इस रहस्यमयी एपिसोड में, गृहपति अवतार के बाद, देवराज इंद्र अपनी प्रचंड विजय से अहंकार में डूब जाते हैं! 👑 जब उनका अभिमान ब्रह्मांड के संतुलन को तोड़ने लगता है, तब महादेव को लेना पड़ता है अपना सबसे गुप्त और वैराग्यपूर्ण अवतार - अवधूत अवतार! 🧘♂️ एक रहस्यमय संन्यासी के रूप में शिव, इंद्र को विनम्रता, वैराग्य और वास्तविक ज्ञान का पाठ कैसे पढ़ाते हैं? देखें कैसे शिव का अवधूत रूप, इंद्र के घमंड को चूर-चूर कर देता है और ब्रह्मांड में फिर से संतुलन स्थापित करता है! क्या इंद्र सीख पाएंगे परम ज्ञान? #ShivaPurana #AvadhutaAvatar #LordShiva #Indra #HinduMythology #MythologicalSeries #Devotion #Spirituality #Mahadev
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00:00ग्रहपती अवतार के महान उपदेशों के बाद ब्रहमांड में एक अद्भुत शान्ती और सद्भाव का स्वर्गिय सामराज्य स्थापित हो गया
00:08था, जहां हरकन आनन से स्पंदित हो रहा था।
00:13स्वर्गलोग के दिव्य उद्ध्यान सुगंधित फूलों से महक रहे थे, जहां देवगण और अपसराय मधुर संगीत और नृति में लीन
00:21ग्रहपती के ज्यान से प्राप्त शान्ती का उच्सव मना रहे थे।
00:26किन्तु यह स्वर्गिय शान्ती अधिक समय तक न टिक सकी, क्योंकि पाताल से एक भीशन अंधकार में उर्जा का उदे
00:34हुआ, जिसने पूरे ब्रहमांड में आतंग की लहर दोडा दी।
00:38उस भयावह असुर के पच्चाप से प्रित्वी काप उठी और स्वर्गलोग तक में भय की एक गहरी चाया चा गई,
00:46जिससे देवों के हृदय में चिंता घर कर गई।
00:50देवगन भयभीत होकर एकत्र हुए, उनकी सभा में सन्नाटा पसरा था, हर कोई एक ऐसे नायक की तलाश में था
00:58जो इस विकट संकट का सामना कर सके और ब्रहमांड को बचा सके।
01:03तब एक शानदार आभा के साथ, देवराज इंद्र अपने सिनहासन से उठ खड़े हुए, उनकी आखों में संकल्प की चमक
01:11और मुख पर अदमें आत्म विश्वास झलक रहा था, मानो वे ही इस चुनौती का एक मात्र उत्तर हो।
01:18इंद्र ने अपनी विशाल सेना को युद्ध के लिए संगठित किया, दिव्य अस्त्रशस्त्रों की गड़गडाहट और देवों के रणभेदी नारों
01:27से स्वर्गलोक गूंध उठा, जो उनकी द्रिडता और शक्ती का प्रतीक था।
01:33दिव्य तुरियों की ध्वनी और शंकनाद के साथ, देवराज इंद्र अपने एरावत हाथी पर सवार होकर युद्ध भूमी में प्रविष्ठ
01:41हुए, उनकी उपस्थिती मात्र से ही असुरों के हृदय में कमपन होने लगा।
01:46तत पश्चात, देवों और असुरों की सेनाए एक दूसरे से टक्राईं, जिससे युद्ध भूमी में भयानक गर्जनाए, अस्त्रों का घर्षन
01:55और चीक पुकार का ऐसा कोलाहल भर गया जिसने स्वर्ग और प्रित्वी को हिला दिया।
02:01युद्ध के बीचों बीच, इंद्र का सामना उस भयंकर असुर से हुआ, जो क्रोज से धधक रहा था और अपनी
02:09विशालकाई आकृती से पूरी युद्ध भूमी पर हावी था, मानो वह विनाश का साक्षात रूप हो।
02:15इंद्र और उस असुर के बीच एक भीशन द्वंद्व आरंभ हुआ, जहां दिव्य शक्ती और आसुरी बल का टक्राव हो
02:24रहा था, जिसकी प्रचंड उर्जा से त्रिलोक काप उठे।
02:28अपनी पूरी शक्ती का आहवान करते हुए, इंद्र ने अपना वजर उठाया और एक गर्जना के साथ उसे असुर पर
02:36प्रहार किया, जिससे आकाश में कड़कडाहट गूंच उठी और आसुरी अंधकार छिन्नभिन हो गया।
02:43वजर के भीशन प्रहार से वह भयंकर असुर एक भयानक छीख के साथ धराशाई हो गया, उसका शरीर राख और
02:51धूल में मिलकर ब्रहमांडिय उर्जा में विलीन हो गया, जिससे अंधकार का अंथ हुआ।
02:57असुर के पतन होते ही, देवों की सेना में एक जोरदार विज्य भोश गूंड उठा, और स्वर्गलोक में हर्शोल लास
03:05की लहर दोड़ गई, जहां हर देव ने इंद्र की महिमा का गुनगान किया।
03:10अपनी प्रचंड विजय के बाद, देवराज इंद्र एक विजी राजा की भाती अपनी भव्य रत पर सवार होकर स्वर्गलोक लोटे,
03:19जहां उनके स्वागत में शंखनाद और पुश पवर्शा हो रही थी।
03:24स्वर्ग के भव्य दर्बार में, इंद्र अपने इंद्र निल्मनी जटित सिनहासन पर विराजमान थे, जहां देवगण और गंधर्व उनके शौर्य
03:33और पराक्रम की स्टुती कर रहे थे।
03:36देवगणों के मुख से निकली अतिश्योक्ति पून स्टुतिया और अतिरंजित प्रशन साय इंद्र के अहंकार को पोशित करने लगी, जो
03:44उनके भीतर धीरे-धीरे जड़े जमा रहा था।
03:48उन स्टुतियों के प्रक्तेक शब्द के साथ इंद्र के मुख पर एक सुक्ष्म परिवर्तन आया, उनकी आखों में अब पहले
03:56की विनमर्ता के स्थान पर एक तीखी अहंकारी चमक उतर आई।
04:00उनके मन के भीतर विजय और शक्ती के विचारों का एक प्रचंड तूफान उठने लगा, जिससे उनका अहंकार एक विशाल
