00:00आज के इस तच्दिय में हम तारिख की एक ऐसी ञजीम हस्ती की बात करेंगे,
00:03जिन्होंने अपने अमल से मौशरे की उन तमाम दिवारों को गिरा दिया,
00:06जो रंग, नसल और रुथबे के नाम पर कड़ी की गई थी.
00:09हम बात करें हैं हज़र जून बिन हवी रजिय लाह उन्हों की
00:12उनका सफर कोई आम तारीखी वाकिया नहीं है
00:14ये वफादारी, कुर्बानी और सची महब्बत की वो दास्तान है
00:18जो हमें सिखाती है कि कैसे इनसान वक्ती रुत्मों से बहुत उपर उटकर
00:22एक अबदी और रुहानी मकाम हासिल कर सकता है
00:25तो आएए एक हमदर्दाना और इल्मी जाविय से इस हैरतंगी सफर की हर कड़ी को जोड़ते हैं
00:30लेकिन इस सफर में आगे बढ़ने से पहले ज़रा गोर करे
00:33इनसानी खदर और वकार का असल मियार आखिर क्या है
00:36क्या ये वो जाहरी चीजें हैं जो हमने खुद बना ली है
00:39यानी दौलत, खांदानी पसमंजर या फिर जिल्द का रंग
00:42या कोई ऐसा अबदी और रोहानी मेयार भी है जो इन सब चीजों पर भारी है
00:46इस गुफटगू में हम देखेंगे कि कैसे साथमी सरी में
00:49एक इनसान ने अपने शांदार किरदार से इस सवाल का एक ऐसा अमली जवाब दिया
00:53जो आज तक लाजवाल है
00:54तो शुरुआत करते हैं उनके पसमंजर से
00:57यानी हभशा से एहले बैत तक का उनका सफर
01:00हज़रत जौन का तालुक असल में हभशा से था
01:03जिसे आज हम इथोपिया के नाम से जानते हैं
01:05वो सियाफ आम थे और उनने अपनी जिन्दगी का आगाज एक गुलाम की हैसियत से किया
01:09अब इस सकाफती और तारीखी पसमंजर को समझना बहुत जरूरी है
01:13क्योंकि इससे में अंदाजा होता है
01:15कि वो उस वक्त के मौशरे में बिलकुल हाशिये पर थे
01:18यानि एक ऐसा शक्स जिसे मौशरा शायद कोई खास एहमित ना देता हो
01:22लेकिन तारीख इसे कैसे याद रखने वाली थी
01:25ये वाक़ी एक कमाल के सफर का आगास था
01:27गुलामी से आजादी के बाद
01:29इनका रुहानी सफर बड़ी तेजी से आगे बढ़ा
01:32सबसे पहले वो अजीम सहाबी
01:34हज़त अबुजर गफारी रजियल्लाहुनों के साथी
01:37और खादिम बने
01:38और फिर हज़त अबुजर की वफात के बाद
01:41उन्हें अमीर अलमुमिनीन
01:42हज़त अली अलीसिल्लाहुन की खिद्मत का शरफ मिला
01:45फिर इमाम हसंद अलीसलाह की खिद्मत की
01:48और बिलाखिर वो इमाम हसेन अलीसिल्लाह के
01:51प्रिब तरीन और इंतहाई वफादार साथियों में
01:54शामिल हो गये
01:54ये कोई छोटी बात नहीं है
01:56जरा सोचें एक इन्तेहाई सादा पसे मनजर से उटकर मदीना के सबसे एहम घराने यानी एहल बैत के पिलकुल अंदरूनी
02:05हलके का हिस्टा बन जाना ये उनके बेपना खुलूस की सबसे बड़ी गवाही है
02:10और फिर वक्त आया तारीख के इस एहम तरीम मोड का यानी कर्बला का सफर
02:1560 हिज्री में जब स्यासी हालात बिगड़े और यजीद में बेयत का मतालबा किया
02:20तो इमाम हुसेन लिएसलाम ने मदीना से रवानगी का फैसला किया
02:23ये काफला पहले मक्का पहुँचा और वहां क्याम के बाद कुफा की तरफ निकल पड़ा
02:28अब रास्ते में बेशुमार खत्रात थे
02:30हालात तेजी से बदल रहे थे
02:31मौत के साहे बिलकुल वाज़े थे
02:33लेकिन इस सब के बावजूद
