यमलोक के नरक और निम्न योनियों के बाद, क्या आत्मा को मानव जन्म में भी मिलता है कर्मों का दण्ड? इस एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को 'कर्मविपाक' का वो भयावह रहस्य बताते हैं जहाँ पिछले जन्मों के पाप इस जीवन में भयानक और असाध्य रोगों, शारीरिक विकृतियों और मानसिक पीड़ा के रूप में प्रकट होते हैं। जानिए कौन से पाप शरीर के किन अंगों को प्रभावित करते हैं और क्या इन अदृश्य रोगों से मुक्ति संभव है। यह एपिसोड आपके जीवन की हर बीमारी का गुप्त कारण उजागर करेगा और धर्माचरण का महत्व समझाएगा। #गरुड़पुराण #कर्मविपाक #पुनर्जन्म #पाप #कर्मरोग #हिंदूधर्म #आध्यात्मिकज्ञान #रहस्य #यूट्यूबज्ञान #धार्मिककथाएं #मृत्युकेबाद #असाध्यरोग #मोक्ष
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00:00हे पक्षी राज गरुड, जब एक जीवात्मा करोडों यौनियों के भीशन कष्ट भोग कर पुनह मनुष्य यौनी में प्रवेश करती
00:07है, तब भी उसके पाप कर्मों का अद्रिश्य साया उसका पीछा नहीं छोड़ता।
00:13इस रहस्य में इस सत्य को सुनकर गरुड अत्यंत विस्मित हो उठे और उन्होंने प्रभु से पूछा की मुक्ती मिलने
00:20के बाद भी मनुष्य के शरीर में यह पीडा कैसे शेश रह जाती है।
00:25तब श्रीहरी ने समझाते हुए कहा कि यमलोग के बाहरी दंड समाप्त होने पर भी आत्मा के संचित प्रारब्ध कर्म
00:33उसके गर्भ में प्रवेश करते ही एक अद्रिश्य श्राप की तरह सक्रिय हो जाते हैं।
00:40यह प्रारब्ध कर्म मनुष्य के नए शरीर को स्वस्थ और निरोगी बनाने के बजाए जन्म से ही उसे असाध्य रोगों
00:48और शारिरिक विकृतियों के जाल में जकड लेता है।
00:52गरुर ने उचसुक्ता से पूछा की है दयानिधी वे कौन से विशिष्ट पाप कर्म हैं जो मनुष्य को इस प्रकार
01:00गर्भ से ही भयानक बीमारियों का शिकार बना देते हैं।
01:05भगवान विश्णु के मुख पर गंभीर करुणा के भाव उभे और उन्होंने बताना शुरू किया की कैसे पूर्व जन्म में
01:12किये गए गुप्त पाप ही इस जन्म के गुप्त रोग बनते हैं।
01:17जो मनुष्य अपने पूर्व जन्म में असहार प्राणियों और निर्दोष जीवों को शारिरिक पीडा देकर आनन्दित होते थे, उनका वह
01:25क्रूर कर्म उनके नए जन्म में असाध्य दर्थ का कारण बनता है।
01:30भगवान विश्नु ने समझाया कि कैसे चल और कपट से दूसरों का धन हड़पने वाले अगले जन्म में गंभीर आर्थिक
01:39संकट और शारिरिक दुर्बलता से जूजते हैं।
01:42मानो कर्मों का लेखा जोखा प्रकृती स्वयंकरती हो।
01:46गरुर ने ध्यानपूर्वक सुना, उनके नेत्रों में गहन जिग्यासा और चिन्ता के भाव स्पष्ट थे कि यह ज्यान कितना महत्वपून
01:55और भयावह हो सकता है।
01:58जो लोग निर्दोशों पर जूठे आरोप लगाकर उन्हें अपमानित करते थे, वे अगले जन्म में ऐसे रोगों से ग्रस्थ होते
02:06हैं, जो उनके मुख और वानी को प्रभावित करते हैं, जिससे उन्हें बोलने में अकल्पनिय कठिनाई होती है।
02:14पापो का यह अद्रिश्य बोज आत्मा पर एक अभिशाप की तरह चिपक जाता है, जो समय के साथ शरीर में
02:22रोग बनकर प्रकट होता है, जीवन को एक अंथीन संधर्ष में बदल देता है।
02:28भगवान विश्णू ने आगे बताया कि जो मनुष्य दूसरों के सुख को देखकर इरश्या से जलते थे और उनका अहित
02:36चाहते थे, वे अगले जन्म में शारिरिक जलन और तवचा संबंधी गंभीर विकारों से पीडित होते हैं।
02:44उन्होंने द्रिडता से कहा कि प्रतेक कर्म का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह कितना भी गुप्त क्यों न हो,
02:51ब्रहमांड का न्याय अटल और अप्रिहार्य है।
02:56विशेश रूप से, जो लोग पवित्र स्थानों और धर्म ग्रंथों का अनादर करते थे, उन्हें अगले जन्म में हड्डियों और
03:03जोडों से संबंधित ऐसी बीमारिया घेर लेती हैं, जिनसे उनका शरीर छीन होकर पीड़ा से कराहता है।
03:12कर्मों का यह अद्रिश चक्र, जिसमें हर बुराई एक शारिरिक पीड़ा बनकर लोटती है, जीवन के गूढ रहसियों में से
03:20एक है, जो हमें सतकर्मों की ओर प्रेरित करता है।
03:24फिर भगवान विश्णु ने उन लोगों की बात की, जो दूसरों की पतनी या पती पर कुद्रिश्टी डालते थे या
03:32अनैतिक संबंध बनाते थे, उन्हें अगले जन्म में जन्नांगों से संबंधित असहनिय रोग भुगतने पड़ते हैं।
03:40गरुर ने भवय मिश्रित श्रद्धा से सिर जुकाया, इस गेहन ज्यान को हृदय में धारन करते हुए, जिसकी कलपना भी
03:47उनके लिए कठिन थी।
03:49जो लोग भोजन या जल में मिलावट करके दूसरों के स्वास्थे से खिलवाड करते थे, वे अगले जन्म में पाचन
