Dive deep into Episode 46 of the Shiva Purana as Sage Suta narrates one of the most terrifying yet protective manifestations of Lord Shiva—the Sharabha Avatar! After slaying the demon Hiranyakashipu, Lord Vishnu's Narasimha (half-lion, half-man) incarnation becomes consumed by an uncontrollable cosmic wrath that threatens to incinerate the entire universe. As the Devas tremble in fear, Lord Shiva must intervene to restore cosmic balance. Experience the epic clash between the supreme bird-beast Sharabha and the fierce Narasimha, culminating in a profound lesson on humility, ego dissolution, and the eternal harmony between Shiva and Vishnu. #ShivaPurana #SharabhaAvatar #Narasimha #LordShiva #LordVishnu #HinduMythology #SpiritualEgo #Mahadev #VedicLore
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00:00सूट जी महाराज ने शौनकादी रिशियों को शांत करते हुए कहा कि हिरने कशप के वद के बाद भी ब्रहमांड
00:07में शांती स्थापित नहीं हुई थी
00:10महाबली हिरने कशप का विशाल महल अब एक्ष मशान बन चुका था जहां केवल तबाही और रक्त बिखरा पड़ा था
00:19उस विनाश के केंद्र में भगवान रिसिन्ह खड़े थे जिनका भयानक क्रोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा था
00:26उनकी प्रत्येक हुंकार से तीनों लोकों की धर्ती काप रही थी और आकाश में ज्वालाए धधक रही थी
00:35सत्यलोक में बैठे स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा भी इस विक्राल रूप को देखकर अत्यंत भयभीत हो गए
00:44देवर्शी नारद ने अपनी वीना को थामे हुए अत्यंत व्याकुलता से इस भयंकर द्रिश्य को देखा
00:51इंद्र आदी सभी देवता स्वर्गलोक से इस विनाशलीला को देख अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगे
00:59बाल भक्त प्रहलाद ने अपने प्रभु के चर्णों में गिरकर उन्हें शांत करने का प्रयास किया
01:06किन्तु न्रिसिन्ह देव का क्रोध इतना तीवर था कि वे प्रहलाद के आसुओं को भी नहीं देख पा रहे थे
01:13समुद्र उबलने लगे थे, परवत पिघलकर बह रहे थे और पूरी स्रिष्टी महा प्रलय की ओर बढ़ रही थी
01:22ब्रहमा जी ने आगे बढ़कर न्रिसिन्ह देव के क्रोध को रोकने की प्रार्थना की परंतु उनके तेज ने उन्हें पीछे
01:29धकेल दिया
01:31पंचभूत, प्रित्वी, जल, अगनी, वायू और आकाश सभी अपना संतुलन खोने लगे थे
01:38इस विकट परिस्थिती में केवल देवाधिदेव महादेव ही थे जो ब्रहमांड को इस संकट से बचा सकते थे
01:47कैलाश परवत पर विराजित माता पारवती भी दूर हो रहे इस विनाश को देखकर अत्यंत चिंतित थी
01:55जब स्वर्ग में आग की लप्ते पहुँचने लगी तो देवताओं ने वहां से पलायन करना शुरू कर दिया
02:02सभी भैभीत देवताओं ने मिलकर निर्नय लिया कि वे महादेव के पास जाकर उनसे रक्षा की प्रार्थना करेंगे
02:11ब्रहमा जी के नेतरित्व में भैभीत देवताओं का समूह कैलाश परवत की ओर तेजी से बढ़ने लगा
02:18वे बादलों और दिव्य नक्षतरों को पार करते हुए उत्तर दिशा में स्थित पवित्र कैलाश के निकट पहुँचे
02:26एक तरफ धधकती हुई आग थी और दूसरी तरफ कैलाश की शीतल और शांत बर्फ जो सुखद लग रही थी
02:35अंतह सभी देवता महादेव के चर्णों में गिर पड़े और नरसिंह के भयानक क्रोध से स्रिष्टी को बचाने की भीख
02:42मांगने लगे
02:44असुरों के संहारक अत्यंत उग्र नरसिंह भगवान के दहार से तीनों लोकों के स्तंभ कापने लगे जैसे प्रलै का महाविनाश
02:52सामने खड़ा हो
02:54नरसिंह के मुख से निकली प्रल्यंकारी अगनी ज्वालाए जैसे पाताल के नागों का विशैला फुम्फकार हो
03:01सागरों को सुखाने लगी और स्वर्ग की निर्मल आभा को जुलसाने लगी
03:07भक्त प्रहलाद की मधुर और कोमल प्रार्थनाए जैसे शीतल मंद पवन नरसिंह के प्रचंड क्रोध को शांत करने में पूर्णत
03:15असमर्थ सिद्ध हुई
03:18देवताओं के राजा इंद्रभी नरसिंह के क्रोध की ज्वालाओं से भयभीत होकर अपने वजर का बल भी व्यर्थ पाकर स्वर्गलोग
03:26को छोड़ने पर विवश हो गए
