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गरुड़ पुराण के 29वें एपिसोड में भगवान विष्णु, गरुड़ को नरक के उन और भी भयानक कुंड़ों में ले जाते हैं जहाँ आत्मा को उसके जघन्य पापों का और भी घृणित दंड भुगतना पड़ता है। इस कड़ी में जानें कैसे पापी आत्माएँ 'सुकरमुख' में रौंदी जाती हैं, 'कृमिभोजन' में कीड़े खाती हैं, 'अयःपान' में उबलता लोहा पीती हैं, और 'सूचीमुख' में सुईयों से छेदी जाती हैं। हर पाप का एक निश्चित, भीषण परिणाम है। क्या आप तैयार हैं कर्मों के इस अदृश्य लेखा-जोखा के और भी गहरे रहस्यों को जानने के लिए? यह एपिसोड आपको धर्म और अधर्म के गूढ़ सिद्धांतों का साक्षात्कार कराएगा। #गरुड़पुराण #GarudaPurana #नरक #Narak #कर्मफल #Karma #विष्णु #Vishnu #गरुड़ #Garuda #हिंदूधर्म #Hinduism #पाप #Sin #पुनर्जन्म #Rebirth #आत्मा #Soul #मृत्युकेबाद #Afterlife
Transcript
00:00भगवान विश्नु अनन्त ब्रहमांडों के साक्षी गरुर से कहते हैं कि पापी आत्मा की नरक यात्रा अभी भी अधूरी है,
00:08क्योंकि उसे अब और भी भयावह लोकों में प्रवेश करना होगा जहां पापों के अनुसार नई पीडाय प्रतीक्षा कर रही
00:15हैं.
00:17गरुर्प भय और जिग्यासा से भरे उस अनकही पीडा का विवर्ण सुनने के लिए व्याकुल होते हैं, जिसकी कल्पना भी
00:24उनकी दिव्य चेतना को जगजोर रही थी.
00:28पिछली यातनाओं से जरजर अर्धचेतन आत्मा को यमदूत बिना किसी दया के एक ऐसे भयावह मार्ग पर घसीटते हैं, जो
00:37नरक के सबसे क्रूर और घ्रेनित लोकों की ओर जाता है.
00:41यह मार्ग सीधे तप्तसुर्मी नरक की ओर ले जाता है, जहां पापियों को उबलते हुए पिघले लोहे का सेवन करने
00:49की अकलपनिय यातना सहनी पड़ती है.
00:53यमदूत आत्मा को कुरूरता पूर्वक उस जलते हुए लोहे के कुंड के पास लाते हैं, जहां से निकलती भाप ही
01:00आत्मा को जलाकर भस्म करने की शक्ती रखती है.
01:05बिना पलक जपकाए, एक यमदूत एक विशाल कल्ची में धधकता हुआ पिघला लोहा भरता है, जिसकी तपिश से आसपास की
01:13हवा भी जलने लगती है.
01:16आत्मा के प्रतिरोध के बावजूद, उस दहकते हुए तरल धातु को उसके विवश मुख में उडेल दिया जाता है, जिससे
01:24उसकी पूरी चेतना एक असहनिय अगनी में लिपट जाती है.
01:29भीतर से जलती हुई आत्मा चीक उठती है, उसकी हर कोशिका पिघलते हुए लोहे की आच से जलती है, जिससे
01:37उसके अस्तित्व का हर क्षण अनंत पीडा में बदल जाता है.
01:42तप्ट सुर्मी की यातना से थोड़ी राहत मिलने से पहले ही आत्मा को क्रिमिभोजन नरक की ओर घसीटा जाता है,
01:50जहां उसे दुरगंधयुक्त कीडों का घिनोना भोजन करने पर विवश्च किया जाता है.
01:56क्रिमिभोजन का लोक एक विशाल दल्दली भूमी है, जहां हर इंच पर घिनोने कीडे रेंगते हैं और हवा में सडन
02:04की असहनिय दुरगंध व्याप्त है.
