Garuda Purana Episode 14 dives deep into the esoteric ritual of Sapindikarana. Discover how a wandering soul (Preta) transitions into a divine ancestor (Pitri) and what happens when this sacred rite is neglected. Learn about Pitri Dosha, the science of Pinda Daan, and the cosmic journey of the soul. #GarudaPurana #PitriDosha #GarudPuran #Afterlife #HinduMythology
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00:00व्रिशोत सर्ग महायग्य की परम महिमा को सुनकर देवराज पक्षीराज गरूर का हृदय अत्यन्त ग्रवित हो उठा और वे गहरे
00:08सोच में डूग गए
00:10परम प्रभुश्री हरी विश्नु की शरण में शीश जुका कर गरूर ने उस भयानक प्रेत योनी के विशय में अपनी
00:17गहरी शंका व्यक्त की
00:19गरुर ने अत्यंत विनीत स्वर में पूछा कि है मधुसूदन भटकती हुई प्रेट आत्मा आखिरकार किस प्रकार अपनी भयानक और
00:27कश्टकारी पहचान से सदा के लिए मुक्थ होती है
00:32उन्होंने उस भयानक प्रेट योनी का स्मरण किया जहां आत्माए भूख, प्यास और अंधकार में तड़पती हुई इस प्रतीक्षा में
00:40रहती है कि कब उनका उद्धार होगा
00:44गरूर का प्रश्न था कि वह कौन सा गुप्ट विधान है जो एक भयानक प्रेट को दिव्य, पूजनिय और शांत
00:50पूर्वज यानी पित्री में परिवर्तित कर देता है
00:55भगवान श्री हरी विश्नु ने गरूर की इस निस्वार्थ जिग्यासा को देख कर अपनी अत्यंत कोमल और दिव्य मुस्कान से
01:02पूरे ब्रहमांड को आलोकित कर दिया
01:06प्रभू ने कहा कि हे गरूर, तुमने मृत्यू लोग के कल्यान के लिए एक अत्यंत गुप्ट और कल्यानकारी रहस्य के
01:13बारे में पूछा है, जिसे सुनना परम पुन्यदाई है
01:18श्री विष्णू ने स्पष्ट किया कि जब तक अंतिन संस्कार के बाद एक विशेश गुप्ट अनुष्ठान नहीं किया जाता, तब
01:25तक जीवात्मा प्रेत योनी के घोर दुखों से कभी मुक्त नहीं हो सकती
01:31वह जीवात्मा आकाश और प्रित्वी के बीच एक त्रिशंकु की भांती बिना किसी आधार के लटकी रहती है, जहां उसे
01:39असहनिय यातनाई झेलनी पड़ती है
01:43तभी भगवान विश्णु ने उस महारहस्य में अनुष्ठान का नाम उजागर किया, जिसे शास्त्रों में सपिंडी करण श्राध के नाम
01:51से जाना जाता है
01:54भगवान ने समझाया कि सपिंडी करण वह परम सेतु है, जो प्रेत आत्मा के अस्तित्व को विलीन करके उसे पित्रिलोक
02:01के देवताओं में सम्मिलित करता है
02:05इस अनुष्ठान में मृत व्यक्ती के व्यक्तिगत अस्तित्व को उसके पूर्वज पिता, दादा और परदादा की आत्माओं के साथ हमेशा
02:13के लिए एक कर दिया जाता है
02:17पित्रिलोक में प्रतीक्षा कर रहे तीनों पीडियों के दिव्यपूर्वज अपनी बाहे फैलाए उस भटक्ती हुई आत्मा का स्वागत करने के
02:25लिए तत्पर रहते हैं
02:28विष्णु जी ने इस विधान की गुप्त क्रिया का वर्नन करते हुए बताया कि इसमें आटे या चावल के पिंडों
02:34का निर्मान किया जाता है जो स्थूल शरीर का प्रतीक हैं
02:40मुख्य रूप से चार पिंड बनाये जाते हैं एक प्रेट आत्मा के लिए और तीन अन्य पूर्वजों की तीन पीधियों
02:47के प्रतीक होते हैं
02:50मंत्रो चार के साथ कुशा घास और जल के छिड़काव से उन पिंडों को शुद्ध और जागरित किया जाता है
02:57जिससे उनमें आध्यात्मिक उर्जा का संचार होता है
03:02फिर एक अत्यंत रहस्यमे क्रिया में प्रेट के पिंड को तीन भागों में विभाजित करके उन्हें क्रमशह तीनों पूर्वजों के
03:10पिंडों में मिला दिया जाता है
03:13जैसे ही यह भौतिक मिलन संपन्न होता है, वैसे ही सुक्ष्म जगत में वह प्रेत आत्मा अपने भयानक रूप को
03:21त्याग कर एक परम तेजस्वी और शान्त रूप धारण कर लेती है
03:26वह नवीन रूप से मुक्थ हुई आत्मा अब स्वतंत रहोकर अत्यंत हर्ष के साथ अपने पूर्वजों के साथ मिलकर अनन्त
03:34शान्ती को प्राप्त करती है
03:37श्री हरी विष्णू ने अपने कथन को विराम देते हुए गरूर से कहा कि यह सपिंडी करण ही वह गुप्त
03:44कुंजी है जो मनुष्य को अकाल मृत्यू और प्रेत बाधा के कष्टों से सदा के लिए बचाती है
03:51भगवान विष्णू के वचनों को सुनकर परम ज्यानी गरूर ने अत्यंत विनमर्ता पूर्वक हाथ जोड़कर प्रित्वी पर मनुष्यों द्वारा किये
03:59जाने वाले सपिंडी करण विधान की सुक्ष्म प्रक्रिया के बारे में पूछा
04:05शीर सागर के शांत वातावर्ण में मंदमंद मुस्कुराते हुए श्री हरी ने सपिंडी करण के उस महान और अलौकिक रहस्य
04:12को प्रकट करना आरंभ किया जो प्रेत आत्मा की अंतिम मुक्ती का मार्ग प्रशस्त करता है
04:20नारायन ने समझाया कि इस कर्मकांड में योग्य ब्राह्मन द्वारामृत आत्मा और उसके तीन पूर्वजों के प्रतीक रूप में चार
04:28विशेश पिंड तैयार किये जाते हैं
04:31इन में से पहला पिंड उस नवम्रित प्रेत आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी अधूरी इच्छाओं और सांसारिक बंधनों
