श्रीमद्भागवत पुराण के छठे स्कंध की यह अत्यंत ही फलदायी और रहस्यमयी गाथा है! जानिए कैसे एक पतित ब्राह्मण अजामिल ने मृत्यु के क्षणों में केवल अपने पुत्र 'नारायण' का नाम पुकारा और यमराज के भयंकर दूतों को वैकुण्ठ के दिव्य विष्णुदूतों के सामने पीछे हटना पड़ा। क्या है 'हरि-नाम' का गुप्त रहस्य? क्यों यमराज ने स्वयं अपने दूतों को विष्णु-भक्तों से दूर रहने का आदेश दिया? देखिए श्रीमद्भागवतम् की यह अलौकिक और ज्ञानवर्धक कथा!
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00:00नरक के भयानक वर्णनों को सुनकर राजा परीक्षित का हृदय करुणा से भर उठा और वे गंगा के तट पर
00:06अत्यंत व्याकुल होकर बैठ गए।
00:09राजा परीक्षित ने नमरता से अपने हाथ जोडे और महर्शी शुकदेव जी के चरंटमलों में प्रणाम करते हुए अपना प्रश्ण
00:17रखा।
00:18परीक्षित ने पूछा की है ब्रहमर्शी जो अज्यानी मनुष्य विभिन पाप कर्मों में लिप्त हैं वे भयानक नरक की यातनाओं
00:27से स्वयन को कैसे बचा सकते हैं।
00:30महराज परीक्षित के मन में उन असहाय जीवों के प्रती अत्यधिक दया थी जो रौरव और कुम्भी पाक जैसे घोर
00:38नरकों की ज्वालाओं में जलते हैं।
00:41राजा परीक्षित की अगाद करुणा और निश्पाप जिग्यासा को देखकर भगवान शुकदेव जी के तेजस्वी मुख पर एक शांत और
00:50कृपालु मुस्कान तैर गई।
00:53शुकदेव जी ने कहा कि हे राजन पापों का शमन करने के लिए वेदों में कर्मकांड, कठिन वरत और प्राश्चित
01:00के अनेक विधान बताए गए हैं।
01:03इस पर राजा परीक्षित ने तर्क दिया कि यदि मनुष्य प्राश्चित के बाद पुना वही पाप करता है, तो वह
01:10प्राश्चित हाथी के स्नान की भानती व्यर्थ है।
01:14परीक्षित का मानना था कि जब तक मनुष्य का हरिदय भीतर से शुद्ध नहीं होता, तब तक केवल बाहरी अनुष्ठान
01:22पापवासना को नश्ट नहीं कर सकते
01:25राजा परीक्षित के इस सुक्ष्म और विवेक पूर्ण प्रशन से अत्यंत प्रसन्न होकर महर्शी शुकदेव जी ने उनका अभिनन्दन किया
01:34शुकदेव जी ने स्पष्ट किया कि केवल भगवान श्री हरी की निश्काम भक्ती ही पाप के वीज और वासनाओं को
01:41जड़ से समाप्त कर सकती है
01:45भगवन नाम की असीम और परमतारक महिमा को सिद्ध करने के लिए शुकदेव जी ने अजामिल के प्राचीन और अध्भुत
01:52इतिहास का वर्णन आरंभ किया
01:55उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में काने कुग्ज नामक अत्यंत सम्रिध नगर में एक धार्मिक और वेदपाथी ब्राहमन कुल निवास
02:04करता था
02:05उस संभ्रांत कुल में अजामिल नाम का एक नव्युवक रहता था जो वेदों का परम विद्वान, अत्यंत शांत, शीलवान और
02:13संसकारी था
02:15अजामिल अपने व्रिद्ध मातापिता की निश्था पूर्वक सेवा करता था और शास्त्रानुसार सत्यक दया तथा ब्रहमचर्य के कठोर नियमों का
02:24पालन करता था
02:26एक दिन अजामिल यग्य की समिधा, कुशा घास और पूजा के पवित्र पुष्प एकत्र करने के लिए हरे भरे सघन
02:33वन में गया
02:35घने वन के बीच अजामिल की द्रिश्टी अचानक एक अमर्यादित और कामातुर अवस्था में बैठे शूदर पुरुष और स्त्री पर
02:43पड़ी
02:44उस द्रिश को देखते ही अजामिल का चित विचलित हो गया और उसकी वर्षों की तपस्या तथा इंद्रिय निग्रह एक
02:52ही क्षण में डग्मगाने लगे
02:55वासना के तीवर आवेग ने अजामिल की निर्मल बुद्धी को हर लिया और उसका मन धर्म शास्त्र के कठोर सिधान्तों
03:02को भूल गया
03:04वह अशान्त और विचलित हृदय के साथ अपने आश्रम लोटा परन्तु उसका मन अब न तो संध्यावंदन में लग रहा
03:12था और नहीं वेदपाठ में
03:15शुकदेव जी ने कहा कि इस प्रकार एक क्षण के पतन ने अजामिल का जीवन बदल दिया परन्तु अंत में
03:22भगवन नाम की अपार शक्ती ने उसका परम उद्धार किया
03:27कामागनी में जलते हुए अजामिल ने अपने दैनिक संध्यावंदन और यज्यहवन जैसे पवित्र अनुष्ठानों को पूरी तरह त्याग दिया
03:36उसकी पतिवर्ता ब्राहमनी पतनी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उसे धर्म मार्ग पर लोटने की प्रार्थना की, किन्तु कामांध अजामिल ने
03:45उसकी एक न सुनी
03:47अपने पूज्य वृद्ध मातापिता और कुल की मर्यादा का त्याग कर अजामिल सदैव के लिए अपने पावन ग्रिहाश्रम से बाहर
03:55निकल गया
03:57वह सीधा उस निम्नजाती की कामुक स्त्री के निवास पर पहुँचा और उसके सौंदर्य के आकर्षण में पूरी तरह समर्पित
04:05हो गया
04:06उस त्री को प्रसंद करने और उसकी महेंगी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अजामिल ने अपने सभी ब्राहमन नियमों
04:14और शौच आचार को तिलांजली दे दी
