादेव ने अपने पराक्रमी शिवगणों को आदेश दिया कि वे एक राजसी सेना की भांती माता सती की
02:59अग्वानी और सुरक्षा के लिए उनके साथ चले.
03:03माता सती ने अपने प्रस्थान की तैयारी पूरी की और उनका मुखमंडल एक और पिता से मिलने की प्रसन्नता और
03:11दूसरी और पती से बिछडने के दुख से मिश्रित था.
03:16महादेव ने अपनी जीवन संगिनी को विदा करते हुए उन्हें एक अंतिम बार देखा, मानो वे उस आने वाली प्रल्यंकारी
03:24आपदा की चाया को पहले से ही देख रहे हुँ.
03:28नंदी की पीठ पर विराजित होकर और हजारों शिवगणों के जैगोश के साथ माता सती ने कैलाश की बरफीली उचाईयों
03:36से कंखल की ओर अपनी यात्रा आरंभ की.
03:40पीछे कैलाश पर देवाधिदेव महादेव अकेले ही गहरे ध्यान और मौन में डूब गए जबकी संपूर्ण प्रकृती आने वाले विनाश
03:49के भय से कांप उठी.
03:51यात्रा करते हुए माता सती ने कैलाश के बरफीले शिखर से उतर कर जहां शिव का अनन्त मौन राज करता
03:59था, हरेभरे परवतिय मारगों और विशाल वनों को पार किया, जहां प्रकृती उनके आगमन से मानो स्वय ही थम सी
04:07गई थी.
04:09दूरक्षितिच पर कंखल की भूमी पर दक्ष प्रजापती का विशाल यग्यस्थल एक भव्य नगरसा प्रतीत होता हुआ, अपनी चमक और
04:17भव्यता से सूर्य के प्रकाश को भी चुनौती दे रहा था.
04:22जैसे ही सती का काफिला यग्यशाला के समीप पहुँचा, उच्सव का कोलाहल उनके कानों तक आने लगा, जो उनके भीतर
04:30एक अजीब सी आशंका और विस्मय को जगा गया.
04:34विशाल प्रवेश द्वार के सामने, सती ने नंदी की पीट से उतर कर अपने गणों को वही प्रतीक्षा करने का
04:42संकेत दिया, उनकी आखे द्रिड संकल्प से चमक रही थी.
04:47हजारू शिवगण अपने अस्त्रशस्त्रों के साथ, अपने मुखों पर अदमे निष्ठा और मौन प्रतिग्या का भाव लिये, द्वार के बाहर
04:55ही स्थिर हो गए, उनकी गर्जना को आज्या ने शांत कर दिया था.
05:00सती ने एका की ही यग्यशाला के भव्य प्रांगन की ओर कदम बढ़ाए, उनका प्रतेक पग राजसी गरिमा और अदमे
05:08साहस का प्रतीक था.
05:10भीतर प्रवेश करते ही, उनकी दिव्यद रिष्टी ने दूर दूर से आये रिशियों, देवताओं और राजाओं की विशाल सभा को
05:18देखा, जो यग्य के पवित्र अनुष्ठानों में लीन थे.
05:22जैसे ही उनकी आखें अपने पिता दक्ष पर पड़ी, जो यग्य की मुख्य वेदी के समक्ष विराजमान थे, उनके मुख
05:30पर गर्व और अभेलना का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, मानो उन्होंने सती को देखा ही न हो.
05:37सती की अन्य बहने, अपने पतियों के साथ, उन्हें देखकर कानाफूसी करने लगी, उनके चहरों पर आश्चरियत भय और कुछ
05:46की आखों में तिरसकार का भाव था.
05:49दक्ष की पतनी और सती की माता, प्रसूती, एक क्षण के लिए अपनी बेटी की ओर देखती हैं, लेकिन उनकी
05:57आखों में प्रेम के स्थान पर एक शांत, अज्ञानी उदासीनता तैर गई.
06:03सती ने अपनी मा की ओर कुछ उम्मीद भरी नजरों से देखा, उनके हृदय में अभी भी मात्रि प्रेम की
06:10एक बची हुई लौ टिम्टिमा रही थी.
06:13परंतु प्रसूती ने अपनी बेटी से आखें फेर ली, मानो उन्हें अपनी बेटी के आने से कोई प्रसन्नता या समवेदना
06:21न हुई हो, जो सती के हृदय को एक तीखे शूल की तरह चुब गया.
06:26यह उपेक्षा हर एक परिचित चहरे की बेरुखी, सती के भीतर एक गहरा घाव करती गई, जो उनके आने के
06:34आनन्द को धीरे-धीरे विशाद में बदल रहा था.
06:38चारों ओर से उठती फुस्फुसाहटें और अप्रत्यक्षताने सती के कानों में जहर घोल रहे थे, जो उनकी मर्यादा और महादेव
06:47के सम्मान पर आक्षेप कर रहे थे.
06:50उनके भीतर का शांत सरोवर तिरसकार की लहरों से अशांत होने लगा, पीडा की अगनी अब क्रोध की ज्वाला बनने
06:58लगी थी.
07:00दक्ष अपनी भव्यता और अहंकार में डूबे हुए, अपने स्थान पर विराज मान रहे, उनकी द्रिष्टी अभी भी सती से
07:08दूर यग्य के अनुष्ठानों पर केंद्रित थी, मानो वह एक अद्रिष्य प्राणी हो.
