Skip to playerSkip to main content
नरक की यातनाएँ भुगतने के बाद, क्या आत्मा को तुरंत मानव जन्म मिल जाता है? गरुड़ पुराण के इस भयावह अध्याय में, भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि कैसे कर्मों का लेखा-जोखा आत्मा को लाखों जन्मों तक पशु, पक्षी, कीट-पतंग और यहाँ तक कि जड़ वस्तुओं की योनि में भटकने पर मजबूर करता है। एक मामूली पाप भी कैसे एक आत्मा को वर्षों तक सूअर, सांप या वृक्ष के रूप में कष्ट भोगने पर विवश करता है, इसका रहस्योद्घाटन होगा। यह एपिसोड कर्मफल के उस सूक्ष्म और अकाट्य विधान को उजागर करता है, जहाँ प्रत्येक कर्म का फल भोगने के बाद ही आत्मा धीरे-धीरे मानव योनि की ओर अग्रसर होती है। क्या है यह लाखों जन्मों का भयानक चक्र, और कैसे मिलती है अंततः मानव शरीर में वापसी? जानिए इस रोमांचक और शिक्षाप्रद कड़ी में! #गरुड़पुराण #कर्मफल #पुनर्जन्म #मृत्युकेबाद #नरक #योनियां #सनातनधर्म #भारतीयसंस्कृति #आध्यात्मिकयात्रा #गरुड़पुराणEp32
Transcript
00:00नरक की अकल्पनिय यातनाओं से गुजरने के बाद भी आत्मा का सफर शेश बचे हुए कर्मों के बोज तले कभी
00:07समाप्त नहीं होता। भगवान विश्णु ने गंभीर स्वर में गरूर से कहा।
00:12गरूर के विस्मेभरे नेत्रों में असीमित जिग्यासा थी, जैसे वह इस नए रहस्य को समझने का प्रयास कर रहे हों
00:20और उन्होंने अपने स्वामी की और प्रश्न सूचक द्रिश्टी से देखा।
00:25भगवान विश्णु ने कर्म विपाग के कठोर विधान का खुलासा किया, समझाते हुए कि कैसे आत्मा को शेश कर्मों के
00:33कारण तुरंत मानव योनी नहीं मिलती, बलकि उसे निम्न योनियों में भटकना पड़ता है।
00:40यही अधम योनियों का भयावध द्वार है, जहां एक आत्मा अपनी शुद्धता खोकर मात्र एक शीन प्रकाश पुझ में बदल
00:48जाती है, और इस वीरान भूमी के गहन अंधकार में खीची जाती है।
00:53इस वीरान भूमी में असंख्य आत्माए, अपने कर्मों के अनुसार, अपनी नई और भयावा यात्रा की शुरुवात करने के लिए
01:03विभिन्न निम्न रूपों में ढलने को विवश्ट थी।
01:07भगवान विश्णू ने गरूर को बताया की कैसे अधर्मी आत्माए, जिन्हें अत्यधिक घमंड और स्वार्थ था, अब कीडें कोडों के
01:15घ्रिनित शरीर में जीवन व्यतीत करने पर मजबूर होंगी।
01:20एक आत्मा, एक अचेट धूसर कीडे में सिमट्ती हुई, धूल और क्षय के बीच रेंगने लगी, उसका पूर्व का अहंकार
01:28अब एक नगण्य अस्तित्व में बदल चुका था।
01:32उस छोटे से कीडे की आखों में, जो अब पृत्वी की गंदगी में लिप्ट था, एक अदमे पीडा और पूर्व
01:39जीवन की दबी हुई स्मृती की जलक स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
01:44दूर क्षितिच पर इस वीरान भूमी में अब कहीं कहीं ठहरे हुए गंदे पानी के पोखर और दलदल भी दिखाई
01:51देने लगे थे, जो सरीसरिप योनियों की ओर इशारा कर रहे थे।
01:57गरुर के चहरे पर एक भयावः शड़र दोड़ गया, जैसे ही भगवान विश्णु ने उन आत्माओं के बारे में बताया
02:04जो सर्पों और अन्यजलिये जीवों के रूप में पुनरजन्म लेती हैं।
02:10एक आत्मा, एक भयानक चीतकार के साथ अपने मानव रूप को त्याग कर एक विशैले काईदार नागिन में बदल गई,
02:18जो ततकाल उस मेले पानी में सरक गई।
02:21उस नागिन की ठंडी, निर्विकार आखों में अब किसी भी प्रकार की मानविये चेतना का अंशेश नहीं था, केवल एक
02:30आदिम क्रूर इंस्टिंट की चमक दिखाई देती थी।
02:34फिर यह वीरान भूमी और भी शुष्क और कठोर दिखाई दी, जहां पत्थरों के उभार और निर्जीव प्रतीत होने वाले
02:42भूभाग और भी जड़ योनियों की ओर संकेट कर रहे थे।
02:46गरूर के मन में अब एक गहरी उदासी चा गई, क्योंकि भगवान विश्णु ने उन आत्माओं के भाग्य का वर्णन
02:54किया जो पत्थर, चट्टान और अन्यजड वस्तूओं में विलीन हो जाती हैं।
03:00एक आत्मा धीरे धीरे अपने अस्तित्व को खोते हुए, एक विशाल खुर्दरे पत्थर में समाहित होती गई, उसकी सभी भावनाएं
03:09और चेतना जड़ता में विलीन हो गई।
03:12अब वह आत्मा एक ठंडे निर्जीव पत्थर के भीतर कैद थी, सहसरों वर्षों तक उसी जड़ता में बंधी रहने के
03:20लिए अभिशप्त बिना किसी स्मृती या आशा के।
03:24यह अधम योनियों का विशाल शेत्र अब अंगिनत कीडे, सर्प और पत्थरों से भर चुका था, प्रत्येक रूप एक आत्मा
03:32के निरंतर भोग का भयावः प्रमान था।
03:36गरुर अत्यंत विचलित होकर अपने स्वामी से पूछा, हे प्रभु यह असहनिय यातनाय कब तक चलती रहेंगी? क्या इन आत्माओं
03:46को कभी मुक्ती मिलेगी?
