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इस रहस्यमय एपिसोड में, देवों और असुरों द्वारा ब्रह्मांडीय समुद्र मंथन से निकला सबसे घातक हलाहल विष, जब पूरी सृष्टि को भस्म करने वाला था, तब महादेव ने कैसे बचाया? 😱 देखिए भगवान शिव का अद्भुत बलिदान, जब उन्होंने नीलकंठ बनकर पीया वो भयानक ज़हर और बने त्रिलोकी के रक्षक। उनकी परम करुणा और त्याग की अविस्मरणीय गाथा! #ShivaPurana #Nilakantha #SamudraManthan #Mahadev #Vish #Neelkanth
Transcript
00:00महर्शी दुर्वासा के अत्यंत भयंकर और अमोग श्राप के कारण कभी अलोकिक वैभव से चमकने वाला देवराज इंद्र का अमरावती
00:08धाम आज पूरी तरहे से अपनी दिव्यकांती खोकर अंधकार में और निश्प्रान हो चुका था.
00:15देवराज इंद्र अपने निश्प्रान स्वर्ण सिनहासन पर अत्यंत निर्बल और हताश बैठे थे, क्योंकि उनके भीतर का दिव्यतेज और संचित
00:24अहमकार दोनों ही उसक्रोधित रिशी के श्राप की अद्रिश्य अगनी में भस्म हो चुके थे.
00:31स्वर्गलोग के अन्य प्रमुख देवता भी अपनी निरंतर घटी शक्तियों के कारण दुर्बल और तेजहीन दिखाई दे रहे थे, और
00:39उनके शरीरों से निकलने वाला अलौकिक प्रभामंडल अब पूरी तरह से बुच चुका था.
00:45इंद्र को बार-बार अपने मस्तिष्क में क्रोधित महर्शी दुर्वासा का वह उग्र रूप दिखाई दे रहा था, जिन्होंने पारिजात
00:53पुष्पों की दिव्यमाला के अपमान पर देवलोग के संपूर्ण एश्वर्य को नश्ठ होने का श्राप दिया था.
01:00अत्यंत व्याकुल होकर और स्रिष्टी के अस्तित्व को संकट में पाकर, देवराज इंद्र ने इस महाविनाश से बाहर निकलने का
01:08कोई मार्ग खोजने के लिए बचे हुए सभी देवताओं को एकत्रिप किया.
01:14अपनी खोई हुई अमर्ता और एश्वर्य को पुनह प्राप्त करने की अंतिम आशा के साथ, सभी दुर्बल और असमर्थ देवता
01:22कापते कद्मों से भगवान विश्णु के परमधाम वैकुंठ की ओर प्रस्थान करने लगे.
01:28जैसे ही वे सभीक शीर सागर के दिव्यतत पर पहुँचे, वैकुंठ की अनुपम और परमशीतल आभा ने देवताओं के भयभीत
01:37और संतप्त हरिद्यों में आशा की एक नई किरन जगा दी.
01:42देवताओं ने अत्यंत श्रद्धा और संकोच के साथ वैकुंठ के उन भव्यद्वारों में प्रवेश किया, जहां का कनकन शांत संगीत
01:50और अलौकिक मंत्रों की ध्वनी से लगातार गुंजायमान हो रहा था.
01:55वहां उन्होंने अनन्त ब्रहमांडों के रक्षक भगवान श्री हरी विश्नु को क्शीर सागर की लहरों पर तैरते विशाल शेशनाग की
02:03शयापर अत्यंत तेजस्वी और शांत मुग्रा में विराज मान देखा.
02:08देवराज इंद्र ने अपनी सुधबुध खोकर अत्यंत करुणा के साथ भगवान विश्नु के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया और रोते
02:17हुए अपनी और समस्थ देवलोग की रक्षा के लिए प्रार्थना की.
02:22कापते हुए हाथों से इंद्र ने नारायन को बताया कि किस प्रकार असुरों की शक्ती दिन प्रति दिन बढ़ती जा
02:29रही है और देवता पूरी तरह से निर्बल होकर अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं.
02:37देवताओं की इस दीन और अत्यन्त व्याकुल पुकार को सुनकर करुणा और दया के सागर भगवान विश्नु के मुखमंडल पर
02:44एक अलोकिक और आश्वस्त करने वाली मंद मुस्कान बिखर गई.
02:50जगतपालत भगवान विश्नु अपनी शेश्या से उठकर बैठे और उन्होंने अपने कल्यानकारी वर्देहस्त को उठाकर अत्यन्त भयभीत देवताओं को निर्भय
03:00होने का आशिरवाद दिया.
03:03परमिश्वर श्रीहरी ने अत्यन्त गंभीर वाणी में देवताओं को समझाया कि संकट के समय केवल बलकाम नहीं आता, बलकि बुद्धी,
03:11कूटनीती और अटूट धैर यही विजय का एक मात्र मार्ग प्रशस्त करते हैं.
03:17देवताओं के कल्यान और उनकी अमर्ता को पुनह स्थापित करने के लिए भगवान विश्णु ने उन्हें अथा क्षीर सागर के
03:25मन्थन का एक अत्यन्त भव्य और असंभव सा लगने वाला उपाय बताया.
03:31उन्होंने आगे कहा कि इस विशाल और असाधारन कार्य को अकेले संपन्न करना देवताओं के लिए असंभव है, इसलिए उन्हें
03:40इस कार्य में अपने शत्रु असुरों का सहयोग लेना ही पड़ेगा.
03:45असुरों से संधी करने की बात सुनते ही देवताओं के चहरों पर संशय और गहरे भय की लहर दोड़ गई,
03:51क्योंकि वे असुरों के विश्वास धाती स्वभाव को अच्छी तरह से जानते थे.
