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Watch the epic tale of Lord Shiva's Sharabha Avatar from the Shiva Purana. When Lord Narasimha's cosmic rage threatened to destroy the universe after slaying Hiranyakashipu, Lord Shiva manifested as the colossal, eight-legged winged beast, Sharabha, to pacify him and restore balance to the cosmos. #ShivaPurana #SharabhaAvatar #LordShiva #LordNarasimha #Mahadev #HinduMythology #Spiritual #VedicStories
Transcript
00:00पवित्र त्रिमूर्ती के रौद्र रूप भगवान नर्सिंग का भयंकर क्रोध जिसने हिरन्यक्षिपु का वद किया, अब भी शांत नहीं हुआ
00:08था, मानो प्रलै का ज्वार उमड पड़ा हो।
00:12अंतरिक्ष काम प्रहा था, उनके गर्जन की ध्वनी ब्रहमांड की शांती को भंग कर रही थी, मानो अंगिनत ग्रह उनके
00:19रौद्र रूप से विदीन हो रहे हो।
00:41आतंक से कहीं अधिक भयानक था। देवताओं के राजा इंद्र अपने वजर को थामे हुए भी काम प्रहे थे, क्योंकि
00:49उन्होंने पहले कभी ऐसी अनियंतरित दैविय शक्ती का अनुभव नहीं किया था।
01:11कि हे प्रभु, हे नरसिन्ह अपने भक्त की पुकार सुनें, इस क्रोध को शांत करें क्योंकि यह संपून स्रिष्टी को
01:18भस्म कर देगा।
01:20परंतु नरसिन्ह का क्रोध, जैसे अथाह सागर की लहरें, प्रहलाद की विनमर प्रार्थनाओं से प्रभावित नहीं हुआ, उनकी दैविय उर्जा
01:29अनियंतरित रूप से फैलती रही।
01:32अंतरिक्षिय गूंज ने ऐसी भयावह ध्वनी उत्पन्न की, जैसे किसी महासागर के तल में छिपे दैत्य का जागरित होना।
01:41ब्रहमांदी अगने की लपतें, उनके नथुनों से निकलती हुई, दूर के नक्षत्रों को भी जुलसाने लगी, जैसे वे अग्रिश काल
01:49के मुख से निकली हों।
01:51तारा मंदल जो कभी सौंदर्य और रहस्य के प्रतीक थे, अब उनके क्रोध की ज्वाला में जलते हुए अंगारों की
01:59तरह दिखाई दे रहे थे।
02:01भगवान शिव कैलास परवत परस्थित अपने दिव्य आसन से इस प्रल्यंकारी द्रिश को देख रहे थे। उनका शांत मुखमंडल भी
02:10चिंता की छाया से आच्छा दित था।
02:13देवी पारवती शिव के वाम अंगमे विराजमान ने अपने स्वामी से पूछा, हे महादेव यह भयंकर क्रोध किसका है, जो
02:22संपूर्ण स्रिष्टी को कमपा रहा है।
02:25शिव ने अपनी शांत वानी में उत्तर दिया, यह भगवान विश्नु का नरसिन्ह अवतार है, जिसका क्रोध हिरन्यक्षिपू के वद्ध
02:34के उपरांत भी शांत नहीं हुआ है, और यह तीनों लोकों के लिए संकट का कारण बन रहा है।
02:41नारद मुनी वीना बजाते हुए स्वर्गलोक में विलाप कर रहे थे, यह कैसा अनर्थ है, मेरे आराध्य का यह रूप
02:49तो विनाश का प्रतीक है।
02:52सभी देवता चिंतित थे, क्योंकि वे जानते थे कि नर्सिंग के क्रोध की अगनी किसी भी अस्त्र या मंत्र से
03:00बुझाई नहीं जा सकती थी।
03:02इस असहनी अस्थिती में स्वया भगवान शिव ने हस्तक शेप करने का निर्णै लिया, क्योंकि स्रिष्टी का संतुलन खत्रे में
03:10था।
03:12उन्होंने एक ऐसे रूप को धारन करने का निश्चय किया, जो नर्सिंग के भयंकर क्रोध को भी शांत करने में
03:19सक्षम हो, एक ऐसा रूप जो स्वयं महाशक्ती का प्रतीक हो।
03:23और इस प्रकार स्रिष्टी के रक्षण हेतु भगवान शिव ने शरब नामक एक महापक्षी का रूप धारन किया, जिसके पंखों
03:32में अनंत ब्रहमांड समाहित थे।
03:35जब भगवान नर्सिह का प्रचंड विनाश का तांडव कर रहा था, तब देव लोक में भय की लहर दोड़ गई,
03:42मानो प्रलै का साया मंदरा रहा हो।
03:45इंदरक देवों के राजा अपने वजर की शक्ती पर भी संदेह करते हुए घबराहट में अपने इंदरलोक से पलायन कर
03:53गए, स्रिष्टी के विनाश की आहट सुन रहे थे।
03:57ब्रहमाजी, स्रिष्टी के रचिता, अपने कमल आसन पर भी अस्थिर थे, नर्सिंग के अनियंतरित क्रोध को देख, उन्हें भी चिंता
04:05सता रही थी।
04:07वैकुंठ भगवान विश्णु का शाश्वत धाम भी नर्सिंग की प्रचन शक्ती से काप उठा, जहां स्वय विश्णु के कोप का
