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राजा सगर अपने 60,000 पुत्रों के विनाश से गहरे शोक में डूबे हैं। अश्वमेध यज्ञ अधूरा है और सगर वंश संकट में है। ऐसे में कौन करेगा अश्व की खोज और पुत्रों के उद्धार का मार्ग प्रशस्त? इस एपिसोड में देखें, कैसे सगर के पोते अंशुमान एक असंभव यात्रा पर निकलते हैं, कपिल मुनि से मिलते हैं, और सगर वंश के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के महान संकल्प की शुरुआत होती है। एक अद्भुत साहसिक और आध्यात्मिक यात्रा जो पीढ़ियों तक चलेगी! #VishnuPurana #SagarKatha #Anshuman #KapilMuni #GangaDescent #HinduMythology #Suryavansh
Transcript
00:00अपने साथ हजार पुत्रों के भस्म होने की हृदय विदारक सूचना पाकर राजा सगर गहरे शोक के सागर में डूब
00:07गए और उनका विशाल राजमहल मौन वेदना से घिर गया।
00:12अश्वमेध यग्य की अधूरी यग्यशाला में पवित्र अगनी अब ठंडी पड़ चुकी थी और यग्य का स्तंभ बिना अश्व के
00:19अत्यंत सूना और उजड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था।
00:23संपूर्ण अयोध्या नगरी में सन्नाटा पसरा हुआ था जहां नागरिक अपने प्रिय राजकुमारों की अकाल मृत्यू पर फूट फूट कर
00:32आसू बहा रहे थे।
00:33महल के भीतर रानिया केशिनी और सुम्ती अपने मृत पुत्रों के वस्त्रों को छाती से लगा कर विलाप कर रही
00:41थी जिससे पत्थरों का हृदय भी पसीज रहा था।
00:46महाराज सगर ने अपने कमपकमपाते हाथों में यग्य की भस्म को उठाया और अपने वन्ष के इस भीशन अंत पर
00:53फूट फूट कर रोने लगे।
00:55इस महान शोक के समय ब्रहमर्शी वशिष्ट अत्यंत गमभीर और शान्त कदमों से विलाप कर रहे राजा सगर के दर्बार
01:04में प्रविश्थ हुए।
01:05राजा सगर ने व्याकुल होकर वशिष्थ मुनी के चर्णों में अपना मस्तक रख दिया और अपने पुत्रों की आत्मा की
01:13शान्ती का मार्ग पूछने लगे।
01:15महर्शी वशिष्थ ने दुखी राजा को धान्धस बंधाया और समझाया कि जब तक यग्य का अश्व वापस नहीं आता और
01:24पुत्रों का तरपन नहीं होता, तब तक उन्हें मुक्ती नहीं मिल सकती।
01:28सभा के एक कोने में खड़े युवा राजकुमार अंशुमान अपने पितामह के असीम कष्ट और कुल के विनाश को देखकर
01:37भीतर ही भीतर संकल्प से भर उठे।
01:40राजा सगर ने कापती आवाज में महर्शी को बताया कि कैसे उनके साथ हजार पुत्र पाताल लोक में कपिल मुनी
01:48के क्रोध की अगनी में जल कर राख हो गए।
01:51पाताल लोक की उस भयानक और अंधकारमय गुफा में साथ हजार राजकुमारों की भस्म के विशाल धेर अभी भी अपनी
01:59मुक्ती की प्रतीक्षा कर रहे थे।
02:02अपने कुल के उद्धार के लिए वीर और तेजस्वी राजकुमार अंशुमान ने आगे बढ़कर अपने विलाप करते हुए पितामह सगर
02:11के चर्णों में प्रणाम किया।
02:13अंशुमान ने अत्यंत द्रिड संकल्प के साथ प्रतिग्याकी की वे पाताल लोक जाकर उस यगिय अश्व को वापस लाएंगे और
02:22अपने पिताओं की मुक्ती का मार्ग खोजेंगे।
02:26ब्रहमर्शी वशिष्ठ ने मंत्रोच चार करते हुए अपने दिव्य हाथों से अंशुमान को आशिरवाद दिया, जिससे उनका संपूर्ण शरीर एक
02:34अलोकिक तेज से चमक उठा।
02:37महाराज सगर ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने वीर पोत्र अंशुमान को गले से लगा लिया, जिसमें उनके कुल की अंतिम
02:45आशा की किरन दिखाई दे रही थी।
02:48महल के विशाल द्वारों पर एक अत्यंत शक्तिशाली और श्वेत अश्व अंशुमान की इस महायात्रा के लिए पूरी तरह से
02:56तैयार खड़ा था।
02:58अंशुमान ने अपने कंधों पर धनुष और तरकश धारण किया और अत्यंत गंभीर भाव से अपनी मात्रिभूमी अयोध्या की पवित्र
03:07मिट्टी को मस्तक से लगाया।
03:10प्रस्थान से पूर्व महाराज सगर ने भगवान विश्णु की दिव्य प्रतिमा के सम्मुख बैठ कर अपने पौत्र की सफलता के
03:17लिए अत्यंत भावुक प्रार्थना की।
03:21अयोध्या के शोकमगन नागरिकों ने अपने हाथों में जलती हुई मशाले लेकर राजकुमार अंशुमान के साहस को नमन किया और
03:29उन्हें विदा किया।
03:31अपने अदमय साहस और द्रिड विश्वास के साथ राजकुमार अंशुमान ने अपने घोडे को दोड़ाया और घने रहस्य में जंगलों
03:40की ओर पाताल लोग की यात्रा पर निकल पड़े.
03:44राजकुमार अंशुमान का अश्व क्तीवर वायु के समान घने और भयावववन मार्क से होकर पाताल लोग की ओर दौरता चला
03:52जा रहा था, जहां हर पत्ता एक अनकहा रहस्य छिपाए हुए था.
03:58कभी वह विशाल परवतों को पार करते, तो कभी गहरी नदियों को अश्व पर सवार होकर अत्यंत सावधानी से लांगते
04:06हुए अपनी अटूट प्रतिग्या की ओर बढ़ते जा रहे थे.
