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देवराज इंद्र के अहंकार के शांत होने और हलाहल विष पीने के बाद महादेव के नीलकंठ बनने के बाद भी, देवताओं को अपनी शक्ति और अमृत की आवश्यकता थी। समुद्र मंथन जारी रहा, और इस बार ब्रह्मांड का सबसे बहुमूल्य रत्न, अमृत कलश, प्रकट हुआ! 😱 अमृत के लिए देवताओं और असुरों के बीच एक भीषण संग्राम छिड़ गया। लेकिन कैसे भगवान विष्णु ने अपनी अद्भुत माया और मोहिनी अवतार के रूप में आकर असुरों से अमृत को छीना? कैसे हुई राहु-केतु की उत्पत्ति? इस एपिसोड में देखिए, उस दिव्य छल की पूरी गाथा जिसने ब्रह्मांड का भाग्य बदल दिया! #ShivaPurana #MohiniAvatar #SamudraManthan #Amrita #Vishnu #RahuKetu #HinduMythology #MythologicalStories #DevaAsuraWar #DivineIllusion #Immortality
Transcript
00:00हलाहल विश को अपने कंठ में धारण कर जब महादेव ने उसे शांत किया, तब उनके नीलकंठ स्वरूप को देखकर
00:07संपून ब्रहमान कृतज्यता से जुप गया
00:11भगवान शिव के नीले पड़ते कंठ से निकलती दिव्य अभा को देखकर देवताओं और असुरों के चहरों पर छाया हुआ
00:18मृत्यू का भय सदैव के लिए समाप्थ हो गया
00:23भगवान विश्णू ने अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर महादेव के इस परम और अनुपम त्याग की मुक्तकंट से स्तुती
00:30की
00:31माता पार्वती ने अत्यंत प्रेम और गर्व भरे नेत्रों से अपने पती महादेव को देखा जिन्होंने स्रिष्टी की रक्षा के
00:40लिए विश्का पान किया था
00:42शीर सागर के उपर मंदरा रहे विशैले और काले धुएं के बादल छंट गए और चारों और एक अलोकिक दिव्य
00:50प्रकाश फैल गया
00:52शीहरी विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ सभी देवों और दानवों को संबोधित करते हुए उन्हें पुनह समुद्र मंथन आरंभ
01:00करने की प्रेणा दी
01:03देवराज इंद्र ने अपने दिव्य एरावत हाथी के समीब खड़े होकर अत्यंत उत्साह के साथ देवताओं को वासुकी नाग की
01:11पूँच थामने का निर्देश दिया
01:14असुर राज बली ने अपने विशाल और पराक्रमी साथियों के साथ अत्यंत गर्व से नागराज वासुकी के मुख की ओर
01:22के हिस्से को मजबूती से पकड़ लिया
01:25कुर्मावतार धारी भगवान विश्नु ने विशाल कचुए के रूप में समुद्र की गहराईयों में जाकर मंदराचल परवत को अपने सुद्रिड
01:33पीठ पर फिर से संतुलिप किया
01:36नागराज वासुकी ने अपने भीमकाय और चमकीले शरीर से मंदराचल परवत को लपेट कर मन्थन के लिए स्वयन को पूरी
01:44तरह से स्थिर कर लिया
01:47भगवान विश्णु के विराट स्वरूप ने अपनी मायावी शक्तियों से देवों और असुरों को अध्भुत मानसिक और शारिरिक उर्जा प्रदान
01:55की
01:57देवताओं ने पूरी श्रद्धा और भक्ती के साथ हर हर महादेव का जयगोश करते हुए वासुकी नाग को अपनी ओर
02:04खींचना शुरू किया
02:07असुरों ने भी अपनी संचित आसुरी शक्ती और अमरित पाने की लालसा के साथ पूरी ताकत से मंथन की रसी
02:14को खींचा
02:26अंतरिक्ष में कडक्ती बिजलियों और गरस्ते बादलों के बीच ब्रहमांड की समस्थ शक्तियां इस महामंथन की गवाह बनने लगी
02:35समुद्र की गहराईयों से सुनहरे और अलौकिक जाग उठने लगे जो इस बात का संकेत थे कि अब दिव्यरत्नों का
02:43आगमन होने वाला है
02:46ब्रहम लोक से भगवान ब्रहमा ने अपने हंस वाहन पर सवार होकर इस महान द्रिश्य पर दिव्य पुश्पों की वर्षा
02:53की
03:05रखा क्षीर सागर के भीतर से निकलने वाली सत्रंगी रश्मियों ने संपूर्ण दिशाओं को जगमगा दिया जिससे सब के हृद्यों
03:13में नई आशा का संचार हुआ
03:16समस्थ देव और दानव अपनी पूरी एकागरता के साथ उस पल की प्रतीक्षा करने लगे जब समुद्र के गर्ब से
03:24दिव्य अमरित कलश प्रकट होगा
03:27मंदराचल परवत के तीवर घूर्णन और वासुकी नाग के फुफकार से क्शीर सागर का जल उबलने लगा जिससे ब्रहमांडिय उर्जा
03:35की तरंगे चारों और फैलने लगी
03:39महामंथन के इस घोर घर्षन के बीच समुद्र के गर्ब से एक असीम और दिव्य प्रकाश पुंज उपर उठने लगा
03:46जिसने देवों और असुरों दोनों की आखों को चौनधिया दिया
03:51उसी अलौकिक प्रकाश के मध्य से दिव्य और मनमोहक स्वरूप वाली कामधेनु गाय धीरे-धीरे प्रकट होने लगी जिसके शरीर
04:00से दिव्य सुगंध और कांती उचसर्जित हो रही थी
