यमराज के दरबार से दंडित होने के बाद, पापी आत्मा को नरक के सबसे भयावह लोकों में घसीटा जाता है। इस एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को महाघोरव, कुंभीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन और अंधकूप जैसे पांच अत्यंत क्रूर नरकों की हृदयविदारक यात्रा का वर्णन करते हैं। आत्मा यहाँ अपने जघन्य पापों के अनुसार उबलती है, जलती है, कटती है और भयानक जीवों द्वारा नोची जाती है। हर पीड़ा आत्मा को उसके कर्मों का सीधा परिणाम दिखाती है, जहाँ कोई भी बच नहीं सकता। यह सिर्फ शुरुआत है! क्या आत्मा कभी इन भीषण यातनाओं से मुक्त हो पाएगी? देखें 'गरुड़ पुराण' के इस नए एपिसोड में। #गरुड़पुराण #GarudaPurana #नरक #यमराज #Karma #पाप #पुण्य #आत्मा #मृत्यु #हिंदूधर्म #पुराण #यूट्यूब #mythology
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00:00पिछले नरक की आतनाओं से क्षीन हुई पापी आत्मा को यमदूत अब और भी वीरान तथा भयावह महागोरव नरक की
00:07ओर घसीटते हुए ले जाते हैं, जहां की भूमी पर केवल कंकड और जलते हुए अंगारे बिखरे हैं.
00:15आत्मा भय से कापती है, जैसे जैसे वह इस निर्जन प्रदेश में आगे बढ़ती है, उसके कानों में अंगिनत पीडित
00:23आत्माओं की चीखें और कराहें अधिक स्पष्ट रूप से गूंजने लगती हैं.
00:29इसी बीच, शीर सागर के शांत जल पर, भगवान विश्नु अपनी दिव्य मुस्कान और गंभीर ग्रिष्टी के साथ गरूर की
00:37जिग्यासा को शांत करते हुए आगे के नर्कों का वर्णन जारी रखते हैं.
00:43भगवान विश्नु गरूर को बताते हैं कि यह महागोरव नरक उन अभागे आत्माओं के लिए आरक्षित है, जिन्होंने दूसरों को
00:51पीड़ा पहुचा कर आनंद लिया और बिना किसी पश्चाताप के अपार कष्ट दिये.
00:57गरूर उनके शब्दों को सुनकर भय और करुना से भर जाते हैं, यह कल्पना करते हुए कि ऐसी आत्माओं को
01:05किस असहनिय यात्ना का सामना करना पड़ता होगा.
01:09यमदूत पापी आत्मा को एक ऐसे रास्ते पर धकेलते हैं, जो गहरी और अधिक भयावह होती जाती है, जहां की
01:17हवा में जलते हुए मास और गंधक की दुरगंध सघन रूप से व्याप्त है.
01:23अब महागोरव का असली रूप सामने आता है, एक विशालकाय, बंजर भूमी जो नुकीले, काले पत्थरों और भयानक दरारों से
01:32भरी है, जिसके क्षितिच पर अंथीन आग की लप्टे नाच रही हैं.
01:38आत्मा क्षितिच पर अंगिनत अन्य आत्माओं को देखती है, जो असहनिय दर्ग में छटपटा रही हैं, उनकी अस्पष्ट आकृतिया जलती
01:47हुई भूमी पर संधर्ष कर रही हैं.
01:50एक पापी आत्मा, जिसे काले रंग के लोहे के काटों से जड़े चाबुक से बेरहमी से पीटा जा रहा है,
01:57उसकी दर्गनाक चीख वातावर्ण को और भी भयावा बना देती है.
02:03यम्दूत वर्तमान आत्मा को बिना किसी दया के आगे धकेलते हैं, उसे उन सभी भयानक ग्रिश्यों और ध्वनियों से गुजरने
02:11पर मजबूर करते हैं, जो उसके आने वाले भविश्य का संकेत देती हैं.
02:18अचानक वे एक विशाल, गहरे और धधकते हुए कुंड के किनारे पहुँचते हैं, जहां से भीशन गर्मी की लप्तें और
02:25भयानक चीखें उठ रही हैं.
02:29भगवान विश्यों बताते हैं कि यह अगाध कुंड है, जो नरक का वह हृदय है, जहां पापी आत्माओं को उनके
02:36किये गए पापों के अनुसार उबाला, जलाया और काटा जाता है.
02:42गरुर का चहरा भयावह विवर्ण सुनकर भय और करुणा के एक मिश्रन से पीला पड़ जाता है, उनकी आखें सदमे
02:50से चौड़ी हो जाती हैं.
02:53आत्मा कुंड के भयानक रूप को देखकर चीखती है और पीछे हटती है, लेकिन यमदूतों की क्रूर पकड़ उसे हिलने
03:01भी नहीं देती.
03:03यमदूत कुरूरता पूर्वक आत्मा को कुंड के किनारे पर घसीटते हैं, जहां से उबलते हुए लावा की भयंकर गर्मी उसे
03:11जुलसा रही है.
03:14आत्मा अपने अस्तित्व के अंतिन क्षणों में एक मूख याचना करती है, उसकी आखें यमदूतों में किसी दया की तलाश
03:21करती है, जो व्यर्थ है.
03:25बिना किसी हिचकी चाहट के, यमदूत आत्मा को धधकते हुए कुंड के भयानक मुख में धकेल देते हैं, जहां से
03:32एक गहरी गड़गडाहट और चीखें निकलती हैं.
03:37भगवान विश्णू इस भयानक क्षण के साक्षी करुना से भरे एक गंभीर भाव के साथ न्याय की कठोरता पर चिंतन
03:45करते हैं.
03:47आत्मा धधकते हुए कुंड के भीतर गिरती है, जहां उबलते हुए लावा और तीखे शूल उसका स्वागत करते हैं, उसके
03:55अस्तित्व को टुक्रे टुक्रे करने को तैयार.
03:59जैसे ही आत्मा कुंड के खौलते हुए तरल में डूबती है, उसकी देह जलने, पिघलने और कटने लगती है, जिससे
04:07एक अविश्वस्निय अंथीन दर्द की शुरुवात होती है.
