विष्णु पुराण के पहले एपिसोड में आपका स्वागत है! इस ब्रह्मांड की रचना के परम रहस्य को जानने के लिए महर्षि मैत्रेय और पराशर के संवाद में डुबकी लगाएँ। इस एपिसोड में हम सृष्टि के आरंभिक तत्वों, प्रकृति-पुरुष के संयोग, महत् और अहंकार के उदय और सूक्ष्म से स्थूल जगत के निर्माण की अद्भुत यात्रा को देखेंगे। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, यह उस शक्ति का उद्घोष है जो हर कण में व्याप्त है - भगवान विष्णु। #VishnuPurana #HinduMythology #CosmicCreation #LordVishnu #Puranas
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00:00प्रथम सत्र की अभूत पूर्व सफलता के पश्चात अब विश्णु पुरान के दिव्य प्रकाश से आलोकित इस नए महाध्याय में
00:07आपका हृदय से स्वागत है।
00:11पिछले सत्र की महान पौरानिक गाथाए अब नए युग के इस भव्य महाका व्यका मार प्रशस्त कर रही हैं।
00:19शीर सागर की अनंत नीली तरंगों पर सहस्त्रफन वाले अनंत शेशनाग की शयापर भगवान श्री हरी विश्णु का परम पावन
00:28दर्शन होता है।
00:30अपने चतुर्भुज स्वरूप में सुशोभित भगवान विश्णु का प्रत्येक अस्त्र और आभूशन ब्रहमांड की संतुलन शक्ती का उद्गोश करता है।
00:40भगवान विश्णु की नाभिकमल से प्रकट होकर ब्रहमाजी वेदध्वनी से संपूर्ण नए संसार के स्रिजन का संकल्प लेते हैं।
00:49धन और समरिध्धी की अधिश्ठात्री देवी लक्ष्मी अत्यंत प्रेम और भक्ती से प्रभू श्री हरी के कमल चर्णों की सेवा
00:58में लीन हैं।
01:00एक प्राचीन तपोवन में जिग्यासु शिश्य मैत्रे अत्यंत नमर्ता के साथ अपने गुरु महर्शी पराशर के सम्मुख उपस्थित होते हैं।
01:10महान ज्यानी महर्शी पराशर अपने ध्यान की गहराई से विश्नु पुराण की दिव्य गाथा को सुनाने का शुभारंभ करते हैं।
01:20प्राचीन ताडपत्रों पर स्वर्ण से उकेरे गए संस्कृत के पवित्र श्लोक इस महान पुराण के आदी रहस्य को उजागर करते
01:28हैं।
01:29जब स्रिष्टी का कोई अस्तित्व नहीं था, तब केवल अगाध अंधकार और भगवान विश्नु की संकल्प शक्ती विद्यमान थी।
01:38विश्नु के दिव्य प्रभाव से वह महाहिरनेगर्ब प्रस्फुतित हुआ और ब्रह्मांड के अंगिनत लोकों का निर्मान हुआ।
01:47समस्त देव, गंधर्व और सप्तर्शी एक स्वर में प्रभु श्री हरी विश्नु की अनंत महिमा का गान कर रहे हैं।
01:56देवर्शी नारद अपनी महती वीना के तार छेड़ कर तीनों लोकों में भगवान नारायन के पावन नाम का प्रसार कर
02:03रहे हैं।
02:05स्रिष्टी के इस नियम में धर्म और संतुलन को बनाए रखने के लिए विश्नु पुरान की कथा अत्यंत आवश्यक है।
02:14भगवान विश्नु के चक्र की प्रचंड गतियों में छिपा है समय और काल चक्र का सबसे बड़ा सत्य।
02:21यह पुरान केवल कथा नहीं बलकी मानव चेतना को अंधकार से निकाल कर परम मोक्ष की ओर ले जाने वाली
02:29जोती है।
02:31प्रित्वी के कोने-कोने में बसे भक्त और मुनिजन श्री हरी के इस ज्यान को पाकर धन्य हो रहे हैं।
02:39ग्रहों और नक्षत्रों की यह अनोखी युती इस बात की गवाही दे रही है कि एक नए दिव्य युग की
02:45शुरुवात हो चुकी है।
02:48शीर सागर की पावन तरंगों से उठता यह अमर प्रकाश अब पूरे संसार को अपने में समेटने के लिए तत्पर
02:55है।
02:57आईए इस पौरानिक यात्रा में कदम रखें और विश्नु पुरान के अंतरगत स्रिष्टी के आदी रहस्य को समझें।
03:05उतरायन के परम पवित्र प्रभात काल में हिमालय की सुरमय घाटियों में स्थित महर्शी पराशर का आश्रम अलोकिक आध्यात्मिक उर्जा
03:14से सराबोर था।
03:16परम ज्यानी और विनीत शिष्य रिशी मैत्रे ज्यान की तीवर अभिलाशा लिये अपने पूजे गुरु के कुटीर की ओर मंदगती