03:57नारायन ने उन्हें धीरस बंधाते हुए समझाया कि मन्थन से उत्पन होने वाला दिव्य अमरिथी देवताओं को पुनह अमर और
04:06अजे बनाएगा, इसलिए कूटनीतिक रूप से असुरों को शामिल करना अनिवार्य है.
04:12भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया से देवताओं को होने वाले उस महामंथन की एक अलोकिक जाकी दिखाई, जिसमें मंदराचल परवत
04:21मथानी और वासुकी नाग रसी के रूप में दिखाई दे रहे थे.
04:26इस दिव्य योजना और आश्वासन को प्राप्त कर देवताओं के मनों का संपूर्ण अंधकार दूर हो गया और उन्होंने पूरी
04:34श्रद्धा से सिर जुका कर इस स्विष्ट रक्षक महाभियान का संकल्प लिया.
04:40देवताओं का मन गलानी और पराजय के बोज तले दबा हुआ था, क्योंकि उनके दिव्य अस्त्रशस्त्र और अमर्ता प्रदान करने
04:48वाला अमरित दोनों ही उनसे चीन लिये गए थे.
04:52स्वर्ग लोग की भव्यता फीकी पड़ गई थी और उनकी शक्ती का तेज अंधकार में समाता जा रहा था, जिससे
05:00संपून स्रिष्टी में एक भीशन असंतुलन चा गया था.
05:04देवगण भैभीत थे कि यदी यह अवस्था बनी रही, तो संपून ब्रह्मान असुरों के क्रूर शासन और अनाचार की चाया
05:12में बिखर जाएगा, जिससे धर्म और व्यवस्था का विनाश निश्चित था.
05:18तभी शीरसागर के अनन्त विस्तार से एक अलौकिक जोती पुन्च प्रकट हुआ, जो अपनी भव्यता से संपून अंतरिक्ष को प्रकाशित
05:26कर रहा था. यह स्वयं पालनहार भगवान विश्णु का तेजस्वी आगमन था.
05:32भगवान विश्णु जिनकी द्रिष्टी त्रिकालदर्शी थी, उन्होंने देवों की दैनिय अवस्था और ब्रहमांड पर छायभीशन संकट को एक पल में
05:42ही अपनी असीम चेतना से समझ लिया.
05:45उनकी शांत और प्रभावशाली उपस्थिती से देवों के हृदय में आशा की एक नई किरण जगी, जैसे घोर अंधकार में
05:53कोई ध्रुवतारा चमक उठा हो, जो उन्हें सही मार्ग दिखाएगा.
05:58तब भगवान विश्णु ने अपनी गंभीर और मधुरवानी में उद्घोश किया कि इस भीशन संकट से निकलने का एक मात्र
06:06उपाय है शीर सागर का महा मंथन, एक ऐसी युक्ती जो स्रिष्टी को बचा सकती थी.
06:13उन्होंने बताया कि इस महान मंथन से ही वे अपनी खोई हुई दिव्य शक्तिया और अमर्ता प्रदान करने वाला अमरित
06:21पुनह प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उनका व्यभव लौट आएगा.
06:25यह कोई साधारन कार्य नहीं था, बलकि एक ऐसा विशालकाय प्रयास था जो स्वयन ब्रहमांड के संतुलन को पुनरस्थापित करने
06:34वाला था, एक ऐसा यग्य जिसकी कल्पना भी असंभव थी.
06:39देवों की शक्ती इस समय इतनी क्षीन हो चुकी थी, कि वे अकेले इस अकल्पनिय कार्य को अंजाम नहीं दे
06:47सकते थे, उनकी भुजाओं में वह बल्शेश नहीं था.
06:51इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि इस महामन्थन के लिए उन्हें असुरों की अदमय शक्ती और उनकी विशालकाय भुजाओं का सहयोग
07:00लेना अनिवार्य होगा, एक अंचाहा गठ बंधन.
07:04यह विचार सुनकर देवगन चकित रह गए, क्योंकि जिन शत्रूओं से वे अभी अभी पराजित हुए थे, उन्हीं से सहयोग
07:12मांगना उनकी कलपना से भी परे था और अत्यंत अपमान जनक भी.
07:17भगवान विश्णू ने समझाया कि यह एक अस्थाई समझाता होगा, जहां शत्रूटा को भुला कर केवल ब्रहमांड के हित के
07:25लिए मिलकर कार्य किया जाएगा, एक कूटनीतिक रणनीती.
07:30उन्होंने देवों को आश्वस्त किया कि असुर अमरित के लालच में इस प्रस्ताव को स्वीकार अवश्य करेंगे, भले ही उनकी
07:38नियत में चल हो, क्योंकि लालच उनकी सबसे बड़ी कमजोरी थी.
07:43अंतह देवों ने संकट की गंभीरता को समझते हुए और भगवान विश्णों की दूरग्रिष्टी पर विश्वास रखते हुए, अनिक्छा से
07:52इस गठ बंधन के लिए अपनी सहमती दे दी, एक कठिन निर्ने.
07:57देवों ने अपने मन में हिचक लिए हुए असुरों के विशाल और अंधकार में लोग की ओर प्रस्थान किया, जहां
08:04शक्ती और अहंकार का सामराज जिथा, एक खतरनाक यात्रा.
08:10उन्होंने असुर राज बली और अन्य प्रमुख असुरों के समक्ष समुद्र मन्थन का प्रस्ताव रखा, जिसमें अमरित के असीमित लाभों
08:18का विस्त्रित और लोभनिय वर्णन किया गया.
