Following the legendary encounter of Pippalada and Shani Dev, Sage Suta narrates the most terrifying and awe-inspiring manifestation of Lord Shiva—the Kaal Bhairava Avatar. When Brahma's growing ego leads him to insult the supreme cosmic order, Shiva's concentrated wrath takes form as Bhairava. Watch the epic cosmic drama unfold as Bhairava severs Brahma's fifth head, undergoes the punishing journey of Brahmahatya redemption, and ultimately becomes the eternal guardian 'Kotwal' of the holy city of Kashi. Subscribe for more epic tales from the Shiva Purana! #ShivaPurana #BhairavaAvatar #KaalBhairav #HinduMythology #Mahadev
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00:00दिव्य प्रकाश के मध्य, मेरू परवत की स्वर्णिम चोटियों पर रिशियों का एक समागम हुआ, जो स्रिष्टी के आदिस रोत
00:08की अनंत पहेली को सुलजाने के लिए एकत्र हुए थे.
00:12जैसे ही विचार विमर्ष चरम पर पहुचा, देवर्शी नारद ने एक प्रशन उठाया, जिसने ब्रहमांडिय ताने बाने को हिला देने
00:20वाली बहस को हवा दी.
00:23ब्रहमा, अहंकार की माया से ग्रसित, अपनी चार मुखी वानी से गर्जना करते हुए बोले, मैं ही आदी निर्माता हूँ,
00:31मेरे विचार से ही यह विराट ब्रहमांड उत्पन हुआ है.
00:36ब्रहमा के शब्दों में ब्रहमांडिय अहंकार की गूँच थी, जैसे कोई रचिता अपनी रचना पर पून अधिकार का दावा कर
00:44रहा हो.
00:46विश्नूग स्रिष्टी के संरक्षक अपनी शांत और गंभीर मुद्रा में ब्रहमां के डावों को सुनते हुए मंद मुस्कान के साथ
00:54प्रतिक्रिया व्यक्त की.
00:56उन्होंने कोमलता से कहा, हे ब्रहमा, स्रिजन का कार्य एक सतत प्रबाह है, जिसमें स्वयन से परेभी एक आदी शक्ती
01:04का योगदान है.
01:07ब्रहमा का मुखमंडल क्रोज से लाल हो गया, जैसे कोई परवत ज्वाला मुखिये विस्पोट के कगार पर हो और उन्होंने
01:14विश्नु के शब्दों को अहमकार का तिरसकार माना.
01:19उसक्षन जैसे ब्रहमांड का तानाबाना हिल गया हो, आदी योगी, भगवान शिव उस विवाद के मर्म को समझ कर प्रकट
01:26हुए.
01:28शिव परम ब्रहमा, जिनकी उपस्थिती मात्र से वातावर्ण में एक अनूठी शान्ती और शक्ती का संचार हुआ, तीनों लोकों के
01:36साक्षी बनकर वहां उपस्थित हुए.
01:39उनकी तीसरी आख, जो ज्ञान और विनाश का प्रतीक है, ब्रहमांडिय अहमकार की उस छोटी सी चिंगारी को देखकर धीरे
01:48-धीरे खुलने लगी.
01:50ब्रहमा उस दिव्य उपस्थिती के भार से अभिभूत अभी भी अपने अहमकार के परदे में लिप्टे हुए, शिव से बोले
01:57तुम कौन हो जो स्रिष्टी की उत्पत्ती पर प्रश्न उठाते हो?
02:02शिव की प्रतिक्रिया अत्यंत तीवर थी, उनके शांत स्वरूप से निकली एक चिंगारी जिसने ब्रहमांडिय व्यवस्था के संतुलन को बिगाड़ने
02:11का साहस किया था.
02:13जैसे ही शिव का क्रोध एक अनियंत्रिक बल में प्रस्पुटित हुआ, उनकी भौहों के बीच से एक भयानक और प्रचन
02:21शक्ती का जन्म हुआ.
02:23वह शक्ती जो स्वयन समय के भंवरों से जन्मी थी, काल भैरव के रूप में प्रकट हुई, जिसकी उपस्थिती मात्र
02:31से मृत्यु का भय व्याप्थ हो गया.
02:34काल भैरव जिनकी आखें प्रलय की अगनी से जल रही थी, उन्होंने ब्रह्मा के पाँचवें सिर को घूर कर देखा,
02:42जिसने जूठा दावा किया था.
02:44एक क्षण में काल भैरव ने अपने एक हाथ से, जिसने काल का भी विनाश करने की शक्ती थी, ब्रह्मा
02:52के अभिमानित पाँचवें सिर को जड़ से उखाड फेंका.
02:56ब्रह्मा का पाँचवासिर, जो अहमकार और जूठ का प्रतीक था, अंतरिक्ष में एक लाल चिंगारी की तरह विलीन हो गया,
03:04जिससे स्रिष्टी की व्यवस्था पुनह स्थापित हुई.
03:08काल भैरव का यह अवतार स्रिष्टी के संतुलन को बनाए रखने के लिए था, यह दर्शाता है कि अहमकार किसी
03:15भी रूप में अस्वीकार्य है, भले ही वह स्रिजन करता काही क्यों न हो.