04:40के कारण अंधकार्मई और अशांत दिखाई देती है
04:44जबकि शेश तीन बड़े पिंड क्रमशह उसम्रित व्यक्ती के पिता, दादा और परदादा के पावन पित्री रूपों को दर्शाते हैं
04:52जो पित्री लोक में पहले से ही दिव्य प्रकाश में निवास कर रही हैं
04:58धरा पर बैठा हुआ उसम्रित आत्मा का जेश्ट पुत्र अत्यंत श्रद्धा और पवित्र हृदय से श्वेट वस्त्रधारन कर वेद मंतरों
05:07के उच्चारन के बीच इस अनुष्ठान को संपन्न करता है
05:11जब मुख्य आचार्य वेदों के अत्यंत प्रभावशाली और गुप्ट मंतरों का सस्वर गान करते हैं तो संपूर्ण वातावर्ण में स्वर्णिम
05:20तरंगें उत्पन्न होने लगती हैं
05:24इसके पश्चात पुत्र एक पवित्र कुशा घास के तिनके को हाथ में लेकर उस प्रत्पिंड को धीरे धीरे विभाजत करने
05:31की क्रिया आरंभ करता है
05:34पुत्र अत्यंत सावधानी पूर्वक उस प्रित्पिंड को तीन बराबर भागों में काट देता है जो इस बात का प्रतीक है
05:42कि आत्मा अब अपने सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए तयार है
05:48इस विभाजन के तुरंत बाद पुत्र मंत्रो चार के साथ प्रित्पिंड के उन तीनों हिस्सों को एक एक करके तीनों
05:56बड़े पित्रिपिंडों में विलीन करने लगता है
06:00जैसे ही प्रित्वी पर यह भौतिक मिलन पूर्ण होता है, वैसे ही सुक्ष्म जगत में एक अत्यंत विस्मयकारी और दिव्य
06:08घटना घटित होने लगती है
06:11वह भटकती हुई प्रेट आत्मा, जो अब तक अपने भयानक और क्षत्विक्षत रूप में पीडा से कराह रही थी, अचानक
06:19शांत होने लगती है
06:22दिव्य मंत्रों की शक्ती से उस प्रेट के शरीर से सारा अंधकार दूर हो जाता है और उसके स्थान पर
06:29एक अत्यंत उजजवल और देधी प्यमान प्रकाश फैल जाता है
06:34उस मुक्त आत्मा का रूप अब देवताओं के समान तेजस्वी हो जाता है, जिसके सिर पर एक सुन्दर किरीट और
06:41शरीर पर दिव्य आभूशन सुशोभित होते हैं
06:45उसी समय पित्रे लोग के विशाल द्वार खुलते हैं और वहां से तीन परमशान्थ और दिव्य पूरवज अपने इस नए
06:53वन्शच का स्वागत करने के लिए प्रकट होते हैं
06:57वे तीनों पूरवज हर्शित होकर अपनी भुजाए फैलाते हैं और उस नवीन मुक्त आत्मा को अपने परिवार के हिस्से के
07:05रूप में गले लगाने के लिए आगे बढ़ते हैं
07:10सपिंडी करन के प्रभाव से वह जीवात्मा सदा के लिए प्रेत योनी के कश्टों से मुक्त होकर पित्रों की श्रेनी
07:16में सम्मिलित हो जाती है
07:19भगवान विश्णू ने गरूर से कहा कि जो मनुष्य प्रिथवी पर अपने माता-पिता का यह विधान नहीं करते उनके
07:27पितर प्यास और भूख से तडपते हुए उन्हें शाप देते हैं
07:32यह परम पावन सपिंडी करण अनुष्ठान ही वह एक मात्र विधान है जो कुल को पित्रिदोश से बचाता है और
07:40वंश में सम्रिध्धी तथा शांती सुनिश्चित करता है
07:44श्री हरी के इन अम्रित वचनों को सुनकर गरूर का हृदय अगाध ज्यान से भर गया और उन्होंने स्रिष्टी के
07:51इस महान जीवन मृत्यू के चक्र को शक्षत नमन किया
07:56परमिश्वर श्री हरी विष्णू ने मंद मुस्कान के साथ गरूर को संबोधित करते हुए सपिंडी करण के उस गोपनियक्षन का
08:04वर्णन आरंभ किया जहां पिंडों का दिव्य विभाजन होता है
08:09भगवान ने बताया कि इस अनुष्ठान में कुष घास और काले तिलों से पवित्र की गई भूमी पर चार विशेश
08:16पिंडों का निर्मान अत्यंत श्रधा पूर्वक किया जाता है
08:20इन चार पिंडों में से प्रथम तीन पिंड क्रमशह पर लोग सिधार चुके पिता, दादा और परदादा यानी तीन पीढियों
08:28के पित्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं
08:31पहला पिंड साक्षात उस मित व्यक्ती के पिता का स्वरूप होता है, जो वासनाओं और सांसारिक बंधनों से मुक्थ होकर
08:40पित्री लोक में निवास करते हैं.
08:43दूसरा पिंड दादा का प्रतीक है, जिनकी आत्मा ज्यान और काल के चक्र को पार कर पित्रिग्णों के साथ शांती
08:51पूर्वक प्रतिष्थित हो चुकी है.
08:54त्रीतिय पिंड पर दादा के दिव्य अंश को दर्शाता है, जो अपने संचित पुनियों के प्रभाव से पित्रि लोक के
09:01उच्चतम सोपानों में स्थान प्राप्थ कर चुके हैं.
09:05चतुर्थ पिंड उस नूतन मृत आत्मा यानी प्रेट का होता है, जो अभी अभी इस नश्वर संसार को छोड़कर परलोक
09:13के द्वार पर खड़ी मुक्ती की प्रतीक्षा कर रही है.
09:17इस चौथे प्रेट पिंड को अन्य तीनों पिंडों से थोड़ा अलग रखा जाता है, जो यह दर्शाता है कि वह
09:24आत्मा अभी तक अपने पूर्वजों के दिव्य समाज में सम्मिलित नहीं हो पाई है.
09:31श्रीहरी ने समझाया कि यह चार पिंड केवल अन्य के गोले नहीं, बलकि संपूर्ण कुल की भौतिक और आध्यात्मिक वन्शानुगत
09:39उर्जा का साक्षात प्रतीक है.
09:42गरुर ने विस्मय से सुना जब भगवान ने रहस्योद घाटन किया कि ये तीनों पितर क्रमशय वसु, रुद्र और आधित्य
09:50देवताओं के आध्यात्मिक स्वरूपों में निवास करते हैं.
