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पिछले जन्मों के कर्मों से जन्मी असाध्य बीमारियों और कष्टों से मुक्ति कैसे पाएं? इस एपिसोड में भगवान विष्णु, गरुड़ को 'कर्मविपाक' के गहन सिद्धांतों के बाद, अब उन 'प्रायश्चित' के गुप्त विधानों का वर्णन करते हैं जो आत्मा को न केवल शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाते हैं, बल्कि जन्मों के पापों को भी क्षय करते हैं। क्या हैं दान के अदृश्य चमत्कार, व्रत और तीर्थ यात्रा की महिमा, और सच्चे हृदय से किए गए प्रायश्चित का वास्तविक अर्थ? जानिए कैसे छोटे-से-छोटे कर्म भी हमारे भाग्य को बदल सकते हैं और मोक्ष के द्वार खोल सकते हैं। यह एपिसोड आपको कर्मों के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाएगा! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #कर्मफल #प्रायश्चित #धर्माचरण #मोक्ष #रोगोंउपचार #आध्यात्मिकज्ञान #हिंदूधर्म #पापपुण्य #सनातनसंस्कृति
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00:00वैकुंठ के परम पावन और प्रकाश्मान धाम में, जहां निल्मनी के समान चमक्ती तरंगे और स्वर्ण कमल चारों और सुशोभित
00:08हैं, स्विष्टी के पालनहार भगवान विश्णु गरुड के संशय को दूर करने के लिए प्रस्तुत होते हैं।
00:16शेशनाग की शयापर विराजमान भगवान श्रीहरी अपने परम भक्त गरुड की ओर करुणापूर्ण ग्रिश्टी डालते हुए कहते हैं कि पूर्व
00:24जन्मों के संचित पाप ही इस जन्म में असाध्य रोगों के रूप में प्रकट होते हैं।
00:31गरुर अत्यंत विनीत भाव से अपने पंखों को समेट कर भगवान के चर्णों में शीश जुकाते हैं और पूछते हैं
00:39कि इन कष्टकारी कर्मरोगों के चक्रविव से मुक्त होने का गुप्त विधान क्या है।
00:44तब नारायन एक अलोकिक जोती पुंच की ओर संकेत करते हैं जो आत्मा को शुद्ध करने वाले उस सनातन सत्य
00:52को दर्शाता है जिसे संसार प्रायश्चित कहता है।
00:57नारायन गरूर को स्मरण कराते हैं कि यमलोक के भीशन दंड भोगने के बाद भी कर्मों का अवशेश भाग सुक्ष्म
01:05शरीर से लिपट कर प्रित्वी लोक तक चला आता है।
01:09भगवान विश्नु अपने दाहिने हाथ से अभय मुद्रा प्रदर्शित करते हुए समझाते हैं कि कर्मफल का यह सिध्धांत अत्यंत अटल
01:18है और इसे केवल आध्यात्मिक शुद्धी से ही काटा जा सकता है।
01:23इस सत्य को सुनते ही गरुड के नेत्रों में ज्यान की जोती चमक उठती है और वे पूर्ण एकागरता के
01:30साथ प्रभु के मुखारविन से निकलने वाले एक-एक शब्द को ग्रहन करने लगते हैं।
01:37जैसे अंधकार में घिरी प्रिथवी पर सूर्य की पहली किरन जीवन का संचार करती है। वैसे ही प्रायश्चित का यह
01:45गुप्त ज्यान पीड़ित मानवता के लिए एक संजीवनी बूटी के समान है।
01:51वैकुंठ के शान्त और अलौकिक उपवनों में जहां पारिजात के वरिक्षों से दिव्य सुगंध बहती है। वहीं इस ज्यान का
01:59प्राकट्य संपूर्ण चराचर जगत के कल्यान के लिए हो रहा है।
02:04जगत गुरु श्रीहरी अपनी गदा और चक्र को विश्राम मुद्रा में रखकर गरुड से कहते हैं कि केवल औशधिया शरीर
02:11को स्वस्थ कर सकती हैं, परन्तु आत्मा को निरोगी केवल प्रायश्चित ही बनाता है।
02:18भगवान विश्नु अपने बाएं हाथ में सुशोभित पवित्र शंख को उठाते हैं, जिसकी दिव्यध्वनी से संपून ब्रहमांड में शुद्धी और
02:27सत्य की तरंगे गूंज उठती हैं।
02:31प्रायश्चित का यह पहला नियम है कि मनुष्य अपने अपराधों को स्विकार करे, क्योंकि पश्चाताप की अगनी ही संचित पापों
02:39के इंधन को भस्म कर सकती है।
02:42वैकुंट के अनन्त विस्तार में, जहां समय की सीमा समाप्थ हो जाती है, प्रभु का यह संदेश मानव जाती को
02:50कर्मों के भयानक चक्र से मुक्त करने का एक मात्र प्रकाश स्तम्भ है।
02:56गरुर अत्यंत विस्मय से पूछते हैं कि हे प्रभु यदि कोई पापी अनजाने में कोई भयंकर अपराथ कर बैठे तो
03:04क्या उसके लिए भी प्रायश्चित के द्वार सदैव खुले रहते हैं।
03:09भगवान विश्णु अपने आसन से थोड़ा आगे जुपकर करुना से मुस्कुराते हैं और आश्वासन देते हैं कि पश्चाताप करने वाले
03:17हर जीव के लिए प्रायश्चित के नियम समान रूप से कार्य करते हैं।
03:23इस प्रकार मन, वचन और कर्म से की गई भूलों को स्विकार करना ही उस मार्ग की ओर पहला कदम
03:30है जो जन्मजन्मांतर के बंधनों को काट देता है।
03:35वैकुंठ के परम पवित्र प्रांगण में जहां दिव्य संगीत की स्वरलहरिया स्वतह ही गुंजती रहती हैं।
03:42वहां कर्मों की शुद्धी का यह महान प्रवचन अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ता है।
03:48भगवान नारायन स्पष्ट करते हैं कि प्रायश्चित केवल एक शारिरिक क्रिया नहीं, बलकि आत्मा का वह परम संकल्प है जो
03:56पुनह कभी पाप न करने की प्रतिग्या लेता है।
04:01भगवान विश्णु के वचनों को सुनकर गरूर के हृदय का सारा संशय समाप्थ हो जाता है और वे समझ जाते