04:09अनियंत्रित अगनी के समान भड़क उठा।
04:13इस बढ़ते हुए अभिमान ने ब्रह्मांडिय संतुलन को बाधित करना शुरू कर दिया, जिससे दूर कहीं, तारों के बीच एक
04:21सुक्ष्म किन्तु अशुब कमपन महसूस होने लगा।
04:25अपनी विजय के प्रचेंड गर्जना में डूबा, देवराज इंद्र स्वर्ग के स्वर्ण सिनहासन पर आरूड थे, उनका तेजस्विता से दमकता
04:33वजर उनके हाथों में शक्ती का प्रतीक बनकर चमक रहा था।
04:38उनकी आँखों में अदमय गर्व की अगनी प्रजवलित थी, जो उनके अहंकार की ज्वाला को और भी प्रचेंड कर रही
04:45थी, जैसे स्वर्ग के समस्त वैभव को उन्होंने स्वया अर्जित किया हो।
04:51अन्य देवता और रिशिगण जो इस विज्योत्सव में उपस्थित थे, इंद्र के अनियंत्रित प्रदर्शन को देख रहे थे, उनके चहरों
05:00पर धीरे धीरे चिन्ता की हलकी रेखाये उभरने लगी थी।
05:04एक लगु देवता ने जब इंद्र से विनमरता पूर्वक एक प्रार्थना की, तो इंद्र ने उसे अपने अधिकार की तुछता
05:12मानते हुए उपहास भरे स्वर में अस्विकार कर दिया, अपनी सर्वोचता का प्रदर्शन करते हुए।
05:19गरजते हुए इंद्र ने घोशना की की तीनों लोकों में अब कोई ऐसी शक्ती नहीं बची है, जो उनके सम्मुख
05:27खड़ी हो सके, उनकी अजेता का डंका स्वर्ग में गूंज उठा।
05:31तब देवताओं के गुरु महर्शी ब्रिहस्पती ने इंद्र के बढ़ते दर्प को भापते हुए उन्हें विवेक और सन्यम का मार्ग
05:39दिखाने का प्रयास किया, उनकी आखों में गहरा ज्यान जलकता था।
05:44परंतु इंद्र ने ब्रिहस्पती के शब्दों को अनसुना कर दिया, अपनी श्रिष्टता के दंभ में वे किसी भी सलाह को
05:52अपने गौरव के विरुध मान रहे थे, उनकी भिकुटी अहंकार से तन गई थी।
05:58ब्रिहस्पती ने अन्य वरिष्ट देवताओं के साथ अपनी चिंता साजहा की, उनकी आवाज में एक गंभीर चेतावनी थी कि यह
06:06अनियंतृत अहंकार स्वर्ग को विनाश की ओर ले जा सकता है।
06:11इंद्र ने एक भव्य भोज का आदेश दिया, जिसमें देवताओं को अपने एश्वर्य और शक्ती का अन्वरत प्रदर्शन करते हुए,
06:20उनकी सुक्ष्म चेतावनियों को पूरी तरह से नजरंदाज कर दिया।
06:24उन्होंने सभा में उपस्थित सभी से बिना किसी प्रश्ण के उनकी आध्या का पालन करने की मांग की, जिससे स्वर्ग
06:32का वातावर्ण भारी और असहज हो गया।
06:36उनके दम्व से भैभीत होकर, एक गंधर्व संगीतकार ने अपनी वीना बजाते हुए एक क्षण के लिए एक सुक्ष्म त्रुटी
06:44कर दी, जिससे वातावर्ण में सन्नाटा चा गया।
06:48इंद्र की क्रोधित द्रिष्टी ने पूरी सभा को एक पल में भैभीत मौन में डुबो दिया, उनकी शक्ती का आभास
06:55सभी को अपनी अलपता का हैसास करा रहा था।
07:00स्वर्ग की आनंदमय शोभा अब एक अप्रिय तनाव और भै के आवर्ण में ढक गई थी, जहां प्रत्येक मुस्कान के
07:07पीछे एक अदमय भै छिपा था।
07:10देवता आपस में इंद्र के बेलगाम अहंकार और उसके संभावित परिणामों के बारे में फुस्फुसा रहे थे, उनकी आवाजे चिंता
07:19से बोजिल थी।
07:21इंद्र अपने ही गौरव के नशे में चूर, स्वर्ग में बढ़ रही इस अशान्ती और देवताओं के कश्टों से पूरी
07:28तरह अन्भिग्य थे, उनकी आखों में केवल अपनी ही छवी थी।
07:33उन्होंने अपनी सर्वोच्चता की घोशना करते हुए सभी तीनों लोकों को चुनोती दी, यह मानते हुए कि उनकी शक्ती को
07:41अब कोई भी रोक नहीं सकता, उनका दर्प आकाश चू रहा था।
07:47उनके अनियंत्रित अहमकार के कारण ब्रहमांड में सुक्षम गडबडिया और विश्मताय उत्पन होने लगी थी, जैसे प्रकृती स्वय ही उनके
07:56दंभ पर कराह रही हो।
07:59सब्तर्शियों ने एकत रहोकर इंद्र के अनियंत्रित व्यवहार पर गेहन चिंता व्यत्त की, उनके मुख पर आगामी संकट का पूर्वाभास
08:07पश्ट था।
08:09अपने गौरव के शिखर पर चड़कर, इंद्र ने एक प्राकृतिक घटनाया किसी दिव्य आदेश में हस्तक्षेप करने का दुस्सा हस
08:17किया, ब्रह्मांड के स्थापित नियमों को चुनौती देते हुए।
08:22अचानक स्वर्ग लोग के उपर एक गहरा, अशुभ मेगशा गया, जो इंद्र के अनियंत्रित अहंकार के विरुध हासन्न दिव्य हस्तक्षेप
08:30का एक मुख संकेत था।
08:33देवराज इंद्र का अहंकार एक प्रजवलित अगनी के समान तीवर गती से बढ़ने लगा था, जिसकी लप्टें स्वर्ग लोग के
08:41शाश्वत प्रकाश को भी धुंधला कर रही थी।
08:45देवताओं और रिशियों ने, विशेशकर देवगुरु ब्रहस्पती ने इंद्र के इस अनियंत्रित गर्व को ब्रहमांडिय संतुलन के लिए एक गंभीर
08:54खत्रे के रूप में देखा।
08:56देव गुरु ब्रिहस्पती ने विनमरता पूर्वक इंद्र को समझाने का प्रयास किया कि अहंकार का मार्ग केवल विनाश की ओर
09:04ले जाता है, मानो वह अंधकार में भटकने वाली नौका हूँ.