04:17धन का अभाव होने पर अजामिल ने छलकपट, जुआ और असत्य बोलने जैसे घ्रेनित साधनों का सहारा लेना प्रारंभ कर
04:25दिया
04:26वह निर्जन वनमार्गों में राहगीरों को लूटने और चौर्य कर्म करने लगा ताकि उस्त्री के लिए बहुमुल्य आभूशन जुटा सके
04:36कान्यकुब्ज नगर के धर्मात्मा जनों और विद्वान ब्राहमनों ने उसके इस घोर पतन को देखकर दुखी मन से उसका सामाजिक
04:44बहिशकार कर दिया
04:47समाज से बहिशक्रित होकर वह उस्त्री के साथ एक अंधेरे अनैतिक घर में रहने लगा और निरंतर हिंसा तथा पाप
04:55कर्मों में डूबता चला गया
04:57इस घोर अधर्म के बीच भी अजामिल के पूर्व जन्मों का कोई अज्यात सुक्ष्म पुन्य संसकार उसके भीतर सुप्ट अवस्था
05:05में विद्यमान रहा
05:07कई वर्ष व्यतीत हो गए और उस स्त्री के गर्भ से अजामिल के दस पुत्रों का जन्म हुआ
05:14जब उसका सबसे छोटा पुत्र उत्पन हुआ तब इश्वरिय प्रेणा और अदृष्य प्रारब्ध के प्रभाव से अजामिल ने उसका नाम
05:23नारायन रखा
05:25अजामिल का हृदय अपने उस छोटे से बालक नारायन के प्रती अपार वातसल्य और तीवर मोह से भर गया
05:43प्रिय पुत्र नारायन मिट्टी में खेलता या तुतलाते हुए बोलता, तो अजामिल प्रेम विवल होकर उसे अपनी बाहों में भर
05:50लेता।
05:52धीरे धीरे समय का चक्र घूमा और अजामिल अत्यंत वृद्ध दुर्बल तथा रोगों से ग्रस्थ हो गया, उसकी दृष्टी भी
05:59धुंधली पड़ने लगी।
06:0188 वर्ष की आयू में मृत्युशया पर पड़े होने पर भी उसका मन केवल अपने प्रिय पुत्र नारायन में ही
06:09अटका हुआ था।
06:11अजामिल इस बात से सर्वता अन्भिग्य था कि पुत्र के बहाने लिया गया भगवान नारायन का पावन नाम उसके सुक्षम
06:18पापों को भस्म कर रहा था।
06:21अंत्य उसके प्राणों का अंत निकटा गया और उसके जरजर शरीर के चारों और काल की भयानक काली छाया मंडराने
06:29लगी।
06:31अजामिल की अंतिन सासों के साथ ही यमलोग की दिशा से भयानक यमदूतों का आगमन प्रारंब हुआ, जो उसकी आत्मा
06:38को बांधने के लिए तयार थे।
06:41जैसे ही अजामिल के प्रान शरीर से निकलने को हुए, उसकी आखों के समक्ष यम्दूतों का भयंकर दल एक विक्राल
06:49अंधकार की तरहे छा गया, जिसके भयानक रूप उसके हृदय को चीर रहे थे
06:55मृत्यू के अंतिन प्रहार से भयभीत अजामिल ने अपनी सारी शक्ती बटोर कर बिना किसी अन्य विचार के अपने पुत्र
07:03नारायन को पुकारा, जो वास्तव में भगवान नारायन का ही पावन नाम था
07:08उस असहार पुकार में छुपी थी एक गहरा विश्वास की अव्यक्त शक्ती, जिसने अनायास ही मृत्यू की चोखट पर खड़े
07:17व्यक्ती को परम्पिता परमात्मा से जोड़ दिया
07:21अजामिल की वह करोन ध्वनी स्वर्ग लोग के सभी लोकों को पार करती हुई, सीधे वैकुंठ में भगवान नारायन के
07:28दिव्यकानों तक पहुँची
07:31सर्वव्यापी भगवान नारायन ने ततकाल अपने सेवकों को उस मरनासन आत्मा की सहायता के लिए भेजा, जिनकी पुकार केवल एक
07:40बच्चे के नाम से अधिक थी
07:42तभी चारों दिशाओं से दिव्याभासे प्रकाशित भगवान विश्नु के चार तेजस्वी पार्षत प्रकट हुए, जिनके तेज से यमदूतों की आखों
07:52में चकाचौन्ध छा गई
07:55यमदूत जो मृत्यू के दूत होने का अहमकार रखते थे, इन अनपेक्षित आगंतुकों को देखकर क्षन भर के लिए अपनी
08:02कुरूरता भूल गए और आश्चर यच्कित रह गए
08:07विश्नुदूतों ने ततपरता से अजामिल की आत्मा को यमदूतों द्वारा लगाए गए पाशों से मुक्त किया, मानो कोई दिव्यत जोती
08:15काली छाया को हटा रही हो
08:18यमदूतों ने क्रोधित होकर प्रश्न किया कि वे कौन हैं और किस अधिकार से उनके मार्ग में बाधा डाल रहे
08:25हैं, जो धर्मराज यम के आदेश का पालन कर रहे थे
08:30विश्नुदूतों ने शांत और अधिकार पूर्ण स्वर में उत्तर दिया कि वे भगवान नारायन के दूत हैं और अजामिल अब
08:37उनके प्रभुका सेवक है, जिसे वैकुन्ठ ले जाया जाएगा
08:42यमदूतों ने अजामिल के जीवन भर के कुकर्मों की लंबी सूची गिनाई, जिन में चोरी, छल और परस्त्रिग्मन जैसे घोर
08:50पाप शामिल थे, और तरक दिया कि वह यमपुरी जाने का अधिकारी है
08:57विश्नुदूतों ने मधूर्ता से समझाया कि भगवान के नाम की महिमा इतनी अपार है कि एक बार भी उसका उच्चारन
09:04समस्थ पापों को जला कर भस्न कर देता है, भले ही वह अंजाने में ही क्यों न लिया गया हो
09:11अजामिल की आत्मा इन दिव्यदूतों के मध्य निलंबित होकर अपने ही जीवन के कर्मों और नामजब के अप्रत्याशित प्रभाव को
09:19साक्षी बन रही थी
09:22यमदूतों ने अविश्वास में सिरहिलाया, यह समझने में असमर्थ थे कि एक घोर पापी को केवल एक नाम के उच्चारन