03:48भगवान विश्णू ने धीरता से उत्तर दिया, गरुर जब तक कर्मों का चक्र पूर्ण नहीं होता, आत्मा इसी प्रकार विभिन्न
03:56योनियों में भटकती रहती है, एक से दूसरी में प्रवेश करती हुई
04:01और इस प्रकार अधम योनियों की इस भयावह यात्रा में, प्रत्येक आत्मा अपने कर्मों के अनुसार अपनी नेती का सामना
04:10करती हुई, अनंतकाल तक इस विरान भूमी में भटकती रहती है
04:15भगवान विश्णु ने फिर अपनी असीम ज्यानद्रिष्टी से आगे के मार्ग का रहस्योद घाटन किया, जहां आत्माओं को एक और
04:24भीशन परीक्षा का सामना करना पड़ता है
04:28गरुर्त जो मनुष्य दूसरों की संपत्ती को अनुचित रूप से हडपता है, वह अपने कर्मों के फल्स्वरूप व्रिक्ष योनी में
04:35जन्म लेता है
04:38उस आत्मा को कठोर धर्ती में जड़वत खड़ा रहना पड़ता है, जहां वह अपनी पूर्व की लालसाओं का प्रायश्चित करती
04:45है बिना किसी गती या अभिव्यत्ती के
04:49भीशन गर्मी की तपिश और शीत काल की ठिठुरन उसे वर्षों तक बिना किसी प्रतिक्रिया के सहनी पड़ती है, जैसे
04:57एक पत्थर जड़वत पड़ा हो
05:00इसी प्रकार जो पर्यावरण को नश्ट करते हैं या निर्दैता से हरे भरे व्रिक्षों को काटते हैं, वे भी इस
05:07जड़ योनी के शाप के भागी बनते हैं
05:11गरुर ने गहरी सास ली, उसके हरिदय में उन आत्माओं के प्रती करुणा उमर पड़ी जो अब व्रिक्ष बन चुके
05:18थे, मौन पीडा सहते हुए
05:21जो लोग स्वार्थवश वनों को उजाडते हैं और जीवजन्तूओं के आश्रय छीन लेते हैं, उनकी आत्माओं स्वयंग उन ही कटे
05:29हुए व्रिक्षों के रूप में पुनरजन्म लेती हैं
05:33वे अपनी जडों से बंधे हुए, अनंतकाल तक प्रकृती के अनियंत्रित क्रोध को जहलते हैं, हर आधी और तूफान में
05:41अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए
05:44यह यातना तब तक जारी रहती है, जब तक उनके पापों का भार पूरी तरह से नश्ट नहीं हो जाता,
05:51कभी कभी कई सौ वर्षों तक
05:54भगवान विश्णों की आखों में एक गहरी उदासी चाई हुई थी, वे प्राणियों के कष्टों को देख कर विचलित थे,
06:02पर धर्म का मार्ग अटल था
06:05ऐसे व्रिक्ष अपनी पत्तियों, फूलों और फलों के माध्यम से भी अपने कष्टों को व्यक्त नहीं कर पाते, केवल हवा
06:12में सिस्किया भरते हैं
06:15सदिया बीट जाती हैं, मौसम बदलते रहते हैं, पर उस आत्मा के लिए समय एक स्थिर कारागार बन जाता है,
06:23जहां उसे अपने पापों का प्रायश्चित करना होता है
06:28प्रत्य कृत्य चाहे वह छोटा हो या बड़ा, ब्रहमांड के अद्रिश्य धागों में गुंत कर एक अविनाशी परिणाम बुनता है
06:37गरुर ने भगवान विश्णों की ओर देखा, उसकी आखों में अब केवल भय नहीं, बलकी कर्मों के अटल विधान के
06:45प्रती गहरी समझ थी
06:47जब ऐसे व्रिक्षों को काटा जाता है, तो आत्मा को तीवर पीडा होती है, जैसे उसके अपने ही शरीर को
06:55खंडित किया जा रहा हो
06:57कटे हुए ठूंट से भी आत्मा की पीडा निरंतर रिस्ती रहती है, एक मौन चीख बनकर जो केवल ब्रहमांड ही
07:05सुन सकता है
07:07यह व्रिक्ष योनी गरुड उन पापियों के लिए एक कड़वी पाठशाला है, जो जीवन के महत्व को नहीं समझते
07:15गरुड ने अपनी आखे बंद कर ली, मन में व्रिक्षों के मौन कष्टों को महसूस करते हुए और उनके भाग्य
07:23पर गहन चिंतन करने लगा
07:25इस योनी से मुक्ती पाने के बाद आत्मा को और भी निचले स्तरों में धकेल दिया जाता है, जहां वह
07:32अपने शेश कर्मों का भोग करती है
07:36और इस प्रकार कर्मों का अटूट चक्र घूमता रहता है, प्रत्येक आत्मा को उसकी यात्रा के अगले पड़ाव की ओर
07:43धकेलता हुआ, मुक्ती की खोज में
07:47भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य आभा बिखेरते हुए, गरूर से कहा कि अब वे उन आत्माओं के कश्टों का वर्णन
07:54करेंगे जिन्हें सुक्ष्म पापों के कारण कीट पतंगों और अन्य निम्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है
08:02गरूर ने अपनी आखें खोली और भगवान विश्णू की ओर देखा, उनका चहरा गेहन जिग्यासा और करुणा के भावों से
08:10भरा हुआ था, जो आने वाले वृत्तांत को सुनने के लिए उच्शुक थे
08:16विश्णू के संकेत पर एक अद्रिश्य द्वार खुला और गरूर ने एक भयानक दल्दली भूमी का दर्शन किया, जहां एक
08:24चोरी करने वाले की आत्मा एक रेंगने वाले कीडे में परिवर्तित हो रही थी, जिसका शरीर मवाद और कीचड से
08:31सना था
08:33हर कीडे का जीवन निरंतर भय और असुरक्षा से भरा था, प्रत्येक क्षन दूसरों द्वारा कुछले जाने या शिकार होने
08:41के डर में बीटता था, जो उसके सुक्ष्म पापों का चिरस्थाई दंड था
08:46इस दलदली भूमी के विशाल विस्तार में प्रत्येक कीडा अपने पिछले जीवन के छोटे मोटे अपराधों का हिसाब चुका रहा
08:54था, जहां गंदगी फैलाने वाले और दूसरों को अनावश्यक रूप से परेशान करने वाले व्यक्ति इस निम्नतम योनी में धके
09:02ल