04:12खौलते हुए कुंड के भीतर, आत्मा का सूक्ष्म शरीर अनवरत जलता, पिघलता और कट्ता रहता है, जिससे हर क्षण एक
04:20अकलपनिय गहन पीडा उत्पन होती है, जो उसे पूरी तरह से निगल लेती है.
04:27वेदना की प्रतेक लेहर के साथ आत्मा छट पटाती है, अपनी नश्वर देह के अंतिम अवशेशों को बचाने के लिए
04:35व्यर्थ प्रयास करती है, किन्तु यह यातना अंथीन चक्र में फंसी रहती है.
04:41अचानक कुंड के तल से एक भयानक कमपन उठता है, जैसे कोई प्राचीन और दुष्ट शक्ती गहरे पाताल से जागरित
04:49हो रही हो, जिससे आसपास की धर्ती थर्रा उठती है.
04:54लावनमय तरल में विशाल बुलबुले फूटते हैं, और फिर कुंड के केंदर में भयावध दरारे दिखाई देने लगती हैं, जिनसे
05:02अंधेरे और दुरगंध का भयानक मिश्रन उपर उठता है.
05:07इन दरारों से असंख्य विक्रित मानसाहारी कीडे, जिन्हें रुरु कहा जाता है, उभरना शुरू करते हैं, उनके शरीर एक घातक
05:16दुरभावना पूर्ण इरादे से चमक रहे होते हैं.
05:21प्रत्येक रुरु का आकार भयानक है, उसके शरीर पर तीखे कांटे और नुकीले पंजे लगे हैं, जो शिकार को पकड़ने
05:29और चीरने के लिए बने हैं.
05:32वे एक सामुहिक करकश धोनी निकालते हैं, जो नरक की गहराईयों से गूंजती है, जिससे आत्मा का दिलभय और आतंक
05:41से भर जाता है.
05:43उनकी असंख्य लाल चमकती आखें सीधे पीडित आत्मा पर टिक जाती हैं, जैसे भूखे शिकारी अपने असहाई शिकार को घूर
05:52रहे हूं.
05:53एक पल में रुरु का जुन्ड अविश्वस निय गती से आत्मा की ओर जपटता है, उनकी भुजाए और पंजे लक्षे
06:01को भेदने को तयार होते हैं.
06:04वे आत्मा के सुक्षम शरीर से चिपक जाते हैं, उनके कांटेदार पैर और नुकीले जबडे उसके अस्तित्व के हर धागे
06:12को कसकर पकड़ लेते हैं.
06:15फिर वे आत्मा के सुक्षम मास को नोचना और खाना शुरू करते हैं, जिससे एक ऐसी अकल्पनिय पीडा होती है,
06:23जो उस दर्द को दर्शाती है, जो आत्मा ने अपने नश्वर जीवन में दूसरों को पहुँचाया था.
06:30यह पीडा केवल शारिरिक नहीं, बलकि आत्मिक है, क्योंकि रुरू आत्मा के अहंकार और पापों को भी साथ ही निगलते
06:38हैं, उसे भीतर से खोखला करते हुए.
06:42इस भयानक द्रिश्य को देखकर, भगवान विश्नु अपनी असीमित करुणा और ज्ञान के साथ न्याय की कठोर्ता पर गंभीर भाव
06:51से चिंतन करते हैं.
06:54भगवान विश्नु गरूर को सम्बोधित करते हुए, इस विशेश प्रकार के नरक्की यातना के पीछे के विशिष्ट पाप का वर्णन
07:02करना शुरू करते हैं.
07:04वे कहते हैं, गरूर यह यातना उन आत्माओं के लिए है, जिन्होंने दूसरों को भारी शारिरिक और मानसिक पीड़ा पहुचा
07:13कर स्वयं को सम्रिद्ध किया, उनके दुखों पर अपना महल खड़ा किया.
07:18उनके पापी कर्मों का फल है यह रुरू की यातना, जहां उनका सुक्ष्म शरीर उनहीं कीडो द्वारा खाया जाता है,
07:26जिन्होंने उनके पीडितों के आसुँँँपर पोशित किया था.
07:30नरक के इस अगाध कुंड में रुरू अपने नुकीले पंजों और जबडों से आत्मा के कंकन को चीरते रहते हैं,
07:38प्रत्येक्षन उसे भीशन पीड़ा देते हैं.
07:42आत्मा चीखती है, कराहती है और विलाप करती है, किन्तु उसकी आत्नाओं का कोई अंत नहीं है, यह उसके नश्वर
07:51जीवन के अमानविय कृत्यों का सीधा प्रतिबिम्भ है.
07:55यह वह स्थान है जहां दूसरों के आसुओं पर बना सामराज्य तूटता है, और पापी आत्मा को अंत्ह अपनी ही
08:03क्रूरता के भयंकर चक्र में उलजना पड़ता है.
08:07भगवान विश्णु का गंभीर स्वर गूंजता है, इस प्रकार प्रत्येक पाप का उचित दंड मिलता है, और कोई भी प्राणी
08:15कर्म के अटल नियम से बच नहीं सकता.
08:19महागोरव नरक की भयावता से खीचते हुए, क्रूर यमदूत पापी आत्मा को एक ऐसे मार्ग पर घसीटते हैं, जहां की
08:27हवा केवल असहनिय गर्मी और घोर अंधकार से भरी हुई है.
08:33जैसे जैसे वे आगे बढ़ते हैं, जलते हुए मास की तीखी और दम घोंटने वाली दुरगंध हवा में फैल जाती
08:40है, जो आने वाले भयंकर कश्टों का संकेट देती है.
08:45तभी पापी आत्मा के सामने उबलते हुए तेल और खौलते हुए रक्ट से भरे विशाल और विक्राल कड़ाहों की एक
08:53अनंत श्रिंखला दिखाई देती है.