03:24से बढ़ रहे थे।
03:26गुरुदेव के निकट पहुँचकर रिशी मैत्रे ने अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से महर्शी पराशर के श्रीचर्णों में साश्टान प्रणाम किया।
03:36महान तपस्वी महर्शी पराशर ने अपने प्रिय शिश्य को उठने का संकेत दिया और मंद मुस्कान के साथ उन्हें अपने
03:44समीक बैठने का स्थान दिया।
03:46हाथ जोड़कर अत्यंत नमरता से मैत्रे ने अपने गुरु से ब्रहमांड के परमगूड रहसियों को प्रकट करने की अनुमती मांगी।
03:56मैत्रे ने पूछा की है गुरुदेव यह विशाल ब्रहमांड किस प्रकार उत्पन हुआ और इसका आदिकारण कौन है।
04:05स्रिष्टी से पूर्व फैले उस अनन्त और अगाध अंधकार की कलपना करते हुए मैत्रे का हृदय अद्भुत कौतुहल से भर
04:13उठा।
04:14शिश्य ने आगे प्रश्ण किया कि किस शक्ती के बल पर यह संपूर्ण संसार थमा हुआ है और इसका पालन
04:22पोशन कौन करता है।
04:24तभी मैत्रे के मानस पटल पर संपूर्ण जगत के संरक्षन करता भगवान श्री हरी विश्नु का दिव्य और शांत रूप
04:32साकार हो उठा।
04:34फिर मैत्रे ने अत्यंत उच्सुक्ता से पूछा की समय के अंत में इस चलायमान जगत का प्रलय और विलय किस
04:41प्रकार होता है।
04:43गुरु के सामने प्रल्यकाल का विचार आते ही मैत्रे के मन में ब्रहमांडी अगनिजल की विनाशकारी लीला की छवी तैरने
04:51लगी।
04:52मैत्रे ने फिर प्राणियों के कर्मों के बंधन और उनके अनुसार मिलने वाले जन्म और मृत्यु के अटूट चक्र के
05:00बारे में पूछा।
05:02संसार के समस्ट जीव किस प्रकार अपने अपने कर्मों से बंधे रहकर सुख्रुख भोगते हैं यह जानने की तीवर त्रिश्ना
05:10मैत्रे में थी।
05:12उन्होंने प्रश्न किया कि वह परमतत्व कौन है जो स्वय विकार रहित रहकर भी इस संपूर्ण त्रिगुनात्मक जगत को संचालित
05:20करता है।
05:22शिष्य की ऐसी निशकाम और जनकल्यानकारी जिग्यासा को देख कर महर्शी पराशर का हृदय असीम प्रसन्नता से भर गया।
05:31महर्शी पराशर ने अपना दाहिना हाथ उठा कर मैत्रे को आशिरवाद दिया और उन्हें परम ज्यान प्रदान करने का निर्णय
05:39लिया।
05:51ब्रहमांड के रचिता भगवान ब्रहमा और महर्शी पुलस्ते की अलोकिक स्मृती मात्र से ही संपूर्ण आश्रम में दिव्यर जोती प्रस्पुटित
05:59हो उठी।
06:01महर्शी पराशर ने घोशना की कीवे मैत्रे को विश्नु पुरान की वह पवित्र कथा सुनाएंगे जो समस्त पापों का नाश
06:09करने वाली है।
06:11रिशी मैत्रे अत्यंत ध्यानमगन होकर बैठ गए और इस प्रकार भगवान विश्नु के आदी महात्मे की अमर गाथा का महान
06:20प्रारंभ हुआ।
06:20परम जिग्यासु शिष्य मैत्रे ने जब स्रिष्टी के गूड रहसियों को जानने की इच्छा प्रकट की तब महर्शी पराशर के
06:29मुख पर एक अलौकिक मंधास्य उभराया।
06:33महर्शी पराशर ने अपने तेजस्वी नेत्र बंद किये और ब्रहमांडिय ज्ञान के उस असीम प्रवाह को महसूस किया जो सीधे
06:41परमिश्वर विश्नु से प्रवाहित होता है।
06:45शिष्य की निश्कपट पात्रता को देखकर महर्शी पराशर ने संकल्प लिया कि वे इस पावन ज्ञान को इस युग के
06:52कल्यान हेतु प्रकट करेंगे।
06:55जैसे ही पराशर मुनी ने ज्ञान प्रदान करने का प्रण लिया, तपोवन के व्रिक्षों और हवाओं में एक दिव्य शांत
07:02कमपन गूझने लगा।
07:05सर्वप्रथम उन्होंने उस अविनाशी सत्ता को याद किया जो समस्त चराचर जगत का आधार और परमकारण है।
07:24अकाश के परे, शीर सागर के मध्य शेश्षया पर विराजमान भगवान विश्नु का अलौकिक रूप महर्शी के अंतर्मन में साकार
07:32हो उठा।
07:33उनका शरीर नीलमेख के समान श्यामल था और उनके मस्तक पर सुशोगित मुकुट से करोडो सूर्यों का तेज प्रवाहित हो