09:55पिता को वसु के रूप में, दादा को रुद्र के रूप में और परदादा को साक्षात आधित्य देव के रूप
10:01में पूछ कर ही जीव परमगती को प्राप्त करता है.
10:06तपश्चात मंत्रों चार के बीच एक पवित्रस्वर्ण या रजत्शला का उठाई जाती है, जिससे प्रेट्पिंड का अलौकिक विभाजन संपन होता
10:15है.
10:17मंत्रों की प्रचन शक्ती से अभिमंत्रित करके उस प्रेट्पिंड को अत्यंत सावधानी से तीन समान भागों में विभाजित किया जाता
10:25है.
10:27प्रत्पिंड के प्रथम भाग को पिता के पिंड में मिलाया जाता है, जिससे मृत आत्मा का अपने पिता की उर्जा
10:34से प्रथम मिलन और एकी करण होता है
10:38ततपश्चात दूसरे भाग को दादा के पिंड में विलीम किया जाता है जो उस आत्मा को वंश के गहरे आत्मिक
10:45धरातल से जोडता है
10:48और अंतिम तीसरे भाग को परदादा के पिंड में मिला दिया जाता है, जिससे वह नवमरित आत्मा अपने समस्त पूर्वजों
10:56के साथ पूर्णत है एकाकार हो जाती है
11:00इस प्रकार मधुक घी और काले तिलों से युक्त होकर, जब चारों पिंडों का यह भातिक और आध्यात्मिक मिश्रन पूर्ण
11:08होता है, तब स्रिष्टी में एक महा प्रिवर्तन घटित होता है
11:13जैसे ही यह दिव्य मिलन संपन्न होता है, प्रेत योनी के सारे कष्ट और तडप ततकाल समाप्थ हो जाते हैं
11:20और वह भटकी हुई आत्मा एक परम तेजस्वी पित्री में परिवर्तित हो जाती है
11:27अब वह नवनिर्मिक दिव्य पित्री सांसारिक बंधनों को तोड़ कर अपने पूर्वजों का हाथ थामे हुए अत्यंत प्रसन्ता से परम
11:35पावन पित्री लोग की ओर प्रस्थान करता है
11:39इस प्रकार भगवान नारायन ने स्रिष्टी के इस महान रहस्य में विधान को समाप्त किया और गरुर ने अगाद श्रद्धा
11:47से सिर जुका कर अपने प्रभु के श्रीचर्णों का ध्यान किया
11:52भगवान नारायन के मुख से स्रिष्टी के इस गहन रहस्य को सुनकर महाबली गरूर का हृदय असीम श्रद्धा और जिग्यासा
11:59से भर गया और उन्होंने अपने प्रभू की और एक गहन प्रश्न भरी द्रिष्टी से देखा
12:06प्रभू ने गरूर के आंतरिक भाव को भाम्पते हुए एक मधुर मुस्कान के साथ पुनह अपना दिव्य प्रवचन आरंभ किया
12:14क्योंकि वे जानते थे कि अभी भी अनेक गूड रहस्य अनावरित होने बाकी है
12:21भगवान बोले हे गरूर्त प्रेतत्व से मुक्ती के पश्चात आत्मा को पित्रिलोक में स्थाई स्थान दिलाने हेतु सपिंडी करण नामक
12:30एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधान है जो वन्ष परंपरा को अटूट बनाता है
12:36यह वह सूक्षम प्रक्रिया है जहां नवमरित आत्मा का प्रतिकात्मक शरीर जिसे पिंड कहते हैं पूर्वजों के साथ पूर्न रूप
12:45से एकीकृत किया जाता है जिससे वह वन्ष की दिव्यधारा में मिल जाती है
12:51इस विधान के प्रथम चरण में दिवंदत आत्मा के लिए एक विशेश पिंड तयार किया जाता है, जो पके हुए
12:59चावल, जौ और तिल के मिश्रन से बना होता है, उसकी अस्थाई देह का प्रती
13:05यह नया पिंड उस आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जो अभी अभी देह त्याग कर पित्रिलोक में प्रवेश की प्रतीक्षा
13:13कर रही है, अपनी व्यक्तिगत पहचान को धारण किये हुए
13:18ततपश्चात तीन और पिंड बनाये जाते हैं, जो क्रमश्य दिवंगत के पिता, दादा और परदादा यानी तीन पीढियों के पूर्वजों
13:26का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पहले ही पित्रिलोक में प्रतिश्ठित हैं
13:32यह संपूर्ण विधान अत्यंत पवित्र और विधिवत रूप से शुद्ध किये गए स्थान पर संपन्न होता है, जहां वैदिक मंत्रों
13:40की ध्वनी और धूप की सुगंध वातावर्ण को और भी दिव्य बना देती हैं
13:46एक कुशल पुरोहित मंत्रों का उच्चारण करते हुए, इन पिंडों को स्थापित करता है, जो प्रित्वी पर देवत्व और पित्रित्व
13:54के मिलन का आहवान करते हैं
13:57अब आता है सपिंडी करण का सबसे महत्वपून क्षन, जब नवनिर्मित पिंड को सावधानी पूर्वक सुनहरे या चांदी के धागों
14:06से तीन बराबर भागों में विभाजित किया जाता है
14:10ये तीन विभाजित अंश प्रतीकात्मक रूप से नई आत्मा के विभिन पहलूओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अब पित्री वंश
14:19में समाहित होने के लिए तैयार है
14:22फिर इन प्रत्येक छोटे अंश को अत्यंत श्रद्धा और विधान के साथ तीन प्रमुख पित्री पिंडों में से एक एक
14:30में मिलाया जाता है, जिससे चार पीढियों का अभूत पूर्व मिलन होता है
14:36यह शारिरिक मिलन केवल एक प्रतीकात्मक क्रिया नहीं है, अपितु यह आत्माओं के उर्जावान और सुक्ष्म स्तर पर गेहन एकी
14:45करण का परिचायक है
14:47इस पवित्रक्षन में दिवंगत आत्मा की व्यक्तिगत पहचान उर्वजों के सामुहिक चेतना सागर में धीरे-धीरे विलीन हो जाती है,
14:56जैसे नदी सागर में मिलती है