04:08हैं कि शारिरिक रोगों का मूल वास्तव में आत्मा की अशुद्धी में हैं।
04:14अब भगवान विश्णु उन विशेश और अत्यंत गुप्त प्रायश्चित विधानों को प्रकट करने जा रहे हैं, जो जन्मों जन्मों के
04:21असाध्य रोगों को जड़ से समाप्थ कर देते हैं।
04:26भगवान नारायन वैकुंट के परमशांत और दैविय वातावर्ण में गरुड के समक्ष उन गुप्त प्रायश्चित विधानों को प्रकट करना प्रारंभ
04:34करते हैं, जो जन्म जन्मांतर के संचित पापों को समूल नश्ट कर देते हैं।
04:40श्री हरी अपने परमशांत और करुनामई मुखमंडल पर एक मंद मुस्कान लाते हुए कहते हैं कि सच्चे प्रायश्चित की शुरुवात
04:49केवल बाहरी कर्मकांडों से नहीं, बलकि अंतरात्मा के गहरे पश्चाताप से होती हैं।
04:55भगवान विश्णु अपने दाहिने हाथ से संकेत करते हैं और हवा में दिव्य मंत्रों की चमकीली तरंगे प्रकट होती हैं,
05:04जो प्राजापत्य क्रिच्छ नामक गुप्त और कठोर तपस्या के मार्ग को दर्शाती हैं।
05:11इस दिव्य संकल्प की अगनी मनुष्य के सुक्ष्म शरीर में छिपे उनकाले कर्मिक बीजों को जलाकर भस्म कर देती हैं,
05:18जो वर्तमान जन्म में असाध्य रोगों का रूप धारन करते हैं।
05:24वैकुंट के इस पावन वातावर्ण में गरुर अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनते हैं, क्योंकि श्री हरी अब चांदरायन वरत नामक उस महा
05:32प्रायश्चित का वर्णन करते हैं, जो चंद्रमा की कलाओं से जुड़ा है।
05:37गरुर विनीत भाव से अपने हाथ जोरते हैं और पूछते हैं कि हे प्रभु ग्रिहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले साधारन
05:46मनुष्य इन अत्यंत कठिन तपस्याओं को कैसे पूर्ण कर सकते हैं।
05:52भगवान नारायन समझाते हैं कि चांद्रायन व्रत में चंद्रमा के बढ़ने और घटने के अनुसार अन्द का ग्रास क्रेहन किया
05:59जाता है, जो शरीर और मन दोनों का पूर्ण शोधन करता है।
06:05वे बताते हैं कि इस साधना से शरीर के भीतर के विशैले तत्व और मन के विकार वैसे ही नश्ट
06:12हो जाते हैं, जैसे बहती हुई गंगा में मैल धुलकर विलीन हो जाता है।
06:18वैकुंठ के आकाश में ग्रहों और नक्षतरों की चाल धीनी हो जाती है, मानों वे भी भगवान विश्नु द्वारा प्रकट
06:25किये जा रहे इन महान रहसियों को आदर पूर्वक सुन रहे हो।
06:30श्री हरी पुनह वानी का विस्तार करते हुए कहते हैं कि केवल उपवास ही नहीं, बलकि श्रद्धा पूर्वक किया गया
06:38दान भी असाध्य रोगों के कर्मिक बंधनों को काटने की अमोग औशधी है।
06:44वे एक दिव्यद्रिश्य दिखाते हैं, जहां एक धार्मिक मनुष्य भूखे जीवों और ब्राहमनों को स्वर्ण, गौ और अन्न का दान
06:52कर रहा है, जिससे उसके पिछले जन्मों के पाप गल रहे हैं।
06:58इस पुन्य कर्म के प्रभाव से मनुष्य के मस्तक पर एक अद्रिश्य स्वर्ण कांती उभरती है, जो यमराज के दूतों
07:05द्वारा दिये जाने वाले शारिरिक दंडों और रोगों के प्रभाव को नश्ट कर देती है।
07:12वैकुंठ का विशाल सभा मंडप नारायन की दिव्यपूर्जा से आलोकित हो उठता है, जहां देवता और सिध्ध पुरुष अद्रिश्य होकर
07:21इस ज्ञान की गंगा में गोते लगा रहे हैं।
07:25गरुर्पुना हाथ जोड कर पूछते हैं कि हे दीनानाथ जो रोगी अत्यंत दुर्बल हैं और कोई भी शारिरिक तप यादान
07:33करने में असमर्थ हैं, उनका उध्धार कैसे संभव है।
07:38भगवान नारायन अत्यंत मधुर्श्वर में कहते हैं कि उनके लिए केवल नामसंकीर्तन अर्थाक भगवान के नामों का निरंतर और निश्कपट
07:47जब ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है।
07:51नारायन नाम की यह ध्वनी ब्रहमांड में गूजती है और आत्मा पर चड़े जन्मों जन्मों के अशुद्धी के काले पर्दों
07:58को पल भर में छिन्नभिन कर देती है।
08:02वैकुंट के क्षितिच पर संध्याकालीन दिव्य प्रकाश बिखर जाता है, जहां के स्रिया और सुनहरी किर्णे इस महान सत्य की
08:11गवाह बनती हैं।
08:13श्री हरी समझाते हैं कि पूर्ण शर्णागती और भविष्य में पुनह पाप न करने का द्रिड संकल्पी वह अंतिनकुंजी है,
08:21जो यम के भैसे सदा के लिए मुक्त कर देती है।
08:26परमिश्वर के इन वचनों को सुनकर गरुड के नेत्रों से प्रेमाश्रूओं की धारा बहने लगती हैं और वे समझ जाते
08:33हैं कि भगवान की करुणा मनुष्य के हर पाप से अनंत गुना बड़ी है।
08:39अन्तह सच्चे प्रायश्चित से शुद्ध हुई एक जीवात्मा चमकते हुए दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर वैकुंठ के प्रकाश की ओर
08:47अग्रसर होती है, जिसका रोग और कष्ट सदा के लिए समाप्त हो चुका है।
08:53वैकुंठ धाम के स्वर्णिम प्रांगण में सर्वध्य श्री हरी अब पक्षिराज गरूर को विभिन कर्मजन्य रोगों और उनके विशिष्ट प्रायश्चितों
09:01के गहरे रहसियों को बतलाने का विधान प्रारंभ करते हैं।
09:07भगवान विश्णु अपने शांत और करुणामई स्वर में कहते हैं कि पराई संपत्ति या स्वर्ण की चोरी करने वाले मनुष्य
