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गरुड़ पुराण के अध्याय 20 में जानें ब्रह्मज्ञान और आत्मज्ञान का वो गुप्त रहस्य जो आत्मा को सीधे परमात्मा से मिला देता है! भगवान विष्णु ने पक्षीराज गरुड़ को बताया कि कैसे ध्यान, प्राणविद्या और अहंकार के नाश से जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

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Transcript
00:00सतकर्मों की महिमा जानने के बाद पक्षीराज गरुर ने वैकुंठ धाम में जगतपती श्री विष्णु के चरंकमलों में अत्यंत श्रधापूर्वक
00:08प्रणाम किया।
00:09गरुर के विशाल स्वर्णिम नेत्रों में परम सत्य को पाने की अत्रिप्त प्यास और परम पद की प्राप्ती की गहरी
00:17अभिलाशा स्पष्ट जलक रही थी।
00:20गरुर ने विनीत भाव से प्रश्ण किया कि हे प्रभुक उन्य कर्म स्वर्ग तो दिलाते हैं किन्तु क्या वे जीव
00:27को जन्ममर्ण के चक्र से पूर्णता मुक्त कर पाते हैं।
00:32शीर सागर की दिव्यत अरंगों के बीच शीर शाई भगवान विश्णों ने अपने भक्त की इस उच्च आध्यात्मिक जिग्यासा को
00:39मंद मुस्कान के साथ स्वीकार किया।
00:43पक्षी राज ने निवेदन किया कि जब तक कर्मों के सूक्षम बीज शेश रहते हैं तब तक आत्मा पुनह पुनह
00:50इस नश्वर संसार के चक्रव्यूह में फंस्ती रहती है।
00:55के मधुसूदन मुझे उस परम ब्रहमज्यान का उपदेश दीजिए जो समस्त संचित और प्रारब्ध कर्मों को क्षन भर में भस्म
01:03कर दे।
01:04गरुड की वानी में संपूर्ण मानव जाती को इस अनवरत दुखमई संसार्चक्र से उबारने की महा करुणा विद्यमान थी।
01:13उन्होंने पूछा की वह कौन सी अमर जोती है, जिसके प्रजवलित होते ही अज्यान का अंधकार और भेदभाव का भ्रम
01:21सदा के लिए मिट जाता है।
01:24वैकुंठ के देदी प्यमान वातावर्ण में भगवान विश्नु के वक्षस्थल पर सुशोभित कौस्तुभ मनी से अलोकिक नीली और स्वर्णिम किरने
01:33फूटने लगी।
01:34श्रीहरी समझ गए की गरूर अब केवल कर्मकांड या भक्ती मार्ग तक सीमित न रहकर सर्वोच्च आत्मसाक्षातकार के योग्य हो
01:43चुके हैं।
01:45परमेश्वर विश्नु ने अपने चारभुजाधारी दिव्यरूप में अभय मुग्राधारन की और परमगूर ज्यान को प्रकट करने की तैयारी की।
01:54भगवान विश्नु ने ओजस्वी स्वर में कहना प्रारंब किया कि यग्य, दान और तपस्या केवल चित्त की शुद्धी करते हैं,
02:03मुक्ती केवल ज्यान से ही संभव है।
02:06उन्हों ने समझाया कि जिस प्रकार सूर्य के उगते ही रात्री का अंधकार स्वतह समाप्थ हो जाता है, उसी प्रकार
02:14ब्रहमग्यान से माया का जाल कट जाता है।
02:18गरुड अपने विशाल पंखों को समेट कर परम शांत मुद्रा में स्थेर हो गए और नारायन के प्रत्येक शब्द को
02:25एका ग्रचित होकर सुनने लगे।
02:28प्रभु ने बताया कि पंचमहा भूतों से बना यह शरीर और यह संपून द्रिश्य जगत केवल भ्रम और माया का
02:35एक शनिक विलास है।
02:38वास्तविक सत्य तो वह अविनाशी चेतना है, जो इस देह के भीतर साक्षी रूप में सदा विद्यमान रहती है।
02:46गरुर ने उच्सुकता से पूछा कि है प्रभु, एक साधारन जीव अपने भीतर छिपी इस अगवैत परमात्मा की शक्ती को
02:54कैसे पहचान सकता है।
02:57विष्णु ने कहा कि मैं कौन हूँ, इस निरंतर आत्मविचार और विवेक की तीक्षन तलवार से ही अज्ञान के बंधन
03:05काटे जा सकते हैं।
03:08समस्थ देवलोक और रिशिमुनीभी परात पर ज्ञान के इस अनुपम समवात को सुनने के लिए अगरिश्य रूप से वैकुंठ में
03:15एकत्र होने लगे।
03:17गरुर ने पुनह सिर जुका कर प्रार्थना की की है नारायन मुझे उस महाज्यान का विस्तार से बोध कराईये जिससे
03:25आत्मा स्वयं परमात्मा बन जाए।
03:28भगवान विश्णु ने अपने शांत और गंभीर स्वर में माया के गूढ रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा कि यह
03:35त्रिगुनात्मक माया ही समस्त जीवों को अज्यान के अंधकार में बांध कर रखती है।
03:42माया उस स्वर्णन जाल की भांती है जो आत्मा की विशुद्ध अमर चेतना पर एक परदा डाल देती है जिससे
03:49जीव अपने वास्तविक नित्य स्वरूप को पूर्णत्य भूल जाता है।
03:55अज्यानता के वशी भूत होकर वह अविनाशी आत्मा पंचमहा भूतों से बने इस क्षण भंगुर और नश्वर शरीर को ही
04:03अपना वास्तविक स्वरूप मानने की भूल कर बैठती है।
04:08गरुड अपने विशाल स्वर्ण पंखों को समेट कर परमेश्वर के इस अनुपम संदेश को अत्यंत एकागरता और भक्ती भाव के