03:21अंतर शिव ने अपनी शांत मुद्रा में लोटते हुए, ब्रह्मा और विश्णु को यह समझाया कि सच्चा निर्माता वह है
03:28जो अहमकार से परे हैं और स्रिष्टी के प्रती समर्पित है.
03:33इस प्रकार भैरव के प्रचंड अवतार ने स्रिष्टी के सर्वोच अधिकार पर लगे अहमकार के कलंक को धोडाला और शिव
03:42की असीम शक्ती और न्याय का संदेश प्रसारित किया.
03:46ब्रह्मा विवाद की उस उल्जन को सुलजाने के लिए चारों वेदों ने स्वया अपने मूर्तरूप धारण किये जैसे महासागर की
03:55गहरायों से मोती बाहर आये हूँ.
03:58तब चारों वेद एक साथ गूंजे, उनकी आवाजे स्रिष्टी की आदी ध्वनी की तरह गूंज उठीन रुद्रही परमसत्य हैं, वही
04:07समस्ट अस्तित्व के मूल स्रोत हैं.
04:10परंतु ब्रह्मा, जिनके चार मुख थे, अपने अहंकार में इतने चूर थे कि उन्होंने इस दिव्यवानी का उपहास किया, जैसे
04:19कोई बहरा संगीत का मजाक उड़ाएं.
04:22उन्होंने व्यंगे से कहा, यह कैसा हास्यासपद दावा है कि एक नगन भस्म रमाए हुए सन्यासी जो श्मशान का वासी
04:30है, मुझसे श्रेष्ट हो सकता है.
04:34यह सुनकर देवलोक में एक तीवर सन्नाट आचा गया, जैसे तूफान से पहले की खामोशी हो, जहां हर सास एक
04:42वजर्पात के समान भारी थी.
04:45ब्रह्मा के अहंकार भरे शब्दों ने शिव के शांत मुख मंडल पर कोई प्रभाव नहीं डाला, जो ध्यान के सागर
04:52में डूबे हुए थे, जैसे परवत हवाओं से विचलित नहीं होता.
04:57विश्नुक जो स्रिष्टी के पालनहार हैं, ने ब्रह्मा के इस अज्यान पर गहरी चिंता व्यक्त की, उनके मुख पर एक
05:05गंभीर विचार की छाया मंडराने लगी.
05:09नारद, देवताओं के गायक और दूत, अपने वीना के तारों को जंजनाते हुए, मानो देवलोक में एक अनकही धुन बजा
05:16रहे हो, स्थिती की गंभीरता को महसूस कर रहे थे.
05:21ब्रहमा का हट बढ़ता गया, उन्होंने अपने हाथों को फैलाया, मानो वे समस्त ब्रहमांड को अपनी मुठी में समा लेना
05:29चाहते हूं, और वेदों की वानी को हवा में उड़ा देना चाहते हूं.
05:34उन्होंने कहा, मैं इस स्रिष्टी का निर्माता हूं, मुझसे ही सब कुछ उत्पन हुआ है, कोई भी सन्यासी मेरे इस
05:41सत्य को जुठला नहीं सकता.
05:44शिव की आखें धीरे-धीरे खुली, उनमें क्रोध की एक अगनी प्रजवलित हुई, जो सहस्त्र सूरियों के तेज से भी
05:52अधिक प्रकर थी, जैसे शांत समुद्र में अचानक ज्वार उठा हो.
05:57ब्रहमा के अहंकार और वेदों के अपमान से उपजावः प्रचंड क्रोध, शिव के रोम्रोम से प्रस्पुटित हुआ, जैसे ज्वाला मुखी
06:05का लावा फूट पड़े, और उस अगनी से उस महा भयंकर क्रोध से एक अध्भुत विक्राल रूप प्रकट हुआ, स्वय
06:22यमराज भी कांप उठे, उनके हाथ से दंड छूट गया, और तीनों लोकों में मृत्यु का भय व्याप्त हो गया,
06:29भैरव ने ब्रहमा की ओर देखा, उनकी काली आखें प्रलै की ज्वाला उगल रही थी, और उनके भयानक दंट ब्रहमा
06:38के चौथे सिर को घूर रहे थे, �
06:40जैसे सिंह अपने शिकार को देखता है, ब्रहमा जो अब तक हट पर अडे थे, काल भैरव की उस आदिम
06:49शक्ती के सामने स्वयन को तुछ और असहाय महसूस करने लगे, जैसे कीचड में फंसाहा थी, और फिर एक निरनायक
06:58ख्षण में काल भैरव ने अपना नक्षस्त्र उ
07:10सत्य का प्रतीक था, अंतरिक्ष में लुढक गया, और एक मुख चीख की तरह ब्रहमांड में गूझ उठा, सत्य की
07:18विजय का मौन घोशना पत्र
07:20ब्रहमा के पाँचवे सिर्के कट जाने के साथ ही, देवलोक में शांती लोट आई, और वेदों की वानी की सत्यता
07:28स्थापित हो गई, मानों अंधकार के बाद सूर्योदय हुआ हो
07:33जैसे ही ब्रहमा के अहंकार की ज्वाला भब की, उनके पाँचवे मुख से अहंकार के विशैले शब्द बाहर निकलने लगे,
07:41जो देवताओं के समक्ष शिव के स्वरूप का उफास कर रहे थे
07:46ब्रहमा के पांचवे मुख से निकले शब्द कामदेव के पुश्पबानों से भी अधिक तीखे थे, जिन्होंने शिव के वस्त्राभूशन और