08:22असुरों ने पहले तो इस प्रस्ताव पर अविश्वास और घेना व्यक्त की, क्योंकि देवों के साथ किसी भी प्रकार का
08:29सहियोग उनकी अहंकारी प्रकृती के विरुद्ध था.
08:33परंतु अमरित की अमर्ता और असीम शक्ती के आकर्शन ने उनके मन को मोह लिया और वे अपने आंतरिक लालच
08:41के आगे जुक गए, उनकी आखों में लोग साफ दिख रहा था.
08:45इस प्रकार देवों और असुरों के बीच एक अपवित्रक किन्तु आवश्यक समझोता हुआ, जिसकी नीम ब्रहमांड के उद्धार और अमरित
08:54की लालसा पर टिकी थी, एक अजीबो ग्रीब मिलंग.
08:59शीरसागर के विशाल और अलौकिक तट पर देवता और असुर एकत्रित होकर समुद्र मंथन की दूरदर्शी योजना पर विचारविमर्श करने
09:07लगे.
09:09भगवान विश्णू और ब्रहम देव ने सर्वसम्मती से सुवर्णमे मंदार परवत को इस महामंथन का मथानी दंड बनाने का निर्देश
09:17दिया.
09:19समस्थ शक्तिशाली देवताओं और असुरों ने मिलकर विशालकाय मंदार परवत को उखाड़ने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया.
09:28जैसे ही मंदार परवत को समुद्र में रखा गया, वह अपने अगाध भार के कारण तीवर गती से रसातल की
09:35ओर धंसने लगा.
09:48करोन पुकार सुनकर भगवान विश्णू ने अत्यंत विशाल और अभेद्य कूर्मावतार का रूप धारण किया.
09:55भगवान कूर्मावतार गभीर क्शीर सागर की अगाध गहराईयों में जल को चीरते हुए तीवर वेक से नीचे उतरे.
10:04कूर्मावतार ने मंदार परवत के विशाल आधार को अपनी कठोर पीठ पर धारण कर उसे पूरी तरह स्थिर कर दिया.
10:13परवत को स्थिर हुआ देख देवताओं और असुरों का भय दूर हो गया और पूरे ब्रहमांड में हर्ष की लहर
10:19दोड़ गई.
10:21अब इस विशाल परवत को घुमाने के लिए अत्यंत सुद्रिध और समर्थ रस्सी की खोज प्रारम्ध हुई.
10:29भगवान विश्नु के सुझाव पर देवताओं ने सर्वशक्तिमान नागराज वासुकी से मन्थन की रजजु बनने का निवेदन करने का निर्णय
10:37लिया.
10:38देवता और असुर मिलकर पाताल लोग पहुँचे और नागराज वासुकी के समक्ष अत्यंत विनम्रता पूर्वक अपनी प्रार्थना प्रस्तुत की.
10:48जगत के कल्यान और अमरित प्राप्ती के पवित्र उद्देश को जानकर नागराज वासुकी ने सहर्ष मन्थन की रस्सी बनना स्विकार
10:57किया.
10:58महानाग वासुकी ने स्वयंको विशाल मंदार परवत के चारों और कई कुंडलियों में लपेट कर मन्थन दंड को कसकर जकड
11:06लिया.
11:07भगवान विश्णों की चतुर नीती के अनुसार देवताओं ने वासुकी नाग के पूँच वाले भाग को संभाला.
11:15अपने जूठे अहंकार के वश में होकर असुरों ने वासुकी नाग के मुखवाले भाग को पकड़ने का हटपूर्वक निर्नय लिया.
11:24संपूर्ण ब्रहमांडिय व्यवस्था पूर्ण होते ही आकाश से दिव्य शंकनाद और दुन्दुभियों की गूंच सुनाई देने लगी.
11:33भगवान विश्णू ने परवत को उपर से भी संभालने के लिए आकाश में एक साथ सहस्रभुज रूप में स्वयन को
11:40प्रकट किया.
11:42देवताओं और असुरों ने वासुकी नाग को दोनों और से खीचना शुरू किया और शीर सागर में भयंकर हल्चल पैदा
11:49होने लगी.
11:51मंदार परवत कूरमावतार की पीठ पर तेजी से घूमते ही समुद्र मन्थन का वह एतिहासिक और महान अध्याय प्रारंभ हो
11:59गया.
12:00शीर सागर के अनंत विस्तार में मंदराचल परवत मतनी बना और दिव्य नागराज वासुकी काल के सूत्र समान उस पर
12:09लपेटे गए जो स्रिष्टी के सबसे भव्य मन्थन का केंद्र बन गया जिसकी प्रतीक्षा देव और असुर दोनों कर रहे
12:16थे.
12:18एक और देवों के तेजस्वी समुह ने स्वनकिरिटो और दिव्य आभा से सुसजित वासुकी नाग की पूँच को द्रिड़ता से
12:26थाम लिया, उनके मुख पर उत्साह और संकल्प का तेज दमक रहा था.
12:32दूसरी ओर असुरों की प्रचंड सेना ने, जिनके शरीर पर कुरूरता और बल की छाप थी, वासुकी के विशैले मुख
12:40की ओर से अपनी पैशाचिक शक्ती से खींचने की तयारी की.
12:45भगवान विश्नु, ब्रहमांड के पालत, अपनी दिव्य आभा से सब कुछ प्रकाशित करते हुए, एक अचल स्तंभ की भांती उस
12:53भव्य आयोजन के साक्षी बन गए, उनकी उपस्थिती से समस्त वातावर्ण में एक पवित्र उर्जा भर गई.
13:00प्रथम आवेग में देवों और असुरों ने एक साथ वासुकी को खीचा, जिससे मंदराचल का आधार हिल गया और सागर
13:09की शांत सतह पर प्रचंड लहरों का निर्मान हुआ.