02:07यम्दूत आत्मा को कीचड और कीडों से सने फर्ष पर पटक देते हैं, और फिर जबरगस्ती उसके मुह में उन
02:15रेंगते हुए दुरगंधयुक्त जीवों को ठूसते हैं.
02:19आत्मा को मजबूरन उस घिनोने भोजन को निगलना पड़ता है, जिससे उसका पेट फटता हुआ महसूस होता है, और उसकी
02:28अंतराक्मा घेना वपीडा से काप उठती है.
02:32यह उन पापियों की नियती है, जिन्होंने जीवन में दूसरों को धोखा दिया, पराया धन हडपा या पवित्र भोजन को
02:40अपवित्र किया.
02:42गरुर का हृदय इन भयानक ग्रिश्यों और उनके पीछे के कर्मविधान को सुनकर व्याकुल हो उठता है, उनकी दिव्य आखें
02:50भी नम हो जाती है.
02:53भगवान विश्णों आगे बताते हैं कि इन नर्कों के बाद आत्मा को वैतर्नी नदी पार करनी पड़ती है, जो रक्त,
03:00मवाद, बाल और हड्डियों से भरी एक भयानक धारा है.
03:05यह नदी उन पापियों के लिए है, जिन्होंने जीवन में दूसरों को कष्ट पहुँचाया या गुरुजनों का अनादर किया, उनके
03:14लिए वैतर्नी का पार करना ही सबसे बड़ी सजा है.
03:18वैतर्नी के तट पर खड़े यमदूत आत्मा को बिना किसी देरी के उस भयानक नदी में धकेल देते हैं, जहां
03:25अनकिनक मांसभक्षी जीव उसका इंतजार कर रहे होते हैं.
03:31आत्मा नदी के खूनी जल में गिरती है, जहां उसे तीखी हड्डियों और नुकिले पत्थरों से खरोंचा जाता है, जबकि
03:38जल में रहने वाले मांसाहारी जीव उसे नोचते और खाते हैं.
03:44यम्दूत तट पर खड़े होकर आत्मा की चीखों का आनंद लेते हैं, अपनी कोडे फटकारते हुए उसे और गहरे जल
03:52में धकेलते हैं, जहां पीडा का कोई अंत नहीं.
03:56भगवान विश्णु गंभीरता से कहते हैं कि नरक के ये द्वार केवल शुरुवात हैं, क्योंकि पापी आत्मा को अभी भी
04:04कई और अकल्पनिय कष्टों का सामना करना होगा.
04:08भगवान विश्णु ने गंभीर स्वर में अपनी दिव्यवानी जारी रखी, यह समझाते हुए कि नरक के ये भीशन द्वार मात्र
04:16एक भयानक यात्रा की शुरुवात हैं, जहां आत्माओं को अभी भी ऐसे कष्टों का सामना करना होगा जिनकी कल्पना भी
04:24असंभव है.
04:26उन्होंने आगे कहा कि उनकरूर शास्कों और अधिकारियों के लिए जिन्होंने अपनी प्रजाकों निर्गैता से कुछला और अन्याय पूर्वक दबाया
04:35एक और भयंकर नरक प्रतीक्षारत है, जिसे सुकर्मुख कहा जाता है.
04:41यह ऐसा शेत्र था जहां की भूमी लाल, चिपचिपी रक्त और मवाद से लत्पत थी, जिसके उपर काले, नुकीले, पत्थरों
04:50की चोटिया भयावह रूप से आकाश की ओर उठी हुई थी, और वातावर्ण में सडन की दुर्गंध व्याप्त थी.
04:58इसी भयावह भूमी पर दरावने यमदूत, जिनकी आखें आग की तरहा देहक रही थी, और हाथ में तीखे कोडे थे,
05:06असंख्य पापी आत्माओं को घसीकते हुए आगे बढ़ा रहे थे, जो भय से काप रही थी.