07:41रहा था।
07:42रिशी पराशर ने उद्गोश किया की है विश्नु। आप ही स्रिष्टी की उत्पत्ती, इसके पालन और अंत्तह इसके सहार के
07:52एक मात्र कारण हैं।
07:54उनके दाहिने हाथ में घूमता हुआ सुदर्शन चक्र काल चक्र की गती को नियंत्रित करते हुए संपून ब्रहमांड को धर्म
08:02के सूत्र में बांधता है।
08:05प्रभु के पांच जन्य शंक की वह भीशन और मंगलकारी ध्वनी संपून लोकों को जागरत कर अज्यान के अंधकार का
08:13विनाश करती है।
08:15पराशर ने कहा कि आप ही स्थूल हैं और आप ही सुक्ष्म हैं। यह द्रिष्टि गोचर होने वाला संपून संसार
08:23आपकी ही एक अभिव्यक्ती है।
08:26इस अध्भुत और विहंगम स्थुती को सुनकर मैत्रे का हृदय विस्मय, भक्ती और परमशांती के गहरे सागर में डूग गया।
08:35यग्य की वेदी से उठती हुई पावन लप्टे मानो रिशी की इस भक्ति पून स्थुती को सीधे वैकुंठ लोग तक
08:42पहुचा रही थी।
08:45रिशी ने गाया की जो आदी, मध्य और अंत से रहित हैं। उन अजन्मा और अविनाशी परमात्मा को मेरा बारंबार
08:52नमस्कार है।
08:54उस समय वैकुंठ से भगवान विश्नु ने अपने भक्त पराशर के समर्पन को देखा और उनके हृदय में असीम अनुग्रह
09:03का संचार किया।
09:05महर्शी पराशर ने अपने अहंकार और बुद्धी को पूरी तरह से भगवान के चर्णों में समर्पित कर दिया, जिससे वे
09:12परम ज्यान के वाहक बने।
09:15आकाश से देवगणों ने इस पावन मिलन और स्तुती को देख कर प्रसंता पूर्वक गंधर्व गीतों के साथ पुषपवर्शा शुरू
09:23कर दी।
09:25भगवान विष्णु की असीन क्रिपा से पराशर मुनी की वानी में वह शक्ती आ गई जो स्रिष्टी के सबसे गूड
09:32सत्यों को सरल शब्दों में बया कर सके।
09:35अब शांतचित्थ होकर महर्शी पराशर ने मैत्रे की ओर देखा और उस परम रहस्यमय विश्णु पुरान की मुख्य कथा का
09:43आरंभ किया।
09:44महर्शी पराशर ने अत्यंत गंभीर और दिव्यस्वर में अपने शिश्च मैत्रे से स्रिष्टी के सबसे गूड और प्राचीन रहस्य का
09:53बखान करना आरंभ किया।
09:56उन्होंने बताया कि महाप्रलय के समय संपूवन ब्रहमांड केवल एक अगात, शांत और अंधकार्मय शूने के रूप में विद्यमान था।
10:05उस अथांग शूने में न दिन था, न रात, न आकाश था और नहीं भूमी केवल सर्वव्यापी निश्चलता का सामराज्य
10:13था।
10:15इस शूने में दो अनादी और शाश्वत तत्व प्रकृती और पुरुष एक दूसरे में पूर्णतह लीन और अविभाजत रूप से
10:22उपस्थित थे।
10:24महर्शी पराशर ने स्पष्ट किया कि प्रकृती अव्यक्त और निश्क्रिय शक्ती है, जो समस्त भौतिक संसार का मूल कारण है।
10:34वही दूसरी और पुरुष चेतना का शाश्वत स्रोत है, जो स्वय अप्रिवर्तनशील रहकर इस प्रकृती का एक मात्र साक्षी है।
10:44प्रले काल में प्रकृती के तीनों गुन सत्व, रजस और तमस, परस्पर, पूर्ण संतुलन की अवस्था में शांत पड़े हुए
10:51थे।
10:52इन दोनों शाश्वत सिध्धानतों के पीछे सर्वोपरी शक्ती के रूप में भगवान विश्नु काल के रूप में विद्यमान थे। भगवान
11:02विश्नु का यह काल रूप ही स्रिष्टी के आरंभ और अंत की संप्रभु नियामक चाबी है।
11:08जब स्रिष्टी की रचना का समय समीप आया, तब भगवान विश्नु की इच्छा मात्र से काल तत्व गतिशील हो उठा।
11:16इस काल शक्ती ने प्रकृती और पुरुष के बीच प्रवेश करके उनके शांत तादात्मे में एक सुक्षम स्पंदन उत्पन्न किया।
11:26प्रकृती में इस स्पंदन से तीनों गुनों का साम्यावस्था भंग हो गया और रजोगुन का प्रभाव तीवर होने लगा।
11:33पुरुष की केवल एक इच्छा पूरित द्रिष्टी मात्र ने प्रकृती की इस क्रियाशीलता में प्रान फूंक दिये।
11:41प्रकृती और पुरुष के इस अलोकिक सन्योग से ही संपून ब्रहमांड के विकास का महान चक्र गतिमान हुआ।