03:28यह देखकर स्रिष्टी के रचिता चतुर्मुख ब्रहमा स्वय नरसिंह को शांत करने हे तू एक ऐसे रूप का ध्यान करने
03:37लगे जो इस प्रचंड वेक को थाम सके
03:41ब्रहमा के ध्यान से उभरा एक अध्भुत अलौकिक जीव जिसके आठ पैर, पंक और पंजे थे जो सिंह और गरुर
03:49का अध्भुत संगम था जो नरसिंह के भय को दूर करने के लिए बना था
03:54यहां आठ पैरों वाला भीशन शरब रूप गरुर के समान वेक से सीधे नरसिंह के उग्रस्वरूप के सामने प्रकट हुआ,
04:03जैसे कोई प्रचंड तूफान अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को लीलने को तयार हो
04:10नरसिंह ने जैसे ही शरब को देखा, उनका क्रोध और भी भड़क उठा, मानो दो विनाशकारी शक्तियों का महासंग्राम आरंभ
04:18होने वाला हो
04:20शिव के इस भयानक शरब अवतार ने सिंह के मुखवाले नरसिंग को अपने आठ पैरों में जकड लिया, जैसे कोई
04:28अजगर अपने शिकार को कुंडली मार कर जकड लेता है
04:33नरसिंग के प्रचंड बल और भीशन गर्जना के बावजूद शरब का अचल हिमालय जैसा द्रिड संकल्प उन्हें शान्त करने का
04:41मार प्रशस्त कर रहा था
04:43धीरे धीरे नरसिंग के उग्र नेत्रों की लालिमा कम होने लगी, उनकी गर्जना में अब प्रलैकी नहीं, अपितु एक ठकी
04:51हुई, शान्त होती ध्वनी आने लगी
04:55जैसे सूर्य की प्रथम किरने अंधकार को चीरती हैं, वैसे ही शरब के स्पर्ष मात्र से नरसिंग का प्रचन क्रोध
05:02शांत होने लगा, और वे अपने मूल शांत नारायन स्वरूप में लोटने लगे
05:08जब नर्सिन पूर्णता शांत हो गए, शरब ने धीरे धीरे अपनी पकड़ धीली की, जैसे कोई रक्षक अपने शिश्य को
05:16पुना मार्क पर लाकर उसे सने से विदा करता है
05:21प्रजाप्ती ब्रह्मा, जिन्होंने इस अध्भुत शरब रूप को उत्पन किया था, अब अत्यंत प्रसन्न थे, क्योंकि उन्होंने स्रिष्टी को एक
05:30ऐसे विनाश से बचा लिया था, जो स्वय इश्वर के क्रोध से उत्पन हुआ था
05:36तीनों लोकों में शांती लौट आई, जैसे किसी प्रचंड तूफान के बाद स्वच्छंद निर्मल गगन चा जाता है, और देवताओं
05:45ने राहत की सांस ली
05:47भगवान शिव जिन्होंने शरब का यह भयानक रूप धारण किया था, अब अपने कैलाश परवत पर अपनी प्रियत्मा पारवती के
05:55साथ शांत भाव से विराजमान थे
05:59प्रहलाद जो नरसिंगे परमभक्त थे, अब अपने आराध्य को शांत देखकर उनके चर्णों में नत्मस्तक हो गए, उनकी भक्ती का
06:08एक और चरम ख्षन था
06:10इस प्रकार, शिव के शरब अवतार ने न केवल नरसिंग के क्रोध को शांत किया, अपितु संपून ब्रहमान को एक
06:18महान संकट से उबारा, जो उनकी शक्ती और करुणा का प्रतीक बना
06:24यह कथा हमें सिखाती है कि जब धर्म संकट में हो, तो इश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर, सबसे
06:31भयंकर बुराई का भी अंत कर सकते हैं, चाहे वह स्वय इश्वर का ही रूप क्यों न हो
06:38जब नर्सिं के उग्र रूप का कोप थमा नहीं, तब स्रिष्टी के विनाश का भय देवताओं के हृद्यों में अगनी
06:44की भांती धधक उठा
06:47भय भीत महा विश्व के प्रचंड रूप के समक्ष, स्वयन स्रिष्टी करता ब्रह्मा, देवगणों के साथ कैलाश परवत की ओर
06:55भागे, जहां आदिदेव शिव का निवास था
06:58हे महा देव, हे त्रिकाल दर्शी, हम शर्णागत हैं, अपने स्वामी विश्व के अनियंत्रित क्रोध से स्रिष्टी को बचाने की
07:08गुहार लेकर आये हैं
07:11विश्णु का यह स्वरूप जो अधर्मियों का सहार करता है, आज स्वय ही सहार का परियाय बन गया है, महा
07:19देव, क्रिप्या अपनी क्रिपा द्रिष्टी डालें
07:22कैलाश के शांत शिखर पर, जहां हिम्युक की आत्मा निवास करती है, आदिदेव शिव ध्यानमगन थे, उनकी समाधी स्रिष्टी के
07:31हर स्पंदन से जुड़ी थी
07:34ब्रहमा की पुकार, जैसे ध्रुव तारे की भांती, शिव की चेतना तक पहुँची, उन्होंने अपने नेत्र खोले, जिनमें ब्रहमांड का
07:42रहस्य और आदिन शक्ती का वास था
07:46उन्होंने देवों की व्यथित पुकार सुनी, नर्सिह का अनियंत्रित क्रोध, जो स्वय विश्णु का अंश्थ था, अब स्रिष्टी के लिए
07:54एक गंभीर संकट बन चुका था
07:57शिव ने अपने भक्तों की रक्षाहेतु, अपनी अद्भुत शक्ती को जागरित करने का निश्चय किया, वह रूप जो काल को