09:09परंतु इंद्र अपने मद में चूर गुरु के शब्दों को अनसुना कर देते हैं, जैसे कोई अभिमानी राजा एक दरबारी
09:17की सलाह को नकार दे.
09:20अपमानित और दुखी मन से देवगुरु ग्रिहस्पती इंद्र की सभा से लौट जाते हैं, मानो आशा का अंतिम दीपक बुझ
09:27गया हो.
09:29अन्य देवता भी भयभीत थे, क्योंकि वे जानते थे कि इंद्र का यह बढ़ता अभिमान अवश्यमभावी पतन का अग्रदूत था,
09:38जो प्रलय की ओर ले जा सकता है.
09:41इसी बीच कैलाश परवत की पवित्र चोटी पर भगवान शिव अपनी गहन समाधी से उठकर ब्रहमान्डिय घटनाओं का अवलोकन करते
09:50हैं.
09:52उनकी तीसरी आख में एक गहन ग्यान की चमक थी, जो इंद्र के बढ़ते हुए गर्व को सपष्ट रूप से
09:59देख रही थी, जैसे प्रकाश अंधकार को बेधता है.
10:04माता पार्वती अपने पती के शांत परंतु गंभीर अवलोकन को समझ कर उनके पास आती हैं, जैसे कोई नदी अपने
10:12सागर की ओर बहती है.
10:15पार्वती के पूछने पर शिव इंद्र के अहंकार और उसके संभावित परिणामों के बारे में बताते हैं, जो ब्रहमांड की
10:23नीम को हिला सकते थे.
10:26माता पार्वती उनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर विश्वास करती हैं, यह जानते हुए कि शिव हमेशा धर्म की रक्षा के
10:34लिए कार्य करेंगे.
10:36शिव अपने ध्यान की गहराई में उतरते हैं, जहां उनका मन ब्रहमांड के हर स्पंदन को महसूस करता है, हर
10:44असंतुलन को पहचानता है.
10:47अचानक उनकी आखों में एक द्रिड संकल्प की चमक कौन्ध उठती है, जैसे ब्रहमांडिय न्याय का एक नया अध्याय खुलने
10:56वाला हो.
10:57भगवान शिव अपने आसन से उठते हैं, उनके चारों और एक अलौकिक शक्ती का आवर्ण बन जाता है, जो उनके
11:05आगामी कार्य की घोशना करता है.
11:09इधर स्वर्ग लोक में देवता अभी भी इंद्र के व्यवहार से चिंतित थे, अपनी नेती से अन्भिग्य जैसे तूफान से
11:17पहले की शांत लहरें.
11:19इंद्र इस बीच अपने स्वर्गिय महल में अपसराओं और गंधर्वों के साथ आनन्द मनाते हैं, अपने अहंकार के स्वर्ण जाल
11:28में और भी अधिक फंस्ते जा रही हैं.
11:32ब्रहमांड में एक सुक्ष्म कमपन होता है, जो केवल सबसे समवेदनशील रिशियों और प्राणियों द्वारा महसूस किया जाता है, जो
11:40एक आसन्य परिवर्टन का संकेत देता है.
11:45कैलाश पर शिव अपनी अवधूत मुद्राधारन करने की तयारी करते हैं, उनके चारों और दिव्य उर्जा घूमती है, एक शक्तिशाली
11:54परिवर्टन का अग्रदूत.
11:56अवधूत रूप की पहली जलक दिखाई देती है, अभी भी रहस्यमय धंग से धकी हुई है, लेकिन अकल्पनिय शक्ति का
12:04विकिरण कर रही है.
12:07भगवान शिव एक निश्चित परोपकारी द्रिश्टी के साथ खड़े हैं, अहमकार का नाश करने और इंद्र को विनमर्ता का पाठ
12:15पढ़ाने के लिए तयार.
12:18देव लोग के शिखर पर स्थित, एरावत के श्वेत दंतों से भी उजजवल, इंद्र का सुवर्ण मंडित दर्बार अपनी भव्यता
12:25और एश्वर्य से ब्रहमांड को चकाचौन्ध कर रहा था.
12:30महाबली इंद्र स्वयन को तीनों लोकों का अध्वितिय अधिपती घोशित करते हुए अपनी विज्यों और पराक्रम का बखान कर रहे
12:38थे, मानों उनके पराक्रम की गाथाए स्वया आकाश में गूंज रही हों.
12:44देव, गंधर्व और अपसराये उनकी प्रत्येक पंक्ती पर तालिया बजाकर या सिरहिलाकर उनकी प्रशंसा कर रहे थे, पर कुछ रिशियों
12:53के मुख पर चिंता की हलकी रेखाये साफ दिख रही थी.
12:58इंद्र का अहंकार अपने चरम पर पहुँच कर अब केवल शब्दों में नहीं, बलकि उनके तेजों में आभामंडल में भी
13:06स्पष्ट रूप से जलक रहा था, जो दर्बार की प्रत्येक वस्तु को अपनी चमक से फीका कर रहा था.
13:13अचानक दर्बार के केंद्र में, जहां इंद्र की वानी की गूंच चरम पर थी, वहां एक सुक्ष्म किन्तु अलोकिक उर्जा
13:21का स्पंदन हुआ, मानो समय एक क्षण के लिए ठहर गया हो.
13:26पलक जपकते ही, एक तेजस्वी, शांतचित अवधूत, जिनके रोमरों से विरक्ती और दिव्यता का तेज प्रवाहित हो रहा था, इंद्र
13:35के भव्य सिन्हासन के ठीक सामने प्रकट हो गए.
13:39उनकी अप्रत्याशित उपस्थिती ने दर्बार में गहरी चुप्पी और एक अजीबोगरीब असहचता घोल दी, जहां कुछ क्षण पहले तक केवल
13:48इंद्र की अहंकारी वानी गूंज रही थी.
13:51अवधूत का व्यक्तित्व परवत सा अटल और सागर सा शांत इंद्र के वैभवशाली दर्बार की चकाचौंध को सहेज ही निगल
13:59रहा था, बिना किसी प्रयास के.
14:03उनकी दिव्य उपस्थिती से निकली अनासक्ती की तरंगें, इंद्र के घमंड और भौतिक तावादी परिवेश के बिलकुल विप्रीट दर्बार में
14:11एक अजीब सी शांती फैला रही थी.
