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Following the humbling of the Devas, Sage Suta narrates the legendary manifestation of Shiva's Pippalada avatar. Born under a sacred Peepal tree to Sage Dadhichi and his wife Swacha, young Pippalada learns that his tragic childhood and the loss of his parents were caused by the harsh planetary transition of Shani Dev (Saturn). Fueled by righteousness, Pippalada performs immense penance, confronts Shani Dev in an epic cosmic battle, and forever changes the laws of planetary influence. Watch the incredible story of how Shani Dev was humbled and why he never affects children under the age of sixteen!

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Transcript
00:00नमिशारने के घनेवनों में जहां रिशिमुनियों की सभाका आयोजन हुआ था वहां यक्ष अवतार की कथा सुनने के बाद जिग्यासूओं
00:08ने अपने मुखमंडल पर विस्मय के भाव लिए एक नवीन कथा का आरंभ करने है तू प्रभु श्री सूत जी
00:15से विनमर निवे
00:33जिन्होंने ग्रहों के स्वामी शनिदेव को भी अपनी लीला से चकित कर दिया था यह अवतार तब प्रकट हुआ जब
00:41ग्रहों की चाल और नक्षत्रों का संरेखन ब्रहमांडिय व्यवस्था के तानेबाने को भेद रहा था और स्वयन शनिदेव अपने अहंकार
00:49में डू
00:59जिन्होंने अत्यंत करुणा से महादेव से एक पुत्र की आचना की।
01:28प्रकट किया जो स्वयन शक्ती और ज्ञान का पुंच था। उस बालक का तेज इतना प्रचंड था कि मानो सूर्य
01:37स्वयधरा पर अवत्रित हो गया हो और उसका मुखमंडल पिपल के पत्तों के समान कोमल होने के कारण उसे पिपलाद
01:44नाम से जाना गया।
01:47पिपलाद ने बालेकाल से ही असीम ज्ञान और शक्ती अरजित की, वेदों का सार उनके कंठ में था और शिवतत्व
01:54का प्रकाश उनके हृदय में।
01:57ग्रहों के अधिपती शनिदेव जो अपने अधिकार के गर्व में चूर थे, उन्होंने जब सुना की एक मनुष्य पुत्र ने
02:05ग्रहों के विधान को चुनौती दी है, तो उनका क्रोध ज्वाला की भांती प्रजवलित हो उठा।
02:12अहंकारी शनिदेव ने निश्चय किया कि वे इस ननहे बालक को अपनी नवगरह की यात्रा से विस्थापित कर देंगे और
02:20उसे ब्रहमांडिय नियमानुसार गंडित करेंगे।
02:23अपने अहंकार से प्रेरित होकर शनिदेव अपने विक्राल वाहन पर सवार होकर पिपलाद की खोज में प्रित्वी की ओर बढ़े
02:32उनका आगमन मात्रही भाय और आतंक का संचार करने के लिए परियाप्त था।
02:38जैसे ही शनिदेव पिपलाद के आश्रम के पास पहुँचे, प्रकृती स्वय कांप उठी, हवाय रुप गई और काली घटाओं ने
02:46सूर्य को ढख लिया, मानो आने वाले महा संग्राम की सूचना दे रही हो।
02:52परंतु पिपलाद जो स्वयन शिव का अंश थे, वे भैभीत न हुए, अपितु अपने तेज से शनिदेव के आगमन से
03:00उत्पन अंधकार को चीरते हुए, वे अपने ध्यान से उठे।
03:05शनिदेव ने पिपलाद को अपने दिव्य तेज से अभिभूत करने का प्रयास किया, परंतु पिपलाद का तेज तो स्वयन शिव
03:13के त्रिशूल की भांती अचल और अप्रतिन था।
03:17तब पिपलाद ने अपनी अलोकिक शक्तियों का आहवान कर शिव के परमस्त्र पिपलास्त्र को प्रकट किया, जिसका वेग ब्रहमांड की
03:26सीमाओं से परे था।
03:28दोनों के मध्य एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, पिपलाद का पिपलास्त्र और शनिदेव का कालदंड ब्रहमांडिय नियमों को चुनौती दे
03:37रहे थे, उनकी शक्ती का टकराव नक्षत्रों को कमपित कर रहा था।
03:42युद्ध के चरम पर पिपलाद ने अपनी सारी शक्ती लगाकर शनिदेव के कालदंड के वार को अपने पिपलास्त्र से विक्षेपित
03:50किया और एक अचूप प्रहार से शनिदेव के पैर पर आघात किया।
03:56शनिदेव जो कभी किसी पराजय को स्वीकार नहीं करते थे, वे पीड़ा से कराह उठे, उनका अहमकार चूर-चूर हो
04:04गया और वे समझ गये कि यह बालक कोई सामान्य मानव नहीं, अपितुस्वया महादेव का अंश है.
04:12तब पिपपलाद ने अपनी करुणा से शनिदेव के घाव को स्पर्श किया, और शनिदेव के पैर का तूटना तो एक
04:19लीला मात्र था, जिसका उद्देश शनिदेव को उनके अहमकार का त्याग सिखाना था.