07:14सती ने एक गहरी सास ली और यग्य के विशाल मंडप पर अपनी द्रिष्टी घुमाई, जहां हर देवता, हर रिशी
07:22का सम्मान हो रहा था, सिवाए उनके पती महादेव के.
07:27तभी एक रिशी ने संभवता दक्ष के पक्ष में जोर से घोषणा की की इस यग्य में समस्त देवताओं को
07:34स्थान दिया गया है, सिवाए उस अमंगलकारी शिव के.
07:38यह अंतिम आक्षेप सती के लिए असहनिय था, उनके भीतर क्रोध की अगनी प्रजवलित हो उठी और उनकी दिव्य आखें
07:47प्रतिशोध की ज्वाला से देहक उठी.
07:50अपने पती के अपमान का प्रतिकार करने और अपनी प्रतिष्ठा को पुनस्थापित करने के द्रिड संकल्प के साथ, सती ने
07:58अपने पिता दक्ष की और एक रौद्र द्रिष्टी डाली.
08:03अपने पिता दक्ष की ओर धधक्ती ज्वालासी द्रिष्टी डालते हुए, सती ने अपनी बाणी में क्रोध और पीडा भर कर
08:10कहा कि उनकी तपस्या से प्राप्त यह दिव्यदे, जिसने उनके अपमानजनक शब्दों को सुना है, अब और धारन नहीं की
08:18जा सकती
08:20सती ने गर्जनाकी की उस पिता की पुत्री होने का कलंक धोना, जिसने अपनी ही संतान के पती का घोर
08:27अपमान किया, उनके लिए मृत्यू से भी बढ़कर असहनिय है
08:32उन्होंने घोशनाकी की वे इस दूशित शरीर को त्याग कर, जो दक्ष के वंश से उत्पन हुआ है, और अपमान
08:40का पात्र बना, अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में विलीन हो जाएंगी
08:45सती ने द्रिड़ता से कहा कि वे दक्ष के यग्य में उपस्थित किसी भी देवता या रिशी की परवाह नहीं
08:51करती, क्योंकि वे सब उनके पती के अपमान के मूग दर्शक बने रहे
08:57यह कहते हुए, उन्होंने अपने मन में भगवान शिव का ध्यान किया और अपनी दिव्य शक्ती को अपने भीतर केंद्रित
09:05करना आरंभ किया, ताकि इस शरीर को ततकाल त्याग सकें
09:10यग्यशाला में उपस्थित सभी देवता और रिशिगन उनके इस अविश्वसनिय संकल्प को सुनकर भय और विस्मय से एक दूसरे की
09:19ओर देखने लगे
09:21दक्ष प्रजाप्ती अपनी पुत्री के इस भयानक निर्नय को अभी भी मात्रधम की मान कर घमन से मुस्कुराते हुए बोले
09:29कि यह सब केवल नाटक है और वे शिव की माया में फस गई है
09:35किन्तु सती ने दक्ष की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपनी संपूर्ण चेतना को अगनी तत्व में परिवर्तित
09:42कर अपने भौतिक शरीर से नाता तोड़ने की प्रक्रिया आरंभ की
09:47शन भर में उनकी दिव्यकाया से एक तीवर स्वर्णिम प्रकाश फूट पड़ा जिसने पूरी यग्यशाला को एक अलोकिक आभा से
09:56भर दिया
09:57और फिर सभी की आखों के सामने सती के भीतर से प्रचंड योग अगनी प्रज्वलित हुई जिसने उनके पवित्र शरीर
10:06को भस्म करना आरंभ कर दिया
10:08यह असहनी द्रिश देखकर उपस्थित सभी देवता, रिशी और प्राणी भयभीत होकर चीख पड़े उनके मन में आतंक और पश्चाताप
10:18का ज्वार उमड उठा
10:20दक्ष प्रजाप्ती अपनी आखों के सामने अपनी ही पुत्री को भस्म होते देख, पहले तो अविश्वास में डूबे रहे, फिर
10:28उनके अहंकार का गड़ धै गया और वे गहन शोक में डूब गये
10:34योग अगनी इतनी प्रचंड थी कि सती का भौतिक शरीर देखते ही देखते राख में बदल गया, केवल एक अलौकिक
10:41प्रकाश शेश रह गया
10:44उनके आत्मत्याग के साथ ही सती का दिव्य आत्मस्वरूप एक शुद्ध जोती के रूप में कैलाश परवत की ओर तीवर
10:52गती से अग्रसर हो गया
10:55जिस क्षण सती का शरीर भस्म हुआ, आकाश में घने, काले बादल उमड पड़े और एक भयानक गड़गडाहट से पूरी
11:03स्रिष्टी कांप उठी
11:05यग्य शाला में प्रचंड आंधी तूफान उठ खड़ा हुआ, जिसने सभी यग्य सामगरी को तितर बितर कर दिया और विशाल
11:13मंडप के स्तंभों को जख जोर दिया
11:16प्रित्वी थर्राने लगी, भूस खलन हुए और परवत श्रिंख लाओं से भयावध ध्वनिया गुंजने लगी, मानोस्वयम प्रकृती शिव के अपमान
11:25पर विलाप कर रही हो
11:28देवता और रिशी इस विनाशकारी द्रिश्य को देख कर अपने अपने लोकों की ओर भागने लगे, यह समझते हुए कि