09:30मात्र से कैसे मुक्ती मिल सकती है
09:34विश्वदूतों ने आगे सपष्ट किया कि जैसे अगनी लकडी के बड़े धेर को भी जला कर राख कर देती है
09:41वैसे ही नारायन का नाम बड़े से बड़े पापों को भी क्षन भर में भस्म कर देता है
09:47यह वादविवाद यमदूतों और विश्वदूतों के बीच तीवर होता गया
09:52जहां धर्म के दो अलग-अलग सिधानतों का टकराव हो रहा था
09:56एक कर्म आधारित, दूसरा नाम आधारित
09:59अपनी शंकाओं के बावजूद यमदूतों ने अपने पाशों को कसकर पकड़ लिया
10:05यह स्पष्ट करते हुए कि वे अपनी कर्तव्यनिष्था से पीछे नहीं हटेंगे
10:11इसके विपरीट विश्णुदूत अपनी अटल शान्ती और दिव्य शक्ती के साथ खड़े थे
10:17उनकी चमक बढ़ती जा रही थी, जो धर्म के एक उच्चतर सत्य का प्रतीक थी
10:23यमदूतों के मन में धर्म के जटिल नियमों को लेकर एक सुक्ष्म संदेह घर कर रहा था
10:29जैसा कि उन्होंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था
10:34विश्नुदूतों ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ उन्हें धर्म के सार और नाम महिमा के गहरे रहसियों को समझाने की
10:41तयारी की
10:43विश्णुदूतों ने यमदूतों को संबोधित करते हुए अजामिल के जीवन के उन अस्सी वर्षों का विवर्ण देना प्रारंभ किया, जो
10:51पूर्णत है अधर्म और पाप में डूबे हुए थे
10:55अपने व्रिध ब्राहमन मातापिता और पतिवर्ता पत्नी को त्याग कर, अजामिल उस वेश्या के मोहपाश में ऐसा उलज्जा की उसका
11:04संपूर्ण अस्तित्व पाप का परियायर बन गया
11:06उस वेश्या की असीन भौतिक इच्छाओं की पूर्ती के लिए अजामिल ने अपने नित्य संध्यावंदन, अगनिहोत्र और पवित्र वेदपाठ का
11:16पूर्णत है परित्याग कर दिया
11:19धन अर्जित करने की तीवर लालसा में उसने प्राचीन बाजारों में छलकपट, जुआ और निश्पाप व्यापारियों को ठगने का घ्रेनित
11:27मार्ग चुन लिया
11:29धीरे-धीरे उसने क्रूर डाकूओं का एक गिरोह बनाया और घने जंगलों में यात्रियों पर प्राणधा तक आक्रमन करने लगा
11:38रात के अंधेरे में वह समरिध व्यापारी काफिलों पर घात लगा कर हमला करता और बिना किसी दया के उनका
11:45सारा धन लूट लेता था
11:58उसका पवित्र यग्योपवीत धूल में छिन्नभिन हो चुका था और जिस मस्तक पर कभी चंदन सुशोभित होता था वह अब
12:06धूल और रक्ट से सना रहता था
12:09जब भी अजामिल अपने शस्त्रागार से लैस साथियों के साथ गाउं की गलियों से गुजरता तो भैभीत ग्रामीन अपने द्वार
12:18बंध कर लेते थे
12:20वर्ष बीटते गए और अजामिल ने उस वेश्या से दस संतानों को जन्म दिया जिससे उसका सांसारिक मो और भी
12:28अधिक प्रगाड होता गया
12:30अपने विशाल परिवार के भरन पोशन के लिए उसने असहाय विध्वाओं और अनाथों की अंतिन जमापुंजी तक छीनने में संकोच
12:39नहीं किया
12:41दशकों के बीतने के साथ अजामिल धर्म के नियमों के प्रती पूर्णत अंधा हो गया और साधुसंतों का उपहास उड़ाने
12:49लगा
12:49उसने मार्ग किनारे बने पूजय शिवालियों को क्षती पहुचाई और रिशियों के धार्मिक यग्यों में विधन डालना अपना स्वभाव बना
12:58लिया
13:00उसके पाप कर्मों का भार इतना विशाल हो गया था कि उसके दुश्कृत्यों से संपूर्ण वातावर्ण में एक भारी और
13:07मलिन उर्जा चा गई थी
13:10उसका यवन धल गया और शरीर जुर्रियों से भर गया परन्तु उसके मन से लोग, वासना और अज्यानता का अंधकार
13:18तनिक भी कम नहीं हुआ
13:20पूरे असी वर्षों तक उसके मुख से न तो कोई पवित्र नाम निकला और नहीं उसके कठोर हृदय में धर्म
13:27का कोई विचार आया
13:30जीवन के संध्याकाल में वह अकूत अनैतिक संपत्ती के बीच रहता था, परन्तु भयानक दुस्वपन और आत्मिक अंधकार उसकी रातों
13:39की नींद छीन लेते थे
13:41उसके दस पुत्र भी उसी पापमई वातावर्ण में बड़े हुए, जो अपने ब्राह्मन पूर्वजों की महानता और मर्यादा से सर्वथा
13:50अनभिग्य थे
13:52सन्योगवश उसके सबसे छोटे और प्रिय पुत्र का नाम नारायन रखा गया था, जिसे वह केवल पुत्रमोह के कारण निरंतर
14:00पुकारता रहता था
14:01इस प्रकार विश्नुदूतों ने यमदूतों के समक्ष अजामिल के 80 वर्षों के अनवरत पाप चक्र का संपून आख्यान स्पष्ट रूप
14:10से प्रस्तुत किया
14:13विश्नुदूतों ने कहा कि अजामिल ने अपने जीवन में 80 वर्ष तक घोर पाप किये हैं, यह सत्य है, परन्तु
14:20अब हम आपको उसके उध्धार का कारण बताते हैं
14:25इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
14:32यह संसार अपने समस्ट जटिलताओं और कर्मफल के गहन चक्र के साथ एक ऐसी अग्रिश शक्ती से बंधा है, जिसकी