04:10जैसे जैसे वह आगे बढ़ते गए, प्रित्वी में गहरे दरारें और विशालकाय सुरंगे दिखने लगी, जो सगर पुत्रों के अथक
04:19परिश्रम और विध्वन्स का मूग प्रमाण थी.
04:22अंतह एक विशालकाय गुफा के मुख पर पहुँचकर, अन्शुमान ने देखा कि पाताल लोक का प्रवेश द्वार अंधकार और रहस्य
04:31में डूबा हुआ था, जहां से एक अजीब सी शीतल वायू उपर की ओर बह रही थी.
04:37बिना किसी भयके, अपने हृदय में अटूट विश्वास और संकल्प लिये, अन्शुमान ने अपने अश्व सहित उस अंधेरी खाई में
04:46प्रवेश किया, जहां हर कदम गेहन अंधकार की ओर ले जा रहा था.
04:51पाताल लोग की रहस्यमई गुफाओं में, जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुचता था, अन्शुमान को सिर्फ अपने अश्व के
04:59खुरों की ध्वनी और अपनी सासों का शोर ही सुनाई दे रहा था.
05:04हर मोड पर उन्हें उन विशाल खाईयों और तूटी हुई चट्टानों के धेर दिखाई देते थे, जो उनके चाचाओं द्वारा
05:12मोक्ष की तलाश में की गई असीमित खुदाई का मुख गवाह थी.
05:17इस अध्भुत और भयावध द्रिश्य को देखकर अन्शुमान को अपने दिवंगत चाचाओं के अथक प्रयासों की गहनता का एहसास हुआ,
05:26जिन्होंने अपनी खोज में पूरे पाताल लोग को विदीर्ण कर दिया था.
05:31गहन अंधकार के बीच उन्हें दूर से एक मंद शांत प्रकाश दिखाई दिया, जो किसी दिव्य उपस्थिती या शांती पूर्ण
05:39स्थल की ओर संकेट कर रहा था.
05:42उसी प्रकाश की ओर बढ़ते हुए, अंशुमान ने पाया कि वह पाताल के मध्य में स्थित एक शांत और पवित्र
05:50आश्रम की ओर अग्रसर थे, जहां बातावर्ण में एक अद्वितिय शांती और पवित्रता का अनुभव हो रहा था.
05:58आश्रम के निकट पहुँचते ही, उनकी आखों ने वह बहुप्रतीक्षित अश्व देखा, जो शांत भाव से एक पेड के नीचे
06:06खड़ा था, मानो अपने स्वामी की प्रतीक्षा कर रहा हो.
06:11अश्व के पास ही, अन्शुमान को अपने साथ हजार चाचाओं के शरीर की राख दिखाई दी, जो एक बड़े धेर
06:18के रूप में पड़ी थी, उनके मोक्ष की अधूरी यात्रा का मौन प्रतीक्षित्षित अपने चाचाओं की राख को देखकर अन्शुमान
06:27का हृदय व
06:37बनी थी, तभी आश्रम के भीतर से एक दिव्य आभा निकलती हुई दिखाई दी, जहां स्वय महर्शी कपिल अपनी योग
06:46निद्रा से जागरित होकर परम शांती और ज्यान के साथ विराजमान थे, अन्शुमान ने अत्यंत विनमरता और श्रधा के साथ
06:55महर्शी कपिल की
06:57और कदम बढ़ाए, उनके मुख पर एक गेहन जिग्यासा और मोक्ष की कामना सपष्ट जलक रही थी। उन्होंने अपने दादा
07:05महाराज सगर की पीरा, अश्वमेध, यद्य के अश्व के अफरन और अपने चाचाओं के विनाश की पूरी कहानी महर्शी को
07:13अत्यंत भाव
07:17महर्शी कपिल ने अपनी दिव्यद रिष्टी से सब कुछ जानते हुए भी अन्शुमान की हर बात को धैर्य पूर्वक सुना,
07:24उनके हृदय की शुधता और संकल्प की गहराई को अनुभव करते हुए।
07:44महर्शी कपिल ने अपने होट खोले, मानो ब्रहमांड के प्राचीन रहस्यों को उजागर करने के लिए तयार हो और अन्शुमान
07:52की आशाय आसमान चूने लगी।
08:14परवत्सी चुनोती खड़ी कर दी, जिसे पार करने के लिए उन्हें स्वर्ग के शिखरों को चूना था और पाताल की
08:21गहराईयों में उतरना था।
08:23यह केवल एक अश्व को खोजने की यात्रा नहीं थी, अपितु अपने पूर्वजों की आत्माओं को मुक्ती दिलाने और अपने
08:32वंश पर लगे कलंग को मिटाने का एक असाधारन तब था।
08:36अंशुमान ने अपने मन में संकल्प का एक अटूट स्तम्भ स्थापित किया, कि चाहे कितनी भी बाधाये आएं, वह इस
08:45असंभव से प्रतीत होने वाले कार्य को अवश्य सिद्ध करेंगे।
08:49इस गेहन विचार मन्थन के पश्चात अंशुमान अपने वृद्ध और शोकग्रस्ट दादा महाराजा सगर के समक्ष पहुँचे, जिनके हृदय में
08:59आशा की एक शीन किरन मात्र बची थी।
09:03अंशुमान ने महर्शी कपिल के देववानी सद्रिश वचनों को अपने दादा को विस्तार से सुनाया, जिसमें गंगा के अवतरण की
09:11अनिवार्यता और उसके दिव्य प्रभाव का उल्लेख था।
09:15इन वचनों को सुनकर महराजा सगर का हृदय पहले तो करुणा और निराशा से भर उठा, किन्तु फिर अंशुमान के
09:23मुखमंडल पर द्रिडता देखकर उनके भीतर एक नई आशा का संचार हुआ।
09:29महराजा सगर ने अपने प्रिय पोते के मस्तक पर अपना कमपायमान हाथ रखकर आशिरवाद दिया, मानो अपनी बची-खुची सारी
09:38शक्ती और अपने वंश की आशा उसके कंधों पर सौंप रहे हुँ।
09:43अब गंगा को धर्ती पर लाने का असंभव सा कार्य अंशुमान के जीवन का एक मात्रधे बन गया था और