07:54वैरागी जीवन पर निर्मम आघात किया
07:58सभा में बैठे समस्ट देवगण ब्रहमा के इन अपमानजनक शब्दों से स्तंभित रह गए, मानो किसी शांत सरोवर में अचानक
08:06प्रस्तरखंड जागिरा हो
08:09अहमकारी पांचवे मुख ने तो शिव के त्रिशूल को तुछ बताकर उनके सर्पों को विशैला सर्पजाल कहकर अपमानित किया
08:18देवताओं के समरक्षक श्री विश्नु यह देखकर अत्यंत व्यतित हुए, उनके कमलसद्रिश नित्रों में चिंता की एक गहरी छाया मंदराने
08:27लगी
08:28नारद मुनी जो सदैव शांतिदूत बनकर विचर्ण करते थे, ब्रहमा के इस व्यवहार पर अत्यंत चिंतित हुए और उन्होंने सत्य
08:37का बोध कराने का प्रयास किया
08:40हे विधाता, यह कैसा वानी दोश है, जो आपको लीलावतार धारी शिव के प्रती ऐसा अमर्यादित बोलने पर विवश कर
08:49रहा है
08:51ब्रहमा के पांचवे मुखने नारत की बात अनसुनी कर दी और शिव की निंदा को और भी प्रकरता से जारी
08:58रखा, मानोकाल स्वय मुखरित हो रहा हो
09:02शिव के प्रती इस अनवरत निंदा ने संपून ब्रहमांड के सुक्षमस्तित्व को कम्पित कर दिया, जैसे महाप्रलाय का आरंभ हो
09:10गया हो
09:12शिव जो कैलाश के हिमशिकरों पर ध्यानमगन थे, इस अनर्थ को अपने दिव्यग्यान से अनुभव कर उठे
09:20उनके दिव्यनेत्रों से एक तीवर, अगनितुल्य उर्जा का स्फुलिन निकला, जिसने ब्रहमांड की शांती भंग करने वाले अहंकार को चुनौती
09:29दी
09:30यह उर्जा, काल का प्रतीक, अत्यंत विक्राल और रौद्र रूप धारन कर प्रकट हुई, जिसने समस्त दिशाओं को कमपा दिया
09:39यह विक्राल रूप महाकाल भैरव के नाम से जाना गया, शिव के तीसरे नेतर की अगनी से जन्मा, जिसका एक
09:47मात्र उद्देश्य अहंकार का दमन था
09:50भैरव ने अपना विक्राल मुख खोला, जिसमें अंगिनत तीखे दात थे, और ब्रहमा के पाँचवे अहंकारी मुख की ओर एक
09:58छलांग लगाई
10:00ब्रहमा के पाँचवे मुख ने जब भैरव के गरजन को सुना, तो उसका अहंकार पल भर में भय में परिवर्तित
10:07हो गया, पर अब बहुत देर हो चुकी थी
10:11एक असहनिय ध्वनी के साथ महाकाल भैरव ने अपने नगन खड़ से ब्रहमा के उस पाँचवे मुख को धड़ से
10:18अलग कर दिया, जिसने शिव का अपमान किया था
10:23पाँचवे मुख के गिरने के साथ ही ब्रहमा के अहंकार का नाश हुआ और सभा में एक असहनिय शान्ती छा
10:30गई, जैसे किसी भयानक तूफान के थम जाने पर होती है
10:35महाकाल भैरव अपने कार्य की पूर्ती पर शिव के आदेश आनुसार पुन्ह अपने दिव्य लोक को लोट गए, पीछे छोड़
10:43गए एक गंभीर सीख
10:46आंकार का सर्वनाश आवश्चक है, क्योंकि वही समस्त दुखों और अनर्थों की जड़ है, यह सत्य उस दिन समस्त देवगणों
10:54ने भली भानती अनुभव किया
10:57ब्रहमा जी के पांचवें सिर के अहंकार ने तीनों लोकों में अशान्ती फैला दी, तब भगवान शिव ने अपने प्रचंड
11:04क्रोध को व्यक्त करने का निर्णे लिया
11:08भगवान शिव के रौद्र रूप से एक स्तंभ के समान, अंधकार्मय और दैधी प्यमान अगनी प्रकट हुई, जिसने संपून ब्रहमांड
11:16को अपनी लप्टों में घेर लिया
11:18उस अगनी के भीतर से एक विक्राल श्यामवर्नी देवता का उदे हुआ, जिसके दांत नुकीले थे और नेत्र अंगारों के
11:27समान देहक रहे थे
11:29काल भैरव के हाथों में त्रिशूल सुशोभित था, जो स्रिष्टी के विनाश और स्रिजन दोनों का प्रतीक था
11:37उनके आगमन की सूचना देने हे तू, एक काला कुट्ता, जो यमराज का वाहन भी कहलाता है, उनके साथ प्रकट
11:45हुआ
11:46काल भैरव ने ब्रहमा जी के पाँचवें सिर की ओर देखा, जिसका अहंकार अभी भी तीनों लोकों में गूज रहा
11:54था
11:55ब्रहमा जी अपने पाँच सिरों के साथ अभी भी अपने अहंकार में डूबे हुए थे, उन्हें शिव के इस भयंकर
12:03रूप का कोई भय नहीं था