14:59इस प्रकार वह भटकी हुई आत्मा अब मात्र एक पित्री नहीं, अपितु वंश के गौरवशाली इतिहास का एक अभिन्द और
15:08सशक्त हिस्सा बन जाती है, जिसे सपिंड कहा जाता है
15:13गरुर भगवान के एक एक शब्द को आत्म साथ करते हुए, अपनी आखों के सामने इस दिव्य मिलन की सुक्ष्म
15:20जामिती को जीवन्थ होते हुए महसूस कर रहे थे
15:24नारायन ने आगे बताया कि इस एकी करण से न केवल दिवंगत आत्मा को शान्ती मिलती है, बलकि वन्षज भी
15:32अपने पित्रों के अक्षोना आशिर्वाद से धन्य होते हैं
15:37सपिंडी करण के माध्यम से वन्ष की आध्यात्मिक शक्ती नवजीवन प्राप्त करती है, समस्त नकारात्मक उर्जाएं समाप्त होती है और
15:46परिवार शुद्ध होता है
15:49इस विधान का परम उद्देश केवल आत्मा को मोक्ष दिलाना नहीं, अपितु जीवित वन्षजों के लिए शान्ती, समरिध्धी और पित्रों
15:57के आशिर्वाद से परिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करना भी है
16:02इस प्रकार भगवान नारायन ने सपिंडी करन के इस गेहन विधान का रहस्योद घाटन किया, जिसे सुनकर गरूर ने अगाद
16:10श्रधा से पुनह अपने प्रभु के श्रीचर्णों में सिर जुका दिया, कृतग्यता से भर उठे
16:17भगवान श्री हरी विष्णू के मुख मंडल पर अचानक एक गंभीर और चेतावनी पूर्ण भाव उभराया, जब उन्होंने गरूर को
16:25सपिंडी करन न करने के भयानक परिनामों के बारे में बताना आरंभ किया
16:31श्री नारायन ने कहा कि मृत्यू के पश्चात एक वर्ष की अवधी वह संधिकाल है, जहां जीवात्मा अपने अंतिम गंतव्य
16:39की प्रतीक्षा में अत्यंत सुक्ष्म रूप में ब्रहमांड में स्थित रहती है
16:45यदि एक वर्ष के भीतर उस मृत्य आत्मा के निमित सपिंडी करन संसकार संपन्न नहीं किया जाता, तो वह जीवात्मा
16:53सदैव के लिए पित्रिलोक के पावन मार्ग से वंचित हो जाती है
16:58सपिंडी करन के अभाव में वह जीवात्मा अत्यंत भयानक और कश्टकारी प्रेत योनी में परिवर्तित हो जाती है, जो कि
17:06स्रिष्टी की सबसे अंधकार में और दुखद अवस्था है
17:11वह अत्रिप्ट प्रेत आत्मा अनंत अंतरिक्ष के उस भयावा और बर्फीले शूने में भटकने लगती है, जहां न तो सूर्य
17:19का प्रकाश है और नहीं सांत्वना की कोई किरण
17:24असहनिय भूक और प्यास से व्याकुल होकर, जब वह प्रेत जल पीने का प्रयास करता है, तो उसके पूर्व कर्मों
17:31और इस उपेक्षा के कारण वह जल तक्षन खौलते हुए रक्त या राख में बदल जाता है
17:38भूक की अगनी से जलते हुए, वह दुखी आत्मा ब्रहमांड के उस मौन सन्नाटे में अपनी चीखों से हाहाकार मचाती
17:46है, परंतु उसकी पुकार सुनने वाला वहां कोई नहीं होता
17:51भगवान विश्णू ने गंभीर स्वर में आगे कहा कि जब यह आत्मा अपने ही रक्त संबंधियों द्वारा इस प्रकार त्यागी
17:58जाती है, तो उसका अगाध दुख अत्यंत उग्र क्रोध में परिवर्तित हो जाता है
18:05क्रोधित और अत्रिप्थ होकर वह अद्रिश प्रेत आत्मा अपने पूर्व प्रिथवी लोग के घर वापस लोटती है और अपने उन
18:13जीवित वंशजों पर अपनी द्रिष्टी डालती है, जिन्होंने उसे भुला दिया
18:19उस भूखी और असंतुष्ट आत्मा की उपस्थिती से उस परिवार में पित्री दोश का उदे होता है, जो पूरे घर
18:26को एक भारी और नकारात्मक उर्जा से ढख देता है
18:31इस दोश के प्रभाव से परिवार के सदस्य अचानक अज्यात बीमारियों, मानसिक अशान्ती और आपस में तीवर कलेश का अनुभव
18:40करने लगते हैं, जिससे ग्रिहस्थी का सुख नश्ठ हो जाता है
18:45पीढियों से संचित समरिध्धी और धन धीरे-धीरे नश्ठ होने लगता है, मानो कोई अद्रिश्य शक्ती उनके समस्त पुनियों और
18:53भौतिक लाभों को सोख रही हो
18:56अपनी इस निरंतर दुर्गती से भयभीत होकर, वे पीडित वन्शज अंता मार्ग गर्शन की खोज में एक अत्यंत ज्यानी और
19:04तेजस्वी वैदिक आचार्य के पास पहुँचते हैं
19:09वह ज्यानी आचार्य अपने तपोबल और दिव्य द्रिश्टी से यह जान लेते हैं कि इस परिवार के पूर्वज सपिंडी करण
19:17न होने के कारण प्रेत योनी में अत्यंत कष्ट भोग रही हैं
19:22भगवान नारायन ने गरूर को सपष्ट किया कि जब तक मृत आत्मा प्रेत योनी में तड़पती रहेगी तब तक देवताओं
19:30की कोई भी पूजाया यग्य उस परिवार को सुख नहीं दे सकता
19:35वह प्रेत आत्मा अद्रिश्य लोक से अश्रु बहाते हुए केवल एक बार श्रधा पूर्वक दिये जाने वाले पिंड और जल
19:42के लिए तरसती है जो उसे इस घोर कष्ट से मुक्ती दिला सके
19:48प्रभु के इस अत्यंत मार्मिक और भयानक सत्य को सुनकर गरूर की विशाल आखे करुणा और विस्मय से भर गई
19:55और उन्होंने मानव जाती की अज्ञानता पर दुहक व्यक्त किया
20:01नारायन ने समझाया कि पित्री दोश कोई शाप नहीं अपितु परिवार के उस तूटे हुए आध्यात्मिक बंधन का प्राकृतिक परिणाम
20:09है जिसे केवल सपिंडी करण ही पुन्ह जोड सकता है