04:04साक्षात वेदों की प्रतिमूर्ती प्रतीत होने वाली कामधेनु के चारों ठनों से पवित्र दूध की धाराएं बह रही थी जो
04:12ब्रहमांड के पोशन का प्रतीक थी
04:15आकाश मार्ग से इस अलौकिक ग्रिश को देखते हुए सबतर्शी और अन्य तपस्वी मुनी हर्ष से भर उठे और उन्होंने
04:23कामधेनु की स्तुती में वेदमंत्रों का गान प्रारंभ कर दिया
04:28शीरसागर के उपर शून्य में स्थित भगवान विश्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में मुस्कुराते हुए इस प्रथम रत्न के प्राकटे
04:36का स्वागत अपनी मंद मुस्कान से किया
04:38कैलाश परवतपर विराजमान महादेव और माता पारवती ने भी इस शुभक्षन को अत्यंत प्रसंता पूर्वक देखा जिससे संपूर्ण स्रिष्टी में
04:49शान्ती की लहर डौड गई
04:52देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने कामधेनु की दिव्य आभा को देखकर अपने दोनों हाथ जोड लिए और उनके मुक्से
05:00श्रधा पूर्वक वंदना के शब्द फूट पड़े
05:04असुर भी कामधेनों के उस सम्मोहक और पवित्र रूप को देखकर एक पल के लिए स्तब्ध रह गए और उनके
05:11भीतर का तामसित क्रोध कुछ समय के लिए शान्त हो गया
05:15तब रिशिमुनियों ने देवताओं और असुरों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा की यग्य और हविश्य की पूर्ती के लिए इस
05:23दिवेगाय का रिशियों के आश्रम में रहना ही सर्वोत्तम है
05:28कामधेनु अत्यंत शांत भाव से क्षीर सागर के जल पर इस तरह चलने लगी मानो वह कोई ठोस स्वर्ण भूमी
05:35हो और उसके प्रत्येक कदम से जल में प्रकाश पुंज उठने लगे
05:40चुंकि असुरों को केवल अमरित की लाल सा थी इसलिए उन्होंने बिना किसी आपत्ती के कामधेनु को पूजनिय रिशियों को
05:48सौंपने की सहमती दे दी
05:51देवताओं ने असुरों के इस निर्नाय का स्वागत किया और शंखनाद कर इस महानक्षन की घोशना की जिससे तीनों लोग
05:59प्रसन्न हो उठे
06:01रिशियों ने अत्यंत आदर पूर्वक कामधेनु को ग्रहन किया और उन पर पवित्र गंगाजल छिड़क कर उनका प्रथम अभिशेक किया
06:10जैसे ही रिशियों ने उन्हें स्वीकार किया कामधेनु ने अपनी दिव्य शक्तियों से वहां उपस्थित सभी के लिए उत्तम नैविद्य
06:18और हविश्य प्रकट कर दिये
06:21प्रथम रत्न के इस सफल आवंटन से समुद्र मन्थन का उत्साह दोगुना हो गया और दोनों पक्षों ने और अधिक
06:29उर्जा के साथ वासुकी नाग को खींचना शुरू किया
06:32ब्रहम लोग से स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा ने अपनी चार भुजाओं को उठा कर इस पवित्र यग्य को अपना
06:40सर्वोच आशिर्वात प्रदान किया
06:44देवर्शी नारद ने अपनी वीना की तान पर कामधेनू और भगवान नारायन की महिमा का गान करते हुए संपूर्ण वातावर्ण
06:52को भक्तिमय बना दिया
06:54कामधेनू के प्राकट्य ने देवों और असुरों के मन में यह विश्वास पक्का कर दिया कि अब वह समय दूर
07:01नहीं जब अम्रित कलश भी बाहर आएगा
07:04इस प्रकार कामधेनू के कल्यानकारी प्राकटे के बाद शीरसागर के अगाध जल में छिपे अन्य दिव्य रतनों के बाहर आने
07:13की प्रतीक्षा होने लगी
07:16शीरसागर के मन्थन से उठती दिव्य लहरों के बीच देवताओं और असुरों के हृदय में आगामी चमतकारों के प्रती उठसुकता
07:24तीवर होने लगी
07:26मंदराचल परवत के तीवर घूरनन से समुद्र की गहराईयों में एक विशालकाय और अलोकिक आकरती उभरने लगी जिसने पूरे ब्रहमांड
07:35को कम्पित कर दिया
07:37लहरों को चीरते हुए आठ सूंडों वाला परवताकार श्वेत हाथी एरावत प्रकट हुआ जिसके मस्तक से बहते मद की सुगंधने
07:46दिशाओं को सुवासित कर दिया
07:49देवराज इंद्र ने जब उस अलोकिक और एश्वर यशाली श्वेत गजराज को देखा तो उनके नेत्र उसकी दिव्य आभा और
07:57असीमित शक्ती से चौनधिया गए
08:00अपनी दिव्य महिमा का प्रदर्शन करते हुए एरावत ने देवराज इंद्र के समक्ष शीष जुकाया और इंद्र ने उसे सहर्ष
08:08अपने दिव्य वाहन के रूप में स्विकार किया
08:12एरावत को देवराज इंद्र के अधीन होते देख असुरों के हरिद्यों में इश्या की अगनी भड़क उठी जिससे मन्थन का
08:20वेग और अधिक तीवर हो गया
08:23समुद्र का जल एक बार फिर अशान्थो उठा और लहरों के बीच से दिव्य प्रकाश की तीवर किरने फूटने लगी
08:30जो किसी और महान उपहार का संकेत थी