04:16साथ सुन रहे थे।
04:18भगवान नारायन ने आगे कहा कि अहनकार के प्रभाव में आकर मनुष्य मैं शरीर हूँ, यह धन मेरा है और
04:26ये कुटुम्ब मेरे हैं जैसी जूठी आसक्तियों में उलज जाता है।
04:32इंद्रियों के आकरशन जैसे रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्ष मन को बांध कर आत्मा को अन्थीन वासनाओं के भमवर
04:39में धकेल देते हैं।
04:42शनिक सांसारिक सुख केवल एक ध्रम की भांती आता है, जिसके ठीक पीछे अप्रिमित दुख और शोक की विशाल चाया
04:50सदा छिपी रहती है।
04:53राग और द्वेश की यह निरंतर चलने वाली चक्की आत्मा को जन्म और मृत्यू के चक्रव्यों में एक असहाय पक्षी
05:00की तरह कैद कर देती है।
05:03समय का निर्दई चक्र बहता रहता है, जहां योवन धल जाता है, शरीर जरजर हो जाता है, परन्तु मनुष्य की
05:11त्रिशना कभी भी व्रिध नहीं होती।
05:14मृत्यू के अंतिमक्षणों में भी अज्यानी जीव अपने नश्वर धन और संबंधों को पकड़ने का व्यर्थ प्रयास करता है, जबकि
05:22शरीर उसका साथ छोड़ रहा होता है।
05:26स्थूल शरीर के भस्म हो जाने पर भी अंथीन इच्छाओं से लदा सुक्ष्म शरीर आत्मा के साथ यात्रा करता रहता
05:34है।
05:36अपने ही बोए गए कर्मों के भारी बोज के कारण जीव को यमलोग की छायादार राहों से गुजरना पड़ता है
05:43या विभिन योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
05:4784 लाख योनियों का यह विशाल भंवर आत्मा को पशु, पक्षी, व्रिक्ष और पतंगों के शरीरों में बार-बार भटकने
05:55पर विवश कर देता है।
05:58गरुर ने अत्यंत व्यथित और विस्मित होकर प्रश्न किया कि है प्रभु, जीव-जीवन धर माया के इस महान छल
06:05को क्यों नहीं पहचान पाता।
06:08श्री हरी ने मुस्कुराते हुए समझाया कि त्रिगुन, सत्व, रजस और तमस मनुष्य की बुद्धी को इस प्रकार सम्मोहित कर
06:15देते हैं कि सत्य छिप जाता है।
06:19तमस अज्यान और आलस्य फैलाता है, रजस त्रिश्ना और अशान्त लालसा जगाता है, जबकि सत्व सुख और ज्यान के सुक्ष्म
06:27अभिमान में बांधता है।
06:31यहां तक कि पुन्य कर्म करने वाले श्रिश्ट जीव भी यदि अपने सत्कर्मों के अहंकार से बंधे रहें, तो वे
06:38भी सत्वगुन की स्वर्णिन बेडियों में जक्डे रहते हैं।
06:42तपश्चात अपने कर्मों के अनुसार आत्मा पुन्ह किसी माता के गर्भ के अंधकार्मय स्थान में प्रवेश करती हैं और अत्यंत
06:51कष्ट सहती हैं।
06:53जन्म लेते ही शिशु का क्रंदन वास्तव में माया के पुन्ह आरंभ होने और पूर्व जन्म के दिव्य संकल्पों के
07:00भूल जाने की रोधंध्वनी हैं।
07:04भगवान विश्णु ने इस भाग का अंत करते हुए कहा कि जब तक मनुष्य विवेक रूपी तीक्ष्न अस्त्र से माया
07:11के इस आबर्ण को नहीं भेदता तब तक मुक्ती असंभव है।
07:16हे गरूर अब मैं तुम्हें उस परम गुप्त ज्यान का रहस्य बताता हूँ जिसके द्वारा जीवात्मा पंचकोशों के बंधनों को
07:24भेद कर सीधे परमात्मा में विलीन हो जाती है।
07:27इस यात्रा का प्रथम चरण अन्नमय कोश है जो हमारा यह स्थूल भौतिक शरीर है और जो केवल अन्न तथा
07:36प्रित्वी के पंच्टत्वों के उपभोग से निर्मित और पोशित होता है।
07:41परंतु यह अन्नमय शरीर मात्र एक नश्वर वस्त्र है जो मिट्टी से उत्पन होकर अन्ता मिट्टी में ही मिल जाता
07:49है। इसलिए ज्ञानी पुरुष इस नश्वर काया को अपनी वास्तविक पहचान नहीं मानते।
07:55इसके भीतर दूसरा आवर्ण प्राणमय कोश का है जो जीवन शक्ती, श्वास और उर्जा के रूप में इस निर्जीव काया
08:03को गती और चेतना प्रदान करता है।
08:07ये प्राण ही शरीर में पांच मुख्य वायू बनकर जीवन की गतिविधियों को संतुलित करते हैं, परंतु प्राण का शान्थ
08:15होना ही आत्मा को गहरे स्तर पर ले जाता है।
08:19प्राणों के भी परे मन की अद्रिश्य तरंगों का मनोमय कोश स्थित है, जो इच्छाओं, कल्पनाओं, राग और द्वेश का
08:26निरंतर निर्मान करता रहता है।
08:30यह मन अत्यंत चंचल और माया के वश में है, जो जीवात्मा को संशियों के चक्रवियों में उल्जाकर सत्य के
08:37मार्ग से भटकाता रहता है।
08:40जब मन को स्थिर कर विवेक जागरित किया जाता है, तब साधक विढ्यानमय कोश में प्रवेश करता है, जहां बुद्धी
08:48और परम सत्य का निर्नय करने की शक्ती होती है।
08:53यह बुद्धी का आवर्ण है जो भले ही सत्य और असत्य का भेड करने में सक्षम है, परंतु अहंकार के
09:00सुक्षम आवर्ण से अभी भी मुक्ट नहीं है.