08:56इन विशाल कड़ाहों के भीतर अन्गिनत अन्य पापी आत्माएं उबल रही हैं और उनके असहनिय दर्द से पैदा हुई चीखों
09:04का कोलाहल पूरे पाताल को बहरा कर रहा है.
09:08क्रूर यमदूत पापी की तडप को देखकर अट्थास करते हैं और उसके गले में बंधी जलती हुई लोहे की जनजीरों
09:16को और अधिक कस देते हैं.
09:19कड़ाही के किनारे खड़े होकर वह भयभीत आत्मा नीचे उबलते हुए भयानक तेल को देखती है और अपनी मुक्ती के
09:27लिए गिड़गिडाने लगती है.
09:30बिना किसी दया के एक विशालका यमदूत उसका पती हुई आत्मा को अपनी मजबूत बाहों में हवा में उपर उठा
09:38लेता है.
09:40एक भीशन गर्जना के साथ यमदूत उस पापी को सीधे उस खौलते और उबलते हुए तेल के गहरे कुंड में
09:48फैंक देता है.
09:51उबलते तेल में गिरते ही उस आत्मा की त्वचा तुरंक जुलसने और पिघलने लगती है, जिससे उसकी दर्दनाक चीखे गूँज
09:59उठती है.
10:01जब वह आत्मा सांस लेने के लिए सतह पर आने का प्रयास करती है, तो यमदूत उसे अपने नुकीले भालों
10:09से वापस नीचे धकेल देते हैं.
10:12वैकुंठ लोग से इस हृदय विदारक द्रिश्य को देखते हुए, भगवान विश्नु के वाहन पक्षीराज गरूर का हृदय गहरे दुख
10:20और आश्चर्य से भर जाता है.
10:23अत्यंत श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़कर गरूर भगवान विश्नु की ओर मुरते हैं और इस अत्यंत क्रूर नरक्के उद्देश के बारे
10:32में पूछते हैं.
10:34गरूर के प्रश्न को सुनकर जगत के पालनहार भगवान विश्नु अपने गंभीर और मधुर स्वर में कुम्भी पाक नरक्के रहस्य
10:42को उजागर करते हैं.
10:45भगवान विश्नु बताते हैं कि जो मनुष्य अपने सांसारिक जीवन में निर्दोश पशूओं की हत्या करते हैं या उन्हें स्वाद
10:53के लिए जीवित उबालते हैं, वे यहां आते हैं.
10:58प्रित्वी पर दूसरों के जीवन को नश्ट कर अपनी भूख मिटाने वाले करूर मनुष्यों को यहां उसी खौलते हुए तेल
11:05का स्वाद चखना पड़ता है.
11:09भगवान आगे कहते हैं कि जो लोग विश्वास घात करते हैं और असहाय प्राणियों पर अत्याचार करते हैं, वे इस
11:17कुम्भी पाक के उबलते कुंड में युगों तक जलते हैं.
11:21कुंडों के चारों और खड़े यमदूत विशाल लोहे के कर्चों से उस उबलते हुए तेल को लगातार चलाते रहते हैं,
11:29ताकि कोई भी पापीक्षन भर के लिए भी राहत न पा सके.
11:34इस नरक की विशेष्टा यह है कि अत्यधिक जलन से आत्मा का सुक्ष्म शरीर नश्ट तो होता है, किन्तु कर्मों
11:41के भोग के लिए वह तुरंत पुना नया शरीर धारन कर लेता है.
11:47असहनिय पीडा से तड़पती हुई आत्मा आकाश की ओर देख कर रोती है, और उसे अपने नश्वर जीवन में किये
11:54गए सभी क्रूर कर्म याद आने लगते हैं.
11:59भगवान विश्णु निश्कर्ष निकालते हैं कि कुम्भी पाक की यह अगनी वास्तव में पापी के अपने ही कर्मों की आच
12:06है, जो अन्ता आत्मा को शुद्ध करने के लिए जलती है.
12:11भगवान विश्णु ने आगे बताया कि यह शुद्धी की प्रक्रिया अत्यंत क्रूर और हृदय विदारक है, जहां प्रत्यक्षन आत्मा को
12:20उसके कर्मों का गहन्तम बोध होता है.
12:24कुम्भी पाक के दहकते तेल में पापी आत्मा का सुक्षम शरीर बार-बार विगलित होकर पुन्ह बनता है, मानो अंगिनत
12:32बार मृत्यु का स्वात चखा रहा हो.
12:35जैसे ही आत्मा तेल की प्रचंड उश्मा को स्पर्श करती है, उसका अस्तित्व एक चीख में सिमट जाता है और
12:43शरीर के कणकण भस्म होने लगते हैं.
12:46किन्तु कर्मों का बंधन इतना प्रबल है कि भस्म होते ही पीडा के एक और चक्र के लिए वह पुन्ह
12:53एक अद्रिश्य बल द्वारा आकार ग्रहन कर लेती है.
12:58यह पुनरजन्म तुरंथ होता है, ताकि आत्मा को कभी भी इस भयानक यातना से मुक्ती का क्षणिक सुख भी प्राप्त
13:06न हो सके.
13:08भगवान विश्णू ने गरूर से कहा, यह कुम्भी पाक की अगनी विशेश रूप से उन पापी जीवों के लिए है,
13:15जिन्होंने स्वात की लालसा में निरीह प्राणियों का वद किया.
13:19उन्होंने यह भी कहा, और यह उनकरूर मनुश्यों के लिए भी है, जिन्होंने केवल अपने स्वार्थ के लिए निर्दोशों को
13:27कष्ट पहुँचाया और उनका शोशन किया.
13:30तेल की प्रत्येक बून्द पापी के उनकर्मों का प्रतिरूप है, जो उसने अपने जीवन काल में दूसरों को कष्ट पहुँचाने
13:38के लिए किये थे.
13:40आत्मा की चीखें नरक की दीवारों से टकरा कर लौटती हैं, जिससे उसे अपने जीवन के हर बुरे कृत्य की
13:47यादें बार-बार कचोटती हैं.