08:34तभी सागर के गर्ब से साथ मुखों वाला, हिमसा श्वेत और अत्यंत तीवर गती वाला उड़ने वाला घोड़ा उच्चेहश्रवा प्रकट
08:43हुआ
08:44अपने विशाल और अलौकिक पंखों को फैला कर उच्चेहश्रवा आकाश में उरने लगा, जिससे पूरा नभमंडल उसकी अलौकिक कांती से
08:53जगमगा उठा
08:55इस अध्भुत अश्व की शक्ती और वेग को देखकर असुर राजबली ने आगे बढ़कर उच्चेहश्रवा को अपने दल के लिए
09:03स्विकार कर लिया
09:05देवताओं ने स्रिष्टी के संतुलन को बनाये रखने के लिए बिना किसी विरोध के उस दिव्य अश्व उच्चेहश्रवा को असुरों
09:13के अधिकार में जाने दिया
09:15वासुकी नाग के फुफकारने और मन्थन के पुनह आरंभ होने से समुद्र की सतह पर दिव्य रत्नों की श्रिंखला निरंतर
09:23जारी रही
09:25अचानक पूरे वातावर्ण में एक ऐसी मनमोहक और अलौकिक सुगंध व्याप्थ हो गई जिसने देवों और असुरों दोनों के ठके
09:33हुए मनों को असीम शांती प्रदान की
09:36लहरों के मध्य से दिव्य पारिजात व्रिक्ष प्रकट हुआ जिसकी सुनहरी शाखाएं और अत्यंत सुन्दर गुलाबी स्फेद पुष्प ब्रहमांडिय उर्जा
09:45से दमक रहे थे
09:48पारिजात के पुष्पों से गिरने वाली दिव्य धूली ने समस्त देवों और असुरों के शारिरिक कष्टों और ठकान को क्षण
09:55भर में मिटा दिया
09:57सभी दिव्य और आसुरी शक्तिया इस इच्छा पूर्ती करने वाले कल्प व्रिक्ष समान पारिजात को देख कर विस्मय और लोब
10:05के सागर में डूब गई
10:08देवताओं ने इस दिव्य और पवित्र व्रिक्ष को स्वर्ग की शोभा बढ़ाने के लिए अपने अधिकार में लेने का निर्नय
10:15किया, जिसे असुरों ने भी स्विकार कर लिया
10:19पारिजात व्रिट्ष को देवराज इंद्र के नंदन वन में स्थापित करने के लिए देवदूतों द्वारा स्वर्ग लोग की ओर विदा
10:26किया गया
10:27इन तीन अध्भुत और शक्तिशाली उफारों के प्रक्टिकरण ने दोनों पक्षों के भीतर छिपी महत्वा कांक्षा और लालसा को चरम
10:36सीमा पर पहुँचा दिया
10:38अब अमरित की अंतिम बूंदों को प्राप्ट करने की तीवर आकांक्षा के साथ देव और असुर अत्यंत उर्जा और वेग
10:46से मन्थन में जुट गए
10:48शीर सागर का विशाल जल्मगन धरातल पुनह गर्जना करने लगा जहां देवों और असुरों के परसपर खिंचाव से नागराज वासुकी
10:57की देह से अगनी के स्फुलिंग निकलने लगे
11:00सागर के गहन अंतस्तल से अचानक एक दिव्य अरुनिमा से परिपून ज्वाला प्रकट हुई जिसने समस्त दिशाओं को सहस्त्रों सूर्यों
11:09की भांती उद्भासित कर दिया
11:12महाजल के बीच से दिव्य कौस्तुभ मनी का प्रादुर्भाव हुआ जो अपने असीम प्रकाश और अलोकिक तेज से त्रिलोक के
11:20अंधकार को क्षण भर में मिटा रही थी
11:24दानवों ने उस अतुलनिय मनी को हथियाने का प्रयास किया किन्तु उसकी विशुद्ध पवित्रता और ज्वाला समान उत्ताप ने दुष्ट
11:32असुरों को पीछे हटने पर विवश कर दिया
11:34तभी चतुर्भुज रूप में भगवान विश्णु अपने परम भव्य स्वरूप में अवत्रित हुए जिनका आभामंडल संपून स्रिष्टी को शान्ती और
11:44आनंद से परिपूर्ण कर रहा था
11:47कौस्तुभ मनि स्वतह वायू में तैरती हुई भगवान विश्णु के वक्षस्थल पर श्रीवत्स के समीप स्थापित हो गई जिससे उनका
11:55दिव्य स्वरूप और भी मनमोहक हो उठा
11:59मनि के सन्योग से भगवान श्री हरी का वक्षस्थल सूर्योदय के विस्तृत गगन के समान ददी प्यमान हो उठा जिसे
12:07देखकर देवगण आनंद से जूम उठे
12:10असुरों के हृदय में इर्शया की तीवर ज्वाला सुलग उठी परंतु श्रीहरी के असीम प्रभाव के समक्ष वे पूर्णत असहाय
12:19और निस्तेज खड़े रहे
12:21समुद्र मन्थन की प्रक्रिया पुनह प्रारंभ हुई और मन्थन के प्रचंड वेग से क्षीर सागर के तटपर सुवर्ण के समान
12:29कांतिमान दिव्य फेन उभरने लगा
12:32सहसा संपूर्ण दिशाओं में पारिजात और मन्दार के पुष्पों की ऐसी मादक सुगंध व्याप्थ हो गई जिसने मन्थन के तनाव
12:40को क्षण भर में शांत कर दिया
12:43आकाश मंडल से वीना, मृदंग और वेनु की अत्यंत मधुर सुर्मई ध्वनिया गूँजने लगी जो ब्रहमांड की प्रत्येक आत्मा को
12:52सम्मोहित कर रही थी
12:54जलराशी के स्वर्ण फेन से सौंदर्य की साक्षात प्रतिमाओ, उर्वशी, प्रम्भा, मेनका और तिलोत्मा जैसी अपसराओं का एक साथ दिव्य
13:04प्रादुर्भाव हुआ