13:13मंदराचल परवत धीरे धीरे घूमना आरंब हुआ, जैसे ब्रहमान का एक विशाल धुव और उसके प्रत्येक घूर्णन के साथ शीर
13:22सागर का जल गेहन मंथन से गर्जना करने लगा.
13:26मंथन की गती और तीवर्ता बढ़ती गई, और शीर सागर का जल अगनी की ज्वालासा दिखने लगा, जिससे दिव्यरतनों और
13:34चमतकारी वस्तूओं के उद्भव की प्रतीक्षा में सभी की सासे थम गई.
13:40सबसे पहले सागर के गहन्तम गर्ब से कामधेनु प्रकट हुई, जिनकी दिव्याभा ने समस्त वातावर्ण को आलोकित कर दिया और
13:49देवों के हृदय में हर्ष भर दिया.
13:52कामधेनु इच्छाओं को पूर्ण करने वाली गाय अपने शांत और सौमे स्वरूप में समस्त स्रिष्टी के लिए अन्न और समरिध्धी
14:00का प्रतीक बनकर मधुर ध्वनी करते हुए प्रकट हुई.
14:05उसके पश्चात शीरसागर की गहराईयों से उच्चाहश्रवा नामक दिव्य अश्व प्रकट हुआ जो श्वेत वर्ण का था और वायू में
14:13भी तीवर्था से विचर्ण करने में सक्षम था.
14:17यह अश्व इतना तीवर था कि मानों समय भी उसके वेग का अनुसर्ण न कर पाए और देवों व असुरों
14:24दोनों की दृष्टी उस पर ठहर गई.
14:27फिर एक और भव्य जीव का उदे हुआ, एरावत आठ सूंडों वाला श्वेत हिम के समान विशालकाय और दिव्य हाथी
14:35जो स्वर्ण का गौरव था.
14:38इंद्रदेव के आनंद की कोई सीमा न रही, जैसे ही एरावत, समस्ट आश्वर्य और बल का प्रतीक अपने स्वामी की
14:46ओर बढ़ा, उसकी गर्जना से क्शीर सागर गूंध उठा.
14:50फिर सागर के हृदय से एक अध्भुत रत्न, कौस्तुभ मनी, अपनी अप्रतिम आभा से चमकता हुआ प्रकट हुआ, जो ब्रहमांड
14:59के सौंदर्य को प्रतिबिम्बित करता था.
15:02यह अध्वितिय मनी समस्त लोकों में सर्वोच मानी जाती थी, जिसे भगवान विश्णु ने अपनी विशाल छाती पर सुशोगित करने
15:11के लिए स्विकार किया, जिससे उनका तेज और बढ़ गया.
15:16ततपश्चात स्वर्गिक पारिजात विक्ष सागर से निकला, जिसकी सुगंद से ब्रहमांड के कनकन में दिव्यता घुल गई और उसके फूल
15:24अपनी स्वर्णिम आभा से चमक रहे थे.
15:28पारिजात के प्रत्येक पुष्प में स्वर्ग की सुगंद समाई थी, जो देवताओं और रिशियों के मन को शांती और आनन
15:36से भर रही थी.
15:38और फिर सागर की गहराईयों से अपसराय प्रकट हुई, जिनकी सौंदर्य और नृत्य की कलाने समस्त लोकों को मंत्र मुग्ध
15:46कर दिया.
15:47वे अपनी दिव्य मोहिनी और मोहक मुद्राओ से सागर तट पर उपस्थित सभी देवों और असुरों के मन को मोहने
15:55लगी, जैसे स्वर्ग की आभा साकार हो गई हो.
15:59जैसे जैसे दिव्यरत्न और वस्तुए प्रकट होती गई, देवों और असुरों का उत्साह चरम पर पहुँच गया
16:06उनकी आखों में अगले महान उफार की प्रतीक्षा और लालसा चमक रही थी, जिसे क्शीरसागर अभी भी अपने गर्भ में
16:14छिपाए हुए था
16:17मंदराचल परवत के तीवर घूर्णन से क्शीरसागर का जल उबलने लगा और उसकी गहराईयों से एक भयानक हलचल होने लगी
16:26देव और दानव पूरे बल से वासुकी नाग को खीच रहे थे, जिससे घर्षन से अत्यंत तीवर गर्मी उत्पन हो
16:33रही थी
16:35तभी समुद्र के सबसे गहरे गर्थ से एक अत्यंत भयानक कालेहरे रंग का विनाशकारी वाश्प उपर उठने लगा
16:43वह भयंकर हलाहल विश्था जो एक सजीव अंधकार मेई ज्वाला बनकर समस्त स्रिष्टी को लीलने के लिए प्रकट हुआ
16:52उस हलाहल विश्थ की अत्यंत जहरीली भाप ने पल भर में विशाल समुद्र के जल को खौलते हुए तेजाब में
16:59बदल दिया
17:01विश्थ की प्रचंड गर्मी और दमघोंटू गंध स्वर्गलोक तक जा पहुँची जिससे देवताओं का सास लेना दूभर हो गया
17:10एरावत पर सवार देवराज इंद्र का दम घुटने लगा और चारों ओर का आकाश बैंगनी और विश्यले हरे रंग में
17:17बदल गया
17:19दैत्यराज बली और उनके पराक्रमी सेनापती अपनी त्वचा को जलता हुआ देखकर अत्यंत भय से पीछे हटने लगे
17:28विश्यले बादलों ने प्रिथवी को ढख लिया जिससे हरे भरे जंगल भस्म होने लगे और पवित्र नदिया सूख कर राख
17:36बनने लगी
17:38धर्ती पर त्राहित्राही मच गई और समस्त्र शिमुनी और मनुष्य इस महा संकट से मुक्ती के लिए रोने पुकारने लगे
17:57शीरसागर में शेशनात पर शयन कर रहे भगवान विश्नु ने अत्यंत गंभीर मुद्रा में इस ब्रहमांडी अंधकार को देखा