13:51उबलता हुआ तेल उसकी सूक्षम इंद्रियों को जलाता है, जिससे स्पर्ष, ग्रिष्टी और श्रवन की सभी भावनाएं एक अविश्वस्निय दर्द
14:00में रूपांतरित हो जाती हैं.
14:03यहां की यातनाक्षनिक नहीं, अपितु युगों तक चलने वाली है, जब तक की कर्मों का प्रत्येक अंश पूरी तरह से
14:10भस्म न हो जाएं.
14:12गरुड इस भीशन ग्रिष्य को देखकर विचलित हुए, उनके दिव्य पंखों में एक सिहरन दोड़ गई और उनकी आखें करुणा
14:20से भर गई.
14:22परंतु भगवान विश्नु अपने शांत और गंभीर मुख मंडल के साथ इस दंड के पीछे के नियाय को समझाते रहे,
14:30क्योंकि वे धर्म के शाश्वत नियम को जानते थे.
14:34उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल प्रतिशोध नहीं, अपितु आत्मा को उसके पापों से मुक्त करने और अंत्ध उसे शुद्ध
14:42करने की एक जटिल प्रक्रिया है.
14:46प्रत्येक विगलन और पुनरजन्म के साथ आक्मा से पाप का एक और परत धीरे-धीरे छंटता है, जैसे गंदगी पानी
14:54से धुल जाती है.
14:56पापी को महसूस होता है कि यह अगनी बाहरी नहीं, बल्कि उसके स्वयं के भीतर सुलग रही थी, जो अब
15:04प्रचंड रूप ले चुकी है.
15:07सुक्ष्म शरीर के बार-बार विग्टन से पापी का अहमकार और मैं की भावनाभी क्षण प्रतिक्षण खंडित होती जाती है.
15:16अंत्र पीडा की पराकाश्था पर आत्मा अपने किये गए कर्मों की पूर्न जवाब देही को स्विकार करती है, जो मुक्ती
15:24की दिशा में पहला कदम है.
15:28यद्यपी यह कुम्भी पाक की यातना अत्यंत भीशन है, तथा पी यह नरक के अनेक लोकों में से एक है,
15:35और आत्मा की यात्रा अभी बहुत लंबी है.
15:39भगवान विश्नु ने गरूर से कहा, इसलिए हे गरूर धर्म का पालन करना ही इस संसार में सबसे बड़ा कर्तव्य
15:46है, ताकि ऐसी भयानक पीडाओं से बचा जा सके.
15:51भगवान विश्नु ने अपनी गंभीर द्रिश्टी गरूर पर डाली और अगली यात्ना का वर्णन आरंभ किया.
15:59कुम्भी पाक के उबलते तेल से पापी आत्मा को एक क्रूर यमदूत ने लोहे के नुकीले अंकुष से बाहर खींच
16:06लिया.
16:07तेल की भीशन यात्ना ने आत्मा के स्वरूप को जुलसा दिया था. वह अब मुश्किल से एक सुसंगत आकार में
16:15बची थी.
16:16निर्देई यमदूत आत्मा को नरक के बंजर उबढखाबड पत्रीले मार्ग पर बेरहमी से घसीटते हुए आगे बढ़ रहे थे.
16:25अंतहक वे एक विशाल अंधकार में प्रवेश द्वार के सामने पहुँचे जो कालसूत्र नामक भयानक नरक लोक का मार्ग था.
16:35भीतर प्रवेश करते ही आत्मा ने देखा कि एक असीमित सपाट तामबे की सतह आखों के सामने दूर तक फैली
16:43हुई थी, जिससे तीवर गर्मी निकल रही थी.
16:47बिना किसी दया के आत्मा को उस धधकती तामबे की सतह पर जोर से फैंक दिया गया, जहां से उठती
16:54लप्टें उसे तुरंक निगलने लगी.
16:57अचानक नरक के कोनों से धधकती हुई, कालसूतरी हवाए उस सतह पर तेजी से बहने लगी, जिससे गर्मी कई गुना
17:05बढ़ गई.
17:07कालसूतरी हवाओं के भयंकर वेग से आत्मा का बाहरी आवर्ण क्षन भर में जुलसने लगा, जिससे उसका अस्तित्व और अधिक
17:15खंडित होने लगा.
17:17केवल बाहर से ही नहीं, बलकि अंदरूनी तौर पर भी आत्मा उस धधकती उश्मा से धीरे-धीरे भुन रही थी,
17:24एक असहनिय पीडा जेल रही थी.
17:28इस तीवर गर्मी से कोई भी बच नहीं सकता था, क्योंकि यहां आत्मा के हर कण में समा गई थी,
17:34उसे अंदर से जला रही थी.
17:37आत्मा की चीखें, जैसे ही वे नरक के वातावर्ण में उठती थी, तुरंत सूख जाती थी और एक भयावह सन्नाटे
17:46में विलीन हो जाती थी.
17:48यह यात्ना निरंतर चलती रहती थी, बिना किसी विराम के हर पल आत्मा को एक नए सिरे से पीडा देती
17:56हुई.
17:57अंतह आत्मा ने अपनी नियती को स्विकार कर लिया, यह जानते हुए कि इस नरक से कोई मुक्ती नहीं है,
18:04केवल अनन्त पीडा है.
18:08भगवान विश्णु ने कहा, हे गरुड, यह कालसूत्र नरक उन पापी आत्माओं के लिए है, जो इस जीवन में मातापिता,
18:16गुरुजनों और धर्म का अनादर करते हैं.
18:20कालसूत्र की भीशन यातनाओं का वर्नन सुनकर गरुड का हरिदय काप उठा और उनके मुख पर भय और करुणा के
18:27भाव उभर आए.
18:29भगवान विशनों ने आगे बताया कि जो लोग अपने बड़ों का अपमान करते हैं और दूसरों के धन पर बुरी
18:37नजर रखते हैं, उन्हें इस नरक में इसी प्रकार की पीड़ा मिलती है.
18:42इसलिए हे गरुड विशनों ने द्रिर्टा से कहा, ज्यानियों और वृद्धों का सम्मान करना और सदाचार का पालन करना ही
18:50जीवन का सार है.
