Skip to playerSkip to main content
इस अद्भुत एपिसोड में हम गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की भव्य गाथा का साक्षी बनेंगे! ✨ भागीरथ की कठोर तपस्या के बाद, भगवान शिव गंगा के प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में धारण करते हैं, जिससे देवी गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरती हैं। उनके पवित्र जल से कैसे राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों को मोक्ष मिलता है, और गंगा कैसे भारत की सबसे पवित्र नदी बन जाती हैं। भगीरथ का यह महान कार्य न केवल उनके पूर्वजों का उद्धार करता है, बल्कि मानव जाति को भी एक दिव्य वरदान देता है। इस एपिसोड में गंगा की अलौकिक यात्रा, जह्नु ऋषि से उनका संबंध और उनके पावन जल की महिमा का विस्तृत वर्णन है। यह गाथा हमें दृढ़ संकल्प, भक्ति और त्याग की शक्ति सिखाती है।

#गंगाअवतरण #भागीरथ #विष्णुपुराण #श्रीमहादेव #कपिलमुनि #सगरपुत्र #हिंदूगाथाएं #पौराणिककहानियां #अध्यात्म #धार्मिककथाएं #भारतकीसंस्कृति #गंगा #पुण्यनदी #देवभूमि #moksha
Transcript
00:00भागीरत की कठोर और अविचल तपस्या से सम्पून ब्रहमांड कमपायमान हो उठा जहां उन्होंने अपने पूर्वजों की मुक्ती के लिए
00:08देवताओं का आहवान किया।
00:10भागीरत की भक्ती से प्रसन्न होकर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा उनके समक्ष प्रकट हुए और उनकी निस्वार्थ इच्छा की
00:20सराहना की।
00:21पितामा ब्रहमा ने भागीरत को सचेत किया कि देवी गंगा का प्रचंड वेक केवल देवाधिदेव महादेवी अपनी जटाओं में धारन
00:30कर सकते हैं।
00:32ब्रहमा के परामर्ष पर भागीरत ने भगवान शिव को प्रसंड करने के लिए घोर हिंपात और तूफानों के बीच अपनी
00:40कठिन तपस्या पुनहा आरंब की।
00:43भागीरत की अटूट निष्ठा से द्रवित होकर कैलाशपती भगवान शिव ने प्रिथवी के कल्यान के लिए गंगा के तीवर वेक
00:51को अपने मस्तक पर रोकने की सहमती दी।
00:55स्वर्ग लोक में अपने असीम बल पर गर्व करती हुई देवी गंगा ने अहमकार पूर्वक प्रिथवी की और प्रस्थान करने
01:03की तयारी की।
01:05अचानक एक भयानत गर्जना के साथ देवी गंगा स्वर्ग के द्वारों को लांग कर प्रचंड जल्धारा के रूप में प्रिथवी
01:13की ओर तूट पड़ी।
01:15गंगा का वह विशाल और अनियंत्रित जल्प्रवाह देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आज सम्पूर्ण स्रिष्टी जल्मगन हो
01:23जाएगी।
01:24नीचे खड़े भागीरत भाय और विस्मय से भरे नेत्रों से उस महाविनाशकारी जल्धारा को अपनी और आते देख रहे थे।
01:34तभी कैलाश के सर्वोच शिखर पर खड़े महादेव ने गंगा के दर्प को चूर करने के लिए अपनी जटाओं को
01:41फैलाना प्रारंब किया।
01:43भगवान शिव के खोलते ही उनके घने केश आकाशमंडल में मेगों की भाती चारों और बिखर गए जो गंगा को
01:51बांधने के लिए तयार थे।
01:54गंगा ने अपनी पूरी शक्ती के साथ महादेव के मस्तक पर प्रहार किया। यह सोच कर कि वे शिव को
02:00भी अपने साथ बहा ले जाएंगी।
02:03परंतु जैसे ही गंगा का प्रचंड जल प्रवाह महादेव की जटाओं से टकराया, वह विशाल सागर पल भर में उनके
02:11केशों के चक्रवियों में समा गया।
02:14शिव की जटाओं में प्रवेश करते ही गंगा का सारा वेग समाप्त हो गया और वे उस अथा जाल में
02:21पूरी तरह से बंदी बन गई
02:24गंगा ने शिव के केशों के उस अनन्त चक्रवियू से बाहर निकलने का बहुत प्रयास किया किन्तु उन्हें कोई मार्ग
02:31नहीं सूज रहा था
02:33अपना अहंकार चूर-चूर होते देख देवी गंगा को महादेव की असीन महिमा और अपनी तुछता का आभास हुआ
02:42यह देखकर भागिरत चिन्तित हो गए और उन्होंने महादेव से प्रार्थनाकी की वे गंगा को मुक्त करें ताकि उनके पूर्वजों
02:50का उद्धार हो सके
02:53भक्त की करोन पुकार सुनकर क्रिपालु शिव मुस्कुराए और उन्होंने अपनी जटाओं का एक सिरा खोल कर गंगा को मार्ग
03:00दिया