18:06भयभीत देवताओं और दानवों ने समुद्र मन्थन रोक दिया और अपनी जान बचाने के लिए हाहाकार मचाते हुए भागने लगे
18:15देवराज इंद्र ने कापते हाथों से सभी भयभीत देवताओं को इकठा किया और इस संकट से रक्षा का मार्ग धूंडने
18:24लगे
18:24सभी देवता दोड़ते हुए वैकुंठ धाम पहुँचे जहां उन्होंने भगवान विश्नु के चर्णों में शीष नवाकर जीवन की भीख मांगी
18:35जगतपालक श्रीहरी विश्नु ने अत्यंत शांत स्वर में कहा कि इस विनाशकारी विश्को पचाने की शक्ती केवल देवाधिदेव महादेव में
18:44ही है
18:46भगवान विश्नु के आदेश पर देव, असुर और गंधर्वों का विशाल समोह कैलाश परवत की ओर अत्यंत तीवर गती से
18:53भागा
18:55जब चारों ओर जहरीला कोहरा बढ़ रहा था तब कैलाश की बरफीली चोटिया शिव की दिव्य आभा से चमक रही
19:02थी
19:04देवाधिदेव महादेव कैलाश परवत पर ध्यानमगन बैठे थे, परंतु उनके भीतर संपून ब्रहमांड का करुन करंदन गूंज उठा
19:13उनके समीप बैठी माता पारवती की ममतामई आखों में संसार की रक्षा के लिए अत्यंत गहरी चिन्ता और करुना जहलक
19:21रही थी
19:23समुद्र मन्थन के बीच हलाहल विश्की भयावह नीली लप्ते फुफकारते ही देवसुरों का अहंकार छिन्नभिन हो गया और चारों और
19:32त्राहित्रा ही मच गई
19:34वासुकी नाग के मुख से विश्की घातक बूदे गिरते ही क्षीर सागर का जल उबलने लगा और समुद्र मन्थन का
19:42महान कार्य वही सहसा रुप गया
19:45विश्की तीक्षन गंध और विशैले धुए से देवताओं के स्वर्ण आभूशन काले पढ़ने लगे तथा दानवों की त्वचा जुलसने लगी
19:54देवराज इंद्र और असुर्राज बली ने विनाश को अपनी आखों के सामने देख कर युद्ध और मन्थन दोनों के त्याग
20:02की घोशना कर दी
20:04हलाहल की भयावः ज्वालाओं ने सूर्य की किर्णों को निगल लिया और दसों दिशाओं में सर्वनाशी अंधकार छा गया
20:12तीनों लोकों में हाहाकार मच गया क्योंकि विशैली हवाय अमरावती और पाताल लोक की सीमाओं को भस्म करने लगी थी
20:21स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा स्वयं प्रकट हुए और विश्के तांडव को देखकर अत्यंत चिंतित हो उठे
20:30भगवान विश्णु ने गंभीर मुद्रा में प्रकट होकर सब को सचेत किया कि इस महाप्रलय से केवल कैलाशपती शिव ही
20:38संसार की रक्षा कर सकते हैं
20:41महाविनाश के सम्मुख देवों और दानवों ने अपनी पुरानी शत्रुता भुला कर केवल प्रानरक्षा के लिए परसपर हाथ मिला लिया
20:50ब्रहमा और विश्नु के नेतरित्व में समस्त सुर और असुर जलते हुए महासागर को छोड़कर उत्तर दिशा में पवित्र कैलाश
20:58की ओर दौर पड़े
21:00घायल देवों और भयभीत असुरों की यह एतिहासिक पद्यात्रा दोहस्वपन जैसी काली रातों और तूफानी हवाओं को चीरती हुई आगे
21:09बढ़ी
21:11जैसे ही कैलाश परवत की हिमच्छादित चोटिया दृष्टि गोचर हुई संपून वातावर्ण में एक अध्भूत और अलौकिक शान्ती का संचार
21:20हो गया
21:22कैलाश के पवित्र प्रांगण में भगवान शिव समाधिस्थ बैठे थे जिनके मुखमंडल पर संसार के किसी भी भय की चाया
21:30तक नहीं थी
21:31माता पार्वती महादेव के समीप विराजमान थी जिनकी करुणा पूर्णा दृष्टी समस्त जीवों की पीडा हरने के लिए आतुर थी
21:41भगवान ब्रह्मा ने आगे बढ़कर अपने चारों मुखों से महादेव की स्तुती करते हुए रक्षा की गुहार लगाई
21:49भगवान विश्णु ने अपने चक्र को शांत कर महादेव के समक्ष नत्मस्तक होते हुए उनसे संपून ब्रह्मांड के अस्तित्व को
21:57बचाने की प्रार्थना की
22:00देवराज इंद्र और दानवराज बली सहित सभी देव और असुर एक साथ बर्फ पर घुटनों के बल बैठ गए और
22:08महाकाल की शरणली
22:10दूर क्षितिच पर हलाहल विश्की उठती हुई उची काली तरंगे अब सीधे कैलाश की पवित्र भूमी को छूने ही वाली
22:18थी
22:31समस्थ जगत की आर्थ पुकार सुनकर भगवान शिव ने मंद मुस्कान के साथ अपने तीसरे नेत्र को धीमे से खोला
22:39और सृष्टी का कल्यान करने का संकल्प लिया
22:42समुद्र मन्थन से भयावा हलाहल विश एक काले धुएदार बवंडर के रूप में प्रकट हुआ जिसकी एक-एक बूंड में