04:15अंत किसी साधारन शक्ती से संभव न था।
04:19नारद मुनिक जो सदा देवों के दूद थे, चिंतित होकर इस विनाशलीला को देख रहे थे, और उनके मुख से
04:27केवल चिंता के शब्धी निकल रहे थे।
04:30हर तरफ हाहाकार मचा था, दानवराज हिरनेकशब के अहकार को तोरने के बाद नरसिंग का क्रोध थमने का नाम नहीं
04:38ले रहा था, जिससे स्रिष्टी के अस्तित्व पर ही प्रश्ण चेहन लग गया।
04:44किसी भी देव या दानव में इतना बल नहीं था कि वे नरसिंग के विक्राल रूप और उनके अनियंतरित क्रोध
04:51का सामना कर सकें, सभी दिशाएं असहायता से भर गईं।
04:55तब देवों के समोह ने एक ही निर्णे लिया कि इस विकट परिस्थिती से निकलने का मार्ग केवल कैलाश परवत
05:02पर ही मिलेगा, जहां शिव स्वय निवास करते हैं।
05:07कैलाश की ओर उनका पलायन किसी सामान्य यात्रा जैसा नहीं था, बलकि यह एक ऐसी आशा की किरन थी, जो
05:15विनाश के अंधकार में टिम्टिमा रही थी।
05:19भगवान शिव जो स्वय कालातीत और सर्वश्रिष्ट हैं, अपने निवास स्थान कैलाश परवत पर ध्यान मगन थे, उनकी शांती अचल
05:28थी।
05:29देवी पारवती शिव की अरधांगिनी अपने शांत स्वभाव के साथ कैलाश की बरफीली चोटियों के बीच शिव के ध्यान में
05:38लीन थी।
05:40जब देवों का दल कैलाश पर पहुँचा, तो उन्होंने शिव के अविचल ध्यान को भंग न करने का निश्चय किया,
05:47और वे करबध खड़े हो गए अपनी व्यथा व्यक्त करने की प्रतीच्शा में।
05:52नारद मुनी देवों के प्रतिनिधी के रूप में शिव के चर्णों में पहुँचे और अत्यंत विनमर्ता से स्रिष्टी के आसन
06:00विनाश की गाथा सुनाई।
06:03उन्होंने नर्सिंग के अनियंतरित कोप और स्रिष्टी पर उसके विनाशकारी प्रभाव का वर्णन किया, मानो शब्द स्वयंका प्रहे हो।
06:12शिव की आखें धीरे-धीरे खुली, जैसे ब्रहमांड स्वयं जागरित हो रहा हो, उनकी द्रिष्टी में गहन करुणा और एक
06:20अनूठी शक्ती का संचार हुआ।
06:23उन्होंने देवों की व्यथा सुनी और नर्सिंग के क्रोध को शांत करने के लिए एक अद्भुत योजना बनाई जो केवल
06:31उनकी लीला का ही हिस्सा थी।
06:34ततकाल शिव ने अपने ही एक महारूप शरब अवतार को धारन करने का निश्चय किया, जो नर्सिंग के उग्र रूप
06:41के समकक्ष था।
06:43यह महापक्षी जिसके पंक अत्यंत शक्तिशाली थे, नर्सिंग के क्रोध को नियंत्रित करने और सृष्टी को बचाने के लिए प्रकट
06:52हुआ।
06:53जैसे ही शरब अवतार प्रकट हुआ, देवों के हृदय में आशा का संचार हुआ, और उन्होंने यह जान लिया कि
07:01अब सृष्टी का विनाश अवश्यंभावी नहीं रहा।
07:05देवताओं की कराहती पुकार कैलाश परवत की शान्त शिकरों तक गूँज उठी, जहां महादेव शान्त भाव से ध्यान में लीन
07:13थे।
07:14उनके ध्यान भंग होते ही, देवी पारवती, कमल जैसी आखों वाली, उनके सम्मुख प्रकट हुई, जिनके चहरे पर देवताओं के
07:23कश्टों की चिंता की चाया थी।
07:26शिव ने गहरी सांस ली, ब्रहमांडिय संतुलन की रक्षा का भार अपने कंधों पर महसूस करते हुए, और नर्सिंग के
07:34उग्र रूप को शान्त करने का निर्णय लिया।
07:37उन्होंने अपने वीर विनाशकारी अवतार वीर्भद्र को बुलाया, जिसकी उपस्थिती मात्र से ही असुरों के हृदयकाप उठते थे।
07:47वीर्भद्रक महापक्षी के भयंकर रूप को धारन करने वाले शिव के आदेश पर नर्सिंग के क्रोध को शान्त करने हेतु
07:55ततकाल प्रस्थान करने को तयार हुए।
07:58वीर्भद्र को संबोधित करते हुए, शिव ने कहा, जाओ, मेरे वीर पुत्र और विश्नु के उस उग्र रूप को समझाओ,
08:06जिसने स्रिष्टी के संतुलन को बिगार दिया है।
08:10उन्हें याद दिलाओ की वे परंपिता ब्रह्मा के तब को भंग न करें, और नहीं अपने भक्त प्रहलाद के नाम
08:17को कलंकित करें, शिव की वानी में द्रिडता थी।
08:21वीर्भद्र ने शिव को प्रणाम किया, उनका विशाल रूप प्रकाश की गती से अंतरिक्ष में गूंज उठा, नर्सिंग की ओर
08:29तीवर गती से अग्रसर हुआ।