03:01शिव की जटाओं से मुक्त होकर देवी गंगा अत्यंत शांथ पवित्र और कल्यानकारी धारा के रूप में धर्ती पर अफ्तरित
03:10हुई
03:11इस प्रकार भागिरत के महान संकल्प और महादेव की क्रिपा से गंगा का पावन जल पृत्वी की धरा को स्पर्श
03:19कर धन्य हो गया
03:21भगवान शिव की जटाओं से मुक्त होकर गंगा की पहली शीतल धारा हिमालय की उची चोटियों से बहती हुई प्रिथ्वी
03:28की पावन भूमी पर उत्री
03:31महादेव के इस परम अनुग्रह को देख कर राजा भागिरत ने उनके चर्णों में सिर जुका कर अनंत श्रद्धा और
03:38कृतग्यता प्रकट की
03:40अपनी यात्रा का आरंभ करते हुए भागिरत ने एक दिव्य शंक फूंका जिसकी गूंट से दिशाएं पवित्र हो गई और
03:48गंगा को आगे का मार्ग मिला
03:51शंक की मंगलकारी ध्वनी का अनुसर्ण करते हुए देवी गंगा एक शांथ और अत्यंत तेजस्वी धारा के रूप में पहाडों
03:59से नीचे की ओर बढ़ने लगी
04:02हिमाले की कंदराओं में तपस्या कर रहे रिशियों और मुनियों ने गंगा के आगमन पर मंत्रो चार और फूलों की
04:09वर्षा कर उनका स्वागत किया
04:12जैसे ही गंगा का पावन जल सूखी घाटी से गुजरा वहां की जुलसी हुई धर्ती पर हरीभरी वनस्पतिया और सुन्दर
04:20फूल खिल उठे
04:22अपने पूर्वजों के उध्धार की तीवर इच्छा लिये भागे रत अपने स्वर्णिम रत पर सवार होकर गंगा की धारा को
04:29मैदानी इलाकों की ओर ले चले
04:33स्वर्गलोग से देवताओं ने इस अध्भुत द्रिश्य को देखा और प्रित्वी पर बहती गंगा पर दिव्यपारिजात के फूलों की वर्शा
04:41की
04:42बहते भते गंगा की यह तीवर धारा महर्शी जहनु के पवित्र आश्रम के समीप पहुची जहां उनकी यग्यशाला स्थापित थी
04:51गंगा के प्रचन प्रवाह ने महर्शी जहनु के यग्यकुंड और उनकी कुटिया को जल मगन कर दिया, जिससे उनका ध्यान
04:59भंग हो गया
05:01अत्यंत क्रोधित होकर महर्शी जहनु ने अपनी योगिक शक्ती से गंगा की संपूर्ण विशाल धारा को एक ही घूंट में
05:08पी लिया
05:10गंगा को अद्रिश्य देखकर राजा भागिरत स्तब्ध रह गए और उन्होंने हाथ जोड कर महर्शी जहनु से गंगा को मुक्त
05:18करने की याचना की
05:20भागीरत की विनम्र प्रार्थना से प्रसन्न होकर दयालू महर्शी जहनू ने गंगा को अपने कान के मार्ग से पुनह पृत्वी
05:28पर प्रवाहित कर दिया
05:30इस प्रकार जहनों की पुत्री कहलाने के कारण गंगा का नाम जहनवी पड़ा और वे नए उच्साह के साथ आगे
05:37की यात्रा पर चल पड़ी
05:40अंत्र भागिरत गंगा को उस गहरे पाताल लोग की ओर ले गए जहां कपिल मुनी का आश्रम और राजा सगर
05:47के पुत्रों की भस्म स्थित थी
05:50उस अंधकार मई गुफा में प्रवेश करते ही गंगा की पवित्र तरंगों ने वहां फैली गहरी निरवता को भंग कर
05:57दिया
05:58जैसे ही गंगा के पावन जल ने राजा सगर के साथ हजार पुत्रों की भस्म को स्पर्ष किया, एक अलौकिक
06:05चमतकार घटित हुआ
06:08गंगा के सपर्ष मात्र से उन सभी साथ हजार राजकुमारों की आत्माएं पाप मुक्त होकर दिव्य जोती पुंज में परिवर्तित
06:16हो गई
06:17वे सभी दिव्य आत्माएं राजा भागीरत और मा गंगा को धन्यवाद देती हुई वैकुंठ लोक की ओर प्रस्थान कर गई
06:26भागीरत का यह महान भागीरत प्रयत्न सफल हुआ और ब्रहमाजी तथा भगवान विश्नु ने आकाश से उन पर आशिरवाद की
06:34वर्शा की
06:36महादेव की जटाओं से मुक्त होने के बाद राजा भागीरत ने परमिश्वर शिव को श्रधा पूर्वक नमन किया और मागंगा
06:44को प्रित्वी के कल्यान मार्ग पर ले जाने के लिए तयार हुए
06:49भागीरत अत्यंत उत्साह के साथ अपने दिव्य स्वर्ण रत पर सवार हुए और उसके तेजस्वी श्वेत घोडों की रास अपने
06:57हाथों में थाम ली
06:59स्वर्ग से उत्री मागंगा अपनी दिव्य लहरों को समेट कर भागीरत के रत के पीछे-पीछे चलने के लिए तत्पर
07:07हुई
07:08भागीरत का रत तीवर गती से आगे बढ़ा और उसके पहियों से निकलने वाली दिव्य प्रतिध्वनी से सम्पूर्ण प्रिथवी गूँझ
07:16उठी
07:18गंगा का शीतल और पवित्र जल भागीरत के रत के पच्चेहनों का अनुसर्ण करते हुए एक महाप्रवाह के रूप में
07:25बहने लगा
