Watch Shiva Purana Episode 49. After defeating the Asuras, the Devas become consumed by extreme arrogance, claiming sole credit for the cosmic balance. To shatter their pride, Lord Shiva manifests as the mysterious Yaksheshwara (Yaksha Avatar). Watch how a simple blade of grass humbles the mighty elemental gods Agni, Vayu, and Indra, teaching them the ultimate lesson of humility and devotion.
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00:00समुद्र मन्थन के पश्चात, जब देवताओं ने असुरों पर अपनी विजय का जश्न मनाया, तब इंद्र का अहंकार एक ज्वलंत
00:08अगनी की भाती प्रजवलित हो उठा.
00:12वायुदेव, जिन्होंने अपने प्रचंड वेग से रनभूमी को परिवर्तित किया था, वे भी अपनी शक्ती के मद में चूर हो
00:18गए, मानों वे ब्रहमांड के स्वामी हो.
00:22अगनी देव, जिन्होंने अपनी ज्वालाओं से शत्रूओं को भस्म किया था, वे भी अपनी दाहक शक्ती के सम्मुख अन्य सभी
00:30को तुछ समझने लगे.
00:32देवताओं के हृदय में यह अहंकार अंकुरित हुआ कि यह विजय उनकी अपनी शक्ती का फल है, न कि किसी
00:40अलौकिक विधान का.
00:42यह आध्यात्मिक अंधापन उस परम सत्ता के प्रती कृतग्यता को विस्मृत कर चुका था, जिसने उन्हें यह शक्ती प्रदान की
00:50थी.
00:51भगवान शिव जो कैलाश के अपने शांत निवास में वास करते थे, उन्होंने देवताओं के इस बढ़ते अहंकार को सुक्ष्मता
01:00से अनुभव किया.
01:02उन्होंने देखा कि किस प्रकार विजय की नशीली मादक्ता ने देवों के हृदय में अज्यान का बीज बो दिया था.
01:10ब्रहमा जी, चतुरमुखी ब्रहमा, जो सृष्टी के रच्चिता हैं, वे भी इस अद्रिश्य पतन को देखकर चिन्तित हुए.
01:18उन्होंने अपनी दिव्यद्रिश्टी से देखा कि किस प्रकार देवों ने उस परम चेतना को भुला दिया था जिसने उन्हें बल
01:26प्रदान किया था.
01:28नारद मुनी जो तीनों लोकों में विचर्ण करते हैं, वे देवताओं के इस अज्ञान को देवर्शी की विविश्टा से देख
01:35रहे थे.
01:37वे जानते थे कि अहंकार का यह व्रिक्ष देवों के आध्यात्मिक पतन का कारण बनेगा.
01:44शिव ने अपनी योग माया का आवाहन किया, एक ऐसी शक्ती जो सत्य को प्रकट करने और भ्रम को दूर
01:51करने में सक्षम थी.
01:53इस योग माया के प्रभाव से एक अध्भुत यक्ष का रूप प्रकट हुआ, जो देवताओं के मत को चूर करने
02:00हेतु रचा गया था.
02:02यह यक्ष जो की शिव का ही एक रूप था, अत्यंत तेजस्वी और बल्शाली प्रतीत हो रहा था.
02:10उसकी आभा ऐसी थी मानो सहस्त्र सूर्य एक साथ उदे हो गए हों और उसकी शक्ती असीन प्रतीत होती थी.
02:19शिव ने इस यक्ष को देवताओं के सामने प्रकट होने और उनके अहंकार का परीच्षन करने का आदेश दिया.
02:27यक्ष अत्यंत विनमरता से सिर जुका कर अपने स्वामी के आदेश का पालन करने के लिए उद्यत हो गया.
02:35इंद्रप वायू और अगनी अपने देवलोप में बैठे, अपने विजय के मद में लीन थे.
02:42तभी उस यक्ष ने एक साधारन तिनके के समान दुर्बल देवलोप के द्वार पर अपनी उपस्थिती दर्श कराई.
02:50उसका आगमन इतना आकस्मिक था कि किसी ने भी उस अलपद्रिशमान प्राणी की शक्ती का अनुमान नहीं लगाया.
02:59स्वर्णिन स्वर्ग की विशाल स्वर्ण मंडप में देवराज, इंद्र, वायुदेव और अग्निदेव विज्योत्सव मना रहे थे, मानो वे ही स्रिष्टी
03:08के एक मात्र आधार हो.
03:11इंद्र ने मेगों को गर्जना करते हुए कहा, यह ब्रह्मान्ध हमारे यानी वायुक अग्नी और वजर के बल पर ही
03:18टिका है, और कोई नहीं.
03:21वायुदेव ने मंद समीर को प्रचंड बवंडर में बदलते हुए कहा, मेरे ही पवन के जोके बिना तो सूर्य का
03:28रत भी नहीं चल सकता.
03:31अग्नी देव ने अपनी ज्वालाओं को और प्रजवलित करते हुए दावा किया, इस जगत का हरकन मेरे तेज से ही
03:38प्रकाशित और पोशित है.
03:41तीनों देवों ने उनमाद में एक दूसरे की पीठ थपत पाई, इस विश्वास में की वे ही स्रिष्टी के परम
03:48रक्षक हैं.
