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Witness the emotional story of Hazrat Ali Asghar (A.S.), the six-month-old son of Imam Hussain (A.S.), whose martyrdom became one of the most painful moments in the history of Karbala. On the 10th of Muharram, during the Battle of Karbala, Ali Asghar (A.S.) became a symbol of innocence, sacrifice, and unwavering faith.

This video explores the historical events of Ashura, the suffering of the Ahlul Bayt, and the sacrifice that continues to inspire millions around the world. Learn about the final moments of Ali Asghar (A.S.) and the lessons of courage, patience, and devotion from Karbala.

📌 Watch till the end to understand the true significance of Ashura and the sacrifice of Imam Hussain (A.S.) and his family.

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00:00खुशामदीद, आज हम एक बहुत ही एहम तारीखी तज्जिये का अगास करने जा रहे हैं।
00:05इस तज्जिये में हम कर्बला के तारीखी वाकियात, खास तोर पर उस दोर की समाजी और स्यासी हरकियात,
00:11दुरुस्ट टाइम लाइन और बीवी रबाब की जानिब से काइम की गई इस देर पास समाजी मीरास का एक गेर
00:17जानिबदाराना जाइजा लेंगे,
00:19जो आज भी काइम है, तो आएए देखते हैं कि तारीख के ये औराक हमें क्या बताते हैं।
00:25इस गहरी और कसीर जहती तारीख को सही मानों में समझने के लिए हम एक वाज़े तर्टीब के साथ चलेंगे,
00:31यानि अब्तदाई मदीना की खांदानी हरकियात से बात शुरू करेंगे, फिर हिजरत के असबाब, कर्बला के कठिन वाकियात, असीरी के
00:40मराहिल और आखिर में इस अजीम सकाफ्ती मीरास पर बात करेंगे जो इन तमाम हालात के नतीजे में उभर कर
00:46सामने आई।
00:47तो चलिए, बिलकुल बुन्याद से शुरुआत करते हैं, यानि इप्तिदाई मदीना के उन समाजी धांचों और खांदानी तहाद से जो
00:56हिजरत से पहले वहां काइम थे।
01:17उम्मे फर्वा का निका, इमाम हसन से और छोटी बेटी बीबी रबाब का निका, इमाम हुसें से हुआ।
01:24ये सरफ शादिया नहीं थी, बलके इस दोर का एक बहुत बड़ा समाजी और माशी इंजमाम था।
01:31अब इस ने समाजी माहोल में बीबी रबाब अपनी बेपना सखावत की वज़ से पूरे अरब में जानी जाने लगी।
01:38वो खुद तो बहुत कम गो और मोहताद तब्यत की मालिक थी, लेकिन यहां जो चीज तारीख के तालिब इल्मों
01:44के लिए सबसे ज्यादा मतवज़ा करने वाली है, वो है इमाम हुसें की उनके साथ और अपनी बेटी सुकैना के
01:50साथ गहरी वाबस्तगी।
01:52इमाम हुसें का वो मशूर कौल तो आपने सुना ही होगा कि उन्हें वो घर बिलकुल पसंद नहीं जहां रबाब
01:58और सुकैना ना हो, ये उनके आपसी तालू की गहराई को जाहर करता है।
02:27इन तारीखों को जहन में रखना इसलिए जरूरी है ताके आगे चलकर हम इन तारीखी शक्सियात की उम्रों का दुरूस्त
02:35अंदाजा लगा सकें।
02:52पीछे बीबी रबाब और उनके खादमीन थे। इस दोर के कबाईली और खांदानी हरकियात को समझने के लिए ये एक
02:59इंतहाई किलीदी मुशाइदा है।
03:01सोचिए सिर्फ 18 दिन। जी हाँ जब मदीना से मक्का और फिर करबरा तक का ये 6 माँ पर मोहित
03:10तवील और कठिन सफर शुरू हुआ तो उस वक्त कमसिन अली अजगर की उम्र महज 18 दिन थी। ये एक
03:18ऐसा नमबर है जो आने वाकियात की शिदत और इन सफरी तकालीफ को जह
03:52इन में बिलकुल वाज़ कर देता है।