09:15को अगले जन्म में कुष्ट या त्वचा संबंधी असाध्य रोगों का कष्ट भोगना पड़ता है।
09:21इस त्वचा रोग की शांती हेतु श्री हरी विधान देते हैं कि मनुष्य को भक्तिभाव से सूर्य देव का पूजन
09:28करते हुए शुद्ध स्वर्ण और गोदान का संकल्प लेना चाहिए।
09:33जो जीव दूसरों के अन्न और मिष्ठान की चोरी करते हैं, वे अगले जन्म में जठरागनी के विकार या पेट
09:41के गंभीर असाध्य रोगों से संतप्थ होते हैं।
09:45ऐसे उदर रोगों के निवारण के लिए गरूर पुराण में अन्नदान, चंदरायन, व्रत तथा निर्धनों को भरपेट सात्विक भोजन कराने
09:53का विशेश महत्व बताया गया है।
09:57श्री हरी आगे प्रकट करते हैं कि मुख से निरंतर असत्य बोलने, चुगली करने और दूसरों पर जूठा लांचन लगाने
10:05का पाप जहवा और वानी दोश के रूप में प्रकट होता है।
10:10वानी के इस भयंकर दोश को मिटाने के लिए मौन व्रत धारण करना, सरस्वती देवी की उपासना करना और वेदपाथी
10:18ब्राहमनों को विद्या वपुस्तकों का दान देना परम कल्यानकारी है।
10:23शास्त्रों का अपमान करने और ज्ञान की अभहेलना करने वाले मनुश्यों को मंद बुद्धी, स्मृतिलोप, अथवा मस्तिष्क के मानसिक रोगों
10:32की वेदना सहनी पड़ती है।
10:35मानसिक संताप और बुद्धी भरंश के निवार नार्थ मनुश्य को गायतरी जप, महामरित्युन जय अनुष्ठान और ब्राहमी ओश्धियों के साथ
10:44साथ ज्यानदान का आश्रे लेना चाहिए।
10:48परमेश्वर बताते हैं कि निर्पराध प्राणियों पर हिंसा करने और उन्हें शारिरिक यातनाय देने का पाप मनुश्य को पक्षाघात या
10:56जोडों के भयंकर दर्द से ग्रसित करता है।
11:00हिंसा के इस दुश्परिनाम को शांत करने के लिए प्राणी मात्र पर दया, जीव हिंसा का पूर्ण त्याग और शिवजी
11:08के सम्मुख्तिल वग्रित का होम करने का विधान है।
11:11पराई स्त्रियों पर ग्रिष्टी डालने और व्यभिचार के पाप में लिप्त रहने वाले जीवों को जन्नेंद्रिय संबंधी असाध्य व्याधियों और
11:20गुप्त रोगों का दंड भुगतना पड़ता है।
11:24इस कामी पाप की शुद्धी के लिए कठोर क्रिक्षर वरत बहती पवित्र नदियों में स्नान तथा तीर्चस्थलों में गुप रूप
11:32से भूमी दान करना अनिर्वाय माना गया है।
11:35गरुर बड़े ध्यान से सुनते हैं जब नारायन बताते हैं कि माता पिता और गुरुजणों का तिरस्कार करने वाले मनुश्यों
11:44के नेत्रों की जोती क्शीन हो जाती है और वे अन्धेपन के रोग को प्राप्थ होते हैं।
11:51नेत्र रोगों की शांती और गुरुद्रोह के प्रायश्चित के लिए अरुनोदय काल में सूर्य अर्ग्य देना और नेत्रहीन व असहाय
11:59लोगों की आजीवन सेवा करना ही एक मात्र आउशधी है
12:04छलकपट और विश्वासधात के द्वारा अर्जित धन से जीवन यापन करने वाले जीवों को हृदय रोग और अकारण भय के
12:12मानसिक विकारों का सामना करना पड़ता है
12:16हृदय के इस संताप को दूर करने हेतु शुद्ध मन से सत्य का पालन पीपल वरिक्ष के नीचे विश्णू सहसर
12:23नाम का पाठ और अभयदान देना सरवाधिक फलदाई है
12:28श्री हरी स्पष्ट करते हैं कि प्रायश्चित केवल बाह्य कर्मकांड नहीं बलकि अंतरात्मा का वास्तविक रुपांतरण और पुनह पाप न
12:37करने का अटूट संकल्प है
12:40यदि मनुष्य पूर्ण निष्ठा के साथ इन प्रायश्चित विधानों का पालन करे तो जन्मांतरों के संचित पाप बीज भी दगध
12:48होकर पूर्ण आरोग्य की प्राप्ति कराते हैं
12:52भगवान विष्णु के इस परमगूड कर्मविपाक ज्यान को सुनकर पक्षिराज गरूर परम संतोश और भक्ती के सागर में निमगन हो
13:00जाते हैं
13:02इसके पश्चात सर्वेश्वर भगवान विष्णु पक्षिराज गरूर को कर्मचक्र को बदलने वाली दान की अद्रिश्य और परम शक्तिशाली महिमा का
13:11वर्णन करना प्रारंभ करते हैं
13:15पक्षिराज गरूर अत्यंत विनीत होकर पूचते हैं कि प्रभु सानसारिक दान की साधारन भेंट किस प्रकार जन्मांतरों के भयानत पापभार
13:24को छिन्न भिन्न कर देती है
13:27श्री हरी मंद मुस्कान के साथ समझाते हैं कि जब दान बिना किसी अहमकार और पूर्ण निशकाम भाव से किया
13:35जाता है तो वह आत्मा के संचित पापों को ततकाल भस्म कर देता है
13:41दान की अगनी में मनुष्य के पूर्व जन्मों के वे अद्रिश्य बंधन और पापबीज मोम की भांती पिघल कर सर्वथा
13:49नश्ठ होने लगते हैं
13:51सर्व प्रथम अन्नदान की महिमा बताते हुए नारायन कहते हैं कि क्षुधित प्राणी को भोजन कराना समस्त वैदिक यग्यों के
14:00समान पुन्य प्रदान करता है
14:03भगवान विश्नुस पष्ट करते हैं कि अन्नदान से त्रिप्थ हुए जीव की अंतरात्मा से निकलने वाला आशिरवाद सीधे कर्मचक्र को
14:11आरोग्य में बदल देता है
14:14एक निश्पाप ग्रिहस्त को भूखे और असहाई जनों को प्रेमपूर्वक अन्न परोस्ते हुए देखकर आकाश से देवगण उस पर पुश्पवर्शा
14:23करते हैं
14:25भोजन के प्रत्येक निवाले के साथ मनुष्य के जन्मांतरों से चले आ रहे पेट और काया के गंभीर रोग स्वत्य
14:33शांत होने लगते हैं