18:53काल सूत्र की धधक्ती हवाय और आत्मा की मौन पीड़ाय विशनों के शब्दों के साथ प्रिष्ठ भूमी में अभी भी
19:00गूंज रही थी, एक भयानक चेताबनी के रूप में.
19:05भगवान विशनों ने एक गहरी सास ली, मानो अगली यातना का वर्णन करने से पहले एक क्षण के लिए ठहर
19:12रहे हों, और फिर उन्होंने गरुड की ओर देखा.
19:16भगवान विशनों ने अपनी गंभीर वानी में कालसूत्र नरक के उस भयावः विस्तार का वर्णन शुरू किया, जहां की भूमी
19:24धधकते हुए तामबे की तरहलाल और अत्यंत गर्म है.
19:29गरुड ने अपने विशाल सुनहरे पंखों को समेटते हुए, अत्यंत श्रद्धा और भय के साथ भगवान विशनों के मुख से
19:37इस भयंकर सत्य को सुना.
19:40विशनों ने बताया कि जो मनुष्य अपने नश्वर जीवन में अपने पूजनिय मातापिता को अकेला छोड़ देते हैं या उनका
19:48अपमान करते हैं, उन्हें यम्दूत बलपूर्वक यहां घसीट लाते हैं.
19:53काल सूत्र की इस धधकती हुई तामबे की जमीन पर पैर रखते ही पापी आत्मा का सुक्ष्म शरीर भयंकर रूप
20:01से जुलसने लगता है.
20:04भगवान विश्नु ने समझाया कि यह धीमी और निरंतर होने वाली जलन उस धीमी उपेक्षा को दर्शाती है, जो उन्होंने
20:12अपने बुजुर्गों के प्रती दिखाई थी.
20:15जब पीड़ा से व्याकुल होकर वह आत्मा भागने का प्रयास करती है, तो यमदूत उसे जलते हुए लोहे के भारी
20:23पाश में जकड लेते हैं.
20:26काल सूत्र का आस्मान हर समय घने दमगोंटु काले धुए से घिरा रहता है, जिससे वह आत्मा घुट-घुट कर
20:33तडपती है, पर मर नहीं पाती.
20:37इसके बाद विश्णु ने उस भीशन दंड के बारे में बताया जो उन लोगों को मिलता है, जिन होने अपने
20:44पूजे गुरुओं का अनादर किया था.
20:47उन आत्माओं को जलती हुई भट्टियों के उपर उल्टा लटका दिया जाता है, जिससे उनके सिर में असहनिय गर्मी और
20:54दर्द का संचार होता है.
20:57उनके आसु गालों पर गिरने से पहले ही उस तीवर गर्मी में भाप बनकर उर जाते हैं, और उनकी पुकार
21:05को सुनने वाला कोई नहीं होता.
21:08यह देखकर गरूर का हरिदय काप उठा और उन्होंने अत्यंत विनमर्ता से पूछा कि क्या इस अत्यंत कठोर दंड का
21:15कोई अंत नहीं है.
21:18भगवान विश्णु ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया कि कर्मों का यह चक्र तब तक चलता है, जब तक कि
21:25पाप की अंतिम बूंद भी जलकर भस्म नहीं हो जाती.
21:29प्यास से व्याकुल होकर जब वे आत्माएं पानी के लिए गुहार लगाती हैं, तो उनके सुखे कंठ केवल दर्द की
21:37चीखें ही निकाल पाते हैं.
21:40क्रूर यमदूत उनकी प्यास बुझाने के बजाए उनके मुह में पिघला हुआ तामबा और गर्म सीसा डाल देते हैं, जो
21:48उनकी ठंडी उपेक्षा का फल है.
21:51वह उबलता हुआ धातु उनके कंठ से नीचे उतरते ही उनके सुक्ष्म शरीर के अंगों को भीतर तक जला कर
21:59राख कर देता है.
22:01विश्नु ने कहा, हे गरुड, जिसने अपने नश्वर जीवन में किसी भुखे प्यासे को पानी नहीं दिया, उसे यहां एक
22:09बूंद जल भी नसीब नहीं होता.
22:12एक अन्यकोने में उन लोगों को लोहे की तप्ती सुयों से बेधा जाता है, जिन्होंने अपने धार्मिक कर्तवियों और धर्म
22:20का त्याग कर दिया था.
22:22प्रत्येक सुय का चुभना उनके द्वारा तोड़े गए वादों और कर्तवियों की अन्देखी की याद दिलाता है, जिससे उनकी आत्मा
22:30भीतर तक छलनी हो जाती है.
22:34गरुर ने भगवान के इस न्यायप्रिय और भयानक रूप को देखकर अपने सिर को जुका लिया और स्रिष्टी के इस
22:41कठोर सत्य को स्विकार किया.
22:44भगवान विश्णू ने अपनी अंतिम चेतावनी देते हुए कहा कि केवल सदाचार, माता-पिता की सेवा और गुरु का सम्मान
22:52ही मनुष्य को इस भीशन गती से बचा सकते हैं.
22:57भगवान विश्णू ने पुनह अपनी दिव्य आभा से गरूर को संबोधित करते हुए कहा कि आथ मनुष्य को सदैव धर्म
23:04के मार्ग पर चलते हुए सदकर्मों में लीन रहना चाहिए, क्योंकि कर्मफल से कोई नहीं बच सकता.
23:12उधर्क नरक के भयावह मार्गों पर पापी आत्मा को जो अब एक लगभग आकारहीन कापती हुई छाया मात्र थी, क्रूर
23:20यम्दूतों ने एक विद्रूप और दान्तेदार परिद्रिश से घसीतना शुरू कर दिया.
23:26मार्ग इतना विक्राल था कि हर कदम पर आत्मा की बची खुची चेतना को और अधिक शत्विक्षत कर देता, जैसे
23:34किसी खुर्दूरे पत्थर पर रगड़ा जा रहा हो.