05:13ये वे आत्माओं थी, जिन्होंने धर्ती पर राजा, मंत्री या अधिकारी के रूप में अपनी शक्ती का दुरुप्योग किया था,
05:21अपनी प्रजा पर अत्याचार किये थे, और उनकी संपत्ती को अन्याय से हडपा था.
05:27उनके सामने सुकर्मुख के केंदर में एक विशालकाय प्राचीन कोलहु खड़ा था, जिसके भारी लकडी के लठे और पत्थर के
05:36चक्के सदियों के पापों को कुचलने के लिए तैयार दिख रहे थे.
05:41क्रूर यम्दूत जिनकी आखों में शैतानी चमक थी, अपनी लोहे की छडों से आत्माओं को धकेलते हुए, उन्हें उस विशालकोलहु
05:49के अंधेरे मुहाने की ओर मजबूर कर रहे थे.
05:53आत्माओं चीखती चिल्लाती रही, अपनी पीडादायक नेती से बचने की निरर्थक कोशिश करती रही, जब उन्हें एक-एक करके उस
06:02भयावा यंत्र के संकरे अंधेरे फनल में धकेल दिया गया.
06:07एक धीमी करकश गर्जना के साथ कोलहु का विशालकाय लकडी का बीन घूमना शुरू हुआ, जो नरक की इस यातना
06:15को गती देने के लिए तयार था.
06:18पहले कुछ आत्माय जिन्हें अभी-भी भीतर धकेला गया था, भारी पत्थर के चक्कों के बीच फंस गई, उनके शरीर
06:26अस्वाभाविक रूप से मुर गये और अविश्वस्निय दबाव में कुचलने लगे.
06:32रक्त और अन्य चिपचिपे द्रव्य, आत्माओं के कुचले हुए शरीरों से रिस्ते हुए, कोल्हु के किनारों से बाहर निकलने लगे,
06:40जिससे एक धिनोना, लाल रंग का जहरना बन गया.
06:44उनकी पहचान मिख चुकी थी, अब वे सुवरों की तरह कुचले हुए मास के ढेर में बदल चुके थे, ठीक
06:51वैसे ही जैसे वे निर्दई शासक अपनी प्रजा को कुचलते थे.
06:56यह भयानक प्रक्रिया अन्वरत चलती रही, एक के बाद एक आत्मा कोलहु में धकेली जाती रही और भयंकर दर्द के
07:04साथ कुचली जाती रही, जिससे सुकर्मुख की भूमी पर और अधिक रक्त और निराशा फैलती गई.
07:11एक क्षण के लिए उनकी यातना का अन्थ हो जाता, उनके कुचले हुए रूप निश्क्रिय पड़े रहते, मानो मृत्यूने उन्हें
07:19मुक्ती दे दी हो.
07:21परंतु यह नरक की कुरूर चाल थी, अगले ही पल, एक भयानक दिव्य उर्जा उनके क्षत्विक्षत शरीरों में प्रवाहित होती,
07:30और वे पूरी तरह से फिर से जीवित हो उठते, पहले जैसे ही पीडादायक अवस्था में.
07:37और फिर से नवजीवित आत्माए, जिनकी स्मृती में पिछली यातना ताजा थी, स्वयन को उस घूमते हुए यंत्र के चंगुल
07:45में पाती, जो उन्हें एक बार फिर कुचलने के लिए तयार था.
07:50निराशा और आतंक की उनकी चीखें सुकर्मुख के उजाड और वीरान परिद्रिश में गूंज उठती, जब वे जानते थे कि
07:58उन्हें बार बार उसी अकल्पनिय यातना का सामना करना पड़ेगा.
08:03यमदूत, तटस्थ और क्रूर भाव से उस भयावा चक्र को देखते रहते, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई भी आत्मा
08:11अपनी पीडा के इस अंथीन निरित्य से बच न सके.