11:35अब शिव का रौद्र रूप अवश्य प्रकट होगा
11:39इसी बीच कैलाश परवत पर ध्यानमग्न भगवान शिव ने अपनी योग समाधी से बाहर आकर सती के आत्मदाह का भयावह
11:48समाचार अपनी अंतरग्रिश्टी से प्राप्त किया
11:52सती के देह त्याग की सूचना मिलते ही, महादेव का शांत स्वरूप ब्रहमांड को भी हिला देने वाले प्रचंड क्रोध
11:59में परिवर्तित हो गया, मानो प्रलै का आहवान हो रहा हो
12:04कैलाश के हिमशिखरों पर महादेव का प्रचंड क्रोध एक विनाशकारी जंजावात में बदल गया, जिसने ब्रहमांड के हर अनो को
12:12कमपा दिया, मानो प्रलै का निरित्य आरंभ हो रहा हो
12:17महादेव के कंट से निकली एक गर्जना ने तीनों लोकों को भेद दिया, उसकी गूंच स्वर्ग से पाताल तक फैल
12:24गई, हर प्राणी के हिर्दय में भय और विनाश का संकेट भरती हुई
12:29क्रोध की चरम सीमा पर शिव ने अपने जटा जूट से एक लट प्रचंड वेग से खीची, मानो ब्रहमांड की
12:37उर्जा को अपने हाथों में समेट रहे हो
12:40उस लट से ततकाल एक विशाल भयानक आकरिती प्रकट हुई, जो स्वयन शिव के रौद्र रूप का मूर्थ स्वरूप थी,
12:48जिसका नाम वीर्भद्र था
12:51उसी क्षण शिव की दाहिनी जटा से एक और भयानक देवी भदरकाली प्रकट हुई, जो उनकी प्रचंड शक्ती और संहारेनी
13:00उर्जा का साकार रूप थी
13:03महाकाल के रौद्र रूप के समक्ष, वीर्भद्र और भदरकाली, दोनों ही विराट और भयावख घुटनों के बल खड़े होकर अपने
13:11स्वामी की आग्या का इंतजार कर रहे थे
13:14शिव की जलती हुई आखों से आदेश की अगनी निकली, जिसने वीर्भद्र को दक्ष के यग्य को पूर्ण रूप से
13:22ध्वस्त करने का प्रचंड संकेत दिया
13:25वीर्भद्र ने एक भयानक युद्ध घोश किया, उसकी विशाल देह कैलाश से नीचे की ओर उर चली, उसके पीछे-पीछे
13:33शिव के भयानक गणों की सेना भी चल पड़ी
13:37गणों की विक्राल सेना, जिसमें हर एक गण भयावः और अद्वितिय था, वीर्भद्र के नेत्रित्व में विनाश के पत पर
13:45आगे बढ़ रही थी एक भयंकर आंधी की तरहे
13:49उधर दक्ष प्रजापती के भव्य यग्यस्थल पर, रिशिमुनी और देवतागण अभी भी हर्शोलास के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में लीन थे,
13:58आने वाले विनाश से अन्भिग्य
14:01अचानक यग्यस्थल पर अशुब संकेतों की एक श्रिंखला शुरू हुई हवाय भयंकर रूप से चिलाने लगी, यग्यकी अगनी अस्वाभाविक रूप
14:11से जिल्मिलाने लगी और धर्ती हल्की हल्की कापने लगी
14:15एक कान फार देने वाले धमाके के साथ वीरभद्र यग्यस्थल में अवत्रित हुए, उनके आगमन ने पवित्र वातावर्ण को एक
14:24ही पल में भयावह विनाश में बदल दिया
14:27वीरभद्र ने अपनी विनाशलीला आरंभ की, यग्य के पात्रों को बिखेरते हुए, वेदियों को तोड़ते हुए, और भयभीत उपस्थित देवताओं
14:36तथा रिशियों पर तूट पड़ते हुए, चारों और त्राहित्रा ही मच गई
14:41कई देवता और रिशी अपनी जान बचाने की कोशिश में भागते हुए, वीरभद्र और गणों के प्रचंड क्रोध का सामना
14:49करने लगे, उनके शरीर पीडा से छटपटा रहे थे
14:54अंतह, वीरभद्र ने अपने स्वामी के अपमान का प्रतिशोध लेते हुए, अपनी विशाल तलवार से दक्ष के सिर को धड़
15:02से अलग कर दिया, जो हवा में उचल कर दूर जा गिरा
15:06उसी क्षन्क भद्रकाली ने अपनी भयानत प्रसंता के साथ यग्य की सभी पवित्र आहुतियों को निगल लिया, और भागते हुए
15:15उपस्थित प्राणियों के रक्त का पान किया
15:18पूरा भव्य यज्य मंडप मलबे के धेर में बदल गया, उसके सुनहरे स्तंभ और अलंकरित सजावट धूल और खंडेहर में
15:26सिमट कर रह गए
15:28वीर्भद्र अपने विनाश के कार्य को पूर्ण कर ध्वस्त यज्यस्थल के बीचों बीच खड़े थे, उनका विशाल रूप अभी भी
15:36अदमय शक्ती बिखेर रहा था
15:39स्वर्ग से इस विनाशकारी द्रिश को देखते हुए, ब्रह्मा और विश्नु, ब्रह्मान के इस अप्रत्याशित परिणाम पर गहन चिंतन में
15:47डूग गए