03:50तभी एक अद्रिश शक्ती ने उनके अहंकार का स्पंदन महसूस किया, जैसे महाकाल स्वया उनकी उपेक्षा को जान गए हूँ.
03:59स्वर्ग की सभा में एक अद्भुत, शांत शक्ती का अनुभव होने लगा, जिससे तीनों देवों के अहंकारी स्वर अचानक थम
04:07गए.
04:09अचानक एक साधारन सातिनका, जो पहले किसी के ध्यान में नहीं था, भूमी से उठकर हवा में मंदराने लगा.
04:18वायुदेव ने तिरसकार से कहा, यह तुछ तिनका क्या कर सकता है? मैं इसे पल भर में ब्रहमांड के दूसरे
04:26छोर पर फेंक दूँगा.
04:29वायुदेव ने अपनी पूरी शक्ती लगा कर उस तिनके को उड़ाने का प्रयास किया, पर वह वही स्थिर रहा, जैसे
04:36किसी अद्रिश्य बंधन में बंध गया हो.
04:39अगनिदेव ने उफास करते हुए कहा, मैं इसे भस्म कर दूँगा, यह तो एक शन का कार्य है, और उन्होंने
04:47अगनी का तीवर जोंका उस और भेजा.
04:50परन्तु अगनी की ज्वालाएं तिनके को स्पर्श करने से पहले ही शांत हो गई, जैसे कोई अग्ये शक्ति उन्हें रोक
04:58रही हो.
04:59अंत में इंद्र अपने वजर को उठाते हुए बोले, मैं इस तुछ वस्तु को अपने प्रहार से भस्म कर दूँगा.
05:07जैसे ही इंद्र का वजर तिनके की ओर बढ़ा, वह अचानक अत्यंत भारी हो गया, जैसे उसमें ब्रह्मांड का सारा
05:15भारा गया हो.
05:17इंद्र अपना ही वजर न उठा सके, उनके हाथ कामपने लगे और उनका सारा बल व्यर्थ सिद्ध हुआ.
05:25तब तीनों देवों का अहंकार चूर-चूर हो गया, वे समझ गये की कोई अनंत शक्ती उनसे कहीं परे है.
05:34आकाश्वानी हुई हे देवों, यह तिनका नहीं, बलकि महाकाल की शक्ती का प्रतीक है, जो तुम्हारे अहंकार को भस्म करने
05:42आई है.
05:44तुम्हारा वायुक अगनी और वजर केवल निमित मात्र है, सृष्टी का मूल आधार तो वह परम चेतना है, जिसे तुम
05:52भूल बैठे हो.
05:54यह सुनकर तीनों देवों ने विनमर्ता से सिर जुकाया और महाकाल से क्षमा याचना की, उनके अहंकार की राख में
06:02अब ज्यान का अंकुर फूट रहा था.
06:05और इस प्रकार एक साधारन से तिनके ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची शक्ती अभिमान में नहीं, बलकि उस
06:13परम तत्व के चर्णों में हैं, जिसे कोई भी देव या दानव पूरी तरह समझ नहीं सकता.
06:19अंधकार के सागर में, जहां देवों के अहंकार ने सूर्य को भी छुपा दिया था, एक अलौकिक प्रकाश पुंच का
06:27उदे हुआ, जिसने तीनों लोकों को जगजोर दिया.
06:31यह प्रकाश स्तंभ, जो किसी दैविय इच्छा शक्ती का साकार रूप था, देवताओं के सभी अस्त्रशस्त्रों को भयभीत कर रहा
06:39था, मानो स्वयंकाल उनके समक्ष खड़ा हो.
06:43वायु देव, जिन्होंने कभी अपने वेग से स्रिष्टी को मोडा था, अब उस प्रकाश के सामने अपने पंखों को समेटे
06:51हुए शक्तिहीन से प्रतीत हो रहे थे.
06:54अगनी देव, जिनके प्रचंड ज्वालाओं से त्रिलोक काम पता था, स्वयं उस अलौकिक तेज के समक्ष मंद पढ़ते जा रहे
07:02थे, उनकी ज्वालाएं काम प्रही थी.
07:06ब्रहमा जी, स्रिष्टी के रचिता, अपने चतुर मुखी ध्यान में भी उस प्रकाश की शक्ति को समच नहीं पा रहे
07:13थे, जैसे ब्रहमांड का कोई रहस्य खुल रहा हो.
07:18भगवान विश्णु, जो स्रिष्टी के पालनहार हैं, अपने शांत स्वभाव को बनाए रखने का प्रयास कर रहे थे, परन्तु उस
07:26दिव्य जोती ने उनकी चेतना को भी जख जोर दिया.
07:30देवताओं के बीच एक असहज शांती छा गई, वे कापते हुए हृदय से उस प्रकाश के स्रोत को देखने लगे,
07:37जो स्रिष्टी के नियमों को चुनौती दे रहा था.
07:41तभी नारद मुनी वीना बजाते हुए, अपने चिरपरिचित मुस्कान के साथ उस प्रकाश की ओर बढ़े, मानोवे किसी प्राचीन भविश्यवानी
07:50को सत्य होते देख रहे हुँ.
07:53उन्होंने देवताओं से कहा, हे देवगन, यह कोई साधारन प्रकाश नहीं, यह उस परम सत्ता का संकेथ है, जिसका आदी
08:02और अंत तुम तीनों देव भी नहीं जानते.