13:05इन आकाशिय सुंदरियों के अंधुप्रत्यन से अलोकिक कांती छिटक रही थी और उनके परिधानों से छंती सुगंध ने वातावर्ण को
13:14सम्मोहित कर दिया
13:17अपसराओं ने सागर के प्रिष्ठभाग पर खिलते हुए नीलक्मलों पर अपने पच्चाप रखकर लैबध शास्त्रीयन रिती की मनमोहक प्रस्तुती आरंभ
13:26की
13:27उर्वशी और रंभा के भाव पूर्ण नयन और नुपुरों की जंकार ने देवों और असुरों दोनों के चेतनों को मंत्रमुग्ध
13:35कर दिया
13:36मेनका और तिलोत्तमा ने अपनी कोमल अंजली से दिव्यमंदार पुष्पों को वायू में बिखेरते हुए संपून आकाश को कलात्मक छटा
13:45से भर दिया
13:47दानव अपनी क्रूरता और युद्ध की भावना भूल कर केवल उन सुन्दरियों के सम्मोहत लावने को एक तक देखने में
13:54लीन हो गए
13:56देवराज इंद्र ने स्वर्ग की इस अनुपम निधी का सहेश स्वागत किया और उन्हें देवलोग की असीम शोभा और सम्मान
14:04के रूप में स्विकार किया
14:07सभी अपसराएं मन्ध हास्य बिखेरती हुई स्वर्ग लोग की ओर प्रस्थान कर गई जहां वे अमरावती को अपनी कला से
14:14सर्वदा जीवन्त रखने वाली थी
14:18अपसराओं के गमन के पश्चात क्षीरसागर में पुना भयंकर तरंगे उठने लगी क्योंकि अब अमरित के अंतिम महा प्रादुर्भाव का
14:26समय निकट आ रहा था
14:29शीरसागर के भीशन मन्थन के बीच समुद्र की लहरें सोने जैसी चमक उठीन और पानी के भीतर से एक विशाल
14:36और दिव्य गुलावी कमल उपर उठने लगा
14:40उसी क्षन उस अलोकिक कमल के उपर साक्षात धन, समरिध्धी और सौभाग्य की अधिश्ठात्री देवी लक्षमी अत्यंत दैविय तेज के
14:49साथ प्रकट हुई
14:51देवी लक्षमी के इस मनमोहक और अलोकिक रूप को देखकर देवों और असुरों के बीच चल रहा भीशन युद्ध अचानक
14:59थम गया और हर कोई मंत्र मुग्ध हो गया
15:03अपने हाथों में वर्माला लिये देवी लक्षमी उस विशाल कमल पर अत्यंत गरिमा और मंद मुस्कान के साथ खड़ी थी
15:10जिससे पूरा ब्रहमांड आलोकित हो रहा था
15:14तभी चारों दिशाओं से दिव्य और विशाल सफेद दिगज, हाथी, सोने के कलशों में पवित्र और सुगंधित जल लेकर वहां
15:23उपस्थित हुए
15:24उन दिव्य हाथियों ने श्रध्धा पूर्वक उन सोने के कलशों का पवित्र जल देवी लक्ष्मी के उपर अर्पित करते हुए
15:32उनका भव्य राजजा भिशेक किया
15:35स्वर्ग से अपसराएं अत्यंत हर्शित होकर मधूर संगीत पर नृत्य करने लगी और गंधर्वों ने देवी के स्वागत में दिव्य
15:43गीतों का गान किया
15:45असुरों के नायक, क्रूर और बल्वान बली ने अपनी वजर्मुष्टी तानते हुए गर्जनाकी की अमरित पर उनका प्रथम अधिकार है
15:53क्योंकि उन्होंने मन्थन में सर्वाधिक श्रम किया है
15:58देवों के अधिपती इंद्र ने अपने तेजों में स्वरूप में आगे बढ़कर असुरों के दावे को यह कहते हुए द्रिड़ता
16:06से खंडित किया कि अमरित पर केवल देवताओं का ही नैसर्गिक अधिकार है
16:12दोनु सेनाओं की आखों में अब सम्मान और संधी की जगह केवल युद्ध की लपतें और विजय की लालसा स्पष्ट
16:19रूप से दिखाई दे रही थी जिसने पूरे वातावर्ण को उग्र बना दिया
16:25तभी एक विशालकाय असुर्ग जिसने अपनी भीशन भुजाओं में एक भीमकाय गदा थाम रखी थी क्रोध से धधकते हुए अमरित
16:34कलश की ओर जपता
16:36उसके इस दुस्साहस्पूर्ण कदम से देवों में हाहाकार मच गया और उन्होंने एक स्वर में यह अनुचित है कहते हुए
16:44विरोध किया
16:46उस विशालकाय असुर ने क्षण भर भी प्रतीक्षा न करते हुए धनवंतरी भगवान के हाथों से बलपूर्वक अमरित कलश छीनने
16:54का प्रयास किया जिससे पूरा मंच हिल गया
16:58देवों में से एक पराक्रमी योध्धाने तुरंथ हस्तक शेप करते हुए असुर को रोकने का प्रयत्न किया जिससे अमरित कलश
17:06हवा में थोड़ा उचल गया
17:09अमरित कलश की सुरक्षा के लिए देवों और असुरों के बीच भीशन धक्का मुक्की और अखाड़ा बन गया
17:16हर कोई उस दिव्य तरल को पाने के लिए बेताब था
17:20असुरों की अदमय शक्ती और संख्या बल ने देवों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया
17:26उनकी गरजना से आकाश गूंज उठा और देवताओं का संतुलन डगमगाने लगा
17:32अंतह एक क्रूर असुर ने अपनी विशाल भुजाओं में अमरित कलश को कसकर पकड़ लिया
17:37उसके मुख पर विजय की पाश्वित मुस्कान तैर रही थी
17:42अमरित के कलश को अपने अधिकार में पाकर असुरों की सेना में विजयोत सव का शोर गूंद उठा