09:02जाते थे, गरुर ने अपने आखे बंद कर ली, इन निरी प्राणियों की अलपायू और निरंतर भय से भरी पीडा
09:11को अपने हिदय में महसूस करते हुए और कर्म के इस कठोर विधान पर चिंतन करने लगे, कुछ आत्माय घेनित
09:19लारवा में बदल गई, जो सड़ते हु�
09:25अपने पूर्व जीवन की घेनित हरक्तों का फल भोगते हुए। यह योनी उन लोगों के लिए थी, जो अपने स्वार्थ
09:34में दूसरों का शोशन करते थे, उन्हें अनवरत रूप से रेंगने और घेनित पदार्थों पर जीवित रहने का दंड मिलता
09:41था।
09:43विष्णू ने बताया कि जो लोग दूसरों को धोखा देते थे या इर्श्या से दूसरों की प्रक्ती को रोकते थे,
09:50वे अगले चरण में विशैले सापों की योनी में जन्म लेते थे।
09:55गरुर ने गहरी सांस ली, कलपना करते हुए कि एक आत्मा कैसे विशैले साप के शरीर में कैद होकर निरंतर
10:03भय और एकाकीपन का अनुभव करती होगी।
10:06इन सापों को अपने विश के साथ जीवित रहने की विविशता थी, जो हमेशा अपने ही अस्तित्व के बोज से
10:14पीडित रहते थे और शिकारी जानवरों द्वारा शिकार होने के निरंतर डर में जीते थे।
10:21यह योनी उन व्यक्तियों के लिए एक एकाकी और भयावध दंड थी जिन्होंने अपने जीवन में कटू वचन बोले या
10:28दूसरों के लिए जहर घोला था।
10:31विश्नु ने आगे बताया कि जो आत्माएं बहुत अधिक जड थी, दूसरों की भावनाओं के प्रती उदासीन थी या अनावश्यक
10:39रूप से बाधाये पैदा करती थी, उन्हें पत्थर के रूप में पुनरजन्म लेना पड़ता था।
10:45गरुर ने विस्मय से सुना, यह सोचकर की एक चेतन आत्मा किस प्रकार एक जड पत्थर के रूप में बिना
10:53किसी इच्छा या अनुभूती के हजारों वर्षों तक अस्तित्व में रह सकती है।
10:59इन पत्थरों को हजारों वर्षों तक हवा, पानी और समय के कटाव का सामना करना पड़ता था, जो अपने पूर्व
11:06जीवन की जड़ता और कठोरता का निश्क्रिय भोग था।
11:11यह योनी उन लोगों के लिए थी जिन्होंने अपने हृदय को कठोर कर लिया था और दूसरों की पीडा के
11:17प्रती उदासीन रहते थे, उन्हें अनवरत स्थिर्ता और असहायता का अनुभव करना पड़ता था।
11:24इस प्रकार छोटे-छोटे पापों के लिए आत्मा को कीटों, सापों और पत्थरों जैसी विभिन नयोनियों में भटकना पड़ता है,
11:33जब तक कि उसके कर्म का हरकन शुद्ध न हो जाए।
11:38भगवान विश्णु ने गरूर को समझाया कि यह कर्म का अटूट नियम है, जहां प्रत्येक क्रिया का फल मिलता है,
11:45चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो।
11:48एक आत्मा को देखा गया जो एक कीडे से साप में और फिर एक पत्थर में परिवर्तित हो रही थी,
11:55उसकी यात्रा एक अन्थीन चक्र थी जो सुक्षम पापों के दंड को दर्शाती थी, अन्तह कर्म का यह अटूट चक्र
12:04घूमता रहता है, प्रत्येक आत्मा को उसकी या
12:16गरूर को आगे समझाते हुए कहा कि वे आत्माएं जो दूसरों के प्रती कपट और विश्वास्खात करती हैं, उनकी यात्रा
12:24अभी और गहन होती है, जहां उन्हें सरीस्रिप योनी में जन्म मिलता है।
12:46व्यापारी ने अपने प्रतिद्वंद्वी को धोखा देने के लिए व्यापारिक सौदे में गुप रूप से जाल बिचाया, जिसके कारण उसका
12:53पतन हुआ।
12:55उस चल के प्रतिफल में, आत्मा ने एक सर्प की योनी धारन की, जो अंधेरी भूमिगत दरारों में छिपकर रेंग
13:03रहा था।
13:03उसकी पूर्वमान विय स्मृती भय और एकाकी पन से भरी थी।
13:09भगवान ने बताया कि कप्टी और धोखेबाज लोग साम्प, छिपकली और अन्य सरीस्रिप जैसे जीवों के रूप में पुनरजन्म लेते
13:17हैं, जिन्हें सदैव छिपकर रहने की नेती प्राप्थ होती हैं।
13:22गरुर्ण ने विस्मय और करुणा के मिश्रित भाव से सिरहिलाया, इस कर्म के अटूट बंधन की जटिलता को समझते हुए।
13:31एक दरावना द्रिश उभरा जिसमें एक जहरीला नाग एक जाड़ी के पीछे से अचानक फुफकारते हुए निकला, एक राहगीर को
13:39डसने के लिए तैयार अपनी घातक प्रवृत्ती को दर्शाता हुआ।
13:44सरीस्रिप के रूप में उन्हें लगातार भयभीत जीवन जीना पड़ता है।
13:49हर पल छिपाते हुए दूसरों के लिए गुप रूप से गड़े खोदने के अपने कर्म के फल को जहलते हुए।
13:57भगवान विश्नु ने समझाया कि यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक कि उस आत्मा के कपट और
14:04छल का प्रत्येक अंश पूरी तरह से चुकाया नहीं जाता।
14:08गरुर ने गहरे चिंतन में डूब कर अपनी आखे बंद कर ली इस अनवरत कर्म चक्र की कुरूरता और न्याय
14:15पर विचार करते हुए।
14:18पुन एक अतीट का ग्रिश्य सामने आया, जहां एक व्यक्ती ने धोखे से दूसरे के कुए में विश मिलाया ताकि
14:25उसके खेत बंजर हो जाए।
14:27वही आत्मा अब एक छिपकली के रूप में पुनरजन्म लेती है, जो सुनसान खंधरों में दुपकी रहती है, अपने पिछले
14:36धोखे के कारण लगातार खत्रे में रहती है।
14:40भगवान ने आगे कहा कि उनकी कुरूर्ता और धूर्तता उनके अगले जन्म में साम्प के विश और छिपकली की नीच
14:48गती का कारण बनती है।
