पिछले एपिसोड में, द्वारका में महान ऋषियों के शाप ने यादव वंश के विनाश की नींव रखी। एक लोहे का मूसल समुद्र में फेंक दिया गया, लेकिन उसका भयानक प्रभाव अभी शेष था। इस एपिसोड #94 में, द्वारका नगरी में एक के बाद एक अशुभ और भयावह संकेत प्रकट होने लगते हैं, जो आने वाले महाप्रलय की ओर इशारा करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण इन सभी संकेतों को देखते हैं और समझ जाते हैं कि कालचक्र अब अपनी चरम सीमा पर है। वे यादवों को प्रभास तीर्थ जाने का आदेश देते हैं ताकि वे स्नान, दान और तपस्या से अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें। लेकिन क्या यह यात्रा उन्हें श्राप के प्रभाव से बचा पाएगी, या यह उनके अंतिम विनाश का मार्ग बनेगा? देखें श्रीकृष्ण की इस अद्भुत लीला का अगला चरण, जहाँ नियति का खेल अपने सबसे क्रूर रूप में सामने आता है, और द्वारका पर मंडराते काले बादल और भी गहरे हो जाते हैं।
#Dwarka #ShriKrishna #YadavaVansh #PrabhasaTeerth #BhagavataPurana #Mahavinash #KalaChakra #HinduMythology #KrishnaLeela #S3Ep94 #पौराणिककथा #द्वारकानाश #प्रलय #अशुभसंकेत
भगवान श्रीकृष्ण इन सभी संकेतों को देखते हैं और समझ जाते हैं कि कालचक्र अब अपनी चरम सीमा पर है। वे यादवों को प्रभास तीर्थ जाने का आदेश देते हैं ताकि वे स्नान, दान और तपस्या से अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें। लेकिन क्या यह यात्रा उन्हें श्राप के प्रभाव से बचा पाएगी, या यह उनके अंतिम विनाश का मार्ग बनेगा? देखें श्रीकृष्ण की इस अद्भुत लीला का अगला चरण, जहाँ नियति का खेल अपने सबसे क्रूर रूप में सामने आता है, और द्वारका पर मंडराते काले बादल और भी गहरे हो जाते हैं।
#Dwarka #ShriKrishna #YadavaVansh #PrabhasaTeerth #BhagavataPurana #Mahavinash #KalaChakra #HinduMythology #KrishnaLeela #S3Ep94 #पौराणिककथा #द्वारकानाश #प्रलय #अशुभसंकेत
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00रिशियों के भयानक श्राप और मूसल के विसर्जन के बाद द्वार का नगरी पर एक अप्शकुन भरी अस्वाभाविक शांती चा
00:07गई थी, मानो नेती ने अपनी भयावध धुन बजाने से पहले एक गहरी सांस ली हो
00:14कभी जीवन्त रहने वाले बाजार अब शांत थे, गलियों में फुस्फुसाहटें तैर रही थी और नागरिकों की आखों में एक
00:22अनकहा डर साफ दिखाई दे रहा था, जो भविश्य की अग्यात विप्दा का संकेत था
00:28नगर के सबसे व्रिद्ध पुरोहित हाथों में अपनी जोतिशिये पोथी लिए, चिंतित ग्रिष्टी से बदलते नक्षत्रों को देख रहे थे,
00:37जिनकी चाल में उन्हें अनिष्टकारी संकेतों का भयानक पूर्वाभास हो रहा था
00:43यादवों की भव्य सभा में भी एक असहज खामोशी पसरी हुई थी, जहां कभी गर्जनापूर्ण वादविवाद गूंचते थे, वहां अब
00:52केवल चिंतित फुस्फुसाहटें और एक दूसरे की आखों में अनिष्चित्ता का भय व्याप्ट था
00:58इन सब से उपर भगवान श्री कृष्ण अपने भव्य कक्ष में शांतचित बैठे, ब्रहमांडिय सत्य को जानते हुए, अपने भीतर
01:07और द्वारका के बाहर मंदराते महाकाल के भयानक संकेत को गहराई से महसूस कर रहे थे
01:14धीरे धीरे शहर में अप्रत्याशित और भयानक अप्षकुन दिखाई देने लगे, रात में अंगिनत चुहे बिलों से निकल आते, पक्षी
01:23अजीबो ग्रीब आवाजे करते, और हवा में एक अज्यात भय की गंध फैलने लगी
01:29जिस सागर ने द्वारका को सुरक्षा दी थी, वह अब अशान्थ हो उठा था, उसकी लहरें तटों से भयानक रूप
01:37से टक्रा रही थी, और उसकी गहराई से आती अंजानी गूंज एक आसन्न विनाश की चेतावनी दे रही थी
01:45यादवों के बीच छोटी-छोटी बाते भी बड़े विवादों में बदलने लगी थी, उनकी आपसी समझ और सम्मान ख्षीन होता
01:53जा रहा था, और अहमकार की आग अब ग्रहकलह की चिंगारियों को भड़का रही थी
01:59धर्म और न्याय के स्थान पर लोगों में लोब और इर्श्या का संचार होने लगा था, जिससे द्वारका के नैतिक
02:07तानेबाने में एक भयावा दरार पैदा हो रही थी
02:11शान्त स्वभाव वाले बलदाऊ भी इन विचलित करने वाले परिवर्तनों को देख रहे थे, उनकी आखों में गहरा दुहक और
02:19भविश्य की चिंता स्पष्ट जलक रही थी, क्योंकि वे नेति के खेल को समझते थे
02:25क्रिश्न और बलराम एक एकांत कक्ष में, द्वारका पर मंदराते इन भयानक अप्षकुनों पर गहन चर्चा कर रहे थे, उनके
02:34चहरे पर एक ही समय में गहरी समझ और हृदय विदारक पीड़ा जलक रही थी
02:39अब अप्षकुन अधिक स्पष्ट और भयानक हो चुके थे, शाही हतियारों की ढाले अनायास ही गिर जाती, देवताओं की मूर्तियों
02:48से रक्त की बूंदे टपक्तीन और मंदिरों के जंडे उल्टी दिशा में फहराने लगते
02:55कभी अनुपम सौंदर्य वाली द्वार का नगरी अब अपनी चमक खो रही थी, उसके भव्य उद्यान मुर्जा रहे थे और
03:02उसके सुनहरे भवन फीके पढ़ते जा रहे थे, मानो उस पर शाप की काली चाया पूरी तरह से चा गई