08:16भगवान विश्णों ने गंभीर स्वर में बताया कि यह अंथीन यातना उन लोगों के लिए है, जिन्होंने अपने स्वार्थ के
08:24लिए अपनी प्रजा के जीवन को कुचला और उनका शोशन किया.
08:28इस नरक में उन्हें ठीक वैसी ही असहनिय पीडा का अनुभव कराया जाता है, जैसी उन्होंने अपनी प्रजा को अपनी
08:37कुरूरता से दी थी, एक कार्मिक प्रतिशोध जो उनके हर बुरे कर्म का हिसाब चुकाता है.
08:44भगवान विश्णुने अपनी दिव्य आभा से प्रकाशित होते हुए, आगे आने वाले एक और भयानक नरक का वर्णन करना प्रारंभ
08:52किया, जहां स्वार्थी आत्माओं को उनके कर्मों का भयानक फल भोगना पड़ता है.
08:59गरुर अपने तेजस्वी पंखों को धीमे से फड़फडाते हुए, अपने स्वामी के प्रत्येक शब्द को अत्यंत गंभीरता और विस्मय के
09:07साथ सुन रहे थे, उनके सुनहरे नेत्रों में ब्रहमांडिय ज्ञान की प्यास जलक रही थी.
09:14भगवान विश्नु ने बताया कि यह अगला नरक, जिसे क्रिमि भोजन कहा जाता है, उन आत्माओं के लिए है, जिन्होंने
09:21अपने जीवनकाल में केवल स्वयन के लिए जिया और दूसरों के साथ कभी कुछ साजह नहीं किया.
09:29उन्होंने उन आत्माओं का जिक्र किया, जो स्वादिष्ट भोजन का आनंद अकेले लेते थे, या अपने भोजन के लिए निर्दोष
09:36जीवों की निर्मम्ता से हत्या करते थे, बिना किसी दया या पच्चतावे के.
09:42यह उन लाल्ची और क्रूर लोगों के लिए एक गंड है, जो संसार के जीवों के प्रती कोई करुणा नहीं
09:49रखते थे, केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते थे.
09:55जैसे ही भगवान विश्णू ने यह कहा, द्रिश्य बदल गया, और गरूर ने अपनी आखों के सामने क्रिमिभोजन नरक की
10:02भयावता को प्रत्यक्ष देखा.
10:05यह एक विशाल, काला और गहरा तालाब था, जिसका पानी नहीं, बलकि सड़ते हुए मास और मवाद का एक घिनोना
10:13दुर्गंधयुक्ट दलदल था.
10:16तालाब की गहराई से, करोडों की संख्या में भयानक मांस भक्षी कीडे रेंगते हुए उपर आ रहे थे, जिनकी आखें
10:24चमकदार लाल थी और उनके नुकीले दात किसी भी जीविक चीज को फाड़ने के लिए तयार थे.
10:31इस दुर्गंधयुक्ट दलदल में उन पापी आत्माओं को फेंक दिया गया था जिन्होंने दूसरों को कभी भोजन नहीं दिया, और
10:39अब उन्हें स्वय भयानक भोज बनने के लिए मजबूर किया गया.
10:44जैसे ही आत्माओं पानी में गिरी, लाखों कीडे तुरंत उनकी ओर लपके उनके पारभासी शरीरों को एक ही पल में
10:52घेर लिया, जैसे भूखे शिकारी शिकार पर तूट पड़ते हैं.
10:57कीडे आत्मा के हर अंको, भीतर और बाहर से निर्दैता पूर्वक कुतरने लगे, जिससे उसे निरंतर असहनिय दर्द और घेना
11:06की अनुभूती होती रही.
11:09प्रत्य कीडे का हर गंश एक गहरा, जलता हुआ घाव छोड़ जाता था, जो कभी भरता नहीं था, बलकि अगले
11:17कीडे के लिए एक नया प्रवेश द्वार बन जाता था.