09:04बुद्धी के भी पार अत्यंत सुक्ष्म और आनंद से परिपून आनंदमय कोश है जो सुशुक्ति अवस्था में अगाद शांती और
09:13असीम सुख का अनुभव कराता है
09:17परंतु हे गरुड यहां आनंदमय कोश भी अंतिम सत्य नहीं है क्योंकि यह मात्र अज्यान की चादर ओढ़े हुए परम
09:25आनंद का एक प्रतिविंभ है
09:28यह पांचों कोश वास्तव में उस परम जोती रूप आत्मा को धके हुए पांच आवर्ण हैं जिनहें तीक्षन ज्यान रूपी
09:36खड़ से काटना अनिवार्य है
09:39जैसे प्यास के छिलके उतारने पर अन्त में केवल रिक्तता बचती है वैसे ही इन पांचों कोशों को हटाने पर
09:47केवल शुद्ध सच्चिदानंद आत्मा ही शेश रह जाती है
09:52वह आत्मा न तो जन्म लेती है न कभी मरती है वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और इस ब्रहमांड की आदियंतहीन
10:00चेतना है
10:02जब साधक इन सभी कोशों से परेचला जाता है तब वह स्वयं को ही प्रत्येक जीव में और संपून स्रिष्टी
10:10को स्वयं में देखने लगता है
10:13यही वह अहँ ब्रहमास्मी और तक्त्वमसी का परम महावाक्य है जिसे जान लेने पर आत्मा स्वयं पर्माक्मा का ही स्वरूप
10:21बन जाती है
10:23हे पक्षी राज इस परम ज्ञान को पाकर जीव संसार के समस्थ जन्ममर्ण के भैसे सदास्दा के लिए मुक्थ हो
10:31जाता है
10:41उनका हृदय ब्रहमग्यान से प्रकाशित हो गुठा तब वैकुंठ लोग की पावन भूमी दिव्य घंटियों की ध्वनियों और अपसराओं के
10:50मंगलगान से गुँच उठी मानो समस्थ ब्रहमांड इस गुप ज्यान के प्रक्तिकरण का उच्सव मना रहा हो
10:58इस प्रकार भगवान ने गरूर को समझाया कि जो कोई भी इस पंचकोश के भेद को जान लेता है उसे
11:05पुनह इस नश्वर संसार के चक्र में नहीं आना पड़ता
11:09तब भगवान श्री हरी ने पक्षी राज गरूर को संबोधित करते हुए कहा कि केवल ज्यान का श्रवण ही परियाप्त
11:16नहीं बलकि ध्यान योग ही वह माध्यम है जिससे यह ज्यान साक्षात अनुभव में बदलता है
11:24श्री हरी ने उपदेश दिया कि ध्यान योग के अभ्यासी को सर्वप्रथम एक अत्यंत पवित्र, स्वच्छ और कोलाहल से दूर
11:32एकांत स्थान में अपना स्थिर आसन जमाना चाहिए
11:37ध्यान अवस्था में प्रवेश करते समय साधक को अपनी रीड की हड़ी, गर्दन और मस्तक को एक सीधी रेखा में
11:44स्थिर रखकर नासिका के अगरभाग पर अपनी दृष्टी केंद्रित करनी होती है
11:50जिस प्रकार एक कच्छुआ भाय का संकेत पाते ही अपने समस्थ अंगों को अपने भीतर समेट लेता है, उसी प्रकार
11:58योगी को अपनी इंद्रियों को बाहरी विश्यों से खीचना चाहिए
12:03प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से श्वास प्रश्वास की गती को नियंतरित करके मन की चंचलता और विचारों के निरंतर प्रवाह
12:11को पूर्णत है शांत किया जाता है
12:15जब चंचल मन विश्या सक्ती छोड़ कर स्थिर हो जाता है, तब साधक को अपने अनाहत चक्र यानी हृदय कमल
12:22में प्रजवलित परंजोती का ध्यान करना चाहिए
12:26उस हृदय कमल के केंद्र में सर्वव्यापी भगवान श्री हरी के मनमोहक चतुर्भुज स्वरूप का निरंतर और अनन्य चिंतन करना
12:34चाहिए
12:36ध्यान के दौरान जब सांसारिक विचार और माया के भ्रामक दृष्यमन को विचलित करने का प्रयास करें, तब साधक को
12:43एक परवत की भांती अचल बने रहना चाहिए
12:47भगवान विश्नु ने समझाया कि अभ्यास और वैराग्य रूपी दो अस्त्रों से ही विश्यवासनाओ के तीवर वेग को मोड़ा जा
12:55सकता है
12:57जैसे किसी वायुहीन और शांत स्थान में रखा गया दीपक बिना हिले निशकम्प जलता रहता है, वैसे ही समाधिस्थ योगी
13:05का चित्परमात्मा में लीन रहता है
13:09समाधि की परम अवस्था में पहुँचकर साधक का मैं और मेरा का मिथ्या अहंकार भस्म हो जाता है और केवल
13:16शुद्ध परब्रहम ही शेश रह जाता है
13:20इस प्रकार ध्यान योग रूपी सुद्रिध नौका पर आरूढ होकर मनुष्य इस अपार और संकट पूर्ण संसार समुद्र को सुगमता
13:28पूर्वक पार कर लेता है
13:32भगवान विश्णु के इन परम गोपनिये और आनंदमई उपदेशों को सुनकर पक्षी राज गरूर का हृदय असीम सुख और शांती
13:40से आपलावित हो उठा
13:42ध्यान की गहनता में साधक को अनहद नाद की अलोकिक ध्वनी सुनाई देती है जो संपूर्ण सृष्टी के मूल ओम
13:50की अमर प्रतिध्वनी है
13:53जब निरंतर ध्यान से ध्याता, ध्यान और धे की त्रिपुटी समाप्थ हो जाती है, तब जीवात्मा का परमात्मा में पूर्णता