03:09हो
03:10वह युवा यादव जो कभी अहमकार से भरे थे, अब उनके चहरे पर घमंड की जगह भय और अनिश्चित्ता की
03:18रेखाये खिंच गई थी, क्योंकि वे अपने ही कृत्यों के भयानक परिणाम देख रहे थे
03:25द्वार्का के रक्षक अपने उचे बुर्जों पर खड़े होकर एक अद्रिश्य शत्रू की तलाश में थे, उनकी आखे रात के
03:32सन्नाटे में तेज थी, लेकिन वे जिस खत्रे का सामना कर रहे थे, वह भीतर से आ रहा था
03:39गेहन चिंतन के बाद भगवान श्री कृष्ण ने अंत्ता द्वार्का के समस्त व्रिद्ध और प्रमुखों को एक गंभीर सभा के
03:47लिए बुलाने का निर्णय लिया, क्योंकि वे जानते थे कि अब समया गया है जब कठोर सत्य का सामना करना
03:54होगा
03:56कृष्ण के आदेश पर द्वार्का के सभी सम्मान निय व्रिद्ध और प्रमुख एकत्रित हुए उनके चहरे पर चिंता की गहरी
04:03लकी रही थी और उनकी आखों में आने वाली त्रास्दी की सपष्ट समझ जलक रही थी
04:10भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य आभासे मंडित सभा के केंद्र में खड़े हुए उनकी वानी में गहन गंभीरता थी जैसे वे
04:19आने वाले समय के भारी बोच को महसूस करते हुए कोई अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य बताने वाले हुँ
04:26उन्होंने द्वारका की बिगर्ती स्थिती, अप्षकुनों की वृध्धी और यादवों के नैतिक पतन का विस्तार से वर्णन किया, उनकी हर
04:35बात में अपने प्रियजनों के प्रती गहरा प्रेम और आने वाले विनाश का दुख स्पष्ट था
04:41उनकी बातों को सुनकर सभी को यह भयावह एहसास हुआ की द्वारका पर अब महाकाल का साया है, और केवल
04:49प्रभास छेत्र की तीर्थियात्रा ही शायद उनके पापों का प्रायश्चित कर सके और एक नई आशा दे सके
04:57भगवान श्रीकृष्ण के गंभीर वचनों से स्थब्ध द्वारका के नागरिक एक पल को सन्न रह गए, उनके हृदय में अंजानी
05:05आशंका की लहरें उठने लगी
05:08तभी नगर के उपर आकाश का रंग अचानक बदलने लगा, एक गहरा, रहस्यमई बैंगनी काले रंग का मिश्रन पूरी नगरी
05:16को अपनी आगोश में लेता चला गया
05:20भैभीत नागरिक अपनी सामान्य दिन्चर्या छोड़कर आस्मान की ओर निहारने लगे, उनकी आखों में अन्होनी की सपष्ट जलक थी
05:30शन भर में एक तीवर करकश हवा का जोका पूरी नगरी में फैल गया, जो अपने साथ धूल और अंजाने
05:37डर की गंध लेकर आया, जिससे पेडों की शाखाये उनमत्त होकर जूलने लगी
05:43धर्ती काप उठी और पत्थरों से बनी मजबूत दीवारें और भव्य भवन भी डगमगाने लगे, उनकी नीव में दरारें सपष्ट
05:52दिखाई देने लगी, जो किसी गंभीर खत्रे का संकेत थी
05:57गलियों में कुट्टे जोर-जोर से रोने लगे और गाएं अपने बाड़ों में बेचैन होकर भागने लगी, जानवरों का यह
06:04असामान्य व्यवहार आने वाली अन्होनी की गहरी चेतावनी दे रहा था
06:10आकाश में पक्षियों के जुन्ड अव्यवस्थित धं से चीखते हुए इधर उधर उड़ने लगे, उनका अशुब क्रंदन वातावर्ण में और
06:18अधिक भय और तनाव घोल रहा था
06:21पवित्र मंदिरों के गर्भग्रह में स्थापित हजारों वर्षों से पूजी जा रही दिव्यमूर्तिया भी अपने आसनों पर हिलने लगी, मानो
06:30स्वयन देवता भी इस विनाश से विचलित हो
06:34भय भीत पुजारी अपने हाथों में दीट लिये, मंत्रों चार करते हुए इन अशुब संकेतों को शांत करने का प्रयास
06:42करने लगे, उनके चहरों पर गहरी चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी
06:47लेकिन उनके सारे प्रयास व्यर्थ गए, जब एक एक करके मंदिरों से भव्य मूर्तिया अपने आसनों से गिरकर धराशाई होने
06:55लगी, जिससे एक भयानक गर्जना पूरे नगर में गूंज उठी
07:00इस भयावा द्रिश को देखकर नगर में भगदर मच गई, लोग चीखते चिलाते हुए अपने घरों की ओर भागने लगे,
07:09यह समझते हुए की प्रलै का यह आरंभ मात्र है
07:14इसी बीच द्वारका के तट पर विशाल समुद्र भी क्रोधित हो उठा, उसकी लहरें भयंकर गर्जना के साथ शहर की
07:21दीवारों से टक्राने लगी, मानो वह भी इस विनाश में शामिल हो
07:27किनारे पर हजारों मचलिया और समुद्री जीव मर कर बहकर आ गए, उनके मृत शरीर समुद्र तट को एक भयानक
07:34और अप्शकुनी चित्र प्रदान कर रहे थे
07:38नगर के हरे भरे उद्यान और फलता-फूलता वनस्पती अचानक मुर्जाने लगे, उनके पत्ते काले पढ़कर गिरने लगे, जैसे कोई
07:47अद्रिश शक्ती जीवन को सोख रही हो
07:50पवित्र कुओं का जल मैला हो गया और नदी नालों का पानी सूखने लगा, जिससे जीवन के लिए आवशक स्रोत
07:57भी दूशित और अनुपलब्ध हो गए
08:00इन लगातार बढ़ते अशुब संकेतों के साथ, द्वार का नगरी पर अब एक गहरी, असहनिय उदासी और निराशा का काला
08:09साया छा गया, हर नागरिक का हृदय भैसे संकुचित हो रहा था
08:14नगर के वृद्धजन और ज्यानी ब्राहमन, शास्त्रों के पन्ने पलटते हुए, इन अन्होनी घटनाओं के पीछे के रहसियों और प्राचीन
08:22भविश्यवानियों पर गहन विचार विमर्ष करने लगे