11:21उनकी चीखें हालां की अद्रिश थी, फिर भी उस भयानक नरक की वायू में एक भारी निराशाजंक ध्वनी के रूप
11:29में गूँज रही थी.
11:32स्वार्थी आत्माए इस निरंतर मांस भक्षी भोज से बचने के लिए छट पटाती रही, लेकिन दलदल की चिपचिपी पकड़ और
11:40कीडों की अंथीन संख्या से कोई मुक्ती नहीं थी.
11:44यमदूत अपने लोहद्रिड संकल्प और निर्विकार भाव से तटस्थता से खड़े थे, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्येक पापी आत्मा
11:53को उसके कर्मों के अनुसार सटीक पीड़ा मिले.
11:57भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि यह नरक उन स्वार्थी लोगों के लिए है, जिन्होंने कभी दूसरों को कुछ
12:04नहीं दिया, और अब उन्हें स्वया अपने शरीर को एक भयानक और अंथीन भोज के रूप में प्रस्तुत करना होगा.
12:12इस यातना में शारिरिक दर्द के साथ साथ अत्यंत घ्रिना और अपमान भी था, क्योंकि वे अपने ही शरीर को
12:20लाखों घ्रिनोंने कीडो द्वारा खाया जाता देखते थे.
12:25प्रत्येक पल पीड़ा का एक नया चक्र लाता, जहां आत्मा को हर बार एक नय सिरे से अपने शरीर को
12:32कुतरते हुए महसूस करना पड़ता था.
12:35यह उन लोगों के लिए एक कड़वा सबक था जिन्होंने जीवित रहते हुए दूसरों के दर्द को नजरंदाज किया, और
12:43अब उन्हें दूसरों की दया के बिना अनंतकाल तक पीड़ित होना था.
12:47इस प्रकार स्वार्थ और निर्दैता का भयानक परिणाम क्रिमिभोजन के रूप में प्रकट हुआ, जहां आत्मा को अपने ही शरीर
12:56के विनाश की असहनिय पीड़ा में डुबोया जाता है, एक अनंत चक्र जिसका कोई अंत नहीं.
13:03क्रिमिभोजन की अनवरत यातनाओं से क्षीन हुई आत्मा, अब एक और भयानक द्वार की ओर धकेली जा रही थी, जहां
13:11की हवा में जलते हुए धातु की गंध और अंगिनत चीखें घुली हुई थी.
13:16तब भगवान विश्नु, ब्रहमांडिय ज्ञान के प्रतीक, अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरूर को संदंश नरक के भयावर रहस्य से
13:24अवगत कराते हैं, जहां लालच का फल अत्यंत पीडा दायक होता है.
13:30इस लोग का दृष्य ऐसा था मानो किसी ज्वलंत लोहार की भठी को अनंत काल तक फैला दिया गया हो,
13:37जहां की जमीन लालक धातु से बनी थी और आकाश से आग की फुहारें गिर रही थी.
13:44भगवान विश्णु ने समझाया कि यह नरक उंदुरात्माओं के लिए है, जिन्होंने अपने जीबित रहते हुए दूसरों का धन्चीना, बेमानी
13:53से संपत्ती अर्जित की या लालच में आकर चोरी जैसे जगन्य पाप किये.
13:59स्मृतियों के एक विदारक जटके में, आत्मा को याद आया की कैसे उसने एक असहाय किसान की जमीन को धोखाधडी
14:07से हडपा था, और उसके हरिदय में क्षण भर के लिए पश्चाताप का एक थंडा शूल उठा.
14:14यमदूतों के क्रूर धक्के के साथ, आत्मा को एक विशाल धुए से भरे अखाडे में फेंक दिया गया, जहां अंगिनत
14:22अन्य आत्माएं पहले से ही चीख रही थी और तडप रही थी.
14:27चारों ओर से लालत धातु के टक्राने की करकश ध्वनी गूंज रही थी, और हवा में जलते हुए मास की
14:34दुरगंध इतनी तीवर थी की आत्मा का अस्तित्व ही काम उठा.
