Discover the glorious cosmic origin of Lord Hanuman, the 11th Rudra avatar of Lord Shiva. In this 54th episode of our Shiva Purana series, witness how Lord Shiva's divine energy was carried by Vayu Dev to Anjana's womb, resulting in the birth of the ultimate symbol of strength, humility, and devotion. Learn why the supreme destroyer chose to become a humble servant of Lord Rama, the cosmic boons granted to young Hanuman by the Devas, and the true spiritual significance of the Rudra Avatar. #HanumanAvatar #ShivaPurana #Rudravatar #LordShiva #LordRama #Hanuman #SpiritualAwakening #HinduMythology
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00:00त्रेटा युग के आरंभ की आहट के साथ, जैसे ही ब्रहमांड भगवन विश्नु के राम अवतार की प्रतीक्षा में थमसा
00:07गया, देवलोक में एक गहन चिन्ता की लहर दौड गई.
00:12कैलाश के हिम्मंडित शिखर पर विराजमान, आदी योगी भगवान शिव ने तीनों लोकों में व्याप्त इस बेचैनी को अपने त्रिनेत्र
00:20से देखा.
00:21भगवन विश्नु के आगामी राम अवतार की महत्ता और रावन जैसे महाशक्तिशाली असुर के विनाश की आवश्शक्ता को वे भलीभाती
00:30समझते थे.
00:32शिव के हृदय में भगवन विश्नु के प्रती अनन्य भक्ती और सेवा का भाव जागरित हुआ, जो शाश्वत एक्ता का
00:40प्रतीक था.
00:42उन्होंने निश्चय किया कि वे स्वयन एक ऐसे स्वरूप में प्रित्वी पर अवत्रित होंगे जो भगवन राम के चर्णों की
00:49सेवा कर सके.
00:51यह केवल देवों के आदेश का पालन नहीं, अपितु उनके अपने हृदय की गहरी इच्छा थी, जो स्रिष्टी के संतुलन
00:59को बनाये रखने के लिए व्याकुल थी.
01:02माता पार्वती, जो सदैव शिव के साथ चाया की भाती रहती थी, उनके संकल्प को देखकर प्रसन्न हुई.
01:11उन्होंने शिव से पूछा, हे महादेव, आप किस अवतार में प्रित्वी पर जा रहे हैं और आपका क्या उद्देश होगा?
01:20भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, प्रिये, मैं पवनपुत्र हनुमान के रूप में प्रित्वी पर अवत्रित होंगा, जो वानर रूपी
01:28महाशक्ती होगा.
01:30यह स्वरूप न केवल बल में अतुल्निय होगा, बल की भगवन राम के प्रती मेरी असीम भक्ती का प्रतीक भी
01:37बनेगा.
01:38माता पार्वती ने उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए कहा, आपका संकल्प प्रशन सनिय है, महादेख मैं आपको पूर्ण समर्थन
01:48देती हूँ.
01:49शिव का यह संकल्प मात्र एक अवतार नहीं, अपितु ईश्वर और भक्त के शाश्वत संबंध का पुनर्रिली क्रण था.
01:58उन्होंने नारद मुनी को बुलाया, जो तीनों लोकों में विचर्ण करते थे और देवों के संदेशवाहक थे.
02:06नारद शिव के संकल्प को जानकर उसे प्रित्वी पर निश्पादित करने हेतु शीघृता से चल पड़े.
02:13शिव की इच्छाथी की हनुमान अवतार शक्ती, भक्ती और सेवा का वह संगम बने, जिसकी आवश्शक्ता त्रेता युग में होगी.
02:23यह देवों के लिए एक आशा की किरण थी, कि शिव स्वय भगवन राम के सबसे बड़े सहायक के रूप
02:30में अवत्रित हो रहे हैं.
02:32और इस प्रकार आदी योगी शिव ने अपने ग्यारहवे रुद्रावतार महाबली हनुमान को जन्म देने का संकल्त लिया.
02:41त्रेटा युग की वह महत्वपूर्ण बेला निकट आ रही थी, जब भक्ती का यह अध्भुत अवतार प्रित्वी पर अवत्रित होकर
02:49धर्म की स्थापना में सहायक बनेगा.
02:52जब त्रिकाल दर्शी भगवान शिव ने मोहिनी रूपी श्री हरी के अलोकिक सौंदर्य को निहारा, तो ब्रहमान्डिय उर्जा का एक
03:00ऐसा दिव्यतेज उत्पन हुआ जिसने संपूर्ण त्रिलोग को प्रकाशित कर दिया.
03:05यह तीवर स्पंदित दैविय शक्ती, जो नवजात शिशु की भांती नवचेतन थी, कैलाश परवत की बरफीली चोटियों के मध्य एक
03:15प्रकाशपुंच के रूप में केंद्रित हो गई.
03:19सब्तर्शियों ने अपने तपोबल से उस उश्म और अत्यंत शक्तिशाली तेज को नियंत्रित किया, मानों वे किसी अनमोल रत्न को
03:27सहेज रहे हूं.
03:29उन्होंने उस दिव्यतेज को एक अलौकिक पात्र में अत्यंत सावधानी से स्थापित किया, जो भविष्य के एक महान अवतार का
03:37बीज था.