08:27भगवान श्रीकृष्ण अपने भव्य सिनहासन पर बैठे हुए, मौन भाव से इन सभी द्रिश्यों का अवलोकन कर रहे थे, उनके
08:35दिव्य मुख मंडल पर एक अप्रकट पीरा और परम शान्ती का संगम था
08:40अब पूरी तरह से आश्वस्थ हो चुके नादरिक, प्रभास छेत्र की तीर थे आत्रा को ही एक मात्र आश्रे मानकर
08:48अपने सामान बांधने और परिवार को तयार करने की जुगत में लग गए
08:53इस प्रकार एक विराट पलायन की तैयारी शुरू हो गई, जिसमें हर कदम भय और आशा के बीच जूल रहा
09:01था, क्योंकि द्वार का अपने भाग्य के अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही थी
09:07भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यद्रिष्टी कालचक्र के अंतिम प्रवाह में गहरा डोग गई, जहां नेती के अग्रिश्य धागे एक महान विनाश
09:16की ओर बुनते चले जा रहे थे
09:19उनकी अनंत चेतना में रिशियों का वह भयानक श्राप गूंज गुठा, जिसके शब्द अब द्वार का के भाग्य की अंतिम
09:26कहानी लिख रहे थे
09:28उन्होंने स्वया अपने पूर्व निर्धारित वचनों को साकार होते देखा, जब उन्होंने यदुवंश के अंत की भविश्य वानी की थी,
09:37यह सब उनकी लीला का ही एक अंग था
09:41उनके दिव्य मुख मंडल पर पीडा और परम शांती का एक अद्भुत संगम था, जैसे ब्रह्मांड का सारा दुख और
09:48समस्त ज्यान एक बिंदु पर समाहित हो गया हो
09:52दूर से आती द्वारका की चहल पहल, परिवारों के सामान बांधने और यात्रा की तयारी की ध्वनिया उनके एकांत में
10:00भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी
10:03प्रत्येक घर से उठने वाली चिन्ता और आशा की मिश्रित भावनाए, जैसे एक अद्रिश्य उर्जा तरंग के रूप में पूरे
10:11नगर को घेरे हुए थी
10:14बालकों के मासूम चहरों पर अनिश्चित्ता का भय साफ जलक रहा था, जबकी बड़े बुजुर्गों की आखों में गेहन चिन्ता
10:22और भविश्य की धुंधली तस्वीरे तैर रही थी
10:26जैसे जैसे दिन धलता जा रहा था, द्वारका की भव्यता पर एक उदासी का परदा चाता जा रहा था, जो
10:33उसके अंतिम सूरियास्त का संकेट दे रहा था
10:37श्री कृष्ण ने अपनी आखों में गेहन करोना लिये, अपने प्रिय नगर द्वारका को देखा, जानते थे कि इस महान
10:45लीला का यह अंतिम अध्याय है
10:48एक चण के लिए पूरी स्रिष्टी मौन हो गई, जैसे समय ने स्वयं ठहर कर इस ब्रहमांडिय नाटक के अंतिम
10:56द्रिश की प्रतीच्शा की हो
10:58फिर उनके भीतर एक द्रिड संकल्प जागा, उन्होंने अपनी भूमिका को स्विकार किया, जो इस महान लीला के समापन के
11:07लिए निर्धारित थी
11:09अपने सिनहासन से उठकर, वे धीरे धीरे अपने कक्ष के केंद्रिय भाग की ओर बढ़े, उनके प्रत्येक पग में ब्रहमांडिय
11:17गंभीरता जहलक रही थी
11:20उन्होंने अपने विश्वस्थ साथी उद्धव को पुकारा, जिनकी निष्ठा और ज्ञान पर उन्हें पूर्ण विश्वास था
11:28उनकी वानी, गंभीर और शांत थी, फिर भी उसमें एक अटल आदेश का बल था, जो निती की पुकार को
11:35प्रतिबिम्बित कर रहा था
11:49यह यात्रा केवल एक शारिरिक पलायन नहीं, बलकि आत्माओं के शुद्धिकरण और आगामी संधर्ष से बचने का एक आध्यात्मिक मार्ग
11:58भी थी
12:00द्वारका के भव्यद्वार से यादवों का एक विशाल कारवा धीरे-धीरे प्रभास की ओर बढ़ने लगा, प्रत्येक रत और व्यक्ति
12:08अपने साथ एक भारी नियती ढो रहा था
12:12नगर की सडकों पर पसरा मौन और प्रत्येक दीवार से छलक्ती उदासी इस बात का प्रमान थी कि द्वार का
12:19स्वयन अपने प्रिय निवासियों से विदाले रही थी
12:23श्री कृष्ण ने अपने महल की उँचाई से इस विराट पलायन को देखा, उनकी आखें दूर क्षितिच पर टिकी थी
12:31जहां उनके वंश का अंतिम अध्याय लिखा जाना था
12:36अंधेरा गहरा रहा था और उसके साथ ही एक युग का अंत भी जैसा की शाश्वत कालचक्र ने सदियों पहले
12:43निर्धारित कर दिया था
12:45नगर की सडकों पर पसरा मौन और प्रत्येक दीवार से छलक्ती उदासी इस बात का प्रमान थी की द्वार का
12:53स्वयन अपने प्रिय निवासियों से विदाले रही थी
12:57श्री कृष्ण ने अपने महल की उँचाई से इस विराट पलायन को देखा उनकी आखे दूर क्षितिच पर टिकी थी
13:04जहां उनके वंश का अंतिम अध्याय लिखा जाना था
13:09अंधेरा गहरा रहा था और उसके साथ ही एक युग का अंत भी जैसा की शाश्वत कालचक्र ने सदियों पहले
13:16निर्धारित कर दिया था
13:18एक गहरी सास उनके हरिदय से निकली जिसमें ब्रहमांडिय उत्तरदायत्व और अपने प्रियजनों के लिए व्यक्तिगत दुहक दोनों का भार
13:27समाहित था
13:29वे धीरे से मुड़े अपने भव्य कक्षों की ओर बढ़े जहां वे अपने अंतर्मन में गहन चिंतन के लिए एकांत
13:37खोज रहे थे
13:39विशाल वैभवशाली कक्ष अब नीरव था, ब्रहमांडिय उर्जा की सुक्ष्म गूंजी उसमें व्याप्त थी, जो उनके आंतरिक स्थिती को दर्शा
13:48रही थी
13:50श्रीकृष्ण एक ध्यानस्थ मुद्रा में बैठ गए, उनकी आखें बंद थी, उनकी दिव्य देह से एक सुक्ष्म उदासी भरी आभा