04:26इस प्रकार पिपपलाद अवतार ने न केवल शनिदेव के अहंकार का मरदन किया, अपितु यह भी सिद्ध किया की भक्ती
04:34और इश्वरिय क्रिपासे ग्रहों के विधान को भी परिवर्तित किया जा सकता है, और यह कथा स्वय महादेव की अप्रिमित
04:41लीला का एक सुन्द
04:55देवताओं के स्वामी इंद्र अपने वजर के प्रभावीन होने पर हताश होकर स्रिष्टी के रक्षक भगवान विष्णू की शरण में
05:03पहुँचे
05:04भगवान विष्णू ने महातेजस्वी महर्शी दधीची के असाधारन त्याग का मार्ग सुझाया, जिनके अस्थियों में थी वजर को गढ़ने की
05:13शक्ती
05:14अध्यात्म और तपस्या की प्रतिमूर्ती महर्शी दधीची अपने आश्रम में ध्यानमगन थे, जब देवताओं का दल उनके समक्ष अवतरित हुआ
05:25इंद्र ने अत्यंत विनमर्ता से महर्शी से स्रिष्टी की रक्षा हेतु अपने प्राणों के बलिदान और अपनी हड्डियों को दान
05:33में मांग लिया
05:35महर्शी दधीची ने एक क्षण भी संकोच किये बिना अपने इष्ट देव शिव का स्मरण कर अपने शरीर के त्याग
05:43का संकल्प लिया
05:45उन्होंने अपनी पत्नी स्वाहा से विदाली जो अपने गर्भ में रिशी के तेज को धारण किये हुए थी और एक
05:52असहनिय वेदना को महसूस किया
05:56महर्शी ने अपना अंतिम श्वास लिया और उनका पार्थिव शरीर एक तेजस्वी जोती में विलीन हो गया
06:02उनकी हड्डिया वजर के निर्मान हेतु तयार हो गई
06:07देवताओं के शिल्पी, विश्व कर्मा ने महर्शी की पवित्र अस्थियों को एकत्र किया
06:13जो स्वयाही डैविय उर्जा से स्पंदित हो रही थी
06:17इन पवित्र अस्थियों से उन्होंने भगवान इंद्र के लिए एक अभेद्य और विनाशकारी वजर का निर्मान किया, जिसमें ब्रहमांड की
06:26शक्ती समाहित थी
06:28वजर का निर्मान पूर्ण हुआ और उसकी आभाने संपूर्ण देवलोग को प्रकाशित कर दिया, जिससे असुर वृत्रासुर के विनाश का
06:36मार्ग प्रशस्थ हुआ
06:39वृत्रासुर अपने मद में चूर तीनों लोकों पर अपना आतंक फैला रहा था, उसे यहाँ आभास नहीं था कि उसका
06:47अंत निकट है
06:49इंद्र ने दधीची की अस्थियों से बने वजर को धारण किया और उसके भीतर महर्शी के असीमत्याग और पवित्रता की
06:57शक्ती को महसूस किया
06:59देवताओं और असुरों के बीच एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, जहां वजर की गर्जना ने अंधकार की शक्तियों को चुनोती
07:07दी
07:08वजर की प्रतेक प्रहार के साथ वृत्रासूर की शक्ती क्षीन होती गई और महर्शी दधीची का बलिदान व्यर्थ नहीं जा
07:16रहा था
07:18अंतिमक्षन में इंद्र ने पूर्ण बल से वजर का प्रहार किया और वृत्रासूर का अंधकार में अस्तित्व ब्रहमांड की शक्तियों
07:26में विलीन हो गया
07:28स्रिष्टी एक बार फिर सुरक्षित थी महर्शी दधीची के परमत्याग के स्मरण से पूरित जिनका बलिदान अमर हो गया
07:37परंतु महर्शी की पत्नी स्वाहा अपने पती के वियोग में गहरी वेदना में थी और अपने अजन में शिशु के
07:44भविश्य के लिए चिन्तित थी
07:47इस महान त्याग की कथा, स्रिष्टी के कल्यान के लिए एक रिशी के अटूट प्रेम और साहस की गाथा, सदा
07:55सरवदा गूंजती रहेगी
07:57असाधारन करुणा और दुखों से भरी स्वाहा ने अपने पती के पीछे सती होने की इच्छा से एक पवित्र पीपल
08:05के व्रिक्ष के नीचे अपने नवजात शिशु को जन्म दिया
08:09जैसे ही सूर्य की अंतिम किरने क्षितिच पर विलीन हो रही थी, स्वाहा ने अपने शिशु को व्रिक्ष की जड़ों
08:17को सौंपते हुए वन के देवताओं का मौन आहवान किया
08:21उसने अपने पुत्र को उस महा व्रिक्ष के सनरक्षन में छोड़ दिया, जिसके पत्ते जीवन का प्रतीक थे और स्वय
08:29अपने पती के दिव्य लोग की ओर प्रस्थान कर गई