17:48उनके भयानक अटहास से स्वर्ग भी काप उठा
17:53उनकी मादक मुस्कान और कटाक्ष में वह शक्ती थी जो संसार के सबसे कठोर योधा को भी क्षन भर में
18:00अपना दास बना ले
18:02और इस प्रकार छल और सौंदर्य का अवतार लेकर भगवान विश्णू असुरों से अमर्त्व छीनने की उस महागाथा का शुभारंभ
18:11करने चले
18:13शीरसागर के अशांत तट पर अमर्त कलश को छीनने के लिए देवों और असुरों के बीच एक अत्यंत विनाशकारी और
18:21प्रल्यंकारी युद्ध छिड़ गया था
18:23इस भयानक महासंगराम को देख कर वैकुंठ में शेशनाग की शयापर विराजमान भगवान नारायन ने स्रिष्टी के संतुलन की रक्षा
18:32हेतु एक परम दिव्य लीला रचने का निश्चय किया
18:37स्रिष्टी के पालनहार ने जैसे ही अपनी आखे मून दी उनका विशाल चतुर्भुज रूप एक अत्यंत सुक्ष्म और अलौकिक सुनहरी
18:45उर्जा के पुंज में बदलने लगा
18:48शन भर में उस परम पुरुष की कठोर भुजाएं और विशाल वक्षस्थल एक अत्यंत सुकोमल आकर्शक और अनुपम स्त्री की
18:56काया में परिवर्तित हो गए
18:59और तब वहां प्रकट हुई साक्षात देवी मोहिनी जिनकी अलौकिक सुन्दर्ता और मनमोहक छवी के सामने समस्त ब्रह्मांड का सौन्दर्य
19:08फीका जान पड़ता था
19:11मोहिनी की कजरारी आँखों में एक ऐसा सम्मोहन था जो किसी भी तपस्वी की वर्षों की कठिन तपस्या को पल
19:18भर में खंडित कर सकता था
19:21जब देवी मोहिनी ने अपने पैरों में बंधे नूपुरों की मधुर जंकार के साथ रणभूमी की ओर प्रस्थान किया तो
19:29संपूर्ण प्रकृती उनके स्वागत में आनन्दित हो उठी
19:33देवों और असुरों के बीच का वह भयंकर और रक्तरंजित महा संग्राम अचानक थम गया क्योंकि रणभूमी में उस अनुपम
19:41सुन्दरी के कदम पड़ चुके थे
19:44रणभूमी पर एक गहरा मौन चा गया और हवा में लहराते हुए तीखे बान और भारी गदाएं वहीं की वहीं
19:51हवा में ही ठिठक कर रह गई
19:54महान असुर राज बली और उनके विशालकाय सेनाप्ती मोहिनी के इस सम्मोहक रूप को देखकर अपने सबसे प्रिय अमरित कलश
20:03को भी पूरी तरह से भूल गए
20:06स्वर्ग के राजा इंद्र और अन्य समस्त देवता भी उस अलौकिक सौंदर्य के प्रभाव में आकर सुधबुध खो बैठे और
20:13अपने दिव्यास्त्रों को नीचे जुका लिया
20:17मोहिनी की हर एक चंचल चित्वन और उनकी वह रहस्य में मुस्कान असुरों के कठोर हृद्यों को पिगला कर उन्हें
20:24अपने प्रेंजाल में बांध रही थी
20:27वह अत्यंत धीमी और मनभावन गती से उस स्थान की ओर बढ़ी जहां देवताओं और असुरों के बीच अमरित का
20:35कलश रखा हुआ था
20:37जब मुहिनी के अत्यंत कोमल और लालिमायुक्त हाथों ने उस तप्त स्वर्ण कलश को छुआ तो ऐसा लगा मानों अमरित
20:45भी धन्य हो उठा हो
20:48असुरों की बुद्धी पर ऐसा परदा पड़ा कि वे मुहिनी के मीठे और सम्मोहक वचनों पर आखे मुंद कर विश्वास
20:55कर बैठे और अपना विवेक पूरी तरह खो दिया
20:59सुदूर कैलाश परवत की बरफीली चोटियों से देवाधिदेव महादेव भी विश्णु जी की इस परमसुंदर और अत्यंत चतुर माया को
21:08देखकर मंदमंद मुस्कुरा रहे थे
21:11मुहिनी ने अपनी सुरीली आवाज में असुरों से कहा कि यदि वे अमरित का न्यायपूर्ण बटवारा चाहते हैं तो उन्हें
21:19उनके प्रत्येक निर्नय को स्वीकार करना होगा
21:23मुहिनी के रूप पर पूर्णतह मोहित होकर असुरों ने बिना किसी संकोच के उस दिव्य अमरित कलश को अपनी इच्छा
21:30से उनके हाथों में सौंप दिया
21:34जैसे ही अमरित कलश मोहिनी के हाथों में आया, उनकी सुन्दर आखों में एक शनिक और चतुर विजय की चमक
21:41कौन्ध गई, जिसे मूर्ख असुर समझ न पाए
21:44इस प्रकार सौंदर्य की आड में देवताओं के रक्षक भगवान विश्णु ने असुरों को उनके अमर्त्व से वंचित करने के
21:52एक महान और एतिहासिक अभियान का सूत्रपात किया
21:57जैसे ही समुद्र मन्थन की तरंगों के बीच से सर्व मोहिनी श्रीहरी विश्णु का मोहिनी रूप प्रकट हुआ, संपून ब्रह्मान
22:05उनके अलोकिक रूप की चमक से चकाचोंध हो गया
22:09देवी मोहिनी की देह से उठती दिव्यपारिजात की सुगंध और उनके आभूशनों की जंकार निक्षीर सागर के शांत तटको एक
22:18मादक और सम्मोहक वातावर्ण में ढाल दिया
22:22भयंकर असुर राहु और केतु जोक्षन भर पहले विनाशकारी युद्ध के लिए उध्यत थे, मोहिनी की असीम सुन्दर्ता को देखते