03:57संबंधी विकारों और रक्त की अशुद्धियों से आजीवन कष्ट पाते हैं।
04:04यह कर्मफल का सिध्धान्त दिखाता है कि कैसे सुक्षम पाप भी अंतह एक स्थूल शारिरिक कष्ट के रूप में सामने
04:11आते हैं, जिसका निवारन अत्यंत कठिन होता है।
04:16विष्णू ने बताया कि जो मनुष्य दूसरों की संपत्ती चीनने या उन्हें धोखा देने के लिए जूठी गवाही देते थे,
04:23उन्हें अगले जन्म में तंत्रिका तंत्र संबंधी गंभीर रोग होते हैं, जिससे उनके अंग निश्क्रिय हो जाते हैं।
04:32उन्होंने समझाया कि कर्म का यह चक्र इतना जटिल है कि केवल पूर्ण आत्म जागरूकता और शुद्ध आचर्ण ही इसे
04:40भेज सकता है और मुक्ती दिला सकता है।
04:44विशेश रूप से जो लोग गुरूओं, ब्राहमनों या पूजनी अव्यक्तियों का अपमान करते थे, उन्हें अगले जन्म में मुक्ता या
04:52सुनने की अक्षमता जैसे दोश मिलते हैं, जिससे वे समाज से कटे रहते हैं।
04:59यह सिद्ध करता है कि वानी और श्रवन का दुरूपयोग अन्त इन्हीं इंद्रियों को निश्क्रिय कर देता है, क्योंकि कर्मों
05:07का न्याय अविचल और सटीक है।
05:10भगवान ने अन्त में कहा कि जो लोग दूसरों को जानबूच कर कश्ट देते थे या किसी की जान लेने
05:17का प्रयास करते थे, वे अगले जन्म में असाध्य रोगों से जूचते हुए अलपायो होते हैं, जीवन भर पीडा सहते
05:25हैं।
05:26गरुर ने गंभीरता से उनकी वाने को आत्मसाथ किया। यह समझकर की कोई भी कर्म, चाहे वह कितना भी छोटा
05:34क्यों न हो, ब्रहमांडिय संतुलन से नहीं बच सकता।
05:38ऐसे पापों का परिणाम व्यक्ति को गर्ब से ही विभिन शारिरिक विकृतियों या भयानक बीमारियों के साथ पैदा करता है,
05:46मानो शरीर स्वय ही कर्मों का दरपन बन गया हो।
05:51विष्णू ने निशकर्ष निकाला कि इस प्रकार मनुष्य के शरीर में व्याप्त रोग केवल भौतिक नहीं, बलकि आत्मा पर अंकित
05:59पूर्व जन्म के पापों के गहरे निशान होते हैं।
06:03विष्णू ने आगे बताया कि कर्मों का यह विधान उन आत्माओं पर भी लागू होता है, जिन्होंने इस जीवन में
06:11गुरुओं और बड़ों का अनादर किया, उनकी शिक्षाओं को तुछ समझा।
06:16गरुर ने उच्सुकता से अपनी गर्दन जुकाई, उनके चहरे पर गुरु शिष्य परंपरा के भंग होने के संभावित परिनामों के
06:23प्रती गहरी चिन्ता और जिग्यासा थी।
06:27भगवान विष्णु ने अपने दिव्य नेतरों से उन्द्रिश्यों को देखा जहां शिष्य अपने गुरुओं के ग्यान और मार्गदर्शन का तिरसकार
06:35करते थे, मानो ग्यान कोई बोज हो जिसे वे फेंक देना चाहते थे।
06:41उन्होंने समझाया कि गुरु का अनादर करना केवल व्यक्ति का अपमान नहीं, बलकि स्वयं ग्यान का अपमान है, जो ब्रह्मान
06:49दिय संतुलन को बाधित करता है और अव्यवस्था फैलाता है।
06:54विश्णु ने बताया कि ऐसे व्यक्ति अगले जन्म में गुंगे पैदा होते हैं, जिनकी वानी छीन ली जाती है क्योंकि
07:02उन्होंने ज्ञान के स्रोत को चुप कराने का प्रयास किया था।
07:06गरुर ने अपनी पंखों को थोड़ा समेटा, यह कलपना करते हुए कि वानी विहीन जीवन कितना कश्ट दायक हो सकता
07:14है, जहां स्वयं की भावनाय भी व्यक्ति न की जा सकें।
07:18उन्होंने एक ऐसे बालक का चित्र प्रस्तुत किया जो जन्म से ही गुंगा था, जिसकी आखें बोलने की कोशिश में
07:26छटपटाती थी, पर मुख से कोई ध्वनी न निकलती थी।
07:30यह मौन केवल आवाज का अभाव नहीं था, बलकि आत्मा पर अनकित पश्चाताप का एक गहरा चिन्ह था, जो उसे
07:38ज्ञान के मूले का स्मरण कराता था।
07:41फिर विश्णों ने उन लोगों की बात की जिन्होंने अपने मातापिता को विशेश कर उनकी वृध्धावस्था में उपेक्षित किया या
07:50उन्हें भावनात्मक पीडा दी।
07:53गरुर ने अपनी द्रिश्टी जुकाई, उनके मन में उन जीवों के प्रती करुणा उमर पड़ी जो संसार में सबसे पवित्र
08:00और निस्वार्थ संबंध को तोड़ते हैं।
08:04ऐसे व्यक्ति अगले जन्म में अंधेपन से ग्रसित होते हैं, उनकी आखे दुनिया की सुन्दर्ता को देखने में असमर्थ हो
08:12जाती हैं, क्योंकि उन्होंने अपने जन्मदाताओं की उपेक्षा की थी।
08:17यह अंधापन केवल भौतिक नहीं, बलकि आत्मा का अंधापन था, जो उन्हें प्रेम और कर्तव्य के प्रकाश से बंचित कर
08:25देता था और उन्हें सही मार्ग नहीं दिखा पाता था।
08:30विष्णू ने बताया कि जिन लोगों ने अपने बड़ों को अपमानित किया या उनकी सलाह को ठुकराया, वे बहरेपन के
08:37अभिशाप से ग्रस्थ होते हैं और दुनिया की ध्वनियों से कट जाते हैं।