14:35ततपश्चात श्री हरी गोदान के परम पवित्र विधान का उदघाटन करते हैं जो जीवात्मा को परलोग की भीशन बाधाओं से
14:44मुक्ती दिलाता है
14:46प्रभु गरूर से कहते हैं कि श्रधा पूर्वक किया गया गोदान मृत्यु के उपरांत आत्मा को तप्त वैतर्णी नदी को
14:54सुगमता से पार कराने वाली नौका बन जाता है
14:58एक भक्तिभाव से पूर्ण साधक दिव्यशुभ लक्षणा गाय की पूँच में रेश्मी वस्त्र और स्वर्ण आभूशन बांध कर योग्य विद्वान
15:07को भेंट करता है
15:10गोदान के प्रभाव से तप्त मार्ग और यमलोग की यातनाई छिन्नभिन होकर शीतल कमलों के मार्ग में परिवर्तित हो जाती
15:18है
15:19इसके बाद मधुसूदन भूमिदान के अक्षय पुन्य का वर्णन करते हैं जो प्राणी को अक्षय कीर्थी और भावी जन्मों में
15:27राजसी वैभव प्रदान करता है
15:31श्री हरी बताते हैं कि आश्रमों, चिकित सालियों या जनकल्यान के लिए दी गई भूमी मनुष्य के लोग और छल
15:38से निर्मित सभी पापों को मिटा देती है
15:42एक राजा अपनी समस्त भूमी समपत्ति का तामर पत्र पर उतकीन दान पत्र रिशियों के चरणों में पूर्ण विनमर्ता से
15:49अरपित करता है
15:52दान की गई भूमी का प्रत्येक कन दानदाता के पूर्वजन्मों के संचित रिनों को भस्म करके उसे स्थिर्ता और धर्म
16:00की शक्ती देता है
16:02नारायन आगे विद्यादान और वस्त्रदान की अलोकिक शक्ती पर प्रकाश डालते हुए वैकुंठ को परमज्ञान की जोती से आलोकित कर
16:11देते हैं
16:12श्री हरी कहते हैं कि अज्ञानी को विद्या का दान देना उसके भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को सदा के
16:20लिए मिटा कर उसके आत्म ज्यान को जागरित करता है
16:25भगवान विश्णु गरूर को दिखाते हैं कि वस्त्रदान किस प्रकार समाज में असहायों के लज्जा और सम्मान की रक्षा करके
16:33मनुष्य के सामाजिक पापों को धोडालता है
16:37इस प्रकार निश्काम दान का महाविधान कर्म के कठोर चक्र को मोक्ष और भगवत कृपा की ओर मोरकर जीवात्मा को
16:45परंपद प्रदान करता है
16:48दान की महिमा बताने के पश्चात, भगवान नारायन अब गरुर को वरत और उपवास के उस परम पावन मार्ग की
16:55ओर ले जाते हैं, जो जीवात्मा के त्रिविध तापों का शमन करता है
17:01श्री हरी अपने मंध हास्य से वैकुंट को आलोकित करते हुए कहते हैं कि केवल अन का त्याग ही उपवास
17:08नहीं, अपूर्ण वासनाओं पर विजय पाना ही सच्चा वरत है
17:13जब मनुष्य पूरी निष्ठा से इंद्रियों का दमन कर निराहार रहता है, तब उसकी जठरागनी शरीर के भीतर संचित पूर्वजन्मों
17:22के सुक्ष्म विकारों को भस्म करने लगती है
17:26उपवास के समय मन की चंचलता को वश्मे करने से आत्मा में उस अलौकिक शक्ती का उदे होता है, जो
17:33पापों के अद्रिश्य जालों को छिन्न भिन्न कर देती है
17:38भगवान विश्नु समझाते हैं कि चंद्रवर्ष के चक्र में आने वाली पवित्र एकादशी तिथी सभी व्रतों में सर्वश्रिष्ट है, जो
17:47मन को सीधे परम चेतना से जोड़ती है
17:50गरुर अत्यंत विस्मय से पूछते हैं कि हे प्रभु इस एकादशी व्रत का पालन करने से किस प्रकार एक साधारन
17:58मनुष्य यमलोग के भयानक कष्टों से सदा के लिए बच जाता है
18:03श्री हरी बताते हैं कि एकादशी के दिन अन्न का त्याग करने से शरीर में तामसिक प्रवृत्तियां शान्त होती हैं
18:11और बुद्धी में सत्व गुन का प्रकाश फैलता है
18:15यह वरत केवल अन्न का परहेज नहीं बलकी निंदा, असत्य और क्रोध जैसी मानसिक बुराईयों से दूर रहकर मन को
18:23केवल भगवत्चिंतन में लीन करने का संकल्प है
18:28इसके बाद भगवान महादेव के प्रिय महा शिवरात्री वरत का वर्णन करते हैं जो अज्यान के घोर अंधकार को मिटा
18:36कर जीवात्मा को शिवत्व प्रदान करता है
18:40प्रभु विश्णु कहते हैं कि शिव और शक्ती के मिलन की यह रात्री मनुष्य के भीतर की सोई हुई कुंदलिनी
18:47शक्ती को जागरत करने का सर्वोत्तम समय है
18:51जो साधक शिवरात्री को निराहार रहकर बेलपत्र और गंगाजल से महादेव का पूजन करता है
18:58उसके कोटी-कोटी जन्मों के संचित महापाप भस्म हो जाते हैं
19:03वरत के इस प्रभाव से साधक के सुख्ष्म शरीर के चकर जागरत होने लगते हैं और उसका अंतहकरन दिव्य प्रकाश
19:11से भर जाता है
19:14विष्णू आगे कहते हैं कि विभिन रितूओं के संधिकाल में किये जाने वाले अन्य विशिष्ट वरत भी मानव शरीर को
19:21रोगों और मानसिक विकारों से मुक्त रखते हैं
19:25गरूर यह जानकर मुदित होते हैं कि कैसे ये वरत केवल आध्यात्मिक ही नहीं बलकि मनुष्य के भौतिक स्वास्थ्य को
19:33सुधारने के अचूक वैज्ञानिक साधन भी हैं
19:38व्रत की समाप्ती पर पारण के समय जब सात्विक और संतुलित आहार ग्रहन किया जाता है तो वह शरीर में
19:45नए प्रान और ओज का संचार करता है
19:49इस प्रकार नियमित उपवास करने वाले मनुष्य का शरीर केवल हाडमास का धाचा नहीं रहता बलकि वह परमात्मा का एक
19:57जीवन्त मंदिर बन जाता है
