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गरुड़ पुराण के इस रहस्यमय अध्याय में, भगवान विष्णु गरुड़ को उन 'अदृश्य पापों' से अवगत कराते हैं जिनकी गंभीरता अक्सर अनदेखी कर दी जाती है। जानिए कैसे मेहमानों का अनादर, पवित्र स्थलों का अपमान, और देव-धन की चोरी जैसी क्रियाएं आत्मा को यमलोक के भयानक दंड और निम्न योनियों के अटूट चक्र में धकेल देती हैं। इस एपिसोड में, हम उन विशिष्ट कर्मफलों का अनावरण करेंगे जो इन गंभीर पापों के कारण उत्पन्न होते हैं, और समझेंगे कि क्यों धर्म का सूक्ष्म पालन ही मुक्ति का एकमात्र मार्ग है। क्या आप तैयार हैं कर्म के सबसे गहरे रहस्यों को जानने के लिए? #गरुड़पुराण #अदृश्यपाप #कर्मफल #यमलोक #हिंदूधर्म #अतिथिदेवोभव #धार्मिकरहस्य #आध्यात्मिकज्ञान #पापऔरपुण्य #गरुड़पुराणEp38
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00:00भगवान विश्नु, शांत वैकुंठ लोक में विराजमान, गरुर को कर्म के उन सूक्ष्म और अद्रिश्य नियमों से अवगत करा रहे
00:07थे, जिनका ज्ञान अत्यंत गोपनिय और गहन है.
00:12उन्होंने समझाया कि सूतक और पातक तो प्रत्यक्ष अशुद्धिया है, किन्तु कुछ ऐसे अद्रिश्य पाप भी होते हैं, जो अज्ञानवश
00:21या सूक्ष्म अहमकार के कारण किये जाते हैं, जिनका प्रभाव ब्रहमांडिय संतुलन पर पढ़ता है.
00:28ये अद्रिश्य पाप अद्रिश्य धागों की तरह धीरे धीरे धर्म के सूक्ष्म तानेबाने को उलजाते जाते हैं, जिससे सृष्टी का
00:37नैसर्गिक प्रवाह बाधित होने लगता है.
00:41इस प्रकार अज्यानता में किये गए छोटे से छोटे कर्म का भी ब्रहमांडिय संतुलन पर एक गहरा और अंदेखा प्रभाव
00:49पढ़ सकता है, जो समय के साथ एक भयानक दंड को आमंत्रित करता है.
00:55भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य दृष्टी से अतीत के एक दृष्टांत का स्मरण करते हुए, गरूर को समझाया की कैसे
01:03देवताओं का अनादर, चाहे वह अंजाने में ही क्यों न हो, अदृष्य रूप से गंभीर परिनामों को जन्न देता है.
01:12उन्होंने कहा, हे गरूर, यह केवल भौतिक नियमों का उलंगन नहीं है, बलकि यह श्रद्धा और सम्मान की सुक्ष्म उर्जा
01:20का भी अनादर है, जो स्रिष्टी को बांधे रखती है.
01:25विश्णू ने बताया कि देवताओं के प्रती किया गया मामूली अनादर भी एक अदृष्य विश्की तरह, धीरे धीरे एक व्यक्ती
01:33के भाग्य और उसके परिवेश को दूशित करने लगता है.
01:37यह अदृष्य पाप अन्तह एक ऐसे भयावध दंड को आमंतरित करता है, जो न केवल उस व्यक्ती को बलकि उसके
01:46वंश्जों को भी प्रभावित कर सकता है.
01:49भगवान विश्णों ने आगे स्पष्ट किया कि ऐसे पाप अक्सर अभिमान या अज्यानता की धुंध में छिपे होते हैं, जहां
01:57व्यक्ती अपने कर्मों के वास्तविक परिणामों को देख नहीं पाता.
02:02कल्पना करो हे सुपर्ण की एक राजा अपनी शक्ती के मद में चूर होकर किसी महान रिशी या देवता का
02:10अनादर करता है, यह सोचकर की उसके कर्म अद्रिश रहेंगे.
02:15यह अनादर एक अद्रिश बीज की तरहें उस राजा के राज्य की जड़ों में बोया जाता है, जो धीरे धीरे
02:22उसके भाग्य की उर्वर्ता को नश्ट कर देता है.
02:26और जैसे जैसे वह बीज अंकुरित होता है, राजा के जीवन में अप्रत्याशित बाधाय, रोग और अनिष्ट घटनाए बिना किसी
02:35स्पष्ट कारण के प्रकट होने लगती हैं.
02:39भगवान विश्णु ने गंभीर्ता से आगे कहा, कोई भी कर्म, चाहे कितना भी छोटा या अद्रिश क्यों नहों, ब्रहमांड के
02:47स्मृती पटल से कभी मिटता नहीं, और समय आने पर वह अपना फल अवश्य देता है.
02:54गरुर ने उच्शुक्ता से पूछा, तो क्या ऐसे पापों का कोई प्रायश्चित नहीं, हे प्रभु या वे सदैव दंड के
03:01भागिदार होते हैं?
03:04विश्णु ने उट्तर दिया की प्रायश्चित संभव है, किन्तु उसके लिए आत्मग्यान और सच्चे हृदय से पश्चाताप की आवश्शक्ता होती
03:12है, जो इन अद्रिश्य पापों की जड़ तक पहुँच सके.
03:17अन्यथा, ये अद्रिश्य पाप अंतह एक भयंकर चक्रवात का रूप ले लेते हैं, जो आत्मा को अनंत काल तक कश्टों
03:25के भवर में फसा देता है.
03:28भगवान विश्णु ने अपने डिस्कोर्स को विराम देते हुए, गरुर को समझाया कि इन अद्रिश्य पापों को पहचानना और उनसे
03:36बचना ही सच्चा धर्म है, जो आत्मा को शुद्धता और शांती प्रदान करता है.
03:43गरुर ने गहरे सम्मान और ज्ञान से भरी आखों से प्रभु की ओर देखा, उनके शब्दों की गंभीरता को पूरी
03:50तरह आत्मसात कर लिया था.
03:53इस ज्ञान के साथ गरुर ने महसूस किया कि ब्रहमांड में न्याय की अद्रिश्य शक्तिया कितनी गहरी और अप्रत्याशित हो
04:01सकती हैं, जो कभी न कभी अपना हिसाब अवश्य लेती हैं.
04:06और इस गंभीर चर्चा के साथ वैकुंठ लोक में एक सूक्ष्म उर्जा परिवर्तन हुआ, जो आगे आने वाले भयानक दंडों
04:15की कहानी का पूर्वा भास दे रहा था.