03:39फिर उन महर्शियों ने पवन देव वायुपुत्र मारुत को स्मरण किया, जो अपनी सर्वव्यापी प्रकृती के कारण इस दिव्य उर्जा
03:47के वाहत बनने योग्य थे.
03:50वायुदेव, जो चेतना की भांती सर्वत्र विद्यमान है, शीघरता से प्रकट हुए, उनके आगमन से दिशाएं पवन के जोकों से
03:59भर उठी.
04:01सब्तर्शियों ने पवन देव को वह दिव्य उर्जायुक्ट पात्र सौपा, यह निर्देश देते हुए कि इसे तब तक सुरक्षित रखें,
04:09जब तक कि स्वय भगवान शिव आदेश न दें.
04:13वायु देव ने उस अमूल्य भार को सहर्ष स्वीकार किया, उनकी शक्ती और गती ही उस दिव्य तेश की रक्षा
04:20का एक मात्र आधार थे.
04:23उन्होंने उस तेश को अपनी चेतना में समाहित कर लिया, जिससे वह उनकी ही भांती सर्वव्यापी और क्षणक्षण परिवर्तनशील हो
04:31गया.
04:33ब्रहमांड के कोने-कोने में यह दिव्य उर्जा वायु देव के साथ विचर्ण करने लगी अपने पूर्ण प्रकट होने की
04:40प्रतीक्षा में.
04:42यह वह दिव्य बीज था, जिसमें भगवान शिव का एकादश रुद्र अवतार बनने की असीम क्षमता संचित थी.
04:51काल की गती अपने रहस्यमई पत पर आगे बढ़ती रही उसक्षन की प्रतीक्षा करते हुए जब यह तेज प्रकट होकर
04:58धरा को धन्य करेगा.
05:01अंधकार्मय युगों के आगमन की आहट सुनाई देने लगी और दुष्ट शक्तिया प्रिथवी पर आतंक फैलाने लगी.
05:09धर्मात माओं की पुकार और अधर्म के बढ़ते प्रभाव ने स्वया आदिदेव को व्याकुल कर दिया.
05:16तब भगवान शिव ने पुनह श्री हरी का वह मोहक मोहिनी रूप स्मरण किया, जिससे वह दिव्य उर्जा सर्वप्रथम उत्पन
05:24हुई थी.
05:26उस स्मरण मात्र से, जैसे किसी बीज को जल मिलने पर अंकुर फूटता है, वायु देव में संचित वह दिव्य
05:33तेज पुनह स्पंदित होने लगा.
05:36यह स्पंदन इतना तीवर था कि इसने संपून ब्रहमांड में एक उर्जालहर दोडा दी, मानो प्रकृती स्वयन किसी महान घटना
05:45की साक्षी बनने वाली हो.
05:48भगवान शिव की आग्या का संकेट मिलते ही, वायु देव ने उस दिव्य तेज को पृत्वी की ओर निर्देशित करना
05:55प्रारंब कर दिया.
05:57वह दिव्य तेज, जो अब पृत्वी के वायु मंडल में प्रवेश कर रहा था, वानर मुखिय रूप धारन करने की
06:04दिशा में अग्रसर हो रहा था.
06:07इस प्रकार भगवान शिव के एकादश रुद्र अवतार, जो श्री राम के परम भक्त बनने वाले थे, का जन्म एक
06:15महादिव्य प्रक्रिया के माध्यम से आरंभ हो चुका था.
06:19किशकिंधा के घने, प्राचीन वनों के हृदय में, जहां सूर्य की किरने भी मुश्किल से धर्ती को छूपाती थी, देवी
06:27अंजना अपने पती केसरी के साथ निवास करती थी, जो स्वयन एक वानर राजा थे.
06:34एक दिव्य योध्धा और अपसरा होने के बावजूद, एक श्राप ने अंजना को वानर रूप में जीवन जीने के लिए
06:41विवश कर दिया था, लेकिन उनका हृदय कभी भी अपने दिव्य स्वरूप को नहीं भूला.
06:47अपने पती केसरी के पूर्ण समर्थन के साथ, अंजना ने स्वयन को भगवान शिव की आराधना में लीन कर दिया,
06:55एक ऐसे पुत्र की इच्छा में जो उनकी ही तरहे पराक्रमी और दैविय गुनों से परिपूर्ण हो.
07:02उनकी तपस्या इतनी कठोर और तीवर्थी की वर्षों बीत गए, लेकिन उनकी भक्ती में कोई कमी नहीं आई, मानोवे स्वयन
07:10शिव को अपने सम्मुख प्रकट होने के लिए विवश कर रही हो.
07:15अंजना ने अन्नजल त्याद दिया, केवल वायू का सेवन कर स्वयन को पूर्णतह महादेव की भक्ती में समर्पित कर दिया,
07:23उनकी आत्मा शिव के दिव्य स्वरूप में विलीन होने लगी.
07:28उनके पती के स्री, जो स्वयन एक शक्तिशाली योध्धा थे, ने भी अपनी पत्नी का हर कदम पर साथ दिया,
07:35उनकी निष्ठा और प्रेम अंजना की तपस्या की अगनी को और भी प्रजवलित कर रहे थे.
07:42जैसे जैसे अंजना की तपस्या चरम पर पहुँचने लगी, किशकिंधा के वन कम्पित होने लगे, प्रकृती स्वयन उस अलौकिक शक्ती
07:50का साक्षी बन रही थी, जो प्रकट होने वाली थी.