12:05काल भैरव की एक गरजना से दिशाय काप उठीन, जैसे स्वयन प्रलै का नागिन अपने फन फैला रही हो
12:14उन्होंने अपना हाथ उठाया और जैसे ही उनकी उंगलियों ने हवा को काटा, वह पाँचवास सिर्ख अहंकार का प्रतीक शिव
12:22की आग्या से अलग हो गया
12:25ब्रहमा जी का पाँचवास सिर्ख जो अहंकार का प्रतीक था, भूमी पर गिर पड़ा और उसके गिरते ही संपूर्ण स्रिष्टी
12:33कांप उठी
12:35ब्रहमा जी के मुख से चीतकार निकली, जो देवताओं और असुरों के बीच एक भयभीत मौन ले आई
12:43भगवान शिव अपने भैरव रूप में शान्त हो गए, लेकिन उनके नेत्रों में अभी भी उस उग्रता की चाया शेश
12:50थी
12:52उन्होंने अपनी दिव्यद रिष्टी से ब्रहमा जी के उसकटे हुए सिर को देखा और उस पर थूक दिया, जिससे वह
12:59सिर एक जलते हुए अंगारे में बदल गया
13:02वह सिर्ख जो अहंकार से भरा था, जलते हुए अंगारे में परिवर्तित होकर शूने में विलीन हो गया, अहंकार का
13:10अंठ हो गया
13:12ब्रहमा जी ने कापते हुए भगवान शिव से क्षमा मांगी, अपने कर्मों के भार को स्विकार किया
13:19शिव ने ब्रहमाजी को क्षमातो कर दिया, परंतु यह स्पष्ट कर दिया कि अहंकार का परिणाम सदैव विनाशकारी होता है
13:29इस प्रकार काल भैरव के अवतरण ने अहंकार पर विजय प्राप्त की और ब्रहमांड को संतुलन में वापस स्थापित किया
13:38देवताओं ने भगवान शिव के इस अद्भुत रूप की स्थुती की, जिसने अहंकार के अंधकार को मिटा कर ज्ञान का
13:45प्रकाश फैलाया
13:47शिव के आदेश पर काल भैरव समय के तांडव से भी तेज गती से उस सभा में कूद पड़े जहां
13:54ब्रहमा के अहंकार का अंत निकट था
13:57काल भैरव क्षिव के प्रचंड क्रोध का साकार रूप बिजली की कड़कडाहट समान गर्जना के साथ प्रकट हुए, जिनका स्वरूप
14:06अत्यंत विक्राल और विनाशकारी था
14:09ब्रहमा जी के पंचम मुख से निकले अहंकारी शब्दों ने ब्रहमांडिय शांती भंकर दी, जिससे देवलोक में एक असहज मौनचा
14:18गया
14:19देवताओं के तीवर नेत्रों ने उस पल को देखा, किन्तु काल भैरव का प्रहार इतना दुरुप था कि कोई भी
14:26उसे रोकने में असमर्थ रहा
14:29काल भैरव के नाखून, मानो समय के तीखे पंजे हो, ब्रहमा जी के उस पाँचवें सिर पर जपते, जिसने देवों
14:37के समक्ष अमर्यादित वानी का प्रयोग किया था
14:40एक क्षण में, जैसे किसी तीक्षन वजर्पात ने देवलोग को चीर दिया हो, वह पांच वासिर अहंकार का प्रतीक धर
14:49से विलग हो गया
14:51रक्त की एक बून भी भूमी पर न गिरी, अपितु वह एक तेजस्वी जोती में विलीन हो गई, जो देवलोग
14:58की पवित्रता को दर्शाती थी
15:01पंचमुख ब्रहमा के शेश तीन मुखों पर अब केवल विस्मय और पश्चाताप के भाव थे, जैसे काल ने उनके अहंकार
15:09पर विजय प्राप्त कर ली हो
15:12ब्रहमा जी के उस अहंकार पूर्ण मुख की चेतना, एक दिव्य प्रकाश पुंच बनकर सीधे शिव के त्रिशूल की ओर
15:19प्रवाहित हो गई
15:21शिव ने उस दिव्य चेतना को अपने त्रिशूल में समाहित कर लिया, यह इंगित करते हुए कि स्रिष्टी के रचिता
15:28को भी नियमों का पालन करना अनिवार्य है
15:32सभा में पुनः शान्ती चा गई, किन्तु इस बार यह शान्ती ब्रहमा के अहमकार के दमन के बाद स्थापित हुई
15:40एक गहरी अधिक स्थिर व्यवस्था का प्रतीक थी
15:44काल भैरव अपने उद्देश की पूर्ती के पश्चात पुनः शिव में विलीन हो गए, उनकी विक्रालता अब शिव के शान्त
15:51ब्रहमांडिय संतुलन का हिस्सा बन गई
15:55देवतागन ब्रहमा की मूर्खता से उत्पन्न संकट के तल जाने पर शिव के नियाय और काल भैरव की शक्ती की
16:02भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे
16:05नारद मुनी वीना बजाते हुए, इस घटना के गहन आध्यात्मिक अर्थ का गायन करने लगे, जो स्रिष्टी के नियमों के
16:13महत्व को दर्शाता था
16:16ब्रहमा के पंचम मुख का पतन, अहंकार के विनाश और विनमृता की विजय का एक चिरस्थाई प्रतीक बन गया