04:19भगवान विश्णु ने अपनी शांत, अथाह दृष्टी गरूर पर केंद्रित की, और एक नए सिध्धान्त को उजागर करने से पहले
04:26ब्रहमांडिय शांती के क्षण भर की अनुमती दी, जो मानवता के सबसे महत्वपूर्ण नैतिक आधारों में से एक था.
04:35उन्होंने धीमे स्वर में कहा, हे गरूर, सूतक और पातक के परे एक ऐसा पाप है, जो सीधे देवताओं के
04:43हृदय को चीरता है, वह है अतिथी देवो भव के पवित्र नियम का उलंधन करना.
04:49जैसे ही कोई ठका हुआ यात्री, प्यासा साधु या आश्रेहीन ब्राहमन किसी के द्वार पर आता है, वह साधारन मनुष्य
04:57नहीं, बलकि स्वयन परमात्मा का एक अंश होता है, जो आतिथ्य की अगनी परीच्शा लेता है.
05:05इस शाश्वत सत्य को अंदेखा करना ब्रहमांडिय संतुलन में एक सुक्ष्म लेकिन शक्तिशाली कमपन पैदा करता है, जो आने वाले
05:14समय में भयानक प्रतिध्वनियों का पूर्वा भास देता है.
05:18गरुर ने अपनी गर्दन जुकाई, उनके विशाल पंखों में एक हल्की फड़फडा हट हुई, क्योंकि उन्होंने अतिथी के दिव्यस्वरूप के
05:27बारे में प्रभु के ज्ञान को आत्म साथ किया.
05:31विश्नु ने समझाया, एक साधु, एक ब्राहमन, एक जरूरतमंद या कोई भी प्राणी जो आश्रे या भोजन के लिए तुम्हारे
05:39द्वार पर आता है, वह केवल एक नश्वर देह नहीं है, बलकि उस सर्वोच आत्मा का ही एक अंश है,
05:46जो हर जीव में निवास करती है
05:50कल्पना करो, एक तपस्वी संथ अपनी तपस्या से क्षीन शरीर के साथ केवल शुद्ध हरिदय और सत्य की प्यासलिये तुम्हारे
05:58द्वार पर खड़ा है, उसका अपमान करना या उसे वंचित करना, स्वया उन उच्च लोकों में देवताओं का अपमान करना
06:07है, जहां स
06:37आशिरवाद और भाग्य का प्रवाह होता है।
06:38पना की थी जो अज्यानता या अहंकार में ऐसे पाप करते हैं।
07:09विश्नु ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, इससे भी अधिक, कठोर और अपमान जनक शब्द बोलना, जो किसी विनमर
07:17अतिथी के हिदय को घायल करते हैं। वह भी उतना ही बड़ा पाप है जितना उन्हें शारिरिक रूप से वंचित
07:24करना।
07:25गरुर ने अपने पंखों को थोड़ा सिकोडा, मानो उन शब्दों की कलपना कर रहे हों जो आत्मा को छिन भिन
07:32कर सकते हैं।
07:35एक शब्द तलवार से भी तेज वार कर सकता है, आत्मा में गहरे घाव छोड़ सकता है, जो कभी भरते
07:42नहीं और देवता ऐसे आघात को कभी नहीं भूलते।
07:47वानी की शक्ती महान है और जब इसे अपमान या तिरसकार के लिए उपियोग किया जाता है, तो यह ब्रह्मान
07:54दिये सत्भाव में एक तीखा स्वर उत्पन करता है।
07:59गरूर के विशाल मन में ये नियम गहरे अंकित हो गए, न्याय के एक और अद्रिश्य आयाम को उजागर करते
08:06हुए।
08:28यह सत्य एक सुक्ष्म चमक की तरह हर जीव के भीतर निवास करता है, एक सार्वभौमिक नियम जो हर घर
08:35और हर आत्मा पर लागू होता है।
08:39इस प्रकार अतिथी देवो भव का सिध्धान्त केवल एक प्रथा नहीं, बलकि स्वयं परमात्मा का एक जीवन्त स्पंदित प्रतिबिंभ है,
08:48जो हर प्राणी के आदर में व्यक्थ होता है।
08:52भगवान विश्णू ने अपने गंभीर स्वर में आगे कहा, परंतु जो अज्यानी इस शाश्वत सिध्धान्त की अभेलना करते हैं और
09:00अतिथियों को अपमानित कर भूखा प्यासा लोटाते हैं, उनके लिए नरक में भयानक और अविस्मनिय दंड प्रतीक्षा करता है
09:09भगवान विश्णू के शब्दों ने गरुड के विशाल हरिदय को विस्मय और चिंता से भर दिया, क्योंकि उन्होंने उन पापों
09:17की गंभीरता को समझा जो मनुश्यों को ऐसे अंधकार में भाग्य की ओर ले जाते हैं
09:23विश्णू ने अपनी हथेली खोली, जिसमें ब्रहमांड का एक सुक्ष्म प्रतिरूप चमक रहा था, और उसके भीतर नरक का एक
09:32विशेश छेत्र प्रकट हुआ जहां केवल अन्थीन भूख और प्यास की चीखें गूंजती थी
09:38यह था अन्नजलवंचित नामक नरक का वह भीशन खंड जहां उन आत्माओं को भयंकर यम्दूतों द्वारा अनंत प्यास और भूख
09:47की ज्वाला में धकेला जाता था जिन्होंने जीवनकाल में दूसरों को अन्न और जल से वंचित किया
09:53उस नरक में आत्माओं प्रेतरूप धारन कर लेती थी जिनके शरीर अत्यंत ख्षीन और दुर्बल होते थे उनकी हड्डिया त्वचा
10:03से बाहर जाकती थी और आखे भयानक लालसा से चमकती थी
10:08गरुर ने भय और करुणा से भरी आखों से उन प्रेतों को देखा उनका विशाल हृदय काप उठा यह सोचकर
10:16की कैसे एक छोटा सा मानविय अपराध इतनी भयानक यातना का कारण बन सकता है
10:22उनके सामने विशाल काई स्वर्ण थालों में स्वादिष्ट पकवान और अमरित से भरे कलश रखे जाते थे जिनकी सुगंध उन्हें
10:31और भी अधिक व्याकुल कर देती थी
10:34वे उन व्यंजनों की मोहक सुगंध से मूर्चित होने की कगार पर पहुँच जाते थे किन्तु जैसे ही वे खाने
10:41का प्रयास करते वह सब कुछ अद्रिश्य हो जाता उन्हें केवल हवा और निराशा ही मिलती