08:43गरुर ने अपनी पंखों को कसकर बंद कर लिया, यह कलपना करते हुए कि दुनिया की ध्वनियों से कटे हुए
08:50जीवन में कितना एकाकीपन और अलगाव होगा।
08:54ऐसे व्यक्ति दूसरों की बाते सुनने में असमर्थ होते हैं, मानो प्रकृती उन्हें वह कान देने से इनकार कर देती
09:01है, जिनसे उन्होंने ज्ञान और अनुभव को सुनने से मना किया था।
09:07यह बहरापन एक शाश्वत मौन था, जो उन्हें उस ज्ञान से दूर रखता था जिसे उन्होंने अपने अहंकार में कभी
09:15सुना ही नहीं और जिसके महत्व को कभी समझा नहीं।
09:19अंत में भगवान विश्णु ने उन विश्वास घाती शिश्यों के कर्मफल का वर्णन किया जिन्होंने अपने गुरुओं के साथ चल
09:27किया और उनके विश्वास को तोड़ा।
09:30गरुड की आखे क्रोध और दुख से भर गई क्योंकि विश्वास घात को सबसे जगन्य पापों में से एक माना
09:37जाता है और यह सभी संबंधों को दूशित कर देता है।
09:42ऐसे लोग अगले जन्म में लंगडे या अपंग पैदा होते हैं, उनके कदम दग्मगाते हैं और वे सही मार्ग पर
09:50चलने में अक्षम होते हैं, मानो उनके मार्ग पर ही छल का बोज हो।
09:55विष्णू ने अंत में बताया कि ये शारिरिक विकृतिया मात्र दोश नहीं, बलकि आत्मा पर अंकित कर्मों के गहरे निशान
10:03हैं, जो प्रत्येक जन्म में न्याय का स्मरण कराते हैं।
10:08पक्षियों के राजा गरूर ने उच्सुकता पूर्वक पूछा की अधर्म, चोरी और छल से अरजित धन का परिनाम आक्मा को
10:16किस प्रकार भोगना पड़ता है।
10:19भगवान विश्णु ने शांत और गंभीर मुद्रा में उत्तर देते हुए कहा कि दूसरों का धन और चोरी का सामान
10:27आक्मा के लिए कालकूट विश्के समान होता है।
10:31जो मनुष्य चलकपट या बलपूर्वक दूसरों की जमापूंजी पर अधिकार कर लेते हैं, वे महापाप के सबसे निचले गर्त में
10:39गिरते हैं।
10:41अधर्म से कमाया गया हर एक सिक्का आत्मा के पवित्र प्रकाश को ढखकर उसे घंगोर आध्यात्मिक अंधकार में धकेल देता
10:50है।
10:51विशेश रूप से देवस्थानों या पवित्र मंदिरों के लिए समर्पित धन और दान की वस्तूओं की चोरी करना सबसे बड़ा
10:59महापाप माना गया है।
11:02विश्णू ने गरूर को सचेट करते हुए बताया कि धर्म प्रायन ब्राहमनों और असहाय लोगों का धन छीनने वाला कभी
11:09सुखी नहीं रह सकता।
11:12यग्यक पूजा या लोग कल्यानकारी धार्मिक कारियों के लिए रखे गए अन्न और कोश की चोरी करने वाले का सर्वनाश
11:20निश्चित है।
11:22चोरी किया गया धन इस भौतिक संसार में क्षणिक सुख दे सकता है, किन्तु पर लोग में वह प्रजवलित अगनी
11:29बनकर आत्मा को जलाता है।
11:32यमलोक में भयानक यातनाय सहने के पश्चात ऐसी पापी आत्मा पुन मनुष्य योनी में अत्यंत दरिद रहोकर जन्म लेती है।
11:42पक्षी राज गरुर ने ध्यान पूर्वक सुना कि कैसे पूर्वजन्म की चोरी वर्तमान जन्म में भयानक मुरिसी और भिक्षातन का
11:50कारण बनती है।
11:52उस नए मानव जन्म में वह व्यक्ती भोजन के एक एक दाने के लिए तर्षता है और जीवन भर भयानक
12:00तंधाली में भटकता रहता है।
12:03जिस हाथ ने पूर्वजन्म में अधर्म से दूसरों की संपत्ती चीनी थी, वही हाथ अब तिनके-तिनके और दया के
12:11लिए दूसरों के सामने फैलता है।
12:14केवल दरिद्रता ही नहीं, बलकि चोरी का अशुद्ध पाप शरीर में कुष्ठ रोग और भयानक त्वचा बीमारियों के रूप में
12:22प्रकट होता है।
12:24श्रीहरी ने समझाया कि जो व्यक्ती देवधन या पवित्र सम्पदा का हरण करता है, उसकी काया कुष्ठ रोग से पीडित
12:32होकर गलने लगती है।
12:34रोगी का पूरा शरीर घावों और सफेद दागों से ढख जाता है, जिससे समाज और परिवार के लोग उसे पूरी
12:42तरह त्याग देते हैं।
12:44शरीर की यह सड़ती हुई त्वचा और घाव वस्तुता आत्मा पर अनकित चोरी के अपवित्र दागों का ही भौतिक प्रतिबिन्भ
12:53हैं।
12:54कुष्ट और गंभीर त्वचा रोगों से पीडित मनुष्य जीवन भर असहनिय शारिरिक और मानसिक संताप में तड़पता रहता है।
13:04भगवान विश्णों के इन गभीर वचनों को सुनकर पक्षी राज गरूर का हरिदय कर्मों के इस अटूट न्याविधान से कांप
13:11उठा।
13:13समाज से तिरस्कृत और निरंतर पीडा से कराहता हुआ वह व्यक्ति अपने ही शरीर से घ्रिना करने पर विवश हो
13:20जाता है।
13:21इस प्रकार गरूर पुरान सिखाता है कि इमानदारी से कमाया गया एक तिनका भी चोरी के विशाल सामराज्य से सहसर
13:30गुना श्रिष्ट है।
13:33भगवान विश्णो के वचनों ने गरूर के समक्ष एक और भयावह सत्य का अनावरन किया, जिसमें उन्होंने पवित्र संबंधों के
13:41अपमान और विश्वासघात के अटूट कर्मिक परिनामों का वर्णन किया।