14:51गरुर के मुख पर गेहन गंभीरता चा गई, इस बात को समझते हुए कि कर्म का दंड कितना सटीक और
14:57अटल होता है।
15:00एक भयानक करीबी द्रिश में एक विशाल जहरीला नाग अपने फन को उचा उठाए हुए था, उसके विशदंतों से घातक
15:08विश की बूंदे टपक रही थी, जो बीते हुए कुरूर कर्मों का प्रतीक था।
15:14शिपकली की धूर्ट और सतर्क आखें, जो लगातार खत्रे के लिए इधरुधर देख रही थी, एक आत्मा के कप्टी अतीत
15:22की नीच गती को दर्शाती थी।
15:26भगवान ने कहा कि जब तक आत्मा अपने कृत्यों के लिए परियाप्त पीडा नहीं जहलती, तब तक वह इस निन्न
15:33योनी के अन्थीन चक्र में फंसी रहती है।
15:37गरुर ने अपने आखें खोली, उनकी द्रिश्टी अब पहले से कहीं अधिक तीवर और गहरी थी, कर्म के इस गहरे
15:44सत्य को आत्म साथ करते हुए।
15:47एक छोटी, कमजोर छिपकली, एक विशाल पक्षी के छायादार पंजों से बचने के लिए एक सूखी पत्ती के नीचे छिपने
15:55की बेताब कोशिश कर रही थी, जो उसके निरंतर भय और असुरक्षा को दर्शाता था।
16:01अंतह आत्मा को छिपने, दंक मारने और लगातार भय भीत रहने की यंत्रणा भुगतनी पड़ती है, जो उसके छल और
16:10विश्वासघात के कड़वे फल को दर्शाती है।
16:15ततपश्चात कर्म के अगले मोर पर आत्मा उन दुष्टों के शरीर में प्रवेश करती है, जिन्होंने अपनी वानी का दुरुपयोग
16:23दूसरों को अपमानित करने या जूट बोलने में किया था, जो अब पक्षी योनी में कष्ट सहती है।
16:31भगवान विश्णु ने गरूर को समझाया कि कैसे वचन जो आत्मिक उर्जा का शुद्धतम रूप है, जब कलुशित हो जाता
16:38है, तो वह आत्मा को अन्थीन भय और चीक पुकार के चक्र में बांध देता है।
16:45एक छोटी सी चिडिया, जिसके पंख घायल थे, अपनी व्यथा में लगातार चीक रही थी, उसकी आवास जंगल की भयावः
16:53शान्ती को चीरते हुए कर्म के कडवे फल को दर्शा रही थी।
16:58उसकी बेबस चीक एक शाप बन चुकी थी, जो पिछली योनी के कटू वचनों और जूठी गवाहियों का प्रायश्चित कर
17:06रही थी, जिसका शोर जंगल के हर कोने में गूंज रहा था।
17:11जंगल की गहराई में सैकडों अन्य पक्षी भी निरंतर भय में जी रहे थे, उनके हर फड़फडाहट में शिकारियों का
17:18डर और नीड के अस्थाई सुख की चिंता साफ जलक रही थी।
17:23गरुर ने गहरी सांस ली, उनका मन इस विचार से अशान्थ हो गया कि कैसे एक व्यक्ति के शब्द जो
17:31हवा में घुल जाते हैं, अगले जीवन में उनकी नेती को इतना क्रूरता से आकार दे सकते हैं।
17:38एक बाज आकाश से अचानक गिरते हुए, अपनी पैनी चोच से एक छोटे पक्षी को जपटने की कोशिश कर रहा
17:46था, जो पक्षी योनी में निरंतर मंडराते मृत्यू के भाय का प्रतीक था।
17:52आशियाना जो सुख और सुरक्षा का प्रतीक होना चाहिए, वह भी केवल क्षणिक राहत प्रदान करता था, क्योंकि तूफान और
18:00अन्य शिकारियों से उसकी निरंतर चिंता बनी रहती थी।
18:04अलग-अलग प्रजातियों के पक्षी, हर एक अपनी विशेश ध्वनी के साथ, लेकिन सभी एक समान अद्रिश्य बंधन में बंधे
18:12हुए अपनी निरस नेती को जी रहे थे, जो उनकी पिछली वानी के कर्मों का फल था।
18:19गरुर के पंख भारी हो गए, उन्हें आभास हुआ कि मुक्ती केवल भौतिक बंधनों से नहीं, बलकी वानी और विचारों
18:27के सुक्ष्म जंजाल से भी है, जिसे अकसर लोग अंदेखा कर देते हैं।
18:33एक तोता अपनी पिंजडे जैसी डाली पर बैठा, मधुर गीत गाने की कोशिश कर रहा था, पर उसके कंट से
18:41केवल एक दर्ध भरी बेसुरी चीख निकल रही थी, मानों उसकी आत्मा कराह रही हो।
18:47उसकी वानी, जो कभी दूसरों को चलने का साधन थी, अब एक शाप बन गई थी, जहां वह केवल अपने
18:55भीतर की पीडा को व्यक्त कर सकती थी, पर कोई सुनता न था।
19:00एक विशाल व्रिक्ष की शाखाओं में, छोटे पक्षियों का एक समोह भयभीत होकर दुपका हुआ था, उनकी आखे लगातार अंजाने
19:09खतरों के लिए जंगल के अंधेरों को टटोल रही थी।
19:13भगवान विश्नों ने धीरता से कहा, गरुर्त प्रत्येक शब्द एक बीज है, या तो वह ज्यान का व्रिक्ष बनता है,
19:21या दुख का कांटा।
19:23एक मा चिडिया अपने छोटे बच्चों को सूखे पत्तों से बने घोंसले में निगलने के लिए कीडे ला रही थी,
19:30उसकी आखों में गहरी चिंता और आने वाले खतरों का भैस पश्ट था।
19:35उसके प्रेम में भी एक कडवी नेती का अहसास था, क्योंकि वह जानती थी कि उसके बच्चों का भविश्य भी
19:43इसी अनवरत संधर्ष और भैसे भरा होगा।
19:47पक्षी योनी की यह यात्रा अनिश्चित काल तक चलती रहती थी, जब तक की आत्मा अपने वाकदोश के सभी फल
19:54नभोग ले, जंगल का हर पत्ता एक मौन गवाह था।
19:59भगवान विश्णु ने अपने शांत स्वरों में गरूर को बताया कि यह योनी वानी के महत्व को सिखाती है, जहां
20:06एक भी कटु शब्द अनंत पीडा का कारण बन सकता है।
20:11एक पक्षी घोंसले से दूर उरते हुए, उसकी आखों में स्वतंत्रता की एक शनिक चमक थी, लेकिन फिर तुरंथी आकाश