08:31अंतरिक्ष की गहराईयों में जहां तारे मंद पड़ जाते हैं, वीर्भद्र ने नर्सिंग को पाया, जो अपने प्रचंड रूप में
08:39एक शिला पर बैठे, अपने पंजों से स्तंभ को चीर रहे थे।
08:45नर्सिंग का क्रोध ज्वाला मुखियों से भी अधिक भयंकर था, उनके नखरों से निकलती प्रचंड उर्जा ने ब्रहमांड के तानेबाने
08:53को कमपा दिया था।
08:55वीर्भद्र अपने महापक्षी रूप में नर्सिंग के सम्मुक हुत्रे, उनकी उपस्थिती ने उस प्रचंड उर्जा को कुछ हद तक संतुलित
09:04करने का प्रयास किया।
09:06उन्होंने विनीत भाव से कहा, हे नर्सिंग, परमपिता के पुत्र मैं शिव का दूत बनकर आया हूँ, आपके भयंकर क्रोध
09:14को शांत करने का अनुरोध करने।
09:17नर्सिंग ने अपनी गर्जनारों की उनकी तीवर आखें वीर्भदर का मूल्यांकन कर रही थी, यह समझ रहे थे कि यह
09:25कोई साधारन जीव नहीं, बलकि शिव का प्रतिनिधी है।
09:30शिव का दूत नर्सिंग की वानी में अभी भी गड़गडा हट थी, क्या शिव मेरे भक्तों की रक्षा नहीं कर
09:37सकते, जिसके लिए मुझे यह भयंकर रूप धारन करना पड़ा।
09:42वीर्भदर ने उत्तर दिया, मेरे स्वामी का उद्देश विनाश नहीं, बलकि संतुलन की पुनरस्थापना है, और आपके क्रोध की ज्वाला
09:51ने उस संतुलन को खत्रे में डाल दिया है।
09:55प्रहलाद की रक्षा के लिए ही आपका अवतार हुआ, न कि स्रिष्टी के विनाश के लिए अब उस भक्त की
10:02प्रतिष्ठा को बनाए रखने का समय है, न कि क्रोध की आग में जलने का।
10:08नर्सिंग की उग्रता धीरे धीरे शांत होने लगी, जैसे तूफानी समुद्र शांत लहरों में बदल रहा हो, उनके दिव्यनेत्रों में
10:16अब करुणा का भाव जलकने लगा।
10:19उन्होंने वीरभदर को स्वीकार किया, शिव की इच्छा सर्वोपरी है, मैं उनके संदेश का सम्मान करता हूँ और अपने क्रोध
10:27को सन्यमित कर स्रिष्टी के कल्यान में सहयोग करूँगा।
10:31इस प्रकार शिव के दूत वीरभदर ने अपनी बुद्धिमत्ता और शिव के आदेश से नर्सिंग के उग्र क्रोध को शांत
10:39किया और ब्रहमान्डिय संतुलन को पुनह स्थापित किया।
10:44युद्ध के रणक्षेत्र में जहां अहंकार के बादल छाय हुए थे, वीरभदर शिव के गणों के अधिपती एक अत्यंत शांत
10:53और निर्मल रूप धारन करते हुए अवतरित हुए।
10:56नर्सिंग जिन्होंने अपनी उग्र गर्जना से ब्रहमान्ड को कमपा दिया था, उनके सम्मुख वीरभदर ने विनमर्ता से अपना शीष जुकाया,
11:06मानोवे स्वय आदी देव को प्रणाम कर रहे हुँ।
11:10वीरभदर ने अपनी वानी में माधोरिय भरते हुए नर्सिंग से उनके रौद्र रूप को शांत करने का अनुरोध किया, जो
11:18की अत्यंत कोमल और विन्ती भरा था।
11:21उन्होंने याद दिलाया कि प्रहलाद की रक्षा का उनका परम उद्देश जो विश्नु का अवतार था, पहले ही पूर्न हो
11:29चुका था।
11:31वीरभदर ने कहा, हे नारायन के नर्सिंह रूप, आपके इस भयंकर अवतार का उद्देश सिद्ध हो गया है।
11:39जैसे ही हिरन्यक्षिपु का अंथुआ, प्रहलाद सुरक्षित हैं, और आपके कर्तव्य का भार अब कम हो गया है।
11:48यह उग्रता जो दुष्टों के सहार के लिए थी, अब विश्राम का समय चाहती है।
11:55वीर्भदर ने नर्सिंग की ओर हाथ बढ़ाते हुए, उन्हें शिव के शान्त और प्रेम्मय धाम कैलाश की ओर संकेत किया।
12:04हे प्रभुक शिव का धाम आपको आमंत्रित करता है, जहां शान्ती और आनंद का वास है।
12:11आपकी उर्जा जो दुष्टों को भस्म करने के लिए थी, अब स्रिष्टी के कल्यान के लिए शिव के साथ मिल
12:18सकती है।
12:20नर्सिंग जिन्होंने क्शन भर के लिए अपनी उग्र गर्जनारों की वीर्भदर की बात को ध्यान से सुनने लगे।
12:28विश्णु के इस अवतार ने, जिसकी शक्ती असीमित थी, धीरे-धीरे अपने पंजे शिथिल किये।
12:36उनके नेत्रों की अग्नी, जो पूरे लोग को भस्म करने की ख्शमता रखती थी, अब शान्त होने लगी।
12:43वीर्भदर ने एक कोमल मुस्कान के साथ नरसिह को एक दिव्यक्षन का आभास कराया।
12:51उन्होंने कहा, हे श्री हरी, आपकी लीला अप्रमपार है और आपका कार्य पूर्ण हो गया है।