14:40भयानक यमदूत जिनकी आखें आग के अंगारों सी देहक रही थी, अपने हाथों में विशाल, रक्तलाल गर्म चिम्टे पकड़े हुए
14:48थे, जो नरक की अगनी में धधक रहे थे.
14:52एक यमदूत ने कुरूरता से आगे बढ़कर आत्मा के आभासी शरीर का एक हाथ अपने विशाल धधकते चिम्टे से मजबूती
15:01से जकड लिया, जिससे आत्मा की हर कोशिका में तीवर जलन फैल गई.
15:06तप्ट चिम्टे की पकड़ से आत्मा का हर अंग जुलसने लगा, एक ऐसी पीड़ा जिसने उसे अपने पूरे अस्तित्व में
15:13कभी महसूस नहीं की थी, मानो उसका शरीर भीतर से ही जल रहा हो.
15:20अमानविय बल के साथ यमदूत ने चिम्टे को खीचा, और आत्मा के शरीर का वह हिस्सा एक चीख के साथ
15:27अलग हो गया, जैसे कोई कपड़ा फार दिया गया हो.
15:31आत्मा की चीख अंतरिक्ष में गूंज उठी एक ऐसी ध्वनी जो केवल अनंत पीड़ा का संचार करती थी, क्योंकि उसके
15:39शरीर का प्रत्येक रेशिदार टुकड़ा भयानक दर्द में बिखर रहा था.
15:44यह दर्द उस लालच का सीधा परिनाम था जिसके तहट उसने दूसरों के धन को निर्दैता से हडपा था, और
15:52अब उसका अपना शरीर उसी तरह तोड़ा जा रहा था.
15:57लेकिन यह अंत नहीं था, कुछ ही क्षणों में आत्मा का फटा हुआ अंग फिर से धीरे धीरे जुड़ने लगा,
16:04ताकि यातना का चक्र फिर से शुरू हो सके.
16:07चारों और सैकडों अन्य आत्माई भी इसी तरह की भयानक यातना से गुजर रही थी, जिनके अंगों को यमदूतों द्वारा
16:15गर्म चिम्टों से फाड़ा जा रहा था, एक भयानक सामुहिक चीतकार में.
16:21भगवान विश्णों ने गंभीर स्वर में कहा, यह पुनरावरिती का नरक है, जहां प्रत्येक बार जब शरीर फिर से जुड़ता
16:29है, तो पीड़ा और भी तीवर होकर आत्मा को लालच के मूल पाप से शुद्ध करती है.
16:36गरुर्द उनके मुख से इन क्रूर्द रिश्यों और उनके पीछे के नियाय को सुनकर अवाक रह गए, उनकी आखों में
16:43करुणा और भय के भाव एक साथ उमर पड़े.
16:47भगवान विश्णों ने आगे बताया कि यह दंड न केवल पाप का प्रतिफल है, बलकि आत्मा को लालच की वासना
16:55से पूरी तरह मुक्त करने का एक कठोर मार्ग भी है.
16:59एक आत्मा के चहरे पर गर्द की एक भयावः विकृती उभराई, जब यमदूत ने एक और चिंटा उसके पेट में
17:07गार दिया, और उसके आंतरिक अंगों को खींचने की तयारी की.
17:12इस प्रकार संदंश में हर वह आत्मा जो लालच के बंधन में बंधी थी, उसे अपने शरीर के हर उस
17:20हिस्से को कटते और फिर से जुरते हुए महसूस करना पड़ता था जिसे उसने कभी दूसरों से चीना था, एक
17:27अनंतकाल की पीड़ा में.
17:30भगवान विश्णू ने शांत स्वर में आगे कहा, ए गरुर लालच की अगनी से मुक्त होने के बाद उन आत्माओं
17:37को अगले द्वार पर धकेला जाता है, जहां वासना की ज्वाला उन्हें जलाती है.