10:48प्यास से उनकी जीभें सूज जाती थी और मुख सूख कर कड़ा हो जाता था उनकी आखों में पानी की
10:56एक बुन के लिए एक अंथीन प्रार्थना समाहित थी
11:00विश्णू ने अपने आवाज में पीडा भरते हुए कहा जो लोग दूसरों को एक घूंट पानी भी देने से इनकार
11:07करते हैं उन्हें यहां अनंतकाल तक प्यास से तडपना पड़ता है उनकी आत्माए अगनी में जलती रहती है
11:16नदिया उनके सामने बहती थी जिनकी धाराए चमकते हुए जल से भरी होती थी परंतु जैसे ही वे पीने का
11:24प्रयास करते जल भाप बनकर उर जाता या खूनी मवाद में बदल जाता
11:30हर एक स्वादिष्ट व्यंजन एक ध्रामक माया था और हर एक जल का स्रोत एक क्रूर धोखा जो उनकी आशा
11:37को बार-बार चकनाचूर करता था
11:41यमदूत जिनके मुख सूअर जैसे थे और देह विशालकाई उन्हें ऐसे स्थानों पर खड़ा कर देते थे जहां वे दूसरों
11:49को त्रिप्थ होते देख सकें जिससे उनकी यातना और भी बढ़ जाती थी
11:54गरूर ने गहरी सांस ली कलपना करते हुए कि यह दंड कितना भीशन होगा जब न केवल भौतिक इच्छाय अत्रिप्त
12:02रहें बलकि दूसरों की संतुष्टी देखकर मानसिक पीड़ा भी सहनी पड़े
12:08उनकी आत्माय उन भोजनों को देख देखकर जलती थी जिन्हें उन्होंने कभी दूसरों को देने से मना किया था
12:16और उनकी आखें प्यास से फटने को होती थी उस सुविधा के लिए तरस्ते हुए जिसे उन्होंने दूसरों से छीन
12:23लिया था
12:24यह एक अनन्द चक्र था, भूख, प्यास, आशा और फिर निराशा का जो उनके हर क्षण को एक जीवित नरक
12:32बना देता था
12:34उस वीभत्स चेत्र में कोई विश्राम नहीं था, कोई राहत नहीं थी, केवल चीखती हुई आत्माओं का एक अन्थीन को
12:43लाहल था जो अपनी भयानक पीडा से मुक्ती की भीख मांगती थी
12:48विश्नु ने अपनी दिव्य आखें गरुड पर स्थिर की और उनके स्वर में एक अंतिम चेतावनी थी, इसलिए अतिथी का
12:56आदर करना केवल एक कर्तव्य नहीं, बलकि मोक्ष का मार्ग है और उसका अनादर नरक के द्वार खोलता है
13:05गरुड ने सिर जुका कर भगवान विश्नु के शब्दों को अपने हृदय में अनकित किया, यह जानते हुए कि इस
13:12ज्ञान का भार अब उनकी उडान के हर पंख में समाहित रहेगा
13:17नरक का वह भयानक द्रिश धीरे-धीरे फीका पढ़ने लगा, लेकिन उसकी गूंज गरुड के मन में हमेशा के लिए
13:24अनकित हो गई, जो हर अतिथी के सम्मान की महत्ता का एक स्थाई अनुस्मारक बन गई
13:31वैकुंट के परम प्रकाश के बीच, भगवान विश्नु का ध्यान अब प्रित्वी पर स्थापित भव्य मंदिरों और पवित्र तीर्थ स्थलों
13:39की ओर मुर गया
13:41श्री हरी ने अपने शांत किन्तु गंभीर स्वर में गरूर से कहा, ये गरूर देवालय केवल पत्थर और माटी का
13:48धाचा नहीं, बलकि ब्रहमांडिय उर्जा का जीवन्त केंद्र होते हैं
13:54फिर प्रभु ने दिखाया कि कैसे एक पापी मनुष्य लालच के वशीभूत होकर गर्भग्रह में प्रवेश करता है और भगवान
14:02के विग्रह से स्वन आभूशन चुरा लेता है
14:06चोरी के उस दुश्कृत्य केक्षण ही, मूर्ती से फूटने वाली दिव्य आभाक्षीन हो गई और उस मनुष्य के समस्त पूर्व
14:14पुनियों के सुक्ष्म धागे जलकर भस्म हो गई
14:18द्रिश्य बदलकर एक पवित्र नदी के तटपर स्थित तीर्थ शेत्र का हो गया, जहां कुछ मूर्पुरुष पवित्र जल और परिसर
14:26को अशुद्धियों से दूशित कर रहे थे
14:29विश्णु जी ने दुखी होकर कहा, जो मनुष्य अपनी वासना या आलस्यवश्टीर्थ स्थलों की पवित्रता को नश्ट करता है, वह
14:38सीधे घोर पाप का भागी बनता है
14:41एक अन्य भयानक द्रिश में, एक अहंकारी व्यक्तिक रोध और अज्यान में आकर एक प्रतिष्थित दिव्य प्रतिमा को खंडित करता
14:50हुआ दिखाई दिया
14:52जैसे ही मूर्ती पर प्रहार हुआ, अंतरिक्ष में काली विद्युत कड़क उठी और उस पापी की आत्मा पर जन्म जन्मांतर
15:00का भयानक कर्मिक रेन अंकित हो गया
15:03इसके बाद विश्णु जी ने गरूर की द्रिष्टी को नरक के उस खौफनाक शेत्र की ओर मोड़ा, जहां मंदिर द्रोहियों
15:11को भयंकर यातनाए दी जाती है
15:14गरूर ने अत्यंत व्यथित और भयभीत होकर अपने पंखों को समेटा, जबकी प्रभू उन्हें मंदिर की संपत्ती हडपने वालों का
15:23अंतिम विधान समझा रहे थे
15:26नरक के उस खौलते कुंड में, यमदूत देवद्रव्य चुराने वाली आत्माओं के मुख में धधकता हुआ पिघला हुआ ताबा उन्देल
15:34रहे थे
15:35चौरी की गई हर एक स्वर्ण मुद्रा अब जलते हुए कटार के रूप में बदल कर उस पापी के वक्षस्थल
15:42को अनंतकाल तक बींध रही थी
15:45दूर तक फैले विशैले धुए के बीच तीर्थों को अपवित्र करने वाले जीव दलदल जैसे दुरगंधयुक्त कुंडों में गर्दन तक
15:53धन से तड़प रहे थे
15:56भगवान विश्णु ने गरूर को सचेत करते हुए कहा प्रसाद का अपमान करना या देवोत्थान के लिए दिये दान का
16:03निजी स्वार्थ में प्रयोग करना महापातक है
16:07एक द्रिश में एक छली पुजारी मंदिर के कोश से गुप रूप से स्वर्ण मुद्राय चुरा कर अपनी ठैली में