08:33वन देवता जो उस पीपल व्रिक्ष की आत्मा थे, नवजात शिशु की रक्षा का भार स्विकार करते हुए, कोमल पत्तियों
08:41से आच्छा दित हो गए
08:44आकाश में भगवान शिव कैलाश के अधिपती, अपनी पत्नी सती के वियोग के असहनिय दोहक से व्याकुल अपने त्रिशूल को
08:52थामे हुए प्रकट हुए
08:55उन्होंने अपने प्रिय सती के अंतिन संस्कार की सूचना पाई, जिसने अपने पिता के अपमान से व्यथित होकर स्वयं को
09:03यग्य की अगनी में बलिदान कर दिया था
09:06इस असहनिय पीडा ने शिव को क्रोध की ज्वाला में जुलसा दिया, जो ब्रहमांड को हिला देने वाली शक्ती से
09:13परिपूर्ण थी
09:15जब देवताओं ने शिव के प्रचंड रोश को देखा, तो वे कांप उठे, यह जानते हुए कि उनकी विनाशकारी शक्ती
09:23से कोई भी अचुता नहीं रह सकता
09:26उस विक्राल क्रोध में महादेव ने अपना एक बाल उखाड फेंका, जो सीधे प्रिथवी पर गिरा और एक बालक के
09:34रूप में प्रकट हुआ
09:36यह बालक, जिसे पिप्पलाद के नाम से जाना जाता था, अपनी मा की मृत्यू के प्रतिशोध और पिता के दुहक
09:43की गूँच के साथ जन्मा था
09:46वन देवता, जिन्होंने शिशु को पाला पोसा, उसे प्रकृती के रहसियों और वन की शक्तियों का ज्यान दिया
09:55पिप्पलाद ने तेजी से वृध्धी की, उसकी अलोकिक शक्ती और ज्यान हर गुजरते दिन के साथ बढ़ते गए
10:02उसने अपने जन्म के पीछे के रहसिय को जानने की तीवर इच्छा महसूस की एक ऐसी जिग्यासा जो उसे अपने
10:10पिता, स्वय महादेव की ओर खीच लाई
10:14जब पिपलाद कैलास पहुचा, तो उसने अपने पिता को गेहन ध्यान में लीन पाया, उनकी शक्ती और उदासी का एक
10:22अध्वितिय संगम
10:25महादेव ने अपनी दिव्य चेतना से अपने पुत्र के आगमन को महसूस किया, और धीरे धीरे अपने नेत्र खोले, जिनमें
10:33ब्रहमांड का ज्ञान समाहित था
10:36पिपपलाद ने अपने पिता को अपनी उत्पत्ती की कहानी बताई, वह रहस्य जिसने उसे जन्म दिया था, और सती के
10:44बलिदान की पीड़ा को व्यक्त किया
10:46शिव ने अपने पुत्र को गले लगाया, उसके शरीर से निकली शक्ती और सती की आत्मा की जहलत पाकर उनका
10:54हृदय करुना से भर गया
10:57उन्होंने पिपपलाद को बताया कि वह केवल एक पुत्र नहीं, बलकि सती के बलिदान की पवित्रता और शिव के क्रोध
11:04की शक्ती का अवतार है
11:07इस घ्यान से उतपरोथ पिपपलाद ने अपने पिता की आग्याली और शनीदेव से मिलने के लिए एक यातरा शुरू की,
11:16जहां नेती ने उन्हें एक महान संधर्श के लिए तयार किया था
11:21दिव्य पिप्पलाद की यात्रा अब शनी देव के साथ एक महाकाव्य युद्ध की ओर ले जाती है जहां उनके अवतरण
11:28का सच्चा उद्देश प्रकट होगा
11:31वन के हृदय में जहां सूर्य की किरने भी धर्ती को छूने में संकोच करती थी एक नवजात शिशु को
11:39प्रकृती के आचल में अकेला छोड़ दिया गया था
11:43लेकिन प्रकृती मा की गोद में एक दिव्य पिप्पला वरिक्ष जागरित हुआ जिसकी शाखाएं मानो अमरित की वर्षा कर रही
11:51थी
11:52जैसे ही अमरित की बूदें शिशु के मुख पर पड़ी एक नवजीवन का संचार हुआ जो जन्म से ही अलौकिक
11:59शक्तियों से युक्ट था
12:02महादेव, स्रिजन और विनाश के देव अपनी दिव्य उर्जा से उस बालक की रक्षा कर रहे थे जो प्रकृती के
12:09हृदय में पल्वित हो रहा था
12:12समय पंख लगा कर उर गया और शिशु ने पिपला वरिक्ष की चाया में अपनी आखें खोली प्रकृती ही उसकी
12:19पाठशाला और शिक्षक बनी
12:22उसकी आखें ग्यान के सागर थी और हर सास के साथ वह ब्रहमांड के रहसियों को आत्म साथ कर रहा
12:29था
12:31वह हर पत्ते के सरसराहट में मंत्र सुनता और हर पवन के जोके में इश्वरिय संदेश पाता