14:15इस रहस्यमय अवधूत की अविचलित स्थिर्ता ने इंद्र के मन में न सिर्फ भ्रम उत्पन किया, बलकि एक गहरी अंचाही
14:23बेचैनी भी पैदा कर दी.
14:25इंद्र ने अपनी आखों में अंचाही घबराहट छुपाते हुए, उन्हा अपनी बात शुरू करने का प्रयास किया, पर उनके शब्द
14:33वायू में ही बिखर गए, अपनी शक्तिक हो चुके थे.
14:38अवधूत की द्रिष्टी, ब्रहमांड के रहसियों सी गहरी और अटल, इंद्र के भीतर गहरे पैठ गई, उनके अहंकार की नीम
14:46को हिलाते हुए.
14:48धीरे-धीरे, इंद्र के दर्बार की चमक फीकी पढ़ने लगी, और उनकी गर्वीली वानी के स्थान पर एक अजीबोग्रीब भारी
14:56खामोशी चा गई.
14:58इंद्र को महसूस हुआ कि इस शान्द तपस्वी की उपस्थिती ने उनकी सारी शक्ती और गौरव को सोख लिया है,
15:06और उनके भीतर एक प्रचंड क्रोध उबर रहा था.
15:10अवधूत का अनासक्त तेज अब पूरे दर्बार में चा गया था, प्रत्येक कोने को अपनी पवित्रता से भर रहा था,
15:18मानों इंद्र के गौरवशाली सिनहासन को भी छोटा कर रहा हो.
15:22देव, गंधर्व और अपसराय जोक्षन भर पहले इंद्र की चापलूसी कर रहे थे, अब अवधूत के समक्ष भय और श्रधा
15:31के मिश्रण से मौन खड़े थे.
15:34इंद्र के मुख से अब कोई शब्द नहीं निकल रहा था, उनकी सारी शक्ती, उनका सारा गौरव, इस शांत तपस्वी
15:41की मौन उपस्थिती के सामने धराशाई हो गया था.
15:46अवधूत किसी भी सांसारिक वस्तु से अनासक्त, अपनी उसी शांत और अविचलित मुद्रा में खड़े थे, मानो उनके लिए इंद्र
15:54का दर्बार और एक साधारन कुटिया एक समान हो.
15:59इंद्र का दंभ, जो क्षण भर पहले आकाश चू रहा था, अब तूटकर धूल में मिल चुका था, इस रहस्यमय
16:06अवधूत की मौन किन्तु प्रचंड उपस्थिती ने उसे चूर-चूर कर दिया.
16:11दर्बार में केवल अवधूत की अनासक्ती का मौन सामराज्य फैला हुआ था, जिसने इंद्र के घमंड के पूरे महल को
16:19क्षण भर में ढहा दिया था.
16:22इंद्र अपने स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान तीनों लोकों के स्वामी होने के घमंड में चूर, देवगणों से घिरे वैभव और
16:30शक्ती का जीवन्त प्रतीक थे.
16:33अचानक उनकी भव्य सभा के मध्य एक धूल-धूसरित साधारन सा अवधूत प्रकट हुआ, जिसकी उपस्थिती ने क्षण भर के
16:41लिए स्वर्गिय शान्ती को भंग कर दिया.
16:44इंद्र की दृष्टी जब उस उपेक्षित अवधूत पर पड़ी, तो उनके भव्य चहरे पर तिरसकार की एक हलकी सी लहर
16:52दौड गई, मानो कोई तुछ कीट उनकी सभा में आघुसा हो.
16:57देवगणों में फुस्फुसाहट फैल गई, कुछ भयभीत, कुछ जिग्यासु उस अद्भुत अवधूत के अलौकिक तेज को पहचानते हुए भी, जिसकी
17:06विनमर्ता इंद्र के अहंकार से टक्रा रही थी.
17:10क्रोध से तम्तमाएं इंद्र ने अपनी भव्यता का प्रदर्शन करते हुए, उस साधारन दिखने वाले अवधूत को सीधे संबोधत किया,
17:18उनकी वाणी में घमंड की तीखी ध्वनी गूंज रही थी.
17:23हे अजन्बी, तुम कौन हो और किस अधिकार से मेरी पवित्र सभा में बिन बुलाय प्रवेश कर गए हो, इंद्र
17:31ने अपनी आवाज में तीखापन घोलते हुए पूछा.
17:35अवधूत ने इंद्र की कटूवानी का कोई प्रत्युक्तर न दिया, उनके मुख पर गेहन मौन और एक असीम शान्ती चाई
17:42रही, जो इंद्र के क्रोध को और भी भढ़का रही थी.
17:47यह मौन इंद्र के अभिमान पर एक सीधा प्रहार था, जिसने उनके अंदर के अहंकारी अगनी को और भी तीवर
17:55कर दिया, उनकी आखें क्रोध से लाल हो गई.
17:59अपने अपमान को असहनिये पाकर, इंद्र ने एक बार फिर अवधूत की ओर देखा और चिल्लाए, क्या तुम बहरे हो
18:06या जानबूच कर मेरी आज्या की अवहलना कर रहे हो, हे तुछ प्राणी.
18:11इस बार अवधूत ने अपनी आखें खोली और इंद्र की ओर देखा, उनकी आखों में ब्रहमान की गहरी समझ और
18:20एक रहस्यमय मुस्कान छिपी थी.
18:23अवधूत के होंठिले और उन्होंने गूर शब्दों में कहा, मैं वहां से आया हूँ जहां से सभी आते हैं, और
18:30वहां जा रहा हूँ जहां सभी को जाना है.
18:34इंद्र अपने अहंकार में अंधे होकर इन गहरे शब्दों का अर्थ समझने में असफर रहे, उनके लिए ये केवल एक
18:42असभ्य व्यक्ती के निरर्थक बड़बडा हट थी.
18:45उनके चहरे पर घ्रिणा की रेखाए और भी गहरी हो गई, उन्होंने अवधूत को पूरी तरह से मूर्ख और अपने
18:53अज्ञान में लीन समझा.
18:55क्या तुम अपना परिचय देने योग्य भी नहीं हो, या तुम्हारा ज्ञान केवल असपष्ट पहलियों तक ही सीमित है, इंद्र
19:03ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.
19:06अवधूत का चहरा शांत और स्थिर रहा, उनकी आखें इंद्र के अहंकार को नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी हुई कमजोरियों
19:15और अज्ञानता को देख रही थी.
19:18यह अवधूत का शांत और अविचलित व्यवहार इंद्र के लिए एक व्यक्तिगत चुनौती बन गया, जिससे उनका अहंकारी स्वभाव आग
19:26बबूला हो उठा.