14:41महिमा का वर्णन कर पाना अत्यंत दुशकर है
14:45इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
14:52जन्ममर्ण के इस अनन्त माया जाल में भी एक ऐसा अविनाशी सेतु है, जो सभी पापों और बंधनों को क्षण
15:00भर में भस्म कर सकता है, वह है भगवान के पवित्र नाम की शक्ती
15:05इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
15:12अजामिल ने अपने प्रिय पुत्र के मोह में अन्जाने में ही सही उस परमपावन नाम नारायन का निरंतर उच्चारण किया,
15:20जो स्वय भगवान विश्नु का प्रत्यक्ष स्वरूप है
15:24इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
15:32यमदूतों की आखों में भ्रम और संदेह गहराया, मानों वे किसी अबूज पहेली को सुलजाने का प्रयास कर रहे हों,
15:39क्योंकि उनके विधान में पापों का क्षय केवल पश्चाताप और दंड से ही संभव था
15:44इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
15:53विश्नुदूतों ने धैर्यपूर्वक समझाया कि जैसे अगनी चाहे जानबूच कर जलाई जाए या अनजाने में छूली जाए, अपना दाहक स्वभाव
16:02नहीं त्याक्ती, वैसे ही हरिनाम भी अपना पापनाशक स्वभाव नहीं छोड़ता
16:07इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
16:15अजामिल ने भले ही पुत्रमोह में उस नाम का उच्चारण किया हो, पर उस शब्द की प्रक्तेक ध्वनी उस पवित्र
16:22नारायन की पुकार उसके अंतर्तम में संचित पापों के परवतों को जला कर भस्न करती रही
16:29इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
16:36यह केवल एक सन्योग नहीं था, अपितु स्वय भगवान की अहैतु की कृपा का विधान था कि अजामिल ने अपने
16:43सबसे छोटे पुत्र का नाम नारायन रखा और उसे अनवरत पुकारता रहा
16:49इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
16:56शास्त्रों में भी यह स्पष्ट वर्णित है कि हरी नाम का उच्चारण चाहे श्रधा से हो या अज्यानवश समस्त कलमशों
17:04का नाश करता है और मोक्ष का द्वार खोल देता है
17:09इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
17:16यमदूतों ने अपनी युक्ती प्रस्तुत्की की अजामिल का अभिप्राय अपने पुत्र को पुकारने का था न कि भगवान को आथ
17:24उसे नाम जब का फल कैसे मिल सकता है
17:28इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
17:35विश्नुदूतों ने द्रेड़ता से इस तर्प को खंडित करते हुए कहा कि नाम स्वय भगवान है उसका गुन किसी पुकारने
17:43वाले के अभिप्राय पर निर्भर नहीं करता अपितु अपनी अंतरनिहित शक्ती से कार्य करता है
17:50इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
17:57ठीक वैसे ही जैसे सूर्य का प्रकाश अंधकार को चीरता है चाहे कोई उसे देखना चाहे या अपनी आखें बंद
18:05कर ले हरी नाम की शक्ती भी प्रत्येक जीव के पापों को ऐसे ही हर लेती है
18:12इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
18:19अजामिल ने असी वर्षों तक जो भी पाप संचित किये थे वे सभी नारायन नाम के प्रत्येक उच्चारण से क्षीन
18:26होते गए और अंत्त उसके मृत्युकाल तक वह पूर्णत शुद्ध हो गया था
18:32इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
18:40यमदूतों के चहरे पर अब स्पष्ट अस्मंजस्था उनके कठोर नियम और विश्नुदूतों के तर्प के बीच वे अपने कर्तव्य और
18:48न्याय के प्रती द्वंदों में पड़ गए
18:50इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
18:58आथ विश्नुदूतों ने अपनी दिव्य शक्ती का प्रदर्शन करते हुए अजामिल के सुक्ष्म शरीर को यमदूतों के बंधन से मुक्त
19:06करने की तयारी की
19:08इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
19:15जैसे ही विश्नुदूतों की दिव्य उर्जा ने उसे स्पर्श किया
19:19अजामिल के सुक्ष्म शरीर ने असी वर्षों के बोज और दुख से मुक्ती का अनुभव किया
19:25मानो वह एक गहन निद्रा से जाग उठा हो
19:28इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
19:36उसने जीवन में पहली बार ऐसी शांती का अनुभव किया था
19:40एक ऐसी निर्मलता जो उसके पापों की काली चाया से सर्वता अन्भिग्य थी
19:45जैसे आत्मा ने अपनी वास्तविक पहचान पाली हो
19:49इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
19:57यमदूत जो अब तक अपने धर्म के अटल नियमों से बंधे थे
20:01इस असाधारन घटना को विस्मय और मौन स्विकृती के साथ देखते रह गए
20:07इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
20:15विश्नुदूतों ने अजामिल के शुद्ध सूक्ष्म शरीर को अपने साथ लेकर