07:54उनकी पवित्र तपस्या की गूंच कैलाश परवत तक पहुँची, जहां स्वया भगवान शिव अपनी प्रिय पत्नी पारवती के साथ विराजमान
08:03थे.
08:04शिव जो सृष्टी के रहसियों को जानते थे, ने अंजना की अटूट भक्ती और पुत्र की तीवर इच्छा को महसूस
08:12किया, और उन्होंने उसे वर्दान देने का निर्णय लिया.
08:17भगवान शिव ने अपनी पत्नी, देवी पारवती से परामर्ष किया, जिन्होंने अंजना की पवित्र कामना को स्विकार किया और शिव
08:25के अवतार के लिए अपनी सहमती प्रदान की.
08:29शिव ने अपनी अलौकिक शक्ती का एक अंश अपने रुद्र रूप की उर्जा को अंजना की तपस्या के केंद्र में
08:36भेजने का निश्चय किया
08:39यह दिव्य उर्जा एक शक्टिशाली पवन के रूप में
08:43किश्किंधा के वनों में अंजना की और प्रवाहित हुई
08:46जो शिव के आशिर्वात का प्रतीक थी
08:49उस पवन ने अंजना के शरीर में प्रवेश किया
08:53और वह गर्भवती हुई
08:54शिव के अंश को अपने गर्भ में धारण कर जो आगे चल कर हनुमान के रूप में अवत्रित होंगे
09:02अंजना ने अपने गर्भ में शिव के तेज को धारण किया और उनकी तपस्या का फल उन्हें प्राप्थ हुआ
09:08एक ऐसे पुत्र का वर्दान जो चिरंजीवी, बल्वान और भगवान राम का परम भक्त होगा
09:15भगवान शिव ने स्वय अपने रुद्र अवतार को अंजना के पुत्र के रूप में जन्म लेने का आदेश दिया
09:22ताकि वह धर्म की रक्षा कर सकें और श्री राम के महान कार्य में सहायक बन सकें
09:28इस प्रकार भगवान शिव के ग्यारहवे रुद्रावतार पवनपुत्र हनुमान का जन्म निश्चित हुआ
09:35जो शक्ती, भक्ती और सेवा का अध्भुत संगम थे
09:40अंजनाकी वर्षों की तपस्या व्यर्थ नहीं गई
09:42उन्होंने न केवल अपने लिए बलकि संपून ब्रहमांड के लिए एक ऐसे रक्षक को जन्म दिया जो हमेशा धर्म के
09:50साथ खड़ा रहेगा
09:52शिव के वर्दान और अंजनाकी भक्ती के संगम से हनुमान का जन्म हुआ
09:57वे पहले से ही असाधारन शक्ती और अलोकिक शम्ताओं से युक्त थे
10:03इस प्रकार भगवान शिव ने स्वयन पवन के देवता वायू के माध्यम से अंजना को अपना अंश प्रदान किया
10:10और श्री हनुमान के रूप में एक ऐसे भक्त का उदे हुआ जो युगो लुगो तक पूजनिय रहेगा
10:18शिव के अदमय संकल्प के साथ वायू देव ने उस दिव्य उर्जा को आकाश में ले जाना शुरू किया
10:24जो एक अनमोल खजाने की तरह हवाओं में तैर रही थी
10:29बादलों के चीरते हुए वायू देव हवा के देव अपनी अदरिश शक्ती से उस पवित्र बीज को लेकर अंजना के
10:37ध्यानमगन स्वरूप की ओर बढ़े
10:40जैसे ही वायू देव ने उस दिव्य शक्ती को अंजना के मुख में प्रवाहित किया
10:45वह एक अलौकिक प्रकाश से घिर गई मानो स्वयं ब्रह्मान की उर्जा उसमें समा गई हो
10:52अंजना के भीतर शिव के अंश ने एक नया जीवन लिया
10:56एक दिव्य ज्वाला की तरहे प्रजवलित होकर जो स्रिष्टी के सबसे बड़े रक्षक के आगमन का संकेत दे रही थी
11:04यह मात्र गर्भाधान नहीं था बलकि स्वय भगवान शिव का ग्यारहवा रुद्रावतार एक परम भक्त के रूप में प्रित्वी पर
11:12अवत्रित होने की प्रतिग्या थी
11:16ब्रहमांडिय उर्जा का वह संगम, शिव की शक्ती और अंजना की पवित्रता एक ऐसे शिशु के जन्म की नीम रख
11:23रहा था जो समस्त स्रिष्टी का रक्षक बनेगा
11:27अंजना ने अपने भीतर हो रहे इस अलौकिक परिवर्तन को महसूस किया, एक ऐसी दिव्य चेतना के जागर्ण को जो
11:35अब तक केवल देवताओं के लोक में ही संभव थी
11:39धर्ती पर आने वाले इस महान योध्धा के जन्म की खब वायु देव के माध्यम से तीनों लोकों में गुझ
11:46उठी, जिससे देवताओं और असुरों में हल्चल मच गई
11:51देवताओं ने इस शुब समाचार का स्वागत आनंद और उल्लास से किया, क्योंकि वे जानते थे कि यह अवतार अधर्म
11:59के नाश और धर्म की पुनरस्थापना के लिए आया है
12:04परंतु अंधकार के लोकों में असुरों के हृदय में भय और क्रोध की लहर दोड़ गई, क्योंकि वे इस दिव्य