12:59नरसिह ने धीरे-धीरे अपने विक्राल स्वरूप को समेटना आरंभ किया, जैसे शान्त समुद्र अपनी लहरों को वापस खींच लेता
13:07है।
13:09उनके नकों की तेजस्विता कम हो गई और उनकी गर्जना एक मधुर ध्वनी में विलीन हो गई।
13:16अंतर नरसिह अपने मूल शान्त विश्णू स्वरूप में परिवर्तित हो गए जो परम शान्ती और करुणा के प्रतीक थे।
13:24वीर्भद्र ने कृतग्यता से सिर जुकाया क्योंकि शिव और विश्णू की शक्ती ने मिलकर शान्ती का मार्ग प्रशस्त किया था।
13:34ब्रहमांडिय विनाश की अवशिष्ट उर्जा से अंधा हुआ नरसिह वीर्भद्र की सलाह को अस्विकार करते हुए अवग्या के एक कानफाडू
13:42दहार के साथ गर्जन करता है।
13:46विश्णू के इस प्रचंड अवतार ने कैलाश के अधिकार को चुनोती देते हुए वीर्भद्र को भस्म करने की धमकी देते
13:53हुए और भी भयानक आभा का प्रदर्शन किया।
13:58वीर्भद्रक शिव के गणों में सबसे शक्तिशाली ने नर्सिंग के क्रोध की आग को शांत करने का प्रयास किया।
14:05लेकिन विर्थ
14:07नरसिंह का क्रोध एक ज्वलंत ज्वाला मुखी की तरह था, जिसकी धधक्ती हुई आग शिव के गण के शांत धैर्य
14:14को भस्म करने को तयार थी
14:17वीर्भदर ने कोमल शब्दों में कहा, हे नरसिंह, अपने रौधर रूप को शांत करें, इस विनाश को रोकें, क्योंकि यह
14:25स्रिष्टी के संतुलन के लिए हानिकारक है
14:29लेकिन नरसिंह, अहंकार और क्रोध के नशे में चूर्प ने वीर्भदर की बातों को हवा में उड़ा दिया, जैसे धूल
14:36का एक कण
14:38तुम मुझे कौन होते हो, शिव के सेवक, मुझे उपदेश देने वाले नरसिंह ने अपनी गहरी गड़गडाहट भरी आवाज में
14:46पूछा
14:48वीर्भदर जो अपने स्वामी शिव के आदेश पर कार्य कर रहा था, ने अपनी शांती बनाए रखी, भले ही नरसिंह
14:55का क्रोध उसके चारों ओर की हवा को जला रहा था
14:59हे देव, वीर्भदर ने शांत चित्त से उत्तर दिया, यह क्रोध स्रिष्टी को भस्म कर देगा, स्वया विश्णु के उद्देश
15:07को ही परास्त कर देगा
15:10नरसिंह ने एक और भीशन गर्जना की, जिससे कैलाश के शिखर काम्प उठे और दिव्य संगीत भी मौन हो गया
15:19यह गर्जना केवल ध्वनी नहीं थी, बलकि ब्रहमांडिय अहंकार का एक प्रक्टिकरण था, जो किसी भी चुनोती को स्विकार करने
15:27के लिए तयार था
15:39पर्वत के देवता, जो इस भयानक तक्राव के साक्षी थे, भयभीत होकर काम्प उठे, यह जानते हुए कि यह अवतार
15:47सामान्य नहीं था
15:50नर्सिंग की आभा, जो पहले से ही भयानक थी, अब और भी तीवर हो गई, जैसे कोई काला छेद ब्रहमांडी
15:57उर्जा को निगर रहा हो
16:00वीर्भदर ने देखा कि नर्सिंग के चारों ओर का स्थान विक्रित हो रहा है, यह एक ऐसा ग्रिश्य था जो
16:07स्वयन समय और स्थान को चुनौती दे रहा था
16:11नर्सिंग ने अपनी दिव्य तलवार निकाली, जो अंगिनत ब्रहमांडों के क्रोध से बनी थी, और उसे वीर्भदर की ओर लक्षित
16:19किया
16:21तलवार की चमक इतनी भयंकर थी कि वीर्भदर की आखे भी क्षन भर के लिए चौन्धिया गई, लेकिन उन्होंने अपनी
16:29पकड मजबूत रखी
16:31यह युद्ध नहीं, नर्सिह, यह आत्मविनाश है, वीर्भदर ने अपनी आवास को शांत रखने की पूरी कोशिश करते हुए चिल्लाया
16:41नर्सिह ने जवाब नहीं दिया, बलकि एक और भयंकर गर्जना की, जो वीर्भदर के अंतिम तर्क को एक निर्दई, अंतिम
16:49अस्वीकृती के रूप में समाहित कर रही थी
16:53जब नर्सिह के उग्रतम क्रोध की ज्वालाय स्रिष्टी को भस्न करने लगी, तब महादेव ने अपने परम आराध्य विश्नु की
17:01इस विनाशकारी लीला को रोकने का संकल्प लिया
17:05कैलाश की शांत हिमशिकरों से शिव की दिव्य उर्जा एक महापक्षी के रूप में प्रकट होने लगी, जिसकी विशालता त्रिलोग
17:13को ढखने में सक्षम थी
17:16हजारों भुजाएं, आठ सिंहचन और गरुड से भी विशाल पंक, शर्भेश्वर का रूप स्रिष्टी के हर कण में भय और
17:23विस्मय भर रहा था
17:26उसका गर्जन पाताल की गहराईयों से लेकर स्वर्गलोग की उचाईयों तक गूंड उठा, मानो महाप्रलै का ही आहवान हो रहा