23:38भयभीत आत्मा ने अपनी पूरी शक्ती से बचने का प्रयास किया, हर दिशा में छटपटाती रही, किन्तु यम्दूतों की पाश्वित
23:46पकड़ से छूट पाना असंभव था.
23:49अंतहक वे एक घने अप्रिचित जंगल के किनारे पहुँचे, जहां सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुँचता था और एक अजीब
23:57सी शितलता व्याप्ट थी.
24:00यहां असिपत्रवन था, जहां पेडों के पत्ते सामान्य नहीं, बल्कि उस्तरातेश तलवारों जैसे नुकीले और घातक थे.
24:09जंगल के भीतर से आती हवा भी त्वचा को चीरती हुई महसूस होती थी, जैसे अद्रिश्य खंजर शरीर पर वार
24:17कर रहे हुँ.
24:19जमीन कटी हुई सुक्षम शरीरों के खंडिक टुक्डों से अटी पड़ी थी, जो उन आत्माओं के अवशेश थे जिन्होंने पहले
24:27यहां यातना भोगी थी.
24:29इस भयावा द्रिश्य को देखकर आत्मा ने स्वाभाविक रूप से पीछे हटने का प्रयास किया, किन्तु यम्दूतों ने उसे कसकर
24:37पकड़ रखा था.
24:40यम्दूतों ने कुरूरता से हंस्ते हुए, उसे जबरदस्ती असिपत्रवन के घने अंधकार में धकेल दिया, जहां हर पल मौत का
24:48साया मंदरा रहा था.
24:50जैसे ही आत्मा ने पहला कदम भीतर रखा, एक उस्तरा तेज पत्ती ने उसके सुक्ष्म शरीर को चीर दिया, जिससे
24:58एक तीवर मर्मभेदी पीडा उत्पन हुई.
25:02भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि यह असिपत्रवन उन लोगों के लिए है, जो दूसरों को शारिरिक कष्ट देते
25:10हैं और हिंसा में लिप्त रहते हैं.
25:13गरूर ने असिपत्रवन की इस क्रूर यातना के बारे में सुनकर अपने पंखों को भय से कस लिया, उनकी दिव्य
25:21आत्मा भी इस प्रकार के दंड से काम उठी.
25:25यम्दूतों ने उसे बिनादया के जंगल के गहरे हिस्से में घसीटना जारी रखा, जहां तलवार पत्तों का जाल और भी
25:32घना और घातक था.
25:35प्रत्येक पग पर दर्जनों पत्तिया आत्मा के पहले से ही क्षत्विक्षत रूप को और अधिक काटती, चीरती और छलनी करती
25:43जा रही थी.
25:45हवा में तलवारों के पत्तों से आत्मा के सूख्षम शरीर के कटने की एक भयाबह सरसराहट की ध्वनी गूझ रही
25:52थी, जैसे अद्रिश्य वस्त्रों के टुकडे हो रहे हूं.
25:57आत्मा की चीखें, जो अब केवल एक तीवर, कमपनशील उर्जा के रूप में प्रकट हो रही थी, पूरे जंगल में
26:04निराशा और पीड़ा की गूंज बनकर फैल गई.
26:08यमदूत अपनी क्रूरता से प्रसन्न होकर इस यातना को देखकर अट्थास कर रहे थे, उनके चहरे पर दुष्टता और घेना
26:17स्पष्ट जलक रही थी.
26:19भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि यह दंड उन पापी आत्माओं के लिए है, जिन्होंने अपने जीवनकाल में दूसरों के
26:27शरीर को पीड़ा दी, उनके मन को दूशित किया और निर्दोशों का रक्त बहाया.
26:34असिपत्रवन की यह भीशन यातना अन्वरत जारी रहती है, जब तक कि आत्मा अपने सभी पापों का पूरा फल भुगत
26:41कर शुद्ध नहीं हो जाती.
26:44असिपत्रवन के भयावह व्रिक्षों के बीच तलवार जैसे नुकीले पत्तों ने पापी आत्मा के सुक्ष्म शरीर को चीरना जारी रखा,
26:53हर वार पर मास का कालपनिक लोथड़ा उसके रूप से अलग होता चला गया.
26:58आत्मा की चीखें जो भौतिक नहीं थी, फिर भी संपूर्ण ब्रहमांड में गुंजती हुई महसूस होती थी, जैसे सहसरों पीडादायक
27:07पुकारें एक साथ मिल गई हो.
27:10यमदूत अपने कुरूरता पूर्ण कार्य में मगन आत्मा को आगे धकेलते रहे, जिससे वह गहरे घावों को सहते हुए, पत्तियों
27:19के धारदार किनारों पर बार-बार कट्ती रही.
27:23इस भीशन द्रिश को देवलोक से भगवान विश्नु जो समस्त लोकों के पालक और न्याय के प्रतीक हैं, अपने वाहन
27:31गरूर के साथ अत्यंत गंभीरता और करुणा भरे मुखमंडल से देख रहे थे.
27:37भगवान विश्नु ने अपनी चार भुजाओं में शंक, चक्रक, गदा और पद्मधारन किये हुए एक गहन सांसली और अपने दिव्यक
27:46गंभीर स्वर में गरूर को इस यातना का मर्म समझाना आरंभ किया.
27:51वे बोले हे गरूर यह यातना उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने अपने जीवनकाल में धर्म का त्याग किया, अपने
28:00कर्तवियों से विमुख हुए और सत्य के मार्क को छोड़ दिया.
28:04जैसे ही आत्मा असिपत्रवन में आगे बढ़ती है, उसके प्रत्येक कटाव में अपने ही विश्वास घात का दर्द गहराई से
28:12अनुभव होता है, यह ज्यान उसके कष्ट को और बढ़ा देता है.
28:18विश्णू ने आगे बताया, यह दंड उन लोगों के लिए भी है, जिन्होंने अपनों को धोखा दिया, विश्वास का गला
28:25घोंटा और स्वार्थवश दूसरों के हितों को कुछला.