12:38यही वह बालक था जिसे पिपला वरिक्ष के अमरित से जीवन मिला और जिसने प्रकृती के ही आंगन में आध्यात्मिक
12:46शक्ती पाई
12:48उसका नाम हुआ पिप्पलाद जो पिप्पला वरिक्ष का पुत्रत, प्रकृती का लाल और स्वयन शिव का अंश्थ था
12:56जैसे जैसे पिप्पलाद बड़ा हुआ, उसकी ख्याती दूर दूर तक फैलने लगी, उन लोगों तक जो सत्य और ज्ञान की
13:04खोज में भटक रहे थे
13:06संत, तपस्वी और सामान्यजन सभी उसकी दिव्यवानी सुनने और उसके ज्ञान से आलोकित होने को आतुर थे
13:15उसकी शिक्षाएं वेदों के सार पर आधारित थी, जो आत्मा की अमर्ता और परमात्मा से एक आत्मता का मार्ग दिखाती
13:23थी
13:25वह मात्र एक बालक नहीं था, बलकी एक प्रकाश पुंच था, जो अज्यान के अंधकार को चीर कर सत्य का
13:32मार्ग प्रकाशित कर रहा था
13:35प्रकृती के साथ उसका सामन जस्य इतना गहरा था कि वह वन्य जीवों से बातें कर सकता था और उनकी
13:42पीड़ा को समझ सकता था
13:45उसकी चेतना इतनी विक्सित थी कि वह दूर बैठे हुए भी अपने भक्तों की पुकार सुन सकता था
13:51वह केवल एक शिक्षक नहीं बलकि एक रक्षक था जो अपने अनुयाईयों को हर प्रकार की आध्यात्मिक और भौतिक बाधाओं
14:01से बचाता था
14:03उसकी उपस्थिती मात्र से वातावर्ण शुद्ध हो जाता था और आसपास की संपूर्ण प्रकृती खिल उठती थी
14:11अंधकारमय शक्तियों को उसका बढ़ता प्रभाव असहनिय लगने लगा और उन्होंने उसके ज्ञान के प्रकाश को बुझाने का शड्यंत्र रचा
14:21लेकिन पिपपलाद जिसे स्वयन शिव का आशिरवाद प्राप्थ था वह आने वाले हर तूफान का सामना करने के लिए तैयार
14:29था
14:30प्रकृती के उस अध्भुत लाल का दिव्य स्वरूप अब अंधकार से लड़ने और धर्म की स्थापना करने के लिए पूर्णत
14:38है जागरित हो चुका था
14:40युवा पिप्पलाद की घोर तपस्या से तपोवन का कंकन शिवमय हो उठा था जैसे शांत जील में सूर्य का दिव्य
14:48प्रतिविम चमक रहा हो
14:49उसी समय आकाश मार्ग से उतरे तीन तेजस्वी रिशियों ने उस बालक के मुख मंडल पर साक्षात महादेव का अदमय
14:58तेज अनुभव किया
15:00रिशियों ने विसमय से एक दूसरे को देखा और पहचान लिया कि यह कोई साधारन तपस्वी नहीं बलकि स्वयन शिव
15:08का अंश है
15:11पिपलाद ने हाथ जोड कर उन रिशियों का स्वागत किया और अपने अस्तित्व की अबूज पहेली का समाधान मांगा
15:19तब उन रिशियों ने अत्यंत भारी मन से पिपलाद को उनके पिता महर्शी दधीची के महान बलिदान की अमरकता सुनाई
15:28उन्होंने बताया कि कैसे उनकी माता गभस्तिनी ने अपने पती के वियोग में स्वयन को अगनी के हवाले कर दिया
15:35था
15:37पिपलाद का हरिदय काम्प उठा जब उन्होंने सुना कि उनके जन्म के समय उनके माता पिता उनके साथ क्यों नहीं
15:44थे
15:45रिशियों ने रहस्यो धाटन किया कि शनी देव की क्रूर द्रिष्टी के कारण ही उनके माता पिता को इतनी पीडा
15:53जहिलनी पड़ी
15:54शनी की साढ़े साती और उनकी प्रतिकूल स्थिती ने ही उस छोटे से बालक को अनात बना दिया था
16:02यह सत्य सुनकर पिपलाद की आखों में करुणा की जगह क्रोध की ज्वाला धधकने लगी जो साक्षात रुदर का स्वरूप
16:10थी
16:12उन्होंने पूछा की न्याय के देवता कहलाने वाले शनी किसी निर्दोश बालक के साथ इतने निश्थुर कैसे हो सकते हैं
16:21रिशियोंने समझाया की शनी देव केवल कर्मों का फल देते हैं परंतु पिपलाद का तर्क उनके क्रोध के वेग को
16:28कम न कर सका
16:30पिप्पलाद ने संकल्प लिया कि वे उस क्रूर ग्रह को दंड देंगे जिसने अंगिनत परिवारों को उजाड़ा है
16:38उनके शरीर से निकलने वाला तेज ब्रहमांड की सीमाओं को लांग कर सीधे शनी लोक तक पहुँचने लगा