20:00वैकुंट की इस पावन धरा से बहती हुई दिव्यरश्मिया प्रिथवी के उन सभी स्थानों को पवित्र करती हैं जहां निशकाम
20:08भाव से व्रत और तब किया जाता है
20:12श्री नारायन गरूर को आशिश देते हुए स्पष्ट करते हैं कि जो भी मनुष्य श्रध्धा और नियम से इन उपवासों
20:20का पालन करता है उसके लिए मोक्ष के द्वार स्वत्र खुल जाते हैं
20:25मृत्यू के समय ऐसे धर्मात्मा पुरुष को यम्दू छू भी नहीं पाते और वे सीधे वैकुंट के इन दिव्यद्वारों में
20:33अत्यंत आदर पूर्वक प्रवेश करते हैं
20:37इस प्रकार व्रत और उपवास की यह पावन विधा जीवात्मा को कर्मों के अटूट बंधनों से मुक्त कर अंत्य परमात्मा
20:45के शाश्वत धाम में लीन करा देती है
20:49इसके बाद भगवान विश्णु गरूर को तीर्थ यात्रा के परम पावन महत्व से अवगत कराते हुए कहते हैं कि प्रित्वी
20:56लोग पर स्थित पवित्र नदिया और तीर्थ स्थल साक्षात मोक्ष के द्वार है
21:03परमेश्वर की वानी सुनकर विहगराज गरूर अत्यंत विनीत भाव से अपने पंखों को समेट कर खड़े हो गए और तीर्थों
21:11द्वारा पाप मुक्ती के इस रहस्यमय विज्ञान को समझने के लिए उच्सुक दिखे
21:17भगवान नारायन समझाते हैं कि जो भी मनुष्य पवित्र गंगा नदी के पावन तट पर जाकर श्रध्धा पूरवक्स नान करता
21:24है उसके जन्म-जन मांतर के संचित पाप तटकाल नंश्ठ हो जाते हैं
21:30जैसे ही पवित्र जल मनुष्य के मस्तक का स्पर्ष करता है, उसके पूर्व जन्मों के क्रूर कर्मों का काला साया
21:38धुए की तरह विलीन होकर एक दिव्य जोती में परिवर्तित हो जाता है
21:43आगे प्रभु श्री हरी प्रयाग राज के त्रिवेनी संगम की अनुपम महिमा का वर्णन करते हैं, जहा गंगा, यमुना और
21:51अग्रिश्य सरस्वती का मिलन ब्रहमांडिय उर्जा का केंद्र बनता है
21:56गरुर के विस्मय से भरे नेत्रों को देख कर, श्री विश्नु अपने दाहिने हाथ से वरत मुद्रा बनाते हुए संगम
22:04स्नान के दिव्य फल को विस्तार से प्रकट करते हैं
22:08प्रयाग के इस पवित्र संगम पर किया गया पित्रितरपन भटकती हुई पूर्वजों की आत्माओं को यमलोक की यात्नाओं से मुक्त
22:16कराकर स्वर्ग लोक में स्थान दिलाता है
22:20इस अनुष्ठान के प्रभाव से पूर्वज त्रिप्थ होकर अपने वंश्जों को आशिरवाद देते हैं जिससे उनके घर में सुख, समरिध्धी
22:29और आध्यात्मिक चेतना का उदे होता है
22:33ततपश्चात भगवान विश्णु काशी नगरी की अनुपम महिमा का गान करते हैं, जिसे स्वयम महादेव ने अपने त्रिशूल पर धारण
22:41कर संसार के बंधनों से मुक्त रखा है
22:45विश्णुजी गरूर से कहते हैं कि काशी में मृत्यु प्राप्त करने वाले किसी भी जीव को पुनर्जन्म के चक्र में
22:52नहीं पढ़ना पड़ता, क्योंकि स्वयन शिव उन्हें तारक मंत्र देते हैं
22:58काशी के मंदिर में भक्तगण भगवान विश्वनात की महा आरती करते हैं, जहां जलते हुए दीपकों की लौसे सारा वातावर्ण
23:06शिवमय हो जाता है
23:08आरती की शंकध्वनी और ओम नमह शिवाय के तीवर उद्गोश से पूरे ब्रहमांड में एक ऐसी पवित्र तरंग उठती है,
23:16जो समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश कर देती है
23:21प्रभु आगे कुरुक्शेत्र तीर्थ का सMरण करते हैं, जहां सूर्य ग्रहन के समय किये गए स्नान और दान का पुन्य
23:29अनन्तगुना फलदाई माना गया है
23:32गरुर विस्मय पूर्वक पूछते हैं कि है प्रभुक ग्रहन काल के समय दान करने से जीवात्मा को किस प्रकार का
23:39अलोकिक लाप प्राप्थ होता है
23:43भगवान नारायन समझाते हैं कि इस पावन काल में योग्य ब्राहमनों को दी गई भूमी स्वर्ण और गौ का दान
23:50मनुष्य के भयंकर से भयंकर पापों को भी भस्म कर देता है
23:55वह दान किया हुआ धन जीवात्मा के लिए परलोक के मार्ग में एक अग्रिश्य अभेद्य कवच बनकर उसकी रक्षा करता
24:03है और उसे यम्दूतों के भय से बचाता है
24:08तत्पश्चात प्रभु दक्षिन के रामेश्वरम धाम की चर्चा करते हैं जहां मर्यादा पुरुशोत्तम राम ने स्वय भगवान शिव के शिवलिंग
24:16की स्थापना की थी
24:18श्री हरी के वचनों को सुनकर गरुड का हृदय असीम आनंद से भर गया और उन्होंने समझ लिया कि भक्ती
24:26और तीर्थ यात्रा में कोई भेद नहीं है
24:30भगवान स्पष्ट करते हैं कि जो मनुष्य शारिरिक रूप से तीर्थ जाने में असमर्थ है
24:35वह यदी मन से भी इन तीर्थों का स्मरण करे तो भी उसे आधा पुन्य अवश्य मिलता है
24:42इस प्रकार श्रद्धा पूर्वक की गई यह तीर्थ यात्रा जीवात्मा को अंत्य कर्मों के जाल से मुक्त कर सीधा वैकुंट
24:51के इस परम पावन दिव्यधाम में प्रवेश दिलाती है
24:55श्री हरी विश्णू ने गरूर की ओर अत्यंत क्रिपालू द्रिष्टी से देखते हुए कहा कि तीर्थों से भी उत्तम और
25:03त्वरित फल देने वाला मार्ग सच्चे गुरु और संतों की निहस्वार्थ सेवा है
25:09भगवान के इन दिव्य वचनों को सुनकर गरूर ने श्रद्धा पूर्वक अपने पंखों को समेट लिया और हाथ जोड़कर उनके
25:16मुखमंडल की ओर देखने लगे