08:04भी भैभीत कर दे
08:07अपने भीतर की आदिम उर्जा को एक मूर्थ रूप देते हुए, शिव का वह विक्राल शारदूल रूप प्रकट होने लगा,
08:14जिसमें सिंह और गरूर का बल समाहित था
08:18आठ पैर, पंक, सिंह की गर्जना और गरूर की द्रिष्टी, शारदूल अवतार ने स्रिष्टी को नर्सिन के क्रोध से बचाने
08:26के लिए अपना भयानक रूप धारण किया
08:30वह रूप जो मृत्यूंजे शिव का भी अहंकार तोर दे, अब नर्सिन की उस उनमादी शक्ती को नियंत्रित करने के
08:37लिए प्रिथवी पर अवत्रित हुआ
08:40जैसे ही शारदूल रूपी शिव प्रिथवी पर उत्रे, नर्सिन का क्रोधागनी उनके दिव्य तेज के सम्मुख एक मंद पढ़ती ज्वाला
08:48की भानती क्षीन होने लगी
08:51नर्सिन जो स्वयं विश्नु के अंश्थे ने शिव के इस अद्भुत रूप को देखकर अपने क्रोध पर नियंत्रन पाया जैसे
08:59सागर की लहरेंग शान्थ हो जाती है
09:03शिव ने नर्सिह को अपनी बाहों में लिया, उनके उग्र रूप को शांत किया और विश्नु को उनके वास्तवित शांत
09:11स्वरूप में पुनह स्थापित किया
09:14जैसे ही नरसेह का उग्रस्वरूप शान्थ हुआ, स्रिष्टी पर मंदरा रहा विनाश का बादल छंट गया और देवों के प्राणों
09:21में नव जीवन का संचार हुआ
09:24ब्रह्मा और देवों ने शिव के सम्मुख नत्मस्तक होकर उनके विराठ क्रिपालू स्वरूप का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने स्रिष्टी को
09:33एक बार पुनह बचा लिया था
09:36शिव ने देवों को आश्वासन दिया कि उनका अवतार केवल धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए था
09:43और अब वह अपने धाम लोट जाएंगे
09:47नर्सिंह का उग्र रूप जो अव्यक्त शक्ती का प्रतीक था, अब शिव की शांत शक्ती के सम्मुख विनम्र हो गया,
09:54यह स्रिष्टी के संतुलन का एक अद्भुत क्षण था
09:58इस प्रकार शिव के शारदूल अवतार ने विश्णु के नर्सिंह रूप के अनियंत्रित क्रोध को शांत कर स्रिष्टी को विनाश
10:06के कगार से वापस खींच लिया
10:09देवताओं के व्याकुल कोलाहल के मध्य, कैलाश पर्वत के शांत शिखर पर देवाधिदेव महादेव अत्यंत सौमय भाव से विराज मान
10:18थे, मानो महासागर की अनन्त गहराई समेटे हूँ
10:23देवी पार्वती, जिन्होंने अभी अभी नर्सिह के विक्राल रूप का अनुभव किया था, चिंतित द्रिष्टी से महादेव की ओर देख
10:31रही थी, उनके मुखमंडल पर स्रिष्टी की रक्षा की चिंता स्पष्ट जलक रही थी
10:37शिव की दिव्य चेतना ने देवताओं की घबराहट को महसूस किया, और उन्होंने अपने शांत स्वर में कहा, हे देवगणों,
10:45भय को त्याग दो, क्योंकि मैं तुम्हारे रक्षक के रूप में उपस्थित हूँ, और किसी भी संकट का समाधान मेरे
10:52पास है
10:54उन्होंने आगे कहा, नरसिंग का क्रोध यद्यपी उग्र है, पर यह उस अहमकार का परिणाम है, जिसने देवत्व के मूल
11:02को चुनौती दी है, और हम इसे बल से नहीं, अपितु विवेक से शांत करेंगे
11:09ततकाल महादेव ने अपने अंश से एक तेजस्वी और भयंकर स्वरूप को प्रकट होने का आदेश दिया, जो किसी भी
11:17अकल्पनिय शक्ती का सामना करने में सक्षम हो, ताकि वह नरसिंग के क्रोध को नियंत्रित कर सके
11:24यह कोई साधारन शक्ती नहीं थी, अपितु शिव के प्रचंड तपका वह अंश था, जो स्रिष्टी के संतुलन को बनाये
11:32रखने के लिए अपनी रौदर शक्ती को धारन कर सकता था, एक दिव्य योध्धा का अवतरन
11:38महादेव ने वीर्भदर को अपने उग्र स्वभाव और अटूट निष्ठा के प्रतीक को सम्मुख बुलाया, जिनकी उपस्थिती मात्र से अंधकार
11:47भी काम उठता था
11:50वीर्भदर क महादेव की वानी गुंजी, तुम मेरे क्रोध का प्रत्यक्ष रूप हो, जाओ और उस नर्सिंग को विनमर्ता से
11:57समझाओ, कि उसका कार्य पूर्ण हो चुका है, और उसे अपनी उग्र उर्जा को शांत कर लेना चाहिए
12:05वीर्भदर ने अपने स्वामी के चर्णों में शीष जुकाया, और उनकी आखों में संकल्प की ज्वाला धधक उठी, वह पलक
12:13जपकते ही उस दिशा में प्रस्थान करने को उध्यत हो गए जहां नर्सिंग का प्रचंड तांडव जारी था
12:20उन्होंने महादेव से प्राप्ट दिव्य शक्ती को अपने में समाहित किया, जो किसी आधी की तरह भयानक थी, और तीवर