16:46शनी देव ने अपने सिनहासन पर बैठे हुए एक अज्यात भय का अनुभव किया, मानो कोई महाशक्ती उन्हें चुनौती दे
16:55रही हो
16:56पिप्पलाद ने अपनी तपस्या की शक्ती को एक दिव्य अस्त्र में परिवर्तित कर लिया, जिसका लक्ष केवल न्याय था
17:05तपोवन के पशुपक्षी और व्रिक्ष भी इस महान युद्ध की आहट से स्तब्ध होकर मौन हो गए थे
17:12पिप्पलाद के भीतर छिपे भगवान शिव के रुद्र रूप ने अब पूरी तरह से नियंतरन कर लिया था
17:19रिशियों ने समझ लिया कि आज स्रिष्टी एक अभूतपूर्व युद्ध की साक्षी बनने वाली है, जहां एक पुत्र अपने माता
17:27-पिता का प्रतिशोध लेगा
17:30एक भीशन गर्जना के साथ पिप्पलाद ने शनी लोग की ओर प्रस्थान किया और उनके हर कदम से प्रिथवी डोलने
17:38लगी
17:39दुहक के सागर में डूबे पिप्पलाद, जिन्होंने ग्रहों के करूर विधान से तरस्थ होकर, मृत्यू के देवता यमराज और नवग्रहों
17:47के अधिपती शनी देव को भी अपनी तपस्या से हिला देने का निश्चय किया
17:53उन्होंने महादेव को प्रसन्न करने हेतु, अपने शरीर को यग्य की अग्नी में जोक दिया, ऐसी घोर तपस्या की त्रिलोक
18:01में हाहाकार मच गया
18:04पिपपलाद की इस उग्रत अपस्या की ज्वालाए देवलोक तक पहुँच गई, जिससे देवताओं के हृदय में भय और विस्मय की
18:11लहर दोड़ गई
18:13ब्रहमा जी, स्रिष्टी के रचिता, जो कमल पर विराजते हैं, पिपपलाद की इस अभूत पूर्व शक्ती के स्रोत को जानने
18:21के लिए व्याकुल हो उठे
18:24भगवान विश्णु, जो क्षीर सागर में अनंत शया पर शयन करते हैं, भी इस ब्रहमांडी हल्चल से जाग गए और
18:32इसका कारण जानने हेतु उठसुक हुए
18:35नारद मुनी जो तीनों लोकों में विचर्ण करते हैं, इस महान तप के रहस्य को जानने के लिए तुरंट पिपलाद
18:42की ओर चल पड़े
18:45पिपलाद की तपस्या की अगनी इतनी प्रचंड थी कि वह मृत्यू के देवता यमराज के धाम तक पहुँच गई
18:53यमराज काल के स्वामी पिपलाद के इस क्रोध को शान्त करने हे तु अपने वाहन भेंसे पर सवार होकर यमदूतों
19:01के साथ प्रकट हुए
19:03उन्होंने पिपलाद को रोकने का प्रयास किया परन्तु तपकी प्रचंड ताके आगे यमराज के बल भी क्षीन पढ़ने लगे
19:11तब शनिदेव जो ग्रहों के क्रूर अधिपती हैं पिपलाद के इस प्रचंड तपको अपने नियंतरन से बाहर जाता देख स्वयरन्भूमी
19:20में उतर आए
19:22शनिदेव ने अपनी काली दृष्टी और पाश को पिपलाद पर केंद्रित किया यह विश्वास करते हुए कि वे किसी भी
19:30तपस्वी को अपने अधीन कर सकते हैं
19:34किन्तु पिपलाद जो अब शिव के अवतार के रूप में तप कर रहे थे ने शनी की दृष्टी का सामना
19:40अपने तपकी अगनी से किया
19:43शिव के त्रिशूल की भाती पिप्पलाद के क्रोध की अगनी ने शनिदेव के अहमकार को भेद दिया और उनके पैर
19:51पर प्रहार किया
19:53शनिदेव का पैर पिप्पलाद के प्रहार से तूट गया और वे अपने वाहन कौवे पर सवार होकर पीडा और आश्चर्य
20:01से कराहते हुए पीछे हटने को विवश हो गए
20:05ग्रहों के स्वामी के पराजित होने से स्वर्ग लोक में खलबली मच गई और सभी देवतार इस बालक की शक्ती
20:12से चकित रह गए
20:14तब स्वय महाकाल भगवान शिव जो कैलाश परवत पर निवास करते हैं पिप्पलाद की इस उग्र भक्ती से प्रसन्न होकर
20:22प्रकट हुए
20:24पिप्पलाद की तपस्या की ज्वालाओं के मध्य शिव के अवतार ने महादेव को देखा जिन्होंने अपने गणों के साथ कैलाश
20:32से उतर कर भक्त का अभिनंदन किया
20:36महादेव ने पिपपलाद के कंधे पर हाथ रखा और उनकी तपस्या की ज्वालाएं शान्थ हो गई परंतु उनके भीतर शिवत्व
20:44का तेज और भी प्रजवलित हो उठा