09:50वह इसकी तैयारी में जुट गए पहले पाताल तक का मार्ग खोजने।
09:56अंशुमान ने अपने दादा और अपने राज्य के शेश सदस्यों से विदाई ली। उनके हृदय में एक अथाह पीडा थी,
10:04किन्तु कर्तव्य का आहवान इससे कहीं अधिक प्रबल था।
10:08उन्होंने उस विशालकाय विदर के मुहाने पर कदम रखा, जो उनके चाचाओने प्रिथवी को खोद कर बनाया था, और वह
10:16पाताल लोग की ओर उनके मार्ग का द्वार था।
10:20जैसे ही वह गहरे मार्ग में उत्रे, घोर अंधकार ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया, और उपर के संसार
10:28की रोशनी पीछे छूट गई, मानों कभी थी ही नहीं।
10:32यह मार्ग अत्यंत दुर्गम था, पत्रीले धलान, अस्थिर मिट्टी और तीक्षन चट्टानों से भरा हुआ, जहां एक भी गलत कदम
10:41मृत्यू का आहवान कर सकता था।
10:44गहरे कुए की दीवारों पर अध्भुत और भयावः वनस्पती लिप्ती हुई थी, कुछ चमकती हुई, कुछ मानसभक्षी सी प्रतीत होती
10:53हुई, जो पाताल लोग की भयावः सुन्दर्ता का परिचय दे रही थी।
10:58अंधकार में कभी-कभी असपष्ट आकृतिया उभरती, भयावः फुस्फुसाटे सुनाई देती, जो मन को भ्रमित करने और आत्मा को भयभीत
11:07करने का प्रयास करती थी।
11:10किन्तु अंशुमान का द्रेढ निश्चय और पवित्र उद्देश किसी भी भ्रम या भय से अधिक शक्तिशाली था, जो उन्हें निरंतर
11:18आगे बढ़ने की प्रेणा देता रहा।
11:21जैसे जैसे वह और गहरे उतरते गए, हवा भारी होती गई, उसमें गंधक और प्रित्वी के प्राचीन रहस्यों की गंध
11:29घुली हुई थी, जो पाताल लोग की उपस्थिती को और भी सघन बना रही थी।
11:35कहीं कहीं प्राचीन सुरंगे दिखाई देती थी, जिन पर विलुप्त सभ्यताओं के प्रतीक उत्कीन थे, जो समय के साथ खो
11:43गए रहस्यों की कहानिया सुनाती थी।
11:46इस भयानक और भूल-भूलियासे मार्ग में, हर मोर पर एक नई चुनोती और अज्यात खत्रा उसका इंतजार कर रहा
11:55था, जो उसके संकल्प की अगनी को और प्रजवलित कर रहा था।
12:00प्रतेक पक के साथ अंशुमान का आत्म विश्वास बढ़ता गया, क्योंकि वह जानता था कि यह मार्ग उसे केवल पाताल
12:08लोग तक ही नहीं, बलकि अपने पूर्वजों की मुक्ती तक ले जाएगा।
12:13अपने द्रिड संकल्प के साथ अंशुमान ने अग्यात और भयावः पाताल लोग की गहराईयों में अपनी यात्रा जारी रखी, अपने
12:22वंश के उध्धार का भार अपने युवा कंधों पर उठाए हुए।
12:27पाताल लोग की गहराईयों में जहां समय का भान धूमिल हो जाता था और मौन का सामराज्य था, अंशुमान की
12:34यात्रा अटूट संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी, प्रत्येक पग अज्यात के विरुद्ध एक सासिक चुनौती था।
12:42अचानक मार्ग में एक विशालकाय छाया प्रकट हुई, जो उस अंधकार में लोक में भी दिव्य उर्जा से चमक रही
12:50थी, जिसने अंशुमान को क्षण भर के लिए अपनी गती रोकने पर विवश कर दिया।
12:56यह कोई सामान्य प्राणी नहीं था, उसकी भव्यता और आभा स्वयन देवताओं के वाहन गरुड की ओर संकेत कर रही
13:04थी, जो अपने स्वर्गिये तेज से पाताल लोक के अंधकार को चीर रहा था।
13:10गरुड ने धीरे-धीरे धर्ती पर उतर कर अपने विशाल पंखों को समेटा, उनकी दिव्यध्वनी पाताल लोक की चुप्पी को
13:18भेदती हुई अंशुमान के कानों तक पहुँची।
13:21अंशुमान जिसने अपने जीवन में इतनी भव्य और दिव्य सत्ता कभी नहीं देखी थी, गरुड के समक्ष सिर जुकाकर श्रधा
13:30पूर्वक खड़ा हो गया।
13:31गरुड की आवाज मेगों की गर्जना के समान गंभीर और दिव्य थी, जिसने अंशुमान की आत्मा में एक अजीब सी
13:40शांती और साहस भर दिया।
13:43गरुड ने अंशुमान से कहा कि वे उसके पूर्वजों की मुक्ती के लिए उसकी महान यात्रा और अटूट संकल्प से
13:50परिचित हैं। और यही कारण है कि वे यहां उसकी सहायता हेतु आये हैं।
13:58ततपश्चात गरुड ने अंशुमान को इंद्र के कपट का विस्तृत विवर्ण दिया। कैसे उन्होंने अशुमेध यग्य के अश्व को चुरा
14:05कर कपिल मुनी के आश्रम में छिपाया था।
14:09उन्होंने बताया कि कैसे देवराज, इंद्र, राजा सगर के बढ़ते प्रभाव और अश्वमेध यग्य की पूनता से भैभीत होकर यह
14:17नीच कृत्य करने पर विवश हुए थे।
14:21गरूर ने सपश्ट किया कि इंद्र का उद्देश केवल यग्य में विघन डालना था, ताकि राजा सगर देवलोग पर अपनी
14:29प्रभुता स्थापित न कर सकें।
14:31फिर गरूर ने अंशुमान को चेतावनी दी की जिस स्थान पर अश्व छिपाया गया है, वह कोई सामान्य आश्रम नहीं,
14:40बलकि परम तपस्वी कपिल मुनी का पवित्र निवास है।