13:58प्रवाहित हो रही थी
14:00वे अपने अवतरण के उद्देश, धर्म की स्थापना और दुष्टों के सहार पर गहराई से विचार करने लगे, अपनी लीला
14:08के समापन को स्वीकार करते हुए
14:11उनके मन में गोकुल से मथुरा और फिर महाभारत के युद्ध तक की उनकी यात्रा के दृष्य कौन्ध गए, धर्म
14:19की स्थापना के लिए उनके अथक प्रयासों को दर्शाते हुए
14:23उन्होंने उस अपार शक्ती को याद किया जो उन्होंने धारण की थी, संपूर्ण ब्रहमांड उनके भीतर समाहित था, फिर भी
14:31अब वे एक उच्चतर इच्छा के प्रती गहरे समर्पन का अनुभव कर रहे थे
14:37यह द्रिष्टांत यादवों की ओर मुडा, उनकी समर्ध्धी और उनके भीतर धीरे धीरे पनपते अहंकार को दर्शाते हुए, जो उनके
14:46विनाश का कारण बना
14:48उन्हें रिशियों के श्राप और लोहे के मूसल की घटना याद आई, जो उनके वन्ष के अभिमान का अप्रिहार्य परिणाम
14:56था
14:57अपने प्यारे परिवार के लिए हृदय में पीडा उठी, यद्यपी वे जानते थे कि उनकी नेती उनके अपने ही कर्मों
15:05से तय हो चुकी है
15:08उन्होंने स्विकार किया कि एक दिव्य सक्ता होते हुए भी, वे उस ब्रह्मांडिय विधान कर्म में हस्तक्षेप नहीं कर सकते,
15:16जिसने अब उनके अपने ही वन्ष को घेर लिया था
15:20उनकी दृष्टी अब आंतरिक हो गई, दिव्य योजना पर केंद्रित, वह व्रिहत दिजाइन जहां उनका प्रस्थान भी एक पूर्वनिर्धारित कार्य
15:29था
15:30उन्होंने इस अंतिम लीला के सूत्रधार के रूप में अपनी भूमिका स्विकार कर ली, अपनी ही लीला के चर्मोतकर्ष के
15:38एक मूख दर्शक बन गए
15:40एक शांत मुस्कान उनके होठोन को चूगई, शांती और गेहन ज्यान का मिश्रण जैसे ही उन्होंने आसन्न अंत को गले
15:48लगा लिया
15:50उन्होंने स्वयन को अंतिम यात्रा के लिए मानसिक रूप से तैयार किया, मानव रूप से शाश्वत ब्रहमा में संक्रमन के
15:58लिए
16:09पूर्ण समर्पन के साथ उन्होंने प्रभास की ओर अपने लोगों को अंतिम बार निर्देशित करने का संकल्प लिया, अपनी परम
16:17विदाई से पहले अपना अंतिम सांसारिक कर्तव्य पूरा करते हुए
16:22गहरे संकल्प के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कक्ष से एक शक्तिशाली आहवान भेजा, जिसने द्वारका के सभी प्रमुख यादवों
16:31और मंत्रियों को ततकाल सभा में उपस्थित होने का आदेश दिया, उनकी वानी में न सिर्फ राजसी अधिकार था, बल
16:51कुछ ही क्षणों में सभा कक्ष में एक शांत, लेकिन तेजस्वी उपस्थिती ने प्रवेश किया भगवान श्रीकृष्ण स्वयं, जिनकी निलमसी
17:00कांती और स्वर्ण वस्त्रों से एक अलोकिक आभा फूट रही थी, और जिनके कमलन्यनों में ब्रहमांड के समस्थ ज्
17:10की गंभीरता स्पष्ट दिख रही थी, इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा
17:18का वर्णन किया गया है, उन्होंने अपनी गंभीर और अधिकार पूर्ण वानी में सभा को संबोधित करना शुरू किया, द्वारका
17:28में दिन
17:28प्रति दिन बढ़ रहे अप्षकुनों का विस्तरित वर्णन करते हुए, जैसे हवा में घुलती उदासी, पशुओं का अजीब व्यवहार और
17:36मंदिरों में बुझते दीपत, इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर
18:26जिसे वे अब तक अंदेखा करते आ रहे थे।
18:52अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्नन किया गया है।
18:59गंभीर्ता से श्रीकृष्ण ने उन्हें ततकाल द्वार का छोड़कर प्रभास तीर्थ पर जाने का आदेश दिया, ताकि वेस नान, दान
19:07और तपस्या के माध्यम से अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें और उस श्राप के प्रभाव को कुछ हद तक
19:14कम कर सकें।
19:15इस पावन प्रसंग में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
19:24उन्होंने स्पष्ट किया कि इस यात्रा का उद्देश केवल शारिरिक शुद्धता नहीं, बलकि आत्मा का शुद्धिकरण है, ताकि वे अपने
19:33अहमकारी आचर्ण के परिणामों को समझें और विनमरता के साथ ब्रहमांडिय न्याय को स्वीकार करें।
19:40इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
20:34अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
20:40और बलराम जिनकी विशाल देह और शांत मुखमंडल में एक अदमय शक्ती थी, ने अपने अनुज श्री कृष्ण की ओर
20:48देखा और एक गंभीर सहमती में सिरहिलाया, उनकी आखे भी आने वाली नेती के भार को वहन करती हुई प्रतीत
20:56हुई।
20:57इस पावन प्रसंग में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
21:06श्री कृष्ण ने एक बार फिर अपनी वानी में द्रिड़ता लाते हुए दोहराया की विलंब नहीं होना चाहिए और सभी
21:13को ततकाल प्रभास की ओर प्रस्थान करना चाहिए क्योंकि समय का चक्र अब अपनी अंतिम गती पर था।
21:21इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
21:29उनके आदेश के बाद द्वारका के राजमहल और सडकों पर एक त्वरित हल्चल मच गई जहां हर कोई अपने परिवारों