16:24शिव की लीला अध्भुत है, वे स्वयन स्रिष्टी के आधार हैं, फिर भी वे अहंकार के ऐसे क्षणों को दंडित
16:31करने से कत्राते नहीं
16:33यह घटना स्रिष्टी के सभी प्राणियों के लिए एक चेतावनी थी कि अपने कृत्यों और वाणी में सदैव विनमृता और
16:41मर्यादा बनाए रखें
16:44काल भैरव के उग्र रूप ने भले ही स्रिष्टी को कमपा दिया हो, किन्तु उसका मूल उद्देशिश शिव के न्याय
16:51को स्थापित करना था
16:53इस प्रकार अहंकार का ध्वज जुका और स्रिष्टी का चक्र शिव की कृपा से उन्ह सुचारू रूप से चलने लगा
17:02ब्रहमा जी ने काल भैरव और स्वयन शिव से क्षमा याचना की और स्रिष्टी के नियमों के प्रती अपनी अटूट
17:09निश्था का वचन दिया
17:12यद्यपी काल भैरव द्वारा ब्रहमा का पाँचवा सिर काटना न्याय संगत था, परंतु इस कृत्य ने ब्रहमहत्या नामक भयानक पाप
17:20को जन्म दिया, जो अब एक विक्राल प्रेत के रूप में शिव के पीछे लग गया
17:26ब्रहमा का कटा हुआ सिर मानो किसी जोंक की तरह काल भैरव के हाथ से चिपक गया, एक ध्रेनित अनुसमारक
17:34की स्रिष्टी के रचिता का वध एक अनमिट दाग बन गया था
17:39जैसे ही काल भैरव ने आगे कदम बढ़ाया, ब्रहमहत्या का भयानक प्रेत भी छाया की तरह उनके पीछे चलता गया,
17:47एक शाप जो ब्रहमांड के कणकण में गूंजने लगा
17:51सबसे पहले वह उन लोकों में गये जहां अत्यंत पापी आत्माए निवास करती हैं, यहां आशा करते हुए कि शायद
17:59वहां वह अपने पाप के भार से मुक्त हो सके
18:03परंतु नरक की आग और वहां के यातनाए भी उस अनन्त ब्रहमहत्या के श्राप को शांत न कर सकी, जो
18:10अब उनके हर कदम के साथ और भी भयानक होता जा रहा था
18:15तब वे स्वर्ग की ओर बढ़े, सोचा की देवलोग की पवित्रता शायद इस श्राप से उन्हें मुक्ती दिला सके
18:23स्वर्ग की देवगण भी उस भयावः श्राप से कांप उठे, ब्रहमहत्या के प्रेट को अपने पवित्र लोकों में प्रवेश करने
18:31से रोकने में वे स्वयं असमर्थ थे
18:35इंद्रक स्वर्ग के राजा अपनी वजर गदालिये काल भैरव के सामने आये, पर ब्रहमहत्या के प्रेट के आगे उनकी वीर्ता
18:42भी व्यर्थ सिद्ध हुई
18:45तब काल भैरव ने तीनों लोकों का भ्रमन किया, हर स्थान पर उस प्रेट की चाया उनके पीछे-पीछे चलती
18:52रही, जैसे कोई अनंत अपराध बोध हो
18:56शिव स्वयन अपने इस भयानक रूप में उस पाप के भार को स्वयन वहन कर रहे थे, एक क्रूर अनुस्मारक
19:03की कर्मों का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता
19:07आथह काल भैरव ने निर्ने लिया कि इस श्राप से मुक्ती का मार्ग स्वयन ढूंडना होगा, किसी देव या दानव
19:14की सहायता से नहीं
19:16वे एकांत वास में चले गए, हिमालय की बरफीली चोटियों पर, जहां केवल हवा की सरसराहट और उनकी अपनी चेतना
19:25ही उनके साथ थी
19:27वहां उन्होंने गहन ध्यान लगाया, अपने ही भीतर उस पाप की जड़ को समझने का प्रयास करते हुए, जिसने उन्हें
19:35इस प्रकार जकड लिया था
19:38उन्होंने अपने कर्म के परिनाम को स्विकार किया और उसी स्विकारोक्ती में उन्होंने उस पाप के बंधनों को धीरे-धीरे
19:46कमजोर करना शुरू कर दिया
19:48यह समझ में आया कि पाप केवल कर्म का परिनाम नहीं, बलकि चेतना की वह अवस्था है जो उसे और
19:56भयानक बनाती है
19:58और जैसे ही काल भैरव ने पूर्ण आत्म ज्यान प्राप्त किया, ब्रहम हत्या का प्रेट जो कभी इतना शक्तिशाली था,
20:06पिघल कर एक अद्रिश्य उर्जा में विलीन हो गया
20:10वह कटा हुआ सिर्ख जो उनके हाथ से चिपका हुआ था, अब पवित्र भस्म बनकर उनके माथे पर अनकित हो
20:17गया, एक प्रतीक की उन्होंने अपने कर्म के बोज़ को भी ज्यान में परिवर्तित कर लिया था
20:24ब्रहमहत्या का श्राप समाप्थ हो गया था, पर उस अनुभव की गूंज हमेशा शिव के भीतर रही, यह सिखाते हुए