20:47इस प्रकार पिपपलाद के अवतार ने न केवल शनिदेव को परास्त किया अपितु महादेव की कृपा प्राप्थ कर उन्हें ग्रहों
20:55की पीडा से मुक्ती का वर्दान भी प्राप्थ हुआ
20:59घोर तपस्या में लीन पिप्पलाद की एकागरता इतनी अचल थी मानो ब्रहमांड की धुरी स्वयं उसी बालक के ध्यान में
21:07समा गई हो
21:09इस पवित्र ध्यान की अगनी में तपकर पिप्पलाद का शरीर और आत्मा ऐसे शुद्ध हो गए, मानो वे स्वयं देवत्व
21:17का अंश बन गए हो
21:19तभी आकाश चीरता हुआ, कैलाश के अधिपती महादेव स्वयं प्रकट हुए, उनका आगमन ऐसा था मानो स्वयंकाल निर्थ्य कर रहा
21:28हो
21:30भगवान शिव ने पिप्पलाद की ओर देखा, उनकी त्रिनेत्रों से ऐसी करुणा बर्सी मानो समस्थ ब्रहमांड कास ने उसी द्रिष्टी
21:38में समाहित हो
21:40बालक की अविचल भक्ती और निर्मल हरिदय को देख कर देवों के देव महादेव ने अपना पावन हाथ बढ़ाया, जैसे
21:48क्रिपा का सागर स्वयं उमड पढ़ा हो
21:51उन्होंने पिप्पलाद को दिव्यद्रिष्टी प्रदान की, जिससे वह स्रिष्टी के सुक्षम से सुक्षमकन और विराठ से विराठ सत्य को एक
22:00साथ देख सके
22:02साथ ही, उन्होंने एक अलौकिक दंड प्रदान किया, जो अनंत उर्जा से परिपूर्ण था, मानोस्वय आदी शक्ती का बल उसमें
22:11समाया हो
22:13महादेव ने कहा, हे पिपपलाद, यह दंड केवल शक्ती का प्रतीक नहीं, अपितु कर्म के फल का भी सूचक है,
22:20प्रतेक क्रिया का प्रतिध्वनी अवश्य होती है
22:24उन्होंने चेतावनी दी, ब्रहमांड के हर कार्य का परिणाम होता है, जैसे बीज बोने से ही फल मिलता है, वैसे
22:32ही कर्म से भाग्य बनता है
22:35इस वर्दान के साथ पिप्पलाद के भीतर आत्मबल और इश्वरिय शक्ती का एक ऐसा संगम हुआ, मानोवे स्वय धर्म के
22:44रक्षक बन गए हो
22:46शिव के विदा होते ही, पिप्पलाद ने अपने नवीन नेत्रों से देखा कि संसार केवल द्रिश रूपों का खेल नहीं,
22:54बलकि अद्रिश शक्तियों का एक महा संग्राम है
22:58उनकी दिव्यद्रिश्टी ने उन शक्तियों को भी पहचाना जो अंधकार में छिपी थी, और असुरों के शड्यंत्रों को भी समझ
23:06लिया
23:07शनी देव जो नवग्रहों के न्यायाधीश थे, पिप्पलाद की इस अलौकिक शक्ति और इश्वरिय वर्दान से अन्भिग्य अपने मार्ग पर
23:16अग्रसर थे
23:18भाग्य का विधान लेकर चलने वाले शनी देव को क्या ज्यात था कि एक बालक की तपस्या ने उनके पत
23:25को अवरुद्ध करने की शक्ति प्राप्त कर ली है
23:30जैसे ही पिप्पलाद ने शनी देव के आगमन का अनुभव किया, उनके भीतर का धर्मनिष्ठ योध्धा जाग उठा, अपने हाथ
23:38में शिव प्रदत दंड को कसलिया
23:41शनी देव जो सदैव न्याय के प्रतीक थे, एक बालक को अपने मार्ग में बाधा बनते देख, किंचित विस्मित और
23:48क्रोधित हुए
23:51पिप्पलाद ने निर्भयता से कहा, हे न्याय के देवता, आपका मार्ग अवरुद्ध है, क्योंकि अब धर्म की रक्षा हे तु
23:58मैं खड़ा हूँ
24:00शनी देव ने अपनी शक्ती का प्रदर्शन करते हुए अपना लोहे का दंड उठाया, जिससे काल का चक्र स्वयर रुकने
24:07लगा
24:09किन्तु पिप्पलाद का शिवप्रदत गंड जैसे आदिम अगनी का स्रोथ हो, शनी के प्रहार को निश्फल करते हुए स्वय उर्जावान
24:17हो उठा
24:19क्रोधित शनी देव ने पूरी शक्ती से पुनह प्रहार किया, और पिप्पलाद ने भी अपने गुरु के वर्दान को स्मरण
24:26कर उस दंड से उनके पाव पर प्रहार किया, जिससे उनका पै तूट गया
24:32शिव के आशिरवाद से बलवान पिप्पलाद देव लोग के उस नक्षत्र लोग में जा पहुँचे, जहां शनी देव का सामराज
24:40फैला था
24:42नक्षत्रों के स्वामी शनी देव, जिनकी चाल ही स्रिष्टी के सुख दुख का विधान थी, अपने रथ पर विराजमान थे