28:29प्रत्येक बार जब पत्या आत्मा के सूक्षम शरीर को काटती हैं, तो उसे अपने द्वारा किये गए निर्दोशों के शोशन
28:37और हिंसा का स्मरण होता है, जिससे उसकी वेदना असहनशील हो उठती है.
28:44आत्मा अपने अस्तित्व के हरकण में दर्द महसूस करती हुई, अपने अतीत के कुकर्मों को एक स्पष्ट दरपण में देख
28:52रही थी, जिसका प्रतिबिंब उसकी वर्तमान यातना को तीवर कर रहा था.
28:58गरुर ने अपनी श्रद्धापूर्ण द्रिष्टी भगवान विश्नु पर टिकाये रखी, उनके मुख पर एक गहन समझ और ब्रहमांडिय न्याय के
29:06प्रती सम्मान का भाव स्पष्ट था.
29:10असिपत्रवन की हर पत्ती एक तीचन तलवार बनकर आत्मा के अद्रिष्य धागों को काटती रही, जैसे कोई अद्रिष्य शिल्पी पीडा
29:18से एक नई रचना गड़ रहा हो.
29:22यमदूत अपनी लोहे की गदाओं से आत्मा को और अधिक बलपूर्वक धक्का देते हुए, उसे कांटेदार व्रिक्षों के गहरे गलियारों
29:30में धकेल रहे थे, जहां से कोई वापसी नहीं थी.
29:35आत्मा मुक्ती की एक शनिक आशा में भागने का असफल प्रयास करती, परंतु पत्तिया उसे हर दिशा से घेड लेती
29:43और उसके हर प्रयत्न को निश्वल कर देती.
29:47हर घाव ततकाल भर जाता, केवल अगले ही पल फिर से कटने के लिए यह एक अंथीन चक्र था जो
29:54पापों की गहराईयों तक आत्मा को शुद्ध करने पर तुला था.
29:59भगवान विश्णू ने समझाया कि यह कर्म का अटल नियम है, जहां हर क्रिया का फल अवश्य मिलता है, और
30:06कोई भी दुशकर्म इस दिव्य न्यायाले से बच नहीं सकता.
30:10इस यातना से गुजरते हुए आत्मा का अहंकार और उसका स्वार्थ पिघलने लगता है, उसकी आंतरिक शुद्धी का मार्ग प्रशस्थ
30:19होता है, भले ही वह अत्यंत कष्ट दायक हो.
30:24असिपत्रवन के भयानक व्रिक्षों की चाया में, हजारों आत्माएं इसी प्रकार चीख रही थी, हर चीख एक कहानी थी विश्वास्गात
30:32की, हिंसा की और धर्म के त्याग की.
30:35यह यात्ना तब तक अनवरत जारी रहती है, जब तक की आत्मा अपने सभी संचित पापों के बोज से पूरी
30:43तरह मुक्त न हो जाएं और शुद्धिकरण के अंतिन चरण तक न पहुँच जाएं.
30:48इस प्रकार नरक के गहरे कुंडों में आत्मा अपने कर्मों का लेखा जोखा चुकाती है, एक ऐसी प्रक्रिया से गुजरती
30:57है, जहां उबलना, जलना और कटना ही उसका एक मात्र सत्य होता है.
31:04असिपत्रवन की वीभत्स यातना से लहुलुहान होकर जैसे ही पापी आत्मा आगे बढ़ती है, यमदूत उसे कुरूरता से दबोच कर
31:12एक अत्यंत अंधकार्मय और भयानक शेत्र की ओर घसीटने लगते हैं.
31:18कोले जैसे काले शरीर और जलते हुए अंगारों जैसी आखों वाले विशाल का यमदूत उसका पती हुई आत्मा का उपहास
31:27उड़ाते हुए उसे घसीटते जा रहे हैं.
31:31चलते चलते अचानक यह पत एक अत्यंत विशाल और गहरे कुए के मुहाने पर जाकर समाप्थ होता है, जिससे घनी
31:39-काली धुंध बाहर निकल रही है.
31:42दरी हुई आत्मा जब उस अगाध कुए के भीतर जाकती है, तो उसे केवल एक असीमित, पिछकाले और भयानक अंधकार
31:50ही दिखाई देता है, जहां प्रकाश की एक किरण भी प्रवेश नहीं कर सकती.
31:56दया का नामों निशान खोचुके मुख्य यमदूत ने उस चीखती हुई आत्मा को उसके बालों से पकड़कर उपर उठाया और
32:04अंधकूप के भयानक मुहाने के ठीक उपर लटका दिया.
32:09बिना किसी सहानु भूती के, यमदूतों ने एक जोरदार धक्का दिया और उस असहाय आत्मा को सिर के बल अंधकूप
32:17के उस अथाह और अंधेरे गर्त में नीचे फैंक दिया.
32:22जैसे ही आत्मा उस पिछकाले कुए की गहराई में तेजी से गिरने लगती है, नीचे के घने अंधकार से रोंग्टे
32:29खड़े कर देने वाली भयानक चीखें गूंच उठती है.
32:33उस अगाध खाई के भीतर की हवा अत्यंत भारी और दमगोंटू है, जो पहले से ही वहाँ फंसी अंगिनत पापी
32:41आत्माओं के करोन विलाप से भरी हुई है.
32:46अंधकार की गहराई से अब भयानक गुर्राहटे और किसी विशाल हिंसक जीव की गहरी दहाडे गूंजने लगती हैं, जिससे गिरती
32:54हुई आत्मा का हृदय भय से काम उठता है.
32:58अपनी जान बचाने के लिए वह अभागी आत्मा हवा में घबरा कर अपने हाथ पेर मारती है, लेकिन वहाँ पकड़ने
33:06के लिए केवल शून्य और बर्फीली हवा ही मिलती है.
33:11अचानक उस घणे और अथाह अंधेरे में चारों तरफ भयानक और हिंसक जीवों की लाल और पीली आखें चमकने लगती
33:19हैं.
33:21आत्मा को अपने शरीर पर किसी ठंडे, चिपचिपे और नुकीले पंजों वाले अद्रिश्य जीवों का स्पर्ष महसूस होने लगता है,
33:29जो उसके चारों और मंदरा रही हैं.