17:34हो
17:35नर्सिंह अपने उनमादी रूप में शरब के अवतरण से उत्पन उस ब्रहमांडिय कमपन को महसूस करते हुए, सीधे उस दिव्य
17:44शक्ती की ओर बढ़े
17:46देवताओं और रिशियों ने भय मिश्रित आशा से उस महा संगराम को देखा, जहां दो परम शक्तिया एक दूसरे से
17:54टकराने वाली थी
17:56शंकर अपने शरब रूप में नर्सिंग के विनाशकारी कोप को शांत करने के लिए अत्यंत कोमलता से अपनी हजारों भुजाओं
18:04को बढ़ाया
18:06नर्सिंग के उग्रपंजे शरब के अडिग दिव्य शरीर पर प्रहार करने लगे, पर हर वार विफल हो रहा था
18:14शरब ने अपनी प्रचंड शक्ती से नर्सिंग को थाम लिया, जैसे कोई पिता अपने उनमत बालक को स्ने से अनुशासित
18:22कर रहा हो
18:24शिव के महापक्षी रूप ने अपने पंखों को फैलाया, जिससे एक ऐसा दिव्य वायु वेग उत्पन हुआ जिसने नर्सिंग के
18:32क्रोध की अगनी को शांत करना आरंभ कर दिया
18:36नर्सिंग के नेत्रों की ज्वालाय मंद पढ़ने लगी, जैसे किसी प्रचंड तूफान के बाद शांत होती हुई सुभह की पहली
18:43किरने
18:45असंख्य भुजाओं से शरब ने नर्सिंग को अपनी दिव्य शांती से भर दिया, उस तीवर उर्जा को नियंत्रित कर लिया
18:52जिसने स्रिष्टी को खत्रे में डाला था
18:56अंतर विश्णु अपने मूल शांत स्वरूप में लौट आये, नर्सिंग के भयंकर अवतार का अवसान हुआ, स्रिष्टी पुनह सुरक्षित हो
19:04गई
19:06शर्भेश्वर ने अपना महापक्षी रूप त्याग दिया, और महादेव अपने कैलाश्वासी स्वरूप में प्रकट हुए, तीनों लोकों ने चैन की
19:14सांस ली
19:16भगवान विश्णु ने महादेव का अभिवादन किया, उनके कारियों की भूरी-भूरी प्रशंसा की, यह स्विकार करते हुए की प्रेम
19:24और शक्ती का संतुलन ही सर्वश्रिष्ट है
19:28यह अवतार शरब का दर्शाता है कि जब धर्म की रक्षा के लिए कोमल प्रयास विफल हो जाते हैं, तब
19:36शिव स्वय अपनी दिव्य शक्ती से बुराई का विनाश करते हैं
19:41इस प्रकार शिव के शरब अवतार ने न केवल नर्सिंग के क्रोध को शांत किया, बलकि स्रिष्टी को एक बड़े
19:48विनाश से भी बचाया
19:50यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए जब आवश्यक हो परम शक्तिशाली हस्तक्षेट भी
19:58होता है
20:00शिव पुरान के इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे महादेव स्वयन शरब रूप धारण कर स्रिष्टी के संतुलन को
20:08पुनह स्थापित करने हेतु अवतरित हुए
20:12ब्रहमांडिय आकाश से महादेव ने शरब के महापक्षी रूप को धारण किया जिसके पंखों ने विनाश के अंधकार में बादलों
20:20को चीर दिया
20:22भगवान नर्सिंह जिनकी क्रोधागनी अभी भी प्रजवलित थी गर्जना करते हुए उस दिव्य पक्षी से भिडने के लिए आगे बढ़े
20:32पक्षी सिंह के आठ पैर धर्ती की ओर जप्टे जबकी नर्सिंह के नकरों ने महापक्षी के दिव्य पंखों को फाड़ने
20:39का प्रयास किया
20:41अंतरिक्ष काप उठा जैसे महापक्षी के पंखों की हवाओं ने नर्सिंह के उग्र रूप को पीछे धकेल दिया
20:49नर्सिंग की गर्जना प्रतिध्वनित हुई, जैसे उन्होंने महापक्षी के प्रचंड वेक का जवाब अपनी अडिक शक्ती से दिया
20:58तीनों लोकों में कम-कम पी फैल गई, यह देखकर की दो दिव्य शक्तियों के बीच यह भयंकर युद्ध छिड़
21:05गया था
21:06भगवान शिव शरब रूप में अपनी दिव्य आखों से एक शांत, फिर भी दुर्जे प्रकाश डालते हुए नर्सिंग के उग्र
21:14स्वभाव को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे
21:18नर्सिंग के क्रोधित स्वरूप में हर पंजे की खरोंच ब्रहमांडिय उर्जा के विस्पोट को जन्म दे रही थी, जो अंधकार
21:26को दूर भगा रही थी
21:29महापक्षी के पंखों से निकली हवाएं, शांत करने वाले मंत्रों की तरहें नर्सिंग की असहनी आग को धीरे-धीरे कम
21:37कर रही थी
21:39भगवान विश्णु अपने नर्सिंग रूप से लोटते हुए धीरे-धीरे शांत हो रहे थे, जैसे एक भयंकर तूफान के थमने
21:47के बाद आकाश निर्मल हो जाता है