15:49अपने स्वामी के भयंकर आदेश का पालन करने के बाद, वीर्भद्रक प्रतिशोध के सार को धारन किये हुए, राख से
15:57भरे कैलाश परवत की ओर लौट चले
16:00दक्ष के यग्यस्थल पर अप्मान के तीवरवानों से बिंध कर, सती ने अपनी आत्मा में क्रोध और पीडा की अगनी
16:08को प्रजवलित होते देखा, जहां उनके प्रिय महादेव का अनादर खुलेयाम हो रहा था
16:14उनके हृदय में महादेव के प्रती अटूट निश्था थी, किन्तु अपने पिता द्वारा किये गए इस अक्षमय अपमान ने उनके
16:22अंतर्मन को जख जोर दिया, जहां हर पल अपमान की अगनी धधक रही थी
16:28अपने ही देह को जिसने दक्ष के कुल में जन्म लिया था, एक बंधन और एक भार मानते हुए, सती
16:36ने इसे त्यागने का द्रिड संकल्प कर लिया, जो अब महादेव के अनादर का प्रतीक बन चुका था
16:43उनकी आखों में एक दिव्य जोती प्रस्पुटित हुई, जो इस नश्वर संसार और उसके सारे बंधनों से मुक्ती की राह
16:50दिखा रही थी, केवल महादेव के चर्णों में समर्पन की ओर
16:55अचानक सती ने अपने पिता दक्ष की ओर मुर कर देखा, उनकी आखों में अब प्रेम या पीडा नहीं, बलकी
17:02एक अटल दिव्य क्रोध की ज्वाला धधक रही थी
17:06एक गर्जना के साथ, उन्होंने दक्ष के इस मिथ्या यग्यका और उनके सभी अभिमानी कृत्यों का परित्याग करते हुए, अपने
17:15नाम से उनके वंश का त्याग करने की घोशना कर दी
17:19सती ने उपस्थित देवताओं और रिशियों को महादेव के निरादर के भयावह परिणामों के प्रती चेतावनी दी, उनकी वाणी में
17:28ब्रहमांडिय सत्य की गूम्श थी
17:31उन्होंने अपनी दिव्यता को पुनह प्राप्त करने और महादेव के प्रती अपनी शाश्वत निष्ठा को प्रमानित करने के लिए अपने
17:39भौतिक देह को अगनी में भस्म करने का संकल्प लिया
17:43गहरे ध्यान में लीन होकर सती ने अपनी योग शक्ती को आहवान किया और उनके भीतर से एक दिव्य अगनी
17:51प्रकट होने लगी जिसने उनके शरीर को घेरना प्रारंभ कर दिया
17:56जैसे जैसे अगनी बढ़ती गई उनके दिव्य शरीर से एक अलौकिक तेज फूट पड़ा जो समस्त यग्यस्थल को अपनी पवित्र
18:05लप्टों से प्रकाशित कर रहा था
18:08सती का शरीर दिव्य अगनी के आगोश में समाहित होता गया उनकी हर कोशिका महादेव के नाम का जब करती
18:15हुई परम बलिदान की ओर बढ़ रही थी
18:19यग्यस्थल पर उपस्थित सभी देवता और रिशी इस अविश्वस्निय और हरिदय विदारक ग्रिश को देख कर स्थब्ध रह गए उनकी
18:27आखे भाय और विस्मय से चौड़ी हो गई
18:31दक्ष प्रजाप्ती का चहराभाय और पश्चाताप से पीला पड़ गया क्योंकि उन्होंने अपनी पुत्री के इस परंबलिदान की भयावता को
18:40पहली बार अनुभव किया
18:43ब्रह्मा, विश्नु और अन्य प्रमुख देवगण इस असाधारन त्याग को देख कर गहरे चिंतन में डूब गए ब्रह्मांड के नियमों
18:51का यह उलंधन उन्हें विचलित कर गया
18:54प्रचंड अगनी की लप्तों के बीच सती का दिव्य शरीर धीरे-धीरे एक स्वर्गिय प्रकाश में विलीन हो गया
19:01केवल महादेव के प्रती उनकी प्रेम्मई निष्ठा की राक्षेश रह गई
19:07जैसे ही सती का देह भस्म हुआ एक भयंकर भूकंप ने तीनों लोकों को हिला दिया
19:13जो ब्रह्मांड में एक गंभीर क्षती और अनादर के परिनाम का संकेत था
19:19कैलाश परवत पर गहन ध्यान में लीन भगवान शिव को अपनी योगमाया से
19:24सती के आत्मदाह का असहनिय समाचार प्राप्थ हुआ जिसने उनकी शांती को भंग कर दिया
19:31सती की मृत्यू के समाचार से महादेव का हरिदय तूट गया
19:36उनके मुखमंडल पर गहरा शोक्छा गया और उनकी आखे दुख और क्रोध से लाल हो गई
19:43उनका शांत स्वरूप विक्राल रौद्र रूप में परिवर्तित हो गया
19:47ब्रहमांड की नीम हिलने लगी और सभी देवता भय से काम उठे
19:52क्रोध की पराकाश्ठा पर पहुँचकर महादेव ने अपनी एक जटा को जड से उखाड कर धर्ती पर पटक दिया
20:00जिससे वीर्भदर का जन्म हुआ जो विनाश का प्रतीक था