14:44उन्होंने कपिल मुनी की अदमय, योगिक शक्ती और उनके प्रचंड क्रोध के बारे में बताया, जिसका सामना करना किसी साधारन
14:53मौटल के बसकी बात नहीं थी।
14:56गरुर ने अंशुमान को याद दिलाया कि मुनी की तपस्या इतनी गहन है कि उनका ध्यान भंग करना या उन्हें
15:03किसी भी प्रकार से अपमानित करना, प्रलय को आमंत्रित करने के समान है।
15:09गरुर ने चेतावनी दी की कपिल मुनी की क्रोधागनी स्वयं प्रलय के समान है, जिससे एक क्षण में सब कुछ
15:17भस्न हो सकता है, जैसा कि उन्होंने अतीत में कई बार सिद्ध किया है।
15:22आथक गरुर ने अंशुमान को सलाह दी की वह कपिल मुनी के समक्ष अत्यंत विनमर्ता और सम्मान के साथ प्रस्तुत
15:30हो अपने उद्देश्य को सपष्ट करते हुए केवल अश्व की आचना करे।
15:36उन्होंने जोर दिया कि एक पवित्रहरिदय और शुद्ध इंटेंशन्स ही मुनी के क्रोध को शांत कर सकते हैं और उसके
15:44पूर्वजों के उद्धार का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
15:48गरुड ने अंशुमान को कपिल मुनी के आश्रम तक पहुँचने का गुप मार्ग और आश्रम के आसपास के वातावर्ण की
15:55सुक्ष्म जानकारी भी प्रदान की।
15:58इन महत्वपूर्ण वचनों को सुनकर अंशुमान के मन में एक नया साहस और स्पश्टता भर गई उसके संकल्प की अगनी
16:07अब और भी प्रखर हो उठी थी।
16:10अपनी दिव्य सहायता पूर्ण करने के पश्चात गरुड ने अंशुमान को आशिरवाद दिया और एक विशालकाय स्वर्गिय उडान भरकर पाताल
16:19लोग की गहरायों से उपर उठते हुए अद्रिश्य हो गए।
16:24अंशुमान अब अकेले खड़ा था, अपने पूर्वजों की मुक्ती के लिए कपिल मुनी के आश्रम की ओर बढ़ने को तयार
16:31उसके हृदय में एक नयापत और अटूट विश्वास था।
16:36पाताल लोग की रहस्यमई गुफाओं को पार करते हुए युवा राजकुमार अंशुमान अत्यंत शान्तचित्थ होकर कपिल मुनी के तपोवन की
16:44ओर बढ़ने लगे।
16:46अंधकारमय भूगर्भ के मध्य अचानक उन्हें एक अलौकिक शान्त दिव्य आश्रम द्रिष्टि गोचर हुआ जहां चारों और पवित्र शान्ती व्याप्त
16:55थी।
16:56उस सुरमय स्थान के निकट अंशुमान ने निर्भय होकर चरते हुए दिव्य यगी अश्व को देखा, जिसका श्वेत रूप देदी
17:05प्यमान हो रहा था।
17:07अश्व के पास ही विशाल भस्म के टीले को देख कर अंशुमान का हृदय अपने साथ हजार काकाओं के दुखद
17:14अंत पर व्यथित हो उठा।
17:17उसी प्रांगण में एक वटवरिक्ष के नीचे भगवान विश्णु के अंशावतार महर्शी कपिल गहन ध्यान समाधी में लीन होकर अलोकिक
17:25तेजों में प्रतीत हो रहे थे।
17:28अपने पूर्वजों की अहमकार पूर्ण भूल से सीख लेते हुए अंशुमान ने अपने धनुष और बान को श्रधा पूर्वक भूमी
17:36पर त्याग दिया।
17:37परम नमर्ता और भक्तिभाव से उतप्रोथ होकर युवा अंशुमान ने नंगे पाव आश्रम की अत्यंत पवित्र भूमी पर कदम रखा।
17:46महर्शी कपिल के तेजस्वी स्वरूब के समक्ष पहुँचकर राजकुमार ने अत्यंत विनय के साथ साष्टान प्रणाम किया।
17:56भूमी से उठकर अंशुमान ने अश्रुपूरित नेत्रों और जुडे हुए हाथों से ध्यानस्थ मुनिवर की स्तुती आरंभ की।
18:03उनके कंट से फूटते मधूर स्तोत्र और नमरतापूर्ण वचनों ने संपूर्ण आश्रम के वातावर्ण को भक्ती रस से सराबोर कर
18:12दिया।
18:14अंशुमान ने अत्यंत कातर स्वर में सगर वंश पर आये इस घोर संकट और अपने साथ हजार काकाओं के दारोन
18:21विनाश का वृत्तान्त सुनाया।
18:24उन्होंने विनमरता पूर्वक प्रार्थनाकी की महाराज सगर का महान अश्वमेध यग्य निर्विधन संपन्न करने है तू यग्य अश्व लोटा दिया
18:33जाएं।
18:34अंशुमान की निर्मल भक्ती और असीन नमरता को भांप कर महर्शी कपिल ने धीरे से अपने करुणापूरित नेत्र खोले।
18:43क्रोध के स्थान पर महर्शी के दिव्यमुख मंडल पर अत्यंत वात्सल्य और प्रसन्नता का भाव छलक उठा।
18:51अंशुमान ने पुनह जुपकर कहा, हे ब्रहमर्शी, हम आपके तपोबल का आदर करते हैं और केवल अपने वंश के उद्धार
19:00की याचना करने आये हैं।
19:03महर्शी कपिल ने अपनी गंभीर और मधुर वानी में अंशुमान के उच्च संसकारों तथा अहमकार रहित चरित्र की भूरी भूरी
19:12प्रशन साकी।
19:13प्रसन होकर कपिल मुनीने सहर्ष आग्यादी की अंशुमान इस पवित्र अश्व को लेकर राजा सगर के यग्यस्थ हल पर लोट
19:21सकते हैं।
19:24महर्शी का यह वर्दान और अनुमती पाकर अंशुमान का हृदय असीन कृतग्यता और आनन से भर गया।
19:32ततपश्चात महर्शी कपिल ने अंशुमान को आश्वस्त किया कि भविश में इस सगर वंश का पूर्ण उद्धार सुरसरी गंगा के