08:06नारद की बातों ने देवताओं के हृद्यों में एक नई शंका और भय का संचार किया, कि कोई ऐसी शक्ती
08:13भी है, जो उनसे भी परे हैं.
08:16तभी उस प्रकाश स्तंभ के मध्य से एक दिव्य ध्वनी गूंजी, जिसने देवताओं के अभिमान को चुनोती देते हुए कहा,
08:24तुम मुझे जानते हो या मुझे नहीं जानते.
08:28इंद्र अपने वजर को संभालते हुए, उस ध्वनी की दिशा में ललकारा, है अद्रिश शक्ती, यदि तुम में बल है,
08:36तो अपना स्वरूप प्रकट करो.
08:39वायु देव ने अपनी पूरी शक्ती से उस प्रकाश को भेदने का प्रयास किया, परंतु वे उस दिव्य वायु के
08:46प्रचंड वेक के सामने टिक न सके.
08:49अगनी देव ने अपनी सबसे प्रचंड जवालाएं उस प्रकाश की ओर फेंकी पर वे जवालाएं उस दिव्य जोती में विलीन
08:57हो गई
08:57मानो तिनका समुद्र में समा जाएं
09:00तब विश्नु ने अपने सुदर्शन चक्र को उस प्रकाश की ओर चलाया पर चक्र उस दिव्य प्रकाश के सम्मुख एक
09:08साधारन बनकर रह गया
09:10ब्रहमा जी ने अपने कमंडलू से स्रिष्टी की जलधारा को उस प्रकाश में प्रवाहित किया, परंतु वह जलधारा स्वयन को
09:18उस अनंत में खो बैठी
09:20तब उस प्रकाश स्तंभ से स्वय वह वानी पुनह गुंजी, क्या तुम में से कोई भी मुझे इस अन्तिम सत्य
09:27को पहचान सकता है
09:31सभी देवता निरुत्तर थे, उनका सारा बल, सारा ज्यान, उस परम सत्य के सम्मुख तुछ प्रतीत हो रहा था, जैसे
09:38रेत का कन महा सागर के समक्ष हो
09:42और तभी उस प्रकाश के सागर से एक दिव्य, शांत और गंभीर स्वरूप प्रकट हुआ, जिसने देवताओं के घमंड को
09:50पल भर में भस्म कर दिया
09:52यह यक्ष अवतार, शिव का वह रूप, जिसने स्रिष्टी के रचिता, पालक और संहारक के अहंकार को एक तिनके से
10:00भी कमतर सिध कर दिया
10:03अंधेरे को चीर्ती हुई उस प्रचंड जोती के हरिदय से एक विराट रहस्यमय यक्ष का अवतरण हुआ, जो असीम शांती
10:11और पूर्ण अधिकार के साथ विराजित था
10:14इंद्रत देवताओं के राजा, इस अंजाने शक्तिशाली अस्तित्व को देखकर अत्यंत विचलित हो उठे, क्योंकि यह उनके अपने स्वर्गलों की
10:24सीमाओं का अतिक्रमन कर रहा था
10:27अगनी वायू और अन्य देवगण अपनी इंद्र की आज्या का पालन करते हुए, उस दिव्य यक्ष को चुनोती देने के
10:35लिए आगे बढ़े, जो उनके लोकों में एक अंचाहा अतिथी बन बैठा था
10:40उन्होंने उस यक्ष के समक्ष अपने अपने दैविय अस्त्रशस्त्रों को प्रदर्शित किया, यह विश्वास करते हुए कि उनकी शक्ती इस
10:49अनोखे अतिथी को आसानी से भयभीत कर देगी
10:53किन्तु यक्ष जिसने स्वयं परमेश्वर शिव का रूप धारण किया था, वह अपने आसन पर अचर रहा, मानो इन देवगणों
11:01के हंकार का उसे कोई प्रभाव ही न पड़ा हो
11:05तब अगनी देव ने अपनी दिव्यजवालाओं से उस यक्ष को भस्म करने का प्रयास किया, मानो वे अपनी प्रचंड शक्ती
11:13का प्रदर्शन कर रहे हो
11:15लेकिन यक्ष ने तिनके की एक फूंक मात्र से उस प्रल्यंकारी अगनी को बुझा दिया, जो देवों के लिए एक
11:22अभूत पूर्व आश्चर्य था
11:25इसके पश्चात वायु देव ने अपने प्रचंड वेग से उस यक्ष को उड़ा ले जाने का घमंड किया, मानो वे
11:32प्रकृती की अदमय शक्ती का प्रतीक हो
11:36पर यक्ष ने एक तिन का धर्ती पर रखकर उसे उन सभी पवनों से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया, जिससे
11:43बायु देव स्वयन दिशाहीन हो गए
11:46इंद्र इन दो देवताओं की पराजय से हत्प्रभ थे, उन्होंने अपने वजर को उठाकर उस यक्ष पर प्रहार करने का
11:54निर्नय लिया, जो उनके देवत्व को चुनौती दे रहा था
11:59किन्तु जैसे ही इंद्र का वजर यक्ष की ओर बढ़ा, यक्ष ने केवल एक तिन का उठाकर उसे रोका, और
12:06इंद्र का सारा बल व्यर्थ हो गया
12:09तब यक्ष ने अपना विराठ रूप प्रकट किया, जिसमें ब्रह्मा और विश्णू भी उसे पहचान नहीं सके, जिससे देवों का