20:32की सबसे भयानक पाप भी अन्ता आत्म ज्यान के प्रकाश से दूर हो सकते हैं
20:38इस प्रकार काल भैरव के क्रोध ने न केवल बुराई का नाश किया, बलकि स्वया उस विनाश के पाप को
20:45भी ज्यान की जोती में परिवर्तित कर दिया, जो सदा के लिए शिव के दिव्यचरित्र का एक अंग बन गया
20:52अत्यंत भयंकर काल भैरव अपने स्वामी शिव के आदेशा नुसार अपने हाथों में ब्रहमा का पांचवा सिर्धारण किये, कपालधारी के
21:01रूप में यात्रा का आरंभ करते हैं, जहां हर कदम पाप की छाया से लिप्ता हुआ है
21:08काल भैरव की यात्रा अत्यंत दुर्गम प्रदेशों से होकर गुजरती है, जहां हर आहट उनके द्वारा किये गए जगन्य अपराध
21:16की गूंज बनकर सुनाई देती है
21:20ब्रहमा के कटे हुए सिरसे रिस्तारक्त भूमी को शापित करता है, और काल भैरव के हृदय में अपराध बोध की
21:27एक असहनिय पीडा को जगाता रहता है
21:31देवताओं के पवित्र लोक में भी काल भैरव की उपस्थिती मात्र से भय और विस्मय का संचार होता है, जहां
21:39कोई भी उनकी भयावा, आभा का सामना करने का साहस नहीं करता
21:44नारद मुने अपने वीना के साथ कालभैरव के एकाकी मार्ग पर मिलते हैं, उनकी उपस्थिती में एक विरल करूना है,
21:52पर वह भी इस श्राप के बोझ को महसूस करते हैं
21:57काल भैरव अपने कपाल में भिक्षा मांगते हुए मानवजाती के बीच विचर्ण करते हैं पर उनकी भयावता के कारण कोई
22:06भी उन्हें अन्न का एक कण भी देने का साहस नहीं करता
22:10राक्षसों के भयानक लोक में काल भैरव की उपस्थिती मात्र से अंधकार काम उठता है जहां उनका क्रोध उन पर
22:18भी कहर बनकर तूटता है
22:21हर भिक्षापात्र हर निवाला उस ब्रहम हत्या के पाप का स्मरण कराता है जिसे धोने के लिए वे अन्वरत यात्रा
22:29कर रहे हैं
22:31पाप की छाया एक अद्रिश प्रेट की भांती काल भैरव का निरंतर पीछा करती है
22:37उन्हें उस क्षण का स्मरण कराती है जब उन्होंने परम सत्य का उलंगन किया था
22:44पहाडों की बरफीली चोटियों से लेकर घने जंगलों की गहराईयों तक उनकी यात्रा कहीं भी विश्राम या शान्ती नहीं पाती
22:52काल भैरव अपने भीतर के तूफान से जूचते हुए हर आहट में उस भयानक क्षण की पुन्रावृत्ती देखते हैं
23:02ब्रहमा के कटे सिर का विलाप वायू में गूंजता हुआ, काल भैरव के अंतर्मन को चीरता रहता है, पर वे
23:09प्रायश्चित के पत पर अडिग हैं
23:12एक साधु का वेश भयंकर रूप को छुपाता है, परन्तु उनकी चाल में उस दैवी कृत्य का भार स्पष्ट जलकता
23:20है
23:22काल भैरव तपस्या की अगनी में जलते हुए, हर कष्ट को उस पाप के प्रायश्चित के रूप में स्विकार करते
23:29हैं
23:31चारो दिशाओं में काल भैरव की यात्रा उन्हें उस पाप की जंजीरों से मुक्त करने का प्रयास है, जिसे वे
23:38स्वय अपने हाथों से उत्पन्न कर चुके हैं
23:42उनकी यात्रा का अंत कहा है, यह स्वय उन्हें भी ज्यात नहीं, बस गती ही उनका एक मात्र साथी है
23:50काल भैरव अपनी तपस्या के चरम पर उस ध्यनित पाप के बोज तले दबते हुए भी देवत्व की ओर एक
23:58अनवरत यात्रा करते हैं
24:01हर कदम हर श्वास उस पाप से मुक्ती की ओर एक प्रयास है जो उन्हें अत्यंत महादेव के क्रोध से
24:08उत्पन्न हुआ है
24:10काल भैरव की कपाल यात्रा उस अनन्त प्रायश्चित की गाथा है जहां हर अनुभव उनके देवत्व को और भी परिश्कृत
24:18करता है
24:20काल भैरव शिव के प्रचंड क्रोध का मूर्त रूप अपनी भयानक यात्रा पर निकले जिनका हर कदम स्रिष्टी को कम्पित
24:28कर रहा था
24:30अनन्त यात्राओं के पथ पर अग्रसर काल भैरव का आगमन हुआ वैकुंट के दिव्यधाम में जहां विश्णु लोग की आभा
24:37जग्मगा रही थी
24:39समस्त ब्रह्मांड के पालनहार भग्वान विश्णु ने स्वया उठकर काल भैरव का स्वागत किया जैसे एक महासागर किसी उफंती नदी