17:43यह वह नरक है, जिसे प्यूओद के नाम से जाना जाता है, जहां अपवित्र जीवन जीने वालों को उनकी अशुद्धियों
17:51का घ्रेनित फल मिलता है.
17:54जिन्होंने यौन व्यभिचार किया, पराई स्त्रियों को दूशित किया, या केवल अपवित्र विचारों और कर्मों में लिप्त रहे, उनकी आत्माओं
18:03को यहां अकल्पनिय यातना सहनी पड़ती है.
18:07जैसे ही भगवान विश्णू ने यह कहा, गरुड के मानस पटल पर एक घ्रेनित द्रिश उभराया, जहां यमदूत पापी आत्माओं
18:16को एक अंधेरी घाटी में धकेल रहे थे.
18:19घाटी के अंत में एक विशाल जलाशे फैला हुआ था, जिसका पानी नहीं, बलकी मवाद, प्रक्त, मूत्र और मल का
18:27एक घिनोना मिश्रन था, जो भयानक दुरगंद से भरा था.
18:32उन पापी आत्माओं को उस घ्रेनित जलाशे के किनारे पर लाख़डा किया गया, जहां उनकी आखों में असहनिय भय और
18:40घ्रेना स्पष्ट जलक रही थी.
18:43यमदूतों के चहरे पर क्रूर संतोष था, जैसे वे जानते हों कि यहां आत्माओं के लिए उनकी अपवित्रता का अंतिम
18:51सबसे दर्धनाक अध्याय है.
18:54एक चीक के साथ पहले पापी को निर्ममता से उस दुर्गंध पूर्ण मवाद के सागर में धकेल दिया गया, और
19:02वह घिनोने द्रव में डूगने लगा.
19:05फिर एक एक करके अनेकों आत्माओं को धक्का दिया गया, और वे सब चीकते हुए उस विशाल घ्रेनित जलाशे में
19:13गिरती गई.
19:14वे आत्माएं उस घ्रेनित मिश्रण में छटपटाने लगी, उनकी तवचा जल रही थी और फेफडे उस भयानक दुर्गंध से फट
19:22रहे थे.
19:24तभी एक यमदूत की भयानक गर्जना गुमजी पियो.
19:28अपनी वासना और अपवित्रता का यह विशैला अर्क जिसे तुमने स्वयंबोया है.
19:35यमदूतों ने कुरूरता से आत्माओं के सिर नीचे धकेले, उन्हें उस घिनोंने घोल को पीने के लिए विवश किया, एक
19:43-एक घूंट नर्क की अंतिम पीडा थी.
19:46जैसे ही आत्माओं ने वह विशैला पे पिया, उनके अंतरतम में एक असहनिय जलन और घेना फैल गई, जो उनकी
19:54आत्मा के हर कण को दूशित कर रही थी.
19:58यह प्रक्रिया अनंतकाल तक चलती रही, जहां हर घूंट उनके पापों का कड़वा सच उनके गले से उतारता रहा, उनकी
20:06वासना की प्यास को बुझाते हुए.
20:09भगवान विश्नों की आवाज गहरी और गंभीर हो गई, जब उन्होंने प्यूओद नरक की भीशनता का वर्णन जारी रखा.
20:18यह दंड केवल शारिरिक यातना नहीं, बलकी वासना की उस अशुद्ध ज्वाला को बुझाने का एक घ्रेनित साधन है, जिसने
20:26इन आत्माओं को दूशित किया.
20:29गरुर ने गहरी सास ली, नरक की कुरूरता और आत्माओं की पीडा को सुनकर उनका हृदय विचलित हो उठा.
20:38जब तक आत्मा अपनी वासना की हर बून से मुक्त नहीं हो जाती, तब तक उसे यह घ्रेनित पे पीना
20:45पड़ता है, जब तक कि वह पूरी तरह शुद्ध न हो जाएं.