14:01विलय हो जाता है
14:03जो निश्काम साधक ध्यान योग के इस पावन मार्ग का अनुसर्ण करता है, उसके कई जन्मों के संचित पाप और
14:11कर्म बंधन ततकाल भस्म हो जाते हैं
14:15श्री नारायन ने अपना अभ्यहस्त उठाकर गरुर को आशिरवात दिया कि जो भी इस ध्यान योग का पालन करेगा, वह
14:23मृक्यू के भैसे सदा के लिए मुक्थ हो जाएगा
14:27गरुर ने अत्यंत भक्तिभाव से पुना हाथ जोड कर कहा कि हे प्रभु आपके इस परम ज्यान ने मेरे मन
14:34के संशय रूपी अंधकार को पूर्णता नश्ट कर दिया है
14:39तभी संपूर्ण वैकुंठ लोक में दिव्य धुन्धु भी बज उठी और अपसराओं ने इस ब्रहम ज्यान की सिध्धी पर स्वर्ग
14:47लोक से अलौकिक पुश्पवरिष्टी की
14:50इस प्रकार गरूर पुरान के अंतरगत ध्यान योग का यह परम पवित्र और रहस्य में अध्याय पूर्ण हुआ, जो प्रत्येक
14:58मुमुक्षु जीव को अमर्ता की ओर ले जाता है
15:02इसके पश्चात भगवान विश्णु ने गरूर को संबोधित करते हुए प्रानविज्ञान के परम रहस्य का उठगाटन प्रारंभ किया, जो जीव
15:10को श्वास के माध्यम से मोक्ष की ओर ले जाता है
15:15श्री हरी ने बताया कि इस मनुष्य देह में बहत्तर हजार सुक्ष्म नाडिया स्थित हैं, जो सम्पूर्ण शरीर में जीवनूर्जा
15:23का संचार करती हैं
15:25इन समस्थ नाडियों में तीन प्रमुख नाडिया हैं, इडा, पिंगला और सुशुमना, जो आध्यात्मिक जागरती के मूल स्तम्भ हैं
15:35बाई नासिका से जुड़ी इडा नाडि चंद्रस्वरूपी, शीतल और मन को शांत तथा स्थिर करने वाली उर्जा प्रदान करती हैं
15:45दाहिनी नासिका से प्रवाहित होने वाली पिंगला नाडि सूर्य स्वरूपी, उष्ण और शरीर में कर्म तथा चेतना का संचार करती
15:53हैं
15:55इन दोनों के मध्य में स्थित सुशुमना नाडि मोक्ष का परम्मार्ग है, जो प्राणायाम के द्वारा ही जागरत होती हैं
16:04भगवान विश्णु ने पूरक प्राणायाम का रहस्य समझाते हुए बताया कि एका ग्रचित होकर जीवन दायनी श्वास को भीतर खींचना
16:12मन को स्थिर करता है
16:15तदोपरांत कुम्भक अवस्था में वायू को भीतर रोक कर साधक समस्थ संशयों और विचारों को शांत कर ब्रहमचेतना का स्पर्श
16:24करता है
16:26ततपश्चात रेचक क्रिया के द्वारा नियंत्रित रूप से श्वास बाहर छोड़ते हुए साधक मन के समस्थ विकार और पापों का
16:33पूर्ण त्याग कर देता है
16:36जब प्रान और अपान वायू का नाभिकमल में समागम होता है तब एक अलौकिक आध्यात्मिक अगनी प्रजवलित हो उठती है
16:46उस दिव्य अगनी के प्रभाव से मूलाधार चक्र में सोई हुई कुंडलिनी शक्ती एकाएक जागरत होकर प्रजवलित हो जाती है
16:55स्वर्णिन सर्पेनी के समान भासमान वह कुंडलिनी शक्ती सुशुमना मार्क से उपर की ओर प्रस्थान करने लगती है
17:04कुंडलिनी शक्ती प्रथम दो चक्रों मूलाधार और स्वाधिश्थान का भेदन कर साधक के भौतिक बंधनों को भस्म कर देती है
17:14इसके पश्चात वह मनिपूर और अनाहत चक्र में प्रवेश कर साधक के हृदय को निस्वार्थ प्रेम और अलोकिक शान्ती से
17:22भर देती है
17:24विशुद्ध चक्र तक पहुँचकर यह दिव्य शक्ती वानी को सिध्ध करती है और चेतना को सांसारिक सीमाओं से परेविस्तार देती
17:32है
17:34जब प्रान्शक्ती आज्या चक्र में पहुँचती है, तब साधक को त्रिकालदर्शी ज्यान और अज्यान के विनाश की अलौकिक सिध्धी प्राप्थ
17:43होती है
17:45अंतह सहसरार चक्र में पहुँचकर कुंडलिनी का परम्पिता परमात्मा के साथ अखंड मिलन होता है, जहां केवल परमानंद शेश रह
17:53जाता है
17:55इस अलौकिक सुक्ष्म द्रिश्य को देखकर गरुर का हृदय असीम आश्चर्य और भक्तिभाव से भर गया
18:03भगवान विश्णु ने कहा कि जो मनुष्य प्राणायाम के इस गूड विज्ञान को सिध कर लेता है, वह जीवनकाल में
18:10ही काल और मृत्यु के चक्र से मुक्थ हो जाता है
18:15प्राणायाम और श्वास के इस परम ज्ञान को ग्रहेन कर गरुर पूर्णत है त्रिप्थ हुए और उनका चित आत्म ज्ञान
18:22के अंतिम ध्ये के लिए तैयार हो गया
18:25तब गरुर ने भगवान विष्णु के श्री चर्णों में मस्तक जुका कर पूचा की सतकर्म और प्राणायाम के पष्चात भी
18:32वह कौन सा अंतिम और सुक्ष्म बंधन है जो जीवात्मा को मोक्ष प्राप्त करने से रोकता है
18:40भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि अविद्या का सबसे कड़ा और अंतिम बंधन सुक्ष्म अहंकार है जो