13:45गरूर्द भगवान विश्णों के मुख से व्यभिचार के इन कठोर परिनामों को सुनकर भय और विसमय से स्तंभित होकर उनके
13:54दिव्य मुख मंडल को निहारते हैं।
13:57जो लोग विवाह की पवित्रता को भंग करते हुए वासना के दलदल में धन्स जाते हैं, वे अगले जन्म में
14:04ऐसे रोगों से ग्रस्थ होते हैं जिनसे उनका शरीर घेना का पात्र बन जाता है।
14:10यह उनके कर्मों का फल है जहां वासना के बीज शरीर में गुप्त रोगों के भयानक व्रिक्ष बन जाते हैं।
14:20विश्णू ने आगे समझाया की कैसे विश्वास घात और व्यभिचार न केवल आत्मा को दूशित करते हैं बलकि पुनरजन्म में
14:28भी उसके देह को कलंकित करते हैं।
14:32गरुर ने गहन्ता से सिरहिलाया, उनके दिव्यनेत्रों में एक नई समझ और असीम करुणा का भाव उमड़ाया।
14:40ऐसे लोग जो अपने जीवन साथी को धोखा देते हैं, उन्हें अगले जन्म में गंभीर प्रजन्म अंगोसे संबंधित रोगों या
14:48नपुनसक्ता का सामना करना पड़ता है।
14:52यह एक ऐसी अगनी है जो बाहर से नहीं जलती, बलकी भीतर ही भीतर आत्मा को भस्म करती है, पीडा
14:59के साथ शरीर को क्षीन करती जाती है।
15:03विश्नु के वचन ब्रहमांड के कठोर सत्य की तरह गूंज रहे थे, जिन्होंने पाप के हर कन को उजागर किया।
15:12गरुर ने उत्सुक्ता से पूछा, हे प्रभु, क्या इस भीशन कर्मफल से बचने का कोई मार्ग नहीं।
15:20भगवान विश्नु ने उत्तर दिया कि अनियंत्रित वासना और विश्वासगात से उत्पन्न रोग अकसर व्यक्ती को समाज से बहिश्कृत कर
15:28देते हैं, जिससे वह एकांट और घेना में जीने को विवश होता है।
15:34ऐसे व्यक्तियों को उनके पिछले जीवन के पापों का बोज आजीवन धोना पड़ता है, जो एक अद्रिश्य बेडी की तरह
15:42उन्हें जक्डे रखता है।
15:45यह कर्म का चक्र ऐसा है, जो बिना किसी पक्षपात के अपने मार्ग पर चलता है, और हर आत्मा को
15:52उसके कृत्यों के अनुरूप फल देता है।
15:56गरूर इस गहन सत्य को सुनकर अपने पंखों को धीरे से फैलाते हैं, जैसे वे स्वय इस विशाल ब्रहमांडिय न्याय
16:04को समझने का प्रयास कर रहे हूं।
16:07व्यभिचार से उत्पन्न होने वाली पीडा केवल शारिरिक नहीं होती, बल्कि यह आत्मा को भी अनंत दुहक और गलानी की
16:15गहरायों में धकेल देती है।
16:18विश्वास घात का विश संबंधों को ही नश्ट नहीं करता, बल्कि आने वाले जन्मों में भी प्रेम और विश्वास की
16:25हर संभावना को कुचल देता है।
16:29विश्णू ने चेतावनी दी की जीवन साथी के प्रती निष्ठा का उलंधन एक ऐसा पाप है, जिसका फल पीधियों तक
16:37भुगतना पड़ता है।
16:39गरुर ने भगवान के दिव्यचर्णों में श्रधा से सिर जुकाया, उनके हृदय में धर्म और मर्यादा का महत्व और भी
16:47गहरा हो गया।
16:49इस प्रकार व्यभिचार से उत्पन हुए रोगों का चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक की आत्मा अपने कृत्यों
16:56के लिए प्रायश्चित और शुद्धिकरण के मार्ग पर न चले।
17:01अंत्र केवल सच्ची निष्ठा, प्रेम और संबंधों की पवित्रता का सम्मान ही आत्मा को इस कर्मिक बंधन से मुक्ती दिला
17:09सकता है।
17:11भगवान विश्णू ने अपनी असीम करुणा और ज्ञान के साथ गरुर को कर्मों के एक और गहन पहलू की ओर
17:18निर्देशित किया, जहां वासना से परे, हिंसा और असत्य के बीज भी अगले जन्मों के लिए अद्रिश्य रोगों को बोते
17:26हैं।
17:27गरुर ने श्रद्धा पूर्वक अपने पंक समेटे और भगवान के प्रत्येक शब्द को अपने हृदय में आत्म साथ करते हुए,
17:35अगले जन्मों में कर्मों के सुक्ष्म प्रभाव को समझने के लिए उत्सुक्ता से उनकी ओर देखा।
17:42विश्नु ने समझाया कि जो आत्माय अपने जीवनकाल में अनुचित हिंसा का मार्ग चुनती हैं, वे न केवल दूसरों को
17:50शारिरिक कष्ट देती हैं, बलकि अपनी ही आत्मा पर भी ऐसे घाव छोड़ जाती हैं, जो अद्रिश्य होते हुए भी
17:57गहरे होते हैं।
17:59इन अद्रिश्य कर्मिक धावों का परिणाम अगले जन्म में शारिरिक कमियों के रूप में प्रकट होता है, विशेशकरवानी, गले और
18:08इंद्रियों से संबंधित, जो जीवन भर उन आत्माओं को सत्य बोलने और समझने में बाधा डालता है।
18:16यह कर्म चक्र इतना सूक्ष्म है कि एक छोटा सा जूट भी, जिसे अक्सर तुछ माना जाता है, आत्मा के
18:24अगले जन्म में संचार की क्षमता को प्रभावित करने की शक्ती रखता है।
18:30गरुर ने पूछा हे प्रभु, क्या वानी के दोश भी उसी प्रकार कर्मों के परिणाम है, जैसे शरीर के अन्यविकार
18:38और क्या वे मात्र शारिरिक नहोकर आत्मिक भी होते हैं।