20:19उसे दिव्य वैकुंठ धाम की ओर अनन्त प्रकाश और परमशांती की दिशा में अग्रसर किया
20:26इस पावन प्रसंद में सबसे छोटा पुत्र नारायन की महिमा का वर्णन किया गया है
20:3388 वर्ष की व्रिधावस्था में जरजर हो चुका अजामिल जीवन की अंतिम सांसे गिंता हुआ अपने जेन शेन कक्ष में
20:41शया पर असहाय पड़ा था
20:44जैसे ही उसके प्रान पखेरू उड़ने का समय समीप आया
20:48कक्ष का वातावर्ण अत्यंत ठंडा भारी और रहस्य में निस्तब्धता से भर गया
20:54कमरे के अंधियारे कोनों में यमलोग की काली चायाए फुसफुसाती हुई मंदराने लगी और समय की गती जैसे ठहर सी
21:02गई
21:04तभी काल के क्रूर दूतों के रूप में तीन भयंकर और विशाल का यमदूत अचानक उस कमरे में प्रकट हुए
21:12उन यमदूतों के विक्राल चेहरे, दरावनी चड़ी हुई लाल आखें और बिखरे हुए अगनिशिखा जैसे केश अजामिल के मन में
21:20थर्थरी पैदा कर रहे थे
21:23उनके हाथों में मोटे लोहे के कालपाश और कांटेदार भारी नागपाश थे, जो पापी जीव की आत्मा को बांधने के
21:31लिए तयार थे
21:33कक्ष का तापमान इतनी तेजी से गिरा कि सास लेना भी दूभर हो गया और अजामिल की द्रिष्टी में केवल
21:40भै का अंधकार चाने लगा
21:43पहले यमदूत ने अपनी भारी लोहे की जंजीर को हवा में लहराया, जिसकी भयानक खनकनाहट से पूरा घर कांप उठा
21:52दूसरे यमदूत ने अपने पैने पीले दान्त दिखाते हुए एक क्रूर अठास किया, जिससे अजामिल की बची-खुची चेतना भी
22:00लुप्त होने लगी
22:02तीसरे यमदूत ने पाश को सीधा अजामिल की ओर बढ़ाया ताकि उसके शरीर से सुक्षम प्राणों को बलपूर्वक खीचा जा
22:10सके
22:12मृत्यू के इस भयंकर प्रहार से अजामिल के हाथ पे ठंडे पढ़ गए और उसकी जड़ हुई काया सुन्न होने
22:19लगी
22:20गले में कफ और भय के कारण घुट्ती हुई सासों के बीच अजामिल बेबस होकर सहायता के लिए चारों ओर
22:28देखने लगा
22:29अपनी धुंधलाती आखों से उसने अंतिम उम्मीद में घर के बाहर खुले आंगन की दिशा में दृष्टी दोडाई
22:37आंगन में उसका सबसे छोटा और प्रिय पाँच वर्ष का पुत्र मासूमियत से अपने लकडी के खिलोनों के साथ खेल
22:45रहा था
22:46उस छोटे बालक का नाम भी नारायन था और उसकी एक जलक देखते ही व्रिध पिता का हृदय ममता और
22:54तीवर व्याकुलता से भर उठा
22:57जैसे ही यमदूतों ने पाँश को अजामिल की गरगन पर फैंकने के लिए हाथ आगे बढ़ाया अजामिल के सामने काल
23:04का विक्राल रूप पूरी तरह चा गया
23:07मृत्यू के अत्यंत भयानक भय से कापते हुए अजामिल ने अपने पुत्र को पुकारने के लिए सुखे होठों को बड़ी
23:14कठिनाई से खोला
23:17उसने अपनी बची हुई पूरी शक्ति लगा कर गले के रुंधे हुए स्वर में जोर से चिल्ला कर कहा नारायन
23:25नारायन
23:26वह मृत्यू की यातना से बचने के लिए गिड़गिडाते हुए बार-बार अपने पुत्र का नाम पुकारने लगा है नारायन
23:33मेरे पास आओ मुझे बचाओ
23:38अंजान में ही सही किन्तो भगवान के परम पवित्र नाम नारायन की वह पुकार पूरे ब्रहमांड की दिशा बदलने के
23:45लिए गूंजूठी
23:47अजामिल की विवश पुकार नारायन नाम की ध्वनी बनकर सुक्ष्म जगत में कमपन पैदा करती हुई
23:54समस्त लोकों को भेद कर सीधे वैकुंठ धाम के द्वार तक जा पहुँची
23:59उस पवित्र नाम के प्रभाव से ततकाल ही वैकुंठ लोक में भगवान विश्नु के पार्षद उनकी सेवा में लीन चार
24:07तेजस्वी दूतों को अजामिल के प्राणों की रक्षा का आदेश प्राप्थ हुआ
24:12शन भर में ही आकाश को चीरते हुए एक दिव्य प्रकाश पुंच प्रित्वी की ओरती वृता से अवतरित होने लगा
24:20जिसने समस्त वातावर्ण को एक स्वर्णिम आभा से भर दिया
24:24ठीक उसी पल जहां यमदूत अजामिल के सुक्षम शरीर को घसीट रहे थे उस स्थान पर चार अत्यंत तेजस्वी चतुर्भुज
24:33विश्नुदूत प्रकट हुए जिनकी आभा से अंधकार छंट गया
24:38उनकी उपस्थिती से यमदूत स्थब्ध रह गये उनके हाथों से अजामिल का सुक्षम शरीर खीचने का प्रयास रुकसा गया मानो
24:47समय थम गया हो
24:49विश्नुदूतों के नेत्रों में करुणा और द्रिड़ता का अध्भुत मिश्रण था और उनके होठोन पर हलकी सी मुस्कान थी जो
24:57उनके आगमन के उद्देश्य को सपष्ट कर रही थी
25:01उनके चार हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोगित थे जो उनकी अलौकिक शक्ती और भगवान विश्नु से उनके
25:10प्रत्यक्ष संबंध का प्रतीक थे
25:13यमदूतों ने अपने पाशों को कसने का प्रयास किया, लेकिन विश्नुदूतों ने तुरंथ हस्तक्षेप करते हुए अपने दिव्य प्रभाव से
25:21उनके हाथों को शिथिल कर दिया
25:24उनका तेज इतना प्रचंड था कि यमदूतों की आखों में चकाचौंध भर गई और वे अपने कर्तव्य को पूरा करने