11:49इस प्रथम सन्योग से सर्वप्रथम महत तत्व अर्थात ब्रहमांडिय महान बुद्धी का प्रादुर्भाव हुआ।
11:57तत्पश्चात महत तत्व से तीन प्रकार के अहंकार का जन्म हुआ, जिसने स्रिष्टी को विविधता प्रदान की।
12:05इन तत्वों से ही पांच पंचतन मात्रों और स्थूल भूतों की सुक्ष्म रचना का मार्ग प्रशस्थ हुआ।
12:12अंत्ध इन समस्थ प्राथमिक तत्वों के सम्मिश्रण से एक विशाल और तेजस्वी हिरन्यगर्भ अर्थात ब्रहमांडिय स्वर्नाइंड का निर्मान हुआ।
12:22महर्शी पराशर ने हाथ उठा कर मैत्रे को समझाया कि कैसे विश्नु की असीम माया ही इस अनादी चक्र की
12:30एक मात्र आधार्शिला है।
12:33यह सुनकर मैत्रे भाव विभोर हो गए और उन्होंने परम पुरुष विश्नु के इस आदी रहस्य को सादर नमन किया।
12:41जब अव्यक्त प्रकृती और परम चेतना पुरुष का दिव्य सन्योग हुआ, तब अनन्त शूने के शांत गर्भ में स्रिष्टी का
12:49पहला स्पंदन गूझ उठा।
12:51अंधकार मैं ब्रहमांडिय जल के उपर योग निद्रा में लीन भगवान विश्नु की नाभी से एक अलोकिक जोती प्रस्पुटित होने
12:59लगी।
13:01प्रकृती के तीन गुन सत्व, प्रजस और तमस अपनी साम्यवस्था से निकल कर गतिमान हुए और कोस्मिक हल्चल आरंभ हुई।
13:09इस महान संचलन से ब्रहमांड का सबसे पहला प्रत्यक्ष तत्व प्रकट हुआ, जिसे शास्त्रों में महत अर्थात कॉस्मिक बुद्धी कहा
13:18गया है।
13:20यह महत तत्व केवल एक शक्ती नहीं, बलकि समूचे ब्रहमांड के समस्त ग्यान, तर्क और विवेक का दिव्य और अनन्त
13:28भंडार था।
13:30चतुर्भुज भगवान विश्णु ने अपनी कमलसद्रिश करुनामई आखों से इस उदित होती कॉस्मिक बुद्धी पर अपनी कृपा द्रिष्टी डाली।
13:39आदिशक्ती प्रकृती ने अपने हाथों से सुनहरी चेतना की धाराएं प्रवाहित की, जिससे महत तत्व अधिक प्रदीक्त और दिव्य हो
13:48गया।
13:49परम पुरुष ने अपनी असीन दिव्य किर्णों से महत को आच्छा दित किया, जिससे पूरे शुनि में कॉस्मिक ज्यान की
13:56लहरें फैल गई।
13:58महत के उदे होते ही अनंत अंतरिक्ष में एक दिव्यस वर्णिन प्रकाश पुंच फैल गया, जिसने आगे बनने वाली हर
14:06वस्तु का मानसिक धाचा तैयार किया।
14:10नाभिक्मल पर प्रकट होने वाले चतुर्मुख भगवान ब्रह्माने ध्यान मुद्रा में बैठ कर इस महत तत्व के ज्यान को अपने
14:17अंतर्मन में स्विकार किया।
14:20इस कॉस्मिक बुद्धी की चेतना से ही विचार, तर्क और अवधारनाओ का पहला सुक्षम बीज ब्रहमान्ड में अंकुरित होना शुरू
14:27हुआ।
14:29देवर्शी नारद ने अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ इस आदि बुद्धी के प्राकट्य का गान करते हुए त्रिलोक
14:36को इसकी सूचना दी।
14:38महत तत्व ने ब्रहमान्ड में व्यवस्था और अनुशासन स्थापित करते हुए अज्ञान के अंधकार को पूरी तरह नश्ट कर दिया।
14:48भगवान विश्णु के दिव्य सुदर्शन चक्र की आभाने महत तत्व की स्वर्णिम किर्णों को दिशा दी, जिससे भावी सृष्टी की
14:55रूपरेखा स्पष्ट होने लगी।
14:58इस कॉस्मिक इंटेलेक्ट ने प्रकृती के तीनों गुनों को अनुशासित करते हुए स्रिष्टी की आगे की विकास यात्रा का मार्ग
15:06प्रशस्त किया।
15:07संपूर्ण शूने में वेदों की पवित्र रिचाएं और उंकार का अनाहत नाद गूंजने लगा, जो महत की जागृती का प्रमाण
15:16था।
15:16इस महान बुद्धी के प्रकाश से अनन्पतारों, नक्षतरों और आकाश गंगाओं का होने वाला भविश्य का स्वरूप पूर्वनिर्धारित होने लगा।
15:27सर्वव्यापी पुरुष और त्रिगुनमई प्रकृती ने संतोष के साथ देखा कि उनकी पहली रचना पूरे ब्रहमांड को ज्यान से आलोकित
15:36कर रही है।