18:48जीवात्मा को परमात्मा से अलग होने का मिथ्याभ्यम बनाए रखता है
18:54परमेश्वर ने समझाया कि जब तक मनुष्य मैं करता हूँ के अभिमान में फंसा रहता है तब तक उसके श्रिष्ट
19:01कर्म भी उसे जन्म और मृत्यु के अटूट चक्र से बांध कर रखते हैं
19:07सुक्ष्म द्रिष्टी में जीवात्मा का रूप प्रकट हुआ जो देहा भिमान और अपनी उपलब्धियों के अग्रिश्य किन्तु सुद्रिड सुनहरे धागों
19:15में उलजा हुआ संसारी बंधन में पड़ा रहता है
19:20भगवान विश्णु ने सचेत करते हुए कहा कि बड़े-बड़े ज्यानी तपस्वी और पंडिक भी तब मार्ग से भटक जाते
19:27हैं जब उनके भीतर अपने ज्यान और तपस्या का सूक्ष्म गर्व उत्पन हो जाता है
19:34इस परमगूर चेतावनी को सुनकर गरुड अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनते हुए अपने पंखों को पूर्ण समर्पन भाव से नमित कर अपने
19:43स्वामी के दिव्य वचनों को आत्म साथ करने लगे
19:47श्रीहरी ने उजागर किया कि सच्चा स्वस्तित्व अह ब्रहमास्मी का दिव्य बोध है जबकि मिथ्या अहंकार केवल इस नश्वर शरीर
19:55और बुद्धी के साथ असत्यतादात्म्य है
20:00आमकार के इस कठोर आवर्ण को तोड़ने का प्राथमिक और अचूक साधन बताते हुए भगवान ने पूर्ण शर्नागती और निश्काम
20:08भक्ती का महामार्ग प्रकट किया
20:11जैसे प्रातहकाल के प्रखर सूर्य के आलोक में भोर का कोहरा विलीन हो जाता है
20:16वैसे ही भगवच्चर्णों में पूर्ण समर्पन से साधक का प्रिथक अहंकार क्षनभर में भस्म हो जाता है
20:24तत्पश्चात नारायन ने आत्मविचार की अंतरमुखी विद्या का रहस्य खोलते हुए को हम अर्थात मैं कौन हूं के निरंतर अनुसंधान
20:33का उपदेश दिया
20:35उन्होंने गरूर को हरिदय की उस सुक्ष्म ग्रंथी का बोध कराया जहां चित्त और अज्यान की गांठ बंधी होती है
20:42जिसे केवल विवेक रूपी खडगही काट सकता है
20:47भगवान ने पंचकोशों का वर्णन करते हुए स्पष्ट किया कि किस प्रकार अहंकार बुद्धी और अन्नमय कोश के आवर्ण में
20:55छिटकर जीवात्मा को अपने वास्तविक स्वरूप से दूर रखता है
21:00गरुड ने विनीच स्वर में पुनह प्रश्न किया कि है प्रभू, ग्रिहस्थ और साधारन संसार में रहने वाला मनुष्य इस
21:08सुक्ष्म अहंकार का दमन किस प्रकार कर सकता है
21:13भगवान विश्णु ने निशकान कर्मयोग का रहस्य बताते हुए कहा कि मनुष्य को अपने समस्ट कर्मों के फल परमिश्वर को
21:20समर्पित कर निश्पक्ष भाव से दायत्वों का निर्वाह करना चाहिए
21:25जो मनुष्य सफलता और विफलता में संभाव रखकर कर्म करता है, उसका अंतहकरन दर्पन की भांती निर्मल होकर अहंकार के
21:34कलंक से सदा मुक्त रहता है
21:38भगवान ने गर्जना करते हुए ज्यान की परम शक्ती प्रकट की, जहां ज्यान रूपी तीक्षन खडग अग्यान और करतापन की
21:45गांठ को एक ही प्रहार में सदा के लिए काट देता है
21:50जैसे ही अहंकार का वह अंतिम परदा छिन नभिन हुआ, संपूर्ण ब्रहमाड में अद्वैत सत्य और अनंत परमानंद की दिव्य
21:59जोती प्रस्वुटित हो उठी
22:01श्रीहरी ने अंतिम सिध्धान्त घोशित किया कि अहंकार के नश्थ होते ही जीवात्मा का प्रिथक अस्तित्व समाप्थ हो जाता है
22:09और वह परमेश्वर के साथ एकाकार हो जाती है
22:14इस परम सत्य की अनुभूती करते ही गरूर की चेतना में अगाध शान्ती चा गई और उनका चित्त द्वैत के
22:21समस्त संश्यों से पूरी तरह मुक्त हो गया
22:25भगवान विश्णु ने अभय मुद्रा धारण कर गरूर को आशिरवाद दिया और संपूर्ण वैकुंठ लोक में सोहम का पावन अनाहत
22:33नाध गूजने लगा
22:36सोहम के महानाध के शान्त होते ही भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ अपने नेत्र खोले और गरूर को
22:43माया के उस भ्रम के बारे में बताना शुरू किया जो आत्मा को पर्मात्मा से अलग दिखाता है
22:50श्रीहरी ने समझाया कि जिस प्रकार एक मिट्टी के घड़े के तूटने पर उसके भीतर का शुन्य आकाश असीम महा
22:58आकाश में मिल जाता है
22:59उसी प्रकार पंच्तत्वों से बने शरीर के नश्ट होने पर जीवात्मा अनंत ब्रहमा में विलीन हो जाती है
23:07गरुर ने विस्मय से देखा कि भगवान विश्णों के विशाल वक्षस्थल पर संपूर्ण ब्रहमांड खूमते हुए नक्षत्र और जलते हुए
23:16तारे एक महा सागर की लहरों की तरह प्रवाहित हो रहे थे
23:21परमेश्वर ने सागर और उसकी लहरों का उदाहरन देते हुए कहा कि जैसे तरंग सागर से भिन्द नहीं होती वैसे