19:40आग्मन से होगा।
19:42महर्शी के चरण स्पर्शकर और दिव्य अश्व की बागदोर संभाल कर अंशुमान अपने संकल्प पूर्ती के अगले चरण के लिए
19:50ततपर हुए।
19:52महर्शी कपिल ने अपनी तपस्या की उर्जा से युक्त पवित्र भस्म की चुटकी उठाकर युवा राजकुमार अंशुमान के हाथ में
20:00सौंप दी।
20:02अंशुमान ने अत्यंत अगाद श्रद्धा और विन्यभाव से उस पवित्र भस्म को ग्रहन करते हुए महर्शी के समक्ष अपना शीष
20:10जुकाया
20:12महर्शी कपिल ने अंशुमान को निर्देश दिया कि वे बिना किसी विलंब के इस दिव्य अश्व को ले जाकर अपने
20:19पितामह का यग्य पूर्ण कराएं
20:22अंशुमान ने अलौकिक कांती से चमकते हुए यग्य के श्वेट अश्व की स्वर्णिम बागडोर को द्रिड़ता से थाम लिया
20:30पाताल लोग की उस शांत गुफा से प्रस्थान करने से पूर्व अंशुमान ने महर्शी कपिल के तेजस्वी स्वरूप को अंतिमबार
20:38नमन किया
20:40दिव्य अश्व की बागडोर संभाले हुए राजकुमार अंशुमान पाताल लोग की रहस्यमई और अंधेरी सुरंगों से होकर उपर की ओर
20:49बढ़ने लगे
20:50पाताल की गहन गहराईयों को पार करके अंशुमान अंतर पृत्वी लोग के सूर्य के दिव्य प्रकाश में सुरक्षित बाहर निकलाए
21:00राजकुमार अंशुमान उस अलौकिक अश्व को साथ लेकर घने जंगलों और विशाल परवतों को पार करते हुए अयोध्या की सीमा
21:08में प्रविष्ठ हुए
21:10संध्या काल के स्वर्णिन प्रकाश में चमकते हुए अयोध्या के भव्य और विशाल राजद्वारों ने अंशुमान का स्वागत किया
21:19अयोध्या के राजसिनहासन पर विराजमान वृद्ध समराट सगर अपने साथ हजार पुत्रों के शोक में अत्यंत व्याकुल और चिंतित बैठे
21:28थे
21:29अंशुमान ने जब दिव्य अश्व के साथ राजसभा में प्रवेश किया तो संपूर्ण दर्बार में उपस्थित सभी लोग आश्चर्य और
21:38हर्श से भर उठे
21:40राजकुमार अंशुमान ने अपने पितामह राजा सगर के चर्णों में जाकर भस्म से भरा पवित्र कलश अत्यंत सादर अर्पित किया
21:49राजा सगर ने अपनी अश्रुपूरित आँखों से अंशुमान द्वारा सुनाए गए अपने साथ हजार पुत्रों के भस्म होने का दुखद
21:57वृत्तांत सुना
21:59इसके पश्चात अंशुमान ने महर्शी कपिल के उस दिव्य वचन को दोहराया कि भविश्य में देवन्दी गंगा के जल से
22:07ही उनके चाचाओं को अंतिम मुक्ती मिलेगी
22:11महर्शी कपिल की अपार कृपा और गंगा अवतरण के भावी मार्ग का समाचार सुनकर राजा सगर को अपार सांत्वना प्राप्थ
22:19हुई
22:20राजा सगर ने तुरंट अपने कुल पुरोहितों के साथ मिलकर अधूरे पड़े महान अश्वमेध यग्य की आहुतियां पुनह प्रारंभ करवाई
22:30यग्यवेदी से उठती हुई पावन योगगनी की लप्टों ने आकाश को आलोकित कर दिया और अश्वमेध यग्य सकुषल संपन्न हुआ
22:39यग्य के सफलता पूर्वक पूर्ण होने के पश्चात राजा सगर ने अपने वन्ष के भावी उद्धार हेतु संपूर्ण राजपाथ अंशुमान
22:47को सौंपने का विचार किया
22:50अंशुमान ने पवित्र यग्यवेदी के समक्ष हाथ जोड कर यह प्रतिग्याली की वे सुरसरी गंगा को प्रित्वी पर लाने के
22:58प्रयास में कोई कसर नहीं छोडेंगे
23:01अनंत आकाश की गहरायों में दिव्य प्रकाश की किरने बिखर गई जो सगर्वन्ष के अंतिम उद्धार हेतु गंगा के पावन
23:09अवतरण का मार्ग प्रशस्त कर रही थी
23:13अंधकार को चीरते हुए अन्शुमान अश्व को साथ लिए अपने मृत चाचाओं की पवित्र भस्न को हृदय से लगाए द्रिड
23:21संकल्प के साथ अयोध्या की ओर लोट रहे थे
23:24जिनके पच्चेन प्रित्वी पर एक नई आशा की कहानी लिख रहे थे
23:30दूरक्षितिच पर अयोध्या के भव्यद्वार जगमगाते हुए दिखाई दिये
23:34जैसे स्वयन देवगन उसके विजी आगमन का अभिनंदन करने को आतुर हो और अंशुमान के मन में एक नई उर्जा
23:42का संचार हो गया
23:45अंशुमान के नगर प्रवेश करते ही शंकनाद और जैकारों की ध्वनी से पूरी अयोध्या गूंज उठी जिसने वर्षों से लटकी
23:53निराशा के बादल छाट दिये और हर हृदय में विजय का उत्साह भर दिया
23:59महल में राजा सगर अधीरता से अपने पोते की प्रतीक्षा कर रहे थे उनके चहरे पर आशा और चिंता की
24:06गहरी परछाईया एक साथ नाच रही थी जो एक लंबे और कष्ट प्रद इंतजार की कहानी कह रही थी
24:14जब अन्शुमान और सगर का मिलन हुआ तो आखों से बहते आसू और हृदय को छू लेने वाले आलिंगन ने
24:21युगों के कष्ट और अब मिली मुक्ती की पहली किरण को एक साथ प्रकट किया
24:27अन्शुमान ने श्रद्धा पूर्वक अपने चाचाओं की पवित्र भस्म से भरा पात्र और यग्य का अश्व सगर को समर्पित किया
24:35जो उनके अथक परिश्रम और पैत्रिक रेन चुकाने के संकल्प का प्रतीक था