25:32में स्वयंको असमर्थ पा रहे थे
25:36विश्नुदूतों में से एक ने गंभीर किन्तु शांत स्वर में यमदूतों को संबोधित करते हुए कहा
25:42हे धर्मराज के दूतों तुम इस आत्मा को क्यों खीच रहे हो
25:48यमदूतों के मुख पर प्रश्न चिन्ह उभर आया क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य में कभी ऐसी बाधा का सामना नहीं किया
25:56था
25:57एक यमदूतों ने हिम्मत जुटा कर कहा यह अजामिल पापी है इसने आजीवन घोर पाप किये हैं इसे यमलोक ले
26:05जाना हमारा धर्म है
26:09विश्नुदूतों ने धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनी और फिर एक अन्य दूत ने मंध हास के साथ कहा तुम्हारे नियम इस
26:16आत्मा पर लागू नहीं होते क्योंकि इसने अपने अंतिम ख्षणों में नारायन का नाम लिया है
26:24यम्दूतों ने हसी उड़ाई केवल नाम लेने से क्या कोई घोर पापी शुद्ध हो सकता है
26:30यह तो धर्म के नियमों का उलंगन है
26:34तब विश्नुदूतों ने उन्हें समझाया कि भगवान का नाम इतना शक्तिशाली है कि वह सभी पापों को अगनी की तरह
26:42भस्म कर देता है
26:43भले ही वह अंजाने में ही लिया गया हो
26:47उन्होंने नारायन नाम की महिमा का विस्तार से वर्णन किया
26:51बताया कि यह नाम ब्रहमाण के समस्त पापों का नाश करने में सक्षम है
26:58विश्नुदूतों ने यम्दूतों को चेतावनी दी कि वे भगवान के भक्तों और उनके नाम के आश्रय लेने वालों को स्पर्ष
27:05न करें
27:05क्योंकि वे यम्राज के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं
27:10इस स्पश्टीकरण और दिव्य शक्ती के प्रदर्शन से यम्दूतों के तर्क शिथिल पड़ गए
27:16और उन्होंने धीरे-धीरे अजामिल के सुक्षम शरीर पर अपनी पकड धीली कर दी
27:22विश्नुदूतों ने करुणा पूर्वक अजामिल के सुक्षम शरीर को अपने दिव्य सनरक्षन में ले लिया
27:28और वह अब भय और पाशों से मुक्त था
27:32निराश और विस्मित यम्दूत अपनी हार स्विकार कर शांत भाव से यमलोक की ओर लोट गए
27:38यह अभूत पूर्व घटना उनके मन में गहरे उतर गई थी
27:43यमलोक में प्रवेश करते ही यमदूतों का समूह जो कभी निर्भय और पराक्रमी था
27:50अब एक अप्रत्याशित हार और गहरी निराशा के बोज तले दबा हुआ
27:54अपने स्वामी यमराज के समक्ष नत्मस तक हो गया
27:59धर्मराज यम अपने विशाल सिनहासन पर विराजमान अपने दूतों के अभूत पूर्व नीरस मुखोटों और बिना किसी आत्मा के लोटने
28:07पर एक गहन रहस्यमे द्रिश्टी से उन्हे निहारा
28:12मुख्य यमदूत जिसके चहरे पर हार की छाया स्पष्ट थी
28:16उसने धीरे से अपने सिर उठाया और कापते हुए शब्दों में उस अभूत पूर्व घटना का वर्णन करना आरंभ किया
28:23जिसने स्वर्ग के नियमों को ही चुनौती दे दी थी
28:27उसने विस्तार से बताया कि कैसे चार अध्भूत तेजस्वी पुरुष अचानक प्रकट हुए जिनके शरीर से दिव्य प्रकाश ज़र रहा
28:36था और जिन्होंने अजामिल की आत्मा को लेने के उनके प्रयासों को द्रिड़ता से विफल कर दिया
28:43यमदूत ने सविस्तार वर्णित किया कि कैसे उन तेजस्वी विश्नुदूतों ने यमराज के अधिकारों को चुनौती देते हुए धर्म के
28:51स्थापित नियमों को नामजब की महिमा से परे बताया
28:55उसने यह भी बताया कि विश्णुदूतों ने कैसे स्पष्ट किया कि भगवान के पवित्र नाम का एक बार भी उच्चारन
29:03चाहे वह भैवश हो, अज्ञानतावश हो या मात्र संकेट से हो व्यक्ति के अंगिनत पापों को पूरी तरह भस्म कर
29:11देता है
29:13यमदूतों ने अजामिल के जीवन के दुशकर्मों को भी संक्षेप में सुनाया, यह बताते हुए कि कैसे उनके अनुसार वह
29:21सीधे नर्क के भीशन कष्टों का पात्र था, फिर भी नामजब की शक्ती से उसे मुक्ती मिल गई
29:28पूरी बात सुनने के बाद, यमराज ने एक गहरी सास ली, उनकी दिव्यद रिष्टी ने क्षण भर के लिए ब्रहमांड
29:35के रहसियों को भेद दिया और एक असीन ज्यान उनके चहरे पर प्रकाशित हो उठा
29:41उन्होंने समझा की नामजब का यह रहस्य केवल बाहरी कर्मों से परे हैं, यह आत्मा की आंतरिक शुद्धी और भगवान
29:49के प्रती प्रेम की पराकाश्था को दर्शाता है
29:53एक गहरी शान्ती और स्पष्टता के साथ यम्राज ने अपने दूतों की ओर देखा और उन्हें उस परम सत्य का
30:01बोध कराना आरंभ किया, जो उनके सीमित ज्यान से परे था
30:06उन्होंने समझाया की आत्मा मूल रूप से दिव्य और शुद्ध है, और पाप केवल अस्थाई आवर्ण है, जो सूर्य पर
30:14बादलों की तरह उसे ढख लेते हैं
30:18तब यमराज ने भगवान के नाम की महिमा का वर्णन किया, यह समझाते हुए कि कैसे पवित्र नाम की ध्वनी