19:28निकल जाओ मेरी सभा से मूर्ख तपस्वी.
19:33तुम्हारी उपस्थिती इस दिव्यस्थान को अपवित्र कर रही है, इंद्र ने गरच्ते हुए आदेश दिया.
19:40देवगणों में एक सिहरन दोड़ गई, कुछ चिंतित होकर अवधूत की ओर देख रहे थे, मानों उन्हें आने वाले किसी
19:48अनिष्ट का आभास हो गया हो.
19:50इंद्र ने अपने अंगरक्षकों को संकेत दिया, और वे विशाल का योध्धा अवधूत को बलपूर्वक बाहर निकालने के लिए आगे
19:59बढ़े.
20:00अवधूत धीरे से अपनी जगह से उठे, उनके मौन में एक ब्रहमांडिय शक्ती और गरिमा थी, जिसने चारों और एक
20:09अद्रिश्य उर्जा का घेरा बना दिया.
20:12फिर बिना एक शब्द कहे, अवधूत ने इंद्र की सभा से प्रस्थान किया, अपने पीछे एक गहरा रहस्य और आने
20:20वाले एक महान परिवर्तन का अद्रिश्य संकेत छोड़ते हुए.
20:25इंद्रदेव की विशाल स्वर्ण सभा के मध्य अवधूत रूपी महादेव अविचल खड़े रहे, मानो कोई असीम पर्वत प्रचंड आन्धी के
20:33समक्ष अडिक खड़ा हो.
20:36अपने ही दर्बार में एक साधु को बिना जुके खड़ा देख, देवराज इंद्र के नेत्र क्रोध से भर गए और
20:43उन्होंने अत्यंत अहंकार से उनका परिचय मांगा.
20:47अवधूत ने बिना किसी भय या संकोच के इंद्र की ओर देखा, जिनकी द्रिष्टी में संसार के सबसे शक्तिशाली राजा
20:55का पद्भी धूल के समान तुछ था.
20:58शांत भाव से अवधूत ने अपना पहला उपदेश दिया कि वास्तविक शक्ती सिनहासनों या मुकुटों में नहीं, बलकि स्वयंके भीतर
21:07की चेतना में नहित होती है.
21:10इंद्र ने अवधूत के वचनों को अपने राजाग्या का अपमान समझा और उपहास उडाते हुए अपने विशाल स्वर्ग लोग के
21:18एश्वर्य की ओर संकेत किया.
21:22अवधूत ने मुस्कुराते हुए इंद्र को स्मरण कराया कि काल के अनंत चक्र में स्वर्ग का यह सिनहासन केवल एक
21:29शनिक स्वपन मात्र है.
21:32दर्बार में उपस्थित सभी देवगण और रिशिमुनी अवधूत के परम ज्यानी तरकों को सुनकर स्थब्ध रह गये और सभा में
21:40गहरा सन्नाटा चा गया.
21:42अवधूत ने अपनी वानी को और तीवर करते हुए सांसारिक सुखों की माया का परदाफाश किया, जो बड़े बड़े सुरों
21:50और असुरों को अंधा कर देती है.
21:54आमकार के आगात से विचलित होकर इंद्र ने अपने वजर पर पकड़ मजबूत कर ली और तारकिक तरकों से अवधूत
22:01का खंडन करने का व्यर्थ प्रयास किया.
22:05अवधूत ने इंद्र के क्रोध को देखते हुए कहा कि शस्त्र और भय केवल दुर्बल मन के आश्रय हैं, जो
22:11सत्य का सामना करने से डरता है.
22:15जैसे जैसे अवधूत का ज्यान प्रवाह बढ़ता गया, उनके शरीर से एक अलौकिक दिव्य प्रकाश निकलने लगा जो संपूर्ण दर्बार
22:24को आलोकित कर रहा था.
22:26उन्होंने अनासक्ती के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वास्तविक मुक्ती और शाश्वत आनंद केवल त्रिशनाओं के त्याग से
22:35ही संभव है.
22:37इंद्र ने अपने वैदिक यग्यों और वर्षा का स्वामी होने का अभिमान जताते हुए उत्तर देने की कोशिश की, किन्तु
22:45उनके शब्द बीच में ही लड़खडा गए.
22:48अवधूत ने इंद्र के कर्मकांडी अभिमान को यह कहकर छिन्नभिन कर दिया कि निशकाम भक्ती के बिना किये गए सभी
22:56अनुष्ठान केवल अहंकार का विस्तार है.
23:00सभा में बैठे देवगुरु ब्रिहस्पती और अन्य महर्शी समझ गए कि यह साधारन अवधूत कोई साधारन साधू नहीं, बलकि स्वयन
23:09ज्यान के देवता है.
23:12अपने समस्त तरकों को निश्फल होता देख देवराज इंद्र निरुप्तर हो गए और उनका राजसी दंभ धीरे-धीरे पिघलने लगा.
23:21अवधूत की बेधक द्रिष्टी ने इंद्र के भीतर छिपे हर एक मिथ्याभिमान को उजागर कर दिया, जिससे वेभीतर तक कांप
23:29उठे.
23:31संपूर्ण अमरावती का दर्बार परम ज्ञान के इस दिव्य प्रकाश में डूब गया और कोई भी अवधूत के समक्ष तर्क
23:38करने का साहस न कर सका.
23:41इंद्र का हाथ वजर पर से धीला पड़ गया और उनके हृदय में क्रोध के स्थान पर एक अंजाने भय
23:47और सत्य की अनुभूती ने जन्म लिया.
23:51ज्ञान के इस प्रचन प्रहार के साथ अवधूत ने इंद्र के मिथ्याभिमान को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और वे
23:58विजय भाव से खड़े रहे.
24:01देवताओं के राजा इंद्र के सम्मुख अवधूत ने अपनी दिव्य अनासक्ती का प्रदर्शन आरंभ किया, जहां उनकी शांत मुद्रा में
24:09संपून ब्रहमांड समाहित था.
24:12अभी भी अहंकार में डूबे, इंद्र अपनी स्वर्णजरित सिनहासन पर बैठे, अवधूत की ओर अविश्वास और क्रोध से देख रहे
24:21थे, उनकी आखों में चुनौती का भाव था.
24:24अपनी गर्जनापून आवाज में, इंद्र ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि वे अवधूत पर सबसे शक्तिशाली दिव्य अस्त्रों का
24:33प्रहार करें ताकि उनकी तपस्या भंग हो सके.