24:41अपने दादा को कपिल मुनी के दिव्य संदेश और गंगा के प्रिथवी पर अवतरन से सगर वंश की मुक्ती के
24:47मार्ग का विस्त्रित वर्णन सुनाते हुए अन्शुमान की वानी में एक अविश्वसनी आशा की चमक थी
24:55कपिल मुनी का वर्दान सुनकर सगर का हिदय असीम शान्ती और नवजीवन की भावना से भर गया जैसे वर्षों से
25:03चला आ रहा अंधकार एक ही पल में मिट गया हो
25:07यग्य के समापन की तैयारिया युद्धस्तर पर आरंभ हो गई अयोध्या के हर कोने से उल्लास और उत्साह की ध्वनी
25:15उठ रही थी जो आने वाले शुब ख्षणों का संकेत दे रही थी
25:20पुनरजीवित उत्साह के साथ यग्य का पुनह आरंभ हुआ जहां मंत्रों की शक्तिशाली गूंज और अगनी की लप्तें आकाश को
25:29छू रही थी देवताओं को आमंत्रित करती हुई
25:33सुसजजित यग्य का अश्वक जो अब पवित्रता और विजय का प्रतीक बन चुका था को सम्मान पूर्वक यग्यवेदी के समक्ष
25:41लाया गया जिसकी उपस्थिती से संपूर्ण वातावर्ण दिव्यहोग उठा
25:46राजा सगर ने श्रधा और पूर्णता के साथ अंतिम आहुतिया अगनी को अर्पित की उनके हाथ काप रहे थे परंतु
25:55उनके मन में वर्षों के स्वपन को पूर्ण करने का अध्वितिय संतोश था
26:00यग्य के पूर्ण होते ही आकाश से दिव्य प्रकाश की एक किरण सीधी यग्यवेदी पर उतरी जो देवताओं द्वारा इस
26:08महान कार्य की स्वीकृती और आशिर्वाद का स्पष्ट संकेत थी
26:13इस प्रकार अश्वमेध यग्य सफलता पूर्वक संपन हुआ जिसने राजा सगर की संप्रभुता को अजे घोशित किया और उनके राज्य
26:22को एक नई मुचाई पर स्थापित किया
26:26पूरे अयोध्या में विज्योत्सव और आनंद का माहौल छा गया जहां लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे थे संगीत
26:34और नृत्य की धुने हर गली में गूंज रही थी
26:37एक भव्य समारोह में सगर ने विधिवत अंशुमान को युवराज घोशित किया उनके कंधों पर वंश की गरिमा और भविश्य
26:46के उद्धार का भार सौंपते हुए
26:49अंशुमान ने पुन्ह पवित्र अगनी के समक्ष अपनी प्रतिग्या दोहराई की वे गंगा को प्रिथवी पर लाने के अपने संकल्प
26:57से कभी विचलित नहीं होंगे भले ही इसमें अनंत चुनोतिया क्यों नहों
27:02मन को शांत और संतुष्ट पाकर सगर ने अपने वन्ष के भविश्य और गंगा के अवतरण की प्रतीक्षा में गेहन
27:10ध्यान में लीन होने का निश्चय किया एक नए यूग की दहलीज पर खड़े होकर
27:16अचानक अनंत आकाश में गंगा की दिव्यधारा की एक क्षणिक जलक दिखाई दी जो भविश्य के उस पवित्रक्षण का पूर्वाभास
27:24करा रही थी जब वह प्रित्वी पर अवतरित होंगी
27:29सगर्वंश का भविश्य अब गंगा के पावन प्रवाह से जुड़ा था एक ऐसी महागा था जिसकी अगली कड़ी में एक
27:36और पीढ़ी को अपनी तपस्या से इसे साकार करना था
27:41सगर्व अपने राज सिनहासन पर बैठे अनंत ब्रह्मांड की गहरायों में डूबे हुए अपने पुत्रों के अधूरे मोक्ष और गंगा
27:49के अवतरण की प्रतीक्षा में गहन चिंतन कर रहे थे
27:53उनके मानस पटल पर अभी भी उन साथ हजार पुत्रों की भस्म की करोन छवी कौंध रही थी जो कपिल
28:00मुनी के क्रोध का ग्रास बने थे और मुक्ती की आस में बैकुंट की ओर देख रहे थे
28:07कपिल मुनी के शब्द उनके कानों में गूंज रहे थे कि केवल पतित पावनी गंगा का स्पर्श ही उनके वन्ष
28:14जों को अनंत मोक्ष प्रदान कर सकता है
28:18उन्हें आभास हुआ कि यह कार्य उनके व्यक्तिगत तपस्या से कहीं अधिट उनके पूरे वन्ष की पीढी दरपीढी की महान
28:26साधना की प्रतीक्षा कर रहा था
28:29अपने कुल के उध्धार का यह अकल्पनिय भार उनके कंधों पर एक परवत की तरह महसूस हो रहा था जिसकी
28:36उचाए केवल दैविय क्रिपा से ही ना पी जा सकती थी
28:41उन्होंने महसूस किया कि उनका अपना जीवनकाल इस भव्य संकल्प की पूर्ती के लिए परियाप्त नहीं होगा और अब यह
28:49जिम्मेदारी अगली पीढी को सौंपनी होगी
28:53उनके हृदय में अपने वन्ष के प्रती अगाध प्रेम और द्रिढ निश्चय उमर पड़ा उन्होंने अपने उत्तराधिकारी को इस पवित्र
29:01कर्तव्य के लिए तैयार करने का संकल्प लिया
29:05इसी क्षन उनके प्रिय पौत्र अंशुमान नमरता और सम्मान से भरे हुए शांत कदमों से उनके सम्मुख उपस्थित हुए उनके
29:13मुख पर गहन चिंता के भाव थे
29:17सगर ने आखें खोली उनकी द्रिष्टी में एक अनन्त गामभीर्य और दूरदर्शिता थी जैसे वे युगों के पार देख रहे
29:25हों और अपने पौत्र में एक नया अध्याय तलाश रहे हों