15:38महत की इस जागरिती ने अब अगले प्रत्यक्ष तत्व, अहंकार अर्थात कॉस्मिक पहचान के जन्म का मार्ग पूरी तरह तयार
15:46कर दिया था।
15:47इस प्रकार महत के उदे के साथ कॉस्मिक बुद्धी की जागरिती पूर्ण हुई, जिसने विश्नु पुरान की इस पावन गाथा
15:56में सृष्टी के अगले महान अध्याय का द्वार खोल दिया।
16:00महर्शी पराशर ने मैत्रे को संबोधित करते हुए कहा कि महत्तत्व की निश्चयात्मक बुद्धी से ही सर्वप्रथम अहंकार का अलौकिक
16:09प्रादुर्भाव हुआ।
16:11ब्रामांडिय चेतना के उस अगाध सागर में अचानक एक ऐसा स्पंदन उत्पन हुआ जिसने समस्थ अस्तित्व को मैहूं के बोध
16:19से भर दिया।
16:21महत्त की शांट और अनूठी स्थिती से अहंकार का यह प्रथम उफान संपूर्ण स्रिष्टी में व्यक्तिगत पहचान की नीम रखने
16:29लगा।
16:30यह अहंकार केवल मानव का अभिमान नहीं बलकि इश्वर का वह पहला संकल्प था जो अध्वैत को बहुत्व में बदलने
16:39की क्षमता रखता था।
16:41पराशर जी ने समझाया कि अहंकार ही वह दिव्य सेतु है जो निराकार ब्रह्मा को साकार रूप देने के लिए
16:48माध्यम बनता है।
16:51इसके पश्चात वही एक अहंकार त्रिगुनों के प्रभाव से तीन भिन्न भिन्न स्वरूपों में विभाजित होकर ब्रहमाण में फैल गया।
17:00सर्वप्रथम तामसिक अहंकार जिसे भूतादी कहा जाता है अपने अंधकार में और सघन रूप में द्रिश्यमान हुआ।
17:09इस तामसिक अहंकार से ही सुक्षमतम शब्दतन मात्रा उत्पन हुई जिसने अनंत आकाश के विशाल विस्तार को जन्म दिया।
17:17ततपश्चात चंचल और तेजस्वी राजसिक अहंकार प्रादुर्भूत हुआ जो संपूर्ण ब्रहमांड में गती और क्रिया की शक्ती लेकर आया।
17:27राजसिक अहंकार की अप्रमपार उर्जा से ही प्राणियों की दस इंद्रिया और उनके कार्य की शक्तियों का निर्मान हुआ
17:35अंत में परमशांत और प्रकाश्मान सात्विक अहंकार उत्पन हुआ जो दिव्यता और पवित्रता का प्रतीक था
17:45इस सात्विक अहंकार से ही मनुष्य का मन और समस्त दिशाओं के अधिश्ठाता देवताओं का जन्म संभव हो सका
17:53इन तीनों गुनों के अनुठे संतुलन से ब्रह्मांड में चेतना और पदार्थ के बीच एक नया और अध्भुत संबंध स्थापित
18:01होने लगा
18:03भगवान श्री हरी विश्णु ने अपनी योग निद्रा से इस त्रिविध अहंकार के तानेबाने को देखा और स्रिष्टी संचालन की
18:11स्वीकृती दी
18:12इसी अहंकार के कारण ही प्रत्यक जीवात्मा में मैं और मेरे का भाव उत्पन हुआ जो उसे अन्य जीवों से
18:20प्रिथक बनाता है
18:22इस प्रिथकता के बोध ने ही संपूर्ण जगत में नाना प्रकार के रूप, नाम और विविधता के अनंत बीस बोधिये
18:31महर्शी पराशर ने स्पष्ट किया कि यद्यपी अहंकार स्रिष्टी का मुख्य आधार है किन्तु यही जीव के लिए माया का
18:39सबसे बड़ा आवर्ण भी बनता है
18:42इस गेहन और रहस्य मेई ज्यान को सुनकर महर्शी मैत्रे का हरिदय भाव विभोर हो गया और उनके सारे संदेह
18:50छंटने लगे
18:51तीनो गुनों से आच्छादित यह अहंकार संपूर्ण ब्रहमांडिये चेतना को नए स्रिजन की ओरतीवर गती से अग्रसर करने लगा
19:01इस प्रकार मैं के बोध से दीप्तिमान होकर यह ब्रहमांड अब स्थूल पंचभूतों के प्रक्तिकरण के लिए पूरी तरह तैयार
19:09हो चुका था
19:10जब अज्यानांधकार से भरा हुआ तामसिक अहंकार घनीभूत हुआ तब स्रिष्टी के अतिसुक्षम तत्वों के प्रस्पुतन का समया गया
19:20अनन्त ब्रहमांडी अक्षीर सागर पर विश्राम करते हुए भगवान श्री हरी विश्णू ने अपनी दिव्यद रिष्टी से इस निर्मान की
19:28प्रक्रिया को दिशा दी
19:30कमल के पुश्प पर विराजमान प्रजाप्ती ब्रहमा ने शांतचित्त होकर तामसिक अहंकार से उत्पन होने वाले प्रथम सुक्षम तत्व के
19:39उद्भव को देखा