07:27सदियों से प्यासी और सूखी पड़ी धर्ती गंगा के स्पर्ष मात्र से त्रिप्थ हो गई और भूमी में पुनह नवजीवन
07:34का संचार होने लगा
07:36मार्ग में स्थित आश्रमों से निकलकर महान रिशियों और मुनियों ने वैदिक मंत्रो चार के साथ मा गंगा का भाव्भीना
07:44स्वागत किया
07:46कैलाश पर्वत की उचाईयों से देवाधिदेव, महादेव, अत्यंत प्रसंता के साथ गंगा के इस कल्यानकारी भूप्रवाह को निहार रहे थे
07:56जैसे जैसे रत आगे बढ़ता गया, शुष्क और बंजर घाटिया अचानक हरीभरी घास और लहलहाते व्रिक्षों से जीवन्थो उठी
08:05प्रित्वी के विभिन निक्षेत्रों को सिंचित करने के लिए मागंगा ने स्वयन को अनेक पवित्र उपधाराओं और सहायक नदियों में
08:13विभाजित कर लिया
08:15राजा भागेरत ने अपने दिव्य शंक को बजा कर समस्थ संसार को मा गंगा के प्रित्वी पर आगमन की मंगलमई
08:23सूचना दी
08:25ग्रामीनों और वनवासियों के मुख पर अपार हर्ष छा गया और वे गंगा के पावन जल में फूल और दीप
08:31अर्पित कर आरती करने लगे
08:45गंगा के जादूई प्रवाह ने प्राचीन उजड़े हुए नगरों और पवित्र तीर्थों को सपर्ष कर उन्हें पुनह आध्यात्मिक उर्जा से
08:53सराबोर कर दिया
08:55शीर सागर में शेशनात पर विराजमान भगवान विश्नू और देवी लक्षमी ने इस परमद्रिश को देखकर स्वर्ग से अपनी दिव्यमुस्कान
09:04बिखेरी
09:06घने और पवित्र जंगलों के बीच से बहती हुई गंगा की लहरें वहां के पशुपक्षियों के लिए अमरित के समान
09:13जीवन दाइनी सिध्ध हुई
09:16अंतह भागिरत का रत उस विशाल पूर्वी सागर के तट पर पहुँचा जहां सगर के पुत्रों की भस्न बिखरी हुई
09:23थी
09:24मा गंगा अत्यंत वेग के साथ महा सागर में विलीन हो गई जिससे सागर का खारा जल्भी परम पवित्र और
09:32मोक्षदाइनी बन गया
09:34देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने आकाश से इस अलोकिक द्रिश पर दिव्य पारिजात पुश्पों की वर्षा कर भागिरत की
09:42जैजैकार की
09:44सागर तट पर हाथ जोड़कर खड़े परम प्रतापी राजा भागिरत का नाम इस प्रित्वी पर गंगा को लाने वाले महानायक
09:52के रूप में युगो युगो के लिए अमर हो गया
09:56महासागर की ओर तीवर वेग से बढ़ती हुई पतितपावनी गंगा का प्रचन प्रवाह जब हरीभी घाटी को पार कर रहा
10:03था
10:04तब उनका मार्ग सीधे जहनवी प्रदेश के घने जंगलों की ओर मुड़ गया
10:08इसी शांथ तपोवन के मध्यपरम तपस्वी महरशी जहनू अपनी गंभीर समाधी में लीन थे
10:16जहां चारों और अलोकिक शांती और वेदमंत्रों की गूंज व्याप्त थी
10:21आश्रम के पवित्र प्रांगण में देवराज, इंद्रक और अन्य देवताओं को हविश्य प्रदान करने के लिए एक विशाल और दिव्यय
10:29यग्यकुंड धधक रहा था
10:31तभी मा गंगा का उफनता हुआ जल प्रचंड गर्जना के साथ महर्शी जहनु के शांत तपोवन की सीमाओं को लांग
10:39कर भीतर प्रवेश कर गया
10:41गंगा के अनियंतरित और तीवर वेगने पल भर में ही महर्शी जहनु के पवित्र यग्यमंडप को पूरी तरह से जलमगन
10:49कर दिया और उनकी सभी पूजा सामगरियां बहने लगी
10:54अपने यग्यमें इस अनपेक्षित विग्ण को देखकर महर्शी जहनु ने क्रोध में अपनी आखें खोली जिससे उनकी आखों से साक्षात
11:02रुद्र का तेज प्रकट होने लगा
11:05गंगा के इस अभिमान को चूर करने के लिए महर्शी जहनु ने अपने असीम योग बल और तपोबल का आहवान
11:13किया
11:14एक अत्यंत विस्मयकारी द्रिश में महर्शी जहनु ने अपनी अंजली में गंगा के अथा जल को समेटा और एक ही
11:22सास में उस पूरी नदी को पी गए
11:25देखते ही देखते विशाल और गर्जना करती हुई गंगा नदी प्रिथवी से लुप्थ हो गई जिससे पूरा मार्ग सूखा और
11:33वीरान दिखाई देने लगा
11:35गंगा को अचानक गायब देखकर रत पर सवार राजा भागीरत अत्यंत भैभीट और व्याकुल हो गए कि उनके पूर्वजों की
11:44मुक्ती का मार्ग अवरुद्ध हो गया है
11:47व्याकुलता में भागीरत तुरंत रत से उत्रे और सूखी नदी के मार्ग का अनुसर्ण करते हुए महर्शी जहनु के दिव्यत
11:55अपोवन में जा पहुँचे