25:19पूर्व जन्मों के भयंकर पापों का प्रायश्चित करने के लिए जब मनुष्य किसी परमज्यानी गुरु के चर्णों को धोकर उस
25:27जल को मस्तत पर लगाता है तो उसके जन्मजन्मांतर के संचित पाप ततकाल नश्ठ हो जाते हैं
25:34गुरु के चर्णों से निकलने वाली कृपा की यह दिव्यधारा जीवात्मा के अज्ञान रूपी अंधकार को भेद कर उसके हृदय
25:42में ज्ञान का दीपक प्रजवलित कर देती है
25:46नारायन समझाते हैं कि जहां गुरु और शिश्य का यह पवित्र संबंध बसता है वह स्थान स्वय वैकुंठ के समान
25:54पावन और समस्त विघनों से मुक्थ हो जाता है
25:58श्री हरी ने मुस्कुराते हुए गरूर से कहा कि जो मनुष्य अहंकार का त्याग कर गुरु के वचनों को ही
26:05अपना अंतिन सत्यमान लेता है उसे यमराज के भयानक गंडों का भय कभी नहीं सताता
26:12गुरु की कुटिया में जाडू लगाना, उनके आश्रम की भूमी को स्वच करना और उनके लिए समिधा एकत्र करना अश्वमेध
26:20यग्य के समान पुन्यफल प्रदान करता है
26:24इस सेवा रूपी कर्म से मनुष्य के संचित पापों के विशाल परवत वैसे ही भस्म हो जाते हैं जैसे प्रचंड
26:32अगनी सूखी लकडियों के धेर को क्षण भर में राख कर देती है
26:37भगवान विश्णु ने बताया कि संतों की संगती में बिताया गया एक क्षण भी मनुष्य की बुद्धी को शुद्ध कर
26:44उसे सीधे मुक्ती के मार्ग पर अग्रसर कर देता है
26:49गरुर ने विस्मय और आनन से भर कर पूछा कि है प्रभु यदि कोई मनुष्य अग्यानी हो और उसे सही
26:56गुरु की पहचान न हो तो वह इस भवसागर को कैसे पार करे
27:01श्री हरी ने उत्तर दिया कि जो मनुष्य सच्चे हरिदय से गुरु की खोज में संतों की शरण में जाता
27:07है उसे इश्वर स्वयन सही मार्ग दर्शक के रूप में गुरु से मिला देते हैं
27:14गुरु की दीक्षा के समय जब वे शिश्य के कान में महा मंत्र का फूंक मारते हैं तब उस जीवात्मा
27:20के भीतर सोई हुई दिव्य चेतना जागरित हो उठती है
27:25वह मंत्र केवल शब्द नहीं अपितु स्वयन साक्षात ब्रह्मा का रूप होता है जो संसार के सभी बंधनों और माया
27:33के भ्रमजाल को पलभर में काट देता है
27:37भगवान नारायन आगे कहते हैं कि गुरु की काया में स्वयन ब्रह्मा, विश्नु और महेश का वास होता है इसलिए
27:44उनकी निंदा करना सबसे बड़ा महापाप माना गया है
27:49जो शिश्य अपने गुरु की वानी पर अविश्वास करता है या उनकी आग्या की अभेलना करता है वह घोर नरक
27:57के कश्ट भोगने के बाद अत्यंत निम्न योनियों में जन्म लेता है
28:02इसके विपरीत जो गुरु के चर्णों की धूल को भी अपने मस्तक का तिलक बना लेता है उसे समस्थ तीर्थों
28:10में सनान करने का फल एक साथ प्राप्थ हो जाता है
28:15संपूर्ण चराचर जगत में संत और गुरु के समान कोई दूसरा हितैशी नहीं है क्योंकि वे स्वयन कश्ट सहकर भी
28:22पतित आत्माओं का उध्धार करते हैं
28:26श्री हरी ने पुनह स्पष्ट किया कि संतों की सेवा से प्रसन्न होकर मैं स्वयन उस भक्त के हृदय में
28:33सदैव के लिए निवास करने लगता हूँ
28:36जब संतों के आशिरवाद से मनुष्य की बुद्धी सात्विक हो जाती है तो उसके भीतर परोपकार और दया की भावना
28:44स्वतह ही जागरत हो उठती है
28:47इस प्रकार गुरु की अनन्य भक्ती और संतों का सत्संग जीवात्मा को करमों के कठिन जाल से मुक्त कर सीधा
28:55वैकुंट के इस परम पावन दिव्य धाम में प्रवेश दिला देता है
29:00वैकुंठ के उस पावन दिव्य प्रांगण में भगवान श्री हरी विश्णु ने पक्षी राज गरूर को संबोधित करते हुए मंत्रजब
29:08की असीम महिमा का प्रक्टीकरण प्रारंब किया
29:11श्री हरी ने कहा कि जब साधक अनन्य श्रद्धा से प्रभु नाम का निरंतर जब करता है तो उसके चित्त
29:18में जमा जन्मजन मांतर के कर्ममल स्वतह नश्थ होने लगते हैं
29:24नामजब से उत्पन होने वाली पवित्रस पंदन ध्वनिया मनुष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को भेद कर उसके अंतहकरण में ज्ञान
29:32का अलौकिक प्रकाश फैला देती हैं
29:36जैसे तीवर वायू के वेग से सूखे पत्तों के धेर उड़ जाते हैं वैसे ही हरिनाम के निरंतर उच्चारण से
29:43मनुष्य के संचित पापों के परवताकार धेर भस्म हो जाते हैं
29:48इसके पश्चात पूर्ण परमेश्वर ने गरूर को तब की महिमा बताते हुए कहा कि इंद्रियों और मन को सन्यमित करना
29:56ही वास्तविक और परम तपस्या है
30:00पक्षी राज गरूर ने विनीत भाव से शीश नवाकर पूछा कि है प्रभू कठोर शारिरिक लेश और आत्मसन्यम रूपी तपस्या
30:08में वास्तव में क्या अंतर है
30:11नारायन ने स्पष्ट किया कि केवल शरीर को कष्ट देना तप नहीं बलकि धर्म मार्ग पर चलते हुए सुख दुख
30:18और मानपमान में संभाव रखना ही सच्चा तप है
30:23जिस प्रकार अगनी में तपने के बाद ही कच्चा स्वर्ण शुद्ध होकर जग्मगाता है उसी प्रकार तपस्या रूपी भठी में
30:31जलकर जीव का अहमकार और मलिंता भस्म हो जाती है
30:36श्री हरी ने आगे बढ़ते हुए ध्यान योग के सुख्षम रहसियों को उजागर करते हुए बताया कि मन की एकागरता