12:16भ्रम और भी गहरा हो गया
12:19उन्होंने देवों से पूछा, यह क्या है, और इस प्रश्ण ने इंद्र, अगनी और वायू के अहंकारी हृदय में भय
12:26का संचार कर दिया
12:29देवताओं ने पुनह-पुनह यक्ष को पहचानने का प्रयास किया, किन्तु हर बार वे असफल रहे, उनकी शक्ती और ज्ञान
12:37इस रहस्यमय शक्ती के सम्मुख नगण्य सिद्ध हुए
12:41अंत्र, यक्ष ने स्वयं को प्रकट किया, यह बताते हुए कि वह स्वयं परम ब्रहमा हैं, जिन्होंने देवों के अभिमान
12:48को चूर-चूर करने के लिए यह रूप धारन किया था
12:53उन्होंने इंद्र को समझाया कि सक्ची शक्ती अहंकार में नहीं, बल्कि विनमर्ता और आत्म ज्ञान में नहित है, जो सभी
13:01भ्रमों को दूर कर देती है
13:04इस प्रकार यक्ष अवतार ने देवों को उनकी सीमाओं का एहसास कराया और उन्हें सिखाया कि अंतिम सत्य किसी एक
13:12के अधिकार छेत्र में नहीं, बल्कि सर्वव्यापी है
13:17यह घटना सदैव देवों के लिए एक स्मर्णिय पाठ बन गई, कि अहमकार का अंत अवर्षम भावी है और विनमर्ता
13:25ही सच्ची दिव्यता का मार्ग प्रशस्त करती है
13:29और इस प्रकार यक्ष रूप धारण कर महादेव शिव ने न केवल देवों का बल्कि समस्त स्रिष्टी का अहमकार मर्दन
13:37किया और सत्य का प्रकाश फैलाया
13:41जैसे ही वायू और अगनी के अभिमान का ज्वार मंद पड़ा, स्वय अगनी देव प्रजवलित ज्वालाओं के सागर उस दिव्ययक्ष
13:49के सम्मुख प्रकट हुए उनका तेज ब्रहमांड की हर वस्तु को भस्न करने के लिए आतुर था
13:56अपनी प्रचन आभा के साथ अगनी ने उस रहस्य मेई यक्ष से गर्जना करते हुए पूछा, है अग्यानी, तू कौन
14:04है जो मेरे मार्ग में खड़ा है, तेरी शक्ती क्या है, जो तू मेरे प्रताप को चुनौती दे रहा है
14:11यक्ष ने, जिसकी उपस्थिती शांत महासागर की तरह गहरी थी, मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, है अग्णी देव, पहले
14:20स्वयं को पहचाने, आपकी ख्याती का वर्णन तो आपके मुख से ही श्रव्य होगा
14:26अग्णी का अहंकार, जैसे प्रजवलित इन्धन, यक्ष के इस विनमर प्रश्ण से और भी भड़क उठा, और उन्होंने स्वयं को
14:34सबसे शक्तिशाली देवता के रूप में घोशित किया
14:38मैं अग्णी हूँ, उन्होंने गर्जन किया, त्रिलोक का भख्षक, जिसकी एक सांस मात्र से यह संपूर्ण नश्वर ब्रहमांड भस्म होकर
14:47राख हो सकता है
14:50उन्होंने अपनी भुजाय फैलाई, मानो संपूर्ण स्रिष्टी उनकी दावत का हिस्सा हो, और कहा, मैं वह हूँ जो संसारों को
14:58भस्म करता हूँ, जिसकी जिर्वाय अंगिनत लोकों को चट कर जाती है
15:04मेरी ज्वालाओं में इतनी शक्ती है कि वे एक पलक जपकते ही तारामंडल को राख में बदल सकती है, और
15:11मेरी भूख ब्रहमांडिय शून्यता से भी अधिक है
15:16अगनी का मुख मंडल तपता हुआ लोहा बन गया, और उनकी वानी में वह विनाशकारी उर्जा थी जो नक्षत्रों को
15:23भी जुलसा सकती थी
15:26उन्होंने यक्ष की ओर घूरते हुए कहा, मैंने समस्त ब्रहमांड को अपनी ज्वालाओं में समाहित किया है, और आज तक
15:33कोई भी देवता या असुर मेरी शक्ती के सामने टिक नहीं सका
15:38यक्ष जो अब भी शांत और अटल थे, ने अग्णी की प्रचंडता को एक कोमल द्रिष्टी से देखा, मानोवे किसी
15:46चंचल बालक की क्रीडा देख रहे हुँ
15:49अग्णी के शब्दों की आग, यक्ष के शांत व्यक्तित्व के सामने फीकी पड़ रही थी, क्योंकि यक्ष ने कोई प्रत्युप्तर
15:57न देकर अपनी मौन शक्ती का प्रदर्शन किया
16:01यक्ष ने अपना हाथ धीरे से उठाया, और जैसे ही उनकी उंगलिया खुली, एक साधारन सा तिनका, जो अब तक
16:09मौन था, एक अभूत पूर्व प्रकाश से चमक उठा
16:13वह तिनका, जो पहले धर्ती का एक सामान्य अंश मात्र था, अब एक दिव्य अस्त्र में परिवर्तित हो गया था,
16:21जिसकी उर्जा अगनी की समस्ट ज्वालाओं से भी अधिक प्रचंड थी
16:26अगनी देव अपनी सारी शक्ती और अभिमान के साथ, उस छोटे से तिनके के प्रकाश की ओर ऐसे देख रहे