11:57परमतपस्वी रिशी के समक्ष पहुँचकर भागीरत ने साश्टांग दंडवत प्रणाम किया और अश्रुपूर्ण नेत्रों से गंगा को मुक्त करने की
12:06प्रार्थना करने लगे
12:09भागीरत की पुकार सुनकर देवराज, इंद्र, देवर्शी नारद और अन्य देवता भी स्वर्ग से उतर कर महर्शी के आश्रम में
12:17उपस्थित हो गए
12:19देवताओं और उपस्थित रिशियों ने महर्शी जहनु के क्रोध को शांत करते हुए उनसे लोग कल्यान के लिए गंगा को
12:26पुनह जीवन देने का आग्रह किया
12:30देवर्शी नारद ने वीना बजाते हुए मधुरवानी में महर्शी को समझाया कि गंगा का अवतरण केवल सगरपुत्रों के उद्धार और
12:38जगत के कल्यान के लिए हुआ है
12:41देवताओं की प्रार्थना और लोग कल्यान की भावना को देखकर महर्शी जहनु का क्रोध पूरी तरह शांत हो गया और
12:49उन्होंने गंगा को अपनी पुत्री मान लिया
12:53महर्शी जहनु ने अपनी जंधा को चीर कर गंगा के पवित्र जल को पुना प्रित्वी पर प्रवाहित होने के लिए
12:59मार्ग प्रदान किया
13:02रिशी की जंगा से बाहर निकलने के कारण ही मा गंगा का नाम जाहनवी पड़ा और वे जहनु रिशी की
13:08दिव्य पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित हुई
13:12नवजीवन प्राप्त कर गंगा पुनह पूरे वेग से बहने लगी और राजा भागिरत शंकनाद करते हुए उनके आगे-ागे मार्ग
13:20दिखाने के लिए चल पड़े
13:23जाहनवी के इस पावन मिलन के बाद गंगा अब अपने अंतिन गंतव्य की और बढ़ चली जहां सगर के साथ
13:30हजार पुत्रों की भस्म उनका उद्धार होने की प्रतीक्षा कर रही थी
13:35भागिरत शंकनाद करते हुए उस विशाल दरार की ओर आगे बढ़े जो पाताल लोग के अंधकार में सामराज जिकादवार थी
13:45भागिरत के पीछे-पीछे मा गंगा का वेगवान और प्रचन प्रवाह पहाडों को चीरता हुआ पाताल की दिशा में मुर
13:52गया
13:53जब गंगा का जल पाताल के मार्ग पर बढ़ा तो संपूर्ण प्रित्वी उनके भारी वेग और गर्जना से कांप उठी
14:02पाताल के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर भागिरत ने अपनी पूरी शक्ती से शंक बजाया ताकि सोई हुई आत्माओं को
14:10मुक्ती का संदेश मिले
14:12स्वर्ग से उत्री गंगा अब एक दिव्य और अलोकिक जल प्रपात के रूप में पाताल की अनंत गहराईयों में उतरने
14:19लगी
14:21पाताल लोक का युगों पुराना अंधकार गंगा के श्वेत और दैदी प्यमान जल की दिव्य रोशनी से अचानक पूरी तरह
14:28मिट गया
14:30पाताल में रहने वाले नाग और अन्यप्राणी इस पावन और शीतल जलधारा को देखकर विस्मय और श्रद्धा से नत्मस्तक हो
14:38गए
14:39पाताल की जटिल और संकरी गुफाओं के बीच भागेरत बिना रुके लगातार आगे बढ़ते रहे और गंगा उनके पीछे पीछे
14:48चलती रही
14:49गंदा की विशाल लहरेंग पाताल की प्राचीन और कठोर चट्टानों से टक्रा कर उन्हें पवित्र करती हुई आगे बढ़ती जा
14:57रही थी
14:59अंतह वे उस परमशांत और गंभीर स्थान के समीप पहुँचे जहां कपिल मुनी की तपोभू में स्थित थी
15:07उस गुफा के केंद्र में महान रिशी कपिल मौन धारन किये हुए अत्यंत दिव्य और तेजस्वी मुद्रा में समाधिलीन बैठे
15:15थे
15:16कपिल मुनी के ठीक सामने राजा सगर के साथ हजार पुत्रों की विशाल भस्म की ढेरिया युगों से मुक्ती की
15:23प्रतीक्षा में बिखरी पड़ी थी
15:26अपने पूर्वजों की भस्म को देखकर राजा भागेरत ने अत्यंत भावुक होकर हाथ जोड़े और मा गंगा से उनके उध्धार
15:34की प्रार्थना की
15:36मा गंगा एक क्रिपालू माता की भानती ममतामई वेक के साथ सगर पुत्रों की भस्म की ओर तेजी से आगे
15:44बढ़ी
15:45जैसे ही गंगा के पावन जल की पहली बूंदों ने उस थंडी और निर्जीव भस्म का स्पर्ष किया वहाँ एक
15:52अलोकिक हलचल मच गई
15:55वह काली और शापित भस्म देखते ही देखते दिव्य और सुनहरे प्रकाश के पुंज में परिवर्तित होने लगी
16:03उस भस्म से सगर के साथ हजार पुत्रों की दिव्य आत्माएं अपने तेजस्वी और दैविय स्वरूप में प्रकट होने लगी
16:11मुक्त हुरी उन सभी दिव्य आत्माओं ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक मागंगा और अपने रक्षक भागीरत के सामने हाथ जोड़कर उन्हें