12:28गती से उस लोग की ओर प्रस्थान किया जहां स्रिश्टी के विनाश का संकट मंदरा रहा था
12:35वीर्भद्र का आगमन नर्सिंग के प्रचंड क्रोध के बीच एक शांत परंतु द्रिढ आहवान था, जो नर्सिंग की दिव्य चेतना
12:43को जगाने और उन्हें स्रिश्टी के हित में अपने कार्य को समाप्त करने का संदेश दे रहा था
12:50नर्सिंग जो हिरन्यक्षिपु के वध के पश्चात भी शांत नहीं हुए थे और जिनका भयानक रूप तीनों लोकों में भय
12:57का संचार कर रहा था, वीर्भद्र की उपस्थिती से क्षन भर के लिए चकित हुए
13:04वीर्भद्र ने अपनी गंभीर वानी में कहा, हे नर्सिंग, जग के रक्षक आपके पराक्रम से स्रिष्टी धन्य हुई, पर अब
13:12आपकी लीला का यह अध्यार पूर्ण हुआ है, क्रिप्या अपनी दैविय उर्जा को वापस ले ले
13:19उन्होंने नर्सिंग के तेजस्वी स्वरूब के सम्मुख अपने मुख मंडल पर कोई भय या कामपना नहीं दिखाया, अपितु एक अटल
13:27विश्वास के साथ महादेव के संदेश को पहुँचाया
13:31नर्सिंग ने अपने सिंहस्मान मुख से एक गर्जना की, जो कैलाश तक सुनाई दी, और पूछा, किस देव की आग्या
13:39से तुम यहाँ आए हो, क्या महादेव स्वयम मुझे रोकने का दुस्साहस कर रही हैं
13:46वीर्भद्र ने निर्भैता से उत्तर दिया, देवाधिदेव महादेव ने मुझे आपके देवत्व का सम्मान करते हुए, यह निवेदन करने भेजा
13:54है, कि स्रिष्टी का कल्यान आपके शांत स्वरूप में ही है, न कि इस उग्र रूप में
14:01उन्होंने समझाया कि महादेव का उद्देश्य नर्सिंग को दंडित करना नहीं, बलकि स्रिष्टी को उस उर्जा के अतिरिक्ट प्रवाह से
14:09बचाना है, जो अब किसी भी रूप में आवश्चक नहीं थी
14:14वीर्भद्र की सत्यवानी और महादेव की शक्ती का प्रभाव नर्सिंग के उग्र हृदय पर पढ़ने लगा, उनके प्रचंड क्रोध की
14:22अगनी धीरे-धीरे शांत होने लगी, जैसे प्रलय के पश्चात प्रकृती पुनह शांत हो जाती है
14:30अंतह नर्सिंग ने अपनी भयंकर उर्जा को समेट लिया, उनका रूप धीरे-धीरे शांत होने लगा, और उन्होंने वीर्भद्र की
14:38बातों को स्विकार किया, इस प्रकार महादेव की बुद्धिमत्ता ने उग्रता पर विजय प्राप्त की
14:45महादेव के आदेश पर वीर्भद्र अत्यंत वेग से हिरन्यक्षिपु के नश्ठ हो चुके भव्य महल के आंगन में उत्रे, जहां
14:53चारों और विनाश का सन्नाटा पसरा हुआ था
14:56वहाँ उन्होंने भगवान रिसिंह को देखा, जिनका भयंकर क्रोध और गर्जना तीनों लोकों की सीमाओं को हिला रही थी
15:06वीर्भदर ने अपने भयानक अस्त्रशस्त्रों को नीचे जुका लिया ताकि वे द्रिसिंह देव के प्रती अपनी शांतिप्रिय और विनीक मन्शा
15:14को प्रदर्शित कर सकें
15:16क्रोध से उबलते हुए सिंह देवता की ओर बढ़ते हुए वीर्भदर ने श्रद्धा पूर्वक अपने हाथ जोड लिये और विनमरता
15:25का परिचय दिया
15:27द्रिसिंह ने अपनी जलती हुई आखों से वीर्भदर को भूरा, मानों उनकी आखें प्रलय की अगनी उगल रही हो
15:35वीर्भदर ने अत्यंत मधुर और गंभीर स्वर में महादेव शिव का शांति और ब्रहमांडिय संतुलन का संदेश देना प्रारंभ किया
15:45उन्होंने न्रिसिंह को याद दिलाया कि वे स्वय जगतपालत भगवान विश्णु हैं, जिनका परम कर्तव्य स्रिष्टी की रक्षा करना है,
15:53विनाश नहीं
15:55वीर्भदर ने नमरता पूर्वक प्रार्थना की की चूंकी अत्याचारी हिरन्यक्षिपू का वध हो चुका है, इसलिए अब उन्हें अपने इस
16:03भयंकर क्रोध को शांत कर लेना चाहिए
16:07किन्तु शिवदूत की इस प्रार्थना को सुनकर न्रिसिन्ह की पूंच क्रोध में हवा में लहराई और उसने महल के बचे
16:14-खुचे खंभों को भी ध्वस्त कर दिया
16:17दिसिन्ह देव ने अत्यंत अट्थास किया, जिसकी भयंकर गर्जना से पूरा ब्रह्मांड थर्थरा उठा और देवगन भय से कामपने लगे
16:27दिसिन्ह ने महादेव के संदेश को पूरी तरह ठुकराते हुए स्वयंको स्रिष्टी का एक मात्र अधिपती और काल का भी
16:35काल घोशित कर दिया
16:37वीर्भद्र ने अपना धैर्य बनाय रखा और कापती हुई प्रकृती और डरे हुए देवताओं की रक्षा के लिए एक बार
16:45फिर से शान्ती की गुहार लगाई
16:48क्रोधित होकर न्रिसिन्ह अपने सिन्हासन से उठ खड़े हुए उनका विशालकाई शरीर वीर्भद्र के सामने एक धधकते हुए परवत के
16:56समान लग रहा था