22:30ही अपने अस्त्रशस्त्र भूल गए
22:34असुराधिप्ती बली के विशाल हाथों से भारी गदारेत पर आगिरी और उनका क्रोध मोहिनी की एक ग्रिष्टी मात्र से पल
22:41भर में छूमंतर हो गया
22:44समस्त दैत्य सेनाप्ती अपनी बुध्धी और विवेक खोकर एक दूसरे से मोहिनी के अनुपम सौन्दर्य की ही चर्चा करने लगे
22:52और अमर्त्व का ध्यान उनके मन से निकल गया
22:56मोहिनी ने अपनी पायल की मधुर ध्वनियों के साथ मखमली कदम बढ़ाए तो असुरों को लगा जैसे साक्षात कामदेव का
23:04कोई जादूई स्वपन उनके सामने साकार हो गया हो
23:08दूर खड़े देवताओं ने श्रीहरी विष्णु के इस मायावी स्वरूप को पहचान लिया और राहत की सांस लेते हुए मन
23:16ही मन मोहिनी रूप को प्रणाम किया
23:19कालकूट विष्गे भाय और अमरित के लिए चल रहे भीशन रक्तपात को भूल कर असुरों के मन में केवल मोहिनी
23:26का सानिध्य पाने की तीवर तृष्णा जाग उठी
23:30मोहिनी ने जब अपनी तिर्ची चित्वन से असुरों की ओर देखा और मंद मुसकान बिखेरी तो असुरों के हृदय कामागनी
23:38और मोह के सागर में डूप गए
23:41कामांध हुए दैत्य राजों ने बिना किसी हिचकी चाहट के अमरित से भरा वह अमूल्य स्वर्ण कलश मोहिनी के कोमल
23:48कमलननी हाथों में सौंप दिया
23:51मोहिनी ने जैसे ही अमरित कलश को धारण किया उसकी अलोकिक कांती से पूरा समुदर तटकनक जैसी दमक्ती किर्णों से
23:59भर उठा
24:01मूर असुरों के मन में यह द्रिड विश्वास बैठ गया कि ऐसी परमसुंदरी और पवित्र देवी कभी उनके साथ कोई
24:09छल या पक्षपात नहीं कर सकती
24:12मुहिनी ने अपनी मधु से भी मीठी वाणी में असुरों को सम्मोहित करते हुए कहा कि वह सभी के साथ
24:19पूर्ण न्याय पूर्वक व्यवहार करेंगी
24:23मोहिनी के रूप पाश में बंधे असुरों ने एक स्वर में चिला कर कहा कि वे अम्रित बंटवारे का समपूर
24:29अधिकार केवल और केवल मोहिनी को ही सौंपते हैं
24:34चल का तानाबाना बुनते हुए मोहिनी ने चंचल मुसकान के साथ कहा कि किसी अंजानस्त्री पर इतना अगाध विश्वास करना
24:43असुरों के लिए उचित नहीं।
24:45मोहिनी की इस चतुर चेतावनी ने असुरों के मोह को और गहरा कर दिया और उन्होंने प्रतिज्याली कि वे उनके
24:53हर निर्नय को बिना प्रशन स्विकार करेंगे.
24:56मोहिनी ने अपनी योजना के अनुसार पहली शर्ट रखी कि अमरित पाने के लिए देवताओं और असुरों को अलग-अलग
25:04पंक्तियों में शांति पूर्वक बैठना होगा
25:07मोह के जाल में पूर्णत फन से असुर बिना किसी शंका के दोड़ कर एक व्यवस्थित पंक्ति में बैठ गए
25:14ताकि मोहिनी सबसे पहले उन्हें ही अमरित का पान कराए
25:19दूसरी और शांतिप्रिय देवतागन भी मर्यादा में रहकर समानांतर पंक्ति में बैठ गए और श्रीहरी की इस महान लीला का
25:27परिणाम देखने की प्रतीक्षा करने लगे
25:31असुरों के सर्वनाश और देवताओं के विजय की नीम रखते हुए मोहिनी ने अमरित कलश को उठाया और उनकी आखों
25:38में भावी महाचल की चमक कौंध गई
25:42अपसरा मोहिनी के अलौकिक सौंदर्य और हाथों में जगमगाते अमरित कलश को देखकर देव और असुर दोनों ही स्तब्ध रह
25:50गए
25:51अपनी मोहक मुस्कान के साथ मोहिनी ने चालाकी से प्रस्ताव रखा कि शांति पूर्वक वितर्ण के लिए दोनों पक्षों को
25:59अलग-अलग पंक्तियों में बैठना होगा
26:02मोहिनी के रूप जाल में पूरी तरह बंध चुके दानवों ने बिना किसी संदेह के उसकी इस शर्थ को तुरंट
26:09स्विकार कर लिया
26:11भगवान विश्नु के मोहिनी अवतार ने देवताओं को दाहिनी और और दानवों को बाहिनी और पंक्तियों में सुसजित होकर बैठने
26:19का निर्देश दिया
26:21देवराज इंद्र के नेत्रित्व में समस्त देवता अपनी अपनी जगह शांत भाव से बैठकर मोहिनी के अगले कदम की प्रतीक्षा
26:29करने लगे
26:31परंतु असुरों के समूह में बैठे अत्यंत चतुर स्वर्भानू को मोहिनी की इस व्यवस्था में किसी भावी चल का संदे
26:38होने लगा
26:40मोहिनी ने अपने नृत्यात्मक हावभाव से असुरों को भटकाते हुए सबसे पहले देवताओं की पंती में अमृत परोसना आरंभ किया
26:50मुहिनी की रूपराशी और नृत्यमई चाल में खोए दानव यह ध्यान ही नहीं दे पाए कि कलश का अमरित केवल
26:57देवताओं को ही पिलाया जा रहा है
27:00चल भांपकर स्वर्भानु ने अपनी आसुरी माया का प्रयोग किया और स्वयं को एक दिव्य देवता के रूप में बदल