16:34थे, मानों वे किसी अज्यात, अकल्पनिय शक्ती के सम्मुख खड़े हो
16:39यक्ष ने धीरे से वह तिनका अगनी की ओर बढ़ाया, और जैसे ही वह तिनका अगनी के ज्वलंत शरीर के
16:46पास पहुँचा, अगनी की सारी ज्वालाएं एक शीन प्रकाश में सिमट गई
16:52अगनी जो स्वयंको त्रिलोक का भख्षक कहते थे, उस साधारन तिनके के स्पर्ष मात्र से ऐसे कामपने लगे जैसे किसी
17:00शिशु ने उन्हें छू दिया हो
17:03यक्ष ने उस तिनके को एक पल के लिए भी रोके रखा, और अगनी देव की समस्थ शक्ती उनकी ज्वालाओं
17:10का तेज उस नन्हे से तिनके में समाहित होकर लुप्थ हो गया
17:15अगनी की ज्वालाएं बुझ गई, उनका सारा अभिमान राख हो गया, और वे उस तिनके के सामने नत्मस्तक हो गये,
17:23जिसने उन्हें उनकी वास्तविक तुछ सत्ता का बोध कराया था
17:28उसक्षन अगनी देव ने जान लिया कि वास्तविक शक्ती वानी के आडंबर में नहीं, बलकि उस मौन सर्वव्यापी सत्ता में
17:36नहित है, जो सबसे छोटे कण में भी निवास करती है
17:41अभिमान से भरकर यक्षने देवराज इंद्र को संबोधित करते हुए प्रिथवी पर एक कोमल तिनका रख दिया, मानो वह देवताओं
17:50का सबसे दुर्जे शत्रु हो
17:52यह तुछ तिनका, जिसने अभी अभी ब्रहमांड को हिला दिया था, अब अगनी के प्रल्यंकारी वेग के सामने एक हास्यासपत
18:00चुनौती बन गया
18:03इंद्रक जिसने इस अपमान का प्रत्यक्ष अनुभव किया था, ने अगनी से कहा, हे अगनी देव इस तुछ जीव को
18:10भस्म कर दो, इस अचे तिनके को राख में मिला दो
18:14अगनी अपनी अनन्त शक्तियों पर गर्व करते हुए, हसा और बोला, यह तिनका तो पल भर में भस्म हो जाएगा,
18:22यह मेरे प्रल्यंकारी तेज के सामने क्या टिक पाएगा
18:26जैसे ही अगनी ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का आहवान किया, एक प्रचंड ज्वाला, जो सूर्य के दहारते मुख के समान
18:34थी, उस तिनके की ओर बढ़ी
18:38देवताओं की आखें विस्मय से फैल गई, वे उस क्षण का इंतजार कर रहे थे, जब वह कोमल तिनका पल
18:45भर में भस्म हो जाएगा
18:47किन्तु उस प्रचंड अगनी के वेग के नीचे, वह तिनका जसका तस बना रहा, जैसे किसी अद्रिश्य कवचने उसे सुरक्षित
18:55रखा हो
18:57अगनी की जवालाए तिनके के चारों और नाचती रही, एक दुर्जे बल का प्रदर्शन करती हुई, फिर भी वे उसे
19:04चूने में असमर्थ थी
19:07देवताओं ने अपना विश्वास खो दिया, उनकी श्रद्धा उस ईश्वर पर डगमगा गई जिसका तेज स्वयं बुझने लगा था
19:16अगनी शक्तिहीन और थका हुआ, अपनी पूर्ण शक्ती के व्यर्थ प्रयास के बाद अपमानित और हताश होकर पीछे हट गया
19:37इंद्रक जिसने अपने अभिमानी मित्र को इस प्रकार शक्तिहीन होते देखा, उसका अहमकार भी धूल में मिल गया
19:45वह समझ गया कि देवत्व की सच्ची शक्ती मात्र बल या तेज में नहीं, बलकि उस अद्रिश्य चेतना में है,
19:52जो इन तत्वों को भी नियंत्रित करती है
19:56यक्षने, जिसने उनकी सारी शक्ती को एक पल में व्यर्थ कर दिया था, उनकी ओर देखा और कहा, तुम्हारा अभिमान
20:04ही तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु है, देवों
20:08उसने उस तुछ दिखने वाले तिनके को उठाया, जो अब देवताओं के लिए सबसे बड़ी पहेली बन गया था, और
20:16उसे अपनी हथेली पर रख लिया
20:19उसकी वाणी में एक गहरा सत्य छिपा था, जो वायू के जोकों की तरह देवताओं के हिर्द्यों को भेद गया
20:37इह अद्रिश्य बल जिसने देवताओं के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था, उस परम सत्य का प्रतीक था जिसे
20:44केवल विनमरहृदय ही समझ सकते थे
20:47इस प्रकार एक कोमल तिनके ने अगनी, वायू और इंद्र के घमंड को चूर-चूर कर दिया और शिव के
20:55यक्ष अवतार ने उन्हें शाश्वत सत्य का पाठ पढ़ाया
20:59अगनीदेव को लजजित होकर पीछे हटते देख, वायू देव अत्यंत गर्व से भरकर यक्ष के सम्मुक अत्यंत वेग से आगे