20:20में मंदराते शिकारी की चाया देखकर वह भैसे सिकुड गया।
20:25इस पक्षी योनी में, आत्मा को अपनी वानी का दुरुपयोग करने के पाप का फल भुगतना पड़ता है, जहां वह
20:32केवल बेबस चीख पुकार कर सकती है, मुक्ती की एक जूठी आशा के साथ।
20:38पक्षियों की बेबस चीखों के बीच, भगवान विश्नु ने अपने गंभीर स्वर में बताया कि अत्यधिक इंद्रिय भोग और वासना
20:46में लिप्ट आत्माएं अब सूअर की योनी में प्रवेश करती हैं, जहां उन्हें निरंतर मैला खाने का दंड भोगना पड़ता
21:08एक विशाल सूअर अपनी कीचर से सनी सून से दुरगंधिक भूमी को खोदते हुए, लगातार भूखा और प्यासा रहकर अपने
21:17अतीत के अनियंत्रिक भोगों के लिए असहनिय शारिरिक कष्ट जेल रहा था
21:22सूर की आखें जो कभी वासना से भरी थी, अब केवल पीरा और हताशा से चमक रही थी, मानो वह
21:30अपने ही कर्मों के दलदल में धनस्ता चला जा रहा हो
21:35सूरों के इस नार की अस्तित्व से थोड़ा आगे, वे आत्माय भटक रही थी, जिन्होंने अपने जीवन में दूसरों के
21:42प्रतीकरूरता और निश्ठाहिंता दिखाई थी, अब कुत्ते की योनी में भूख और भै से काप रही थी
21:50भगवान विश्णू ने धीरच से समझाया की कैसे इन आत्माओं को अपने ही विश्वास घात और हिंसा का दंड भोगना
21:57पड़ता है, जब वे हर पल मृत्यू और पीडा के डर में जीते हैं
22:03एक पतला कुत्ता जिसका शरीर घावों से भरा था, दूर से आती हर आहट पर डर से काप उठता था,
22:11मानो उसे हर क्षण किसी शिकारिया पत्थर से कुछले जाने का भै सता रहा हो
22:17कुत्ते की बेबस घुर घुराहट और दैनिय चीखें उस आत्मा का प्रतीक थी, जिसने कभी दूसरों पर क्रूरता की थी,
22:25अब स्वय ही लगातार भै और गर्द का अनुभव कर रही थी
22:29इस पशु योनी के और भी गहरे स्तरों में उन आत्माओं को गधे के रूप में देखा गया जिन्होंने अपने
22:36जीवन में दूसरों पर अत्यधिक बोज डाला था या व्यर्थ अभिमान किया था
22:42गरुर ने पूछा की क्या इन आत्माओं को कभी अपने पापों से मुक्ती मिलेगी जिस पर भगवान विश्णु ने कर्म
22:49के अटल नियम को और स्पश्ट किया
22:52एक गधा अपनी पीठ पर पत्थरों का पहाड धोते हुए उसकी चाल धीमी और लड़खडाती हुई थी क्योंकि उसे दिनरात
23:01अनवरत श्रम करने का शाप मिला था
23:04गधे की उदास आखें जो कभी अहंकार से भरी थी अब केवल अन्थीन ठकावट और असहनिय दास्ता का बोज लिये
23:13हुए थी
23:15आगे बढ़ते हुए उन्हें वे आत्माएं दिखाई दीन जिन्होंने दूसरों के जीवन में अत्यधिक हिंसा और क्रूरता फैलाई थी अब
23:23स्वयन शिकारी और शिकार के शाश्वत चक्र में फंसी थी
23:28भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि कैसे इन आत्माओं को अपने ही क्रूर कर्मों का फल भुगतना पड़ता है
23:35जब वे एक दूसरे का भख्षन करते हुए अपने अस्तित्व के लिए संगर्ष करते हैं
23:42एक भूखा शेर जिसकी दहार अब अपने ही भय को दर्शाती थी अपने शिकार की तलाश में बेचैनी से भटक
23:50रहा था जबकि उसे स्वयन दूसरे शक्तिशाली शिकारियों का निरंतर खत्रा महसूस होता था
23:57शिकारी के रूप में जन्मी इस आत्मा को न केवल भूख का दंड जेलना पड़ता था बलकि मृत्यु का शाश्वत
24:04भय भी उसे सताता था खीक वैसे ही जैसे उसके शिकार को सताया गया था
24:10अंत में उन आत्माओं को कीड़े साप या पत्थर की योनी में धकेला गया जिन्होंने अपने जीवन में अत्यधिक छल,
24:18प्रपंच और निश्क्रियता का प्रदर्शन किया था जहां उन्हें स्वयन का अनुभव भी नहीं होता था
24:26भगवान विश्नु ने अंतिम रूप से समझाया कि ये योनी आत्मा के लिए सबसे निक्रिष्ट तम है, जहां उसे न
24:33तो चेतना का आभास होता है और नहीं मुक्ती की कोई आशा
24:38एक कीडा कीचड में रेंगता हुआ, जिसे अपने अस्तित्व का कोई बोध नहीं था, अपने पिछले जीवन के नीच कर्मों
24:46का फल भुगत रहा था, जहां वह मात्रे एक निश्क्रिय मास का लोथरा बनकर रह गया था
24:53कीडे, साप और पत्थरों का यह निश्क्रिय अस्तित्व, उन आत्माओं के लिए अंतिम और सबसे भयानक दंड था, जिन्होंने अपने
25:01मानविय रूप का दुरुक्योग कर जीवन को केवल व्यर्थ और हानिकारक बनाया था
25:07भगवान विश्नु ने गरूर को समझाया कि अत्यंत निक्रिष्ट योनियों से भी आत्मा की यात्रा समाप्त नहीं होती, बल्कि यह
25:15योन प्रिवर्थन का एक गूर और अनंत्चक्र है, जहां प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार रूप द्रहन करता है
25:24गरूर ने भगवान की ओर अपनी गहन जिग्यासु द्रिष्टी उठाई, उनके शब्दों की गहराई को आत्म साथ करते हुए, क्योंकि
25:32प्रत्येक योनि का रहस्य धीरे-धीरे उनके सामने खुल रहा था
25:38भगवान विश्णु ने समझाया की कैसे सबसे पहले आत्माय व्रिक्षों, लताओं और घास जैसी स्थिर योनियों में प्रवेश करती हैं,
25:46जहां वे अपने कर्मों का एक निश्चित, निश्क्रिय अन्श भोगती हैं