24:37आकाश को भेदता हुआ, पहला दिव्य अस्त्र, अगनिबान एक जलते हुए धूमकेतु की भाती अवधूत की ओर प्रचंड वेक से
24:46लपका, जिससे वायुमंडल में एक चीतकार गूंज उठी.
24:51किन्तु अवधूत अपने ध्यान में अटर रहे, उनकी आखों पर पलक तक नहीं जपकी, जैसे उन्हें आसन्न खत्रे का कोई
24:59भान ही न हो.
25:01अगनिबान अवधूत के शरीर से टकराने से ठीक पहले, एक अद्रिश्य शक्ती द्वारा विलीन हो गया, जैसे कोई मायावी स्वपन
25:09सुभा की धूप में घुल जाएं, बिना कोई निशान छोड़े.
25:14इस चमतकार को देखकर इंद्र का क्रोध और बढ़ गया, और उन्होंने अपने सभी देवानायकों को आदेश दिया कि वे
25:22अवधूत पर सबसे घातक और अप्रतिरोध्य अस्त्रों की वर्षा करें.
25:27ततकाल ही आकाश से दिव्यबानों, चक्रों और शक्ति पुन्जों की एक अविश्वस्निय वर्षा आरम हो गई, जो ब्रहमांड को भेदने
25:36की ख्षमता रखती थी.
25:38अवधूत के चारों और एक अलोकिक स्वर्णनीले प्रकाश का प्रभामंडल प्रकट हुआ, जिसने सभी दिव्य अस्त्रों को बिना स्पर्ष किये
25:47ही भस्न कर दिया.
25:49इंद्र का अहंकार अब निराशा में बदलने लगा, जब उन्होंने देखा कि उनकी सबसे शक्तिशाली सेना और अस्त्रभी अवधूत की
25:58अविचल शान्ती को भंग नहीं कर पाए.
26:01अपनी अंतिमचाल के रूप में इंद्र ने मायावी शक्तियों का सहारा लिया, जिससे स्वर्ग की सबसे सुंदर अपसराय प्रकट हुई,
26:09जो अपने निरित्य और मोहक सौंदर्य से अवधूत को विचलित करने लगी.
26:15किन्तु अवधूत की आखें बंद रही, उनके चहरे पर वही अटल शान्ती और अविचल ध्यान चाया रहा, जैसे ये मोहक
26:23द्रिश्य उनके लिए अस्तित्वहीन हो.
26:26उनकी अनासत्ती के सामने अपसराओं का मायावी सौंदर्य फीका पढ़ने लगा, और एक-एक करके वे शूनिय में विलीन होती
26:35गई, जैसे वे कभी थी ही नहीं.
26:37फिर इंद्र ने सबसे भयावह मायावी शक्तियों का आहवान किया, जिससे अवधूत के चारों और दरावने राक्षसों और भयानक दुहस्वपनों
26:47की दुनिया प्रकट हुई.
26:50राक्षसों की गर्जना और दुहस्वपनों के बीच भी अवधूत के चहरे पर वही अचूती मुस्कान खिली रही, जो उनके अदमय
26:58धैर्य और पूर्ण अनासक्ती का प्रतीक थी.
27:02धीरे धीरे वे डरावनी आक्रितिया भी धूल के कणों की भाती बिखरने लगी, और उनके स्थान पर केवल एक शांत,
27:10ब्रहमांडिय शांती शेश रह गई.
27:13इंद्र का अहंकार पूर्णता ध्वस्थ हो चुका था, उनके भीतर भय की एक गहरी अनुभूती जागरित हुई, ऐसी शक्ती का
27:21अनुभव उन्होंने पहले कभी नहीं किया था.
27:24अवधूत ने धीरे-धीरे अपनी ब्रहमांडिय आखें खोली, उनकी द्रिष्टी में सहसर सूर्यों का तेज और संपून स्रिष्टी का ज्यान
27:33समाहित था.
27:35उनकी द्रिष्टी इंद्र पर पड़ी एक मौन संदेश जिसमें अनासक्ती की शक्ती और सर्वोच्च सत्ता का बोध था, जिससे इंद्र
27:43का हृदय भय और श्रद्धा से भर गया.
27:47उसक्षण इंद्र को अनासक्ती की सच्ची शक्ती का ज्यान हुआ, जो सभी भौतिक संपदा और मायावी मोह से परे थी,
27:55एक ऐसी शक्ती जिससे बड़ा कोई राजाया योध्धा नहीं हो सकता था.
28:00इंद्र अपने स्वर्गिय सिनहासन पर आसीन अब भी अवधूत को एक सामान्य सन्यासी मान कर उसके शांत स्वरूप के पीछे
28:09छिपी परम शक्ती से अन्भिग्य अपने अहमकार में लीन थे.
28:14अचानक अवधूत के आसपास की हवा में एक अलौकिक कमपन उठा, जिससे इंद्र के सबसे पराक्रमी दर्बारी भी विचलित हो
28:22गए, यद्यपी इंद्र ने इसे मात्र एक सन्योग समझा.
28:27अवधूत ने बिना कोई शब्द कहे, एक गेहन द्रिष्टी से इंद्र को देखा, जैसे ब्रहमांड के सारे रहस्य उस एक
28:35पल में खुल गए हो, जिससे इंद्र के मन में पहली बार एक अद्रिष्य चुनौती का बीज बोया गया.
28:42ततपश्चात अवधूत ने ब्रहमांड के जन्म और लै के बारे में ऐसे गूड ज्यान का वर्णन किया, जिसे सुनकर इंद्र
28:49के स्वयन के गुरु ब्रहस्पती भी चकित रह जाते.
28:53इंद्र ने अपने मन में उठ रहे संदेहों को दबाने का प्रयास किया, लेकिन अवधूत के हर शब्द ने उनके
29:00हंकार की दीवार में एक नई दरार पैदा कर दी.
29:05अवधूत ने इंद्र के मन के अनकहे प्रशनों को पढ़ लिया और उनका उत्तर देना शुरू किया, जिससे इंद्र की
29:12आखें विसमय से चौड़ी हो गई, जैसे कोई गहरा रहस्य उजागर हो रहा हो.
29:18इंद्र के दरबारी, जो पहले अवधूत का उफास कर रहे थे, अब दर और श्रद्धा से कापते हुए अवधूत की
29:26अलोकिक उपस्थिती को स्विकार करने लगे.