24:48का अभिनंदन करे
24:51देवी लक्षमी धन और सौभाग्य की अधिश्थात्री ने अपने कोमल हाथों से काल भैरव के कपाल पात्र को पवित्र अमरित
24:59से भर दिया
25:01अमरित का वह दिव्य प्रवाह जो अमरित्यों को भी जीवन दे दे काल भैरव के कपाल में समाने लगा किन्तु
25:08एक अन्बूज पहेली की भांती
25:11परन्तु विस्मय की बात यह थी कि वह पात्र जो देवों के अमरित से भरा था फिर भी रिक्थी रहा
25:18जैसे कोई अनंत प्यास बुझने को हो
25:22वह कपाल पात्र जो शिव के क्रोध की अगनी से जन्मा था काल भैरव के हाथ से मानो अविभाज होकर
25:29चिपक गया था
25:31यह केवल एक पात्र नहीं था अपितु कर्मों का वह भमवर था जिसे काल भैरव को स्वयंपार करना था
25:39विश्नु और लक्ष्मी के आतिथ्य का दिव्य आलिंगन भी उस अटूट बंधन को शिथिल न कर सका
25:46काल भैरव ने समझा कि यह अवतार केवल शक्तियों का प्रदर्शन नहीं अपितु कर्मों के फल को भोगने की एक
25:54अगनी परीच्शा है
25:57उन्होंने विश्नु को नमन किया यह स्विकार करते हुए कि हर देवत्व को भी अपने नियत कर्मों की पूर्ती करनी
26:04परती है
26:06भगवान विश्नो ने भी मुस्कुराकर सिरहिलाया काल भैरव के कर्मपत की महिमा को समझते हुए
26:13काल भैरव ने अपनी यातरा पुनह आरंव की, कपाल पात्र अब उनके अस्तित्व का ही एक अंग बन गया था
26:22वह पात्र जो कभी अम्रित से भरा गया था, अब केवल उनकी तपस्या और सहनशीलता का मौन साक्षी था
26:30हर कदम के साथ वह कर्मों के उस चक्र को पूरा कर रहे थे, जिसे किसी भी देव या दानव
26:37से टाला नहीं जा सकता
26:39यह उस परमसत्य का प्रतीक था कि पावर भी अन्तह कर्म के विधान से बंधी होती है
26:47काल भैरव ने वैकुंट के आतिथ्य को एक मौन स्वीकृती में बदल दिया, आगे की अनवरत यात्रा के लिए स्वयं
26:55को समर्पित करते हुए
26:57उनका हर कदम अब केवल एक यात्रा नहीं, बलकि उन सभी कर्मों का प्रत्यक्ष अनुभव था, जिन्हें भुगतना ही नेती
27:05थी
27:07यह भैरव अवतार की वह विस्मयकारी लीला थी, जहां शक्ती का चरम भी कर्म के विधान के अधीन था
27:14इस प्रकार वैकुंठ की यात्रा ने काल भैरव को यह गेहन सत्य सिखाया कि अन्तर हर अवतार को अपनी नेती
27:23का चक्रस्वय ही पूर्ण करना होता है
27:26विश्नु के दिव्य मार्क दर्शन से काल भैरव जिनके चरण जहां पड़ते वहां पाप की चाया भी कांप उठती अब
27:34काशी की पावन सीमा में प्रवेश कर रहे थे
27:38जैसे ही उनके फीट पवित्र भूमी पर पड़े पापी ब्रहमाहत्या की विक्राल चाया जो अद्रिश्य होकर काल भैरव का पीछा
27:47कर रही थी चीतकार उठी
27:50वह भयानक एंटेटी जो स्रिश्टी के नियमों को तोड़ कर उत्पन हुई थी मानो अगनी में जुलस गई हो उसके
27:57विक्राल रूप के टुक्रे टुक्रे होने लगे
28:01ब्रहमाहत्या के चीतकार और विध्टन की ध्वनी से कापती हुई धर्ती में वह अभिशाप का पुँझविलीन होने लगा
28:09काल भैरव जिनके प्रचंड तेज के सामने स्वयम्रित्यू भी थर्थर कापती थी अब उस पाप से पूर्णता मुक्त हो चुके
28:17थे
28:19काशी जो स्वय भगवान शिव की चेतना और मोक्ष का प्रतीक है ने अपने भीतर काल भैरव को समाहित कर
28:26लिया
28:27इस पवित्र भूमी पर जहां हर कण में शिवत्व समाया था काल भैरव का अवतार एक लीला मात्र बनकर रह
28:35गया
28:36काल भैरव ने उस पाँचवें सिर को देखा जो अभी भी उनके हाथ में स्रिष्टी के अहमकार का प्रतीक भैभीत
28:44अवस्था में पढ़ा था
28:46शिव के आदेशानुसार इस निरर्थक अहमकार को विसर्जित करने का क्षणा गया था जहां केवल सत्य और मुक्ती का वास्था
28:56उन्होंने उस सिर को काशी की पावन धर्ती पर छोड़ दिया जहां यह तुरंट दिव्य प्रकाश में विलीन हो गया
29:03अपने साथ अहमकार की सारी निशानी ले गया
29:07ब्रहमा का वह पांच वासिर जिसने शिव का अनादर किया था, अब काशी की पवित्रता में लीन होकर मात्र एक