29:30सगर ने धीर गंभीर स्वर में कहा अन्शुमान हमारे वन्ष का भाग्य अब एक ऐसे संकल्प से बंधा है जो
29:38प्रित्वी और आकाश के बीच एक सेतु का निर्मान करेगा
29:42कपिल मुनी ने मार्ग दिखाया है कि केवल स्वर्ग की पावन गंगा ही हमारे पूर्वजों की आत्माओं को मोक्ष दिला
29:50सकती है और यह तुम्हारा परम कर्तव्य होगा
29:54अंशुमान ने अपने दादाजी की बातों को आत्म साथ करते हुए, अपने पूर्वजों की पुकार और गंगा के महान अवतरण
30:02के लिए अपनी आत्मा में एक अगनी प्रजवलित होती महसूस की
30:07सगर ने अपनी मुकुट उतार कर अंशुमान के सिर पर रखा, अपने वंश का भार और गंगा को पृत्वी पर
30:14लाने का पवित्र संकल्प उसे सौंपते हुए
30:18अंशुमान ने अशुरुपूर्ण नेत्रों से किंतु द्रिढ हरिदय से इस महान प्रतिज्या को स्विकार किया, अपने वंश की मुक्ती और
30:26पृत्वी के कल्यान के लिए अपना जीवन समर्पित करने का वचन दिया
30:32सगर ने अपने पौत्र को गले लगाया, उसे अनमोल ज्यान और असीम शक्ती का आशिरवाद दिया, जैसे एक प्राचीन व्रिक्ष
30:40अपनी जडों से उर्जा को नए अंकुर में प्रवाहित कर रहा हो
30:45अंशुमान ने अपने दादाजी को अंतिन प्रणाम किया, उसका हरिदय एक नए दिव्य उद्देश की ज्वाला से प्रजवलित हो चुका
30:53था, जो उसे दुर्गम मार्ग पर ले जाने के लिए तैयार था
30:58एक नए युग का आरंभ हो चुका था, और अंशुमान ने अपना लक्षय हिमालय की ओर साथते हुए कठिन तपस्या
31:06के मारग पर पहला कदम रखा
31:09उसने वन में प्रवेश किया, जहां प्रकृती की कठोर्ता और एकांथ उसे अपनी तपस्या में लीन होने के लिए एक
31:17आदश प्रिष्ठ भूमी प्रदान कर रहे थे
31:20देवलोक में देवतागन और रिशिगन अंशुमान की इस अप्रतिन प्रतिग्या और उसकी आरंभिक तपस्या को उचसुकता से निहार रहे थे
31:29ब्रहमांड में एक नई आशा की किरन जगमगा उठी थी
31:34अब सगरवंश का भविश्य और प्रित्वी का भाग्य अंशुमान के अटूट संकल्प और स्वर्गगंगा के पावन प्रवाह की प्रतीक्षा में
31:42था
31:43एक ऐसी महागा था जो अमर्ता की ओर अग्रसर थी
31:47कपिल मुनी के आश्रम से दिव्य अश्व को लेकर लोटे वीर अंशुमान का स्वागत करने के लिए
31:53राजा सगर ने व्याकुल और अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी बाहें फैला दी
31:59अपने साथ हजार पुत्रों के शोक में डूबे राजा सगर ने अयोध्या के कल्यान के लिए
32:05धर्म प्रायन अंशुमान को राज्य का उत्तराधिकारी घोशित कर उनका राज्या भिशेक कर दिया
32:12संसार के मोह और नश्वर्ता को समझते हुए व्रिध राजा सगर अपने पोते को सुद्रिड सामराज्य सौंपकर वन में तपस्या
32:20करने के लिए प्रस्थान कर गए
32:23महाराज अंशुमान ने अपने न्यायप्रिय और धर्मनिष्ट शासन से प्रजा के दुखों को दूर किया जिससे अयोध्या में सुख और
32:31सम्रिधी का एक नया युग प्रारंभ हुआ
32:35राजसी सुखों के बीच भी अंशुमान के हृदय में अपने साथ हजार पूर्वजों की मुक्ती का प्रश्ण निरंतर एक सुलक्ती
32:42हुई अगनी की भांती दहकता रहता था
32:46गंदा को प्रिथवी पर लाने का अटल संकल्प लेकर अंशुमान ने अपने युवा और वीर पुत्र दिलीग को शासन का
32:53कार्यभार सौंपने का निर्णय किया
32:57अपने राजसी वस्त्रों और आभूशनों का त्याग कर अंशुमान ने एक साधारन वलकल वस्त्रधारन किया और हिमालय की ओर प्रस्थान
33:06कर दिया
33:07हिमालय की गगंचुम्बी बरफीली चोटियों के बीच एक एकांत स्थान पर बैठकर अन्शुमान ने भगवान ब्रहमा की घोर तपस्या का
33:16श्रीगनेश किया
33:17ग्रीश मृतु के प्रचंड सूर्य की तपन के बीच अन्शुमान ने स्वयं को पांच प्रज्वलित अगनियों के बीच स्थापित कर
33:25पंचागने तपस्या प्रारंब की
33:28जब मुसलाधार वर्षा और भयानक गर्जना के साथ इंद्र के मेगबर से तब भी अन्शुमान जल की प्रचंड धाराओं के
33:36बीच अचल परवत की भांती डटे रहे
33:40शीतकाल के असहनिय हिंपात के दौरां अन्शुमान ने बरफीले जल में खड़े होकर अपने मंत्रो चार से संपूर्ण वातावर्ण को
33:48स्पंदित कर दिया
33:50अन्शुमान की इस कठोर तपस्या की दिव्य आभा को देख कर वन के हिंसक पशुभी अपनी कुरूरता भूल कर उनके
33:58समीट शान्ती से बैठने लगे
34:01स्वर्ग के देवतागन और गंधर्व अन्शुमान की इस अदमय इच्छा शक्ती और भक्ती को देख कर आकाश से उन पर
34:09पुश पवर्शा करने लगे
34:11देवर्शी नारद ने अपनी वीना बजाते हुए अन्शुमान के पास आकर उनके इस महान संकल्प की सराहना की और उन्हें
34:20निरंतर प्रयास करने की प्रेणा दी