23:28ही स्रिष्टी का प्रत्येक जीव परमात्मा का ही एक स्पंदन मात्र है
23:34उन्होंने आगे कहा कि अज्ञान के अंधकार में फंसा मनुष्य रस्सी को साम्प समझकर भैभीत होता है परंतु ज्ञान का
23:42प्रकाश होते ही वह भैस्वतह ही समाप्थ हो जाता है
23:47जैसे ही भगवान ने यह कहा उनके मुकुट और नेत्रों से आत्मज्यान की एक तीवर दिव्यकिरन निकली जिसने संपूर्ण वैकुंठ
23:55को परम सत्य के आलोग से प्रदीप्त कर दिया
23:59नारायन ने गरुड को जागरित, स्वपन और सुशुक्ती नामक तीन अवस्थाओं से परे चौथी अवस्था तुरिय का ज्यान दिया जो
24:07आत्मा का वास्तविक और निर्विकार स्वरूप है
24:11इस परम सत्य को सुनकर गरुड ने अपनी आखे मूंद ली और स्वया को इन तीनों सांसारिक अवस्थाओं से उपर
24:19उठा कर शूनी की असीम शांती में लीन अनुभव करने लगे
24:24भगवान विश्णू ने समझाया कि मन और बुद्धी केवल बाह्य साधन है जबकि आत्मा उस शांत साक्षी की तरह है
24:32जो केवल शांत रहकर जीवन के इस खेल को देखती है
24:37श्रीहरी के दाहिने हस्थ से एक सुनहरी प्रकाश की धारा प्रवाहित होकर गरुर के हृदय में प्रवेश कर गई जिससे
24:45उन्हें चराचर जगत के सभी जीवों की एक्ता का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगा
24:51विश्नुजी ने जीवन मुक्त पुरुष के लक्षन बताते हुए कहा कि जो व्यक्ती सुखदुख, माना अपमान और लाभानी में सदा
24:59संभाव रहता है वह जीते जी मुक्त है
25:03गरुर के समक्ष एक दिव्य छवी उभी जिसमें एक तपस्वी धधक्ती हुई दावानल और बर्फीले तूफान के बीच भी पूर्णत
25:11शांत और ध्यानमगन बैठा हुआ था
25:15जगननाथ ने सपश्ट किया कि असली पूजा किसी मंदेरिया कर्मकांड में नहीं बलकि स्वयं के भीतर और हर जीवित प्राणी
25:23में छिपी परमात्मा की सत्ता को पहचानने में है
25:27इस ज्ञान के प्रभाव से गरूर को संपूर्ण ब्रहमांड उर्जा के एक विशाल जाल की तरहे दिखने लगा जहां प्रत्येक
25:35धागा एक ही परम प्रकाश स्रोट से जुड़ा हुआ था
25:40श्रीहरी ने उद्गोशित किया कि जब मैं का यह मिथ्या अहंकार पूरी तरहे पिखल जाता है तब केवल सच्चिदानंद का
25:47असीम और आनंदमय स्वरूप ही शेश रहता है
25:52इस महान सत्य के प्रक्टीकरण से वैकुंठ के सभी कल्पवरिक्ष और दिव्य नदिया सोने और नीलम की आभासे चमकने लगी
26:00मानो वे भी इस अद्वैत ज्यान का उच्सव मना रही हो
26:05गरूर ने अश्रुपूरिक नेत्रों के साथ अपने विशाल पंखों को फैला कर भगवान विश्नु के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया
26:13और अपने प्रिथक अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित कर दिया
26:18भगवान विश्नु ने अपने अभए हस्त को आगे बढ़ाया और गरूर के मस्तक को छुकर उन्हें उस परम आनंद की
26:25अनुभूती कराई जो शब्दों और विचारों से परे हैं
26:30गरूर को ऐसा प्रतीत हुआ कि उनका हृदय विस्त्रित होकर महासागरों, परवतों, तारों और आकाश गंगाओं को अपने भीतर समेट
26:39चुका है और वेस्वय ही यह ब्रहमांड बन गए हैं
26:44अन्ता व्यकुंठ की सभा में एक दिव्य और परम मौन चा गया, जहां भगवान विश्णू और गरूर बिना किसी शब्द
26:51के केवल अधवैत के अखंड सत्य में एक होकर विराजमान थे
26:57विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ अपनी अनंत शक्ती को समेटते हुए धीरे से उस गहन मौन को भंकिया, मानो
27:05गरूर को वापस लौकिक चेतना के किनारे ला रहे हूँ
27:09गरूर ने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली, उनके भीतर अभी भी उस अधवैत आनंद की प्रतिध्वनी गूंज रही थी, और
27:17उन्होंने भगवान विश्णू को एक नए गहन बोध के साथ देखा, मानो वे पहली बार उन्हें साक्षात अनुभव कर रहे
27:25हूँ
27:27भगवान विश्णू की वानी अब वैकुंठ के वातावर्ण में एक दिव्य संगीत की तरह गूंजी, जो उस परम सत्य की
27:34ओर संकेत कर रही थी, जिसे गरूर ने क्षण भर के लिए अनुभव किया था
27:40उन्होंने समझाया कि इस अलौकिक अनुभव को जो अपने दैनिक जीवन में भी बनाए रखता है, वही जीवनमुक्त कहलाता है,
27:48जो जीवित रहते हुए भी माया के बंधनों से मुक्त हो चुका होता है
27:54जीवनमुक्त आत्मा इस संसार में रहती है, सभी क्रियात लाप करती है, किन्तु वह कमल के पत्ते पर पानी की
28:01बूंद की भांती संसार से पूर्णत है अप्रभावित रहती है
