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میدان کربلا کے عظیم وفادار حضرت جونؓ کی قربانی، وفا اور شہادت پر مبنی ایک منفرد تاریخی ڈاکومنٹری۔ اس ویڈیو میں جانئے کہ حضرت جونؓ کون تھے، امام حسینؑ سے ان کی محبت کتنی گہری تھی اور کربلا کے میدان میں انہوں نے کس طرح وفاداری کی نئی مثال قائم کی۔ یہ اسلامی تاریخ کا ایک ایسا باب ہے جو ہر مسلمان کے ایمان کو تازگی بخشتا ہے۔

Watch this exclusive documentary about Hazrat Jawn (John) RA, one of the most loyal companions of Imam Hussain (AS). Discover the inspiring story of sacrifice, courage, faith, and devotion in the Battle of Karbala.
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00:00आज के इस तच्दिय में हम तारिख की एक ऐसी ञजीम हस्ती की बात करेंगे,
00:03जिन्होंने अपने अमल से मौशरे की उन तमाम दिवारों को गिरा दिया,
00:06जो रंग, नसल और रुथबे के नाम पर कड़ी की गई थी.
00:09हम बात करें हैं हज़र जून बिन हवी रजिय लाह उन्हों की
00:12उनका सफर कोई आम तारीखी वाकिया नहीं है
00:14ये वफादारी, कुर्बानी और सची महब्बत की वो दास्तान है
00:18जो हमें सिखाती है कि कैसे इनसान वक्ती रुत्मों से बहुत उपर उटकर
00:22एक अबदी और रुहानी मकाम हासिल कर सकता है
00:25तो आएए एक हमदर्दाना और इल्मी जाविय से इस हैरतंगी सफर की हर कड़ी को जोड़ते हैं
00:30लेकिन इस सफर में आगे बढ़ने से पहले ज़रा गोर करे
00:33इनसानी खदर और वकार का असल मियार आखिर क्या है
00:36क्या ये वो जाहरी चीजें हैं जो हमने खुद बना ली है
00:39यानी दौलत, खांदानी पसमंजर या फिर जिल्द का रंग
00:42या कोई ऐसा अबदी और रोहानी मेयार भी है जो इन सब चीजों पर भारी है
00:46इस गुफटगू में हम देखेंगे कि कैसे साथमी सरी में
00:49एक इनसान ने अपने शांदार किरदार से इस सवाल का एक ऐसा अमली जवाब दिया
00:53जो आज तक लाजवाल है
00:54तो शुरुआत करते हैं उनके पसमंजर से
00:57यानी हभशा से एहले बैत तक का उनका सफर
01:00हज़रत जौन का तालुक असल में हभशा से था
01:03जिसे आज हम इथोपिया के नाम से जानते हैं
01:05वो सियाफ आम थे और उनने अपनी जिन्दगी का आगाज एक गुलाम की हैसियत से किया
01:09अब इस सकाफती और तारीखी पसमंजर को समझना बहुत जरूरी है
01:13क्योंकि इससे में अंदाजा होता है
01:15कि वो उस वक्त के मौशरे में बिलकुल हाशिये पर थे
01:18यानि एक ऐसा शक्स जिसे मौशरा शायद कोई खास एहमित ना देता हो
01:22लेकिन तारीख इसे कैसे याद रखने वाली थी
01:25ये वाक़ी एक कमाल के सफर का आगास था
01:27गुलामी से आजादी के बाद
01:29इनका रुहानी सफर बड़ी तेजी से आगे बढ़ा
01:32सबसे पहले वो अजीम सहाबी
01:34हज़त अबुजर गफारी रजियल्लाहुनों के साथी
01:37और खादिम बने
01:38और फिर हज़त अबुजर की वफात के बाद
01:41उन्हें अमीर अलमुमिनीन
01:42हज़त अली अलीसिल्लाहुन की खिद्मत का शरफ मिला
01:45फिर इमाम हसंद अलीसलाह की खिद्मत की
01:48और बिलाखिर वो इमाम हसेन अलीसिल्लाह के
01:51प्रिब तरीन और इंतहाई वफादार साथियों में
01:54शामिल हो गये
01:54ये कोई छोटी बात नहीं है
01:56जरा सोचें एक इन्तेहाई सादा पसे मनजर से उटकर मदीना के सबसे एहम घराने यानी एहल बैत के पिलकुल अंदरूनी
02:05हलके का हिस्टा बन जाना ये उनके बेपना खुलूस की सबसे बड़ी गवाही है