24:51पिप्पलाद ने निर्भय होकर शनी देव से पूछा, ये नवग्रहों के अधिपती क्यो मासूम बच्चों को अपनी क्रूर द्रिष्टी से
24:58पीडित करते हो
25:01शनी देव ने गर्जना करते हुए उत्तर दिया, यह स्रिष्टी का नियम है, बालक भाग्य किसी को नहीं बख्षता
25:09पिप्पलाद ने अपना छोटा सा हाथ उठाते हुए कहा, नियमों की आड में निर्दोशों को सताना धर्म नहीं, अधर्म है
25:18यह सुनकर शनी देव का क्रोध भड़क उठा और उन्होंने पिप्पलाद पर अपना कोप बरसाना चाहा
25:26किन्तु शिव के वर्दान के प्रताप से पिप्पलाद ने शनी देव के प्रहार को सहजता से अपने मंत्रबल से निश्क्रिय
25:34कर दिया
25:35शनी देव चकित रह गए एक बालक के इस अदमे साहस और अलौकिक शक्ती को देख कर
25:43पिप्पलाद ने आगे बढ़कर शनी देव के रथ के पहिये पर प्रहार किया जिससे वह गगन में लुढकने लगा
25:50रथ के तूटने से शनी देव का संतुलन बिगड़ गया और वह अंतरिक्ष में लड़कडा कर गिर पड़े
25:58पिप्पलाद ने इस अफसर का लाब उठाते हुए शनी देव की और अपनी दिव्य शक्ती प्रवाहित की
26:05शिव के तृशूल की आभालिये पिप्पलाद ने शनी देव के उस पैर पर प्रहार किया जो कश्ट देता था
26:14तृशूल की शक्ती से शनी देव का वह पैर बुरी तरह तूट गया और वह अंतरिक्ष में छटपटाने लगे
26:21दर्द से कराहते हुए शनी देव ने पिप्पलाद से गिरगिराते हुए कहा बालक मुझ पर दया करो यह क्या कर
26:29दिया
26:30पिप्पलाद ने उत्तर दिया यह पीडा उन लाखों बच्चों की है जिन्हें आपने वर्षों से सताया है
26:38उन्होंने आगे कहा जब तक आप अपनी करनी का पश्चाताप नहीं करते यह पीडा आपको भी जहलनी पड़ेगी
26:47शनी देव ने अपनी विवशता स्वीकार की और पिप्पलाद से क्षमा याचना की अपनी गलती को कबूल करते हुए
26:56पिप्पलाद ने शनी देव को आदेश दिया कि वे आज से सभी बालकों को अकारण पीडा न पहुँचाएं
27:04यह सुनकर शनी देव ने सिर जुका कर उस आदेश को स्वीकार किया और पिप्पलाद के सामने नतमस्तक हो गए
27:12जैसे ही शनी देव ने युद्ध शेत्र में कदम रखा पिप्पलाद के क्रोध की सीमा न रही और आकाश काले
27:20बादलों से घिर गया
27:22अपने पिता दधीची के कष्टों का स्मरण करते हुए भगवान शिव के तेजस्वी अवतार पिप्पलाद ने शनी देव को कड़ा
27:30युद्ध का आहवान किया
27:31शनी देव ने अपनी विशाल लोहे की गदा उठाई और ब्रहमांडी अंधकार की शक्तिशाली लहरें चारों और बिखेर दी
27:41पिप्पलाद ने अपनी कठोर तपस्या की संपून उर्जा को अपने भीतर केंद्रित किया जिससे संपून पृत्वी कामपने लगी
27:51दोनों महाशक्तियों के पहले टक्राव से उत्पन हुई प्रचंड उर्जा ने आकाश को सुनहरे और नीले रंकी ज्वालाओं से पाट
27:59दिया
28:00शनी देव ने अपनी भयंकर गदा से पिप्पलाद पर प्रहार किया जिससे युद्ध भूमी के बड़े-बड़े परवत और चट्टा
28:08ने ढहने लगी
28:10परम प्रतापी पिप्पलाद ने अत्यंत सहच्ता से अपनी दिव्य लाठी से शनी देव के उस विनाशकारी वार को हवा में
28:18ही रोक दिया
28:19स्वर्ग लोक में बैठे समस्थ देवता और गंधर्व भाय और विस्मय के साथ इस अभूत पूर्व और महा भयानक युद्ध
28:27को देख रहे थे
28:29क्रोधित होकर शनी देव ने अंतरिक्ष से जलते हुए उलकापिंडो और काली धूल के भयानक बवंडर का आहवान किया
28:48वह साधारन सी दिखने वाली लाठी एक परम तेजस्वी और चमचमाते दिव्य अस्त्र में बदल गई
28:55शनी देव अपनी पूरी आसुरी और ग्रहों की शक्ती समेट कर पिपलाद की ओर तीवर वेग से आगे बढ़े
29:04फुर्ती से हवा में छलांग लगाते हुए पिपलाद ने शनी के घातक प्रहार से खुद को बचा कर उन पर