02:35हजरत जोन मसलसल इस काफले के साथ रहे
02:37और फिर दो महर्रम 61 हिज्री को
02:40ये काफला करबला के मैदान में आ पहुँचा
02:42इस तवील और इंताही मुश्किल जिसमानी सफर में
02:44एक लिए बिए भी इमाम का साथ ना छोड़ना
02:47उनके अटल इरादे की दलील है
02:49इस बात को पूरी तरह समझने के लिए
02:51हमें इस वक्त के माशरे के मैारात को देखना होगा
02:54एक तरफ सात्वी सदी के आरब माशरे के पुराने पैमाने थे
02:58यानि दौलत, उंचा खांदान, कबीले की ताकत और नसल
03:02और दूसरी तरफ खालिस इसलामी मैारात थे
03:05यानि तक्वा, सच्ची नियत, बेलूज अकीदत और कुर्बानी का जजबा
03:10हजरत जून का ये सफर इस बात का जीता जाकता सबूत है
03:13कि उनकी अकीदत ने किस तरह उन पुरानी और फरसूदा तबकाती दीवारों को जड़ से उखार दिया
03:19उन्होंने साबित कर दिया कि इनसान की असल कीमत उसके तक्वा और खुलूस में है
03:24अब हम चलते हैं शब आशूर की उस तारीखी और जजबाती आखरी गुफटगो की तरफ
03:30नौ मुहर्म की रात जिसे हम शब आशूर कहते हैं
03:34इमाम हुसैन अलेहसलाम ने अपने तमाम साथियों को जमा किया
03:38इमाम ने फरमाया कि दुश्मन को सिर्फ मेरी जान चाहिए
03:42उन्होंने सब को रात के अंधेरे का फाइदा उठा कर वहां से चले जाने
03:46और अपनी जाने बचाने की मुकमल आजादी दे दी
03:50ये एक ऐसा लमा था जो इनसान की वफादारी का सबसे बड़ा और कड़ा इंतहान था
03:56हजरत जौन जो एक उमर रसीदा इनसान थे
03:59इमाम ने उन्हें भी खास तोर पर जाने की अजासत दी
04:02और उनकी पिछली तमाम खिदमात का शुक्रिया अदा किया
04:05लेकिन उसके जवाब में हजजर जौन ने जो कहा
04:08उतारीक के माथे का जुमर बन गया
04:10उन्होंने इंतहाई जजबाती अंदाज में कहा
04:14ऐ फर्जंद रसूल क्या मैं खुशाली के वक्त आपके दस्तरखवान से फाइदा उठाओं
04:18और मुसीबत के वक्त आपका साथ छोड़ दूँ
04:20अगर्चे मेरा रंग स्या है
04:22मेरा नसब बुलंद नहीं
04:24मेरी खुश्बू अच्छी नहीं
04:25लेकिन मैं चाहता हूँ कि जन्नत में मेरा रंग सफैद हो जाए
04:28मेरी इजद बुलंद हो जाए
04:29और मेरी खुश्बू मौतर हो जाए
04:31खुश्बा की खस्म मैं आपका साथ नहीं छोड़ूंगा
04:34यहां तक कि मेरा खुश्बू आपके खुश्बू के साथ मिल जाए
04:37जरा इन अलफाज की गहराई
04:39और इस वफादारी के वजन को महसूस करें
04:41यह सिल जजबात नहीं थे
04:43यह एक सची कमिट्मेंट थी
04:45और फिर आशूर के दिन
04:46मैदान जंग में उनकी हैरत अंगेज बहादूरी सामने आई
04:50जब उन्हें मैदान में जाने की अजाज़त मिली
04:52तो वो बेपना खुशी के साथ उतरे
04:54उन्होंने अरब के रिवायती अंदाज में जंगी इशार यानी रजस पढ़े
04:58और ललकार कर कहा कि अगरचे लोग मुझे महज एक सियाह फाम गुलाम समझते हैं
05:03लेकिन आज आज आज वो मेरी तलवार की धार देखेंगे
05:06दुश्मन की सफे मुकमल तोर पर दंग रह गई
05:09किसी को यकीन नहीं आ रहा था कि एक उमर रसीदा इनसान जिसकी पूरी जिन्दगी खिदमत में गुजरी हो
05:13वो इतनी शुजाद, महारत और बेखौफी के साथ कैसे लड़ सकता है