20:14यदी समय रहते इस भूल को सुधार कर सपिंडी करण विधान किया जाए तो वह पीडित प्रेत तुरंत उस अंधकार
20:22में योनी से मुक्थ होकर दिव्यपित्री रूप धारन कर लेता है
20:27इस प्रकार भगवान आदिपुरुष ने गरूर को चेतावनी दी कि किसी भी मनुष्य को अपने पूर्वजों के इस संक्रमन का
20:35लीन संसकार में कभी भी विलंब या उपेक्षा नहीं करनी चाहिए
20:40भगवान नारायन ने गरूर के संशय को दूर करने के लिए अपनी दिव्यद्रिष्टी प्रदान की जिससे यमलोक और भूलोक के
20:48बीच का गुप्त संबंध प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा
20:51उस ब्रह्मान दिय द्वार के पार यमराज का अत्यंत भयावः और अंधकार में सामराज्य दिखाई दिया जहां चारों और जलते
21:00हुए अंगारे घनाधुआ और त्राहित्राही करती आत्माओं की करोन पुकार गूंज रही थी
21:06उस अंधकार के बीच एक पीडित प्रेट आत्मा भारी और दहक्ती हुई लोहे की सांकलों से बंधी हुई थी जिसे
21:14यमराज के विक्राल दूत निर्दैता पूर्वक खींच रहे थे
21:19उसी क्षण भूलोक पर एक पवित्र वेदी के समक्ष बैठा हुआ श्रधावान पुत्र अपने मृत पिता की आत्मा की शांती
21:27के लिए सपिंडी करन संसकार आरंभ करता है
21:31वेद मंत्रों के घोश के बीच पुरोहित ने चावल और काले तिल से बने चार पिंड तयार किये जिन में
21:39से तीन पित्रों के और एक नवम्रित प्रेट आत्मा का प्रतीक था
21:44पुत्र ने अपने कमपकमपाते हाथों से उस छोटे प्रेट पिंड को उपर उठाया, जो यमलोक में तडप रहे उसके पूर्वज
21:52के अंतिम उध्धार का एक मात्र साधन था
21:56जैसे ही प्रिथवी पर मंत्रो चार तीवर हुआ, यमलोक की उस भयावह गुफा में एक तीवर दैविय कमपन उत्पन हुआ,
22:04जिससे वहां की काली दीवारें हिलने लगी
22:08पुरोहित ने सृष्टी के परम नियामक विधान का स्मरण करते हुए, वह महामंत्र पढ़ा जो आत्मा को प्रेत योनी के
22:15बंधनों से मुक्त कर पित्रि लोक का मार्ग खोलता है
22:19मंत्र की समाप्ती पर पुत्र ने पवित्र कुशा घास की पत्ती से उस प्रेत पिंड को तीन भागों में विभाजित
22:26कर दिया, जो प्रेत योनी से आत्मा के विच्छेद का प्रतीक था
22:31फिर उसने उन तीनों हिस्सों को एक एक करके तीनों बड़े पित्री पिंडों में विलीन कर दिया, जिससे परिवार की
22:39तूटी हुई आध्यात्मिक श्रिंखला पुनह जुड़ गई
22:42प्रित्वी पर पिंडों के मिलते ही, यज्यवेदी से एक अत्यंत तीवर और अलौकिक स्वर्णिम प्रकाश का विस्फोट हुआ, जिसने पूरे
22:51वातावर्ण को पावन कर दिया
22:54वही स्वर्णिम प्रकाश यमलोक की गहरी सीमाओं को भेद कर उस बंदी आत्मा के पास बिजली की गती से पहुँच
23:01गया
23:03प्रकाश के स्पर्ष मात्र से यमदूत स्तब्ध रह गए और उनके हाथों से भयानक अस्त्रशस्त्र स्वतह ही धर्ती पर गिर
23:10पड़े
23:12शन्भर में उस जीवात्मा को जक्डे हुए यमलोक के वजर जैसे भारी और तपते हुए लोहे के बंधन पिघल कर
23:19हवा में विलीन हो गए
23:21प्रेत आत्मा का वह पीडित अंधकार्मय और भयानक रूप धीरे धीरे पिघलने लगा और उसकी जगह एक अत्यंत शांत और
23:30तेजस्वी आकरिती उभरने लगी
23:33पूर्वज की आत्मा के चहरे पर युगों की पीडा के स्थान पर अब परम संतोश और असीन कृतग्यता के भाव
23:40चमक रहे थे
23:42यमराज के दूतों ने विस्मय और आदर से अपने सिर जुका लिए क्योंकी यमलोग का नियम अब परमेश्वर के परम
23:49विधान के सामने नत्मस्तक हो चुका था
23:53पूर्णतह मुक्त होकर वह आत्मा एक परम तेजस्वी चतुर्भुज दिव्य पित्री के रूप में परिवर्तित हो गई जो चम्चमाते श्वेत
24:01वस्त्रों और दिव्य आभूशनों से सुशोभित था
24:05स्वर्ग से एक दिव्य चम्चमाता हुआ स्वर्णिन विमान नीचे उत्रा जिसे देवदूत हाक रहे थे ताकि उस पावन पित्री को
24:13ससम्मान पित्रिलोक ले जाया जा सके
24:17भगवान श्री हरी ने गरोर को प्रेम पूर्वक देखते हुए कहा कि जो मनुष्य श्रधा से सपिंडी करण करता है
24:24वह न केवल अपने पूर्वजों को बलकी स्वयन को भी भवसागर से पार लगाता है
24:31भगवान श्री हरी ने गरूर की ओर मुस्कुराते हुए देखना आरंभ किया और पित्री लोग के उस परम गुप्ट विधान
24:38को उजागर किया, जो तीन दिव्य देवगणों के अधीन संचालित होता है
24:44श्री हरी ने बताया कि सपिंडीकरन संसकार के माध्यम से पित्री परमपरा की प्रथम पीधी अर्थात पिता का स्वरूप स्वय
24:52अश्टवसों के पावन स्वरूप में लीन हो जाता है
24:57अंतरिक्ष के स्वर्णिम धरातल पर अश्ट वसु प्रकट हुए, जिनकी शांत और सौमय आभामंडल ने नवदिव्य रूप धारण किये हुए
25:05पित्री का आत्मीता से स्वागत किया
25:08भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि जब प्रित्वी पर पुत्र द्वारा प्रथम पिंड अर्पित किया जाता है, तो वसुगण उसे
25:16ग्रहेन कर पित्री आत्मा को स्थिर्टा और अमर शक्ती प्रदान करते हैं