16:14छुपाता हुआ दिखाई दिया
16:16उस पुजारी के पीछे एक काली छायादार प्रेट सर्पिनी का आकार उभराया जो उसके संपूर्ण वंश्वरिक्ष पर छाई तबाही का
16:25प्रतीक थी
16:27फिर प्रभु ने धर्म प्रायन राजाओं और भक्तों का दृष दिखाया जिन्होंने श्रधा पूर्वक भव्य पत्थरों के शिखरों का निर्मान
16:35कर धर्म की रक्षा की थी
16:38नारायन ने दयालू द्रिष्टी से गरूर की ओर देखते हुए कहा भक्ती और प्रायश्चित ही वे दो मार्ग हैं जो
16:46भूलवश हुए अनादर के पाप का शमन कर सकते हैं
16:50एक सच्चे भक्त को अपने अश्रूओं से मंदिर के गर्भगरह की वेदी को धोते हुए और निर्मल मनसेगी का दीपक
16:58प्रजवलित करते हुए दर्शाया गया
17:01अंतिन द्रिश में उस मंदिर का भव्य शिखर नीली और सुनहरी दिव्यकिर्णों से जगमगा उठा जो यह संदेश देता था
17:09कि पवित्रता ही शाश्वत सत्य है
17:12भगवान नारायन ने गरूर की ओर गमभीर मुखाकरिती से देखा पवित्रता केवल बाहरी स्नान नहीं बलकि अंतरम शुद्धी का प्रतीक
17:21है और जो इसे भंग करते हैं वे एक ऐसे नरक के भागी होते हैं जहां शुद्धता का नामों निशान
17:28नहीं
17:30गरूर के चहरे पर भाय और चिंता की गहरी लकीरें उभी क्योंकि उन्होंने अपने स्वामी के शब्दों की गमभीरता को
17:38समझा और उस भयानक नेती की कलपना की जो अपवित्रता फैलाने वालों की प्रतीक्षा कर रही थी
17:45सहसा एक अभागा आत्मा चीखते हुए एक विशाल दुरगंधित कीचर के गड़े में धकेल दी गई जहां अंगिनत रेंगते हुए
17:54कीडे उसके शरीर को नोचने के लिए तैयार थे
17:58पूरे नरक लोक में भयानक दुरगंध व्याप्त थी और कीचर से उठते हुए हरे पीले धुए ने उस दृष्य को
18:05और भी भयावह बना दिया जहां हर सतह पर चमकते हुए कीडे रेंग रहे थे
18:11विश्णु ने कहा जो अज्यानी या जानबूच कर पवित्र मंदिरों, जलाश्यों या आश्रमों को दूशित करते हैं उनका कर्म उन्हें
18:20इस कीचर भरे पाताल लोक में खींच लाता है
18:24गरुर ने गहरी सास ली उस दुरगंधित वातावर्ण के बोज तले दबे हुए और उनके मन में उन अभागों के
18:32लिए करुणा उमड पड़ी जो इस भयानक दंड को भोग रहे थे
18:37एक आत्मा जो पहले कभी मंदिर की पवित्रता भंग करती थी अब कीचर में धंसी हुई थी और उसके पूरे
18:45शरीर को चमकते हुए कीडे लगातार कुतर रहे थे जिससे असहनिय पीडा हो रही थी
18:52वायुमंडल में सडन की तीखी गंध और मुग चीखें तैर रही थी जो हर कण को दूशित कर रही थी
18:58मानो स्वयन पवित्रता का अपमान स्वर्ग तक पहुँच गया हो
19:03दूर दूर तक फैले इस नरक में अंगिनत आत्माए उसी भयावह यातना को जेल रही थी उनके शरीर अनंतकाल तक
19:11कीडो का भोजन बन रहे थे
19:14गरुर ने अपनी आखें बंद कर ली उस अपार पीडा को देख कर और उनके मन में एक ही प्रश्न
19:21था है प्रभु यह दंड कब तक सहना पड़ता है
19:26एक आत्मा जो कीचड में फंसी हुई थी उसने मुक्ती के लिए हात फैलाए पर हर प्रयास उसे और भी
19:33गहराई में खीचता गया जहां कीडे उसे निर्दैता से नोचते रहे
19:39कीचड में फंसी आखों में अनंत काल की निराशा चमक रही थी, क्योंकि हर चमकता कीड़ा उसके अस्तित्व को अनवरत
19:47पीड़ा दे रहा था
19:49विश्णु ने समझाया पाप की तीवरता के अनुसार आत्माय लंबे समय तक इस नरक में यातना झेलती हैं, फिर उन्हें
19:57ऐसे प्राणियों के रूप में पुनरजन्म मिलता है, जो स्वयं गंदगी में ही निवास करते हैं
20:04गरुर ने भैभीत होकर उस अद्रिश्य चक्र की कलपना की, जहां आत्माय अनंत काल तक पवित्रता भंग करने के अपने
20:12पाप का प्रायश्चित करती थी
20:15एक विचलित आत्मा धीरे-धीरे एक घ्रेनित रेंगते हुए कीट में परिवर्तित होने लगी, उसके शरीर के अंसिकुरते और विक्रित
20:24होते जा रहे थे
20:26पुनर्जन्म के बाद ये आत्माय गंदगी के धेरों में निवास करती हैं, क्रिमी कीट या अन्य घ्रेनित प्राणियों के रूप
20:34में, जिन्हें सभी प्राणी घ्रेना की द्रिष्टी से देखते हैं
20:39अनंत काल तक वे इसी गंदगी और घ्रेना में जीते हैं, अपने पूर्व पापों का फल भोगते हुए, जब तक
20:46की कर्म का चक्र एक नए मोर पर न पहुँच जाए
20:50भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य आभा के साथ गंभीर स्वर में कहा, यह उन सभी के लिए एक अटल सत्य
20:58है जो पवित्रता का अनादर करते हैं, क्योंकि हर कर्म का अपना एक अवश्यमभावी परिणाम होता है
21:06अंतिम द्रिश में एक छोटा, घ्रेनित कीट गंदगी के एक छोटे से धेर में रेंग रहा था, अपने पूर्व जन्म
21:13के पापों का बोज ढोते हुए, घ्रेना और अलगाव का प्रतीक बना हुआ
21:19पूरा क्राइम भोजाना नरक एक तीवर, दुष्ठ हरे प्रकाश से जग्मगा उठा, जो पवित्रता के अपमान के भयानक और चिरस्थाई
21:27परिनाम की मूप चेतावनी दे रहा था