27:08लिया
27:09वेश बदलकर स्वर्भानु अत्यंत सतर्कता से देवताओं की पंक्ती में जाकर सूर्य देव और चंद्र देव के मध्य चुपचाप बैठ
27:17गया
27:19मोहिनी जब उस पंक्ती में पहुँची तो अंजाने में उसने चद्म वेशी स्वर्भानु की अंजली में भी अमरित की कुछ
27:26बून्दे ढाल दी
27:29जैसे ही स्वर्भानु ने अमरित की घूंट ली अमरत्व दायक दिव्यद्रव उसके कंठ तक पहुँचने लगा
27:36उसी क्षण सूर्य देव की तीक्षन ग्रिष्टी उस चद्म रूपी देव पर पड़ी और उन्हें उसके भीतर छिपा आसुरी अंधकार
27:44दिखाई दे गया
27:46चंद्र देव ने भी तुरंत स्वर्भानु की कप्ती आँखों को पहचान लिया और मोहिनी रूपी भगवान विश्णु को चिल्ला कर
27:54चेताबनी दी
27:55जैसे ही अमरित स्वर्भानु के गले से नीचे उत्रा उसकी आसुरी माया छिन्नभिन हो गई और उसका भयानत दानव रूप
28:04उजागर हो गया
28:06मोहिनी का सौमे रूप च्छनभर में लुप्थ हो गया और भगवान विश्णु अपने प्रचंड चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए
28:13प्रभु विश्णु ने अपनी तरजनी उंगली पर ब्रह्मांडिय अगनी से दहकते हुए सुदर्शन चक्र का आहवान किया
28:22इससे पहले की अमरित स्वर्भानु के शरीर में पूरी तरह समाता विश्णु जी ने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक धड़
28:30से अलग कर दिया
28:32अमरित के स्पर्श के कारण स्वर्भानु का कटा हुआ सिर और धड़ मरे नहीं बलकी राहु और केतु नामक दो
28:40अमर पिंडों में परिवर्तित हो गए
28:43भगवान ब्रहमा और शिव के विधान से राहु और केतु को आकाश में छाया ग्रह का स्थान मिला जिन्होंने सूर्य
28:50और चंद्र से सदा के लिए शत्रुता ठान ली
28:54अमरित की अंतिम बूंदों को पीकर देवताओं के शरीर दिव्य तेज से चमकने लगे और उनकी खोई हुई शक्तियां पूरी
29:02तरह वापस आ गई
29:04अमरित पान के प्रभाव से देवराज, इंद्रक और अन्य देवताओं के चहरे पर अमर्ता का अनुपम ओज बिखर गया, जिससे
29:12उनका आत्म विश्वास चरम पर पहुँच गया
29:16अचानक भगवान विश्व की मोहिनी रूपी माया विलीन हो गई, जिससे असुरों के सामने से सुन्दर स्त्री का भ्रमसदा के
29:23लिए तूट गया
29:25मोहिनी के स्थान पर साक्षात भगवान विश्व अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, जिनका सुदर्शन चक्र ब्रह्मांडिय प्रकाश बिखेर रहा
29:34था
29:35छल का एसास होते ही असुरों का क्रोध सात्वें आसमान पर पहुँच गया और उनके भयानक गर्जन से तीनों लोग
29:43काम उठे
29:45अमर्ता के मद में चूर देवताओं ने बिना समय गवाए अपने अस्त्रशस्त्र उठा लिये और असुरों पर आक्रमन करने के
29:53लिए तत्पर हो गए
29:55देवराज इंद्र ने अपने दिव्य वजर को हवा में लहराया जिससे निकलने वाली बिजली ने अंधकारमई आकाश को चीर कर
30:03रख दिया
30:04असुर राज बली ने क्रोध में आकर अपनी विशाल सेना को देवताओं पर तूट पड़ने और अमरित छीनने का अंतिम
30:12आदेश दिया
30:14शीर सागर के तट पर देवताओं और असुरों के बीच एक अत्यंत विनाशकारी और महाभीशन संग्राम छिड़ गया
30:23पैरावत हाथी पर सवार होकर इंद्र ने वजर से असुरों की सेना पर प्रहार किया जिससे सैकडों दानव एक ही
30:30पल में धराशाई हो गए
30:33भगवान विश्णों के दिव्य चक्र की चमक और देवताओं के बानों की बौचार ने असुरों के होसलों को पूरी तरह
30:40से पस्थ कर दिया
30:42वीर कार्तिके और अन्यदेव योध्धाओं ने अपने अस्त्रों से ऐसा अगनी चक्रव्यू रचा की असुर सेना में भगदड मच गई
30:51अब अमर हो चुके देवताओं पर असुरों के किसी भी मायावी अस्त्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था जिससे
30:58दानव हताश होने लगे
31:01रणभूमी में चारों और तलवारों की खनक, रथों की घड़गडाहट और योध्धाओं के भीशन सिहनाद से बातावर्ण गूझ उठा
31:10देवताओं के अस्त्रों से निकलने वाले स्वर्णिन प्रकाश ने असुरों के काले जादू और अंधकार को पूरी तरह नश्ट कर
31:18दिया
31:19असुर राज बली ने देवताओं को रोकने का भरसक प्रयास किया, लेकिन अमर देवताओं के अटूट शौर्य के सामने उनकी
31:27एक न चली
31:29पराजय को निकट देखकर असुर सेना भैभीत होकर रनभूमी छोड़कर भागने लगी, जिससे देवताओं का पलडा पूरी तरह भारी हो
31:38गया
31:39देवताओं ने अपनी पूरी शक्ती का प्रयोग कर असुरों को खदेडा और उन्हें पाताल लोग की अंधेरी गहराईयों में धकेल