25:22तत्पश्चात श्री हरी ने द्वितिय पीधी का रहस्य प्रकट करते हुए कहा कि पितामह अर्थात दादा का स्वरूप एकादश रुद्रों
25:30के रूप में प्रतिश्थित होता है
25:34दिव्य व्योम में ग्यारह तेजस्वी रुद्र अपने त्रिशूल और भस्न से सुशोगित रूप में अवतरित हुए जिनकी प्रचंड उर्जा से
25:42संपूर्ण अंतरिक्ष आलोकित हो उठा
25:45इन एकादश रुद्रों के अमोग प्रभाव से आत्मा के संस्कार और भी पवित्र हो जाते हैं तथा वह पित्रि लोग
25:53के उच्छतर मंडलों की ओर गती प्राप्त करती है
25:57गरूर को रहस्य बताते हुए विश्नु जी ने कहा कि तीसरी पीधी अर्थात प्रपितामह का रूप द्वादश आदित्यों के परम
26:05तेजस्वी प्रकाश में एकाकार होता है
26:09आकाश गंगा के सर्वोच शिखर पर बारह आदित्य सूर्य के समान प्रचंड और परम पावन प्रकाश बिखेरते हुए प्रकट हुए
26:17जिनका तेज कोटी सूर्यों के सम्तुल्य था
26:21ग्वादश आदित्यों ने अपने दिव्यकिर्णों से उस मुक्त आत्मा को परम ज्यान और अमर्ता का ऐसा वर्दान दिया जिससे वह
26:29काल के प्रभाव से मुक्त हो गया
26:32पक्षियों के राजा गरूर ने भगवान हरी के इस अग्भुत विधान को सुनकर भक्तिभाव से अपने दोनों पंक सिकोड लिये
26:39और उनके चर्णों में शीश नवाया
26:42श्री हरी ने आगे कहा कि जब भी प्रिथवी लोग पर योग्य वन्षज तीन पिंडों को मिलाकर एक पिंड बनाते
26:50हैं तब वसु, रुद्र और आदित्य एक साथ कार्य करते हैं
26:56अंतरिक्ष में वसुओं की शांती, रुद्रों की शक्ती और आदित्यों का तेज मिलकर एक त्रिकोनिय दिव्य उर्जाक्षेत्र का निर्मान करने
27:04लगे
27:05उसी समय देवदूतों द्वारा संचालित वह स्वर्णिम विमान नवनिर्मित दिव्य पित्री को लेकर इस त्रिविध देव मंडल के समीप आ
27:14पहुँचा
27:15अश्टवसूों ने आगे बढ़कर नवपित्री के गले में वैजन्ती और पारिजात के अमर फूलों की महक्ती हुई माला अर्पित की
27:24एकादश रुद्रों ने अपने त्रिशूल के अग्रभाग से पवित्र भस्म लेकर उस आत्मा के मस्तत पर तिलत लगाया और उसे
27:32असीम आध्यात्मिक बल दिया
27:35ग्वादश आधित्यों ने सूर्य किर्णों से निर्मित एक दिव्य स्वर्णिम मुकुट उस पित्री के सिर पर सजाया जिससे उसके समस्त
27:43मृत्यू लोग के कष्ट मिट गए
27:46अब वह साधारन आत्मा पूर्ण रूप से एक अमर दिव्य पित्री बनकर पित्री लोग के सिनहासन पर विराजमान होने के
27:53योग्य हो गई
27:55भगवान नारायन ने गरूर से कहा कि इस गुप्त विधान को जानने वाला मनुश्य अपने कुल की तीन पीधियों का
28:02उद्धार कर मोक्ष की राह खोलता है
28:06संपूर्ण ब्रहमांड में वसू, रुद्र और आदित्य की जैजैकार होने लगी और प्रित्वी से लेकर वैकुंठ तक एक स्वर्णिम प्रकाश
28:14की धारा प्रजवलित हो उठी
28:17यह सुनकर पक्षीराज गरुर ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा कि है प्रभु यदि किसी मनुश्य की मृत्यू किसी सुदूर देश
28:25में हो जाए या उसका शरीर पंच्चतत्वों में विलीन होकर नश्ट हो जाए तो उसका उध्धार कैसे होता है
28:33गरुर ने कहा कि हे जनारदन यदि किसी का मृत शरीर हिंसक पशुओं द्वारा खा लिया जाए गहरे समुदर में
28:41डूब जाए या दावानल में भस्न हो जाए तो उसके दाहसंसकार के बिना वह आत्मा कैसे मोक्ष प्राप्त कर सकती
28:48है
28:49भगवान श्रीहरी नारायन ने मंदमंद मुस्कुराते हुए अपने परम भक्त गरुड की ओर देखा और उनके हृदय की इस परम
28:57करुणा को देखकर अत्यंत प्रसंद हुए
29:01जगत के पालनहार ने कहा कि हे खगेश्वर सनातन धर्म में कोई भी जीव अनाथ नहीं है और ऐसी विशम
29:09परिस्थितियों के लिए शास्त्रों में प्रतिनिधी संसकार का परम कल्यानकारी विधान बताया गया है
29:16भगवान ने बताया कि प्रिथवी पर उत्पन्न हुई पवित्र कुशाधास साक्षाक मेरे रोमों से उत्पन्न हुई है जिसमें ब्रहमांड की
29:24समस्थ पवित्र शक्तियां समाहित है
29:28इस विशेश विधान में 360 कुशाके तिनकों को मिलाकर मानव शरीर की अस्थियों और जोडों का प्रतीक रूप बनाकर एक
29:36पुतला तयार किया जाता है
29:39उस पुतले के सिर के लिए नारियल, छाती के लिए गीली मिट्टी और अंगों के लिए कुशाकी डालियों का प्रयोग
29:47कर उसे पूर्ण मानव रूप दिया जाता है
29:51ततपश्चात उस कुशपुतली पर यव के आटे का लेप लगाया जाता है और उसे शुद्धगी तथा उनी धागे से लपेट
29:59कर मृत आत्मा के शरीर का साक्षात प्रतिरूप माना जाता है
30:04फिर पुरोहित पवित्र वैदिक मंत्रों के उच्चारन द्वारा उस कुशपुतली में उस्खोई हुई आत्मा के प्राणों और चेतना का प्रतिकात्मक
30:12रूप से आवाहन करते हैं
30:15इस प्रकार तयार किये गए प्रतिनिधी शरीर को चंदन की लकडियों पर स्थापित किया जाता है
30:21मानो वह उस मृत मनुष्य का वास्तविक भौतिक शरीर ही हो
30:26इसके बाद मृत आत्मा के संबंधी पूरी शरधा के साथ उस कुशपुतले को अगनी समर्पित करते हैं