21:07बढ़े
21:08अपनी शक्ती के अहंकार में डूबे वायू देव ने अट्थास करते हुए कहा कि वे संपून ब्रह्मांड को उड़ाने की
21:16क्षमता रखते हैं
21:18यक्ष ने अत्यंत शांत भाव से उसी साधारन तिनके की ओर इशारा किया जिसे अगनीदेव भस्म नहीं कर पाए थे
21:27यक्ष ने वायू देव को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे वास्तव में बल्वान हैं तो इस तिनके को
21:34उड़ा कर दिखाएं
21:36वायू देव ने उस ननहे तिनके को तुछ समझा और उसकी ओर एक उफास्पून और गर्वभी मुस्कान बिखेरी
21:45वायू देव ने गहरी श्वास ली और अपनी दिव्य शक्तियों को जागरत करना प्रारंभ कर दिया
21:52शन भर में स्वर्ग का वातावर्ण बदलने लगा और चारों और प्रचंद हवाई चलने लगी
21:59वायू देव के संकेट मात्र से ही आकाश में घने, काले बादलों का एक विशाल समूहु मड़ पड़ा
22:07पवन देव ने अपनी पूर्ण क्षमता का प्रयोग करते हुए एक अत्यंत विनाशकारी बवंडर का आहवान किया
22:15उस भयानक आंधी की गर्जना से दसों दिशाएं कांप उठीन और परवतों के शिखर हिलने लगे
22:22यक्ष के चारों और घूमता हुआ वह प्रचंड बवंडर ब्रहमांड के विनाश का द्रिश्य प्रस्तुत कर रहा था
22:30इंद्रदेव और अन्य देवता अत्यंत भयभीत होकर वायुदेव के इस संहारक रूप को देख रहे थे
22:38महाविनाशकारी हवाओं का वेग उस ननहे तिनके पर केंद्रित हुआ किन्तु वह तिनका टस से मस न हुआ
22:44यह देखकर वायुदेव को अपनी आखो पर विश्वास नहीं हुआ और उनका क्रोध सात्वे आसमान पर पहुँच गया
22:54क्रोधित वायुदेव ने अपनी संपून प्रांशक्ती को जोगते हुए स्रिश्टी की सबसे तीवर आंधी का स्रिजन किया
23:02भयानक तूफानों की टककर से आकाश गंगाएं डगमगाने लगी परन्तु यक्ष का वहतिन का अडिग रहा
23:10वायुदेव का अहंकार अब धीरे धीरे असमंजस और गहरे भय में बदलने लगा था
23:17अन्ता वायुदेव की समस्ट शक्तियां समाप्थ हो गई और वे पूरी तरह से हामफते हुए ठककर रुप गए
23:25जैसे ही वायुदेव रुके सारा तूफान थम गया और यक्ष अत्यंत शांत मुद्रा में मुस्कुराते रहे
23:33परास्त और लजजित होकर वायुदेव ने यक्ष के समक्ष शीष जुकाया और उनकी वास्तविक पहचान जानने की प्रार्थना की
23:42देवराज इंद्रत देवताओं के राजा अपने चिर्परिचित अहंकार के साथ उस अग्ये शक्ती के समक्ष खड़े थे जिसने उनके देवत्व
23:51को चुनौती दी थी
23:53यह समझकर की वे किसी साधारन प्राणी का सामना नहीं कर रहे बलकि उस परम चेतना का जिसने स्रिष्टी की
24:01रचना की है इंद्र ने अपने वजर को देवों की शक्ती से भर दिया
24:06जैसे ही देवराज आगे बढ़े बिजली की कड़कडाहट के समान वह यक्ष जिसका रूप रहस्यमय था हवा में विलीन हो
24:15गया मानो कोई स्वपन भंग हो गया हो
24:18इंद्र अकेले अपने गरगराते वजर के साथ उस मूख वातावर्ण में खड़े रह गए जो अब उनके अभिमान के विग्टन
24:26का साक्षी था
24:28वजर जो कभी देवों की विजय का प्रतीक था अब उसके हाथों में एक भारी बेजान वस्तु मात्र रह गया
24:35था
24:37जैसे ही यक्ष लुप्थ हुआ इंद्र के कानों में गूझने वाली मौन पुकार ने उनके अहंकार की नीम हिला दी
24:45अगनी वायू और अन्य देवगन जो युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे इंद्र की एकाकी स्थिती देखकर विस्मय
24:53और भय से भर गए
24:55वे उस अद्रिश शक्ती के प्रमान थे जिसने देवों के राजा को भी निहत्था और मौन कर दिया था
25:03इंद्र के मन में विचार कौन था क्या यह वही परम सत्य है जिसे वेदों ने वर्नित किया है
25:10वह एक ऐसा सत्य था जो न तो इंद्र के वजर से नहीं किसी देव के बल से प्राप्त किया
25:17जा सकता था
25:19देवों के राजा ने पहली बार अनुभव किया कि अज्ञानता का अंधकार कितना घना हो सकता है
25:26उस क्षण वह योध्धा नहीं बलकि एक शिश्य था जो गुरु की प्रतीक्षा में मौन खड़ा था