12:10शक्ती के आगमन से अपने विनाश का पूर्वाभास कर रहे थे
12:16अंजना अब स्वयन एक दिव्य योध्धा के समान अपने भीतर पल रहे उस अंश की रक्षा के लिए संकल्पित हो
12:23गई, जो शिव का ही एक स्वरूप था
12:26शिव ने वर्दान दिया था कि वह अंजना के हिरिदय में वास करेंगे उस पवित्र भूमी पर जहां धर्म की
12:34पुनहस थापना का बीज बोया जा रहा था
12:37यह दिव्य मिलन केवल एक शिशु का जन्म नहीं था, बलकि यह शिव के ग्यारहवे रुद्र का वह अवतार था
12:44जो अत्यंत भक्ती और सेवा के मार्ग का अनुसर्ण करेगा
12:49वायु देव ने यह संदेश देवताओं को दिया कि शिव का ग्यारहवा रुद्रावतार वायु पुत्र के रूप में धरापर अवतरित
12:57होने वाला है
12:59अंजना का शरीर उस दिव्य बीज के कारण अब सामान्य नहीं रहा वह स्वय एक पवित्र मंदिर बन गया था
13:07जो आने वाले देवत्व को धारण करने के लिए तयार था
13:12शिव के आशिरवाद से उस दिव्य बीज में जीवन का स्पंदन तेज हो गया जो प्रकृती के सबसे शांत कोनों
13:19में भी एक हल्चल मचा रहा था
13:22यह वहक्षन था जब शिव ने अपनी शक्ती का एक अंश अपने परमभक्त के रूप में संसार को बचाने के
13:30लिए भीजा
13:31अंजना के हृदय में शिव का अंश अब पूर्ण रूप से विक्सित होकर एक ऐसे वीर का रूप धारन करने
13:38को तैयार था जो आने वाले समय में अत्यंत पराक्रमी सिध्ध होगा
13:43इस प्रकार ग्यारहवे रुद्रावतार हनुमान का जन्म शिव की इच्छा और वायू की सहायता से प्रित्वी पर धर्म की रक्षा
13:52के लिए एक नई आशा का संचार कर रहा था
13:56यह पवित्र अवतार जो शिव के ग्यारहवे रुद्रावतार के रूप में प्रकट हुआ
14:01श्री राम के सबसे बड़े भक्त बनने की यात्रा का पहला कदम था
14:07ग्रहों के शुब सन्योग में जैसे ही नक्षत्रों ने अपने सबसे शक्तिशाली संरेखन में प्रवेश किया
14:13अंजना के गर्भ में एक दिव्य उर्जा का संचार होने लगा
14:18जैसे ही पूर्णिमा का चंद्रमा आकाश में अपने चरम पर पहुँचा
14:23एक स्वर्गिय गर्जना के साथ अंजना ने एक ऐसे शिशु को जन्म दिया जिसकी आभा ने पूरी वानर पूरी को
14:30स्वर्णिम प्रकाश से सराबोर कर दिया
14:32उस नवजात शिशु की त्वचा सूर्य की भांती स्वर्ण कांती से दमक रही थी
14:38और उसके मुख मंडल पर शिव के एकादश रुद्र का तेजस्वी तेज पश्ट रूप से जलक रहा था
14:46उसके छोटे से शरीर में अदमय शक्ती का सागर समाया था
14:50जो हर पल वानर लोग के कणकण में एक नई उर्जा और उत्साह का संचार कर रहा था
14:57वानर राज केसरी अपने पुत्र के अलौकिक रूप को देखकर धन्य हो गए उनकी आखों में कृतग्यता और गर्व के
15:05आसु अविरल बहने लगे
15:07देवताओं और रिशियों ने स्वर्ग से इस अध्भुत अवतरण को देखा और जैकार के नारों से त्रिलोक गूँझ उठा
15:16नारद मुनी वीना बजाते हुए उस नवजात शिशु की प्रशनसा में मधूर श्लोक गाने लगे उसके भविश्य की महानता का
15:24गुनगान करते हुए
15:26शिव के एकादश रुद्र का अंश उस बालक में प्रकट हो रहा था एक ऐसी शक्ती जो गुराई के अंधकार
15:33को चीरने और धर्म की स्थापना के लिए तक पर थी
15:38अंजना ने अपने पुत्र को गोद में उठाया उसके स्वर्निम स्पर्शने जैसे उसे एक अभूत पूर्व दिव्यता और शक्ती का
15:46अनुभव कराया
15:48वानर सामराज्य आनंद से जूम उठा हर दिशा से उत्सव की ध्वनिया और बधाई संदेश गूजने लगे
15:56भगवान शिव कैलाश परवत पर विराजमान अपने ग्यारहवे रुद्रावतार के जन्म पर मुस्कुराएं उनके त्रिशूल से एक कोमल उर्जा निकली
16:06देवी पारवती ने अपने स्वामी के आनंद को साजा किया उन्होंने भी उस नवजात रुद्र की शक्ती और भविष्य के
16:14कल्यानकारी कारियों के बारे में सोचा
16:17यह बालक कोई साधारन प्राणी नहीं था बलकी स्वयन शिव का अंश था जो धर्म और न्याय की रक्षा के
16:25लिए अवत्रित हुआ था