18:44भगवान ने उत्तर दिया किहा, जो आत्माय जानबूच कर जूठी अफवाहे फैलाती हैं, दूसरों की प्रतिष्ठा को हानी पहुचाती हैं,
18:52या कटू शब्दों का प्रयोग करती हैं, वे अगले जन्म में वानी दोशों से ग्रस्थ होती हैं।
19:00उनकी वानी लडखडाती है, उनके शब्द अस्पष्ठ हो जाते हैं, और उन्हें अपने विचारों को स्पष्ठ रूप से व्यक्त करने
19:07में आजीवन संधर्ष करना पड़ता है, मानो उनकी अपनी जीब ही उनके पापों का भार ढो रही हो।
19:15केवल वानी ही नहीं, अपितु इंद्रियों का क्षय भी कर्मों के फल के रूप में प्रकट होता है, विशेशकर उन
19:22लोगों के लिए जो दूसरों की पीडा देखकर भी जानबूच कर आखे मूंद लेते हैं या अनसुना कर देते हैं।
19:30विश्नु ने समझाया कि आतन जूट बोलने वाले और छल कपट में लिप्त रहने वाले अगले जन्म में न केवल
19:38वानी दोश से ग्रसित होते हैं, बलकि उनकी इंद्रिया भी कमजोर पड़ जाती हैं।
19:44ऐसे व्यक्ति सत्य को देखने, सुनने या समझने में असमर्थ होते हैं, जैसे उनकी आत्मा ने पिछले जन्मों में सत्य
19:52से मुह मोड लिया था, वैसे ही अब दुनिया उनके लिए धुन्धली और अस्पष्ट हो जाती है।
19:59उनकी श्रवन शक्तीक्षीन हो जाती है, उनकी दृष्टी मंद पढ़ जाती है और वे संसार के वास्तविक रंगों और ध्वनियों
20:07को पूरी तरह से अनुभव करने में अक्षम हो जाते हैं।
20:12यह सब उन्हें सत्य से दूर रखता है और उन्हें संसार के माया जाल में और अधिक उलजा देता है,
20:20जहां वे कभी भी वास्तविक ज्यान और स्पष्टता प्राप्त नहीं कर पाते।
20:24प्रत्येक असत्य शब्द और प्रत्येक क्रूर कार्य एक अद्रिश कर्मिक रिन बनाता है, जिसे आत्मा को अगले जन्म में अक्सर
20:33अपने ही शरीर और इंद्रियों की सीमाओं के माध्यम से चुकाना पड़ता है।
20:39इस प्रकार सत्य और अहिंसा का मार्ग केवल नैतिक्ता का नहीं, बल्कि आत्मा की स्वतंत्रता और उसके भविष्य के अस्तित्व
20:48की स्पष्टता का मार्ग भी है।
20:51जो लोग इन विकारों के साथ जन्म लेते हैं, वे अपने पिछले जन्मों के पापों का प्रायश्चित कर रहे होते
20:58हैं, उन्हें हर पल अपने कर्मों की याद दिलाते हुए।
21:03गरुर ने गहरी सांस ली, ज्यान की इस धारा ने उसके मन को शुद्ध किया और उसे संसार में सत्य
21:10और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेणा दी।
21:14विष्णु ने समझाया कि इन दोशों से मुक्ती पाने का एक मात्र मार्ग पश्चाताप, सक्ची सेवा और सक्य एव अहिंसा
21:22के सिध्धान्तों का द्रिड़ता से पालन करना है।
21:26केवल तभी आत्मा अपने शरीर और इंद्रियों की कैज से मुक्त होकर स्पष्टता और मुक्ती के मार्ग पर आगे बढ़
21:34सकती है, अपने कर्मों के चक्र को तोड़ते हुए।
21:38और इस प्रकार प्रत्येक शब्द और कार्य का महत्व अनंत काल तक गूंचता है, जो हमारे वर्तमान और भविश्य के
21:46अस्तित्व को आकार देता है एक शाश्वत कर्मिक नरेत्य में।
21:51भगवान विश्नु ने गरूर से कहा, हे पक्षी राज कर्मों का यह खेल मात्र नरक या स्वर्ग तक ही सीमित
21:58नहीं, अपितु यह सुक्ष्म रूप से शरीर के भीतर असाध्य रोगों के बीज बोता है, जिन्हें गुप रोग कहते हैं।
22:06गरूर जो पहले से ही अपने स्वामी की गहरी शिक्षाओं से अभिभूत थे, ने और भी अधिक एकागरता से सुना,
22:14क्योंकि भगवान विश्नु ने इस जटिल रहस्य को उजागर करना जारी रखा।
22:20उन्होंने समझाया कि जब आत्मा पिछले जन्मों में किये गए कई गंभीर पापों का भार उठाती है, तो वह एक
22:27ऐसे मानव शरीर में प्रवेश करती है, जो जन्म से ही असाध्य रोगों और लगातार दुरभाग्य से ग्रस्थ होता है।
22:36यह कर्मिक पीडा एक अग्रिश्य चक्रव्यू की तरह होती है, जिसमें व्यक्ती निरंतर गर्ध, रहस्यमय बीमारियों और लाचारी की गहरी
22:44भावना से घिरा रहता है, जिससे बाहर निकलना असंभव सा प्रतीत होता है।
22:51विश्णू ने आगे कहा कि ये गुप रोग केवल बड़े पापों से ही नहीं, बलकि कई छोटे-छोटे अंदेखे दोशों
22:59के संचय से भी उत्पन होते हैं, जो धीरे-धीरे आत्मा पर एक भारी बोज बन जाते हैं।
23:06गरुर ने नमरता से पूछा, हे प्रभु, क्या ऐसे दोशों का संचय वास्तव में इतने भयानक शारिरिक कश्टों का कारण
23:14बन सकता है, जबकि वे प्रत्यक्ष रूप से उतने गंभीर न दिखें।
23:20भगवान ने उत्तर दिया कि जिस प्रकार जल की बूंदे मिलकर महासागर बनाती हैं, उसी प्रकार छोटे-छोटे पाप यदि
23:28अंगिनत जन्मों तक संचित होते रहें, तो वे एक अद्रिश्य जहर बन जाते हैं, जो शरीर को भीतर से खोखला