25:34यक्ष उस परमचेतना का प्रतीक अव्यक्थी रहा परन्तु उसका प्रभाव इंद्र के अंतर्मन पर गहरा हो गया था
25:43देवगण अपने राजा की दशा को देख कर समझ गये कि यह कोई साधारन पराजय नहीं बलकि एक आध्यात्मिक जागरती
25:51का आरंभ था
25:53अगनी के ज्वलंत क्रोध और वायू के प्रचंड वेग की शक्ती का भी अब कोई अर्थ नहीं रहा था
26:00यह वहक्षन था जब देवों के राजा को अपनी शक्ती की सीमाओं का एहसास हुआ और सत्य की खोज के
26:07मार्ग पर पहला कदम रखा
26:10यक्ष अवतार का यह रहस्यमय अंत देवों के लिए एक नई दिशा का सूचक बन गया
26:17इंद्र का घमंड तूटा और उसके स्थान पर विनमरता और ज्ञान की प्यास ने जन्म लिया
26:24अगनी वायू और इंद्र की शक्ती के चरम पर भी उस यक्ष के तिनके के समान साधारन कृत्य ने स्वयं
26:31को सर्वोप्री सिध्ध कर दिया था
26:34जैसे ही यक्ष का अलौकिक रूप वायू में विलीन हुआ देवराज इंद्र और अन्य देवगन भय और विस्मय से काप
26:41उठे उनका सारा अहमकार क्षन भर में चूर-चूर हो गया
26:46तभी उस रिक्ट स्थान से एक दिव्य प्रकाश पुंज उभरा जिसने पूरे देवलोग को अपने स्वर्ण आभा से भर दिया
26:54जो किसी अनंत ब्रहमांडिय सूर्योदय का संकेट दे रहा था
26:59उस प्रकाश के मध्य से देवी उमा जिन्हें हयग्रीवी के नाम से जाना जाता है एक अध्भुत अलोकिक स्वर्णिम रूप
27:07में प्रकट हुई जिनकी कांती ब्रहमांड के समस्त रतनों से भी अधिक दीप्तिमान थी
27:13उनका स्वर्णिम विग्रह सहस्र सूर्यों की भानती प्रजवलित हो रहा था जिसने इंद्र की आखों को चकाचौंध कर दिया और
27:22उनके हृदय में कमकम्टी उत्पन्न कर दी
27:25देवी हयग्रीवी ने अपनी मधुर किंतु द्रिढवानी में इंद्र से कहा के देवराज यह विस्मय का क्षण है जब सत्य
27:34का आवर्ण हट रहा है
27:36तुम जिस यक्ष को देख रहे थे वह कोई साधारन प्राणी नहीं अपितु स्वया आदिदेव महादेव थे जो तुम्हारे अहंकार
27:45को विगलित करने आये थे
27:47उनकी शक्ती की एक चिंगारी मात्र तुम्हारी समस्थ देवत्व को प्रकाशित करती है जो स्वया अनंत चेतना के सागर में
27:56एक तुछ बिंदु है
27:58अगनी वायू और इंद्र तुम्हारी अपनी शक्ती मात्र उस परम चेतना से प्राप्ट आभा है उसी के सम्मुख तुम सब
28:06गौन हो
28:07यह यक्ष अवतार मेरे पती का वहरूप था जिसने तुम्हारे मत को चूर किया और तुम्हें तुम्हारी वास्तविक स्थिती का
28:16बोध कराया
28:18जैसे एक घड़ा जल से भरा हो और उसमें से एक बूंद भी उस असीन सागर में विलीन हो जाएं
28:25वैसे ही तुम्हारी शक्ती भी उसी परम तत्व की देन है
28:30आथ़ अपने अहंकार को त्यागो और उस परम सत्य को स्विकार करो जो तुम्हारे अस्तित्व का आधार है वही आदी
28:38और अनंत है
28:40वह त्रिमूर्ती से भी परे हैं वे अनादी अनंत निरगुन और निराकार ब्रह्मा हैं जो इस समस्त सृष्टी का आदी
28:49कारण है
28:51जैसे तिनका अगने को बुझा सकता है, वैसे ही एक तुछ वस्तु भी सत्य के समक्ष मत को राख कर
28:58सकती है, यही इस लीला का सार था
29:01जब तुम सब अपने अहंकार में डूबे थे, तब प्रभु ने स्वयन लीला रचकर तुम्हारा घमंड तोड़ा, तुम्हें यह सिखाने
29:09के लिए कि वे ही परम सकता है
29:12जह स्मरण रखो कि देवत्व तुम्हारा अभिमान नहीं, अपितु उस परम शक्ती की कृपा है, जिसकी तुम मात्र एक अभिव्यक्ती
29:21हो
29:22अब जाओ और इस ज्ञान को अपने हृदय में धारण कर, अपने कततव्यों का निर्वेहन करो, परन्तु अब अभिमान के
29:30साथ नहीं, बलकि विनमर्ता के साथ
29:33यह कहकर देवी हयग्रीवी धीरे-धीरे उसी स्वर्णिन प्रकाश में विलीन हो गई, उस स्थान को केवल एक गहन शांती
29:42और आध्यात्मिक बोध से परिपूर्ण छोड़ गई
29:46देवताओं ने अपने अहंकार को त्याग कर, अपने अधिपती के प्रती गहरी श्रद्धा और कृतग्यता का अनुभव किया, जो उन्हें
29:54उसक्षन प्राप्थ हुआ था