21:38और सामानों को समेटने में लग गया, शहर में एक बेचैन उर्जा और चिंता का माहौल फैल गया।
21:45इस पावन प्रसंग में यादवों को अन्तिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
21:53कभी वैभव और उल्लास से परिपूर्ण रहने वाली द्वार का नगरी अब एक उदास और खाली होने वाले शहर में
22:01बदल रही थी, जहां हर कोने में एक अनकहा भय और विदाई की पीड़ा महसूस की जा सकती थी।
22:08इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
22:17सुर्योदय से पूर्व द्वारका के विशाल द्वारों पर यादवों का एक विशाल समो एकत्रित हो गया, प्रथ, हाथी और पैदल
22:25चलने वाले सभी प्रभास की ओर एक मौन और गंभीर यात्रा के लिए तयार थे।
22:31इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
23:01इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
23:31और जब अंतिम यादव भी द्रिश्टी से उजल हो गए, तब श्रीकृष्ण एकाकी और शांत द्वारका के सुनेपन में खड़े
23:39रहे एक गहन शांती और आने वाली अंतिम लीला के प्रती पूर्ण समर्पन के साथ।
23:45इस पावन प्रसंद में यादवों को अंतिम आदेश, प्रभास तीर्थ की ओर की महिमा का वर्णन किया गया है।
23:54श्रीकृष्ण के अंतिम आदेश से याद्वगन स्तब्ध रह गए, उनके मन में भ्रम और अनिश्चित्ता का एक गहरा सागर उमड
24:02पड़ा, क्योंकि उन्होंने कभी ऐसी यात्रा की कलपना भी नहीं की थी।
24:07द्वारका के बुद्धिमान वयोवरिद एक साथ बैठे, इस असाधारन आदेश के पीछे छिपे गूड अर्थों को समझने का व्यर्थ प्रयास
24:16कर रहे थे, उनके माथे पर चिन्ता की लकीरें गहरी थी।
24:20कुछ उच्साही युवायादवों ने इस अचानक पलायन को अस्वीकार करते हुए, प्रभु की आज्या पर खुले तौर पर संदेह व्यक्त
24:29किया और इसका कारण पूछा, उनकी आखों में अविश्वास पष्ट जलक रहा था।
24:35धीरे-धीरे, कुछ के मन में रिशियों के उस भयानक श्राप की स्मृती कौंध गई, जिसने इस यात्रा के पीछे
24:43के भयावह सत्य की एक असपष्ट जलक दी, और उनके रोंगते खड़े हो गए।
24:49उनके अंतर्मन में श्रीकृष्ण के धर्म और कल्युक के विशय में कहे गए गहन शब्द गूंज रहे थे, जो उनके
24:56भीतर व्याक्त भय को और गहरा कर रहे थे, और उन्हें एक अनिश्चित भविश्य की ओर धकेल रहे थे।
25:04अनिश्चा और गहन भय के बावजूद प्रभास तीर्थ यात्रा की भव्य तयारी धीमी गती से आरम हो गई, क्योंकि प्रभु
25:11की आध्या का उलंगन करने का साहस किसी में न था, चाहे परिनाम कुछ भी हो।
25:18घर-घर में यादव परिवार अपनी अमूल्य वस्तूओं को समेट रहे थे, उनके चहरों पर दुरक और नेती के प्रती
25:25समर्पन का एक मिलाजुला भाव स्पष्ट जलक रहा था, हर पल भारी लग रहा था।
25:32ग्वारका की स्प्रिया एक दूसरे से कानाफूसी कर रही थी, उनकी आखों में अपने बच्चों और आने वाले अज्यात भविश्य
25:40के लिए एक गहरा अनकहा भय छलक रहा था, हर शब्द एक फुस्फुसाहट में बदल गया था।
25:47वातावर्ण की असामान्य गंभीरता को भाम्पते हुए, बच्चे अपनी मासूम आखों से अपने मातापिता की ओर देख रहे थे, इस
25:56रहस्यमय पलायन का अर्थ समझने में असमर्थ, बस एक असहज चुप्पी महसूस कर रहे थे।
26:03भारी मन से यादव सेनाप्तियों ने यात्रा के लिए अपनी सेना और रसत की व्यवस्था शुरू की, ताकि यह सुनिश्चित
26:11किया जा सके की सब कुछ क्रमबध तरीके से हो, हाला कि उनके चहरों पर कोई उच्साह नहीं था।
26:17कभी जीवन से गुलजार रहने वाली भव्यद्वार का नगरी अब एक शांत गेहन चुप्पी की चादर ओढ़े हुए थी, उसकी
26:26सारी भव्यता अचानक शनभंगुर लगने लगी थी और एक अप्रत्याशित अंत की ओर इशारा कर रही थी।
26:34प्रकृती में सुक्ष्म, अशुब संकेत प्रकट होने लगे थे, पक्षी मौन थे, सागर की लहरें असामान्य रूप से फुस्फुसा रही
26:43थी, और आकाश पर एक अजीब पीलापन चा गया था जो विनाश का पूर्वा भास दे रहा था।
26:50भगवान बलराम अपने हृदय में गहन दोहक लिये हुए भी, शांत और स्थिर बने रहे, क्योंकि वे इस आसन्य दैविय
26:58नेती की अनिवार्यता को भली भानती समझते थे, और उसे स्विकार करते थे।
27:04देव की और वसुदेव एक दूसरे को धांधस बंधाते हुए, अपने पुत्र की दैविय इच्छा और वियोग के गहरे दोहक
27:12को चुपचाप स्विकार कर रहे थे, उनके चहरे पर त्याग का भाव था।
27:18पुजारीगन, गंभीर और चिंतित चहरों के साथ विशेश प्रार्थनाय और अनुष्ठान कर रहे थे, इस आगामी यात्रा के भयावः भविश्य
27:27को भाम्पते हुए और दिव्य हस्तक शेप की कामना कर रहे थे।
27:32प्रभास तीर्थ तक के मार्ग के नक्षे खोले गए, एक ऐसा रास्ता चहनित करते हुए जो तीर्थ यात्रा से अधिक
27:40एक बड़े पलायन जैसा लग रहा था, जिसमें कोई उत्सव नहीं था, केवल एक मौन गंतव्य था।
27:48द्वारका के प्रत्येक प्राणी पर भय और निती के प्रती समर्पन का एक गहरा, मौन भाव छा गया था, एक