16:27उसकी दिव्य आभा इतनी प्रबल थी कि उसने समस्त वानर सेना के हृदय में अटूट विश्वास और साहस भर दिया
16:36पवन देव जो स्वयं वायू के स्वामी थे अपने पुत्र की शक्ती और तेज को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और
16:43उसे अपना आशिरवाद दिया
16:46जैसे जैसे वह बालक बढ़ता गया उसकी शरारते भी शिव के तांडव की भांती चंचल और उर्जावान होती गई जो
16:55आनंद और आश्चर्य का स्रोत थी
16:58एक बार सूर्य को फल समझ कर वह बालक उसे पकड़ने के लिए आकाश में उड़ गया जिसने देवराज इंद्र
17:06को भी चकित कर दिया
17:08इंद्र के वजर प्रहार से वह भूमी पर गिर पड़ा परंतु शिव की क्रिपा से उसे केवल एक छोटी सी
17:14चोट आई और उसका नाम हनुमान पड़ गया
17:18इस प्रकार भगवान शिव के एकादश रुद्र रूप, पवन देव के पुत्र और अंजना के लाल हनुमान के रूप में
17:26जन में जो आगे चल कर भगवान श्री राम के परम भक्त बने
17:31बाल हनुमान की अदमे भूख ने उन्हें बालेकाल की एक ऐसी यात्रा पर प्रेरित किया जहाकाल और ब्रहमांड भी थम
17:39गए
17:40उस नवजात शिशु की आखें, जिन में ब्रहमांडिय जिग्यासा भरी थी, एक विशाल दहकते हुए फल के समान दिखने वाले
17:48सूर्य पर टिक गई
17:51उसकी शिशुसुलब कल्पना में सूर्य कोई देव नहीं, अपितु एक अलौकिक रस से भरा हुआ फल था जो उसकी क्षुधा
17:59को शांत कर सकता था
18:01एक ऐसी चलांग जो गुरुत्वाकर्शन के नियमों को धता बताती थी, ननहे मारुती को अनन्त आकाश की ओर ले गई
18:10पलक जपकते ही उसने न केवल देव लोग को पार किया, बलकी ब्रहमांडिय व्यवस्था को भी हिला कर रख दिया
18:19देवताओं के स्वर्गलोक में हलचल मच गई, मानो किसी अन्जाने तूफान ने उनकी शांती भंग कर दी हो
18:27भगवान सूर्य जो अपने नित्यरत पर सवार थे, अचानक एक ऐसे आगंतुक से मिले जिसकी गती अकलपनी थी
18:36नारद मुनी जो ब्रहमांडिय यात्राओं के साक्षी थे, इस असाधारन शिशु की और इंगित कर रहे थे
18:44राहु अंधकार का दूट, जिसने पहले ही सूर्य को ग्रासने की दुष्ट योजना बनाई थी, इस नए प्रतियोगी को देखकर
18:52भयभीत हो गया
18:54नन्हे मारुती की उडान में न केवल गती थी, बलकि एक ऐसी शक्ती थी जो देवताओं के लिए भी समझ
19:01से परे थी
19:03ब्रहमा, सृष्टी के रच्चिता, अपने कमल आसन पर बैठे, इस अलोकिक घटना को गंभीर दृष्टी से देख रहे थे
19:12विश्णू पालनकर्ता, शीर सागर में अपने दिव्य आसन पर विराजमान मंद मुस्कान के साथ इस बाल लीला का अवलोकन कर
19:20रहे थे
19:22शिव, विनाशक और सनहारक अपनी कैलाश परवत की ध्यानस्थ मुद्रा से जागरित हुए, उनके त्रिशूल की आभा तीवरहो उठी
19:32पारवती आदी शक्ती अपने स्वामी के पास खड़ी थी, उनकी आखों में अपने पुत्र की अदमें उर्जा पर गर्व और
19:39चिन्ता का भाव था
19:42सूर्य देव, जिन्होंने इस बाल हनुमान को अपनी ओर आते देखा, उन्होंने कभी ऐसी अपार शक्ती का अनुभव नहीं किया
19:50था
19:52मारुती अपनी यात्रा के चरम पर सूर्य को निकट आते देख, उसकी प्रसन्नता और बढ़ गई, जैसे कोई खजाना हाथ
20:00लगने वाला हो
20:02उसकी अलौकिक शक्ती के कारण सूर्य की दिव्यकिरने भी उसके लिए मंद पड़ गई, जैसे कोई छोटा दीपक किसी महासागर
20:10के सामने हो
20:12जैसे ही वह सूर्य को पकड़ने के लिए जपता, देवलोक में एक क्षण के लिए सन्नाटा चा गया, सभी की
20:19सासे थम गई
20:21यह वही बाल हनुमान थे, जिनका जन्म भविष्य में मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम के सबसे बड़े भक्त बनने के लिए
20:29हुआ था
20:31बाल हनुमान बाल सूर्य की भानती तेजों में अपनी अलौकिक शक्ती से खेल रहे थे, मानो ब्रहमान की सारी चंचलता
20:39उन्ही में सिमट आई हो
20:42इंद्र देव, देवराज, ब्रहमान की इस अप्रत्याशित उर्जा से विचलित होकर अपने दिव्य हाथी एरावत पर आरूड होकर तीवर गती
20:51से प्रकट हुए