29:29अवधूत के चारों और एक तेजोमय आभा और भी तीवर हो गई, जिसने पूरे इंद्र लोक को एक दिव्य प्रकाश
29:37से भर दिया, जिससे इंद्र की शक्ती का सिनहासन भी फीका लगने लगा.
29:42इंद्र को अपने ही सिनहासन पर बैठे हुए एक अंजानी बेचैनी और असुरक्षा महसूस होने लगी, जैसे उनका राज्य और
29:51उनका अस्तित्व ही दाव पर लग गया हो.
29:55अवधूत ने शांती से इंद्र के उन अतीत के अहंकार पूर्ण कर्मों का स्मरण कराया, जब उन्होंने रिशिमुनियों और देवताओं
30:03का अनादर किया था, परोक्ष रूप से उनके घमंड की जड़ों पर प्रहार करते हुए.
30:09इंद्र का मस्तिश्क अतीत की उन घटनाओं को याद करके भंवर में घूम गया, जब उनका अहंकार वास्तव में उनकी
30:17हार का कारण बना था, और उनके चहरे पर पश्चाताप की पहली हलकी जलक दिखाई दी.
30:23तभी अवधूत ने अपनी दिव्य शक्ती का एक और प्रचन प्रदर्शन किया, जिससे इंद्रलोक की नीम भिल गई और इंद्र
30:31को ब्रहमांड के विस्तार का एक संक्षिप्ट भयानक दर्शन प्राप्थ हुआ.
30:37इंद्र के हाथ में उनका वजर, जो कभी अजे शक्ती का प्रतीक था, अब एक निर्जीव और भारहीन वस्तु के
30:44समान प्रतीत होने लगा, उसकी चमक पूरी तरह से मंद पड़ गई.
30:49उनके सिर पर रखा भव्य मुकुट, जो उनके शासन और गौरव का प्रतीक था, अब उन्हें एक असहनिय बोज लगने
30:57लगा, जैसे वह उनके अहमकार का भारीपन स्वय वहन कर रहा हो.
31:03अवधूत की शांत, भेदक द्रिष्टी ने इंद्र के आत्मसम्मान की अंतिम परत को भी भेद दिया, जिससे वे अपनी समस्त
31:10मूर्खता और अनादर को सपश्ट रूप से देखने लगे.
31:15उसक्षण इंद्र को अपने सीमित अस्तित्व का भान हुआ, उन्होंने महसूस किया कि वे ब्रहमान की इस विराट लीला में
31:23एक धूल के कंड से अधिक कुछ नहीं थे.
31:26इंद्र की आखों से आसू बहने लगे, जो उनके वर्षों के अहंकार की पिघलती हुई परते थी, एक शुद्ध पश्चाताप
31:34की धारा जो उनके हृदय को धो रही थी.
31:38अपने सिनहासन से धीरे-धीरे उतरते हुए, इंद्र ने अपने शाही परिधानों को जैसे त्याग दिया हो, उनके कदम पहले
31:46हिचकी चाते हुए, फिर द्रिडता से अवधूत की ओर बढ़े.
31:50इंद्र अवधूत के चर्णों में गिर पड़े, उनके हाथ श्रधा और विनय से जुड़े हुए थे, यह समझते हुए कि
31:58यह कोई सामान्य सन्यासी नहीं, बलकि एक परम दिव्य सत्ता है.
32:03अवधूत ने इंद्र को अपनी करुणा भरी द्रिष्टी से देखा, उनके चहरे पर एक हलकी मुस्कान थी, जैसे एक पिता
32:11अपने भ्रमित बच्चे को क्षमा कर रहा हो, और इंद्र के मन में शांती का एक अथा सागर उमड पड़ा.
32:19जब देवराज इंद्र अपने समस्थ अहंकार को त्याग कर अवधूत के चर्णों में दंडवत प्रणाम करते हैं, तब उनके नेत्रों
32:27से पश्चाताप के अश्रु बहने लगते हैं.
32:31गुरु ब्रिहस्पती भक्तिभाव से अपने हाथ जोड कर उस रहस्यमई योगी से इंद्र के प्राणों की रक्षा करने और अपने
32:39वास्तविक दिव्यरूप को प्रकट करने की नमर प्रार्थना करते हैं.
32:44अवधूत के मुख पर छाया हुआ भयंकर क्रोध धीरे धीरे शान्त होने लगता है और उनके तपस्वी चहरे पर एक
32:52परम करुनामई मुस्कान तैर उठती है.
32:56देखते ही देखते अवधूत के शरीर से असीम और दिव्य प्रकाश की सहसरों किरने निकलने लगती हैं, जो संपूर्ण आकाश
33:04और प्रित्वी को आलोकित कर देती हैं.
33:08उस्तीवर और जाज्वल्यमान प्रकाश के भंवर में अवधूत का साधारन दिगंबर रूप विलीन होने लगता है और एक अलोकिक नीली
33:17कांती उभरती है.
33:20प्रकाश के शान्थ होते ही साक्षात देवाधिदेव महादेव अपने अत्यंत भव्य, सुन्दर और चारु स्वरूप में प्रकट हो जाते हैं.
33:30भगवान शिव के ललाट पर सुशोभित तीसरा नेत्र अब समहारक अगनी उगलने के बजाए परमज्यान और असीम शान्ती की किरने
33:38बिखेर रहा था.
33:40साक्षात त्रिलो की नाथ शिव के दर्शन पाकर राजा इंद्र का हृदय परमभक्ती और श्रद्धा से भर जाता है और
33:47वे अपलक उन्हें नहारते रहते हैं.
33:51महादेव के एक हाथ में दिव्यत रिशूल चमक रहा था, जटाओं में अर्धचंद्र और गंगा विराजमान थी, तथा गले में
33:59लिप्टा वासुकी नाग शान्त बैठा था.
34:03भगवान शिव अत्यंत गंभीर और मेगगर्जन जैसी दिव्यवानी में इंद्र को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अहंकार विवेक को
34:11नश्ट कर देता है.
34:13शिव जी समझाते हैं कि स्वर्ग का सिन्हासन कोई उपभोग का साधन नहीं, बलकि समस्त ब्रहमांड में धर्म और न्याय
34:21की स्थापना का पवित्र दायत्व है.
34:25परमिश्वर शिव के इस अलौकिक प्रक्टीकरण को देखकर आकाश से गंधर्व और अपसराय सुगंधित पारिजात पुष्पों की वर्शा करने लगते
34:34हैं.