19:41सबसे पहले आकाश की सुक्षम अवस्था के रूप में शब्द तनमात्रा का जन्म हुआ जिसने अनन्त शूनि में एक दिव्यस
19:49पंदन उत्पन्न किया
19:50यह शब्द तनमात्रा केवल ध्वने नहीं थी, बलकी ब्रहमांड के समस्त नाद और वैदिक मंत्रों की सुक्षम मूलतरंगे थी
20:01ततपश्चात शब्द तनमात्रा के विकार और विस्तार से वायू की सुक्षम आधारभूत अवस्था स्पर्ष तनमात्रा का प्रादुर्भाव हुआ
20:10स्पर्ष तनमात्रा ने अंतरिक्ष में एक अद्रिश्य संसनी और गतिशीलता का संचार किया, जो केवल दिव्य चेतना द्वारा महसूस की
20:19जा सकती थी
20:21इसके बाद स्पर्ष तनमात्रा से रूप और अगनी की मूल अवस्था रूप तनमात्रा का प्रचंड प्रस्पुतन हुआ
20:29रूप तनमात्रा के उदित होते ही अंधकार में ब्रहमांड में प्रकाश, आकार और रंगों की असीम संभावनाय प्रजवलित हो उठी
20:38महायोगी श्री विश्णु ने अपने योग निद्रा में इस रूप मई कान्ती को सराहा, जो आगे चलकर भौतिक अगनी और
20:46द्रिष्टी बनेगी
20:48ततपश्चात रूप तनमात्रा से जल की अंतरनेहित मिठास और आर्गरता वाली रस तनमात्रा की उत्पत्ती हुई
20:56यह रस तनमात्रा स्रिष्टी के समस्त स्वादों, तरलता और पोशन की अमूत और परम सुक्ष्म चेतना थी
21:04अंतर रस तनमात्रा के घनी भूत होने से पृत्वी तत्व की सुक्ष्म जन्नी गंध तनमात्रा का प्राकट्य हुआ
21:11गंध तनमात्रा ने संपून ब्रहमांडिये तत्वों को एक सुवासित एक्ता और स्थिर्ता का सुक्ष्म आधार प्रदान किया
21:20इस प्रकार शब्द, स्पर्ष, रूप, रस और गंध ये पाचों तनमात्राएं इंद्रियों के अनुभव की आधारशिला बनकर स्थापित हुई
21:31नारद मुनी ने इस परम गोपनिय सुक्ष्म रचना को देखकर प्रभुश्री हरी विश्नु की गाथा का वीना बजाकर गान किया
21:39ये पाचों तनमात्राएं अभी अत्यंत अमूर्थ थी, जो अब भी किसी स्थूल भौतिक वस्तु में परिवर्तित नहीं हुई थी
21:49भगवान ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से वेदों की रिचाओं का उच्चारण करते हुए इन तनमात्राओं के संतुलन की स्थापना
21:56की
21:58इन सुक्ष्म तत्वों के सन्योजन से ही अब पंच महाभूतों आकाश, वायुक, अगनी, जल और प्रित्वी का महानिर्मान होने वाला
22:06था
22:06इस प्रकार तामसिक अहंकार से उत्पन्न तनमात्राओं ने उस पंचभौतिक संसार का मार्ग प्रशस्त किया, जिसमें समस्त जीव निवास करेंगे
22:18महर्शी पराशर अपने शिष्य मैत्रे को समझाते हैं कि किस प्रकार अहंकार और तनमात्राओं के पावन सन्योग से ब्रहमांड के
22:26पांच मुख्य भौतिक तत्व उत्पन होने लगे
22:30शब्द तनमात्रा और राजसिक अहंकार के परस्पर मिलन से सबसे पहले सुक्ष्म एवं अनंत आकाश तत्व का प्रादुर्भाव हुआ जिसने
22:39समस्थ शून्य को व्याप्त कर लिया
22:41इस विशाल आकाश का एक मात्र विशेश गुन शब्द है जिसके स्पंदन से संपून ब्रहमांड में अनाहत ओम की गुंज
22:50निरंतर प्रवाहित होने लगी
22:53इसके पश्चात स्पर्ष तनमात्रा ने जब आकाश के साथ क्रिया की तब प्रचंड वेग और जीवंदायनी शक्ती से परिपूर्ण वायु
23:02तत्व का जन्म हुआ
23:04वायु तत्व का मुख्य गुंस पर्ष है जो अद्रिश रहकर भी अपनी गती और शीतलता से संपून अंतरिक्ष में प्राणवुजा
23:12का संचार करता है
23:15भगवान ब्रहमा ने अत्यन्त प्रसंता पूर्वक देखा कि कैसे वायु के निरंतर प्रवाह ने शुनिय में दिशाओं और तरंगों का
23:23निर्मान करना प्रारंभ कर दिया
23:26तत्पश्चात, रूप तन्मात्रा और वायू के दिव्य मिलन से अत्यंत तेजस्वी, प्रकाश्मान और उर्जावान अगनी तत्व का प्रक्तिकरण हुआ
23:36अगनी तत्व का विशिष्ट गुन रूप है, जिसकी भीशन ज्वालाओं ने न केवल अंधकार को दूर किया बलकि संपूर्ण स्रिष्टी