25:52एक विशाल बर्गत का पेड सदियों से अटल खड़ा, उसकी गहरी जड़े प्रित्वी में समाई हुई थी, जो पिछले जन्मों
26:00के अचेतन पापों को धीमेधी में शुद्ध कर रहा था
26:04इसके बाद आत्माए सुक्षम जीवी योनियों में प्रवेश करती हैं, जहां वे अत्यंत सरल जीवन चक्र से गुजरती हैं, जो
26:13उनके शेश कर्मों के सबसे मूलभूत अंश को शुद्ध करता है
26:18गरुर ने गहरी सास ली इस अद्रिश्य और जटिल संसार की कलपना करते हुए, जहां लाखों आत्माए अपनी मुक्ती की
26:26यात्रा के प्रारंभिक चर्णों में थी
26:29एक सुक्ष्म जीवी अंगिनत अन्य जीवों के साथ एक ही समय में जन्म लेता और नश्ट होता, अपनी अत्यंत संक्षित
26:38यात्रा में कर्मों का एक अंश भोगता हुआ
26:42अद्रिश्य और अथाह जल्धाराओं में जीवन की सबसे प्राथमिक अभिव्यक्तियों का एक विशाल निरंतर बढ़ता हुआ जाल था, जहां आत्माए
26:51अंजाने में अपनी शुद्धी कर रही थी
26:54भगवान विश्णू ने आगे बताया कि सुक्ष्म जीवों के बाद आत्माए कीट पतंगों के रूप में जन्म लेती हैं, जहां
27:02वे इंद्रियों और गती की पहली असपष्ट अनुभूती का अनुभव करती हैं
27:08गरुर के चहरे पर अब समझ की एक नई आभा थी, उन्होंने महसूस किया कि हर छोटे से छोटे जीव
27:15में भी एक आत्मा है, जो अपनी नेती की ओर अग्रसर है
27:20एक रेश्मी कोकून से एक सुन्दर तितली धीरे-धीरे उभर रही थी, उसके पंक अभी भी गीले थे, प्रकृती के
27:29इस सबसे कोमल बदलाव में एक आत्मा की नई, शन्भंगुर यात्रा का प्रती
27:35फूलों के एक विशाल मैदान के उपर, मधुमक्खियों का एक जुन्ड उच्साह पूर्वक गुनगुना रहा था, प्रत्येक अपनी वृत्ती से
27:43प्रेरित होकर, एक सामुहिक अस्तित्व में कर्मों का शोधन कर रहा था
27:48इसके बाद आत्माय जलिय जीवों की योनी में प्रवेश करती हैं, जहां वे स्वतंत्र रूप से गती करने और अपने
27:57आस्पास के वातावर्ण के प्रती अधिक चेतन होने की क्षमता प्राप्त करती हैं
28:03गरुर ने धीरे-धीरे सिरहिलाया, इस बात को समझते हुए कि कर्म का विधान कितना विस्तृत और न्याय संगत है,
28:11जो हर आत्मा को उसके शुद्धिकरण के लिए सही मार्ग पर ले जाता है
28:16एक छोटी सुनहरी मचली, रंगीन मुंगा चट्टानों के बीच चपलता से तैर रही थी, अपने आसपास के प्रती सहज रूप
28:25से समवेधन शील, अपने पूर्व जन्मों के गहरे अनुलगनकों को धीरे-धीरे त्याग रही थी
28:32महासागर की विशाल और शांत गहराई, असंख्य जीवन रूपों से भरी हुई थी, जहां प्रत्येक आत्मा कर्म के अनंत्चक्र में
28:40अपनी अद्वितिय यात्रा पूरी कर रही थी
28:44भगवान विश्नु ने अन्तिम रूप से बताया कि इन चर्णों के बाद आत्माय पशु योनियों में आती हैं, जहां वे
28:52भावनाओं और सामाजिक व्यवहार की जटिलता को अनुभव करती हैं, जो मानविय रूप की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है
29:01गरुड अब पूर्ण रूप से इस गूर ज्यान को आत्मसात कर चुके थे, उन्होंने भगवान के प्रती अपनी गहरी श्रधा
29:09और कृतग्यता व्यक्त की इस सार्वभौमिक सत्य को स्विकार करते हुए
29:14एक हिरण शांत जंगल में घास चर रहा था, उसकी आखों में एक सहज मासूमियत थी, जो उसके सरल अस्तित्व
29:22में जटिल मानविय इच्छाओं के शुद्धिकरण का प्रतीक थी
29:27योनि प्रिवर्तन का यह महाकाव्यत एक शाश्वत नरित्य था, जो प्रत्येक आत्मा को उसकी परम मुक्ती की ओर ले जाता,
29:35दिव्य विधान द्वारा संचालित एक अविस्मनिय यात्रा
29:40भगवान विष्णु ने उस शाश्वत नरित्य की गहराई को समझाते हुए, गरुर को बताया कि यह केवल एक अत्यंत दुरलब
29:48और लंबी यात्रा का प्रारंभिक चरण है, जहां आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर होने का अफसर मिलता है
29:56गरुर के विस्मय ने आकाश को भी स्तब्ध कर दिया, जब उन्होंने सुना की एक जीवात्मा को करोडों निन्न योनियों
30:03से होकर गुजरना पड़ता है, जैसे कीरे, साप और पत्थर मानव योनि प्राप्थ करने से पहले
30:11एक आत्मा को सबसे पहले अत्यन्त सूक्ष्म और आदिम रूपों में जन्म लेना पड़ता है, जैसे की जल में तैरता
30:18हुआ एक अतिलगु कीरा, जो केवल अस्तित्व की मूल चेतना को महसूस करता है
30:25यह आत्माओं के लाखों करोडों वर्षों की यात्रा का आरंभ था, जहां चेतना धीरे-धीरे विक्सित होती है, प्रत्येक योनी
30:33में एक नया अनुभव बटोरते हुए
30:37पत्थरों और परवतों में स्थिर आत्माए अनन्तकाल तक प्रकृती की निस्तब्धता को सहती है, उनकी चेतना धीरे-धीरे जागरित होने
30:45की प्रतीक्षा में रहती है
30:49भगवान विश्णु ने अपने गंभीर स्वर में कहा, यह प्रत्येक कर्म का लेखा जोखा है, गरुड जहां प्रत्येक आत्मा अपने
30:57कर्मों के अनुसार ही अगले शरीर को प्राप्थ करती है
31:02फिर आत्माय व्रिक्षों और पौधों की योनी में प्रवेश करती है, जहां वे सूर्य के प्रकाश और भूमी के पोशन
31:09को अवशोशित करती है, जीवन के चक्र को एक नई द्रिष्टी से अनुभव करती है