27:55अज्यात भविश्य को चुपचाप स्विकार करते हुए, उनकी आत्माय भय से काम प्रही थी।
28:02द्वारका के भव्यद्वार, जो सामान्यत व्यापार के लिए खुले रहते थे, अब एक विशाल पलायन के लिए तयार किये जा
28:09रहे थे, उनकी चमक में एक उदासी घुल गई थी, मानों वे भी विदाई का दर्द महसूस कर रहे हुँ।
28:17जैसे ही प्रभात हुआ, यादवों के पहले दल, पुरुष, स्त्रिया और बच्चे, अपने भारी कदमों और उदास हृदय के साथ
28:25प्रभास की ओर अपनी दुखद यात्रा शुरू करने लगे, द्वारका को पीछे छोड़ते हुए।
28:31और सुनहरी द्वारका अपने निवासियों को विदा करते हुए, इस दैविय नाटक के क्रमिक समापन की मूख साक्षी बनी खड़ी
28:40थी, जिसका भाग्य अब सुनिश्चित था और जिसमें कोई बदलाव संभव न था।
28:46द्वारका से निकले इस विशाल यादव कारवा की भव्यता, जो कभी गर्व का प्रतीक थी, अब केवल एक दुखद प्रस्थान
28:54की भारी छाया बनकर रह गई थी।
28:58धूल के घने बादल, जो सैकडों रथों और पैरों से उठ रहे थे, उनके पीछे द्वारका की सुनहरी दीवारों को
29:05निगलते जा रहे थे, मानो अतीप को मिटा रहे हूँ।
29:10छोटे बच्चों की आखें, जो रथों और पालकियों से जाक रही थी, पीछे छूटती अपनी प्रियनगरी की ओर उच्सुकता और
29:18भय के मिलेजुले भाव से देख रही थी।
29:22व्रिध और दुर्बल यादव अपने युवा परिजनों के कंधों का सहारा लिए लड़ खडाते कदमों से आगे बढ़ रहे थे,
29:30उनके चहरे पर एक गहरी थकान और नेती की स्वीकृती जलक रही थी।
29:35स्त्रिया अपने सिर पर छोटे मोटे सामान और हृदय में अथा दुख लिये चुपचाप चलती जा रही थी। उनकी आखों
29:43में अनकही कहानिया और अश्रु भरी हुई थी।
29:48बलशाली यादव योध्धा, जिनके हाथों में कभी चमकते अस्त्रशस्त्र होते थे, अब अपने हथियारों को भारी मन से ढो रहे
29:56थे, उनकी भुजाओं में बलथा पर हृदय में अनिश्चित्ता का भय।
30:01रथों के पहियों की चर्मराहट, घोडों की टापें और हजारों पैरों की सामुहिक धीमी गूंज उस शांत सुबह में एक
30:09अजीबो ग्रीब, चिन्ताजंत संगीत रच रही थी।
30:13भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्यरत पर आरूड, शांत और गंभीर मुद्रा में बैठे थे, उनकी गहन आखें इस विशाल पलायन के
30:22हर द्रिश को बिना किसी प्रतिक्रिया के देख रही थी।
30:26उनका श्यामवर्णी रत, जो कभी युद्ध के मैदानों में गर्जना करता था, अब इस दुखद कारवा के बीच धीरे-धीरे
30:34आगे बढ़ रहा था, जैसे नेती स्वयें इस यात्रा का नेत्रित्व कर रही हो।
30:40द्वारका के आसपास की उपजाव भूमी अब पीछे छूट चुकी थी, और उनके सामने फैला था एक शुष्क पत्रीला मार्ग
30:48जो प्रभास की ओर जाता था, हर कदम भारी होता जा रहा था।
30:53मध्याहन का सूरज उनके सिर पर देहक रहा था, और उसकी तीखी किरने ठके हुए यादवों की आशाओं को भी
31:00जुलसा रही थी, जो एक अंजाने भविश्य की ओर बढ़ रहे थे।
31:06कभी कभी कारवा रुकता, लेकिन यह विराम राहत देने वाला नहीं था, बलकि एक मौन चिंतन का अफसर था, जिसमें
31:14हर चेहरा अपने भीतर के तूफान से जूज रहा था।
31:19यह एक पलायन नहीं, बलकि एक पूरी सभ्यता का विस्थापन था, जिसकी धाराक्षितिवस्तक फैली हुई थी, हर मोर पर नेती
31:27की पुकार को सुनती हुई।
31:30यादवों के बीच फुसफुसाहटें और चिंतित दृष्टविनिमय यद्यपी शब्दों में व्यक्त नहीं हुए, उनके सामुहिक भाय और आसन्न संकट की
31:39गहरी समझ को दर्शा रहे थे।
31:42श्रीकृष्ण की आखों में कोई क्रोध नहीं था, नहीं कोई दुख, बलकि एक शाश्वत स्विकृती थी, जो इस लीला के
31:50हर अप्रत्याशित मोर को पहले से ही जानती थी।
31:54जो यादव कभी अपनी समरिध्धी और अदमय शौर्य के लिए जाने जाते थे, वे अब एक विवश यात्रा पर थे,
32:02उनकी शान का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा था।
32:06जैसे जैसे दिन धलता गया, शितिच पर समुद्र की एक धुंधली चमक दिखाई देने लगी, जो प्रभास के करीब आने
32:14का संकेत थी, लेकिन यह आशा की नहीं, बलकि अवश्यमभावी अंत की निशानी थी।
32:21नारंगी और बैंगनी रंग से रंगा आकाश इस विशाल कारवा के उपर एक उदास परगा डाल रहा था, जैसे प्रकृती
32:29भी उनके आगामी विनाश का शोक मना रही हो।
32:33ठके हुए शरीर और भारी मन लिये, वे धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे, हर बीत्ता पल उन्हें उनके अंतिम गंतव्य
32:41के करीब ले जा रहा था, जहां नेती उनका इंतजार कर रही थी।
32:46और इस तरह द्वारका के शक्तिशाली यादवों का यह विशाल कारवा प्रभास के क्षितिच की ओर नेती के रथ पर
32:54आरूढ होकर अपने अंतिम गंतव्य की ओर बढ़ता रहा।
32:58अंतह क्षितिच पर प्रभास तीर्थ की स्वर्णिम बालू और पवित्र जलधाराय प्रकट हुई, मानो स्वर्ग ने स्वय अपनी शांती और
33:07सुन्दर्ता का एक टुकडा धर्ती पर बिखेर दिया हो।
33:10इस दिव्य संगम तट पर जहां पौरानिक नदिया सागर से मिलती थी, एक अलोकिक शांती व्याप्त थी, जो उनके अशांत