34:23सत्यलोक में विराजमान स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मान ने अन्शुमान की तपस्या को देखा परंतु गंगा के अवतरण का उचित
34:31समय अभी नहीं आया था
34:34अनेक वर्षों के निरंतर प्रयास के बाद भी जब गंगा का अवतरण न हो सका तब वृद्ध और निर्बल हो
34:41चुके अन्शुमान ने अयोध्या लोटने का निरने लिया
34:45अयोध्या वापस पहुँचकर महाराज अन्शुमान ने अपने प्रतापी पुत्र दिलीब को अपने पास बुलाया और अपने जीवन के अधूरे उद्देश
34:54से अवगत कराया
34:56अन्शुमान ने दिलीब के मस्तक पर तिलत लगाते हुए कहा कि सगर के पुत्रों का उध्धार केवल गंदा के पावन
35:03जल से ही संभव है और यह कार्य अब तुम्हें पूरा करना है
35:08अपने जीवन के सारे दायत्वों को पूरा कर महाराज अन्शुमान ने सर्यू नदी के तट पर योग समाधी लेकर अपने
35:16प्राणों को त्याग दिया
35:19अंशुमान के महाप्रयान के बाद, राजा दिलीप ने अपने पिता की प्रतिज्या को अपने जीवन का एक मात्र धें मानकर
35:26गंगा को प्रित्वी पर लाने का संकल्प लिया
35:30राजा दिलीप ने अपने पूर्वजों के उद्धार हेतु कठोर तपस्या का संकल्प लेकर हिमालय की दुर्गम और पवित्र चोटियों की
35:38ओर प्रस्थान किया
35:41भीशन ग्रीश्मकाल की ज्वाला और शीत्रितू की जमा देने वाली हवाओं के मध्यभी महाराज दिलीप अचल परवत की भांती ध्यान
35:49में लीन रहे
35:51गंगा माता की क्रिपा पाने के लिए उन्होंने चारों और प्रजवलित अगनियों के बीच खड़े होकर अतिक्थोर पंचागनी तपस्या प्रारंब
35:59की
36:00राजा दिलीप के तपोबल से उतपंप्रचन आध्यात्मिक ऊर्जा ने सम्पूर्ण तपोवन और दिशाओं को आलोकित कर दिया
36:08वन में निवास करने वाले महान रिशियों ने राजा दिलीप के निस्वार्थ त्याद और वन्शिय कर्तव्यनिष्ठा को देख कर उन्हें
36:17भावुक होकर आशिरवाद दिया
36:20दिलीप ने अनवरत रूप से परम्पिता ब्रहमा जी का ध्यान करते हुए वेदों के पवित्र मंत्रों का गुंजता हुआ उच्चारण
36:28किया
36:29राजा के अभूत पूर्व समर्पन से प्रसन्न होकर ब्रहमांड के रच्चिता भगवान ब्रहमा दिव्य सुनहरे प्रकाश पुंच के साथ प्रकट
36:37हुए
36:39ब्रहमा जी ने दिलीप को सांत्वना देते हुए कहा कि यद्यपी उनका तप महान है
36:44किन्तु देवन्दी गंगा के अवतरण का नियत समय उनके काल में नहीं है
36:50ब्रहम देव के वचनों को सिरोधार्य करते हुए महाराज दिलीप ने बिना किसी खशोग के विधाता के विधान के समक्ष
36:58विनमरता पूर्वक मस्तक जुकाया
37:01भगवान ब्रहमा ने भविश्यवानी करते हुए राजा को आश्वस्त किया कि उनका यह महान तप उनके आने वाले यशस्वी पुत्र
37:09के लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा
37:13तपस्या समाप्त कर राजा दिलीप पुन्ह अपनी राजधानी अयोध्या लोटे और धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करने में सनलगन हो
37:21गए
37:22इक्षवाकु वंश की महान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अनेक धर्म ग्रंथों के अनुसार विशाल यग्यों और लोग कल्यानकारी
37:31कारियों का संपादन किया
37:34समय बीतने के साथ राजा दिलीप के घर राजकुमार भगीरत का जन्म हुआ जो बचपन से ही असाधारन तेजोमी और
37:42धर्मनिष्ट थे
37:44व्रिद्धावस्था निकट आते ही राजा दिलीट ने अपने युवा पुत्र भगीरत को सगर के साथ हजार पुत्रों की भस्म होने
37:51की दुखद गाथा और गंगा अवतरण के अधूरे संकल्प के बारे में विस्तार से बताया
37:58पिता के वचनों को सुनकर युवा भगीरत ने भावुक होकर अपने वन्ष के उध्धार का यह कठिन महा संकल्प अपने
38:05कंधों पर लेने की प्रतिग्या की
38:09राजपाट अपने सुयोग्य पुत्र भगीरत को सौंप कर राजा दिलीप जीवन के अंतिन पड़ाव में वानप्रस्थ आश्रम हेतु पुनहवन की
38:17ओर प्रस्थान कर गए
38:19सर्यू नदी के शांत तट पर ध्यानमग्न होकर महाराज दिलीप ने योग समाधी के माध्यम से अपने नश्वर शरीर का
38:27त्याग किया और परमधाम को प्राप्थ हुए
38:31अयोध्या की प्रजाने अपने उस परम तपस्वी और कर्तव्यनिष्ठ राजा के देवलोक गमन पर अश्रुपुरुत नेत्रों से अंतिम श्रधान जली
38:40अर्पित की
38:41अपने पिता के महाप्रयान के पश्चात नए राजा भगीरत परवत की उचाईयों पर खड़े होकर आकाश की ओर देखते हुए
38:49अपने पूर्वजों के उध्धार की योजना बनाने लगे
38:53अब सगर्वन्शा संपूर्ण भविश्य और गंगा को स्वर्ग से धरापर लाने का इतिहास बदलने वाला महासंकल्प भगीरत के हाथों में
39:02आचुका था

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