22:50समस्थ सृष्टी को भस्न करने की सामर्थ्य थी
22:54उस विक्राल विश की तपिश और तीवर गंध ने तीनों लोकों को ततकाल अपनी चपेट में ले लिया जिससे स्वर्ग
23:01से पाताल तक हाहाकार मच गया
23:05वनस्पतियों, जीवों और स्वय देवों के शरीर में पीडा की लहर दोड गई जिससे उनके प्राण सूखने लगे और आशा
23:13की अंतिम किरण भी मंद पढ़ने लगी
23:16स्रिष्टी के इस भयावह संकट को देख कर भगवान विश्णु अपने शांत सागर शयापर और ब्रहमाजी अपने कमल सिनहासन पर
23:25अत्यंत चिंतित और गंभीर मुद्रा में बैठे थे
23:29सभी देव, रिशिमुनी और भयभीत प्राणी एक जुठ होकर स्रिष्टी के पालक भगवान विश्णु और ब्रहमाजी के पास सहायता के
23:37लिए पहुँचे
23:39जब हलाहल विश्गी विनाशकारी शक्ती को देखकर कोई उपाय नहीं सूझा, तब सभी देवों ने एक स्वर में महादेव शिव
23:47की शरण लेने का निर्णय किया
23:50विश्णु ब्रहमा और समस्थ देवों ने मिलकर कैलाश की ओर अपनी करुन पुकार भेजी जो एक अद्रिश उर्जा तरंग के
23:58रूप में शिव के धाम तक पहुँची
24:01कैलाश के एकांध शिखर पर भगवान शिव गहन समाधी में लीन थे, जहां ब्रहमांड की कोई भी हलचल उन्हें विचलित
24:09नहीं कर पाती थी
24:11देवों की करुन पुकार की सुक्ष्म तरंगे उनकी गहन समाधी को भेदने लगी, जिससे उनके तीसरे नेत्र में एक मंद
24:20प्रकाश की चमक उभी
24:22धीरे धीरे ब्रहमांड की पीडा और संकट की अनुभूती ने महादेव को अपनी समाधी से जागरित किया और उन्होंने अपनी
24:30दिव्य आखें खोली
24:32उनकी दिव्यद्रिष्टी ने ततकाल पूरे ब्रह्मांड को स्कैन किया और उन्होंने चारों और फैले हलाहल विश्के विनाशकारी प्रभाव को देखा
24:43ब्रह्मांड की पीडा और समस्त प्राणियों की करुण चीखें उनके हृदय में उतर गई जिससे उनका शांतचित असीम करुणा से
24:51भर उठा
24:53बिना किसी हिचकिचाहट या स्वार्थ के महादेव ने समस्त स्रिष्टी को बचाने के लिए उस महाविश्को स्वयन पीने का अटल
25:01संकल्प लिया
25:03अपनी असीम शक्ती से महादेव ने अपना दाहिना हाथ ब्रह्मांड में फैले उस विशालकाय हलाहल विश्की ओर बढ़ाया
25:12शन भर के लिए वह विश्च सहमा पर फिर महादेव की अलौकिक शक्ती और करुणा से खिंचा चला आया एक
25:19बिन्दू में सिमटता हुआ
25:22तीनों लोकों को नश्ट करने वाला वह महाविश अब एक छोटे से नीले काले गोले के रूप में महादेव की
25:29हथेली पर विराजमान था
25:32बिना एक पल की देरी किये महादेव ने उस विश के गोले को अपने मुख की ओर बढ़ाया मानो कोई
25:39अमरित पान कर रहे हूँ
25:41जैसे ही विश उनके कंठ में उत्रा, उनके परमेश्वरी कंठ ने उसे अपने भीतर रोक लिया और वह ततकाल एक
25:49गहरे नीले रंग में परिवर्तित हो गया
25:52कंठ में विश धारन करते ही तीनों लोकों में फैला हुआ हलाहल शान्थ हो गया और सभी देवों, रिशियों और
26:00प्राणियों ने ततकाल प्राणों का संचार महसूस किया
26:04कृतज्यता से भरे हृदय से भगवान विश्नु, ब्रह्मा और समस्त देवों ने नीलकंठ महादेव को शत्षक प्रणाम किया
26:13इस महाबलिदान के पश्चात महादेव नीलकंठ के नाम से पूजनिय हुए, ब्रह्मांड के शाश्वत रक्षक के रूप में अपनी दिव्य
26:22समाधी में पुना लीन हो गए
26:25महासागर से निकला हलाहल विश, प्रल्यंकारी अगनी की तरहे जलता हुआ, ब्रह्मांड के कंकन को भस्म करने को आतुर था,
26:33जिसने समस्त देवों और असुरों को भयभीत कर दिया था
26:38स्रिष्टी के इस भयावह संकट को देख कर, त्रिलो की नाथ भगवान शिव ने स्वयें इस कालकूट विश का पान
26:44करने का निश्चय किया, ताकि समस्त चराचर जगत का विनाश रोका जा सके
26:51महादेव ने अपने विशाल हाथों में उस महाविनाशक विश को एक छोटे से नीले गोले के रूप में समेटा, जिसकी
26:58एक गूंद भी पूरी स्रिष्टी को राख करने की ख्षमता रखती थी
27:03जो ही उन्होंने उस विश को अपने होठों तक लाया, ब्रहमांड में एक भयाव सन्नाटा चा गया, मानो समस्त जीवन
27:11क्षण भर के लिए अपनी सासे रोक चुका हो
27:15विश्ने महादेव के शरीर में प्रवेश करते ही भीशन दाह उत्पन किया, उनका बर्ण क्षण भर के लिए अगनी के
27:22समान लालिमा लिये हुए दिखाई दिया, जो उनके दिव्यताप को भी चुनौती दे रहा था