28:07उसके लिए सुख और दुहक, लाब और हानी, यश और अप्यश सब एक समान होते हैं, क्योंकि वह द्वंद्वों से
28:14परे अपनी आत्मिक अवस्था में स्थिर रहता है
28:19उसकी इंद्रिया विश्यों में विचर्ण करती हैं, परन्तु उसका मन सदैव आत्मग्यान में लीन रहता है, जैसे कोई साक्षी मात्र
28:27होकर जगत को देखता है
28:30वह न किसी चीज की इच्छा करता है और न किसी चीज से घ्ञिना, उसके कर्म सहज होते हैं, बिना
28:37किसी फल की आसकती के प्रकृती के एक अबाध प्रवाह की तरह
28:43उसके भीतर से अहंकार का परदा हट चुका होता है और वह स्वयं को केवल एक उपकरण मानता है जिसके
28:50माध्यम से दिव्य इच्छा कार्य करती है
28:54संसार की उलजने उसे स्पर्ष नहीं कर पाती जैसे हवा की तेज धारा किसी परवत को हिला नहीं सकती उसका
29:02मन अटल और स्थिर रहता है
29:05वह हर प्राणी में परमात्मा का अंश देखता है चाहे वह एक छोटा कीड़ा हो या स्वयं ब्रह्मा उसके लिए
29:13कोई भेद नहीं रह जाता
29:16ऐसे जीवन मुक्त अत्यंत दुर्लब होते हैं जैसे समुदर में अन्मोल मोती जो सहचता से प्राप्त नहीं होते
29:24गरुर ने गहन एक आगरता से भगवान विश्नों के प्रत्येक शब्द को सुना उनके हृदय में ज्यान का एक नया
29:31द्वार खुल रहा था और उनकी जिग्यासा शान्त होने के बजाए और भी प्रगाड हो रही थी
29:38भगवान ने आगे कहा कि बाहर से जीवनमुक्ट सामान्य मनुश्यों जैसा ही प्रतीत होता है पर उसके भीतर का संसार
29:46ब्रहमा से एक हो चुका होता है
29:50उसकी हर श्वास, हर द्रिष्टी, हर मौनक्षन में परम आनंद और अखंड शान्ती का अनुभव होता है जो बाहर की
29:57किसी भी परिस्थिती पर निर्भर नहीं करता
30:01वह अपने शरीर को केवल वस्त्र के समान मानता है जिसे वह धारन करता है पर जिससे वह स्वयन को
30:08कभी भी एकाकार नहीं करता
30:11ऐसे मुक्थ पुरुष समाज के कल्यान हेतु कर्म करते हैं बिना किसी स्वार्थ के केवल लोकसंग्रह की भावना से प्रेरित
30:20होकर
30:21उनका जीवन स्वय ही एक उपदेश बन जाता है, जहां हर कर्म, हर शब्ध, हर मौन ज्ञान का स्रोत होता
30:28है
30:30गरुर के मन में अब परमसत्य की एक स्पष्ट छवी उभर आई थी, वह समझ गए थे कि वास्तविक मुक्ती
30:37भी तरसे आती है, बाहर के कर्मों से नहीं
30:41भगवान विश्णु ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि यही ब्रहमग्यान का वह महा रहस्य है, जिसे जान लेने
30:49पर आत्मा स्वयं परमात्मा बन जाती है
30:53भगवान विश्णु ने आगे बताते हुए कहा कि जो साधक ब्रहमग्यान से परिपूर्ण हो जाता है, उसके लिए मृत्यु काक्षन
31:01किसी कष्ट का नहीं बलकी परम उत्सव का काल बन जाता है
31:06उन्होंने स्पष्ट किया कि अग्यानी जीवों की भाती ज्ञानी आत्मा को देह त्यागने के बाद किसी यातना या लंबे यात्रा
31:14मार्ग से होकर नहीं गुजरना पड़ता
31:18जैसे कोई मनुष्य अपने पुराने वस्त्रों को सहस्ता से उतार फेंकता है, वैसे ही ब्रहम ज्ञानी की आत्मा बिना किसी
31:26भई या वेदना के इस भौतिक शरीर को छोड़ देती है
31:30उस परम ज्ञानी आत्मा के समीब आते ही यमलोग के भयानक द्वार स्वतय बंध हो जाते हैं और यमराज का
31:38अधिकार क्षेत्र वही समाप्थ हो जाता है
31:42स्वयन्याय के देवता यम्राज और उनके दूत दूर से ही उस दिव्यल जोतिर्मय आत्मा को देखकर नत्मस्तक हो जाते हैं
31:51वह खौलती हुई भयानक वैतर्नी नदी जो पापी जीवों को भयभीत करती है ब्रहम ज्यानी के चरण स्पर्ष से पूर्व
32:00ही शान्थ होकर निर्मल भाप में बदल जाती हैं
32:04यम मार्ग की वह तप्ती हुई बालू और नुकीले काटे उस सिध्ध आत्मा के लिए ततकाल कोमल कमल के फूलों
32:11में परिवर्तित हो जाते हैं
32:14गरुर पुराण में वर्नित वे सोलह अत्यंत कठिन और दारोन यातनाय ब्रहम ज्यान की अग्नी में भस्म होकर लुप्थ हो
32:22जाती हैं
32:24गरुर जी अत्यंत श्रद्धा पूर्वक हाथ जोड़ कर प्रभु के मुख से इस अलोकिक और दुर्गम मार्ग के बाइपास की
32:31गाथा सुनते रहे
32:33श्रीहरी ने समझाया कि जिस प्रकार प्रचंड अग्नी इधनों को भस्म कर देती है उसी प्रकार ब्रहम ज्यान आत्मा के
32:41जन्मजन मांतर के समस्ट संचित कर्मों को क्षण भर में समाप्थ कर देता है
32:47ततपश्चात वह प्रकाश्मान आत्मा सूर्यमंडल को भेद कर भौतिक ब्रहमांड की सीमाओं से परे परम व्योम में प्रवेश करती है