33:33उस कुए की शिलाओं की दरारों से विशालकाय और दरावने कीडे बाहर निकलते हैं, जिनकी आखें हरी रोशनी से चमक
33:41रही हैं और उनके मुख से विशैला लार टपक रहा है.
33:46नुकीले सींगो वाले और काले चमकीले शलको वाले विशालकाय नाग उस गहरी खाई की दीवारों पर रेंगते हुए अपने शिकार
33:54की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
33:57उस आत्मा को अब भीशन सत्य का एहसास होता है कि वह इस अंधेरे कुए में अकेली नहीं है, बलकि
34:04सदियों पुराने भूखे और हिंसक राक्षसी जीवों के बीच घिरी हुई है.
34:10अचानक अंधकार से एक विशाल और भयानक छायादार हाथ बाहर निकलता है, जिसके नुकीले नाखुन आत्मा के शरीर को चीरते
34:19हुए गहरे घाव बना देते हैं.
34:23लगातार गिरते हुए, आत्मा के कानों में उसके द्वारा अतीत में सताए गए लोगों की प्रितात्माओं की आवाजें गूंजती हैं,
34:31जो उसके इस हश्र पर कुरूरता से हंस रही हैं.
34:36इंसानी चहरे वाले और चमगादर जैसे पंखों वाले आदम खोर जीवों का एक जुंड अचानक उस पर तूट पड़ता है,
34:44और उसके आध्यात्मिक शरीर को बेरहमी से नोचने लगता है.
34:49बिना कुछ देखे केवल महसूस करने और इन भयानक जीवों द्वारा लगातार नोचे जाने के इस मानसित प्रास ने आत्मा
34:57को पागलपन की कगार पर पहुचा दिया है.
35:01इस अगाध अंधेरे कुए में अंथीन रूप से गिरते हुए, उस पापी आत्मा को अंत्त यह समझ आ जाता है
35:08कि अंधकूप की इस भयानक यातना का कोई अंत नहीं है.
35:14कुए के उस भयावह दलदल में गिरते ही पापी आत्मा का शरीर अंगिनत विशैले कीटों और बिच्चूँं से घिर जाता
35:21है.
35:33कीडों के उस दलदल के बीच से एक भयंकर बहुमुखी दानवी सर्प फुफकारता हुआ उभरता है, जिसकी आखें अंगारों की
35:41तरह देहक रही हैं.
35:44वह दानवी सर्प अपने जहरीले दानतों को आत्मा के सुक्ष्म शरीर में गार देता है, जिससे उसके भीतर असहनिय जलन
35:52पैदा होने लगती है.
35:55पीडा से कराहते हुए उस पापी पर लाखों मांस भक्षी भेंग तूट पड़ते हैं और उसके अंगन को कुतरना शुरू
36:03कर देते हैं.
36:05उस अगाध अंधेरे में आत्मा की दर्दनाक चीखें गूंजती हैं, लेकिन उसकी पुकार सुनने वाला वहा कोई नहीं है.
36:14अंधेरे के बीच से कुछ अद्रिश्य हिंसक शिकारी जीव अचानक सामने आते हैं और आत्मा के सुक्ष्म अंगों को बेर्हमी
36:22से फार देते हैं.
36:25आध्यात्मिक शरीर होने के कारण कटे हुए अंग तुरंत वापस जुड़ जाते हैं ताकि यात्ना का यह अंधीन चक्र फिर
36:32से शुरू हो सके.
36:34इस असहनिय पीडा के बीच पापी आत्मा को प्रित्वी पर किये गए अपने वे सारे चल और हिंसक कुकर्म याद
36:42आने लगते हैं.
36:44चल से छीना गया धन और सताए गये लोगों के विलाप की आवाजें अब उस अंधेरे में दहकते अंगारों की
36:52तरह उसके मन को जलाती हैं.
36:55वैकुंठ के परम पावन धाम में भगवान विश्नु गरूर को इस भयानक नरक का रहस्य समझाते हैं.
37:03नारायन का दिव्य और अलौकिक मुखमंडल स्रिष्टी के अटल न्याय और कर्मफल की गंभीरता को स्पष्ट करता है.
37:12पक्षी राज गरूर अत्यंत विस्मय और श्रद्धाभाव से हाथ जोड कर अपने प्रभू के वचनों को एकाग्र होकर सुन रहे
37:20हैं.
37:22प्रभू समझाते हैं कि स्थूल शरीर के नश्ट होने पर भी सुक्ष्म शरीर को होने वाली पीडा भौतिक शरीर से
37:29हजार गुना अधिक और तीवर होती है.
37:33वापस उस अंधेरे में एक विशालकाय राक्षसी कंखजूरा पापी आत्मा के चारों और लिपटकर उसकी हड्डियों को चूर-चूर कर
37:41देता है.
37:43प्रित्वी पर दूसरों को सताने वाले और निर्बल लोगों का दमन करने वाले पापी अब खुद को असहाए और निर्बल
37:51पाते हैं.
37:53भगवान विश्णू अपनी गंभीर वानी में कहते हैं कि यह अंधकूप तो केवल उन भयानक यातनाओं की शुरुवात मात्र हैं
38:01जो पापियों की प्रतीक्षा कर रही हैं.
38:04वे बताते हैं कि आत्मा के विशिष्ट और कुरूर कर्मों के अनुसार यमराज के सामराज्ज में इससे भी अधिक भयानक
38:12और गहरी यातनाए निर्धारित हैं.
38:16पक्षी राज गरूर कर्म के इस अकाट्य और न्यायपूर्ण विधान को समझकर श्रद्धा से अपना मस्तक भगवान के चर्णों में
38:24जुका देते हैं.
38:26स्रिष्टी के रहस्य में ज्यान की इस कथा को आगे बढ़ाते हुए भगवान विश्नु गरूर को अगले और अधिक भयानक
38:34लोकों के बारे में बताना शुरू करते हैं.