29:57उस दिन से देवताओं ने सीखा कि सच्ची शक्ती अहंकार में नहीं, बलकि उस परम सत्य की विनमर सेवा में
30:04नहित है, जो समस्थ स्रिष्टी का आधार है
30:09देवताओं के घमंड की राख से उपजी नमरता के साथ, इंद्र, वायू और अगनी ने देवी उमा और शिव के
30:16चर्णों में अपना शीश नवाया, पश्चाताप की अश्रुधारा से उनके चर्णों को धोते हुए
30:23देवी उमा ने अपनी करुणा की वर्षा करते हुए उन तीनों को उठाया, यह समझाते हुए कि सच्चा बल अहंकार
30:30में नहीं, अपितु विनमरता और आत्म ज्यान में नहित है
30:36भगवान शिव यक्ष रूप में अपनी असीन शक्ती और ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए बोले अहंकार वह अंधकार है जो
30:44सत्य के प्रकाश को अवरुद्ध करता है और केवल आत्म निरीक्षन ही इसे दूर कर सकता है
30:51उन्होंने तिनके की गोर इशारा किया जो कभी उनकी शक्ती का प्रतीक था और कहा यह छोटा सा तिनका भी
30:59जब ज्ञान के प्रकाश से प्रज्वलित होता है तो त्रिलोग को हिलाने की क्षमता रखता है
31:06इंद्रक जिन्हें अपने वजर की शक्ती पर अभिमान था, उस तिनके की शक्ती देखकर चकित रह गए, जो उनके सबसे
31:14शक्तिशाली शस्त्र से भी अधिक तेजस्वी प्रतीत हो रहा था
31:19वायूक जिसके जोकों से ब्रहमांड काम पता था, उस तिनके की स्थिर्ता और शान्ती को देखकर अवाक रह गए, जो
31:26उनके सबसे प्रचंड तूफान से अधिक स्थाई लग रहा था
31:31अगनी जिसकी ज्वालाएं स्रिष्टी को भस्न कर सकती थी, उस तिनके की निर्मलता को देखकर स्तंभित रह गए, जिसने उनके
31:39अगनितत्व के उग्रस्वभाव को शान्त कर दिया था
31:44भगवान शिव ने समझाया, तुम्हारा घमंड तुम्हें उस असीम शान्ती और शक्ती से दूर कर रहा था जो तुम में
31:51ही वास करती है, अब उस अहमकार का त्याग करो
31:55देवी उमा ने आगे कहा, अपने हृदय के अंधकार को स्विकार करो, और उस अंधकार को प्रेम और सेवा के
32:03प्रकाश से भर दो, यही सच्ची भक्ती का मार्ग है
32:07तीनों देवताओं ने अपनी भूल स्विकार की और शिवपार्वती की शरणली स्वयन को उनकी असीम कृपा और मार्गदर्शन के अधीन
32:16कर दिया
32:18सुर्मुनी श्री सूट जी ने कहा इस प्रकार भगवान शिव के यक्ष अवतार ने देवताओं के अहमकार का नाश किया
32:25उन्हें आत्मज्यान के पथ पर अग्रसर किया
32:29उन्होंने आगे बताया यह अवतार स्वयं को परम सत्य मानने वाले देवताओं के भ्रम को दूर करने और उन्हें उनकी
32:37सीमाओं का बोध कराने के लिए था
32:40जैसे एक कुमहार मिट्टी को आकार देता है वैसे ही शिव ने उन तीनों के अहमकारी स्वभाव को तोड़ कर
32:48उन्हें विनमर्ता की नई काया प्रदान की
32:51तिनके का दृष्टांट एक महान सत्य का प्रतीक था कि सर्वोच शक्ती अहमकार की गर्जना में नहीं बलकि विनमर्ता की
33:00मौन स्वीकृती में पाई जाती है
33:03देवताओं ने सीखा कि उनका असली स्वरूप अहंकार की क्षणिक चमक में नहीं, बलकि शाश्वत सत्य के प्रकाश में प्रकाशित
33:12होता है
33:14भगवान शिव ने अपने यक्ष रूप को विसर्जित किया, लेकिन उनके द्वारा दिया गया ज्यान देवताओं के हृद्यों में सदा
33:21के लिए अनकित हो गया
33:24देवी उमाने देवताओं को आशिरवाद दिया, यह कहते हुए कि उन्होंने अपने अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली है, और
33:32अब वे आत्म ज्यान की ओर अग्रसर है
33:36और इस प्रकार यक्ष अवतार की कथा समाप्त हुई एक ऐसी गाथा जो हमें सिखाती है कि सच्चा देवत्व अहंकार
33:44के त्याग में और विनमर्ता के मार्ग को अपनाने में है
33:49जो भी इस कथा को प्रेम और श्रद्धा से सुनेगा, वह अपने अहंकार के बंधनों से मुक्त होगा और शिव
33:56की क्रिपा का पात्र बनेगा
33:59ओम नमा शिवाए
34:00इस प्रकार शिव पुरान की यह कथा सभी के लिए कल्यानकारी हो
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