21:31उस भीशन नरक के भयावह द्रिश्य अभी भी गरूर की स्मृती में ताजे थे, जहां पापों का बोज अनंत पीडा
21:38बनकर रेंग रहा था
21:40भगवान विश्णू ने अपनी कमलसी आखों को नरक की गहराई पर टिकाते हुए एक गंभीर और स्थिर स्वर में अगला
21:48उपदेश देना आरंभ किया
21:51उन्होंने कहा, गरूर जो कोई भी मंदिरों, ब्राहमनों या धर्मार्थ कारियों के लिए समर्पित धन, आभूशन या पवित्र भूमी को
21:59चुराता है, वह केवल भौतिक चोरी नहीं करता, बलकि धर्म की नीम को हिला देता है
22:07जैसे ही चोर ने अपने भरष्ट हाथों से उस पवित्रदान को चुआ, मंदिर की वेदी पर जलने वाले दीपक की
22:14लौसहसा काप उठी और फिर बुझने लगी, जैसे पवित्रता का प्रकाश क्षीन हो रहा हो
22:21विश्णु ने आगे समझाया कि यह चोरी केवल भौतिक वस्तूओं का नुकसान नहीं है, बलकि उस आध्यात्मिक पोशन का हनन
22:29है, जो समाज को धर्म के माध्यम से मिलता है
22:34गरुर ने अपनी आखें बंद कर ली, उस अपराद की भयावता को महसूस करते हुए, और फिर उन्हें खोलते हुए
22:41गहन चिंतन में भगवान की ओर देखा
22:45भगवान ने कहा, जो कोई भी ब्राहमनों की आजिविका छीनता है, वह सरस्वती का अपमान करता है, क्योंकि ज्ञान का
22:53पोशन करने वाले ही सबसे पहले पूजनिय होते हैं
22:58उसक्षन ज्यान के ग्रंथों पर एक अद्रिश्य धूल की परत चड़ने लगी, और पवित्र मंत्रों की ध्वनी मंद पड़ गई,
23:06जैसे स्वयन सरस्वती देवी कराह रही हो
23:10विश्णू ने द्रिड़ता से घोशना की, यह केवल पाप नहीं, अपितु आत्मा का पतन है, जो प्राणी को ऐसे कर्मों
23:18में लिप्थ होने पर अनंत्काल तक नरक में धकेलता है
23:22गरुर ने अपने विशाल पंखों को थोड़ा फैलाया, मानो वे उन पापियों के भाग्य को सुनकर काप उठे हो, जिनकी
23:30आत्मा नरक की गहराईयों में विलीन हो जाती है
23:34इस पाप के कारण आत्मा को अंत्ता अंधकूप नामक नरक में फेंका जाता है, जहां वह अपनी इंद्रियों के अंधत्व
23:42के कारण कभी प्रकाश नहीं देख पाती
23:46अंधकूप की गहराईयों से कराहने की एक मरमसपरशी ध्वनी गुमजी, जो उन आत्माओं की थी, जिन्होंने पवित्रधन का अनादर कर
23:54अपनी द्रिष्टी खोदी थी
23:57भगवान विश्णू ने आकाश की ओर देखा, जहां दूर वैकूंट की सुनहरी आभाक्षन भर के लिए मंद पड़ती दिखी, जैसे
24:05इस जगन्य पाप से देवत्व भी व्यथित हो
24:09ऐसे चोर विश्णू ने अपनी दिव्य आभा को और भी तीवर करते हुए कहा, अगले जन्म में जन्मजात अंधे या
24:17कोधी के रूप में जन्म लेते हैं, ताकि उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना पड़े
24:22इस दंड को दर्शाते हुए, अगले द्रिश में एक निर्जन मार्ग पर एक अंधे भिखारी का रूपक प्रकट हुआ, जो
24:30अपनी लाठी के सहारे ठोकर खाते हुए जीवन की अनश्चित्ता का प्रतीक बना हुआ था
24:37जैसे ही वह आगे बढ़ा, उसके पच्चहनों से धूल नहीं, बलकि एक सुक्ष्म सड़ी हुई हरीकाई उगने लगी, जो उसके
24:45पिछले जन्म के दूशित कर्मों का प्रतीक थी
24:49भगवान विश्णों ने ब्रहमांड के न्याय को स्पष्ट करते हुए कहा, कोई भी कर्म, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों
24:56नहों, उसके परिणाम से बच नहीं सकता, और धर्म का अपमान सबसे बड़ा पाप है
25:03गरुर ने अपनी आखों में गंभीरता लिये, भगवान के इस अटल विधान को पूरी श्रद्धा से स्विकार किया, क्योंकि उन्होंने
25:11धर्म के गहरे रहसियों को आत्म साथ कर लिया था
25:15इस शिक्षा के सार को दर्शाते हुए, पवित्र जलकुंड के तट पर एक व्रिध पुजारी को दिखाया गया, जो पूर्ण
25:23भक्ती के साथ एक छोटासा दान भी स्विकार कर रहा था, उसकी आखों में संतोश की चमक थी
25:30उस भीशन क्राइम भोजाना नरक के उपर एक शनिक, शांत स्वर्निम आभा फैली, जो पवित्र धन के अपमान के भयानक
25:39परिनाम और धर्म के सम्मान की शाश्वत शक्ती की मूप चेतावनी दे रही थी
25:45धर्म के सम्मान की शाश्वत शक्ती की मूप चेतावनी के बाद अब यमलोग के उस भयानक खंड का समय था
25:52जहां पवित्र धन के चोरों को उनके अक्षमय पापों का दंड भुगतना पड़ता है
25:59भगवान विश्णू ने गरूर की ओर मुर्ते हुए अपनी सौमय परंतु गंभीर वानी में उन अपराधों की क्रूरता का वर्णन
26:06किया जो देवों और ब्राह्मनों के धन को हरने से उत्पन होते हैं
26:12उसी क्षण एक अद्रिश्य शक्ती के आबेग से एक पापी आत्मा को यमदूतों ने एक विशाल लोहे के हूग से
26:19उठा कर भयानक यातना ग्रह में खींच लिया जहां उसके हर अंग को नोचने की तयारी थी
26:26उस भयानक द्रिश्य से एक चीख उठती है जो नरक की गहराईयों में गुंजती हुई हर उस आत्मा को चेताबनी
26:34देती है जिसने पवित्रता का अपमान करने का दुस्सा हस किया
26:39आगे बढ़ते हुए एक और खंड सामने आता है जहां पापियों के शरीरों को भारी घुर घुराती शिलाओं के नीचे