31:16यह धैर्य का एक अन्थीन काल्चक्र है, जहां आत्मा अंगिनत रूपों में स्वयन को खोजती है, प्रकृती के हर पहलू
31:24में जीवन की गहरी समझ पाती है
31:28जल्चरों की दुनिया में आत्माय गहराई के रहसियों को सीखती है, मचलियों और अन्य समुदरी जीवों के रूप में जीवन
31:36की चंचलता और अनिश्चित्ता को अनुभव करती है
31:40गरुर ने अपने आखे बंद कर ली, अपने मन में उन सभी अर्बो रूपों की कल्पना करते हुए जिनसे एक
31:48आत्मा को गुजरना पड़ता है, मानव जन्म की दुरलबता का भार महसूस करते हुए
31:54सरीस्रिप योनियों में आत्माय प्रिथ्वी के साथ अपने सम्बंध को गहरा करती हैं, सर्प के रूप में रेंगते हुए या
32:02मगरमच के रूप में जल में छिपते हुए, अपनी प्रवृत्ती और अस्तित्व की कला को सीखते हुए
32:09यह निम्न योनियों का अनन्प सागर्था जहां आत्मा को हर रूप में कर्म के सुक्षम बीज बोने और काटने होते
32:17हैं
32:17अपने अस्तित्व के पाठ को धीरे धीरे आत्म साथ करते हुए
32:22पक्षियों की दुनिया में आत्मा इस्वतंत्रता की भावना का अनुभव करती हैं, नीले आकाश में उची उडान भरते हुए, अपनी
32:31ध्वनी और रंग के माध्यम से जीवन का आनंद व्यक्ट करती हैं
32:36विश्नु भगवान ने करुणा से भर कर समझाया कि इन सभी योनियों में आत्मा सिर्फ कर्मफल भोगती है, बिना किसी
32:44सचेट चुनाव के मोक्ष की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा सकती
32:49फिर आते हैं जंगली जानवर और पालतू पशु जहां आत्माए अपनी सहच प्रवृत्ती, बल और वफादारी के पाठ सीखती हैं,
32:58एक जटिल सामाजिक संरचना का हिस्सा बनती है
33:02यह एक ऐसी प्रयोगशाला थी जहां आत्मा अपने आंतरिक स्वरूप को परिश्कृत करती है, अपनी मूल दिव्यता को धीरे-धीरे
33:11पुना प्राप्त करने के लिए प्रत्येक योनी में एक अग्रिश्य छाप छोड़ती है
33:17इसके बाद अर्धमानव योनिया आती हैं, जैसे यक्ष, गंधर्व और किन्नर जो दिव्य और मर्थ्य संसारों के बीच एक सेतु
33:26का निर्मान करती हैं, जहां कला और सौंदर्य की भावना विक्सित होती है
33:32गरुर ने गहरी सांस ली उस अनन्त यात्रा के पैमाने को समझते हुए और पूछा तोहे प्रभुक इस कठिन मार्ग
33:40से होकर अंतह मानव योनी की प्राप्ती ही सबसे बड़ा वर्दान है
33:46भगवान विश्णु ने धीरे से सिरहिलाया, हाँ गरुड लाखों करोडों वर्षों और योनियों के बाद ही आत्मा को मानव रूप
33:54में जन्म मिलता है जो कर्म करने और मोक्ष प्राप्त करने की क्षमता रखता है
34:00इस प्रकार मानव योनी ही एक मात्र ऐसी सीधी है जहां आत्मा अपने भाग्य का निर्मान कर सकती है, मोक्ष
34:08के लिए सचेत प्रयास कर सकती है और इस भयानक चक्र से मुक्ती पा सकती है
34:15परंतु हे गरुर, मानव योनी का यह द्वार भी कोई सरल या तुरंत प्राप्थ होने वाला विश्राम नहीं, बलकि शेश
34:22कर्मों का एक जटिल समीकरण है, जो आत्मा के साथ यात्रा करता है
34:29जन्ममान के इस दीर्ग चक्र से मुक्ती पाने के लिए आत्मा को अनेक योनियों में भटकना पड़ता है, परंतु पापों
34:36का लिखा जोखा कभी पूर्णत है समाप्त नहीं होता
34:41आत्ह, जब आत्मा अंत्ह मानव शरीर में प्रवेश करती है, तो वह अपने साथ पिछले जन्मों के कर्मशेश का भार
34:49लेकर आती है, जैसे एक प्राचीन यात्रा का अनसुल्जा सामान
34:54यही कर्मशेश, हे गरुड, नए मानव शरीर में जन्मजात रोगों, दुरबलताओं या प्रारब्ध की अप्रत्याशित कठिनाईयों के रूप में प्रकट
35:03होता है
35:05कुछ आत्माय जन्म से ही अस्वस्थ शरीर में आती हैं, जैसे कोई कलाकार अपने पिछले जीवन की अधूरी कला को
35:13पुन्ह प्रारंब करने आया हो
35:16किसी को निर्धन्ता और अभावों का सामना करना पड़ता है, मानो पूर्व के संचित पापों का रिंचुकाना हो
35:24तो किसी को शारिरिक विटलांगता मिलती है, जो उसे संसार के भावतिक सुखों से विमुख कर आंतरिक यात्रा पर ध्यान
35:32केंद्रित करने को विवश करती है
35:35ये सभी प्रारंभिक जीवन की कठिनाईया आत्मा को उसकी पिछली गलतियों की याद दिलाती हैं, जैसे एक शांत जल में
35:43पत्थर गिरने से उत्पन्न लहरें
35:46यह कर्मशेश एक प्रकार का अग्रिश्य गुरु है, जो आत्मा को हर पल सचेत करता है कि धर्म, न्याय और
35:54करुणा के मार्ग का अनुसर्ण करे
35:57यही कारण है कि कुछ आत्माए, जन्म से ही प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद असाधारन धार्मिक्ता और नैतिक बल का प्रदर्शन
36:06करती हैं
36:08वे अपनी आंतरिक पीडा को अपनी शक्ती बनाती हैं, जैसे कमल कीचड में खिलकर भी अपनी सुन्दर्ता नहीं खोता
36:16यह संधर्ष, यह कमी एक अद्रिश प्रेना है जो उन्हें मोक्ष के पत पर आगे बढ़ने के लिए उच्साहित करती
36:24है
36:26मानव जन्म का यह अफसर अपनी सभी सीमाओं और चुनोतियों के बावजूद आत्मा के लिए एक अन्मोल वर्दान है
36:35यह वह सुनहरा अफसर है जहां आत्मा अपनी इच्छा शक्ती और कर्मों से अपने भाग्य को पुनह लिख सकती है