23:44को आकार और ग्रिश्यात मक्ता प्रदान की
23:48अगनी की स्वर्णेम और रक्तवर्ण लप्टों ने नवनिर्मित आकाश को एक अलोकिक दिव्य चमक से सराबोर कर दिया
23:56जब रस्तन मात्रा ने अगनी के प्रचंड ताप के साथ सन्योजन किया, तब अनंत शीतलता और जीवन से भरपूर जल
24:04तत्व का उद्धव हुआ
24:06जल तत्व का मुख्य गुनरस है, जिसकी बहती हुई अमरित्मई धाराओं ने समस्ट अंतरिक्ष में तरलता और जीवन्दाइनी नमी भर
24:15दी
24:16दिव्य गंधर्वों और देवगणों ने आकाश गंगाओं के मध्य तैरते हुए विशाल नीले आदिकालीन सागरों के अध्भुत द्रिश्य को देख
24:24कर जय जयकार की
24:27अंत में गंध तनमात्रा और जल के अध्भुत मिलन से ठोस, स्थिर और सुगंधित प्रिथवी तत्व की रचना पूर्ण हुई
24:36प्रिथवी तत्व का विशिष्ट गुण गंध है, जो स्थूल जगत को आधार, द्रिडता और पंच तत्वों की पूर्णता प्रदान करने
24:43वाला अंतिम तत्व बना
24:45इस प्रकार आकाश, वायू, अग्नी, जल और प्रिथवी ये पाचों महाभूत मिलकर भौतिक ब्रहमांड के निर्मान हेतु पूर्णता संरेखित हो
24:55गए
24:56भगवान श्री नारायन ने अपने चतुर्भुज स्वरूप में स्थित होकर इन पंच महाभूतों की संतुलित और अनुशासित व्यवस्था को अपना
25:05पावन आशिर्वात प्रदान किया
25:07ये पाचों महाभूत मानव शरीर की पाचों ग्यानेंद्रियों से सुक्ष्म रूप से जुड़कर ब्रहमांड और जीव के मध्य एक अटूट
25:16अलौकिक संबंध स्थापित करते हैं
25:20प्रजाप्ती ब्रहमा ने इन पाचों स्थूल तत्वों की उर्जा को समेट कर अंगिनत तारों, नक्षत्रों और विविध लोकों की रचना
25:28का भव्यकार्य प्रारंब्र किया
25:30पंच महाभूतों के इस पावन तालमेल ने समस्थ स्रिष्टी में एक दिव्य संगीत और अनुठा संतुलन स्थापित कर दिया
25:39महर्शी पराशर ने अपनी गाथा को विराम देते हुए बताया कि कैसे इन पंच तत्वों के माध्यम से ही अब
25:46यह भौतिक जगत जीवों के निवास के लिए पूरी तरहे तयार हो चुका था
25:52महर्शी पराशर अपने शिश्य मैत्रे को समझाते हैं कि स्रिष्टी के प्रारंभ में दिख, काल और तत्व सब विलग और
25:59निश्क्रिय पड़े थे
26:01पंच महाभूत, प्रिथवी, जल, अगनी, वायू और आकाश अंतरिक्ष की शून्यता में बिना किसी सन्योजन के अलग-अलग तैर रहे
26:10थे
26:11बिना किसी अंतर्निहित शक्ती के ये तत्व परस्पर जुरने और किसी जीव या लोग का निर्मान करने में पूर्णत्ह असमर्थ
26:19थे
26:20अगनी का प्रचंड ताप और जल की शीतलता बिना किसी व्यवस्था के आपस में टकरा कर असीम अराजक्ता उत्पन्न कर
26:28रहे थे
26:40कि तब संपूर्ण ब्रहमांड को एक सूत्र में पिरोने के लिए परमपुरुष भगवान विश्णू की इच्छा शक्ती जागरित हुई
26:48शीर सागर की अनन्त गहरायों में चतुर्भुज रूकधारी भगवान विश्णू अपने अलोकिक तेज के साथ प्रकट हुए
26:56भगवान विश्णू ने अपनी योगमाया और पुरुष शक्ती से एक परम दीप्तिमान दिव्यकिरन समस्थ तत्वों की ओर प्रवाहित की
27:05जैसे ही वह दिव्य चेतना पंचमहा भूतों से टक्राई उनमें एक अलोकिक स्पंदन उत्पन हुआ और वे आकर्शित होने लगे
27:15प्रिथक पड़े तत्व विश्णू की दिव्य उर्जा से प्रेरित होकर एक विशाल कॉस्मिक भंवर के रूप में एकत्र होने लगे
27:23जल अगनी वायू और प्रिथवी के कण आकाश की विशालता में मिलकर एक दिव्य संतुलन स्थापित करने लगे
27:32इस महामिलन के केंद्र में एक अतिदीप्तिमान स्वर्णिम बीज अर्था थेरन्यगर्भ का प्रादुर्भाव हुआ जो सहस्र सूर्यों के समान चमक
27:41रहा था
27:42पंचमहा भूतों ने इस स्वर्णिम चेतना को चारों ओर से घेर कर एक अलोकिक कॉस्मिक अंडे यानी ब्रहमांड का रूप
27:50प्रदान किया
27:51यह कॉस्मिक अंडाजल, अगनी, वायू और आकाश की साथ परतदार आवरणों से सुरक्षित होकर महाशून्य में स्थापित हुआ