20:05महादेव के धर्ती पर जटा पटकते ही प्रचंड गर्जना के साथ भूगर्ब से एक विशालकाय अगनी के समान तेजस्वी वीर्भदर
20:13प्रकट हुए
20:14जिनके नेत्रों से विनाश की ज्वाला धधक रही थी
20:19भगवान शिव ने वीर्भदर को अपनी अदमय शक्ती का सार प्रदान करते हुए दक्ष के यग्य का विध्वन्स करने और
20:26उसके अहंकार को चूर-चूर करने का आदेश दिया
20:30उसी क्षणक महादेव के क्रोध की एक और विस्मयकारी अभिव्यक्ती के रूप में भदरकाली का विक्राल स्वरूप प्रकट हुआ जो
20:38स्वय विनाश की ज्वाला थी
20:42वीर्भदर और भदरकाली के साथ शिव के उग्र गणों की विशाल सेना जिन में नंदी भी शामिल थे दक्ष के
20:49यग्य को नश्ट करने के लिए भीशन गर्जना करती हुई एकत्रत हो गई
20:54क्रोध की अग्नी में जलते हुए शिव के गणों ने कैलाश से प्रस्थान किया उनके प्रत्येक पच्चाप से धर्ती काप
21:02रही थी और आकाश गर्जना कर रहा था
21:05यह विध्वन्सकारी सेना जिसका उद्देश केवल प्रतिशोध था अत्यंत तीवर गती से दक्ष प्रजापती के यग्यस्थल की ओर बढ़ी जहां
21:15अंजान देवता और रिशी अनुष्ठान कर रहे थे
21:19दूसरी और दक्ष प्रजापती अपने राजसी गौरव और घमंड में चूर देवताओं और रिशीयों से घिरे भव्य यग्य का संचालन
21:28कर रहे थे अंजाने में अपने अंत को आमंत्रित करते हुए
21:33अचानक यग्य मंडप में अशुब संकेतों की एक श्रिंखला प्रकट होने लगी हवा में एक अजीब सी ठंडक अगनी की
21:41लप्टों का अनियमित होना और देवताओं के चहरों पर चिंता की परचाई
21:46एक भीशन गर्जना के साथ वीर्भदर के नेत्रित्व में शिव की सेना ने यग्य स्थल में प्रवेश किया उनकी क्रूर
21:54उपस्थिती से वातावर्ण भय और अराजक्ता से भर उठा
21:59देवता और रिशी भय से चीक उठे अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे यग्य की पवित्रता एक
22:07ही क्षण में भंग हो गई
22:09वीर्भदर ने अपनी विशाल भुजाओं से यग्य वेदी को ध्वस्त कर दिया, पवित्र अगनी को बुझा दिया और देवताओं द्वारा
22:17किये गए सभी अनुष्ठानों को दूशित कर दिया
22:21शिव के गणों ने देवताओं और रिशियों पर निर्दैता से हमला किया, उनकी दिव्य शक्तिया क्रोधित महादेव के अनुयाईयों के
22:29सामने बेबस प्रतीत हुई
22:32भदरकाली अपनी भयानक हंसी के साथ देवताओं और दानवों पर समान रूप से तूट पड़ी, उनके सिर कलम करती हुई
22:40और यग्यस्ठल को रक्ट से रंगती हुई
22:43दक्ष प्रजाप्ती ने घबरा कर भागने की कोशिश की, लेकिन वीर्भदर ने उसे रोका, उसके घमंड और क्रूरता का अंत
22:51निकट था
22:53वीर्भदर ने दक्ष को पकड़ा, जिसने अपनी ही बेटी की मृत्यू का उपहास किया था, और उसे घसीट कर यग्यवेदी
23:01पर ले आया, जहां उसका अंत निश्चित था
23:05और फिर एक ही प्रचंडवार में, वीर्भदर ने दक्ष प्रजाप्ती का सिर्धर से अलग कर दिया, जिससे उसका अहंकार और
23:13उसका जीवन दोनों समाप्थ हो गए
23:16दक्ष का सिर्ध आकाश में उचल कर दूर जा गिरा, एक प्रतीक के रूप में कि महादेव के क्रोध को
23:23कोई भी शक्ती नहीं रोक सकती
23:26पूरा यग्यस्थल अब रक्ट और राख से सना एक युद्धक्षेत्र बन चुका था, जहां केवल विनाश की भयावह गुंजे सुनाई
23:34दे रही थी
23:36अपना कार्य पूर्ण कर, वीरभदर और भदरकाली अपनी विजी सेना के साथ कैलाश परवत की ओर लोट पड़े, पीछे छोड़कर
23:44केवल एक विधवस्त सामराज्य का निशान
23:48कैलाश पर वापस महादेव अपनी सती के दुख में लीन थे, भले ही प्रतिशोध पूर्ण हो चुका था, लेकिन उनके
23:56हृदय का घाव गहरा बना हुआ था
23:59कैलाश परवत पर महादेव अपने आपको सती के शाश्वत प्रेम की अगनी में दग्ध महसूस कर रहे थे, जहां प्रतिशोध
24:07की राख भी उनके हृदय के गहरे घाव को भर नहीं पा रही थी
24:12देवता और गंधर्व भी इस अविश्वसनिय दुहक के वातावर्ण से भयभीत थे, क्योंकि कैलाश पर पहले कभी इतना गहरा, सन्नाटे
24:21भरा अवसाद नहीं चाया था