29:10पलटवार किया
29:12एक गगन भेदी गर्जना के साथ पिपलाद ने अपनी तपस्या की शक्ती से युक्त लाठी से शनी देव के पैर
29:19पर सीधा वार किया
29:22जैसे ही वह दिव्य लाठी शनी देव के घुटने से टक्राई वहां सोने और नीले रंकी उर्जा का एक भयानक
29:29विस्फोट हुआ
29:31उस प्रचन प्रहार से शनी देव के पैर का कवच तूट कर बिखर गया और उनकी हड़ी तूट गई जिससे
29:38वे असहार हो गए
29:41असहनी अपीडा से चिलाते हुए शनी देव की नकारात्मक उर्जा और अंधकार का प्रभाव तुरंत शीन होने लगा
29:49ब्रहमांड के सबसे कठोर न्यायधी शनी देव दर्थ से कराहते हुए प्रिथवी पर घुटनों के बल गिर पड़े और पराजित
29:57हुए
29:58पिप्पलाद अपनी दिव्य लाठी को भूमी पर टिकाए हुए अत्यंत शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में शनी देव के सामने खड़े
30:06रहे
30:07पराजय स्विकार करते हुए शनी देव ने सदैव के लिए लंगड़ा कर चलने का दंड स्विकार किया और बच्चों को
30:15अपनी वक्र द्रिष्टी से मुक्त रखने का बचन दिया
30:19पहाडों की गूंज में जहां देवों का वास है पिप्पलाद ने शनी देव के क्रूर तांडव को रोका जिससे ब्रहमांडिय
30:26संतुलन डग्मगा रहा था
30:29शनी देव अपनी भयंकर शक्ती के साथ एक क्रूर योध्धा की तरह प्रकट हुए उनका क्रोध ब्रहमांडिय हवाओं को चीर
30:37रहा था
30:39पिप्पलाद जिनमें शिव की दिव्य उर्जाथी ने एक अलौकिक शक्ती का प्रदर्शन किया जिसने शनी देव के अभिमान को चकनाचूर
30:47कर दिया
30:49शक्तिशाली वार से पिप्पलाद ने शनी देव के पैर को तोड़ दिया जिससे न्याय की एक मार्मिक गूंज उठी
30:58दर्द और अपमान में डूबे शनी देव ने पिप्पलाद के चर्णों में शरण ली उनका अहंकार धूल में मिल गया
31:06उन्होंने पिप्पलाद से करुणा की याचना की देवत्व की पुकार सुनी जाए यह विंती की
31:14पिप्पलाद जिन में सर्वोच शिव का सार था ने शनी देव की व्यथा को समझा और अपने कोमल हृदय को
31:21दया से भर दिया
31:22एक पवित्र संधी का जन्म हुआ एक ऐसा करार जो युगों तक ब्रह्मांड में गुंजेगा
31:30पिप्पलाद ने आग्या दी आज से 16 वर्ष से कम आयू के बच्चों को तुम्हारी बुरी दृष्टी से बचाया जाएगा
31:38उन्होंने आगे कहा वे मासूम बच्चे जो अभी जीवन की यात्रा शुरू कर रहे हैं वे तुम्हारे दुरभाग्य के प्रभाव
31:46से मुक्त रहेंगे
31:49उन्होंने पिप्पलाद व्रिक्ष की ओर इशारा किया यह पवित्र व्रिक्ष निर्दोशों के लिए एक अभ्यारणय के रूप में कार्य करेगा
31:58इसकी छाया में कोई भी बच्चा भाय या श्राप से मुक्त होकर शान्ती से रह सकता है
32:05शनी देव जो अब विनम्र और कृतग्य थे ने पिप्पलाद के प्रती अपनी गहरी निष्ठा का वचन दिया
32:13उन्होंने प्रतिग्या की की वे बच्चों की मासूमियत का हमेशा सम्मान करेंगे उनकी आत्माओं की रक्षा करेंगे
32:21यह संधी देवों के न्यायाले में दर्स की गई जो ब्रहमांड में व्यवस्था और दया का प्रतीक बन गई
32:29पिप्पलाद का अवतार जो मासूमियत का रक्षक था हमेशा के लिए पूजनिय बन गया
32:35और पिप्पलाद व्रिक्ष उनकी विरासत का प्रतीक आज भी निर्दोशों को आश्रे और सुरक्षा प्रदान करता है
32:44शनी देव ने अपना पद पुनह प्राप्त किया लेकिन बच्चों के प्रती उनका द्रिष्टिकोन हमेशा के लिए बदल गया
32:53उन्होंने सीखा कि शक्ती का वास्तविक सार दूसरों को कुचलने में नहीं बलकि उनकी रक्षा करने में है
33:01इस प्रकार पिप्पलाद के अवतार ने न केवल एक युद्ध जीता बलकि ब्रहमांड में करुना और सुरक्षा का एक स्थाई
33:09पाठ भी सिखाया
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