02:10और फिर वक्त आया तारीख के इस एहम तरीम मोड का यानी कर्बला का सफर
02:1560 हिज्री में जब स्यासी हालात बिगड़े और यजीद में बेयत का मतालबा किया
02:20तो इमाम हुसेन लिएसलाम ने मदीना से रवानगी का फैसला किया
02:23ये काफला पहले मक्का पहुँचा और वहां क्याम के बाद कुफा की तरफ निकल पड़ा
02:28अब रास्ते में बेशुमार खत्रात थे
02:30हालात तेजी से बदल रहे थे
02:31मौत के साहे बिलकुल वाज़े थे
02:33लेकिन इस सब के बावजूद
02:35हजरत जोन मसलसल इस काफले के साथ रहे
02:37और फिर दो महर्रम 61 हिज्री को
02:40ये काफला करबला के मैदान में आ पहुँचा
02:42इस तवील और इंताही मुश्किल जिसमानी सफर में
02:44एक लिए बिए भी इमाम का साथ ना छोड़ना
02:47उनके अटल इरादे की दलील है
02:49इस बात को पूरी तरह समझने के लिए
02:51हमें इस वक्त के माशरे के मैारात को देखना होगा
02:54एक तरफ सात्वी सदी के आरब माशरे के पुराने पैमाने थे
02:58यानि दौलत, उंचा खांदान, कबीले की ताकत और नसल
03:02और दूसरी तरफ खालिस इसलामी मैारात थे
03:05यानि तक्वा, सच्ची नियत, बेलूज अकीदत और कुर्बानी का जजबा
03:10हजरत जून का ये सफर इस बात का जीता जाकता सबूत है
03:13कि उनकी अकीदत ने किस तरह उन पुरानी और फरसूदा तबकाती दीवारों को जड़ से उखार दिया
03:19उन्होंने साबित कर दिया कि इनसान की असल कीमत उसके तक्वा और खुलूस में है
03:24अब हम चलते हैं शब आशूर की उस तारीखी और जजबाती आखरी गुफटगो की तरफ
03:30नौ मुहर्म की रात जिसे हम शब आशूर कहते हैं
03:34इमाम हुसैन अलेहसलाम ने अपने तमाम साथियों को जमा किया
03:38इमाम ने फरमाया कि दुश्मन को सिर्फ मेरी जान चाहिए
03:42उन्होंने सब को रात के अंधेरे का फाइदा उठा कर वहां से चले जाने
03:46और अपनी जाने बचाने की मुकमल आजादी दे दी
03:50ये एक ऐसा लमा था जो इनसान की वफादारी का सबसे बड़ा और कड़ा इंतहान था
03:56हजरत जौन जो एक उमर रसीदा इनसान थे
03:59इमाम ने उन्हें भी खास तोर पर जाने की अजासत दी
04:02और उनकी पिछली तमाम खिदमात का शुक्रिया अदा किया
04:05लेकिन उसके जवाब में हजजर जौन ने जो कहा
04:08उतारीक के माथे का जुमर बन गया
04:10उन्होंने इंतहाई जजबाती अंदाज में कहा
04:14ऐ फर्जंद रसूल क्या मैं खुशाली के वक्त आपके दस्तरखवान से फाइदा उठाओं
04:18और मुसीबत के वक्त आपका साथ छोड़ दूँ
04:20अगर्चे मेरा रंग स्या है
04:22मेरा नसब बुलंद नहीं
04:24मेरी खुश्बू अच्छी नहीं
04:25लेकिन मैं चाहता हूँ कि जन्नत में मेरा रंग सफैद हो जाए
04:28मेरी इजद बुलंद हो जाए
04:29और मेरी खुश्बू मौतर हो जाए
04:31खुश्बा की खस्म मैं आपका साथ नहीं छोड़ूंगा
04:34यहां तक कि मेरा खुश्बू आपके खुश्बू के साथ मिल जाए
04:37जरा इन अलफाज की गहराई
04:39और इस वफादारी के वजन को महसूस करें
04:41यह सिल जजबात नहीं थे
04:43यह एक सची कमिट्मेंट थी
04:45और फिर आशूर के दिन
04:46मैदान जंग में उनकी हैरत अंगेज बहादूरी सामने आई
04:50जब उन्हें मैदान में जाने की अजाज़त मिली
04:52तो वो बेपना खुशी के साथ उतरे
04:54उन्होंने अरब के रिवायती अंदाज में जंगी इशार यानी रजस पढ़े
04:58और ललकार कर कहा कि अगरचे लोग मुझे महज एक सियाह फाम गुलाम समझते हैं
05:03लेकिन आज आज आज वो मेरी तलवार की धार देखेंगे