24:24उनके अंतर्मन में सती की स्मृतिया एक प्रल्यंकारी तूफान बनकर उमड रही थी, जिसने शिव के तीनों लोकों को हिला
24:32देने वाले रौधर रूप को शांत कर दिया था, पर अब यह दुख स्वयें एक नया प्रलय बन रहा था
24:40सहसा, शिव के हृदय में एक दिव्य अनुभूती जागी, जैसे सती की अंतिम पुकार उन्हें दक्ष के यग्यस्थल की और
24:47अद्रिश्य रूप से खीच रही हो
24:50एक मौन निश्चय के साथ महादेव ने कैलाश परवत छोड़ दिया, उनकी गती में ब्रह्मांड के सबसे गहन दुख का
24:58भार समाहित था
25:00वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपनी द्रिश्टी से उस विद्वस्थ यग्यभूमी को देखा, जहां केवल खंडेहर और भस्म ही बचे थे, जो
25:09उनके क्रोध की पराकाश्था के मूख गवाह थे
25:13और फिर उनकी आखें उस भयावध द्रिश्ट पर ठिठक गई जहां सती का अगनिदग्द शरीर राख के धेर के बीच
25:21एक दुखत प्रतिमासा पड़ा था
25:24समय ठहर गया, ब्रहमांड ने अपनी सासे रोक ली, क्योंकि स्वया महाकाल भी इस असहनिय पीडा के सामने क्षण भर
25:32के लिए स्तब्ध रह गए थे
25:35अत्यंत कोमलता से महादेव ने अपने हाथों में सती के निश्प्राण अगनिदग्द शरीर को उठाया, मानो वह अभी भी उनकी
25:43प्राणप्रिया जीवन्थ हो
25:46जैसे ही उन्होंने सती को उठाया, ब्रहमांड के प्रत्येक कण में एक अपूर्व कमपन हुआ, जैसे स्वयन चेतना का आधार
25:54ही डग्मगा गया हो
25:56और फिर शिव के दुख ने रुद्र तांडव का रूप ले लिया, सती के शव को लिये हुए, वे ब्रहमांड
26:03को अपनी शोक की अगनी से जलाने लगे
26:05उनकी प्रत्येक पच्चाप से प्रित्वी काप उठी, आकाश में बिजली कड़कने लगी और नक्षत्र अपनी कक्षाओं से विचलित होने लगे
26:16समस्त देवगन, गंधर्व और विशी इस भयानक द्रिश्य को देखकर भय और निराशा से त्राहित्राही कर उठे ब्रहमांड का अंत
26:24निकट प्रतीत हो रहा था
26:27भगवान विश्णू और ब्रहमा ने इस महा प्रलय को देखकर स्रिश्टी के विनाश को रोकने के लिए ततकाल उपाय सोचने
26:35लगे
26:36उन्होंने समझा कि शिव को केवल सती के भौतिक मोह से मुक्त करके ही इस प्रलय से ब्रहमांड को बचाया
26:43जा सकता है
26:45विश्णू ने अपने सुदर्शन चक्र को धारण किया जो स्रिश्टी और विनाश की शक्ती का प्रतीक था और एक दुखत
26:53किन्तु आवशक कार्य के लिए तैयार हुए
26:57जैसे ही शिव अपने तांडव में लीन थे, विश्णू ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को धीरे-धीरे
27:04टुक्डों में विभाजित करना शुरू किया, ताकि शिव का मोह कम हो सके
27:09सती के शरीर के प्रत्येक टुक्डे के प्रिथवी पर गिरने से एक नया शक्तिपीठ प्रकट हुआ, जो उनकी दैविय उर्जा
27:17का शाश्वत निवास बन गया
27:20शिव का तांडव जारी रहा, पर सती के भौतिक शरीर के खंडित होते जाने से उनके कंधों पर पड़ा भावनात्मक
27:27भार धीरे-धीरे कम होता गया
27:30अंतह, जब सती का शरीर पूर्णत है शक्तिपीठों में विलीन हो गया, शिव ने अपना तांडव रोक दिया और गहरे
27:38ध्यान में लीन हो गये, अपनी शाश्वत प्रिया की स्मृति को हरिदय में संजोए
27:43ध्यान की गहरायों से जागते ही महादेव के भीतर सती के वियोग का दुहक एक प्रल्यंकारी क्रोध में परिवर्तित हो
27:51गया
27:53कैलाश पर्वत के शिखर पर खड़े होकर, शिव ने जब सती के उस आत्मदाह को याद किया, तो उनका पूरा
28:00शरीर ब्रहमांडी उर्जा से कामपने लगा
28:04परमक्रोध में भरकर महादेव ने अपनी विशाल जटाओं को खोल दिया, जिससे पूरे ब्रहमांड में अंधकार छा गया और तारे
28:12थर्थराने लगे
28:14अत्यंत तीवर रोश के साथ, शिव ने अपनी मस्तक की एक जटा को उखाड लिया, जो साक्षात प्रलै की अगनी
28:21की तरह देहक रही थी
28:24उस दहक्ती हुई जटा को महादेव ने पूरी शक्ती के साथ कैलाश की चटान पर दे मारा, जिससे धर्ती दो
28:31भागों में फटने लगी
28:33जैसे ही जटा चटान से टक्राई, वहां से काले धुएं और ब्रहमांडिय अगनी का एक अत्यंत विशाल बवंडर आकाश की