23:35कर देता है।
23:37यह संचित भार अंतह एक ऐसे बिंदु पर पहुँच जाता है, जहां यह आत्मा के भौतिक अस्तित्व को असाध्य रोगों
23:45के रूप में प्रकट होकर गंभीर रूप से प्रभावित करने लगता है।
23:51विश्नु ने कुछ विशिष्ट पापों का उल्लेख किया, जैसे निर्दोशों को धोखा देना, जीव हत्या में आनंद लेना, और पराय
23:59धन का हरन करना, जो सीधे तौर पर आंतरिक अंगों को प्रभावित करते हैं।
24:05गरुर के चहरे पर गंभीरता और बढ़ गई, जैसे जैसे उन्होंने उन भयानत परिणामों को समझा जो मानविये दुरबलताओं से
24:14उत्पन होते हैं।
24:16ये पाप भीतर ही भीतर शरीर के महत्वपून अंगों को क्षीन करते हैं, तृदय को क्रोध से, यकृत को लालट
24:24से और फेप्रों को असक्य के भार से ग्रसित करते हुए।
24:28इस आंतरिक शय का परिणाम अक्सर रहस्यमय और लाइलाज बीमारियों के रूप में सामने आता है, जो पीडित को असहनिय
24:37शारिरिक और मानसिक पीडा प्रदान करता है।
24:41इन आंतरिक अफ्लिक्शन्स के कारण, व्यक्ती का शरीर एक जीवित कारागार बन जाता है, जहां हर पल कष्ट और निराशा
24:49का अनुभव होता है, और साधारन जीवन भी असंभव सा लगने लगता है।
24:56गरुर ने गहरी सांस ली, अब उन्हे कर्मों के इस अटूट बंधन और उसके शारिरिक परिणामों की पूरी गंभीरता समझ
25:03आ गई थी।
25:26और गहराई से फसाता चला जाता है, मुक्ती की कोई किरन दिखाई नहीं देती।
25:32विष्णू ने कहा, यह चक्रव्यू एक ऐसा जाल है, जिसे तोड़ने के लिए केवल पश्चाताप, सच्ची सेवा और धर्म के
25:40सिध्धानतों का द्रिड़ता से पालन ही एक मात्र मार्ग है।
25:45केवल तभी आत्मा अपने शरीर और इंद्रियों की कैज से मुक्त होकर स्पष्टता और मुक्ती के मार्ग पर आगे बढ़
25:52सकती है, अपने कर्मों के चक्र को तोड़ते हुए।
25:57एक उजजवल सुनहरी किरण इस अंधकार पूर्ण चक्रव्यू को भेदती हुई दिखाई देती है, जो पश्चाताप और धर्म के पालन
26:05से प्राप्थ होने वाली आशा और मोक्ष का प्रतीक है।
26:09और इस प्रकार आत्मा धीरे-धीरे उस अंधकार में अतीत के बंधनों को तोड़ कर एक शाश्वत मुक्ती और शान्ती
26:17की ओर कदम बढ़ाती है, अपने कर्मों के चक्रव्यू से हमेशा के लिए मुक्त हो जाती है।
26:24भगवान विश्णु अपने अनंत ज्ञान की गहराई से गरूर को समझाते हैं कि कर्मों का प्रभाव केवल शारिरिक कश्टों तक
26:32सीमित नहीं रहता, बलकि आत्मा के आंतरिक सुख और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है।
26:39गरूर जिनके पंख दिव्य प्रकाश में चमक रहे थे, बड़े ध्यान से भगवान के प्रतेक शब्द को ग्रहन करते हैं,
26:48ब्रहमांड के इस गहन रहस्य को समझने का प्रयास करते हुए।
26:52ऐसे व्यक्ति जो पूर्व जन्मों में दूसरों की निंदा करते थे, विश्वास घात करते थे या समाज में कलह फैलाते
27:00थे, उन्हें इस जीवन में गहन सामाजिक बहिशकार का सामना करना पड़ता है।
27:07उनकी आत्मा को एक अनकही रिक्तता धेर लेती है, जहां वे भीड में भी अकेलेपन का अनुभव करते हैं, निरंतर
27:15अस्वीकृती के बोज तले दबे रहते हैं।
27:19ब्रहमांड के स्वामी अपनी दिव्य आभा से प्रकाशित आगे बताते हैं कि यह पीडा मात्र सन्योग नहीं, बलकि कर्मों का
27:27अचूप प्रतिफल है।
27:30भगवान विश्नु अपने मुखमंडल पर शांत गंभीरता लिये हुए, गरुर को समझाते हैं कि यह न्याय का एक अटल नियम
27:38है, जिससे कोई भी बच नहीं सकता।
27:41उनके हर प्रयास में असफलता उनका पीछा करती है, जैसे कोई अद्रिश्य छाया हर कदम पर बाधा उत्पन्न कर रही
27:49हो।
27:51मन का यह गुप रोग धीरे-धीरे उनके भीतर एक गहरी मानसिक पीडा को जन्म देता है, जो उन्हें भीतर
27:58ही भीतर खोखला करती जाती है।
28:12भगवान विश्नु अपने मुखमंडल पर शांत गंभीरता लिये हुए, गरूर को समझाते हैं कि यह न्याय का एक अटल नियम
28:20है, जिससे कोई भी बच नहीं सकता।
28:24जिन्होंने दूसरों के विश्वास को तोड़ा था, उन्हें अपने जीवन में बार-बार धोखे का अनुभव होता है, जिससे रिष्टों
28:32की नीम हमेशा अस्थिर बनी रहती है।
28:35उनके संबंध ऐसे नाजुक कांच की तरह होते हैं, जो जरा से आगहात से बिखर जाते हैं, जिससे उन्हें भावनात्मक
28:44अलगाम की गहरी चोट लगती है।
28:47इस प्रकार ब्रहमांड की अग्रिष्य शक्ती न्याय का चक्र चलाती है, जहां प्रत्यक क्रिया का एक समान और विप्रीत परिनाम
28:55होता है।
28:57गरुड अपने दिव्य चक्षूओं से इस सत्य को देखते हुए, मानवता के लिए भगवान के इन गूड वचनों को हृदय