33:20हृद्यों को क्षण भर के लिए सांत्वना दे रही थी।
33:24अपने धूल भरे वस्त्रों और लंबी यात्रा की ठकान के बावजूद, यादवों की आखों में इस पवित्र भूमी को देखकर
33:31एक अजीव सी आशा और भय का मिश्रन जलक रहा था।
33:36भगवान श्रीकृष्ण अपनी अलोकिक आभासे परिपूर्ण दूर से ही अपने कुल के इन अंतिन ख्षणों के कर्मकांडों को शांत भाव
33:45से निहार रहे थे। उनके दिव्यनेत्रों में असीम ज्यान की गहराई थी।
33:50उन्होंने अपने भारी शस्त्रों और राजसी वस्त्रों को उतार कर साधे वलकलों को धारण किया, जो उनके मन की पवित्रता
33:58के संकल्प को दर्शा रहा था।
34:01एक एक करके वे गहरे सम्मान और मौन के साथ प्रभास के ठंडे पवित्र जल में प्रवेश करने लगे, मानों
34:09अपने पापों का बोज धोने के लिए तैयार हो।
34:13उन्होंने विधिवत दुब की लगाई और मंत्रों का जाप किया, यहां मानते हुए कि इस पवित्र जल में स्नान करने
34:20से उनके पिछले कर्मों का मैल धुल जाएगा।
34:24जल से बाहर निकलते ही, एक क्षण के लिए उन्हें अपने शरीर और मन में एक अजीब सी हलकीपन और
34:31शुद्धता का अनुभव हुआ, जो लंबे समय से अनुपस्थित थी।
34:36तत पश्चात उन्होंने अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्माओं की शांती के लिए श्रधा पूर्वक तरपन किया, पवित्र जल और तिल
34:45का दान कर उनकी याद में सम्मान प्रकट किया।
34:49प्रभास के तटपर गूंजते वैदिक मंत्रों और श्रधा से भरी शांत गतिविधियों ने एक पवित्र और गंभीर वातावर्ण का निर्मान
34:57किया, जो उनके मन की गेहन उथल पुथल को क्षण भर के लिए थाम रहा था।
35:03अपनी शुद्धिकरन क्रियाओं के पश्चात उन्होंने अपनी संपत्ती के एक हिस्से को दान करने के लिए गरीब और जरूरत मंदों
35:11में अन्न और वस्त्र का वितर्ण करना आरंभ किया।
35:15स्वर्ण, गायों और रत्नों का भी बड़े पैमाने पर दान किया गया। इस आशा में कि उनकी यह उदारता उनके
35:22पापों के भार को कम कर सकेगी।
35:26इसके बाद उन्होंने अनेक विद्वान और तपस्वी ब्राहमनों को पवित्र भोजन ग्रहन करने के लिए सादर आमंत्रित किया, जिसे ब्राहमन
35:35भोजन के नाम से जाना जाता था।
35:38विभिन आश्रमों से आये हुए ये ब्राहमन अपनी पवित्रता और ज्ञान से परिपूर्ण धीरे धीरे उस स्थान पर एकत्र होने
35:46लगे जहां भोजन की व्यवस्था की गई थी
35:50चांदी के थालों में परोसे गए स्वादिष्ट और सात्विक व्यंजनों की सुगंध पूरे वातावर्ण में फैल गई जहां सैकडों ब्राहमन
35:58शान्थ चित्त से भोजन ग्रहन कर रहे थे
36:02इस क्षण प्रभास का पूरा तट भक्ती और शान्ती से उतप्रोत था जहां सामुहिक प्रार्थनाएं और दान के पवित्र कार्य
36:10किये जा रहे थे
36:11मानों वे एक नए सवेरे की कामना कर रहे हो
36:15इन कर्मकांडों को संपन्न करते हुए कई यादवों के मन में एक क्षणिक आशा जगी की शायद इन पवित्र कार्यों
36:23से वे अपने भयानक श्राप के प्रभाव को कुछ कम कर सकें
36:28एक भ्रमपूर्ण शान्ती चारों और छा गई थी जहां ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अतीत के सभी पाप धुल
36:35गए हैं और एक नई पवित्र शुरुवात संभव है
36:40परंतु भगवान श्री कृष्ण अपनी शाश्वत चेतना के साथ इस क्षणिक शान्ती के पार देख रहे थे
36:47उन्हें ग्यात था कि यह केवल एक शान्त क्षण है जो आने वाले महाविनाश की प्रस्तावना मात्र है
36:55यह प्रभास तट पर फैली हुई वह कपटपूर्ण शान्ती थी जो किसी प्रचंड तूफान से ठीक पहले की खामोशी के
37:03समान थी जहां नेती ने अपनी भयानक योजना को आकार देना शुरू कर दिया था
37:10प्रभास के पवित्र तट पर प्रायश्चित के धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के पश्चात सभी यादव योध्धा उत्सव और प्रीति
37:18भोज के लिए एकत्र होने लगे
37:21सेवकों द्वारा सुवर्ण के विशाल कल्शों में अत्यंत तीवर और मादक मैरे मदिरा लाकर यादव राज कुमारों के सम्मुख प्रस्थुत
37:29की गई
37:31उसी क्षण भगवान श्री कृष्ण की अमोग योगमाया का एक अद्रिश्य प्रभावकारी जाल संपून प्रभास चेत्र पर धीरे धीरे आच्छादित
37:40होने लगा
37:42नेती के वशीभूत होकर विवेखीन यादव योध्धा उस मादक पे का अत्यधिक मात्रा में पान करने लगे
37:50जैसे जैसे मदिरा का प्रभाव गहरा होता गया, उनके मन से धर्म, मर्यादा और एक दूसरे के प्रती भ्रात्रिभाव क्षीन
37:58होने लगा
38:00सात्यकी, कृत्वर्मा, गद और सांब जैसे महावीर भी उस मदिरा जाल में उलचकर अपनी चेतना और सन्यम खोने लगे
38:09जो वारतालाप आरंभ में हासपरिहास और आनंद से भरा था, वह माया के प्रभाव से अहमकारपूर्ण शेखी में बदलने लगा
38:19अतीत के दबे हुए वैर और महाभारत युद्ध के समय के पुराने मनमुटाव उनके मस्तिष्क में पुनह जागरित होने लगे
38:28सात्यकी ने तीवर क्रोध से भर कर कृत्वर्मा की ओर देखा और उस पर कुरुक्षेत्र के रात्रिशिविर में सोय हुए