21:51महापक्षी शरब अपने दिव्यकर्तव्य को पूरा करके धीरे-धीरे अपना भयानक रूप त्यागने लगा
21:58भगवान विश्णु अब अपने शांत चतुर्भुज रूप में महादेव के शरब अवतार के प्रती कृतग्यता से नमन कर रहे थे
22:07महादेव शरब रूप से पुनह प्रकट होकर भगवान विश्णु की शांत उपस्थिती को स्विकार कर रहे थे
22:15दोनों देवाधिदेव ब्रहमांडिय संतुलन को बनाए रखते हुए शांती और सद्भाव के प्रतीक के रूप में खड़े थे
22:24ब्रहमा जी ने अपने कमल आसन से देखा उनके चार मुख इस महापक्षी अवतार की दिव्यता की प्रशंसा कर रहे
22:32थे
22:33देवताओं और रिशियों के दिव्य समूह ने जैकार की जब उन्होंने देखा कि किस प्रकार शिव ने नर्सिंग के उग्र
22:40क्रोध को शांत किया था
22:43यह शरब अवतार महादेव की करुना और शक्ती का एक अद्भुत प्रमान था जिसने संतुलन को बहाल किया
22:51महादेव ने अपनी शक्ती का प्रदर्शन किया यह याद दिलाते हुए कि वे विनाश और स्रिजन दोनों के स्वामी है
23:00इस प्रकार शरब अवतार ने ब्रहमांड को बचाने के लिए नर्सिंग के अनियंतरित क्रोध को शांत किया और शांती लोट
23:08आई
23:08यह गाथा हमें सिखाती है कि सर्वोच शक्ती भी करुणा और संतुलन बनाय रखने के लिए अपनी प्रचंड उर्जा को
23:17नियंतरित कर सकती है
23:20प्रचंड नर्सिंग अपनी उग्रता की पराकाश्था पर चारों दिशाओं में विनाश की ज्वालाएं बिखेर रहे थे जैसे त्रेलोक्य को भस्म
23:29करने पर तुले हूँ
23:31ऐसे विक्राल संकट के क्षण में स्वय महादेव, असीन करुणा और शक्ती के स्रोत महापक्षी शरब के दिव्य रूप में
23:39प्रकट हुए अपने नयनों में ब्रहमांडिये शांती लिये हुए
23:44शरब के विशाल पंखों ने जैसे ब्रहमांड के वस्त्रहों नरसिंग की दाहक उश्मा को जकड लिया, जिससे प्रचंड अगनी शांत
23:52होने लगी
23:54अपने शक्तिशाली पंजों से शरब ने उग्र नरसिंग को अपनी पकड में लिया, जैसे योगेश्वर योग की अवस्ता में स्थिर्टा
24:02लाते हैं
24:04जैसे गरूर अपने पंखों की फड़फडाहट से वायू को चीरता है, वैसे ही शरब ने नरसिंग को आकाश की ओर
24:11उठाया, प्रित्वी के बंधनों से मुक्त करते हुए
24:16जैसे समुद्र की लहरेंग शान्थ होती हैं, वैसे ही नरसिंग का उग्र वेग शरब की दिव्य पकड में आकर मंद
24:22पड़ने लगा
24:24शिखर पर चड़ते हुए, शरब ने नरसिंग को ऐसे थामे रखा, मानों एक साधक अपने मन की चंचल वृत्तियों को
24:32वश में कर रहा हो
24:34दिव्य पक्षी की पंखुडियों से निकली स्वर्नेम आभा ने नरसिंग के उग्र तेज को अभिभूत किया, जिससे उसका प्रचंड पराक्रम
24:42शान्थ होने लगा
24:44जैसे एक कुशल संगीतकार सुरों को साधता है, वैसे ही शरब ने अपनी पकड को समायोजित किया, नरसिंग के अनियंत्रित
24:53बल को पूर्ण नियंत्रण में ले लिया
24:56नरसिंग की दहाड जो कभी ब्रहमांड को कमपाती थी, अब शरब की शान्थ उपस्थिती के समक्ष एक फीकी प्रतिध्वनी मात्र
25:04रह गई थी
25:06जैसे सूर्य की किरने रात्री के अंधकार को मिटा देती हैं, वैसे ही शरब के दिव्य तेज ने नरसिंग के
25:13उगरता आपको निश्क्रिय कर दिया
25:16शिखर से थोड़ा नीचे उतरते हुए, शरब ने नरसिंग को एक ऐसी स्थिती में रखा, जहां उसका प्रचंड वेक पूर्णता
25:24शान्थ हो गया था
25:26जैसे मलय परवत मंदार परवत के मद को शान्थ करता है, वैसे ही शरब की आध्यात्मिक शक्ती ने नरसिंग के
25:34अहंकार पूर्ण बल को वश में कर लिया
25:37नरसिंग के नेत्रों की उग्रता, जो त्रैलोक्य को भस्म कर सकती थी, अब शरब के शान्थ गहन द्रिश्टी के सम्मुख
25:45विलीन होने लगी
25:47जैसे वर्षा की बूंदे सागर में मिलकर एकाकार हो जाती हैं, वैसे ही नरसिंग का भयंकर वेक शरब के दिव्यस्वरूप
25:55में समाहित हो गया
25:57शिखर पर स्थित होकर, शरब ने नरसिंग को ऐसे थामा, जैसे कोई गुरू अपने शिश्य की चंचल चित्तवृत्ती को साधता
26:05है
26:07धीरे धीरे नरसिंग की प्रचंडता कम हुई और शरब की पकड़ में वह अपने मूल दिव्यस्वरूप की ओर लोटने लगा