29:05में धारण करते हैं।
29:07वे निरंतर स्वीकृती और प्रेम के लिए तरस्ते हैं, परंतु हर द्वार उनके लिए बंद प्रतीत होता है, एक अन्थीन
29:15खोज में भटकते हुए।
29:18अतीत के पापों की छाया उनके वर्तमान को इस कदर घेर लेती है कि वे अपने भीतर की खुशियों को
29:25भी अनुभव नहीं कर पाते।
29:28परंतु भगवान स्पष्ट करते हैं कि यह दंड स्थाई नहीं, बलकि आत्मशुधी और परिवर्तन के लिए एक अफसर है।
29:37भगवान विश्णु अपने शान्त और दिव्य मुस्कान के साथ गरूर को बताते हैं कि सच्चे पश्चाताप और धर्म के मार्ग
29:45पर चलने से यह कर्मबंध भी तूट सकते हैं।
29:49जब आत्मा अपने कुकर्मों का प्रायश्चित करती है और सदाचार को अपनाती है तो वह धीरे-धीरे इस मानसिक और
29:57सामाजिक कारावास से मुक्त होने लगती है।
30:01और इस प्रकार कर्मों के इस गहरे निशान से मुक्ती पाकर आत्मा अंत्ता आंतरिक शांती और स्विकृती के एक नए
30:10युग में प्रवेश करती है, अपने शुद्ध स्वरूप को पुनह प्राप्त करते हुए
30:15गरूर के व्याकुल प्रश्णों को सुनकर भगवान विश्णु अपने शांत और करोनामई मुख मंडल पर एक मंद मुस्कान लाते हुए
30:24वैकुंठ लोग के इस परम पावन वातावर्ण में मुक्ती का मार प्रशस्त करते हैं
30:30भगवान विश्णु गरूर की ओर देखते हुए प्रेम पूर्वक समझाते हैं कि यद्यपी कर्मों के रोग अत्यंत भयानक हैं किन्तु
30:38सच्चे पश्चाताप और प्रायश्चित की अगनी से इन्हें पूरी तरह भस्म किया जा सकता है
30:45इस सांसारिक जीवन में औश्धिया केवल शारिरिक लक्षणों को दबा सकती हैं परंतु कर्मजनित रोगों का समूल नाश केवल मन,
30:54वचन और कर्म से की गई सच्ची शुद्धी से ही संभव है
30:59जब कोई आत्मा अपनी पूर्व की गई कुरूरताओं और पापों को स्विकार कर हृदै से क्षमा मांगती है तो उसके
31:06भीतर का संचित अंधकार इश्वरिय प्रकाश में विलीन होने लगता है
31:12नारायन बताते हैं कि पवित्र नदियों में पूर्ण श्रधा के साथ किया गया स्नान और वैदिक मंत्रों का उच्चारण आत्मा
31:20पर जमे पापों के मैल को धीरे-धीरे धोने लगता है
31:25अपने चतुर्भुज रूप में सुदर्शन चक्र और शंक धारन की ये प्रभु विश्नु स्पष्ट करते हैं कि बिना कपटके किया
31:32गया दान सबसे बड़ा प्रायश्चित है जो दरिद्रता और व्याधियों के चक्र को तोर देता है
31:40भूखों को अंदेना, प्यासे को जल पिलाना और असहाय प्राणियों को आश्रे प्रदान करना सीधे नारायन की सेवा के समान
31:48है जो क्रूर प्रारब्ध को भी कोमल बना देता है
31:53जैसे ही धर्म और पुन्य के कार्य संचित होते हैं, वैसे ही कर्मों के वे सुक्ष्म विशैले प्रभाव जो बीमारियों
32:00का रूप लेते हैं, अपना बल्ख होने लगते हैं
32:05शास्त्रों में वर्नित विशिष्ट अनुष्ठानों और यग्यों का आयोजन करने से वातावर्ण में एक दिव्य कमपन उत्पन होता है, जो
32:13रोग उत्पन करने वाले अग्रिश्य नकारात्मक तत्वों को नश्ट कर देता है
32:19भगवान विश्णों की इन कल्यानकारी बातों को सुनकर पक्षी राज गरुड के नयन कृतज्यता के आसूँ से भर जाते हैं
32:27और वे उनके श्रीचर्णों में पुनह शीष जुकाते हैं
32:31मौन रहकर मन को परमात्मा में विलीन करना और प्रानायाम के माध्यम से प्रानवायु को शुध करना, शरीर के भीतर
32:39के समस्त कर्मिक रोगों की अचुक औशधी है
32:44जब प्राण और मन पूरी तरह शुद्ध हो जाते हैं, तो शरीर के भीतर मौजूद दिव्य उर्जा चक्र जागरत होकर
32:51समस्थ शारिरिक और मानसिक व्याधियों को बाहर निकाल फैंकते हैं
32:56प्रभो आगे बताते हैं कि एकांत में बैठकर अपनी भूलों का मनन करना और भविश्य में कभी भी पाप न
33:04करने का द्रिड संकल्प लेना ही वास्तविक पश्चाताप का प्रारंभ है
33:09नारायन अपनी मधुर्वानी में कहते हैं कि जो मनुष्य अहंकार का त्याग कर स्वयं को पूर्णत है इश्वर को समर्पित
33:17कर देता है उसके प्रारब्ध का भार स्वयं भगवान वहन कर लेते हैं
33:23श्रद्धा पूर्वक मंदिर की चौखट को चूमना तुलसी दल से भगवान का अर्चन करना और निरंतर हरी नाम का संकीर्तन
33:31करना आत्मा को रोगों के बंधन से मुक्त कराता है
33:36इस परम भक्ती के प्रभाव से संचित कर्मों की वे अद्रिश्य जन्जीरें जो जीवात्मा को जन्म जन्मांतर से जक्रे हुए
33:44थी एक एक कर तूटकर बिखर जाती है
33:48जो मनुष्य इस सत्य को जानकर धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है उसका वर्तमान जीवन तो सुखमय बनता ही
33:55है
33:56साथ ही उसके आगामी जन्म भी रोगों और कश्टों से सर्वता मुक्त हो जाते हैं