28:42ओर उठा
28:43उस प्रलंकारी अगनी और धुएं के बीच से एक अत्यंत भयंकर, विशालकाय और अजेय योद्धा की आकरती आकार लेने लगी
28:53वह भयंकर आकरती पूर्ण रूप से प्रकट हुई, जो महादेव का महाविनाशक अंश विर्भद्र था, जिसके आठ हाथ और भयानक
29:02रूप था
29:04उसी क्षणक जटा के दूसरे हिस्से से एक और महाशक्तिशाली और विक्राल देवी का प्राकट्य होने लगा, जिनकी आभा अंधकार
29:12को चीर रही थी
29:14वह उग्रदेवी साक्षात भदरकाली के रूप में प्रकट हुई, जिनकी आखों में ब्रह्मांड को भस्म कर देने वाला क्रोध भरा
29:23था
29:24वीर्भदर और देवी भदरकाली ने अपने भयानक शस्त्रों को जुका कर महादेव के चर्णों में अत्यंत आदरपूर्वक्षीश नवाया
29:34महादेव ने अपनी क्रोध से लाल आखों से देखते हुए अपना चमचमाता हुआ त्रिशूल दक्ष प्रजाप्ती के यग्य की दिशा
29:41में उठा दिया
29:43शिव ने अत्यंत गंभीर और गर्जनापूर्ण स्वर में आदेश दिया कि दक्ष के उस अहंकारी यग्य को तुरंत पूर्णत है
29:51तहसन हस कर दिया जाए
29:54महादेव ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सती के अपमान पर मौन रहने वाले हर एक देवता और विशी को उनके
30:01कर्मों का दंड मिलना चाहिए
30:04वीर्भदर ने अपने स्वामी का आदेश सुनकर ऐसी भयंकर हुंकार भरी जिससे दसों दिशाएं देहल उठीन और समुदर कांप उठे
30:14देवी भदर काली ने अपनी तलवार को हवा में लहराते हुए एक अट्थास किया जो दुष्टों के विनाश की पूर्वसूचना
30:22थी
30:23महादेव के आदेश पर्श मशान और अंधकार से शिव के गण, प्रेत और पिशाच भी उनके साथ युद्ध के लिए
30:30उठ खड़े हुए
30:33वीर्भद्र उस भयानक गणों की सेना का नेत्रित्व करते हुए जलते हुए आकाश के मार्क से दक्ष के सामराज्य की
30:40ओर चल पड़े
30:42देवी भद्रकाली भी अपनी सेना के साथ विनाशकारी अगनी की तरहा आगे बढ़ी जिससे धर्ती पर प्रलै का सन्नाटा पसर
30:50गया
30:52आकाश में उमरते काले बादलों और बिजली की कड़कडाहट के बीच यह महाविनाशक सेना कंखल में यग्यवेदी के उपर आपहुँची
31:02वीर्भद्र और भद्रकाली के नेत्रित्व में शिव के भयानक गण जलते हुए उलकापिंडो की तरह कंखल की यग्यशाला में उत्रे
31:10और चारों और हाहाकार मच गया
31:13पवित्र यग्यवेदी की अगनी भय से कामप उठी और चारों तरफ मंत्रों चार की जगह भयभीत रिशियों की चीखें गूंजने
31:21लगी
31:22क्रोध से उफंते वीरभद्र ने अपनी विशाल तलवार से यग्यशाला के सुवर्ण स्तंभों को एक ही जटके में धराशाई कर
31:31दिया
31:32देवी भद्रकाली ने अपनी सेना के साथ यग्य की रक्षा में खड़े सैनिकों पर काल बनकर प्रहार किया जिससे पूरी
31:40भूमी रक्तरंजित हो गई
31:42अपने सामराज्य को उजड़ता देख अहमकारी राजा दक्ष थर-थर कामपने लगा फिर भी उसने अपने अंगरक्षकों को युद्ध का
31:51आदेश दिया
31:52शिव के गणों ने सिन्हनाद करते हुए दक्ष के सैनिकों को गाजर मुली की तरहे काटना शुरू कर दिया
32:00रिशि भेगु ने यग्य की रक्षा के लिए अपनी तपोबल से एक अभेध्य दिव्य मंत्र कवच का निर्मान किया
32:08वीरभदर ने एक अटहास किया और अपने दिव्य मंत्र कवच को तिनके की तरहे बिखेर दिया
32:17इंद्र सहित अन्य देवता अपने वाहनों पर सवार होकर आकाश मार्ग से भागने का असफल प्रयास करने लगे
32:26क्रोधित भद्रकाली ने आकाश में उर्ते देवताओं का मार्ग रोग कर उन्हें चारों तरफ से घेर लिया
32:34वीर्भद्र ने महादेव का अपमान करने वाले अभिमानी रिशी भेगो को दबोच लिया और उनकी दाढ़ी नोच डाली
32:42यग्यमंदप के भव्य शामियाने में आग लग गई जिससे पूरा कंखल सामराज्य काले धुएं की चादर में लिपट गया
32:51दक्ष अपने प्राणों की भीख मांगते हुए यग्यवेदी के गुप्त गर्भग्रेह की और पागलों की तरह भागा
32:58स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्नु शांत भाव से दूर खड़े रहे क्योंकि वे जानते थे कि दक्ष का अंत सुनिश्चित