26:16जैसे योग की समाधी में लींग योगी की देह स्थिर होती है, वैसे ही नरसिंग का उग्र रूप शरब की
26:22दिव्य शक्ती से पूर्णत है शांत और स्थिर हो गया
26:26इस प्रकार शरब अवतार ने न केवल नरसिंग के क्रोध को शांत किया, बलकि यह भी प्रदर्शित किया की परम
26:34आध्यात्मिक शक्ती भौतिक उग्रता पर विजय प्राप्त करती है
26:39जैसे ही महापक्षी शरब के दिव्य आलिंगन में बंधा, भगवान नरसिंग का प्रल्यंकारी क्रोध एक शांत सागर की भाती थम
26:47गया, जिसमें केवल अगाध शांती शेश रह गई
26:52भगवान शिव के शरब अवतार के रौधर रूप के पीछे छिपी परम क्रिपालुता को पहचानते हुए, नरसिंग की आखों में
26:59अब क्रूर्ता का कोई चिन्ह शेश नहीं था, बल्कि उसमें क्रितग्यता का एक गहरा सागर उमड पड़ा
27:06यह महापक्षी मात्र एक रूप नहीं, अपितु स्वयम महादेव का प्रेमपूर्ण आलिंगन था, जिसने नरसिंग की उगरता को पिघला कर
27:15उसे अध्यात्मिक स्पष्टता के प्रकाश में नहला दिया
27:20नरसिंग ने अपनी भयानक गर्जना को एक कोमल श्रद्धापूर्ण श्वास में बदल दिया, जो स्रिष्टी के स्रिजनहार के प्रती कृतग्यता
27:28व्यक्त कर रहा था
27:31आमकार की अगनी जो नरसिंग को भस्म कर रही थी, वह शिव की असीम कृपा के शीतल जल से बुझ
27:37गई और उसका उग्रव्यक्तित्व शान्थ हो गया
27:41उसने अपने प्रचंड पंजों को समेट लिया, जो पहले ब्रहमांड को फाड़ने के लिए उठे थे, अब वे केवल समर्पन
27:49के प्रतीक के रूप में नीचे जुके थे
27:52नर्सिंग के दिव्यनेत्रों से अब क्रोध की ज्वालाये नहीं, बलकी करुणा और विस्मय के आसुबह निकले, जो शिव के विराट
28:00स्वरूप के प्रती उसकी विनमर्ता दर्शा रहे थे
28:04यह नर्सिंग की आत्मविस्मिती का अंत था और शिवतत्व की सर्वोप्रिता की चेतना का एक नया उज्वल प्रभात था
28:14भगवान विश्नु नर्सिंग के रूप में स्वयं को उस आदिम शक्ती के समक्ष पूर्णत है समर्पित कर दिया, जिसने स्रिष्टी
28:21के संतुलन को बनाए रखने के लिए इस भयंकर अवतार को शांत किया था
28:27शरब ने अपनी अश्ट भुजाओं से नर्सिंग को सहलाया, मानो पिता अपने पुत्र को अत्यंत प्रेम और वादसले से आशीश
28:35दे रहा हो
28:37नर्सिंग के मस्तक पर रखे शरब के कोमल पंजे, उसके समस्थ अहंकार और ग्वेश को एक क्षण में भस्म कर
28:44रहे थे और उसे शिवरूप में विलीन कर रहे थे
28:49ब्रहमांड के समस्थ देवता, जो भईभीत थे, अब इस अध्भुत मिलन के साक्षी बनकर विस्मय और आनन से भर उठे
28:58भगवान नर्सिंग ने अपने मुख से शिवनाम का संकीरतन किया, यह स्विकार करते हुए कि वही परम सत्य और आदी
29:06शक्ती है
29:08जैसे ही क्रोध की अगनी शान्त हुई, नर्सिंग का दिव्यतेस पहले से कहीं अधिक प्रजवलित हो उठा, अब वह विनाश
29:16का नहीं, बलकि स्रिष्टी और संरक्षन का प्रतीक बन गया
29:21शरब का भयंकर रूप अब नर्सिंग के लिए भय का स्रोत नहीं, अपितु शिवत्व का वह दर्पन बन गया, जिसमें
29:28वह अपनी परम आत्मा का प्रतिविम्द देख सकता था
29:32उन्होंने दोनों परम देवों ने एक साथ ब्रह्मान को शांती और स्थिर्टा का आश्वासन दिया, जिससे तीनों लोकों में आनंद
29:41की लहर दोड़ गई
29:43नर्सिंग का क्रोध, जो कभी विनाशकारी प्रलै का कारण बन सकता था, अब शिव की क्रिपासे प्रेम और करुना के
29:50महासागर में विलीन हो गया था
29:53इस प्रकार, शरब अवतार ने न केवल एक भयंकर संतुलन स्थापित किया, बलकि स्वयन विश्णु को भी शिव की सर्वोप्रिता
30:02के समक्ष नतमस्तक होने का मार्ग दिखाया
30:05जैसे जैसे नरसिंग की चेतना निर्मल हुई, उन्होंने शिव के चरण कमलों में अपने मस्तक को टिका दिया, उस परम
30:13शक्ती को नमन करते हुए जिसने उन्हें इस भयंकर नरीत्य से मुक्ती दिलाई थी
30:19जैसे ही महानरिसिंह का उग्र रूप शांत हुआ, भगवान विश्नु अपने शांत, चतुर भुजी स्वरूप में पुनह प्रतिष्थित हो गए,
30:27ब्रहमांड को अपने ही अनियंत्रित क्रोध की विनाशलीला से बचा लिया