20:53उन्होंने बाल हनुमान को एक संभावित खत्रा मान कर अपने वजर के प्रहार से उस ननहे से जीवन को अंधकार
21:00में धकेल दिया
21:02वजर के प्रहार से हनुमान का मुखमंडल विकृत हो गया, उनकी चेतना पर मानो घोर रात्री का सामराज जचा गया
21:11अपने प्रिय पुत्र पर हुए इस आघात से वायु देव का हृदय कृध अगनी की भांती धधक उठा
21:19देव लोग से लेकर पाताल लोग तक समस्त ब्रहमान की वायु को उन्होंने अपने कोप में समाहित कर लिया
21:27सास लेना दूभर हो गया देव, दानव, गंधर्व सब जैसे मृत्यू के कगार पर खड़े हो गए
21:34इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ यह कोई सामान्य बालक नहीं अपितु शिव का अंश है
21:42उन्होंने तुरंत एरावत को आदेश दिया ये वानर के पुत्र
21:47शीधर मेरे पुत्र को जीवन दान दो, अन्यथा मेरा वजर तुम्हें भस्म कर देगा
21:54वायु देव जिनकी गर्जना से त्रिलोग काम पता था, उन्होंने अपने पुत्र की कराहट सुनी और उनका कोप कुछ शान्त
22:02हुआ
22:03उन्होंने जैसे ही अपने नन्हे पुत्र को स्पर्श किया, एक अद्भुत दिव्य उर्जा का संचार हुआ
22:11हनुमान के मुखमंडल पर आई विकृती धीरे-धीरे मिटने लगी, जैसे प्रातहकालीन सूर्य की प्रथम किरने अंधकार को चीर देती
22:19है
22:21वायु देव ने इंद्र से कहा, यह शिशु केवल खेलने हे तुही उत्पन हुआ था, आपने बिना विचारे इसका अपमान
22:29किया है
22:31इंद्र देव ने क्षमा याचना की और स्वय अपने वजर से हनुमान के मुख को स्पर्श कर उसे पूर्णता प्रदान
22:38की
22:40जैसे ही हनुमान ने पुनह चेतना प्राप्त की, उनकी आखें पुनह सूर्य की किरनोसी प्रजवलित हो उठी
22:48उन्होंने पुनह इंद्र को अपनी बालसुलब शरारत का शिकार बनाया, मानो पिछली सारी पीडा एक विस्मृत स्वपन हो
22:57वायुदेव ने अपने पुत्र को आशिर्वाद दिया, जाओ पुत्र तुम शिव के अंश हो और तुम्हारा भाग्य महान है
23:05शिव कैलाश परवत परस्थित अपने एकादश रुद्र अवतार को देख कर मंदमंद मुस्कुरा रहे थे, मानो उन्हें अपने कार्य की
23:14सिध्धी का पूर्ण विश्वास हो
23:18पार्वती जी शिव के पार्श्व में बैठी, उस बाल स्वरूप शिव के अंश को देख रही थी, उनके हृदय में
23:24वात्सले का सागर उमड रहा था
23:28हनुमान के रूप में, शिव ने स्वयं को राम के चर्णों में समर्पित करने का वहम मार्ग प्रशस्त किया, जो
23:34तीनों लोकों के लिए एक सागा का आरंभ था
23:39जैसे ही वायु देव का क्रोध शान्त हुआ, ब्रह्मा, विश्नु और शिव की त्रिमूर्ती उस मूर्चित शिशु के पास पहुँचे,
23:46उनके दिव्यस पर्श मात्र से बालक ततकाल सजीव हो उठा
23:51भगवान शिव ने वात्सल्य भाव से उस नवजात का नाम हनुमान रखा, जिसका अर्थ है विनाश रहित जो उसके अटल
23:59भविश्य का प्रतीक था
24:02स्रिश्टी की शांती बनाये रखने के लिए देवों ने उस बालक पर ऐसे वर्दान बरसाए जो उसे अमर और अजे
24:09बना देंगे
24:11भगवान विश्णू ने प्रथम वर्दान दिया, जिससे हनुमान को अस्त्रशस्त्रों से अवध्यता प्राप्थ हुई, कोई भी हथियार उसे चूभी न
24:20सके
24:21फिर अगनी देव स्वयं पधारे और वर्दान दिया, की हनुमान अगनी से भी अविनाशी रहेंगे, अगनी उनकी एक तिनके को
24:29भी जला नहीं पाएगी
24:32जल देव ने भी अपनी क्रिपा बरसाई, यह वर्दान देते हुए की हनुमान जल में भी असीम रूप से विचर्ण
24:39कर सकेंगे, वे कभी डूबेंगे नहीं
24:43ब्रह्मा जी ने बालक को असीम बुद्धी और ज्यान का वर्दान दिया, जिससे वे वेदों और शास्त्रों के ज्याता बन
24:50गए
24:51भगवान शिव ने स्वयन उसे इच्छानुसार रूप बदलने की अध्भूत शक्ती प्रदान की, जिससे वह किसी भी आकार में प्रकट
25:00हो सकते थे
25:01और अंत में सभी देवताओं ने सामुहिक रूप से उसे चिरंजीवी होने का वर्दान दिया, जिससे उसका अस्तित्व स्रिष्टी के
25:09अंत तक बना रहे