30:25एक तीवर अगनी के समान है, जो अंगिनत जन्मों के पापों को क्षण भर में जला कर भस्म कर देती
30:31है
30:33इस गेहन व्याख्या के पश्चात, यमदूतों के चहरों पर ज्यान का प्रकाश फैल गया और उन्होंने अपने स्वामी की दिव्य
30:41अंतरग्रिष्टी को विनम्रता पूर्वक्स विकार किया
30:45उधर्क दिव्य हस्तक्षेप से मुक्थ होकर अजामिल का सूक्ष्म शरीर धीरे धीरे अपने भौतिक देह में लोट आया और उसने
30:53भय और भ्रम के उसक्षन को एक गेहन आत्मचिंतन में बदल दिया
30:58उसने अपने पाप पूर्ण जीवन की गहराई पर विचार किया जिसके कारण उसे मृत्यु के द्वार पर ऐसा भयावह अनुभव
31:07हुआ था और उसके हृदय में पश्चाताप की अगनी प्रजवलित हो उठी
31:12अजामिल के भीतर एक गहरा परिवर्तन आया उसके सभी सांसारिक आसक्तियों से विरक्ति उत्पन हुई और उसके मन में भगवान
31:21के प्रती तीवर भक्ती की लौजल उठी
31:24अपने पुराने पाप पूर्ण जीवन को पूरी तरहे त्याग कर अजामिल ने अपने परिवार और संपत्ती की मोहमाया को पीछे
31:32छोड़ दिया और आध्यात्मिक पत्थ पर चलने का द्रिड संकल्प लिया
31:37वह हरिद्वार की ओर निकल पड़ा जहां गंगा नदी के पवित्र तटों पर उसने अपने शेश जीवन को भगवान के
31:45नामों के निरंतर जप और गहन तपस्या में समर्पित करने का निश्चय किया
31:50गंगा के तट पर एक एकांथ स्थान में अजामिल ने कठोर तपस्या आरंभ की उसका मन पूरी तरह से भगवान
31:58विश्णु के पवित्र नाम के जाप में लीन हो गया
32:01अपने तपस्या की पराकाश्था पर अजामिल के समक्ष वही तेजस्वी विश्णुदूत पुनह प्रकट हुए जिनके दिव्यरूप से संपूर्ण वातावर्ण प्रकाशित
32:12हो उठा और उन्होंने उसे बैकुंठ धाम ले जाने की तैयारी की
32:17अपने उद्देश में विफल और अत्यधिक भ्रमित यमदूतों ने उस खाली स्थान को देखा जहा अभी कुछ क्षण पहले अजामिल
32:25था और उनके चहरे पर गेहन आश्चर्य और असहायता चा गई
32:31विश्णुदूतों के तेजस्वी प्रकाश और अजे शक्ती से पराभूत होकर वे यमदूत भयभीत और निरुत्तर खड़े रह गए उनकी आत्माओं
32:40में एक अप्रत्याशित हार का कड़वा स्वाद घुल गया
32:44अपनी हार स्वीकार कर बिना किसी आत्मा को पकड़े और अपने कर्तव्य से विचलित होकर क्रोध और निराशा से भरे
32:52यमदूतों ने यमलोक की ओर वापसी का मार्ग अपनाया
32:56अत्यन्त तीवरगती से यात्रा करते हुए वे भयभीत यमदूत अंत्य यमलोक पहुँचे और सीधे धर्मराज यमराज की भव्य सभा में
33:05प्रवेश किया जहां न्याय और कर्म का लेखा जोखा रखा जाता है
33:11विशाल का यमलोक में प्रवेश करते ही यमदूतों ने एक गेहन और गंभीर उर्जा का अनुभव किया जो समस्त वातावर्ण
33:19में व्याप्त थी जहां हर प्राणी अपने कर्मों के अनुसार न्याय का सामना करता है
33:26यमराज की भव्य सभा में जहां धर्मराज अपने सिनहासन पर विराज मान थे यमदूतों ने उनके चर्णों में जुपकर अपनी
33:35आखों में गहरी व्याकुलता लिये उस अभूत पूर्व घटना का विवर्ण प्रस्तुत किया
33:41यमदूतों ने अजामिल के जीवन उसके पापों और अंत्त विश्नुदूतों द्वारा उसे बैकुंथ ले जाने की पूरी कहानी अपने स्वर
33:49में आश्चर्य और निराशा घोल कर सुनाई
33:52उनकी बाते सुनकर यमराज के गंभीर मुखमंडल पर एक हलकी रहस्य में मुस्कान उभी जैसे वे पहले से ही उस
34:01दिव्य विधान को जानते थे जो घटित हुआ था
34:05धर्मराज ने अपने यमदूतों को शान्त होने का संकेत दिया और फिर अपनी द्रिष्टी समस्थ सभा पर डाली मानो एक
34:13गहन सत्य को उजागर करने की तयारी कर रहे हूँ
34:18उन्होंने धीर गंभीर स्वर में बोलना आरंभ किया उनके शब्द पूरे यमलोक में गूंच उठे और हर प्राणी के हृदय
34:25में सत्य की एक नई लहर दोड़ गई
34:29यमराज ने समझाया कि इस ब्रहमांड में केवल भगवान विश्णु ही परमसत्य, परम आत्मा और समस्थ स्रिष्टी के एक मात्र
34:37नियामक हैं, जिनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता
34:42उन्होंने आगे कहा कि भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण चाहे वह जानबूच कर हो या अंजाने में समस्थ पापों
34:50को भस्म करने की असीम शक्ती रखता है
34:54यमराज ने अजामिल का उदाहरन देते हुए बताया कि कैसे अपने पुत्र नारायन के नामों च्चारण ने अंतिम क्षण में
35:02उसे भीशन नार किये यातनाओं से मुक्ती दिला दी
35:06उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि जो व्यक्ती भगवान विश्नु का भक्त हो या उनके पवित्र नामों का निरंतर
35:14जब करता हो उसे कभी भी स्पर्ष न करें
35:18धर्मराज ने स्पष्ट किया कि श्री हरी के भक्तों को केवल वैकुन्थ दूत ही ले जा सकते हैं और यमदूतों
35:25का उन पर कोई अधिकार नहीं है