33:06है
33:08वीर्भदर ने गर्भग्रेह के द्वार को तोड़ कर दक्ष का रास्ता रोक लिया और उसके सामने साक्षात काल बनकर खड़ा
33:16हो गया
33:17दक्ष ने कापते हाथों से प्रार्थना की पर वीर्भदर के कानों में केवल महादेव के अपमान की गुँच थी
33:25वीर्भदर ने दक्ष को बालों से पकड़ा और उसे खींचते हुए मुख्य यग्यवेदी की ओर ले आया
33:33एक महाविनाशक हुंकार के साथ वीर्भदर ने अपनी भारी तलवार उठाई और दक्ष का सिर धड से अलग कर दिया
33:42दक्ष का कटा हुआ सिर जलती हुई यग्यवेदी के धधकते कुंड में जागिरा जिससे यग्य सदा के लिए अपून रह
33:49गया
33:50दक्ष के सामराज्यका गर्व धूल में मिल गया और भैभीत देवता और रिशी उस उजाड और शापित यग्यस्थल को छोड़
33:58कर भाग गये
34:00विध्वन्स के बाद शान्त हुए यग्यशाला के राख और धुएं के बीच महादेव अत्यंत भारी कद्मों से प्रवेश करते हैं
34:10यग्यवेदी के समीठ ही महादेव की दृष्टी अपनी प्राणप्रिय सती के निश्प्राण और आंशिक रूप से जुलसे हुए पार्थिव शरीर
34:18पर पड़ती है
34:20अपनी सती की यह दशा देख कर सर्वशक्ति मान शिव घुटनों के बल भूमी पर गिर पड़ते हैं और उनका
34:27हृदय पीड़ा से छटपटा उठता है
34:31महादेव अत्यंत कोमलता से सती के शीतल चहरे को अपने हाथों में लेते हैं और उनके नेत्रों से बहने वाले
34:38अश्रुप रिथवी पर गिरते ही दहकते अंगारे बन जाते हैं
34:44अत्यधिक आघात के कारण शिव का त्रिनेत्र क्रोध और असीम पीड़ा के मिश्रण से सुलक उठता है जिससे चारों और
34:51एक लाल आभा फैल जाती है
34:55असीम करुणा और विलाप के साथ महादेव सती के पवित्र देह को अपने विशाल और बल्शाली कंधों पर उठा लेते
35:03हैं
35:04सती को कंधे पर धारण कर शिव एक ऐसी हृदय विदारक हुंकार भरते हैं जिससे तीनों लोक और संपून ब्रहमांड
35:12थर्थरा उठता है
35:15यग्यशाला के उजार और तूटे हुए स्तंभों को पीछे छोड़ते हुए महादेव सती के शरीर के साथ बिना किसी दिशा
35:23के भटकने लगते हैं
35:26जैसे जैसे शिव आगे बढ़ते हैं उनके गहरे दुहक की छाया से आकाश काला हो जाता है और प्रकृती अपना
35:34संतुलन खोने लगती है
35:37शिव सती की देह को लिए अंतरिक्ष की ओर प्रस्थान करते हैं जहां काल मेग उमड आते हैं और बिजली
35:44कड़कड़ाने लगती है
35:47हिमाले की दुर्गम और बर्फीली चोटियों पर विलाप करते शिव के गर्म आसु सदियों पुरानी बर्फ को पिघला कर नदियों
35:54में बाढ़ ला देते हैं
35:57परवतियवनों के मौन पशु और पक्षी अत्यंत आदर और भय से अपने स्वामी महादेव को अपनी अर्धांगिनी का शब ले
36:05जाते हुए देखते हैं
36:08शिव के अशांत मन के प्रभाव से नक्षत्र अपनी कक्षाओं से विचलित होने लगते हैं और संपूर्ण ब्रहमांड में हाहाकार
36:16मच जाता है
36:18आदिपुरुष के इस घोर संताप को देखकर सूर्यदेव की कांती फीकी पड़ जाती है और वे एक निस्तेज थंडी रोशनी
36:27बिखेरने लगते हैं
36:29प्रित्वी की गहरी घाटियों में भटकते हुए महादेव अपनी सुधबुध खो चुके हैं और उन्हें सृष्टी की पुकार सुनाई नहीं
36:37दे रही है
36:39महादेव के अंतर्मन में उमर्ते दुहक के महासागर के कारण प्रित्वी के समुद्र अशान्थ होकर गगन्चुम्बी लहरों के साथ हाहाकार
36:48करने लगते हैं
36:50स्वर्गलोक से भयभीत देवता इस भयानक ग्रिश्य को देख कांप उठते हैं क्योंकि शिव का यह विलाप पूरी स्रिष्टी को
36:58प्रलय की ओर धकेल रहा है
37:01अत्यंत पीड़ा में व्याकुल महादेव सती के शव को थामे हुए विलाप का एक धीमा और विनाशकारी रुद्र तांडव करने
37:09लगते हैं
37:11इस शोकमय तांडव के कमपन से धर्ती फटने लगती है और ब्रहमांड की नीम भिल जाती है
37:19संपूर्ण बाहिय जगत से विमुख होकर शिव अपनी सती के पार्थिव शरीर को छाती से चिपकाए हुए एक अंधीन विलाप
37:27की समाधी में लीन हो जाते हैं

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