25:12हनुमान की बालीलाएं अब साधारन नहीं रही, वे उन दिव्य वर्दानों का प्रथम प्रदर्शन थी, जिन्हें उन्होंने प्राप्त किया था
25:21महान रिशी सूर्य देव ने हनुमान के मुख पर एक सुन्दर हनु, जबडा का चिन्ह अंकित किया, जो उनके नाम
25:29का एक स्थाई प्रतीक बन गया
25:32इस प्रकार नवजात हनुमान, देवों द्वारा रक्षित और वर्दानों से युक्त अवत्रित हुए, जिनका भविश्य लिलाओं से भरा था
25:41देवताओं के वर्दानों ने हनुमान को न केवल अभेद्य बनाया, बल्कि उन्हें दैविये चेतना और उद्देश से भी भर दिया
25:50बाल हनुमान की प्रत्येक क्रीडा अब इस बात का प्रमान थी कि वे साधारन बालक नहीं, अपितुस्वय इश्वर के अंश
25:58हैं
26:00यह वर्दानों की वर्षा ही थी, जिसने हनुमान को भविश्य के महान कारियों के लिए तयार किया, उन्हें प्रभु श्री
26:08राम के परम सेवक के रूप में स्थापित किया
26:11विभिन लोकों के अधिपती, जैसे इंद्र और सूर्य स्वया हनुमान की बाल लिलाओं को देख कर विस्मित थे
26:19हनुमान के मुखमंडल पर सदैव एक सौमय मुस्कान रहती, जो उनके भीतर विद्यमान असीम शक्ती का शांत प्रदर्शन थी
26:29यह वह काल था जब हनुमान अपने दिव्य गुनों से परिपूर्ण होकर एक महानायक के रूप में अपनी यात्रा का
26:36शुभारंभ कर रहे थे
26:39वर्दानों की इस वर्षा ने हनुमान को न केवल एक दिव्य योध्धा बनाया, बलकि स्वयं भगवान विष्णु के परम भक्त
26:46बनने का मार्ग भी प्रशस्त किया
26:49बाल हनुमान सूर्य देव के ज्यान प्रकाश में वेदों और शास्त्रों के गूढ रहसियों को ऐसे आत्म साथ कर रहे
26:57थे
26:57मानों वेदों की नदिया उनके अंतर्मन में समाहित हो रही हो
27:03सूर्यदेव ने अपने दिव्य ज्यान से हनुमान को ऐसे परिपूर्ण किया कि काल की गती भी उनके ज्यानार्जन के वेग
27:10के समक्ष नत्मस्तक हो गई
27:13उनके भीतर एक अद्रिश्य शक्ती, शिव के अंश का दिव्य खिंचाव, उन्हें एक अंजाने गंतव्य की ओर ले चला, जहां
27:21नेती स्वयं प्रतीक्षा कर रही थी
27:25अयोध्या के राजकुमार, श्री राम, जिन्हें देखते ही हनुमान के रोमरोम में शिव का अनुभव हुआ, जैसे वे अपने शाश्वत
27:33स्वामी के सम्मुख खड़े हूँ
27:35श्री राम की अलौकिक कांती और दिव्य स्वरूब को देख कर हनुमान का हिदय भक्ती के सागर में डूब गया,
27:43उन्होंने अपना सर्वस्व अरपित करने का निश्चय किया
27:47उन्होंने अपनी अपार शक्ती को श्री राम के चर्णों में ऐसे समर्पित कर दिया, मानों वे असीम ब्रहमांडी उर्जा को
27:55एक बिंदु पर केंद्रित कर रहे हूं
27:58श्री राम ने हनुमान के इस निस्वार्थ समर्पन को स्विकार किया और उनके माथे पर एक दिव्य प्रकाश्मान तिलत लगाया
28:06जो अनंत भक्ती का प्रतीक बना
28:09यह केवल शक्ती का समर्पन नहीं था, बलकि उस शिवतत्व का श्री राम के प्रती पूर्ण विलय था, जिसने हनुमान
28:17को रामभक्त शिरोमनी बनाया
28:20राम के चर्णों में गिरे हनुमान के लिए अब हर श्वास राम नाम का जाप बन गई, और हर कर्म
28:26राम सेवा का माध्यम
28:29उनकी शक्ती जो प्रलय का कारण बन सकती थी, अब श्री राम के नाम मात्र से एक कोमल पवन के
28:36जोके में परिवर्तित हो गई
28:38हनुमान के भीतर का शिवतत्व श्री राम के प्रती अटूट भक्ती में विलीन होकर एक ऐसे भक्त का निर्मान कर
28:46रहा था, जिसका कोई सानी न था
28:49अयोध्या की गलियों में हनुमान अब केवल वानर नहीं, बलकि श्री राम के प्रेम का जीवन्त प्रमान बन विचर्ण कर
28:57रहे थे
28:58उनका हर कदम श्री राम की लीला का हिस्सा था और हर आहट उनके स्वामी के प्रेम की मधुर ध्वनी
29:05थी
29:07शत्रों के लिए जो शक्ती कभी भय का कारण थी, वही शक्ती अब राम नाम के जाप से शांत और
29:13विनम्र हो गई थी
29:16हनुमान की भक्ती, परवत समान अटल और सागर समान गहरी थी, जो श्री राम के लिए किसी भी एक्ट ओफ
29:23साक्रफाइस और एफ़र्ट तू परफॉन