35:28उनकी बातों से यमदूतों की आत्माय प्रबुद्धो उठीन और वे समझ गए कि उनका कार्यक्षेत्र केवल उन पापियों तक सीमित
35:37है जो भगवान की महिमा से अनभिग्य है
35:42यम्राज ने पुनह दोहराया कि भगवान के नाम में इतनी शक्ती है कि वह बड़े से बड़े पापियों को भी
35:48शुद्ध कर सकता है यदि वे श्रद्धा पूर्वक उसे पुकारें
35:53समस्थ सभा में एक गहन शांती चा गई क्योंकि हर कोई इस परम रहस्य और दैविय न्याय के सिध्धान्त को
36:01आत्म साथ कर रहा था
36:03यम्दूतों ने श्रद्धा पूर्वक यम्राज को प्रणाम किया उनके मन में अब कोई संदेह नहीं था केवल भगवान विश्णू और
36:11उनके नामों की महिमा के प्रती असीम आदर था
36:15इस प्रकार यम्राज ने अपने सेवकों को धर्म के गूड रहस्यों और नाम महिमा के महत्व से अवगत कराया जिससे
36:23उनका ब्रहमांडिय कर्तव्य और भी सुस्पष्ठ हो गया
36:28जैसे ही अजामिल के प्राण उसके जरजर शरीर में पुनह प्रविष्ठ हुए उसने अपनी आखें खोली और मृत्यू के मुख
36:35से बच निकलने के विस्मय में वह तेजी से सांस लेने लगा
36:40अपने पास खड़े रोते हुए परिवार और अपने छोटे पुत्र नारायन को देखकर अजामिल के मन में अब सांसारिक मोह
36:48के स्थान पर एक तीवर वैराग्य और अलौकिक चेतना का संचार हो गया
36:54अपने जीवन के बीटे दशकों के पापों, मदिरापान और अपने ब्राहमनोचित धर्म के पतन को स्मरण कर अजामिल का हृदय
37:02आत्मगलानी और पश्चाताप की अगनी में जलने लगा
37:06एक पल की भी देरी किये बिना, उसने अपने बचे हुए जीवन को केवल भगवान श्रीहरी की भक्ती में समर्पित
37:14करने का अत्यंत ग्रिड संकल्प लिया
37:17अपने सांसारिक बंधनों और मुहमाया के पिंजरे को तोड़ कर अजामिल शांत कदमों से बिना पीछे मुड़े अपने घर की
37:25चोखट लांध कर बाहर निकल गया
37:28नंदे पैर कंकड पत्थरों और घने जंगलों से होते हुए अजामिल के मुख से निरंतर केवल वही नारायन नाम निकल
37:35रहा था जिसने उसे यमदूतों के पाश से बचाया था
37:40यात्रा करते करते वह परम पवित्र गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार पहुँचा जहां हिमालय की गोज से उतरती हुई मा गंगा की
37:48शीतल और अविरल धारा बह रही थी
37:52गंगा के तट पर एक एकांत और पवित्र शिला को चुन कर अजामिल ने स्वयं को स्थिर किया और कुशा
37:59के आसन पर पदमासन लगा कर बैठ गया
38:02अपनी इंद्रियों को बाहरी संसार से पूरी तरह समेट कर उसने प्राणायाम के माध्यम से अपने मन और प्राणों को
38:10भगवान विश्णु के चर्णों में एकागर करना प्रारंभ किया
38:15उसका मन जो कभी वासना और भौतिक इच्छाओं का दास था अब पूर्णता शुद्ध होकर भगवान क्रिश्ण की असीम और
38:23दिव्य लीलाओं के ध्यान में लीन हो गया
38:26अजामिल के अंतहकरण में भगवान नारायन के चतुर्भुज रूप की एक अत्यंत तेजस्वी और परम आनंदमई जहा की प्रकट होने
38:34लगी जिसने उसके समस्त्व संतापों को हर लिया
38:38जैसे जैसे दिन बीटते गए अजामिल का शरीर चीन होता गया परंतु उसके मुखमंडल पर ब्रहमतेज और अलौकिक कान्ती उत्तरोत्तर
38:48बढ़ती ही गई
38:50गंगाद्वार का वह संपूर्ण वातावर्ण उसके तब के प्रभाव से अत्यंत शांत और पवित्र हो गया यहां तक कि वन
38:57के पशुपक्षी धी उसके समीट शांती पूर्वक बैठने लगे
39:02जब उसकी तपस्या अपनी पराकाश्था पर पहुँची तब आकाश मार्ग से वही दिव्य और तेजस्वी विश्नुदूत एक दैविय और चम्चमाते
39:11स्वर्ण रत पर सवार होकर वहां अवतरित हुए
39:16विश्नुदूतों ने अपने परम सुन्दर और दयालू नेत्रों से अजामिल की ओर देखा, उनके हाथों में शंक, चक्र, गदा और
39:23पद्म सुशोभित हो रहे थे
39:26यह जानकर की उसका प्रित्वी पर समय पूरा हो चुका है
39:30अजामिल ने अत्यंत शांती और संतोश के साथ अपने भौतिक और नश्वर शरीर का त्याग कर दिया
39:37उसी क्षन अजामिल के भौतिक शरीर से एक अत्यंत दिव्य, प्रकाश्मान और वैकुंट के निवासियों जैसा चतुर्भुज आध्यात्मिक स्वरूप प्रकट
39:47हुआ
39:48दिव्य रूप धारी अजामिल ने परम आधर के साथ विश्नुदूतों को दंडवत प्रणाम किया, जिन्होंने उसे बड़े सने से उठाकर
39:57अपने साथ स्वर्ण रत पर बैठाया
40:00देवताओं द्वारा स्वर्ग से पुश्पवर्शा के बीच वह प्रकाशमान दिव्यरत वायुमंडल को पार करते हुए अनंत और चिन्मय आकाश की
40:09ओर तीवर गती से बढ़ने लगा
40:12इस प्रकार केवल एक बार अंजाने में लिए गए नारायन नाम के प्रभाव से शुद्ध होकर अजामिल ने सदास्दा के
40:20लिए परमधाम वैकुंट और शाश्वत मोक्ष प्रात किया
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