16:59ड्रिसिन्ह का क्रोध अब अपनी चरम सीमा पर था उनके सुनहरे शरीर से वाश्प और चिंडारिया निकल रही थी जो
17:06बातावर्ण को जुलसा रही थी
17:09ड्रिसिन्ह ने अपनी नुकीली उंगली वीर्भद्र की ओर तानी और उन्हें तुरंत वहां से चले जाने या फिर चीर डाले
17:17जाने की भयानक चेतावनी दी
17:20वीर्भदर ने निरिसिन्ह के प्रचंड क्रोध की तपन को महसूस किया, परंतु वे कैलाश के प्रतिनिधित्व के आत्मसम्मान के साथ
17:28अडिक खड़े रहे
17:30निरिसिन्ह ने सीधे वीर्भदर के मुख पर एक भयानक दहार मारी, जिससे उत्पन हुए ध्वनिकमपन से प्रित्वी फटने लगी
17:39जब वीर्भदर को विश्वास हो गया कि शान्ती की सभी कूटनी तिक कोशिशे विफल हो चुकी हैं, तो उनका विनीत
17:47भाव धीरे-धीरे आकरामक होने लगा
17:51वीर्भदर ने कड़े शब्दों में न्रिसिंह को चेतावनी दी की महादेव का धैर्य उनकी कमजोरी नहीं, बलकि इस स्रिष्टी के
17:58लिए सुरक्षा कवच है
18:01शिवदूत वीर्भदर आकाश की ओर वापस लोट गए, और पीछे छोड़ गए दहारते हुए न्रिसिंह को, जिससे अब महासंग्राम का
18:10मंच पूरी तरहे तैयार हो चुका था
18:13ग्रिसिंह का उग्रक्रोध जो तीनों लोकों को भस्न करने पर तुला था, अब दिव्य दूतों पर बरस पड़ा, जिनका उद्देश
18:21उसे शांत करना था
18:24न्रिसिंह ने अपने भयानक पंजे बढ़ाए, मानोवे संपूर्ण ब्रहमांड को ही निगल जाना चाहते हूं और देवदूतों को तितर बितर
18:32कर दिया
18:34वीर्भद्रक शिव के गणों में अग्रगणिय देवदूतों की असायता देखकर द्रवित हो उठे और उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर न्रिसिंह के
18:42मार को रोकने का निश्चय किया
18:45किन्तु न्रिसिंह का क्रोध अगनी की भांती प्रजवलित था जिसने वीर्भद्र के शौर्य को भी फीका कर दिया और उन्हें
18:53पीछे हटने पर विवश कर दिया
18:56जब देवों के दूत भी न्रिसिन्ह के क्रोध की जवाला से बच न सके, तो उन्होंने कैलास की ओर प्रस्थान
19:03किया, अपने स्वामी शिव से सहायता की याचना करने हे तू
19:08कैलाश परवत पर जहां सदैव शांती का वास था, माता पारवती ने अपने प्रियतम शिव को न्रिसिन्ह के इस अनियंतरित
19:16विनाशकारी रूप का वर्णन किया
19:19शिव जिन्होंने स्रिष्टी और सहार का संतुलन अपने हाथों में संभाला था, ने निरिसिन्ह की इस भीशन लीला को देखा
19:27और वे शांत भाव से उठे
19:30तब महाकाल जो काल के भी स्वामी है, ने अपने रौद्र रूप शरब अवतार को धारन करने का संकल्प किया
19:39यह वह अवतार था, जो न तो सिह का था, नहीं पक्षी का, बलकि दोनों के भयंकर संगम का, जो
19:46असीमित बल और क्रोध को धारन करता था
19:50शिव के शरीर से दो भयानत पंख निकले, गरूर से भी उचे और शक्तिशाली, जो ब्रहमांड की हवाओं को चीरने
19:57में सक्षम थे
19:59उनके मुख पर सिह का विक्राल रूप था, जिसमें विश्नों के नरिसिन्ह अवतार का भीशन प्रतिविंद दिखाई दे रहा था,
20:07जो उस अनियंतरित उर्जा का सामना करने के लिए तैयार था
20:12शिव का यह रूप शरब आठ पैरों वाला था, प्रत्येक पैर गरुड के पंजों के समान तीक्षन और शक्तिशाली था,
20:20जो प्रित्वी को कमपा देने में समर्थ था
20:23जब यह दिव्य योध्धा अपने पूर्ण रूप में अवतरित हुआ, तो उसके आगमन की गूंच से संपूर्ण ब्रहमांड धर्रा उठा
20:32वह न्रिसिन्ह के उग्रकरोध को शांत करने के लिए, न की उसे नश्ट करने के लिए, बलकी उस उर्जा को
20:39सही दिशा देने के लिए आगे बढ़ा
20:42ग्रिसिन्ह जो अब तक स्वयं को सर्वशक्तिमान समझ रहे थे, ने अपने सामने इस अध्भुत अकल्पनिय स्वरूप को देखा और
20:51क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गए
20:54शरब ने अपने विशाल पंजे आगे बढ़ाए, जिनमें न तो शत्रुता थी, नहीं कोई विनाशकारी बल, बलकी केवल उसे शान्थ
21:02करने का कोमल निमंतरन था
21:05ग्रिसिह के भयानक दहाडने और शरब की शान्थ, दिव्य उपस्थिती के बीच एक विचित्र मौन चा गया, जो ब्रहमांडिय संतुलन
21:14के एक नए अध्याय का संकेत दे रहा था
21:18तब शिव की शरब लीला ने उस उग्र उर्जा को अपने वश में कर लिया, जिसने तीनों लोकों को भयभीत
21:25कर रखा था