16:20नमन किया
16:22पाताल लोग के अंधकार से मुक्त होकर वे सभी साथ हजार दिव्य आत्माएं एक दिव्य प्रकाश पुन्च के रूप में
16:29स्वर्ग लोग की और प्रस्थान कर गई
16:33अपने पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त करते देख भागीरत की आखों से अश्रुबह निकले और गंगा पृत्वी तथा पाताल को पवित्र
16:41कर सदा के लिए वही स्थापित हो गई
16:44गंगा के पावन स्पर्ष से अपने पूर्वजों को सदा के लिए मुक्त देखकर राजा भागिरत का हृदय असीम संतोश और
16:53भक्ती से भर गया
16:55इसके बाद मा गंगा अपनी दिव्य लहरों को समेटते हुए पृत्वी के कल्यान के लिए आगे बढ़ने लगी ताकि वे
17:02सागर से मिल सके
17:05राजा भागिरत ने अपने शंक की तीवर ध्वनी से मा गंगा का मार्ग दर्शन किया और वे उनके पीछे-पीछे
17:12विशाल मैदानों की ओर बहने लगी
17:15गंगा के इस पवित्र जल के स्पर्श से सदियों से सूखी और बंजर पड़ी प्रिथवी अचानक हरीभी और अत्यंत उपजाओ
17:23हो गई
17:25सागर के किनारे स्थित अपनी कुटिया में गहरे ध्यान में लीन परम ज्यानी महर्शी कपिल ने इस दिव्यगटना को अपनी
17:32अंतरग्रिष्टी से जान लिया
17:35महर्शी कपिल अपनी कुटिया से बाहर आये और उनकी आखों में उस पावन नदी के स्वागत के लिए प्रसन्नता के
17:43आसु छलक उठे
17:45जैसे ही मा गंगा सागर के समीद पहुची उनकी गूंजती हुई लहरिंग अनंत महा सागर में विलीन होने के लिए
17:52मचल उठी
17:54तभी महा सागर के स्वामी वरुन देव अत्यंत आदर के साथ अपने विशाल स्वरूप में तरंगों के बीच से प्रकट
18:02हुए
18:03वरुन देव ने मा गंगा का स्वागत किया और अत्यंत विनम्रता पूर्वक उन्हें अपने विशाल हृदय में समाहित होने का
18:11निवेदन किया
18:12और फिर गंगा की पवित्रधारा और असीम महा सागर का वह अद्भुत मिलन हुआ जिससे पूरा ब्रहमांध हर्शित हो उठा
18:22जहां गंगा सागर से मिली वह पवित्रस्थान सदैव के लिए गंगा सागर कहलाया जो पृत्वी का सबसे पावन तीर्थ बन
18:30गया
18:32महर्शी कपिल ने गंगा सागर के इस पावन तट पर गंगा का पहला भव्य आर्ती पूजन संपन्न किया और मंत्रो
18:39चार से दिशाओं को गुंजाय मान कर दिया
18:43गंगा सागर के जल में घुटनों के बल खड़े होकर राजा भागिरत ने अपने पूर्वजों की त्रिप्ती के लिए अंतिन
18:50जलांजली अर्पित की
18:52स्वर्ग लोक से भगवान विश्णू ने गरुर देव पर विराजमान होकर भागिरत के इस असाधारन और अथक पुरुशार्थ को देखा
19:02भगवान नारायन ने अपने वरध हस्ट से भागिरत और मा गंगा को आशिरवाद दिया कि जो भी यहां स्नान करेगा
19:09वह सीधे वैकुंट को प्राप्थ होगा
19:13कैलाश परवत से भगवान शिव और माता पारवती ने भी इस पावन मिलन को देखा और भागिरत के अडिक संकल्प
19:20की प्रशनसा की
19:22स्वर्ग के समस्ट देवी देवताओं ने आकाश से गंगा सागर पर दिव्यकल्प वरिक्ष के फूलों की वर्शा की और दुन्दुभियां
19:30बजाएं
19:32मा गंगा ने स्वयन जल से प्रकट होकर भागिरत को वर्दान दिया कि वे कल्यव के अंत तक प्रित्वी पर
19:39मनुश्यों के पाप हरती रहेंगी
19:42भागिरत ने मा गंगा के इस पावन जल में डुबकी लगाकर अपने जीवन के इस महान और परम पवित्र यग्य
19:49को पूर्ण किया
19:51इस प्रकार राजा भागिरत का द्रिड संकल्प और गंगा की पवित्रता का यह संगम युगो युगो तक मानव जाती को
19:58मुक्ती का मार्ग दिखाता रहेगा
20:01जैसे ही भागिरत मा गंगा के पावन जल से बाहर आये, पूरी प्रिथवी ने एक नए जीवन, एक नए उर्जा
20:08और एक नए पवित्रता का अनुभव किया
20:11मानो युगों की प्यास शांत हो गई हो
20:15गंगा ने अपनी अलोकिक धारा के साथ प्रिथवी पर अपना मार्ग प्रशस्त किया
20:20उनकी गर्जनाकर्ती लहरेन संगीत बनकर हर कण में जीवन का संचार कर रही थी
20:26उनके प्रत्येक स्पर्श से धर्ती के बंजर भूभाग खिल उठे
20:31शुष्क नदिया जीवन से भर गई और प्रकृती ने एक अभूत पूर्व हरियाली धारन कर ली
20:38दूर दूर से लोग इस अध्भुत द्रिश के साक्षी बनने आये