29:15स्मृति बनकर रह गया
29:17काल भैरव ने अपने हाथ में स्थित कपाल को देखा, जो अब केवल एक प्रतीक था, उस भयानक यात्रा का
29:25जो उन्हें स्वय के स्वरूप की ओरले आई थी
29:29काशी की गलियों में, जहां हर कोना शिव के प्रेम और ज्ञान से उत्परोत था, काल भैरव ने एक दिव्य
29:36शान्ती का अनुभव किया
29:38यह वह स्थान था जहां आत्माएं अपने कर्मों के बंधन से मुक्त होकर शिव के परम धाम में विलीन हो
29:45जाती थी
29:47काल भैरव की यात्रा, जो अहंकार और पाप से भरी थी, अंत्य काशी की पवित्रता में पूनता को प्राप्थ हुई
29:56उन्होंने स्वयन को काशी की चेतना में विलीन कर लिया, जहां उनका उग्र रूप अब शिव के परम आनंद का
30:03एक अविभाज अंग बन गया
30:06काल भैरव का अवतार, जो स्वयन शिव के प्रचेंड क्रोध का प्रतीक था, अब मोक्ष के परम गंतव्य में विलीन
30:13हो गया
30:14काशी, जिसे आनंद कानन भी कहते हैं, ने अपने भीतर इस दिव्य खेल को समेट लिया, और अब वहां केवल
30:22शिव का नित्य आनंद शेश रह गया
30:25काल भैरव की लीला पूर्ण हुई, और उनका उग्र रूप स्वय भगवान शिव के शांत, आनंदमय स्वरूप में विलीन हो
30:32गया, जो सभी दुखों का अंत है
30:36इस प्रकार काशी की पावन भूमी पर काल भैरव को ब्रहमा हत्या के अभिशाप से मुक्ती मिली, और वे स्वयन
30:44शिव में लीन हो गये, जो परम सत्य और अनंद शांती है
30:49ब्रहमा के कटे हुए सिर का खोपडी, जैसे एक अशुभ नक्षत्र उस पवित्र भूमी पर गिरी जहां से पापों का
30:56मोचन होता है, जिसे अब कपाल मोचन तीर्थ के नाम से जाना जाता है
31:03भगवान शिव अपनी असीम करुणा में प्रकट हुए और उन्होंने काल भैरव को वारांसी के शाश्वत कोत्वाल के रूप में
31:10नियुक्त करने का आदेश दिया
31:13उन्होंने घोशना की, हे भैरव, तुम काशी के रक्षक होगे, वह द्वारपाल जो मोक्ष के मार्ग की रक्षा करेगा
31:21इस पवित्र शहर में प्रवेश करने वाले प्रत्येक आत्मा को तुम्हारी स्वीकृती प्राप्त करनी होगी, चाहे वे सामान्य हो या
31:30देवता
31:42शाश्वत निवास होगा, काशी का कोत्वाल जहां तुम्हारी पूजा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करेगी
31:49इस प्रकार काल भैरव, शिव के उग्र अवतार हमेशा के लिए वारांसी के दिव्यरक्षक बन गए
31:57उन्होंने स्वयन उस स्थान पर नृत्य किया, जहां ब्रह्मा का सिर गिरा था, और उस पवित्र भूमी को कपाल मोचन
32:04तीर्थ का नाम दिया
32:06यह तीर्थ वह पवित्र स्थान बन गया, जहां भक्त अपने कर्मों के बोज से मुक्थ होने के लिए आते थे
32:15भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती के साथ इस नए नियम की घोशना की
32:22देवी पार्वती जो हर जीव की पीडा को महसूस करती थी, ने इस नियम की गंभीरता को समझा
32:30उन्होंने भगवान शिव से विंती की की वे सुनिश्चित करें कि भैरव की पूजा निश्ठा पूर्वक की जाएं
32:37शिव ने सहमती व्यक्त की और कहा कि भैरव की पूजा मोक्ष प्राप्त करने वालों के लिए सर्वोपरी है
32:45आथक वारांसी के हर मंदिर में भैरव की उपस्थिती अनिवार्य हो गई, उनकी प्रतिमाय प्रमुक्ता से स्थापित की गई
32:55दर्शनार्थियों को शहर में प्रवेश करते समय भैरव के दर्शन करने और उनका आशिरवाद लेने का निर्देश दिया गया
33:03कपाल मोचन तीर्थ काल भैरव के इनरीती से पवित्रा हुआ, जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्ती का प्रतीक बन गया
33:12काशी के कोतवाल के रूप में भैरव ने शहर की आध्यात्मिक अखंडता की रक्षा की यह सुनिश्चित करते हुए की
33:19केवल शुद्ध हरिदय वाले ही मोक्ष प्राप्त करें
33:23यह काल भैरव का अवतार था जिसने शिव की इच्छा को पूर्ण किया और काशी को मोक्ष का परमधाम बनाया
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