21:27निरिसिन्ह का क्रोध शान्थ होने लगा, उनका भयानक रूप धीरे-धीरे क्षीन हुआ, और वे अपने वास्तविक शान्थ स्वरूप में
21:35लोटने लगे
21:36इस प्रकार, शिव ने अपने शरब अवतार से न केवल निरिसिन्ह के क्रोध को शान्थ किया, अपितु स्रिष्टी के संतुलन
21:44को भी पुनह स्थापित किया
21:47अनंत ब्रह्मांड के गेहन अंधकार से, जहां समय स्वयन्थम जाता है, भगवान शिव ने अपने एक ऐसे रूप का आहवान
21:55किया, जो स्रिष्टी के संतुलन को पुनह स्थापित करने के लिए उद्यत था
22:00पृत्वी पर निसिन्ह का क्रोध जो अधर्म का विनाशक था, अब एक अनियंत्रित प्रल्यंकारी शक्ती बन चुका था, जिससे त्रिलोक
22:09कांप उठे
22:11देवताओं की प्रार्थनाए, जो निसिन्ह के विनाशकारी क्रोध को शांत करने के लिए थी, शिव के दिव्यकानों तक पहुँची, और
22:19उन्होंने अपने सबसे भयानक अवतार को धारन करने का निश्चय किया
22:25एक गेहन गर्जना के साथ, जो ब्रहमांड की धमनियों में गूंज उठी, शिव का शरब अवतार प्रकट हुआ, जिसने निरिसिन्ह
22:33के उन्माद को नियंतरित करने का संकल्प लिया
22:37आठ पैरों वाला यह अश्टभुजाधारी दिव्यजीव, पम्खों से जो आकाश गंगाओं को धक लेते थे, एक भयानक शक्ती का प्रतीक
22:45था
22:47उसके पंजे, वजर से भी अधिक शक्तिशाली और आखें, जिनमें प्रलै की अगनी जल रही थी, निरिसिन्ह के अनियंतरित क्रोध
22:55को चुनौती दे रही थी
22:58शारब प्रकट होते ही, निरिसिन्ह ने अपना ध्यान उस नए भयानक स्वरूप की ओर मोड़ा, जो उसके उनमादी निरित्य को
23:06रोकने आया था
23:08निरिसिन्ह का सिन्हमुख क्रोध से गुर राया, उसकी दहार ने प्रित्वी को कमपा दिया, जैसे वह इस नए प्रतिद्वंद्वी को
23:16सीधे चुनौती दे रहा हो
23:19शारब ने अपने विशाल पंखों को फैलाया, जो ब्रहमादी अधूल से सजे थे, और एक शांत, लेकिन द्रिड संकल्प के
23:27साथ निरिसिन्ह की ओर बढ़ा
23:29निरिसिन्ह की प्रत्येक गर्जना और प्रहार विनाश का एक ज्वार था, जिसे रोकने के लिए शारब ने अपने पंखों का
23:37कवच और पंजों का अस्त्रधारन किया
23:41शारब के आठ पैर, जो आठ दिशाओं से शक्ती खीचते थे, निरिसिन्ह के वेग को रोकने के लिए प्रित्वी पर
23:48ग्रिडता से जम गए
23:50इस दिव्य युद्ध में, निरिसिन्ह का प्रल्यंकारी क्रोध, शरब के शांत, अविचल बल से टकराया, जो किसी भी आसुरी शक्ती
23:58को शांत करने में सक्षम था
24:01शारब ने अपने तीक्षन चोंच से निरिसिन्ह के उग्र मुख को घेरा, एक ऐसी पकड जिसने स्वयम रित्यु को भी
24:08भैभीत कर दिया
24:11शिव के शरब रूप ने निरिसिन्ह के उनमाद को धीरे-धीरे शांत किया, जैसे सूर्य की पहली किरने अंधकार को
24:18चीर देती है
24:20जैसे जैसे निरिसिन्ह का क्रोध शांत हुआ, उसका भैयानक रूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा और विश्नु का शांत दिव्य
24:28स्वरूप पुना प्रकट हुआ
24:31न्रिसिन्ह के शांत होने पर शरब ने अपना भयानक रूप त्याग दिया और शिव अपने मूल परम आनंदमय स्वरूप में
24:39लौट आए
24:40शिव ने विश्णु को आश्वासन दिया कि उनका अवतार धर्म की रक्षा के लिए था और उनका क्रोध केवल अधर्म
24:48के नाश के लिए था
24:50इस प्रकार शिव के शरब अवतार ने न्रिसिन्ह के उग्र क्रोध को शांत कर ब्रहमांड में पुनह संतुलन स्थापित किया
25:10ब्रहमांड की शांती भंग हुई, जब विक्राल नर्सिंह, हिरनेकशप के वध के पश्चात भी अपने उग्र क्रोध को शांत न
25:18कर सके और त्रिलोग को कमपाने लगे
25:21शिव की दिव्य चेतना ने इस अनियंत्रित विनाश को महसूस किया और उन्होंने अपने सबसे भयानक अलौकिक रूप शरब अवतार
25:30धारन करने का निश्चय किया
25:33जैसे ही शरब प्रकट हुए नभमंडल में एक बिजली सी कौंध गई और शिव के दिव्य वाहन गरूड का भी
25:40रूप धारन कर उन्होंने नर्सिंग की ओर उडान भरी
25:44नर्सिंग का क्रोध जो त्रिलोग को भस्म करने पर तुला था उसने शरब को अपने मार्ग में एक चुनौती के
25:52रूप में देखा
25:53एक खण में शरब गरूड के समान चपलता से उन प्रचंड नर्सिंग पर जप्टे मानो कोई बास अपने शिकार पर
26:01तूट पड़ा हो
26:03शिव के शरब रूप ने अपने तीक्षन वजर समान नकों से नर्सिंग के उगर शरीर को कसकर जकड लिया