20:42उनके चहरों पर विस्मय, श्रद्धा और कृतग्यता के भाव स्पष्ट जलक रहे थे
20:48रिशिमुनियों ने मंत्रो चार के साथ गंगा का स्वागत किया
20:52उनके भजन और स्तुतिया आकाश में गूंज उठीन, मानो स्वर्ग से भी देवी देवता उन्हें सुन रहे हूँ
21:00गंगा के पावन स्पर्ष से राजा सगर के साथ हजार पुत्रों की आत्माओं को ततकाल मुक्ती मिली और वे जोतिर्मय
21:08होकर मोक्ष की ओर अग्रसर हुए
21:11उनके जल को गंगा जल कहा गया, जो न केवल शरीर की शुद्धी करता है, बलकि आत्मा के गहरे से
21:18गहरे पापों का भी नाश करने में सक्षम है
21:22अनेक रोगी और पीडित लोग गंगा के जल में सनान कर शारिरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ती पा रहे थे,
21:29मानों उनका हर दुख जल में विलीन हो रहा हो
21:33गंगा ने अपने शीतल और पोशक जल से खेतों को सीचा, जिससे भारत की धर्ती अन्न से भर गई और
21:41हर घर में समरिद्धी का वास हुआ
21:44उनके किनारे पर बसे गाव और नगर फले फुले, उनकी धारा जीवन का आधार बनी और सभेताओं का उद्गम स्थल
21:52बन गई
21:53असंख्य भक्त और साधक गंगा के तट पर ध्यान लगाते, उनकी शांति पूर्ण उपस्थिती में उन्हें आध्यात्मिक उर्जा और आत्मिक
22:02शांती प्राप्थ होती थी
22:04वर्षों से चले आ रहे धार्मिक अनुष्थानों और मेलों का केंद्र गंगा का तट बन गया, जहां हर और भक्ती
22:11और उत्सव का माहौर होता था
22:15संध्याकाल में लाखों दीपों से जग्मगाती गंगा आरती का भव्यद्रिश स्वर्ग से उत्रे किसी उत्सव जैसा प्रतीत होता था, जहां
22:23प्रित्वी और आकाश एकाकार हो जाते थे
22:27गंगा को केवल एक नदी नहीं, बलकि एक मा के रूप में पूजा जाने लगा, जिन्होंने अपने प्रेम और उदारता
22:35से भारत की हर पीढ़ी को पोशित किया
22:38उनके तट पर अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल स्थापित हुए, जहां वर्ष भर श्रद्धालू मोक्ष की कामना से पवित्र डुप की
22:46लगाने आते थे
22:48समय के साथ गंगा भारत की सभ्यता और संस्कृती का अविभाज अंग बन गई, उनकी गाथा हर लोकगीट और काव्य
22:57में अमर हो गई
22:59उनकी विशाल धारा ने भारत के विभिन प्रांतों को जोड़ा, सांस्कृतिक विविध्टा को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्रिय एक्टा का
23:07प्रतीक बन गई
23:09सूर्य उदे से सूर्यास्त तक गंगा निरंतर प्रवाहित होती रही, युगो युगो तक मानव जाती को जीवन, मोक्ष और अनन्थ
23:17शांती प्रदान करती रही
23:20भागीरत का नाम गंगा के साथ अमर हो गया, हर बार जब भी कोई इस पवित्र नदी का स्मरण करता,
23:27तो उनके द्रिड संकल्प की गाथा भी गूंज उठती
23:31इस प्रकार गंगा भारत की जीवन रेखा बन गई, एक ऐसी दिव्य शक्ती जो सदियों से इस भूमी को अपनी
23:38पवित्रता और समरद्धी से सीचती आ रही है
23:43अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करने के पश्चात, राजा भगीरत ने कृतग्यता से भरे हृदय के साथ पवित्र गंगा के
23:51तट पर खड़े होकर हाथ जोड लिये
23:54गंगा मया ने जल के बीच से प्रकट होकर भगीरत को दर्शन दिये और उनके इस असाधारन त्याग की भूरी
24:02-भूरी प्रशन साकी
24:04स्वर्ग लोक से ब्रहमाजी और महादेव ने भगीरत के इस भगीरत प्रयतन को सफल होते देख उन पर दिव्य पुष्पों
24:11की वर्शा की
24:13वर्षों के कठिन परिश्रम और तपस्या के बाद राजा भगीरत ने अंत्ता अपने ग्रहराज अयोध्या की ओर प्रस्थान करने का
24:22निर्णय लिया
24:23जैसे ही अयोध्या की सीमाओं पर भगीरत के आगमन का समाचार पहुँचा, संपूर्ण राज्य में हर्ष और उत्सव का माहौल
24:32छा गया
24:33अयोध्या के भव्यद्वारों को सुनहरे गेंदे के फूलों, आम के पत्तों और जलते हुए दीपकों से सजाया गया ताकि उनके
24:41नायक का स्वागत किया जा सके
24:44अपनी प्रजा की जैजैकार के बीच, राजा भगीरत ने एक भव्यस्वन रत पर सवार होकर अयोध्या की सीमा में प्रवेश
24:52किया