36:45सही कर्मों, ध्यान और ज्यान के माध्यम से आत्मा इस कर्मशेश के चक्र को भंग कर सकती है और मोक्ष
36:52प्राप्त कर सकती है
36:55यह कर्मों की अगनी में स्वयं को शुद्ध करने के समान है जिससे आत्मा शुद्ध स्वर्ण के समान चमक उठती
37:02है
37:04आथा हे गरुड मानव जीवन की हर चुनोती, हर कठिनाई, वास्तव में एक अफसर है, एक प्रेणा है, अपनी आत्मा
37:13को उन्नत करने का
37:15और इस अफसर को पहचानना और उसका सदुप्योग करना ही जीवन का सर्वोच लक्ष है, इस भयानक चक्र से मुक्ती
37:23का एक मात्र मार्ग
37:26मानव योनी में मिला यह जीवन, इसलिए ही अमूल्य है, यह अनंत संभावनाओं का द्वार है, परम सत्य की ओर
37:33अंतिम यात्रा का पड़ा
37:36और इस प्रकार, प्रत्येक आत्मा को अपने कर्मों के फल भोगने के बाद, अन्ता उस दिव्य प्रकाश की ओर बढ़ने
37:43का अफसर मिलता है, जहां कोई दुख नहीं, कोई पुनरजन्म नहीं
37:48यह संधर्ष पूर्ण मानव जीवन, जिसे आत्मा अपने शेश कर्मों के कारण प्राप्त करती है, वस्तुतह मोक्ष की अंतिम सीधी
37:57पर चड़ने का सबसे महत्वपूर्ण अफसर होता है
38:02भगवान विश्णु ने गरूर की ओर देखते हुए समझाया कि प्रत्येक आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार ही ऐसी योनी
38:09प्राप्त होती है, जहां उसे अपने पुन्य और पाप दोनों का समयक फल भोगना पड़ता है
38:16फिर एक धूमिल प्रकाश पुंज कर्मों के बंधन में बंधा हुआ, प्रित्वी पर एक अत्यंत निर्धन और साधारन परिवार में
38:24एक नवजात शिशु के रूप में प्रकट हुआ, जहां जीवन का आरंभी संगर्शों से भरा था
38:31उस ननहे से देह में एक प्राचीन आत्मा ने पुनः जन्म लिया था, जिसके भविश्य का निर्धारन उसके अतीत के
38:39कर्मों और अब उसके वर्तमान के प्रयासों से होना था
38:43वह शिशु धीरे-धीरे बढ़ा, और अपने बालपन में ही उसने जीवन की कठोर सच्चायों से साक्षात कार किया, जहां
38:51भोजन और आश्रे के लिए भी प्रतिदिन संधर्श करना पड़ता था
38:56गरुर ने विस्मय से पूछा, हे प्रभु, क्या यह न्याय है कि एक आत्मा को अपने पिछले कर्मों के कारण
39:04इतना कठिन आरंभ मिले, जबकि दूसरों को सहज जीवन प्राप्थ हो
39:09विश्नु मुस्कुराए और बोले गरुर यह न्याय ही है
39:14यह कठिनाईया पूर्व जन्मों के शेश कर्मों का फल हैं, जो आत्मा को शुद्ध करने और उसे अधिक बल्वान बनाने
39:22के लिए आवश्चक हैं
39:25वह बालक बिना किसी शिकायत के हर चुनौती का सामना करता रहा, कभी खेतों में काम करता, तो कभी नदी
39:32से जल भरता, उसके छोटे कंधों पर बड़े उत्तरदायत्व थे
39:37योवन के दहलीज पर कदम रखते ही, उसे समाज और नेती की ओर से और भी कठिन परीक्षाओं का सामना
39:45करना पड़ा, जहां हर मोर पर उसके धैर्य की अगनिपरीक्षा होती
39:50भगवान विश्णू ने बताया कि ये संधर्ष केवल आत्मा को मजबूत नहीं करते, बल्कि उसे सही और गलत के बीच
39:58भेद करने की क्षमता भी प्रदान करते हैं
40:02एक बार जब एक असहाय पडोसी के जीवन पर संकट आया, तो उस युवक ने अपनी जान जोखिम में डाल
40:09कर भी उसकी सहायता की निस्वार्थ सेवा का एक अनुपम उदाहरन स्थापित किया
40:16उसकी हाथों की रेखाओं में परिश्रम और संघर्ष की कहानी खुदी थी, फिर भी उन हाथों से सदैव दूसरों की
40:23मदद और प्रेम का ही संचार होता था
40:27काल चक्र घूमता रहा और वह युवक अब एक प्रौड व्यक्ति बन चुका था, जिसने अपने छोटे से गाउं में
40:34ज्यान और गया का दीपक जलाया, जहां से आशा की किरने फैलने लगी
40:40गरुड ने पूछा हे देव, क्या मनुष्य का भाग्य केवल कर्मों का खेल है, या उसकी इच्छाशक्ती भी उसमें कोई
40:48भूमिका निभाती है
40:51भगवान विश्नों ने उत्तर दिया, निश्चित रूप से गरुड
40:55कर्मों का फल अटल है, किन्तु मनुष्य के पास अपनी इच्छाशक्ती और विवेक से नए श्रिष्ट कर्म करने की स्वतंत्रता
41:03भी है
41:05वह प्रौड व्यक्ती अब अपने अनुभव और ज्ञान को दूसरों के साथ साजा करता, छोटे बच्चों को जीवन के सिध्धान्त
41:13सिखाता और बड़ों को धर्म के मार्ग पर चलने को प्रेरित करता
41:18वर्षों के कठोर परिश्रम और निस्वार्थ सेवा के बाद, जब व्रिधावस्था ने उसे घेर लिया, तो उसके चहरे पर एक
41:26अध्भुत शान्ती और संतोश की आभा चमक रही थी
41:30विश्णु ने कहा, देखो गरूर, यही है मानव जीवन का सार
41:35भले ही शुरुवात कितनी भी कठिन हो, धर्म और सतकर्मों से अन्ता आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है
41:44अपने जीवन के अंतिम क्षणों में, वह व्रिद्ध पुरुष एक शान्त ध्यान की मुद्रा में बैठा था
41:50उसका शरीर भले ही कमजोर था, पर आत्मा परमशान्ती में लीन थी
41:56और फिर एक उजजवल निर्मल प्रकाश शरीर से मुक्त होकर अनंत आकाश की ओर उपर उठ गया
42:03जिसने जन्मम्रत्यू के चक्र से अपनी अंतिम मुक्ती प्राप्त कर ली थी

Recommended