05:06दुश्मन की सफे मुकमल तोर पर दंग रह गई
05:09किसी को यकीन नहीं आ रहा था कि एक उमर रसीदा इनसान जिसकी पूरी जिन्दगी खिदमत में गुजरी हो
05:13वो इतनी शुजाद, महारत और बेखौफी के साथ कैसे लड़ सकता है
05:17वो अकेले ही दुश्मनों के लश्कर में घुसका कमाल बहादरी दिखा रहे थे
05:21और वाकई जब महबत सची हो तो वो इनसान को एक नाकाबल तस्खीर ताकत दे देती है
05:26बात करते हैं इस अलमनाक लेकिन शानदार लम्हे की उनकी शहादत और इमाम की दुआ
05:32मसलसल जंग के बाद बेश्मार जख्मों से चूर होकर बिलाखिर हजरत जौन जमीन पर गिर पड़े
05:38और यहां एक बेहत खुबसूरत और रिक्कत आमेज मनजर पेश आया
05:42इमाम हुसान लिए स्लाम खुद दौड कर उनके पास आए
05:45इमाम ने इस अजीम शहीद का सर अपनी गोद में रखा
05:48जरा तस्वर करें इस मनजर का
05:50वक्त का इमाम एक खादिम के सर को अपनी आगोश में लिये वे है
05:53और फिर इमाम ने वो अबदी दौा फरमाई
05:56एल्ला इनके चेहरे को सफेद फरमा
05:58इनके खुश्बू को खुश्बूदार बना
06:00और इनने नेक लोगों के साथ महशूर फरमा
06:03ये उनकी गुर्बानी और बेलोस महबत का सबसे बड़ा सिला था
06:06और इस दौा का असर क्या हुआ?
06:09तारीख बताती है
06:10कि वाकिये कर्बला के बाद
06:12जब उनके जसद खाकी को देखा गया
06:14तो उसमें से मुश्क से भी जादा मीठी
06:17और दिलफरेब खुश्बू आ रही थी
06:19ये कोई मामूली बात नहीं है
06:21बलके ये इस बात का बिलकुल वाज़े और जिसमानी जहूर था
06:25कि खुदान इनकी रूहानी पाकीज़गी और कुर्बानी को
06:28किस शानदार अंदाज में कुबूल किया है
06:31जो शक्स दुनिया की नजर में एक आम सा इनसान था
06:34तारीख में उसकी अजमत हमेशा के लिए अमर हो गई
06:37अब इस तमाम तारीखी वाके से
06:40मुसावात और अकीदत की जो मिरास मिलती है
06:43उसका तजजिया करते है
06:44इस दास्तान से हमें कुछ इंतहाई एहम और लाजवाल अजबाक मिलते है
06:49पहला सबक सच्ची वफदारी वही है जो मुश्किल तरीन वक्त में कायम रहे
06:54दूसरा ये के एहल बैत से मुहबबत सिर्फ जबानी दावा नहीं है
06:57ये अमली गुर्बानी मांगती है
06:59तीसरा और बहुत एहम नुक्ता
07:01इसलाम में नसल, रंग या कौमियत की बन्याद पर कोई बरतरी नहीं
07:06सिर्फ मुकमल मसावात है
07:07चौता ये के इनसान की कदर उसके मरतबे से नहीं उसकी नियत के खुलूस से होती है
07:13और आखरी बात हक के रास्ते में अपना सब कुछ खुर्बान कर देना ही इनसान का सबसे बड़ा अजाज है
07:18ये वो वसूल हैं जो आज की जदीद दुनिया के लिए भी उतने ही एहम है जितने उस वक्त है
07:23तो हम अपने इस तारीखी तज्जिये के इक्तिताम पर पहुँचते हैं
07:27साथवी सदी में नसल परस्ती और तबकाती नजाम पर हजरत जोन की ये शानदार फता हमारे लिए आज भी एक
07:34बहुत गहरा सवाल छोड़ जाती है
07:36आज जब दुनिया समाजी इनसाफ और बराबरी के लिए इतनी कोशिश है कर रही है
07:40तो हमें सोचना चाहिए क्या हमारे जदीद मौशरे वाकिए इस मेयार तक पहुँच पाए हैं जो हजरत जोन ने अपने
07:46खुलूस से कायम किया
07:47क्या हम भी इनसान को उसके रंग, नसल और बैगराउंड के बजाए उसके किरदार और सचाई के लिए दी गई
07:53कुर्बानी से पैचानते हैं
07:54ये वो लमे फिक्रिया है जो इस दास्तान से मिलता है जिस पर हम सब को जरूर गौर करना चाहिए
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