27:29यह देखकर देवी पार्वती का हरिदय मम्ता और चिंता से भर उठा, उनकी आखों में ब्रहमांड की रक्षा का द्रिड
27:37संकल्प और अपने पती के प्रती अगाध प्रेम जलक रहा था
27:42पलक जपकते ही आदी शक्ती ने अपने असीम सामर्थ्य से विश्को शिव के शरीर में नीचे उतरने से रोकने का
27:49निर्णय लिया, यह एक तातकालिक और दिव्य प्रतिक्रिया थी
27:54बिजली की गती से देवी पार्वती अपने प्रियतम महादेव की ओर बढ़ी, उनकी चाल में अदमय शक्ती और मात्रु प्रेम
28:02का अध्भुत मिश्रण था
28:05उन्होंने तक्षन अपने दिव्य और शीतल हाथों से भगवान शिव के गले को द्रिड़ता से पकड़ लिया, मानो स्रिष्टी को
28:12एक अटूट कवच प्रदान कर रही हो
28:16पार्वती के स्पर्ष से विश का तीवर प्रभाव थमने लगा, विश जो शिव के शरीर में नीचे उतर रहा था,
28:23अब उनके कंठ में ही अटकर रह गया
28:26विश की भयावः शक्ती और देवी के दिव्य अवरोध के बीच एक अद्रिष्य युद्ध छिड़ गया, जिसमें दोनों की प्रचंड
28:34उर्जाएं आमने सामने थी
28:37देवी पार्वती का संकल्प अटल था, उनकी आखें ममतामई होते हुए भी प्रचंड शक्ती से चमक रही थी, मानोवे स्वय
28:45विश को चुनौती दे रही हो
28:48अत्य देवी की दिविय शक्ती ने विश के अधोगामी प्रवाह को पूर्णत अवरुध कर दिया और वह महादेव के कंठ
28:56में एक स्थाई नीलवर्ण के रूप में स्थापित हो गया
29:00विश के ठहराव से महादेव का कंठ धीरे-धीरे गहन नीले रंग में परिवर्टित होने लगा, जो स्रिष्टी के लिए
29:07उनके त्याग का एक शाश्वत प्रतीक बन गया
29:11नीलवर्ण उनके गले पर इस प्रकार फैला, जैसे अनंत आकाश अपने सभी तारों के साथ उनके कंठ में समा गया
29:19हो, एक दिव्य और विसमेकारी द्रिश्य प्रस्तुत कर रहा था
29:22इस प्रकार महायोगी शिव नीलकंठ कहलाए, उनका नीला कंठ उनके परमत्याग और स्रिष्टी के प्रती असीमित प्रेम का साक्षात प्रमान
29:33बन गया
29:34महादेव के मुख पर एक दिव्य शांती चा गई, विश्का तीवरताप अब शितलता में बदल चुका था और उनके चहरे
29:42पर एक गहन शांत मुस्कान थी
29:46देवी पार्वती ने अपने नीलकंठ पती को देखा, उनकी आखों में अब चिंता के स्थान पर गहन प्रेम, गर्व और
29:53असीन भक्ती थी, क्योंकि उन्होंने स्रिष्टी को बचा लिया था
29:58समस्थ देवी देवता, रिशिमुनी और ब्रह्मांड के प्रानीगन महादेव के इस परमत्याग और देवी पार्वती के दिव्य हस्तक शेप को
30:07देखकर नत्मस्तक हो गए
30:10नीलकंठ महादेव का नाम ब्रह्मांड के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अनकित हो गया, जो युगो-युगो तक स्रिष्टी के
30:17कल्यान के लिए उनके बलिदान की गाथा गाता रहेगा
30:22हलाहल विष्ट को अपने कंठ में रोक कर, देवाधिदेव महादेव ने समस्त सुरिष्टी को विनाश की धधक्ति अगनी से बचा
30:30लिया
30:31माता पार्वती ने अपनी दिवियर शक्ति से महादेव के कंठ को स्पर्श कर उस भयानक विष्ट को वही स्थिर कर
30:38दिया
30:39विश्के प्रभाव से महादेव का कंठ सदैव के लिए नीला हो गया और वे संपूर्ण ब्रहमांड में नीलकंठ के नाम
30:47से पूजे गए
30:49सृष्टी को भस्न करने वाली विश्की वह भयानक ज्वाला महादेव के परमधैर्य और असीम सन्यम के सामने शांत हो गई
30:58महादेव के मस्तत पर सुषोभित चंद्रदेव ने अपनी शीतल किर्णों से विश्के उस दाहक ताप को तुरंट शांत कर दिया
31:07भगवान विश्नु ने अत्यंत श्रद्धा और कृतग्यता से भरकर महादेव के इस अनुपम त्याग को शीष जुका कर नमन किया
31:16स्रिष्टिकर्ता ब्रहमाजी ने वेदमंत्रों का पाठ करते हुए महादेव की इस परम करुणा और महिमा का गान किया
31:24देवराज इंद्र और समस्त देवगणों ने आनन्दित होकर स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा करते हुए हर-हर महादेव का उद्गोश
31:32किया
31:34महादेव के इस महात्याग को देखकर दान्वराज और असुरों का अहमकार तूट गया और वेभी श्रधा से नत्मस्तक हो गए
31:43परम भक्त देवर्षी नारद ने अपनी वीना की मधूरतान पर ओम नमः शिवाय का कीर्टन करते हुए नृत्य करना आरंभ
31:51कर दिया