26:10मानो परवत की चोटिया किसी अचल शिला को भेद रही हो
26:16नर्सिंग की दहाड जो पाताल तक गूंजती थी शरब के आलिंगन में एक अविश्वास की चीख में बदल गई
26:24शरब ने अपने अध्भुत बल से नर्सिंग को प्रिथवी से उपर उठाया और उन्हें अंतरिक्ष की असीन गहरायों की ओर
26:31ले चले
26:33जैसे ही वे उचे उड़े नर्सिंग की अगनी तुल्य उर्जा शरब के विशाल पंखों से निकलने वाली दिव्यशी तलता से
26:41मन्द पड़ने लगी
26:43शरब के पंखों की विशाल छाया, नर्सिंह के क्रोध की लप्टों को ढखने लगी, मानो घंगोर घटाएं सूर्य के तेज
26:51को शांत कर रही हो
27:04शिव के शरब रूप ने नर्सिंह की प्रचंड उर्जा को अपने पंखों के भीतर समाहित कर लिया, मानो वे ब्रहमांड
27:12की सभी उथल पुथल को शांत कर रहे हो
27:16नर्सिंह का उग्रगर्जन धीरे-धीरे एक शांत, दिव्यश्वास में परिवर्तित होने लगा, जैसे तूफान के बाद की खामोशी
27:25शिव ने नर्सिंह को अपने नकों से धीरे-धीरे मुक्त किया, और ब्रहमांड को एक नए शांत संतुलन में पुनह
27:32स्थापित किया
27:34नर्सिंह अपने उग्र रूप से वापस विश्णु के शांत, दिव्य स्वरूप में परिवर्तित होने लगे, जैसे उबलता जल शांत सरोवर
27:42में बदल जाए
27:44विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से शरब को देखा, और उस अलौकिक रूप के पीछे शिव के विराट स्वरूप को पहचान
27:52लिया
27:53उन्होंने शरब को प्रणाम किया, उस उग्र अवतार के लिए आभार व्यक्त किया जिसने उन्हें और त्रिलोग को बचाया था
28:02शिव अपने शरब रूप से पुनह शिव के शांत, ध्यानमग्न स्वरूप में विलीन हो गए, जो ब्रहमांड के संतुलन के
28:09रक्षक है
28:23जैसे ही शरब के दिव्यपंजे नर्सिंग के उन्मत अटहास को थामते हैं, विक्राल क्रोध की ज्वालाएं एक अप्रत्याशित शांती में
28:32बदलने लगती हैं
28:35नर्सिंग के आइज, जो अब तक प्रल्यंकारी अगनी उगल रहे थे, शरब के शांत, ब्रहमतेज से परिपूर्ण मुखमंडल को देखकर
28:43विस्मय से भर जाते हैं
28:46शिव का शरब रूप, जो तीनों लोकों के विनाशकारी प्रलै का प्रतीक है, अब नर्सिंग के अहंकार को धीरे-धीरे
28:53पिघलाने लगता है
28:56नर्सिंग को अपनीक शुद्रता का एहसास होता है, वह समझता है कि यह रौद्र रूप भी शिव के महारक्षक स्वरूप
29:04का ही एक अंश है
29:07आमकार की बेडिया तूपती है, और नर्सिंग के हृदय में अपने परम आराध्यत भगवान शिव के प्रती असीम श्रद्धा और
29:15समर्पन का भाव जागरित होता है
29:18शिव के शरब रूप की भयंकरता अब एक मात्रिवत सुरक्षा कवच में बदल जाती है, जो नर्सिंग की आहत आत्मा
29:26को सहारा दे रही है
29:29नर्सिंग जो कभी काल का ग्रास बनते-बनते बचे थे, अब शरब के पंजे में सुरक्षित महसूस करते हैं, जैसे
29:37कोई शिशुमा की गोद में हो
29:40शिव का वह भयानक रूप जो संपूर्ण स्रिष्टी को कमपकमपा देता था, वही रूप आज नर्सिंग के हृदय में शांती
29:47और करुणा का सागर बनकर उमड रहा है
29:52नर्सिंग अपने क्रोध की अगनी से मुक्थ होकर, अब शिव के दिव्य प्रेम के शीतल अमरित का पान करने के
29:58लिए तयार है
30:01शिव का शरब रूप स्रिष्टी के संतुलन को पुनरस्थापित करने के लिए ही प्रकट हुआ था, और अब उसका उद्देश
30:08पूर्ण हो चुका है
30:11धीरे धीरे शरब के आठोन पैर शिथिल होने लगते हैं, और शिव का वह रौधर अफ्तार एक बार पुनह अपने
30:18शांत, योगिश्वर स्वरूप में विलीन होने लगता है
30:23नर्सिव अपनी वास्तविक पहचान में लोटते हुए भगवान शिव को प्रणाम करते हैं, उनकी कृपा के लिए कृतज्यता से आखें
30:32नम हो जाती हैं
30:34भगवान शिव अपने सौमय स्वरूप में प्रकट होकर नर्सिव को उठाते हैं और अपने गले लगाते हैं, जैसे कोई पिता
30:43अपने प्रिय पुत्र को
30:45शिव का स्पर्ष नर्सिव के हरिदय में नई चेतना भर देता है, उन्हें अपनी शक्ती और अपने कर्तव्य का स्मरण
30:52कराता है
30:55नर्सिव अपने क्रोध पर विजय पाकर अब धर्म की रक्षा के लिए पुनह उद्यत होते हैं, शिव की क्रिपा उनका
31:02मार्ग गर्शन कर रही है