34:35देवगुरु ब्रहस्पती अपने मस्तक को भूमी पर टिका कर महादेव की महामहिम स्थुती गाते हैं और उनकी अनंतानंत कृपा का
34:44धन्यवाद करते हैं.
34:47कृपासागर भगवान शिव अपना अभय हस्त उठाकर इंद्र को क्षमादान प्रदान करते हैं और उनके मन से मृत्यु का भय
34:55पूर्णतह मिटा देते हैं.
34:58इंद्रपुनह आगे बढ़कर भगवान शिव के पवित्र चरण कमलों का स्पर्श करते हैं और उनके भीतर फैली अज्यान की कालिमा
35:06सदा के लिए समाप्थ हो जाती हैं.
35:10महादेव इंद्र को स्मरण कराते हैं कि सच्चा बल केवल विनमर्ता, अनासक्ती और निशकाम करतव्यपालन में ही नहित होता है.
35:19भगवान शिव के दिव्य मंडल से निकलती हुई स्वर्णेम और नीली तरंगे पूरे हिमालय परवत शेत्र को एक पवित्र उर्जा
35:27से सराबोर कर देती हैं.
35:30इंद्र एक नए ज्यान और चेतना के साथ खड़े होते हैं, उनका मुख मंडल शांत है और उनका अभिमान सदा
35:38के लिए भस्म हो चुका है.
35:41अपने अवतार के उद्देश को पूर्ण कर भगवान शिव एक दिव्य जोतिह पुंज में परिवर्तित होकर कैलाश परवत की ओर
35:49अंतरध्यान होने लगते हैं.
35:52इंद्र और ब्रिहस्पती दोनों भाव विभोर होकर उस गगन्चुंबी प्रकाश स्तंभ को प्रणाम करते हैं, जो शिव के अविनाशी सत्य
36:01का प्रतीक बन चुका था.
36:03शिव का भयानक अवधूत रूप धीरे-धीरे शान्थ होने लगा और उनके भीतर से आदियनंत परमेश्वर शिव का अत्यंत दिव्य
36:11और मनमोहक स्वरूप प्रकट होने लगा.
36:15भगवान शिव का वह विराट रूप आकाश से भी उचा दिखाई दे रहा था, जिसके मस्तक पर चमकता हुआ चंद्रमा
36:22और कंठ में लिप्टे सर्प उनके आदिन सौंदर्य को बढ़ा रहे थे.
36:28देवराज इंद्र का समस्ट अहंकार तिनके की तरहे बिखर गया और वे कापते हुए घुटनों के बल गीली धर्ती पर
36:35गिर पड़े.
36:37पश्चाताप की अगनी में जलते हुए इंद्र की आँखों से आसुओं की धारा बहने लगी और उनका मस्तक शर्म से
36:44जुप गया.
36:45इंद्र ने अत्यंत व्याकुल होकर अपने दोनों हाथ जोड लिये और अपनी अज्ञानता व अहंकार के लिए भगवान शिव से
36:53जीवन की भीख मांगने लगे.
36:56देवगुरु ब्रहस्पती ने भी इंद्र के समीप आकर भगवान शिव की क्रोधगनी को शांत करने के लिए वेदोक्त मंत्रों का
37:04सस्वर पाठ करना प्रारंभ किया.
37:07देवराज इंद्र की सच्ची व्याकुलता और पश्चाताप को देखकर महादेव का क्रोध शांत होने लगा और उनके चारों और जल
37:16रही प्रलेकारी अगनी एक शीतल सुनहरी आभा में बदल गई.
37:21क्रिपालु शिव ने अत्यंत करुणा के साथ मुस्कुराते हुए अपने हाथ में धारन किये हुए दैविय त्रिशूल को नीचे कर
37:28लिया, जो उनकी क्षमा का प्रतीक था.
37:32महादेव ने अपनी मेग जैसी गंभीर किन्तु अत्यंत मधुरवानी में इंद्र को सीख दी की सच्चा वैभव अहंकार में नहीं,
37:40बलकी धर्म और विनमर्ता में नहित है.
37:44भगवान शिव ने अपना दिव्याहाथ आगे बढ़ाया और भय से कापते हुए देवराज इंद्र को सनहपूर्वक भूमी से उपर उठाया.
37:53महादेव की कृपाग्रिष्की पड़ते ही इंद्र के मन का सारा अंधकार और भय समाप्थ हो गया और उनका संपूर्ण शरीर
38:01एक अलौकिक उर्जा से भर उठा.
38:04शिव ने इंद्र को उनके देवराज पद पर पुनह स्थापित होने का वर्दान दिया और आशिरवाद दिया कि वे भविश्य
38:12में सदैव न्याय और मर्यादा के मार्ग पर चलें.
38:16भगवान शिव की असीन करुणा को देख कर इंद्र कृत ग्यता से भर गए और उन्होंने महादेव के चर्णों का
38:23स्पर्ष कर उन्हें बारंबार प्रणाम किया.
38:27इस पावन घटना की स्मृती को अमर बनाने के लिए भगवान शिव ने उसी स्थान पर अपने तेज से एक
38:34अत्यन्त भव्य और दिव्य शिव लिंग प्रकट किया.
38:38यह अलौकिक शिव लिंग दिव्य नीली और सुनहरी किर्णों से जगम गाने लगा, जिसे देखकर समस्त ब्रहमांड में शान्ती का
38:46संचार हो गया.
38:48आकाश से देवताओं और गंधर्वों ने पुष्पों की वर्षा शुरू कर दी और चारों और हर हर महादेव और अवधूतेश्वर
38:56शिव के जैकारे गूंजने लगे.
38:59देवराज इंद्रने श्रधा पूर्वक गंगाजल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हुए उस नवस्थापित अवधूतेश्वर लिंग का पहला अभिशेक संपन्न किया.
39:10अवधूतेश्वर लिंग से निकलने वाली दिव्यत अरंगों ने तीनों लोकों में व्याप्त अहंकार, इरश्या और अंधकार का सम्मूल नाश कर
39:17दिया.
39:19परमिश्वर शिव अपने विराट रूप को समेकते हुए मंदमंद मुस्कुराएं और अंत्त उस जाजवल्यमान अवधूतेश्वर लिंग में ही विलीन हो
39:27गए.
39:29आज भी वह पवित्र अवधूतेश्वर लिंग मनुश्यों और देवताओं के लिए त्याग, ज्यान और निरहंकारिता के शाश्वत प्रतीक के रूप
39:37में पूजनिया है.
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