24:54राजमहल के मुख्यद्वार पर राजपुरोहितों ने वैदिक मंत्रोच चार के साथ राजा भगीरत की आरती उतारी और उन्हें तिलक लगाया
25:04अयोध्या के राजसिनहासन पर उन्ह विराजमान होकर भगीरत ने अपने माथे पर प्रजा के कल्यान और धर्म की रक्षा का
25:12मुकुट धारण किया
25:14गंदा के आगमन के प्रभाव से अयोध्या की सूखी और बंजर भूमी फिर से हरीभी हो गई और चारों और
25:22समरिद्धी की लेहर दोड़ गई
25:24अपनी राजसभा को संबोधित करते हुए भगीरत ने कहा कि यदि संकल्प द्रिढ हो और उद्देश निस्वार्थ हो तो नियती
25:32को भी जुकना पड़ता है
25:35कुलगुरु वशिष्थ ने भगीरत को आशिर्वाद देते हुए घोशना की की उनका यह पुरुशार्थ युगो-युगो तक भगीरत प्रयत्न के
25:43रूप में स्मरण किया जाएगा
25:46देश के कोने-कोने से आय रिशियों और भक्तों ने गंगा के तट पर एकत्रित होकर पहली भव्य महा आर्ती
25:53का आयोजन किया
25:55राजा भगीरत ने गंगा के पावन तटों पर अनेक आश्रमों और मंदिरों का निर्मान करवाया, जिससे वह भूमी आध्यात्मिकता का
26:04केंद्र बन गई
26:06वर्षों तक न्याय प्रियता से शासन करते हुए भगीरत ने अपनी प्रजा को सुख, शान्ती और आध्यात्मिक संतोष प्रदान किया
26:15बैकुंठ लोग से भगवान विश्नु ने राजा भगीरत के इस महान कार्य को देखा और सूर्यवंश को अपना शाश्वत आशिरवात
26:23प्रदान किया
26:25राज्य के किसान लहलहाती फसलों को देखकर आनन्दित हो उठे जो गंगा मया के आशिरवात से प्रचुर मात्रा में उत्पन
26:34हुई थी
26:36अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में राजा भगीरत ने राजपाट अपने योग्य उत्तराधिकारी को सौंपकर गंगा तटपर तपस्या का मार्ग
26:45चुना
26:46भगीरत की पित्र भक्ती और समर्पन की यह अमर गाथा आज भी हर भारतिय के हृदय में कर्तव्य और त्याग
26:54की प्रेणा जगाती है
26:56इस प्रकार राजा भगीरत का यश गंगा की लहरों के समान अनंत काल तक बहता रहेगा जो कभी समाप्त नहीं
27:04होगा
27:06भगीरत के पश्चात सूर्यवंश के उत्तराधिकारियों ने गंगा की पवित्र लहरों की साक्षी में अयोध्या के सिनहासन को न्याय और
27:14धर्म का शाश्वत केंद्र बनाये रखा
27:17प्रतापी राजा नाभाग ने सूर्यवंश की गरिमा को नई उचाईयों पर पहुँचाया और गंगा तट पर भव्ययग्यों का आयोजन कर
27:25देवों को त्रिप्त किया
27:28राजा नाभाग के पुत्र परम वैशनव महाराज अंबरीश ने राजसी वैभव के बीच भी अपने मन को भगवान विश्नु के
27:36चरण कमलों में पूर्णत है समर्पित कर दिया
27:39महाराज अंबरीश ने गंगा के पावन तट पर एकादशी का कठोर व्रत धारन कर राज्य की सुक्समरिधी और आध्याक्मिक उन्नती
27:48के लिए प्रार्थना की
27:49इसी बीच अत्यंत क्रोधी और तेजस्वी महर्शी दुर्वासा अपने शिश्यों के साथ राजा अंबरीश की परीक्षा लेने के लिए उनके
27:58द्वार पर पधारे
28:01महर्शी दुर्वासा के भयंकर क्रोध के सम्मुख भी राजा अम्बरीश अटल और शांत बने रहे क्योंकि उनका रक्षक स्वय नारायन
28:09का सुदर्शन चक्र था
28:12भगवान विश्नों के सुदर्शन चक्र ने प्रकट होकर अपने तीक्षन और धधकते तेज से महर्शी दुर्वासा का पीछा करना प्रारंब
28:20कर दिया
28:21त्रिलोक में शरण नपाकर अंत्तह महर्शी दुर्वासा ने राजा अम्बरीश के चर्णों में गिरकर क्षमा मांगी जिससे वैशनव धर्म की
28:30विजय सिद्ध हुई
28:32पीढियों के चक्र में आगे चलकर राजा रितुपर्ण ने सूर्यवन्ष की कमान संभाली जो अपनी गणना विद्या और कुशल रत
28:40संचालन के लिए विख्यात हुए
28:43प्रतापी राजा सुदास ने अपने असाधारन, युद्ध कौशल और धर्म प्रायंता से सूर्यवन्ष की सीमाओं को सुरक्षित रखा और प्रजा
28:52का पालन पुत्रवत किया
28:54इस वन्ष के प्रत्येक राजा के लिए पतितपावनी गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि उनकी कुलदेवी और आध्यात्मिक चेतना का
29:03मुख्यस रोत थी
29:06तदोपरांत सूर्यवन्ष में राजा दिलीप द्वितिय का प्रादुर्भाव हुआ, जो अपने अदमे साहस, अपार विनमर्ता और धर्म के प्रती निष्ठा
29:14के लिए जाने जाते थे