05:17वो अकेले ही दुश्मनों के लश्कर में घुसका कमाल बहादरी दिखा रहे थे
05:21और वाकई जब महबत सची हो तो वो इनसान को एक नाकाबल तस्खीर ताकत दे देती है
05:26बात करते हैं इस अलमनाक लेकिन शानदार लम्हे की उनकी शहादत और इमाम की दुआ
05:32मसलसल जंग के बाद बेश्मार जख्मों से चूर होकर बिलाखिर हजरत जौन जमीन पर गिर पड़े
05:38और यहां एक बेहत खुबसूरत और रिक्कत आमेज मनजर पेश आया
05:42इमाम हुसान लिए स्लाम खुद दौड कर उनके पास आए
05:45इमाम ने इस अजीम शहीद का सर अपनी गोद में रखा
05:48जरा तस्वर करें इस मनजर का
05:50वक्त का इमाम एक खादिम के सर को अपनी आगोश में लिये वे है
05:53और फिर इमाम ने वो अबदी दौा फरमाई
05:56एल्ला इनके चेहरे को सफेद फरमा
05:58इनके खुश्बू को खुश्बूदार बना
06:00और इनने नेक लोगों के साथ महशूर फरमा
06:03ये उनकी गुर्बानी और बेलोस महबत का सबसे बड़ा सिला था
06:06और इस दौा का असर क्या हुआ?
06:09तारीख बताती है
06:10कि वाकिये कर्बला के बाद
06:12जब उनके जसद खाकी को देखा गया
06:14तो उसमें से मुश्क से भी जादा मीठी
06:17और दिलफरेब खुश्बू आ रही थी
06:19ये कोई मामूली बात नहीं है
06:21बलके ये इस बात का बिलकुल वाज़े और जिसमानी जहूर था
06:25कि खुदान इनकी रूहानी पाकीज़गी और कुर्बानी को
06:28किस शानदार अंदाज में कुबूल किया है
06:31जो शक्स दुनिया की नजर में एक आम सा इनसान था
06:34तारीख में उसकी अजमत हमेशा के लिए अमर हो गई
06:37अब इस तमाम तारीखी वाके से
06:40मुसावात और अकीदत की जो मिरास मिलती है
06:43उसका तजजिया करते है
06:44इस दास्तान से हमें कुछ इंतहाई एहम और लाजवाल अजबाक मिलते है
06:49पहला सबक सच्ची वफदारी वही है जो मुश्किल तरीन वक्त में कायम रहे
06:54दूसरा ये के एहल बैत से मुहबबत सिर्फ जबानी दावा नहीं है
06:57ये अमली गुर्बानी मांगती है
06:59तीसरा और बहुत एहम नुक्ता
07:01इसलाम में नसल, रंग या कौमियत की बन्याद पर कोई बरतरी नहीं
07:06सिर्फ मुकमल मसावात है
07:07चौता ये के इनसान की कदर उसके मरतबे से नहीं उसकी नियत के खुलूस से होती है
07:13और आखरी बात हक के रास्ते में अपना सब कुछ खुर्बान कर देना ही इनसान का सबसे बड़ा अजाज है
07:18ये वो वसूल हैं जो आज की जदीद दुनिया के लिए भी उतने ही एहम है जितने उस वक्त है
07:23तो हम अपने इस तारीखी तज्जिये के इक्तिताम पर पहुँचते हैं
07:27साथवी सदी में नसल परस्ती और तबकाती नजाम पर हजरत जोन की ये शानदार फता हमारे लिए आज भी एक
07:34बहुत गहरा सवाल छोड़ जाती है
07:36आज जब दुनिया समाजी इनसाफ और बराबरी के लिए इतनी कोशिश है कर रही है
07:40तो हमें सोचना चाहिए क्या हमारे जदीद मौशरे वाकिए इस मेयार तक पहुँच पाए हैं जो हजरत जोन ने अपने
07:46खुलूस से कायम किया
07:47क्या हम भी इनसान को उसके रंग, नसल और बैगराउंड के बजाए उसके किरदार और सचाई के लिए दी गई
07:53कुर्बानी से पैचानते हैं
07:54ये वो लमे फिक्रिया है जो इस दास्तान से मिलता है जिस पर हम सब को जरूर गौर करना चाहिए
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