03:53प्रिशनाक सूरतहाल पैदा हो गई। दस महर्रम के इस आखरी वक्त को तारीख कुछ इस तरह गेर जानबदाराना अंदाज में
04:00बयान करती है।
04:01इमाम हुसेन आखली मरतबा मुखालिफ फौच के सामने आते हैं और एक सदा देते हैं।
04:08नासिरुन यनसुरुना यानि क्या कोई है जो मेरी मदद करें।
04:12तारीख हमें बताती है कि सदा इस तगासा के जवाब में कमसिन अली असगर खेमे में अपने जूले से जमीन
04:19पर गिर गए।
04:20अमन और मदद की इस फर्याद का अंजाम एक इंतहाई अलमनाक और सखत तारीखी हकीकत की सूरत में निकला।
04:28इस छे महा के कमसन बच्चे को एक से शाखा यानि तीन भाल वाले तीर से शहीद कर दिया गया।
04:35और इसके बाद इमाम हुसेन ने अपनी शहादत से बिलकुल पहले अपनी तलमार जुल फकार की मदद से कबर खोद
04:43कर अपने बेटे को खुद सुपुर्दे खाक किया।
04:46इन वाकियात के बाद अब हमें इन हालात का जाइजा लेना है जो पसे मांदगान पर गुजरे यानि असीरी का
04:53वो तवील और कठिन दौर।
04:55ग्यारा महरम को मैदान में लाशों की बेहुर्मती देखने के बाद बीबी रबाब ने अल्ला के हुजूर एक बड़ा ही
05:01सखत एहद किया।
05:25कर्बला की तप्तीज जमीन से शुरू होकर कूफा फिर वहां से शाम के कैद खानों तक का सफर और आखरकार
05:32तवील अर्से बाद मदीना वापसी ये पूरा रास्ता उनकी जबरी मुन्तकली का एक कठिन बयान है।
05:55कर दिया गया जिससे पहन कर उन्होंने ये लंबा और तकलीफ दे सफर दे किया था।
06:00आखर में आईए देखते हैं कि ये सारे तारीखी वाकियात किस तरह बीबी रबाब के एहद और उनकी काइम करदा
06:08अजीम समाजी मेरास में तबदील हुए।
06:11ये हमारे तज्जिय का सबसे एहम हिस्सा है।
06:14देखें जब बीबी रबाब वापस मदीना आती हैं तो उन्होंने क्या किया।
06:18उन्होंने अपनी बाकी बची हुई तमाम दौलत तक्सीम कर दी और दो रिवायात यानि मजलिस और नियाज को एक बाकाइदा
06:27समाजी इदारे की शकल दे दी।
06:29अब ये सिर्फ जाती सोग नहीं रहा था। ये तारीख को मसलसल जिन्दा रखने और मुस्तहकीन तक खाना पहुचाने का
06:36एक बाकाइदा कल्चरल सिस्टम बन गया।
06:39ये उनके जाती गम और दौलत के इस्तिमाल से काइम होने वाली वो मिरास थी जिसने आने वाले वक्तों के
06:45समाजी रवईयों को हमेशा के लिए बदल दिया।
06:48इनके उस एहद की जो जिसमानी कीमत थी वो मक्का के एक आलम के इस वाके से बिलकुल वाज़ होती
06:55है।
06:55होता कुछ यू है कि वो आलम इमाम सज्जाद की खिद्मत में हाजिर होता है और देखता है कि एक
07:01जईफा कड़ी धूप में बैठी मुसलसल रो रही है।
07:04जब उसने वज़ा पूछी तो इमाम सज्जाद बताते हैं कि ये उनकी वालिदा बीबी रबाब हैं जो आज भी अपना
07:11वो कर्बला वाला वादा पूरी शिद्दत से निभा रही है।
07:34ने अपना वादा तोड़ने के बजाए मौत की दूआ की और फिर उनका इंतकाल हुआ और उन्हें जन्नत बगी में
07:41उनके वालिदेन के पहलू में सुपरदिखा किया गया।
07:44तो जैसे ही हम इस तजजिये को यहां समेटते हैं इसे कि इंतहाई एहम सवाल पर जरूर गोर कीजेगा।
07:50हमने देखा कि कैसे एक शदीद जाती गमने तारीखी रिवायात की बनियाद रखी।
07:55लेकिन आखिर किस तरह एक जाती दुख एक ऐसे मजबूत समाजी इदारे में तबदील हो जाता है जो बड़ी-बड़ी
08:02सल्तनतों के मिठ जाने के सदियों बाद भी आज तक पूरी आबोताब से कायम है।
08:07ये यकीन हम सब के लिए सोचने और तहकीक के नए दर्वाजे खोलने का मकाम है।
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