30:32भगवान विश्नु ने अपनी दिव्यवानी में कैलाश परवत्पर उपस्थित देवादिदेव महादेव के शरब अवतार की भूरी-भूरी प्रशंसा की यह
30:42स्विकार करते हुए कि केवल शिव का यह रूप ही इस प्रल्यंकारी संकट को टाल सकता था
30:49शिव के शरब रूप के पराक्रम का बखान करते हुए भगवान विश्नु ने कहा हे कैलाश पती आपका यह अवतार
30:57मेरे अपने ही अनियंत्रित तेज को नियंत्रित करने के लिए प्रकट हुआ जिसने संपूर्ण त्रिलोग को अपनी ज्वाला में भस्म
31:04करने की ख्षमत
31:05रखता था इस दिव्य मिलन के साक्षी बने समस्त देवगण जो स्वर्ग लोग से अवत्रित हुए थे उन्होंने कैलाश परवत
31:14की और निरंतर पुष्प वर्षा की मानोवे उस महापक्षी के अध्भुत रूप की स्तुती कर रही हुँ
31:21स्वर्ग से बरसे पुष्पों की पंखुडिया कैलाश की बरफीली चोटियों पर मंदमंद गिर रही थी जो हरी और हरा के
31:29मध्य के उस सनातन सामंजस्यपूर्ण बंधन का प्रतीक थी जो स्रिष्टी के कणकण में व्याप्थ है
31:37भगवान विश्णु ने शरब रूपधारी शिव को नमन किया जो समस्थ स्रिष्टी के रक्षक और सनहारक दोनों हैं और कहा
31:45आपकी लीला अप्रमपार है हे महादेव जिसने मुझे भी मेरे ही प्रचंड रूप से विमोचित किया
31:52भगवान शिव अपने महापक्षी रूप में विश्णु के प्रती कृतग्यता ज्यापित की उनकी शांत उपस्थिती ने स्रिष्टी को एक बार
32:01पुनह संतुलन में ला दिया था जैसे शांत सागर के बाद का ठहरा
32:06द्रिसिंग का उग्र रूप जो अब विलीन हो रहा था भगवान विश्णु के शांत मुख मंडल पर एक कोमल आभा
32:13के रूप में परिवर्तित हो गया जो उनकी परम कृपा और धैर्य का प्रतीक था
32:19शिव और विश्णु के इस दिव्य मिलन ने सिद्ध कर दिया कि वे दोनों एक ही परम सत्य के दो
32:26भिन्न स्वरूप हैं जो स्रिष्टी के संचालन और कल्यान के लिए सदैव एक साथ कार्य करते हैं
32:34देवाधिदेव महादेव शरब रूप से पुनह अपने कैलाश पती स्वरूप में आ गए त्रिशूल धारन किये हुए शान्त और कैलाश
32:42की बरफीली चोटियों पर विराजमान मानों कोई भी संकट अभी अभी शान्त हुआ हो
32:49भगवान विश्णु भी अपने विराट शान्त स्वरूप में लीन हो गए जिनके चतुर्भुज सदाधर्म और न्याय की रक्षा के लिए
32:56ततपर रहते हैं उनके हाथों में शंक, चक्रक, गदा और पद्म सुशोगित थे
33:03ब्रहमा जी जो स्रिष्टी के रक्षिता हैं ने दोनों देवों के इस मिलन पर प्रसन्ता व्यक्त की और कहा यह
33:10एक्ता ही स्रिष्टी का आधार है जिसके बिना अस्तित्व की कल्पना भी असंभव है
33:17महर्शी नारद वीना बजाते हुए हरी और हरा की इस अद्वैत एक्ता का गुनगान कर रहे थे उनकी धुन में
33:25स्रिष्टी के कंकन को आनंदित करने वाली मधुरता थी
33:29सभी देवगण जिन्होंने इस भयंकर रूप के शांत होने का प्रत्यक्ष अनुभव किया था वे अब कैलाश की ओर देख
33:37रहे थे जहां शांती और सद्भाव पुनह स्थापित हो चुका था
33:42शिव के शरब अवतार ने न केवल विश्णु के नरसिंह रूप के क्रोध को शांत किया बलकि यह भी प्रदर्शित
33:49किया कि कैसे सर्वोच चेतना अपने विभिन्न रूपों में भी एक दूसरे की पूरक है
33:56यह घटना ब्रहमांड के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश थी कि शक्ती का संतुलन आवश्यक है और जब वह बिगड़ता है
34:04तो सर्वोच शक्तिया स्वयं उसे पुनह स्थापित करने के लिए प्रकट होती है
34:11भगवान विश्णु ने महादेव को संबोधित करते हुए कहा आपकी यह लीला ब्रहमांडिय एक्ता का एक अद्भुत प्रमाण है जहां
34:19द्वंद्व भी अंत्तह एक महासत्य का ही अंग बन जाता है
34:24शिव ने उत्तर दिया यह एक ताही स्रिष्टी की आत्मा है हे नारायन और इसी आत्मा की रक्षा के लिए
34:32हम दोनों सदैव तत्पर रहेंगे चाहे कैसा भी विग्धन आए
34:37और इस प्रकार हरी और हरा के मध्य की वह गेहन असीम मित्रता जिसने ब्रहमांड को बचा लिया था
34:44कैलाश परवत पर एक दिव्य उत्सव का रूप धारन कर लिया जो अनंत काल तक मनाया जाएगा
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