29:27उनके हरदय में श्री राम बस गए थे और उनकी द्रिष्टी में केवल अपने स्वामी की सेवा का संकल्प था
29:35शिव के एकादश रुद्र अवतार हनुमान अब पूर्णत राम मैं हो चुके थे, भक्ती के महासागर में एक निर्मल मोती
29:43के समान
29:44यह वहक्षन था जब एक महान भक्त का जन्म हुआ, जिसकी कथा युगो-युगो तक प्रेम, निष्ठा और सेवा की
29:52प्रेना देती रहेगी
29:55हनुमान के लिए श्री राम केवल राजा नहीं, बलकि उनके जीवन का सार, उनका सर्वस्व थे, एक ऐसा सत्य जिसे
30:03उन्होंने हृदय से स्विकार किया
30:06जैसे ही रिशी सूट की वानी गूंजी, उन्होंने बताया कि किस प्रकार महादेव शिवने स्वयन को एक सेवक के रूप
30:13में प्रस्तुत किया, जो भक्ती की असीम गहराईयों को दर्शाता है
30:19उन्होंने समझाया कि यह हनुमान का अवतार महर्शी वालमीकी की तपस्या और भगवान विश्नु के आग्रह का परिणाम था, जिसने
30:28एक अभूत्पूर्व लीला की रचना की
30:31महादेव ने स्वयं को वानर रूपी हनुमान के अवतार में ढाला, जो सर्वशक्तिमान होने पर भी विनमर्ता और सेवा का
30:39प्रतीक बने
30:40यह अवतार केवल दैविय खेल नहीं था, अपितु स्रिष्टी को यह सिखाने की एक गहन शिक्षा थी कि सच्ची शक्ती
30:48सेवा में नहित है, अहंकार में नहीं
30:52भगवान राम जो स्वय भगवान विश्णू के अवतार थे, ने हनुमान की अटूट भक्ती को पहचाना और उन्हें अपना सबसे
31:00प्रिय सेवक स्विकार किया
31:03हनुमान की सेवा निस्वार्थ थी, उनका हर कर्म केवल प्रभु की प्रसन्ता के लिए समर्पित था, जिसमें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ
31:12नहीं था
31:13समुद्र पार कर लंका जाने की उनकी यात्रा और रावन के अभिमान को चकनाचूर करने का उनका कार्य, उनकी शक्ती
31:21और प्रभु के प्रती निष्ठा का प्रमान था
31:25रावन जो अपनी अजय शक्ती और अहमकार के लिए जाना जाता था, ने हनुमान के सामने अपनी दुर्बलता महसूस की,
31:33जो प्रेम और सेवा से कहीं अधिक शक्तिशाली था
31:38हनुमान ने न केवल अपनी शारिरिक शक्ती का प्रदर्शन किया, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता और कूटनीती से भी रावन की सेना
31:46को विचलित कर दिया
31:48उनकी पूँच से लंका देहन का ग्रिश, जहां उन्होंने अहमकार की नगरी को भस्म कर दिया, स्वया विनाश के देवता
31:55शिव के ही एक रूप का स्मरण कराता है
31:59लेकिन इस विनाश के पीछे भी हनुमान का उद्देश केवल प्रभुराम के कार्य को आगे बढ़ाना था, न की व्यक्तिगत
32:08बदला लेना
32:10हनुमान अवतार ने यह सिखाया कि सर्वोच शक्ति तब प्रकट होती है, जब वह विनमरता और निस्वार्थ सेवा के सेवक
32:18भाव से जूर जाती है
32:20यह केवल एक योध्धा की गाथा नहीं, बलकि एक भक्त की कहानी है, जिसने अपने प्रभु के लिए अपनी पहचान
32:28तक मिटा दी
32:30महादेव ने स्वयन सेवक बनकर यह सिद्ध किया कि सबसे महान तपस्वी वह है, जो अहंकार को त्याग कर सेवा
32:38में लीन रहता है
32:41राम और हनुमान का यह अटूट बंधन ब्रहमांडिय भक्ती का शिखर है, जो युगो युगो तक प्रेणा का स्रोत बना
32:48रहेगा
32:50यह अवतार सिखाता है कि इश्वर को पाने का मार्ग एश्वर्य या शक्ती से नहीं, बलकि विनम्र हृदय और सेवा
32:57भाव से खुलता है
33:00हनुमान की हर कथा, चाहे वह संजीवनी लाना हो या अशोक वाटिका में सीता माता से मिलना, उनकी कर्तव्यनिष्ठा और
33:08प्रेन का अद्भुत उदाहरण है
33:12आथक शिव का हनुमान अवतार केवल एक पौरानिक कथा नहीं, बलकि जीवन जीने की कला का एक मुख उपदेश है
33:21यह सिखाता है कि सबसे बड़ा भक्त वह है जो स्वयन को इश्वर के चर्नों में समर्पित कर देता है
33:28और उसी में परम आनंद पाता है
33:32इस प्रकार महादेव ने स्वयन सेवक बनकर मानवजाती को भक्ती की पराकाश्ठा का वह अमर पाठ पढ़ाया जो सदा के
33:40लिए अमर रहेगा
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