30:44ही परमात्मा से साक्षातकार का मुख्यद्वार है
30:48परमपिता विश्णू ने गरूर को समझाया कि चंचल मन को विश्यभोगों से समेट कर हरद्यक्मल में स्थापित करना ही ध्यान
30:56की प्रथम अवस्था है
30:58जब साधक अपनी सांसों पर नियंत्रन कर चेतना को आग्या चक्र पर केंद्रित करता है तो उसके भीतर सोई हुई
31:06कुंडलिनी शक्ती जागरित होने लगती है
31:10ध्यान के सर्वोच शिखर पर पहुँच कर साधक को अपने ही हरदय के भीतर संपून ब्रहमांड के स्वामी श्री नारायन
31:18के चतुर्भुज रूप का दिव्यदर्शन होता है
31:22वैकुंट की उस परमशांत वातावर्ण में भगवान ने बताया कि जब तप और ध्यान का यह त्रिवेनी संगम जीवात्मा को
31:30अविद्या के गेहन अंधकार से बाहर निकालता है
31:34गरुर ने अत्यंत भाव विभोर होकर पूछा कि हे जगनात क्या ग्रिहस्थ जीवन में रहते हुए भी कोई मनुष्य इस
31:42परमसाधना को सिध्ध कर सकता है
31:45प्रभु ने उत्तर दिया कि जो मनुष्य अपने सभी कर्तवियों को इश्वर को समर्पित कर अनासक्त होकर कर्म करता है
31:53वह ग्रिहस्थ भी ध्यानयोगी के समान ही पवित्र है
31:58जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त रहता है
32:02वैसे ही सच्चा ध्यानी संसार के प्रलोभनों के मध्य रहकर भी पापों से मुक्त रहता है
32:09इसके पश्चात श्री नारायन ने जब और ध्यान की इस सर्वोच्च सिध्धी का फल बताते हुए गरुर को आत्म साक्षातकार
32:17के अंतिम रहस्य का ज्यान दिया
32:20भगवान विश्णु ने कहा कि जब साधक की बुद्धी पूर्णतय स्थिर हो जाती है तो वह अह ब्रहमास्मी और सुहम
32:28के अद्वैत भाव को साक्षात अनुभव करने लगता है
32:32इस अवस्था में जीव को संपूर्ण स्रिष्टी में केवल परमात्मा का ही रूप दिखाई देता है और उसका अपना प्रिथक
32:40अस्तित्व ब्रहमान्दिये चेतना में लीन हो जाता है
32:44इस प्रकार जब तप और ध्यान के इस गुप्ट विधान का पालन करने वाली आत्मा सदैव के लिए जन्ममर्ण के
32:51चक्र से छूट कर प्रभु के परम धाम को प्राप्त कर लेती है
32:57भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरुर से कहा कि हे खगेश्वर प्रायश्चित केवल एक बार का कर्मकांड नहीं
33:05है
33:05बलकि यह जीवन परियंत धर्म प्रायंता और सदाचार के साथ जीने का एक निरंतर प्रवा है
33:13गरुर ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर प्रभु की ओर देखा उनके चहरे पर ज्यान की गहरी पिपासा थी और
33:20वे इस गुप्त विधान को समझने के लिए पूरी तरह एकाग्र थे
33:25प्रभु ने समझाया कि जब मनुष्य सत्य का मार्ग चुनता है और जूट का त्याग करता है तो उसके भीतर
33:32का सत्य रूपी प्रकाश उसके पूर्व जन्मों के कई मानसिक पापों को ततकाल भस्म कर देता है
33:40मनुष्य के सत्कर्मों से उत्पन्न होने वाली सकारात्मक उर्जा ब्रह्मांडिय तराजू पर उसके संचित पापों के भार को धीरे-धीरे
33:48संतुलित करने लगती है
33:51आगे बताते हुए नारायन ने कहा कि अहिंसा का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है क्योंकि किसी भी जीव
33:59को मन, वचन या कर्म से पीड़ा न देना आत्मा को परम पावन बनाता है
34:05भगवान विश्णू के वचनों को सुनकर गरूर का हृदय करुणा से भर गया और उन्होंने अनुभव किया की हिंसा का
34:12परित्याधी वास्तव में आत्मा की सच्ची मुक्ती का द्वार है
34:17प्रित्वी लोग पर जब कोई दयालू मनुष्य किसी असहाय या धायल पशुकी सेवा निस्वार्थ भाव से करता है तो उसके
34:25उस करुणापूर्ण स्पर्ष से इश्वर स्वयन प्रसन्न होते हैं
34:30जैसे कीचड में उत्पन होने के बाद भी कमल का फूल निरलिप्ट और अत्यंत सुन्दर रहता है वैसे ही सदाचारी
34:38मनुष्य संसार के दोशों के बीच रहकर भी अचूता रहता है
34:43श्रीहरी ने आगे कहा कि मीठी और प्रियवानी बोलना भी एक महान तपस्या है क्योंकि कटू वचनों से दूसरे के
34:51हृदय को लगी ठेस सबसे गंभीर मानसित पाप का कारण बनती है
34:57अपने दिव्य होठों पर मंद मुस्कान लाते हुए चक्रधारी विष्णु ने गरूर को समझाया कि मीठे वचन बोलने वाले के
35:05मुख में साक्षात सरस्वती वास करती है
35:09जब कोई व्रिध पिता अपने दुखी पुत्र को सांत्व ना देकर उसके मन को शांत करता है तो वह मधुर
35:16समवाद ब्रहमांड में शांती की तरंगे फैलाता है
35:21निस्वार्थ भाव से किया गयादान एक ऐसे जलते हुए दीपक के समान है जो अज्ञान और दरिद्रता के घोर अंधकार
35:29को एक क्षण में मिटा देता है
35:32स्रिष्टी के पालनहार ने बताया कि ख्षमाशीलता ही आत्मा का सबसे बड़ा आभूशन है क्योंकि क्रोध को पीकर दूसरों को
35:41ख्षमा कर देने से शत्रुता के सारे बंधन तूट जाते हैं
35:46गरुर ने विचार किया कि किस प्रकार ख्षमा करने वाला व्यक्ति न केवल स्वयन को बलकि अपने शत्रु को भी
35:53कर्मों के उस भयानक चक्रव्यू से मुक्त कर लेता है
35:58धर्ती पर जब दो पुराने शत्रु अपने अस्त्रों का त्याग कर एक दूसरे को गले लगाते हैं तो स्वर्ग से