26:47कुछला जाता है उनकी आत्माय अनंतकाल के लिए दर्द से छट पटाती है
26:54भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि यमदूतों का क्रोध उन पर भयंकर रूप से उमरता है जो धर्म के
27:01नाम पर अर्जित पवित्र संपदा को कलंकित करते हैं
27:06प्रत्येक यमदूत क्रोध से भयंकर एक पापी की आत्मा को अमानविय शक्ती से खीचता है उसके अंगों को तोड़ने के
27:14लिए जो दर्द की एक अंथीन गाथा थी
27:18लोहे के तीक्षन औजारों से वे शरीर को विखंडित करते हैं हर टुकडे में अनंत पीडा भरते हैं जिसका अनुभव
27:26केवल नरक की गहराईयों में ही संभव है
27:30शरीरों को लगातार कुचला जाता है, फिर से बनाया जाता है और फिर से फार दिया जाता है
27:36यह एक शाश्वत चक्र था जिसमें आत्मा को कभी भी विश्राम नहीं मिलता था
27:42गरुर के विशाल हृदय में भी इस भीशन यंत्रना को देख कर गहरी पीरा और भय घर कर गया, उनकी
27:49आखें इस अकलपनिय दुख पर टिकी थी
27:53तूटे हुए अंगों को फिर से जोडने और फिर से तोडने का यह न्रिशन स्खेल, पापियों को उनके अपराधों का
28:00स्मरण कराता हुआ, अनंतकाल तक चलता रहा
28:04यह दुश्चकरक जिसमें शरीर बार-बार खंडित होते और फिर से जुड़ते थे, पवित्र धन के प्रत्येक चोरी किये गए
28:12कन के लिए एक शाश्वत प्रतिशोध था
28:16इसके बाद एक और भयानक दंड प्रतीक्षा कर रहा था, पिघला हुआ सोना या चांदी, जिसे पवित्र माना जाता था,
28:24अब वही पापियों के शरीर को भीतर से जला कर भस्म कर देता था
28:30भगवान विश्णू ने समझाया की कैसे पवित्रधात हुए, जिन्हें सम्मान से रखा जाना चाहिए था, अब उसी पापियों के शरीर
28:38को पिघला देती हैं, जिन्होंने उनका अनादर किया
28:43यमदूतों ने क्रूर्ता से पिघले हुए सोने और चान्दी को पापियों के गले में उडेल दिया, जिससे उनके अंदरूनी हिस्से
28:50भयावह रूप से जलने लगे और वे चीखने लगे
28:54यह पिघली हुई अगनी शरीर के हर कन को जलाती हुई नीचे उतरती थी, आत्मा को भीतर से भस्म करती
29:02हुई, एक ऐसा दर्ध जो मृक्यू से भी परे था
29:06यमलोक में पवित्रधन चुराने वालों को अनन्त काल तक यह यंत्रणा भोगनी पड़ती थी, उनके पापों का भार उन्हें कभी
29:14मुक्ती नहीं देता था
29:16अन्त में यहां आत्माय अपने कर्मों के फल्स्वरूप, अगले जन्म में गरीब रोगी भिखारी के रूप में जन्म लेती थी,
29:24जिनका जीवन दरिद्रता और बीमारी से भरा होता था
29:29एक पापी आत्मा को यमलोग के द्वार से बाहर धकेला जा रहा था, उसका शरीर अत्यंत दुर्बल और ख्षीन था,
29:37जो उसके अगले जन्म की दरिद्र अवस्था का प्रतीक था
29:41इस प्रकार पवित्र धन का अपमान करने वालों को न केवल नरक में असहनिय पीडा भोगनी पड़ती थी, बलकि जीवन
29:49और मृत्यू के शाश्वत चक्र में भी उन्हें उसका दंड भुगतना पड़ता था
29:55भगवान विश्णू ने अपनी गंभीर वानी में गरूर से कहा कि यह तो केवल भौतिक धन के अपमान का दंड
30:02था, परन्तु धर्म और उसके सच्चे सेवकों का अपमान ब्रहमान को ही जगजोर देता है
30:09उनके मुखमंडल पर गंभीरता और करुणा का अद्भुत संगम था, जब उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति धर्म के आधार स्तंभों
30:17को ही तोड़ने का प्रयास करता है, वह स्वया अपने लिए भयानक दुर्भाग्य का मार्ग खोलता है
30:25उन्होंने एक द्रिश्य का वर्णन किया जहां एक क्रूर राजा अपने अहमकार में चूर एक विनम्र रिशी को निर्ममता से
30:33पीट रहा था, जिसके नेत्रों से जलधारा बह रही थी
30:37उसक्षन ब्रह्मांड के समस्त लोक हिल उठे, जैसे किसी ने धर्म के सबसे पवित्र धागे को तोड़ने का प्रयास किया
30:45हो और आकाश में एक भयावधरार प्रकट हुई
30:49भगवान विश्णू ने समझाया कि धर्मनिष्ट व्यक्तियों को सताना केवल उस व्यक्ति पर ही नहीं, बलकि संपूर्ण वंश और समाज
30:57पर एक अमिट श्राप लगाता है, जो पीढियों तक पीछा करता है
31:03उनकी वानी में वजर के समान द्रिडता थी, जब उन्होंने कहा कि ऐसे कृत्य के परिणाम में उस राजा का
31:10पूरा सामराज्य धीरे-धीरे अकाल, रोग और आंतरिक कलह के दलदल में धंसने लगा
31:17महल के भव्यकक्षों में अब दर्दर्ता का साया मंदरा रहा था, जहां कभी स्वर्ण की चमक थी, वहां अब धूल
31:25और निराशा का सामराज्य था, लोग भूख और बीमारी से त्रस्त थे
31:30एक विशाल सूखता हुआ वरिक्ष, जिस पर कभी फल लगते थे, अब पूरी तरहे से मुर्जा चुका था, जैसे राज्य
31:38की आत्मा ही सूख गई हो, उसकी जड़े सामराज्य के गहरे पापों को दर्शा रही थी
31:45भगवान विश्णु ने चेतावनी दी की पवित्र पशू, विशेशकर गौमाता का अनादर या उत्पीडन, साक्षात, धर्म पर ही प्रहार है,
31:53जिसके परिणाम और भी भीशन होते हैं
31:57गरुर ने उचसुकता से पूछा, हे प्रभु, गौमाता को सताने वालों को ऐसा कौन सा दंड मिलता है, जो इतना