34:02गरूर को पूर्ण संतुष्ट देखकर भगवान विश्णु अपने अंतिम संदेश में कहते हैं कि धर्म का आचर्ण ही मनुष्य का
34:11सबसे बड़ारक्षक और परम औश्धी है
34:15इस परम ज्यान को प्राप्त कर गरूर इस दिव्य संदेश को समस्त लोकों में प्रचारित करने का संकल्प लेते हैं
34:22ताकि मानव जाती कर्मों के इस अद्रिश्य प्रकोप से बच सके
34:27इस प्रकार गरूर पुराण का यह पावन अध्याय हमें सिखाता है कि हमारे द्वारा किया गया हर छोटाब्रा कर्म ही
34:35हमारे स्वास्थ्य और भाग्य का निर्माता है और धर्म ही परम सत्य है
34:41वैकुंठ लोग की इस पावन और दिव्य आभा के बीच भगवान विश्नु और पक्षीराज गरूर के मध्य चल रहा यह
34:48महान समवाद अब अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश करता है
34:55भगवान विश्नु अपने मंध हास्य के साथ गरूर की ओर देखते हुए कहते हैं कि वर्तमान मानव जीवन ही वह
35:03एक मात्र माध्यम है जिसके द्वारा जीव अपने प्रारब्ध के चक्रव्यू को पूरी तरह भेज सकता है
35:11भगवान समझाते हैं कि यद्यपी पिछले कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है लेकिन वर्तमान में किये गए नए धर्म
35:19प्रायन कार्य पुराने पापों के प्रभाव को कम करने की अध्भुत शक्ती रखते हैं
35:25सचेत रूप से धर्म का मार्ग चुन्ने और असहायों की निस्वार्थ सेवा करने से मनुष्य की आत्मा पर जमे हुए
35:33पिछले जन्मों के काले मैल धीरे-धीरे धूलने लगते हैं
35:38वैकुंट के शांत और अलौकिक वातावर्ण में गूंजती हुई नारायन की वानी यह स्पष्ट करती है कि भक्ती और आत्मग्यान
35:46ही संसार सागर से पार उतरने के दो सबसे मजबूत स्तंभ हैं
35:52गरुड अपने पंखों को समेटे अत्यंत विनमरता पूर्वक सुनते हैं क्योंकि उन्हें समझहाता है कि वर्तमान ख्षन में लिया गया
36:01एक भी सही निर्णय भविश्य की दिशा को बदल सकता है
36:05जब कोई मनुश्य निस्वार्थ भाव से भगवान का स्मरण करता है तब उसके मस्तिश्क में सकारात्मक तरंगे उत्पन होती हैं
36:14जो शरीर की आनुवन्शिक बीमारियों के कारणों को भी नश्ट कर सकती है
36:20यह दिव्य संदेश उस दीपक की भांती है जो अंधकार्मय काल कोठरी में भी प्रकाश फैला कर अज्ञान और भय
36:28के सारे जालों को सदा के लिए समाप्त कर देता है
36:33ब्रहमांड के इस सर्वोच पावन धाम में देवगण भी इस अद्भुत ज्यान को सुनकर हर्शित हो रहे हैं कि मनुष्य
36:40अपने भाग्य का स्वया विधाता बन सकता है
36:44भगवान विश्णु अपने मुख मंडल पर एक अनंत करुणा का भाव लाते हुए गरूर को समझाते हैं कि कर्मों का
36:51यह विध्यान किसी को डराने के लिए नहीं बलकि सचेट करने के लिए है
36:57जो मनुष्य वर्तमान में प्रतिदिन सत्संग करता है उसका मन स्वतह ही पाप कर्मों की ओर जाने से रुक जाता
37:05है और वह धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है
37:09यह ठीक उसी तरह है जैसे एक बंजर भूमी पर निरंतर मीठा जल छिड़कने से वहाँ पुनह सुन्दर और सुवासित
37:17पुष्प खिलने लगते हैं
37:20भगवान विश्णु के वचनों की पावन तरंगे पूरे वैकुन्थ लोक में एक अपूर्व शान्ती और परम संतोष का संचार कर
37:28रही है
37:30पक्षी राज गरूड अपने दोनों हाथ जोड कर शीश जुकाते हैं और इस दिव्य रहस्य को हृदय में धारण कर
37:37अत्यंत कृतग्यता का अनुभव करते हैं
37:41भगवान विश्णु आशिरवाद की मुद्रा में अपना दाहिना हाथ उठाते हैं जिससे गरूड के चारों और एक सुरक्षात्मक स्वर्णिम चक्र
37:50निर्मित हो जाता है
37:53इस प्रकार वर्तमान कर्मों की यह नई आशा मृत्यू के भय को मिटा कर जीवन को एक नई और पवित्र
38:00दिशा की ओर मोर देती है
38:03वैकुंठ लोग का यह अलौकिक द्रिश अत्यंत मनोहारी है जहां संपूर्ण स्रिष्टी की सकारात्मक उरजाएं एकत्रित होकर इस पावन प्रवचन
38:13के समापन का स्वागत कर रही है
38:16भगवान विश्णु मुस्कुराते हुए कहते हैं कि जो भी जीव इस गरुर पुराण के संदेश को सुनेगा और उसे अपने
38:24जीवन में उतारेगा वह जन्ममर्ण के बंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाएगा
38:30गरुर अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपने विशाल पंखों को फैलाते हैं और उनका हृदय समस्त मानव जाती के कल्यान की
38:38कामना से भर जाता है
38:41और इस दिव्य संदेश के साथ गरुर पुरान का यह पावन अध्याय समाप्थ होता है जो हमें अंधकार से प्रकाश
38:49की ओर और पाप से मोक्ष की ओर ले जाने का मार्ग दिखाता है