36:05देवगण उन पर पुश्पों की वर्षा करते हैं
36:08निरंतर किया जाने वाला सत्कर्म उस निर्मल गंगा जल की तरह है जो वर्षों से जमी हुई पाप की काई
36:16को धीरे-धीरे धोकर आत्मा को कांच की तरह साफ कर देता है
36:21विश्णु जी ने कहा कि इंद्रिय निग्रह और आत्मसन्यम ही वे अभेद्य कवच हैं जो मनुष्य की आत्मा में नए
36:29पाप कर्मों के प्रवेश को पूरी तरह रोक देते हैं
36:34भगवान के इन परमपावन वचनों को सुनकर गरुड का रोमरोम पुलकित हो उठा और उनके हृदय में छिपे संशय के
36:41सभी बादल सदा के लिए छंट गए
36:45संसार के कोलाहल के बीच भी जो मनुष्य अपने मन को वश में रखकर शांत रहता है वह प्रित्वी पर
36:52रहते हुए भी साक्षात वैकुंठ का ही सुख भोगता है
36:56इस प्रकार धर्म प्रायन जीवन जीने वाली प्रत्येक शुद्ध आत्मा अंत्त उस प्रकाशमान दिव्य मार्ग पर अग्रसर होती है जो
37:05उसे सीधे प्रभु के परम धाम वैकुंठ में विलीन कर देता है
37:10वैकुंठ के इस परम पावन और प्रकाशमान सामराज में, जहां समय की सीमाए समाप्थ हो जाती हैं, शुद्ध आत्माए दिव्य
37:19नेल वैद्यूतिय प्रकाश में विलीन हो रही हैं
37:23भगवान श्री हरी विष्णू अपने परम भक्त गरुड के संशियों का निवारन करने के लिए अपनी गंभीर और अमरित्मई वानी
37:31में मोक्ष के परम सत्यका रहस्य प्रकट करते हैं
37:35मनुष्य के पूर्व जन्मों के संशित कर्मों के भयानक बंधन जो लोहे की सुलक्ती हुई जन्जीरों की भान्ती आत्मा को
37:43जक्डे रहते हैं वे केवल हरी के नाम स्मरण मात्र से पिघलने लगते हैं
37:49जैसे कीचड से उत्पन होने पर भी कमल का पुष्प जल की गंदगी से सर्वता अचूता रहता है वैसे ही
37:56सच्ची भक्ती से युक्त आत्मा संसार के विकारों से मुक्त रहती है
38:02अनंत क्षीर सागर की शान्त तरंगों से उठने वाले दिव्यस्वर ब्रहमांड के मूल तत्व यानी आत्मज्यान की उस परम सत्यता
38:10की घोशना करते हैं जो केवल प्रभु के साननिध्य में मिलती है
38:15गरुड अपने विशाल पंखों को सिकोड कर अत्यंत विनीत भाव से पूछते हैं कि हे प्रभुक कलियुक के घोर अंधकार
38:23में फंसा अज्यानी मनुष्य इस परम ज्यान को कैसे प्राप्त कर सकता है
38:29भगवान विश्णु दयापूर्वक अपने अभय मुद्रा वाले दक्षिन हस्त को उपर उठाते हैं जिससे बहती हुई प्रकाश की दिव्यधाराएं मानव
38:38लोग के अंधकार को मिटाने के लिए प्रस्थान करती हैं
38:43वेदों और उपनिश्दों के वो गुप्ट मंत्र जो जन्मम्रित्यु के इस अनंत चक्र को तोड़ने की सामर्थ्य रखते हैं सुनहरे
38:51अक्षरों में आकाश मंडल पर अनकित हो जाते हैं
38:55प्रभु के इन कल्यानकारी वचनों को सुनकर स्वर्ग के समस्थ देवगन और रिशिमुनी वैकुंठ के जरोखों से हर्शित होकर पारिजात
39:04के पुष्पों की वर्षा करने लगते हैं
39:08श्री हरी समझाते हैं कि कठोर शारिरिक तपस्या केवल शरीर को शुद्ध करती है परन्तु जब तक मन में पूर्ण
39:15समर्पन का भाव न हो तब तक मुक्ती का द्वार कभी नहीं खुलता
39:20मनुष्य का हरिदय जब प्रभु के प्रेम में पूर्ण तह लीन हो जाता है तब वह स्वयं एक दिव्य मंदिर
39:27बन जाता है जहां साक्षात ईश्वर निवास करते हैं
39:32स्रिष्टी के न्याय की तराजू पर जहां कठोर कर्मकांडों का भार हलका पड़ जाता है वही निश्कपट भक्ती के आसूओं
39:40की एक गूंध सबसे भारी सिध्ध होती है
39:44वैकुंठ का वह परम प्रकाश्मान प्रवेश द्वार जो जन्म और मृत्यू के चक्र से परे हैं उन सभी आत्माओं के
39:52लिए खुला है जो वासनाओं का परित्याग कर चुकी है
39:57भगवान की इन परम कल्यानकारी बाते सुनकर गरुड के नेत्रों से प्रेम और कृतग्यता के आसू बहने लगते हैं और
40:04उनका संपूर्ण अस्तित्व आनंदित हो जाता है
40:08प्रभु के मस्तत के पीछे सुदर्शन चक्र अत्यंत मंद गती से घूमते हुए ब्रहमांड की रक्षा और न्याय की अटल
40:16व्यवस्था का निरंतर संकेत दे रहा है
40:20संसार की मोहमाया के पिंजरे को तोड़ कर जब जीव आत्मा स्वतंत्र होती है तो वह एक दिव्य प्रकाश पुंच
40:27बनकर सीधे वैकुंट की ओर उडान भरती है
40:32वैकुंट के इस पावन वातावर्ण में दिव्य कल्प वरिक्ष की पत्तिया भी वायू के मंद जोकों से हिलकर मानो ओम
40:39नमो भगवते वासुदेवाय का मौन गान कर रही है
40:44परंपिता नारायन मंद मुस्कान के साथ गरुड की ओर देखते हैं और संकेट देते हैं कि आने वाले अध्यायों में
40:52वे जीवात्मा की अंतिम यात्रा के और भी गहन रहस्यों को खोलेंगे
40:57भगवान विश्णू के वे चरणकमल जो समस्त स्रिष्टी के विश्राम स्थल हैं और जिनकी सेवा स्वय देवी लक्षमी करती हैं
41:05वे भगतों को भवसागर से पार उतारने की एक मात्र नौका है
41:11इस प्रकार भक्ती और ज्यान का यह अंतिम रहस्य जीव को हमेशा के लिए जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्त कर
41:18परमात्मा के उस परम अविनाशी और दिव्यधाम में स्थापित कर देता है