32:57मार्ग में स्थित स्वर्गलोक के देवता और गंधर्व उस मुक्त आत्मा पर दिव्य पुष्पों की वर्षा करते हुए उसका अभिनन्दन
33:05करते हैं
33:07वह आत्मा स्वर्ग केक्षनिक सुखों और अपसराओं के आकर्षन को त्याग कर केवल परम सत्य की और निरंतर अग्रसर होती
33:15रहती है
33:17अनंत आकाश में अचानक एक दिव्यत, अलौकिक और स्वर्णिम जोती का महासागर प्रकट होता है जिसकी चमक करोडो सूर्यों से
33:26भी अधिक होती है
33:28उस परम प्रकाश के संपर्क में आते ही आत्मा का व्यक्तिगत अहंकार, रूप और नाम का सीमांकन पूर्णथा विलीन होने
33:36लगता है
33:38जैसे नदी की एक गूंद विशाल महासागर में मिलकर स्वयम महासागर बन जाती है, वैसे ही वह आत्मा ब्रह्मा में
33:46एकाकार हो जाती है
33:49वह तेजस्वी आत्मा सीधे सर्वव्यापी परमात्मा की अनंत चैतन्य जोती में सदास्दा के लिए समाहित हो जाती है
33:59संपूर्ण ब्रहमांड में एक परमशांती और आनंद का नाद गूंज उठता है क्योंकि एक और आत्मा सदा के लिए मुक्थ
34:07होकर परमात्मा बन चुकी होती है
34:10गरुर्देव ने भगवान विष्णु के श्रीचर्णों में दंडवत प्रणाम करते हुए इस परम रहस्य की प्राप्ती पर स्वयन को अत्यंत
34:18धन्यमाना
34:20भगवान विष्णु ने अपने अभय हस्त से गरुर को आशिरवाद देते हुए घोशना की की यही ब्रहमग्यान समस्त दुहकों का
34:28अंत और अंतिम परमगती है
34:31परम ज्यान के प्रकाश से सराबोर होकर गरुर्देव के नेत्र भक्ती अश्रूओं से छलक उठे और उनका संपून अस्तित्व असीम
34:40आनंद में निमग्न हो गया
34:42गरुर्देव ने हाथ जोड कर कहा कि प्रभु के वचनों ने उनके चित्त से अज्यान का गेहन अंधकार पूनत मिटा
34:50दिया है
34:52भगवान विश्नु के दिव्यमुख मंडल पर एक मंद आत्मिय मुस्कान तैर उठी जिसकी रश्मियों से समस्त वैकुन्ठ लोक आलोकितो उठा
35:02श्रीहरी के अभय वर्दान ने पक्षी राज गरूर को यह विश्वास दिला दिया कि ब्रहमांड की कोई भी शक्ती अब
35:09उनके विवेक को डगमगा नहीं सकती
35:12गरूर्देव का मन अब पूर्णत शान्त हो चुका था जैसे तूफानी समुद्र के पश्चात कोई अतिशीतल सरोवर निश्चल हो जाता
35:21है
35:22समस्त देवगन और अपसराएं वैकुंट के गगन में प्रकट होकर इस महाग्यान के पूर्ण होने पर दिव्य पुष्पों की वर्षा
35:30करने लगे
35:32ओमकार की गूर्ध्वनी पूरे ब्रहमांड में गूँज उठी जिसने समस्त लोकों की आत्माओं को पवित्रता का बोध कराया
35:41तकपश्चात गरुर्देव ने पुना विनीद स्वर में प्रशन किया कि क्या संसारी जीवों की रक्षा हे तु सुरक्षाक्वच का भी
35:49कोई रहस्य है
35:51भग्वान श्रीहरी ने प्रसन्न होकर बताया कि वैदिक मंत्र और सुरक्षाक्वच आत्मा को सांसारिक दुखों और नकारात्मक शक्तियों से बचाते
36:00हैं
36:02एक पुन्यात्मा के चारों और निर्मित होने वाले इस अभेद्य सुरक्षाक्वच का दृष अत्यंत अलौकिक और तेजस्विथा
36:11गरुर्देव अपने स्वामी की इस अनंत क्रिपा को देख कर पुना उनके चर्णों में जुख गए
36:18भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया की कर्म, भक्ती और अनुष्ठानों का सामंजस्य ही मनुष्य को मुक्ती के द्वार तक पहुचाता
36:25है
36:27नारद मुनी और सनत कुमार जैसे परम वैश्णव भी इस महान समवात का साक्षी बनने हेतू वैकुंठ में उपस्थित हुए
36:36गरुर्देव ने यह संकल्प लिया कि वे इस ब्रहमग्यान और धर्म की मर्यादा को संसार के कोने-कोने तक पहुचाएंगे
36:45भगवान विश्णू ने गरुर को आशिरवाद देते हुए कहा कि यह गरुर पुरान मानव जाती के लिए सदास्दाहेतू मोक्ष का
36:53मार्गदर्शक बनेगा
36:55इस पावन संदेश से गरुर देव का तेज अत्यधिक बढ़ गया और उनका संपूर्ण शरीर दिव्य अगनी के समान प्रदीप्थ
37:03होने लगा
37:05स्रिष्टी के समस्त नियम, ब्रहमांड की संरचना और पित्रों की त्रिप्ती के आगे के अध्याए अब खुलने वाले थे
37:14भगवान विश्णु और गरुर देव के मध्यका यह समवाद मात्र एक कथा नहीं, अपितु आत्मा से परमात्मा के मिलन की
37:21अमरगाथा है
37:24वैकुंठ का प्रत्येक कन इस पावनक्षन का साक्षी बनकर ब्रहम ज्यान के आनंद में सराबोर हो उठा
37:31और इस प्रकार गरुर पुरान के इस महान अध्याय का समापन हुआ, जिसने आने वाले युगों के लिए ज्यान का
37:39अमरदीक प्रजवलित कर दिया

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