32:05भयानक माना जाता है
32:08तब विशनु ने एक ऐसे कुरूर व्यक्ती का चितरन किया, जो एक दुर्बल वृद्ध गाय को बेरहमी से डंडे से
32:15पीट रहा था, जिसके शरीर पर चोट के निशान सपष्ट दिख रहे थे
32:20उसी क्षन उसकुरूर व्यक्ती के हाथ से लाठी छूट कर आग की लप्टों में बदल गई और उसके हाथ पर
32:27गहरे जलने के निशान पड़ गए, जैसे धर्म ने ततकाल प्रतिशोध लिया हो
32:33भगवान विश्णू ने आगे बताया कि यह दुशकर्म केवल शारिरिक पीडा तक सीमित नहीं रहता, बलकि उसकी आत्मा पर एक
32:41अमिट दाग छोड़ जाता है, जो उसे पुनरजन्म के चक्र में भी सताता है
32:47भगवान विश्णू की आखें अनंत ज्यान से चमक रही थी, जब उन्होंने कहा कि ऐसे पापी अगले जन्म में स्वतही
32:55ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं, जहां उन्हें स्वयन तिरसकार और अभाव का सामना करना पड़ता है
33:03एक जीर्ण शीर्ण जोपड़ी में एक बीमार दुर्बल बालक अपनी माता की गोद में पड़ा था, जिसकी आखे भूख और
33:11पीड़ा से भरी थी, जो पूर्वजन्म के कर्मों का फल भुगत रहा था
33:16उनके चारों और दरिद्रता की एक अद्रिश बेड़ी बंधी हुई थी, जो उन्हें कभी भी सुख और समरिद्धी की और
33:24बढ़ने नहीं देती थी, जैसे कि स्वया भाग्य ने उनसे मुह मोड लिया हो
33:30भगवान विशनु ने दरिड़ता से कहा कि धर्म की रक्षा करना और निर्दोशों की रक्षा करना ब्रहमांडिय संतुलन बनाये रखने
33:38के लिए सर्वोपरी है और इसका उलंगन अराजक्ता को जन देता है
33:44गरुर ने भगवान विशनु के शब्दों को अपनी आत्मा में अनकित कर लिया
33:49समझ गए कि धर्म के प्रतीहर अन्याय का मूल्य अत्यंत भारी होता है और प्रकृती उसे कभी नहीं भूलती
33:57एक विशाल प्राचीन तराजू जिसके एक पलडे पर धर्मनिष्ठों के आसू और दूसरे पर पापियों के कृत्य रखे हुए थे
34:05धीरे धीरे संतुलन खो रहा था जिसका जुकाव विनाश की ओर था
34:11दूर क्षितिच पर क्रिंसन परवतों के पीछे एक प्रचंड अगनी की ज्वाला उठ रही थी जो धर्म के प्रतिशोध का
34:19प्रतीक थी एक ऐसा दंड जिससे कोई बच नहीं सकता था
34:24भगवान विश्णू ने गरूर की ओर देखा जिनके मन में धर्म के अद्रिश्य प्रतिशोध की गहनता ने गहरी चाप छोड़
34:31दी थी और कर्म के अटल विधान को और स्पष्ट करने लगे
34:35हे गरूर्द भगवान विश्णू की ध्वनी ब्रहमांड में गूंजी जो व्यक्ती निर्दोश और गुनी आत्माओं को पीड़ा पहुचाते हैं उनका
34:45कर्म रिन अद्रिश्य रूप से उनके पीछे चलता है हर श्वास में उनके पापों का लेखा जोखा करता है
34:53उनके शब्दों के साथ ही आकाश में एक अद्रिश्य चक्र प्रकट हुआ जिसके प्रत्येक खंड में न्याय, पीड़ा और पुनर्जन्म
35:01के सुक्ष्म सूत्र बुने हुए थे जो कर्म के जटिल बुनावट को दर्शाते थे
35:07प्रत्येक आत्मा के उपर एक सुक्ष्म प्रकाश पुन्ष टिंटिमा रहा था, जो उसके सभी कर्मों का मौन साक्षी था, उसके
35:15भविश्य के मार्ग को अद्रिश्य रूप से निर्देशित कर रहा था
35:20विश्नु ने समझाया कि कैसे दुष्ट व्यक्तियों द्वारा सताये गए गुनी संत और पवित्र पशुओं की पीड़ा ब्रहमाड में एक
35:27ऐसी प्रतिध्वनी पैदा करती है, जो अंत्ह अपराधियों के लिए एक गंभीर कर्मिक रेन बन जाती है
35:35उनकी चीखें, उनके अश्रु, भगवान विश्नु ने गंभीर स्वर में कहा, ब्रहमाड की स्मृती में अंकित हो जाते हैं और
35:44समय आने पर प्रतिशोध का बीज बोते हैं, जिसे कोई भी मिटा नहीं सकता
35:49तभी एक प्राचीन वन के मध्य, एक वृद्ध रिशी को क्रूर राजा के सैने को द्वारा निर्गैता से अपमानित करते
35:57हुए देखा गया, उनके ज्ञान और तपस्या का उपहास उड़ाया जा रहा था
36:03रिशी के मौन अश्रु, उनकी आखों से जहरते हुए, भूमी पर गिरे और तुरंथ ही चमकीले रतनों में बदल गए,
36:10जो न्याय के लिए ब्रहमांड की प्रतीक्षा को दर्शाते थे
36:15इसके बाद उन्होंने उन पापियों के भाग्यका वर्णन किया, जो अपनी क्रूर्ता से पवित्र पशूओं को सताते हैं, उनके जीवन
36:23को दुहक और भै से भर देते हैं
36:27गरुर के पंख क्षन भर के लिए कापे, उनकी आत्मा को उन निर्दोश प्राणियों की कलपना से गहरा आगहात लगा
36:34जिनकी कोई रक्षा नहीं थी
36:37एक क्षनिक द्रिश में एक बच्छडे को उसकी मा से निर्ममता पूर्वक अलग किया जा रहा था और उसकी मा
36:44की करुन पुकारें हवा में गूंज रही थी, जिसे कोई नहीं सुन रहा था
36:49उस असहाय जानवर की आखें आसुओं से भरी ब्रहमांड के अन्थीन विस्तार को निहार रही थी, जिसमें न्याय की एक
36:58अग्रिश पुकार समाहित थी
37:01उनके कर्म उन्हें निन्न योनियों में धकेल देते हैं, विश्नु ने आगे कहा, जहां वे स्वयं वही पीडा सहते हैं,
37:08जो उन्होंने दूसरों को दीथी, शोशन और वध का अन्थीन चक्र
37:14वे पशुओं के रूप में जन्म लेते हैं, जिनका उप्योग और वध किया जाता है, अपनी पूर्व जन्म की क्रूरता