28:01भगवान विश्णु ने अपनी अनुग्रह द्रिष्टी इस निर्मित ब्रहमांड पर डाली, जिससे वह जीवन और उर्जा से स्पंदित होने लगा
28:10इस दिव्य कॉस्मिक अंडे के गर्भग्रिह में चतुर्मुखी भगवान ब्रहमा का प्रादुर्भाव हुआ ताकि वे आतनरिक लोकों का स्रिजन कर
28:18सके
28:20स्वर्निम आभा से चमकता हुआ वह ब्रहमांडी अंडा अंतरिक्ष में एक आलोकित महानक्षत्र की भानती दीप्तिमान हो उठा
28:29उस विशाल अंडे के भीतर 14 भुवन, सप्ट सागर और समस्थ देवों के दिव्य निवास स्थान आकार लेने लगे
28:38महर्शी पराशर भक्तिभाव में डूब कर मैत्रे को बताते हैं कि यह ब्रहमांडी समस्थ चेतना और जीवों का परम आश्रय
28:46बन गया
28:47अनंत महाशून्य में इस्थित भगवान विश्नो की माया से निर्मित वह अलोकिक कॉस्मिक अंडा समस्थ स्रिष्टी का आधार बन कर
28:55जग्मगाने लगा
28:57स्वर्णिन ब्रहमांडी अंडे के भीतर एक अलोकिक जोती जागरित हुई जिसने समस्थ अंधकार को मिटा कर नवस्रिष्टी की प्रथम तरंग
29:06उत्पन्न की
29:08उस दिव्य हिरनेगर्भ के केंद्र से चार मुखों वाले स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा कमल के आसन पर भव्यता से
29:16प्रकट हुए
29:18जैसे ही ब्रहमा ने अपने नयन खोले उनके चारों मुखों से निकली चेतना ने अनन्त शूने को ज्ञान के प्रकाश
29:25से सुशोभित कर दिया
29:27महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि ब्रहमा का यह प्राकट्य वास्तव में भगवान विश्णू के नाभिकमल से ही संभव
29:35हुआ है
29:37नारायन की असीन क्रिपा से ब्रहमा को वेदों का परम ज्ञान प्राप्थ हुआ जिससे वे ब्रहमांड की नई रचना के
29:44लिए तत्पर हुए
29:46ब्रहमा जी ने जब स्रिष्टी का प्रथम नाद ओम उच्चारित किया तब समस्त दिशाए उस पवित्र ध्वनी के स्पंदन से
29:54गुंजायमान हो उठी
29:56पराशर जी ने रहस्य उजागर किया की ब्रहमा, शिव और अन्य सभी देव वास्तव में भगवान विश्णू के ही विभिन्न
30:04रूप है
30:06सहार के अधिपती भगवान शिव भी उसी परम्पिता विश्णू की सर्वशक्तिमान उर्जा का ही एक रुद्र रूप है
30:14त्रिदेव ब्रहमा, विश्णू और महेश अलग प्रतीत होकर भी एक ही परम चेतना के तीन अमर स्वरूप है
30:23समस्थ देवों और महर्शियों ने आकाश मार्ग में एकत्र होकर श्रीहरी विश्णू के अनंत गुनों की स्तुती गान प्रारंब किया
30:32ब्रहमांड का प्रत्येक सुक्ष्मकन, तारा और जीवन की हर श्वास भगवान विश्णू की उपस्थिती का सजीव प्रमाण है
30:41जल की एक बून से लेकर विशाल ब्रहमांडिय पिंडों तक हर जगह केवल नारायन का ही वास है
30:50शीर्सागर में विराजमान महा विश्णू की प्रत्येक श्वास के साथ अंगिनत ब्रहमांड उत्पन्न और विलीन होते हैं
30:59ब्रहमाजी ने अत्यंत विनमर्ता के साथ भगवान विश्णू के उस सर्वव्यापी स्वरूप के समक्ष अपना शीष नवाया
31:07श्रीहरी के इस विश्वरूप में सूर्य, चंद्र, अगनी और नक्षत्रमंडल एक साथ प्रज्वलित हो उठे
31:15पंच महा भूत, प्रिथवी, जल, अगनी, वायू और आकाश विश्णू की दिव्यद रिष्टी पाते ही संतुलित होने लगे
31:24महर्शी पराशर ने सृष्टी के इस प्रथम चक्र की पावन कथा को पूर्ण करते हुए परम ज्ञान का संदेश दिया
31:32मैत्रे का हृदय भक्ती और संतोष से भर गया, क्योंकि वे विश्णू के सर्वव्यापक सत्य को समच चुके थे
31:39अब कॉस्मिक अंडा पूर्णतह विक्सित होकर नई दुनिया और जीवन के निर्मान के लिए तयार था
31:46इस प्रकार संपूर्ण ब्रहमांड में केवल भगवान विश्णू की ही सर्वव्यापी चेतना व्याप्त है जो भावी सृष्टी का आधार है
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