38:35योध्धाओं की हत्या का घोर आरोप लगाया
38:39कृत्वर्मा ने भी मदिरा के नशे में धधकते हुए सात्यकी को उफास पूर्वक उत्तर दिया और भूरिश्रवा के वध की
38:46घटना का स्मरण दिलाकर उसका अपमान किया
38:51प्रभास का वह पावन वातावर्ण क्षन भर में कटू वचनों, क्रोधपूर्ण चिल्लाहटों और आपसी शत्रुता की विशैली ज्वाला से भर
38:59गया
39:00अन्य यादव वीर भी शांत रहने के बजाए अपने अपने समुहों का पक्ष लेकर दो विरोधी पक्षों में विभाजित होने
39:07लगे
39:09महाबली बलराम भी अतिशय मदिरापान और दैविय योगमाया के वशीभूत होकर पास ही एक व्रिक्ष के नीचे अचेट अवस्था में
39:17पड़े रहे
39:19सुवर्ण के सुन्दर पात्र भूमी पर पटक दिये गए और चारों और केवल कटु कटाक्ष और अपमानजनक अपशब्द गूझने लगे
39:29योध्धाओं के माथे की नसे तन गई और उनकी उंगलिया अंजाने में ही अपनी कटारों और तलवारों की मूठ पर
39:36कसने लगी
39:38सर्वग्राही काल की छाया उन सभी पर गहराती जा रही थी, किन्तु बुद्धी भरष्ट हो जाने के कारण वे अपनी
39:45आसन्न मृत्यू से पूर्णता अन्भिग्य थे
39:48इस संपूर्ण विनाशकारी द्रिश्य से कुछ दूरी पर भगवान श्रीकृष्ण एकांत में एक पवित्र पीपल व्रिक्ष के नीचे शांत भाव
39:58से विराजमान थे
40:00भगवान जानते थे कि महर्शियों के अमोग शाप और नेती के विधान को पूरा करने के लिए यह ग्रहकलह अनिवार्य
40:07हो चुका था
40:09प्रभास के आकाश में कालेकलूटे बादलों की एक भयावा घटा धिराई जो यादवों के हृद्यों में पल रहे कालकूट विश्की
40:18प्रतीक थी
40:19अब वहक्षन अत्यन्त निकट आ गया था जब भाई ही भाई के रक्त का प्यासा बनकर महाविनाश के तांडव का
40:26आरंभ करने वाला था
40:29प्रभास तीर्थ के तट पर लगे भव्य शिविरों में यादव वीर सुरापान कर रहे थे और उनके नेत्र मदिरा के
40:36तीवर प्रभाव से रक्तवर्ण होने लगे थे
40:40मदमत सात्यकी ने कृत्वर्मा की ओर देख कर उभास पून अटहास किया जिससे कुरुक्षेत्र युद्ध के समय के पुराने घाव
40:48पुनह हरे हो गए
40:50सात्यकी ने सबके समक्ष कृत्वर्मा पर सोते हुए पांडव वीरों की कायरता पून हत्या का गंभीर आरोप लगाते हुए उसे
40:59धिककारा
41:00अत्यंत क्रोधित कृत्वर्मा ने अपनी तलवार की मूठ पर हाथ कस्ते हुए सात्यकी के पुराने कृत्यों का स्मरण करा कर
41:08तीखा पलटवार किया
41:10अंधक और व्रिष्ने वंश के अन्ययादव सेनापती भी इस विवाद में कूद पड़े जिससे शिविर का वातावर्ण तीखे वाक्युद्ध से
41:19गूँझ उठा
41:21प्रद्युम्न ने दोनों पक्षों को शांत करने का प्रयास किया, किन्तु मदिरा के अहंकार में डूबे विरों ने उनके वचनों
41:28की अभेलना कर दी
41:30समुद्र से उठने वाली तूफानी हवाओं ने यग्यवेदी और शिविर की मशालों को जख जोर दिया, जो यादवों के भीतर
41:38सुलक्ते क्रोध का प्रतीक थी
41:40पिता प्रद्युम्न का अनादर देखकर अनिरुद्ध का धैर्य तूट गया और उसने स्वर्णजरित म्यान से अपनी चम्चमाती तलवार बाहर निकाल
41:50ली
41:51युगों पुरानी आंतरिक शत्रुता और अहंकार की आग ने उनके मस्तिष्क पर ऐसा परदा डाला कि वे अपने सगेभाई बंधों
42:00को शत्रु समझने लगे
42:02एक विशालकाय अंधक योध्धाने मदमत्थ होकर मदिरा से भरा स्वर्ण पात्र भूमी पर दे मारा जिससे मदिरा रक्त की भांती
42:11खैल गई
42:12महर्शियों के श्राप का कारण बना साम्ब इस कलह को देख कर विक्षिक्तों की भांती हंसने लगा और दोनों पक्षों
42:20को उकसाने लगा
42:22क्रोध की चरम सीमा पर पहुंचे सात्यकी ने अपनी धारदार तलवार खीच कर कृतवर्मा की ग्रीवा की ओर तान दी
42:30कृतवर्मा के समर्थकों ने तुरंट अपनी धाले और खडग उठा लिये जिससे दोनों और से हथियारों की जंकार गूंजने लगी
42:40प्रभास छेत्र के क्षितिच पर ढलते सूर्य की अंतिम लाल किर्णे मानो इस बात का संकेट थी कि यादव वंश
42:47का प्रताप सदा के लिए अस्थ हो रहा है
42:51ज्यानी उदधव ने अंतिम बार उन्हें समझाने का प्रयत्न किया परंतु मत के कोलाहल में उनकी शांतिप्रिय वानी पूरी तरह
42:59दब गई
43:01नेती के इस करूर खेल को भामपकर उदधव ने अत्यंत दुखी मन से वहां से प्रस्थान करने का निर्णै लिया
43:08और उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले
43:12सागर से उठी एक भीशन जलतरंग ने तट से टकरा कर द्वारका के विशाल रेश्मी ध्वच को उखाड फेंका जो
43:19उनके पतन का सूचक था
43:22अब शब्दों और गालियों का दौर अब शारिरिक हाथापाई में बदल गया जिससे उनके बीच का मर्यादापूर्ण आचन समाप्थ हो
43:30गया
43:31कभी धर्म की रक्षा करने वाले यादव आज रक्त पिपासू असुरों की भांती एक दूसरे को घूर रहे थे और
43:39उनके हाथों में अस्त्र थर्थरा रहे थे
43:43सात्यकी ने पूर्ण बल के साथ कृत वर्मा पर प्रहार करने के लिए अपना खडगहवा में लहराया जिसने महाविनाश के
43:50तांडव का द्वार खोल दिया