31:05शिव के शरब अवतार का यह भयानक किन्तु करुनामय कृत्य स्रिष्टी में संतुलन और न्याय की पुनर्स्थापना का प्रतीक बन
31:13गया
31:14शिव का यह अनुठा अवतार जो मृत्यूंजय है, हमें सिखाता है कि सबसे प्रचंड क्रोध भी अन्ता शिव के दिव्य
31:22प्रेम में विलीन हो जाता है
31:25इस प्रकार शिव के शरब रूप ने न केवल नर्सिह के क्रोध को शांत किया, बलकि संपून ब्रह्मांड को एक
31:33गेहन आध्यात्मिक सत्य का पाठ पढ़ाया
31:36यह घटना एक प्रमान है कि परमेश्वर के विभिन रूप चाहे वे कितने भी भयानक क्यों नहों, अन्ता लोग कल्यान
31:44और धर्म की रक्षा के लिए ही प्रकट होते हैं
31:49जैसे ही नर्सिम्हा का उग्र रूप धीरे धीरे शांत होने लगा, शिव का शरब अवतार जो पहले प्रल्यंकारी प्रतीत होता
31:57था, अब करुणा और संतुलन का प्रतीक बन गया
32:01नर्सिम्हा जिनकी गर्जना से तीनों लोग कांप उठते थे, अब अपनी उस रौदर शक्ती को शरब के चर्णों में सौंप
32:09कर श्रीहरी के शांत स्वरूप में लौट रहे थे
32:13देवताओं ने पुष्प वर्शाकर उस परमरक्षक शिव का अभिनंदन किया, जिन्होंने न केवल देवों के संकट को टाला, बलकी ब्रहमांडिय
32:22समर्स्ता को भी पुनह स्थापित किया
32:25ब्रहमाजी ने अपनी दिव्यवानी में कहा, हे महादेव, आपने आज न्रिसिन्ह के अहंकार को शांत कर, समस्त स्रिष्टी को एक
32:34अनमोल उफार दिया है, संतुलन का उफार
32:38शिव के शरब रूप ने, जो अगनी और वायू का संगम था, न्रिसिन्ह के उग्र तेज को अपनी शीतल, शांत
32:45शक्ती से पूर्णत अवशोशित कर लिया
32:49न्रिसिन्ह का वह विक्राल रूप, जो स्रिष्टी का सहार करने पर उतारू था, शरब की दिव्यता के स्पर्ष मात्र से
32:56शांत हो गया, जैसे प्रचंट ज्वाला शांत जल से बुच जाती है
33:02श्रीहरी ने स्वयन स्वीकार किया, हे भूतनात, आपकी शरब अवतार की शक्ती असीन है, जिसने मेरे क्रोध को भी विनमर्ता
33:11में बदल दिया
33:13नारद मुनिक वीना हाथों में लिए, मधुर स्वर में बोले, यह शिव की लीला का एक और अध्भुत रूप है,
33:20जो विघनों को हरता है, और धर्म की पुनह स्थापना करता है
33:26शारभेश्वर के रूप में शिव ने अपने पंखों को समेट लिया, मानो वह कह रहे हों कि अब नरिसिन्ह के
33:32क्रोध का कोई अस्तित्व नहीं रहा, केवल शान्ती शेश है
33:37विश्णु अपने शांत चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुए, जिनका वर्ण घनश्याम था और जिनके हाथों में शंक, चक्रत, गदा और
33:46पद्म सुशोभित थे
33:48शरब के मुख से निकले कमल के पुश्पों की वर्षा हुई, जो नरिसिन्ह के शान्त हरिदय का प्रतीक थे, जहां
33:55अब कोई द्वेश नहीं, केवल प्रेम और करुना थी
34:00असुरों के हृदय में कापते हुए, उन्होंने देखा कि उनका रक्षत, निसिन्ह, अब उस भयंकर महादेव के समक्ष शान्त खड़ा
34:08है, जिसने उन्हें भी भयभीत कर दिया था
34:12शिव ने न्रिसिन्ह को अपने एकाकार स्वरूप में विलीन कर लिया, मानों वे दोनों एक ही चेतना के दो पहलू
34:19हों, जो स्रिष्टी की रक्षा के लिए सदैव तत पर रहते हैं
34:24यह मिलन्त न्रिसिन्ह के क्रोध का अंत और शिव की परमदया का प्रमाण था, जिसने समस्थ त्रिलोक में शान्ती और
34:32सुव्यवस्था की पुनर्स्थापना की
34:35श्रीहरी के मुख से निकली यहवानी, स्रिष्टी के कंकन में गूँज उठी, अब मैं शान्त हूँ, मेरे हृदय में केवल
34:42प्रेम और करुणा का वास है, महादेव की क्रिपा से
34:47देवताओं ने कर्तल ध्वनी से महादेव की जैजैकार की, उस शिव की जिसने न केवल निरिसिन्ह के अहंकार को तोड़ा,
34:55बलकि अपनी लीला से ब्रहमांड को बचाया
34:59शरब अवतार के रूप में शिव की वह अदमय शक्ती अब शान्त हो गई थी, मानो एक प्रचंड तूफान के
35:06थम जाने के बाद चारों और फैली असीम शान्ती का अनुभव हो रहा हो
35:11यह घटना ब्रहमांडी इतिहास में अनकित हो गई कि कैसे महादेव ने अपने रौद्र और शान्त दोनों स्वरूपों से स्रिष्टी
35:20का संतुलन बनाये रखा
35:21और इस प्रकार शरब अवतार की लीला समाप्थ हुई जिसने न केवल एक भयंकर संकट का समाधान किया बलकि शिव
35:31की असीम करुणा और शक्ती का भी परिचय दिया
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