30:34जिससे पवित्र लप्टें आसमान की ओर उठने लगती है
30:39जैसे जैसे वह कुशशरीर अगनी में विलीन होता है
30:42वैसे वैसे उस सुदूर देश में भटक रहे जीव के सारे पाप और प्रेट योनी के बंधन भस्न होने लगते
30:49हैं
30:51भगवान विश्नु ने कहा कि इस प्रतिनिधी दाह संसकार से उस जीव को वही गती और परंपुन्य प्राप्थ होता है
30:59जो गंगा तटपर किये गए वास्तविक अंतिन संसकार से मिलता है
31:04इस गुप्त यग्य की पूर्णता देखकर उस कुल के पित्रिलोक में निवास करने वाले पूर्वज अत्यंत प्रसन्न होकर स्वर्ग से
31:12आशिरवाद और पुष्पों की वर्षा करने लगते हैं
31:17यमराज के दूट जो उस भटकी हुई आत्मा को प्रेत रूप में बांधने आये थे
31:22इस पवित्र दाह को देखकर अपने पाश खोल कर आदर पूर्वक पीछे हट जाते हैं
31:28वह पीडित और असहाय आत्मा अब एक दिव्य, प्रकाशमान और अत्यंत सुन्दर देवस्वरूक शरीर धारण कर लेती हैं
31:37जिसके चारों और एक स्वर्णिम आभा चमकने लगती हैं
31:42वह मुक्ट आक्मा मंद पवन के जोकों के साथ आकाश मार्ग से होती हुई सीधे स्वर्गिय पित्र लोक की ओर
31:49आनंद पूर्वक प्रस्थान करती हैं
31:53भगवान की इस परम दयालुता और जीवों के प्रती प्रेम को जानकर गरुड के नेत्र आसों से भर गए और
32:00उन्होंने नारायन के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया
32:05श्रीहरी ने अपने वर्दहस्थ से गरुड को उठाकर आशीश दिया और कहा कि यह स्रिष्टी न्याय और परम करुणा के
32:12शाश्वत नियमों पर ही संचालित होती है
32:16इस प्रकार वैकुंठ धाम में प्रतिनिधी विधान का यह दिव्य और गुप्त रहस्य स्थापित हुआ
32:22जिसने संसार के हर असाय जीव के लिए मोक्ष का द्वार खोल दिया
32:27तब गरुड ने उन अश्रुपूर्ण नैनों में भी एक नई आशा और गेहन जिग्यासा लिए
32:33विनमर्ता से पूछा कि किस प्रकार ये गूड विधान प्रेट आत्माओं को उनके अंतिम बंधनों से मुक्त कर परम पूर्वज
32:41के रूप में स्थापित करते हैं
32:44श्रीहरी ने मंदमंद मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि यह विधान केवल दान और प्रतिनिधी क्रियाओं से पूर्ण नहीं होता
32:52अपितु इसमें ध्वनी की अद्रिश शक्ती का भी समावेश होता है जो आत्मा के सूख्ष्म आवरणों को भेदन करती है
33:01भगवान ने स्पष्ट किया कि इस गूर प्रक्रिया का चरम बिंदु सपिंडी करन कहलाता है जहां प्रेट आत्मा हो पित्रि
33:09लोग के द्वार खोलने हेतु दिव्य मार्ग मिलता है
33:13उन्होंने समझाया कि सपिंडी करन का मूल उद्देश प्रेट अवस्था को भं करना और आत्मा को उसके पूर्वच स्वरूप में
33:21विलय करना है जिससे वह मोक्ष की दिशा में अग्रसर हो सके
33:26इस अनुष्ठान में विशिष्ट पिंड दान, तरपन और अनेक प्रकार की दिव्य सामगरी का उपियोग होता है जो प्रेट आत्मा
33:34के सुक्षम शरीर को शुद्ध कर उसे नए आयामों में ले जाने में सहायक होती है
33:40फिर श्रीहरी ने सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डाला वे पवित्र मंत्र जिनकी गूंच स्वय वैकुंठ धाम में भी एक
33:49अग्रिश्य उर्जा तरंग उत्पन करती है जो सीधे आत्मा के अस्तित्व को स्पर्श करती है
33:56भगवान ने बताया कि ये मंत्र केवल शब्द नहीं अपितू ब्रह्मांडिय स्पंदन है जो पंच तत्वों को भेद कर आत्मा
34:04के सबसे गहरे स्थरों तक पहुँचते हैं जहां उसकी पहचान की जड़े छिपी होती है
34:11जैसे ही मंत्रों चार का स्वर गूंचता है वैकुंट के दिव्यवातावर्ण में एक अद्वितिय उर्जा का कमपन उत्पन होता है
34:19जो हर दिशा में फैल कर प्रेट लोग की सीमाओं को भेदता है
34:25इन मंत्रों की सुक्ष्म तरंगे प्रेट आत्मा के चारों और लिप्टे अग्यान और मोह के आवर्ण को धीरे-धीरे विख्टित
34:32करने लगती हैं जैसे सूर्य की किरने घने कोहरे को चीर देती हैं
34:38प्रत्येक मंत्रो चार के साथ अहं के वे अंतिम सुक्ष्म आवर्ण जो आत्मा को उसके भौतिक अस्तित्व से बांधे रखते
34:46हैं, एक एक करके तूटने लगते हैं, मानो एक प्राचीन दीवार धै रही हो
34:52यह आत्मिक उर्जा का तीवर प्रवाह आत्मा के भीतर एक गेहन शुद्धिकरन आरंभ करता है, जिससे वह अपने पार्थिव बंधनों
35:01से मुक्थ होकर एक नई दिव्य चेतना की ओर उन्मुक होती है
35:07प्रेट आत्मा, जो अब तक मोह और दुहक के जाल में फंसी थी, मंत्रों की शक्ती से एक तीवर आंतरिक
35:14उथल पुथल का अनुभव करती है, जैसे किसी गहरे स्वपन से जागरित हो रही हो
35:20यह प्रक्रिया धीरे-धीरे आत्मा को उसके पूर्व जन्मों के कर्मफल के भार से मुक्त करती है, जिससे वह अपने
35:28वास्तविक स्वरूप को पहचानने और स्विकार करने के लिए तयार होती है
35:34जैसे ही अंतिम आवर्ण तूटता है, प्रेट आत्मा का रूप विख्टित हो जाता है और उसके स्थान पर एक शुद्ध
35:41प्रकाश्मय बिंदु प्रकट होता है, जो अब किसी बंधन में नहीं है