37:21का फल भोगते हुए
37:23एक पापी आत्मा, जिसने कभी जानवरों को सताया था, अब स्वयं एक दुर्बल बकरी के रूप में पुनर्जन्म लेती है,
37:31जिसका शोशन किया जाता है, और अंत्य बलिदान के लिए ले जाया जाता है
37:38बकरी की चीखें, जो कभी उस पापी के अत्याचारों का मौन गवाह थी, अब उसकी अपनी पीड़ा की प्रतिध्वनी बन
37:46जाती है
37:48यदि वे मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं, विश्णु ने अपनी बात जारी रखी, तो वे बीमारियों और दुर्भाग्य
37:55से पीड़ित रहते हैं, जब तक कि उनका कर्मिक रेन पूरी तरह से संतुलित नहीं हो जाता
38:02उनकी आत्माए तब तक चैन नहीं पाती, जब तक उन्होंने दूसरों को जो दर्द दिया था, उसे स्वय अनुभव न
38:09कर लें, जिससे न्याय का चक्र पूरा हो जाता है
38:14एक धनी व्यक्ति, जिसने अपने जीवन में गरीबों को सताया था, अब एक दैनिय भिखारी के रूप में जन्म लेता
38:22है, जो लगातार बीमारियों और समाज के तिरसकार से पीड़ित रहता है
38:28कर्म का विशाल चक्र, अनंत काल तक घूमता हुआ, प्रत्येक आत्मा के भाग्य को निर्धारित करता है, यह सुनिश्चित करता
38:36है कि कोई भी अन्याय बिना किसी प्रतिशोध के न रहे
38:41भगवान विश्णु अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन, स्रिष्टी के गूढ नियमों की व्याख्या करते हुए, गरूर को कर्म के अटूट
38:48बंधन का अंतिम सत्य समझाते हैं
38:52वे द्रेड़ता से घोशना करते हैं कि अज्ञानता किसी भी पाप कर्म का क्षमा नहीं है, क्योंकि ब्रहमांड का विधान
39:00अपनी शाश्वत गती से चलता है
39:03हर क्रिया, चाहे वह गुप हो या सब के सामने की गई हो, एक लहर की तरह ब्रहमांड के कर्मसागर
39:10में प्रतिध्वनित होती है, जिससे उसकी लहरें अंत्य करता तक लौट आती है
39:17यह कर्मचकर इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि कोई भी जीव, चाहे वह कितना भी बलशाली क्यों न हो, इसके
39:25पाश से बच नहीं सकता
39:28विश्नु आगे समझाते हैं कि मुक्ती और परमशांती का एक मात्र सच्चा मार्ग केवल धर्म, पवित्रता और अटूट श्रद्धा में
39:36नहित है
39:38वे कहते हैं कि धार्मिक जीवन और सत्य के मार्ग पर चलने से ही आत्मा अपने सभी पापों से मुक्त
39:45होकर परमात्मा में लीन हो सकती है
39:49धर्म का पालन करना केवल नियमों का पालन करना नहीं, बलकि आंतरिक शुद्धता और परोपकारिता के साथ हर प्राणी के
39:57प्रती प्रेम और सम्मान रखना है
40:00यह पवित्र जीवन की शक्ती इतनी गहन है कि वह बड़े से बड़े पापों के संचित भार को भी संतुलित
40:07कर सकती है, जिससे आत्मा का शुद्धिकरण होता है
40:13भगवान विश्णू ने गरूर को बताया कि मन की पवित्रता ही सच्चे कर्म का आधार है, क्योंकि मन से ही
40:19सभी शुभशुभ विचारों का जन्म होता है
40:23वे समझाते हैं कि एक पवित्र मन से किया गया छोटा सा दान भी बड़े अहमकार पूर्ण यग्यों से कहीं
40:30अधिक फलदाई होता है
40:33श्रद्धा और भक्ती से परिपूर्ण हरिदय परमेश्वर के प्रती समर्पन से अपने सभी कर्मों को निश्काम भाव से अर्पित करता
40:41है
40:41जिससे वह कर्म के बंधनों से मुक्थ हो जाता है
40:46धर्म इसलिए केवल एक मार्ग नहीं बलकि जीवन जीने की एक कला है एक शाश्वत सत्य जो हर आत्मा को
40:54उसके अंतिन गंतव्य तक पहुँचाता है
40:58भगवान विश्णु ने अपने प्रवचन का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि धार्मिक व्यक्ती का जीवन स्वय एक यग्य है
41:05जहां हर कर्म आहुती के समान होता है
41:09वे बताते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों के दुहक में अपना दुहक देखता है और उनकी सहायता करता है वह
41:17वास्तव में परमाक्मा की सेवा करता है
41:21ऐसे परोपकारी कर्मों की शक्ती इतनी महान होती है कि वे पिछली जन्मों के अंजाने पापों को भी नश्ट करने
41:29में सक्षम होते हैं, जिससे आत्मा शुद्ध होती जाती है
41:34इसलिए भयभीत होने के बजाए प्राणियों को अपने कर्मों के प्रती सचेत रहना चाहिए और हमेशा धर्म के मार्ग पर
41:42अडिग रहना चाहिए
41:45भगवान विष्णु ने अपने वचनों को विराम देते हुए ब्रहमांड के इस सर्वोच सत्य को गरुड के हृदय में स्थापित
41:52किया की कर्म ही अंतिन निरनायक है
41:56गरुड परम ज्ञान से परिपून होकर भगवान विष्णु के चर्णों में शीश नवाते हैं उनके दिव्य वचनों को अपने हृदय
42:04में आत्म साथ करते हुए
42:06इस ज्ञान के साथ गरुड ने समझा की न्याय और संतुलन ही स्रिष्टी के आधार हैं और कोई भी कर्म
42:13चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो कभी व्यर्थ नहीं जाता
42:18और इस प्रकार कर्म चक्र का अटूट विधान धर्म की परम शक्ती के साथ हर आक्मा के शाश्वत पत को
42:25प्रकाशित करता रहा अनंत काल तक