31:53विश्की भयानक गर्मी से जुलस रही प्रिथवी देवी का संताप दूर हुआ और वेपुनह हरीभी और शीतल हो उठी
32:01विश्की ज्वाला से उबलते हुए समुद्र का जल पल भर में शांत, निर्मल और दिव्य नीले रंग में परिवर्तित हो
32:08गया
32:10भगवान शिव ने अपनी मंद मुस्कान के साथ नेत्र खोले और त्रिलोकी को अभाइदान देकर पूरी तरह आश्वस्त किया
32:19जगत जन्नी माता पार्वती ने अत्यंत प्रेम और गर्व से महादेव की ओर देखा और उनका हाथ ठाम लिया
32:27स्वर्गलोक से अपसराएं निरित्य करने लगी और गंधर्वों के मधुर संगीत से संपूर्ण कैलाश परवत गूँच उठा
32:36बागंबर धारन की ये कैलाश पती शिव समाधी में लीन हो गए और उनका नीला कंठ उनके परम कल्यानकारी रूप
32:44का प्रतीक बन गया
32:46रिशिमुनियों ने दिव्य मंत्रो चार के साथ कपूर और घी के दीप जलाकर नीलकंठ महादेव की महार्ती उतारी
32:55महादेव की इस महिमा से संपूर्ण ब्रहमांड एक नए पवित्र और स्वर्णिन प्रकाश से आलोकित हो उठा
33:03स्रिष्टी के इतिहास में महादेव का यह त्याग निहस्वार्थ प्रेम और परम करुणा का एक अमर और शाश्वत संदेश बन
33:11गया
33:12देव, दानव, मानव और समस्त प्राणी जगत एक स्वर में नीलकंठ महादेव के चर्णों में शीष जुका कर उनकी जैजैकार
33:20करने लगे
33:22महादेव के कंठ में हलाहल समाते ही उनका पूरा शरीर नीलिमा से भर गया जिसने ब्रहमांड को विनाश से बचा
33:30लिया
33:31देवगन भयमुक्त होकर नीलकंठ महादेव के इस अनुपम त्याग को देखकर अवाक रह गए उनकी आखों में अगाद श्रधा उमड
33:40पड़ी
33:41असुरों के गरवीले मुख भी सहसा शान्थ हो गए वे पहली बार महादेव के इस करुणापूर्ण रूप को देख निस्तब्ध
33:49खड़े थे
33:51देवी पारवती महादेव के नीले कंठ को देख उनके अगाद प्रेम और त्याद पर गर्व से भर उठीन उनकी आखों
33:59में अश्रु नहीं अपितु दिव्यता थी
34:02भगवान विश्णू ने विनमरता पूर्वक्षीश जुकाकर महादेव के इस अध्वितिय बलिदान को प्रणाम किया जिनकी महीमा अब त्रिलोक में गूँझ
34:11उठी थी
34:13ब्रहमा जी ने अपनी चार मुखों से एक साथ स्तुती गान किया महादेव की करुणा और सामर्थ्य की प्रशंसा में
34:21ब्रहमांड गूंड उठा
34:23समस्त देवी देवताओ और असुरों ने एक स्वर में महादेव को नमन किया उनके दिव्यत्याग के आगे सभी भेद मिट
34:31गए थे
34:33हलाहल का तीवर विशकंठ में धारन करने के बावजूद महादेव का मुख मंडल अलौकिक शांती और करुणा से दीप्त था
34:41भय और हाहाकार की जगहे अब एक गहन शांती और कृतग्यता ने ले ली थी मानो स्रिष्टी ने एक लंबी
34:49सांस ली हो
34:51देवर्शी नारद ने अपनी वीना पर महादेव के यशोगान में मधुर भजन छेडा जिसकी दिव्यधुन से ब्रहमांड पुलकित हो उठा
35:00सभी देवगणों ने समीप आकर महादेव के चर्णों में शीश नवाया उनके त्याग के लिए असीम कृतग्यता व्यक्त की
35:09यहां तक की गर्विले असुर्भी अपने अहंकार को त्याग महादेव के समक्ष श्रधावन्त हुए उनके मस्तक स्वयन जुप गए
35:19महादेव ने अपनी मंद मुस्कान से सभी की कृतग्यता स्वीकार की मानों कह रहे हूँ यह तो मेरा कर्तव्य था
35:27तब भगवान विश्नों ने देवों और असुरों से कहा कि अब हलाहल का संकट तल गया है इसलिए मन्थन का
35:35कार्यपुन्ह आरंभ करना चाहिए
35:38देव और असुर दोनों ही अम्रित की आशा से उचसाहित होकर समुद्र मन्थन को फिर से शुरू करने के लिए
35:45सहश सहमत हो गए
35:48मंदराचल को मतनी और वासुकी नाग को नेती बना कर पुन्ह समुद्र मन्थन की विशाल प्रक्रिया का आरंभ हुआ
35:56हलाहल का प्रभाव शांत होने से समुद्र का क्रोध भी थम गया था और वह अब अम्रित को उगलने के
36:03लिए शांत भाव से तयार था
36:06देवों और असुरों ने एक साथ वासुकी को खीचना आरंभ किया और मंदराचल के घर्शन से समुद्र में पुना मन्थन
36:14का तीवर स्वर गूंध उठा
36:17अब सभी की आखें समुद्र के गहरे गर्भ पर टिकी थी जहां से अम्रित सहित अन्य दिव्य रतनों के प्रकट
36:24होने की आशा थी
36:26महादेव कैलाश पर दूर से इस द्रिश को निहार रहे थे उनके कंठ में नीलिमा उनके परमत्याग की अमर गाथा
36:34कह रही थी
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