31:47दिया
31:48असुरों के परास्थ होते ही स्वर्ग लोग के द्वार देवताओं के लिए पुनह खुल गए और चारों और दिव्य पुष्पों
31:55की वर्षा होने लगी
31:57इस महाविजय के बाद स्रिष्टी में पुनह धर्म और शांती की स्थापना हुई और सभी देवताओं ने भगवान विश्णू की
32:05जय जयकार की
32:08देवर्षी नारद के मुख से मोहिनी अवतार द्वारा असुरों का मानमर्दन करने की अध्भुत कथा सुनकर संपूर्ण कैलाश भवन एक
32:16अलौकिक आनंद में निमगन हो गया
32:19श्री हरी विश्णू की इस अकलपनिय मोहिनी लीला को सुनकर भगवान शिव के हृदय में भी उस अनुपम दिव्यरूप को
32:27अपनी द्रिष्टी से निहारने की तीवर अभिलाशा प्रजवलित हो उठी
32:32पार्वती जी ने अपने स्वामी के मुख मंडल पर जिग्यासा की नई तरंगे देखी जब शिवजी ने श्रीहरी की उस
32:39माया की भूरी-भूरी प्रशंसा की जो संपून ब्रहमांड को सम मोहित कर सकती है
32:46महादेव ने मंद मुसकान के साथ कहा कि जो माया असुरों और देवताओं दोनों की बुद्धी को हर ले उस
32:53विश्णुरूप के प्रत्यक्ष दर्शन ही अब उनकी एक मात्र इच्छा है
32:59अपनी इस अलौकिक लालसा को पूर्ण करने के लिए भगवान शिव, जगजन्नी पारवती और अपने नंदी आदी गणों के साथ
33:07शीरसागर में विराजमान विश्णु धाम की ओर प्रस्थान करने लगे
33:12वैकुंठ लोग की अलौकिक सीमाओं में प्रवेश करते ही सर्वत्र फैली सुवर्ण में कांती और शेशनाग की शया पर विश्राम
33:20करते भगवान नारायन के भव्य दर्शन हुए
33:24परमिश्वर शिव ने भगवान विश्णु का आदर पूर्वक अभिवादन किया और उनसे अपने उस मुहिनी अवतार को पुनह प्रकट करने
33:32का मधुर आग्रह व्यक्त किया
33:35भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान बिखेरते हुए शिव को सचेत किया कि मेरी वह मुहिनी माया इतनी सम्मोहक है कि
33:43ज्यानी से ज्यानी जीव भी अपनी चेतना खो बैठता है
33:47शिवजी ने उतकट भाव से कहा कि वे उस सर्वशक्तिमान महामाया का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं जो सम्पून स्रिष्टी
33:56के संतुलन और व्यापार का मूल आधार है
34:00इतना कहते ही भगवान विश्णु अचानक शिवजी की द्रिष्टी से अंतरध्यान हो गए और वातावर्ण में एक अलोकिक सन्नाटा और
34:09रहस्यमई स्पंदन व्याप्थ हो गया
34:12शन्धर में ही वैकुंट का वह स्थान एक परमदिव्य सुवासित और कुसुमित उध्यान में परिवर्तित हो गया जहां मंदमंद बयार
34:20पारिजात के पुश्पों की गंध बिखेर रही थी
34:24उसी सुरमय वाटिका में सहसा मोहिनी रूप धारन किये हुए श्री हरी का प्राकट्य हुआ
34:30जिनका सौंदर्य तीनों लोकों के समस्ट आभूशनों से भी अधिक तेजवान था
34:36मोहिनी के प्रत्येक कदम के साथ उसकी पायलों की जंकार और कटि प्रदेश की किनकीनी से ऐसा मधुर संगीत उत्पन
34:44हो रहा था जिसने पूरी प्रकृती को स्तब्ध कर दिया
34:49भगवान शिव उस अध्वितिय और सम्मोहक रूप को देखकर पूर्णता मुग्ध हो गए और उनकी द्रिष्टी उस दिव्य मोहिनी की
34:56मन्मोहक क्रीडा पर टिक कर रह गई
35:00कंदुक से खेलती हुई मोहिनी की चित्वन और उसकी चंचल भंगिमाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि विष्णू की माया
35:07के समक्ष स्वयनकाल भी नत्मस्तक हो जाता है
35:11जैसे ही शिवजी उस मोहिनी रूप की ओर अग्रसर हुए मोहिनी हलकी मुस्कान के साथ व्रिक्षों की कुंजों में छिपती
35:19और प्रकट होती हुई लीला रचने लगी
35:21इस अलोकिक लीला के चर्मोत कर्ष पर मोहिनी रूप पुनह लीन हो गया और श्रीहरी विष्णू अपने चतुर्थ भुजवाले वास्तविक
35:31स्वरूप में मुस्कुराते हुए प्रकट हुए
35:34भगवान शिव ने समझ लिया कि यह कोई साधारन रूप नहीं अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड को सत्य का मार्ग दिखाने वाली
35:42परमात्मा की महा माया ही थी
35:45शिव और पार्वती ने विष्णू की लीला का सहर्ष अभिनंदन किया और यह स्विकार किया की संसार में माया और
35:53सत्य दोनों एक ही परम्ब्रहम के अभिन्न अंग है
35:57इस प्रकार हरी और हर की यह पावन भेंट सिद्ध करती है कि माया का उद्देश केवल ध्रम पैदा करना
36:04नहीं बलकि जीवन को अमर्त्व का वास्तविक बोध कराना है
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