29:17संतान प्राप्ती की कामना से राजा दिलीप और उनकी महारानी सुदक्षिना ने महर्शी वशिष्ठ के आश्रम में कामधेनु की पुत्री
29:25नंदिनी गाय की सेवा आरंभ की
29:28जब एक मायावी सिह ने नंदिनी पर आक्रमन किया, तब राजा दिलीप ने गाय के प्राणों की रक्षा के लिए
29:35स्वयंका शरीर सिन के आगे अर्पित कर दिया
29:39राजा दिलीप की इस निस्वार्थ भक्ती से प्रसन्न होकर नंदिनी गाय ने उन्हें एक परम प्रतापी और दिग्विजी पुत्र की
29:47प्राप्ती का वर्दान दिया
29:50उसी वर्दान के फल्स्वरूप राजा रघु का जन्म हुआ जिनके पराक्रम से इस महान वंश का नाम रघुवन्श के रूप
29:57में जगत में अमर हो गया
30:00महाराज रगु ने विश्वजीत यग्य संपन कर अपनी समस्थ संपत्ती दान कर दी, जिससे दानशीलता के क्षेत्र में उनका नाम
30:08सर्वोप्री हो गया
30:10राजा रगु के पुत्र अज ने सूर्यवंश की परंपरा को आगे बढ़ाया, जो अपनी कलात्मक रुची, न्यायप्रियता और शौर्य के
30:19लिए सराहे गए
30:21ततपश्चात महाराज दश्रत ने अयोध्या का शासन संभाला, जिनके रथकी गती दसों दिशाओं में अबाधित थी और जिनका यश देवलोग
30:30तक फैला था
30:31इस प्रकार गंगा के अवतरण से पुनीत हुआ सूर्यवंश निरंतर समरिध होता रहा, जो आगे चलकर स्वयम मर्यादा पुरुशोत्तम श्री
30:41राम के अवतार का साक्षी बना
30:44गंगा की पावन धारा ने अयोध्या की भूमी को सीच कर केवल भौतिक समरिध्धी ही नहीं दी, बलकि सूर्यवंश की
30:52आत्मा में भी शुद्धता और धर्मनिष्ठा भर दी
30:56पीधी दर पीधी, सूर्यवंशी राजाओं ने गंगा को अपनी प्रजा की जीवंदायनी और आध्यात्मिक प्रेणा का स्रोत माना
31:05स्वर्ग से प्रिथवी पर अवतरित हुई यह देवी नदी भारतियों के लिए मात्र जलधारा नहीं, अपितु एक जीवित्मा समान पूजनिय
31:13बन गई
31:15उसके अमरित्सम जल में स्नान करने से न केवल शरीर शुद्ध होता था, अपितु आत्मा भी पापमुक्त होकर मोक्ष की
31:23ओर अग्रसर होती थी
31:26भागिरत का अनुपम प्रयास, जिसके कारण गंगा प्रित्वी पर आई, एक शाश्वत गाथा बन गया जो पीधियों को कर्तव्य और
31:34निष्ठा का पाठ पढ़ाता रहा
31:37रिशियों और मुनियों ने गंगा के तटों पर अपने आश्रम स्थापित किये, जहां वे वेदों का अध्ययन करते और गेहन
31:44तपस्या में लीन रहते थे
31:47गंगा का प्रवाह मात्र जल का नहीं, अपितु संस्कृती, ज्यान और आध्यात मिक्ता का प्रवाह था जो पूरे भरतवर्ष में
31:55पैल गया
31:57देवताओं ने भी स्वर्ग से गंगा के प्रिथवी पर अवतरण को एक महान वर्दान माना, जो मानवता को पवित्रता का
32:04मार्ग दिखाता था
32:06यह पवित्र नदी प्रत्येक भारतिय के जीवन का अविभाज्य अंग बन गई, जन्म से मृत्यू तक के संस्कारों में उसका
32:14जल अनिवार्य था
32:16गंदा की क्रिपा से प्रिथवी पर धान और अनाज की फसले खूब लहलहाती, जिससे समरिध्धी और खुशाली का संचार होता
32:24रहा
32:26उसकी कलकल ध्वनी में प्राचीन मंत्रों का प्रतिध्वनी सुनाई देती थी, जो वातावर्ण को दिव्य उर्जा से भर देती थी
32:45युगो युगो तक गंदा ने अनेक राजाओं, संतों और साधारन मनुश्यों की कहानियों को अपने भीतर समेटा
32:54यह शाश्वत नदी सनातन धर्म के उन्मूलभूत सिध्धानतों का प्रतीक बनी, जो पवित्रता, त्याग और अटूट विश्वास पर आधारित है
33:16यह पावन नदी, जिसने सगर पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया, स्वय ही मोक्ष की राह बन गई
33:23उसकी निर्मलधारा ने प्रिथवी को धोकर पापों से मुक्त किया और उसे एक नई दिव्य उर्जा से भर दिया
33:32सोर्यवंश की पीढियां, जो गंगा के आशिर्वाद से पुनीत हुई, अपने धर्म और न्याय के लिए विख्यात होती चली गई,
33:40जो मर्यादा पुरुशोत्तम के आगमन की भूमिका थी
33:43इस प्रकार गंगा का अवतरण केवल एक घटना नहीं, अपितु एक महायग्य था जिसने पूरी सभ्यता को शाश्वत शुद्धी और
33:53प्रेणा प्रदान की
33:55आज भी गंगा अपने तटों पर उन असंख्य कहानियों और श्रद्धा को समेटे भारत की आत्मा बन कर बहती है,
34:03शाश्वत और अविनाशी

Recommended