35:47यह प्रकाश्मय बिंदु धीरे-धीरे एक अधिक परिश्कृत अर्धदैविय स्वरूप में ढलने लगता है, जो धीरे-धीरे उपर की ओर
35:56उठने लगता है, जैसे नवजात कमल जल से निकलता है
36:01जैसे ही आत्मा उपर उठती है, वह अपने सभी पार्थिव लगाव और सांसारिक इच्छाओं को पीछे छोड़ देती है, अपने
36:09अस्तित्व के शुद्ध दिव्यसार को अपनाती हुई
36:14ततपश्चात आत्मा अपने वास्तविक पूर्वज स्वरूप को पहचानती है, अपने गोत्र और कुल की दिव्य चेतना के साथ एक हो
36:22जाती है, पित्रि लोग के विशाल आकाश में विलीन होने के लिए
36:27इस विलय के क्षण में आत्मा एक दिव्य पूर्वज के रूप में स्थापित होती है, जो अब अपने वन्षजों को
36:34आशीश और सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम है
36:39भगवान की इस गहन व्याख्या को सुनकर गरुर का हृदय कृतग्यता और विस्मय से भर गया, उन्होंने अनुभव किया कि
36:47किस प्रकार यह ब्रहमांडिय न्याय प्रत्येक जीव के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है
36:54श्रीहरी ने अपनी दिव्यवानी में अन्त में कहा कि यह विधान केवल मंत्रों और क्रियाओ का संग्रह नहीं, अपितु भक्ती,
37:02श्रध्धा और सही कर्म की त्रिवेनी है, जो आत्मा को परम शांती प्रदान करती है
37:09भगवान श्रीहरी अपनी शांत दिव्य आभासे प्रकाशित गरुड की ओर मुर्ते हैं, उनके नेत्रों में अनंत ज्यान की गहराई जलकती
37:17है, जैसे वे ब्रहमांड के गुप्त रहस्यों को खोल रहे हूँ
37:22गरुड अपने गुरु की वानी से मंत्रमुग्ध होकर, उनकी प्रत्येक शिक्षा को अपने हृदय में गहराई से अंकित कर रहे
37:30थे, जैसे एक प्यासा यात्री जीवंदाईनी जलक रहेन करता है
37:35ठीक उसी क्षन प्रित्वी पर सपिंडी करन संसकार अपने अंतिम और सबसे पवित्रक्षनों में प्रवेश कर रहा था, जहां श्रधा
37:44और भक्ती का संगम एक अदरिश्य उर्जा को जागरित कर रहा था
37:49मंत्रों की शक्ती और अगनी की पवित्रता से प्रेरित होकर प्रेत योनी में फंसी आत्मा ने एक तीवर सुखद कमपन
37:57महसूस किया, जैसे कोई प्राचीन बंधन तूट रहा हो
38:02अगनी में समर्पित अंतिन पिंडाहुती के साथ ही प्रेत योनी के सभी बंधन एक जटके में तूट गए, जिससे आत्मा
38:10को मुक्ती की अध्भुत अनुभूती हुई
38:13जैसे ही अंधकार के परदे हटे, आत्मा का स्वरूप एक शुद्ध, तेजस्वी प्रकाश पुंज में परिवर्थित हो गया, जो अब
38:21अपनी वास्तविक दिव्य प्रकृती को प्रकट कर रहा था
38:25वह अब एक प्रेट नहीं, अपितु एक तेजस्वी पितर था, जिसकी उपस्थिती में एक अगाध शान्ती और शक्ती का अनुभव
38:34हो रहा था
38:35पितर अपने वन्शजों की ओर मुड़कर मौन रूप से अपने आशिरवाद और सुरक्षा की उर्जा प्रवाहित करता है, जो प्रिथवी
38:44पर उनके परिवारों तक पहुँचती है
38:48प्रिथवी पर मौजूद वन्शज अचानक एक अद्रिश्य गर्माहट और शान्ती की अनुभूती करते हैं, जैसे किसी दिव्याहाथ ने उन्हें चूलिया
38:57हो, जिससे उनके हृदय कृतज्यता से भर उठते हैं
39:02उसी क्षण आकाश में एक शान्दार स्वर्गिय मार्ग खुल जाता है, जो शुद्ध प्रकाश से बना है, पित्रिलोक की और
39:10जाने वाले मार्ग का संकेत देता है
39:13दिव्य प्रकाश के इस मार्ग को देखकर, नवमुक्त पितर एक गहरी आंतरिक प्रसन्नता के साथ अपनी स्वर्गारोहन यात्रा आरंभ करता
39:23है
39:24वह धीरे-धीरे उपर उठता है, अपने पीछे प्रित्वी के सांसारिक बंधनों को छोड़ता हुआ, एक नई दिव्य वास्तविट्टा की
39:33ओर अग्रसर होता है
39:36वैकुंठ में भगवान श्रीहरी और गरुड इस दिव्य आरोहन के साक्षी बनते हैं, उनके नेत्रों में ब्रह्मांडिय संतुलन और न्याय
39:44की महिमा झलकती है
39:47आत्मा स्वर्गिक पर्तों से गुजरती है, प्रत्येक्षन और अधिक उजडवल और शुद्ध होती जाती है, जैसे वह उच्चतर लोकों के
39:56प्रकाश को अवशोशित कर रही हो
39:59वह तारों भरे आकाश गंगाओं और सुक्ष्म ब्रह्मांडिय धूल के बीच से निर्बाध रूप से यात्रा करती है, अपनी अंतिन
40:07गंतव्य की ओर बढ़ती हुई
40:09अन्य परोपकारी देवगण स्वर्ग के उच्च लोकों से इस पवित्र आत्मा के आरोहन को अनुमोदन और सम्मान की द्रिष्टी से
40:18देखते हैं
40:20अंतहक पित्रि लोक के द्वार एक शांदार स्वर्णिम चमक से जगमगाते हुए आत्मा के लिए खुल जाते हैं, जो अब
40:28अपने अनंत घर में प्रवेश करने को तैयार है
40:33वहाँ अन्य दिव्य पूर्वज स्वयंभी प्रकाशमे रूपों में नए आय पितर का खुले हाथों और प्रेम पूर्ण स्वागत करते हैं
40:43नवारोहित पितर उनके बीच अपना स्थान ग्रहन करता है, शाश्वत शांती और पित्रि लोग के दिव्य सामन जस्य में विलीन
40:50होकर
40:51यह सब देखकर गरूर का हरिदय असीम श्रद्धा और विस्मय से भर गया, उन्होंने भगवान श्रीहरी की ओर मुड़कर इस
41:00उत्तम ब्रहमांडिय न्याय को समझा