20:49इस प्रकार प्योद में आत्मा अपनी अशुद्धियों को त्याग कर अंत्य एक नए शुद्धिकरण के मार्ग पर आगे बढ़ने के
20:58लिए तयार होती है.
21:01भगवान विश्णू ने गरूर की ओर देखा और बोले यह स्मरन रखो, हे गरूर वासना का त्याग ही मोक्ष का
21:08मार्ग है और कर्मों का फल अवश्य मिलता है.
21:12भगवान विश्णु ने गरूर की ओर गंभीर मुद्रा में देखा और कहा
21:17हे गरूर इसके पश्चात उस भयानक मार्क पर लालाभक्ष नामक नरक आता है
21:22जो भ्रष्टाचार और विश्वासगात करने वालों का अंतिम ठिकाना है
21:28यह वह स्थान है जहां की हवा में ही सडन और दुरगंध व्याप्थ है
21:32और चारों और घने पीले और हरे रंग के जहरीले धुए के बादल चाये रहते है
21:39यहां उन पापी आत्माओं को लाया जाता है जिन होने अपने मानव जीवन में निर्दोशों को सताया
21:46जूठी गवाही दी और रिश्वत लेकर न्याय का गला घोंटा
21:51एक पापी आत्मा जो कभी प्रिथवी पर एक धमंडी अधिकारी था
21:56अब अपने समस्ट ऐश्वर्य से हीन होकर यमदूतों के पैरों में गिरकर दया की भीक मांगती है
22:03परंतु दयाविहीन यमदूत उसे निर्दैता से लात मारते हैं और उस घ्रिनित गड़े की ओर धकेल देते हैं जहां केवल
22:12पीड़ा और गलानी का सामराज्य है
22:15भगवान विश्णू समझाते हैं कि जिन्होंने अपनी शक्ती का दुरुपियोग कर गरीबों का धन छीना उनके हाथ अब भारी और
22:23तपते हुए लोहे की कडियों से जकर दिये जाते हैं
22:28तभी आत्माओं के सामने लाला भक्ष का मुख्य तालाब प्रकट होता है जो कोई जल का स्रोत नहीं बलकी कफ,
22:36ठूक और मलमुत्र के घिनोने मिश्रन से भरा एक विशाल कुंध है
22:41यम्दूत इन भरष्ट आत्माओं के बालों को पकड़ते हैं और उनके सिर को जबरन उस खौलते और दुरगंधयुक्त पदार्थ में
22:49डुबो देते हैं
22:51दम घुटने और उस घ्रेनित पदार्थ के मुह में जाने से पापी बुरी तरहे तडपने लगता है उसे अपने जीवन
22:59के हर एक काले कारनामे की याद आने लगती है
23:04जब भी कोई आत्मा उस घ्रेनोंने कुंड से अपना सिर बाहर निकालने का प्रयास करती है तो यमदूत उन पर
23:11जलते हुए कोडों से प्रहार करते हैं
23:15भगवान विश्नुगरूर से कहते हैं के पक्षी राज जिन लोगों ने दूसरों के खुनपसीने की कमाई को पानी की तरह
23:22बहाया उन्हें यहां दूसरों की गंदगी पी कर ही जीवित रहना पड़ता है
23:28एक पूर्व न्यायधीश जिसने स्वर्ण मुद्राओं के बदले में निर्दोशों को दंड दिया था अब उस कीचड में पड़ा अपनी
23:36ही जूठी गवाही के पाप को भोग रहा है
23:40पापियों का गला उस अमलिय और सड़े हुए द्रव्य से जलने लगता है परंतु यम के इस न्यायलय में मृत्यू
23:47भी उन्हें इस असहनिय कष्ट से मुक्ती नहीं देती
23:51हवा में केवल पीडा की चीखें और यमदूतों के करूर अठास गूंजते हैं जो इन भरष्टाचारियों की दुर्गशा पर तनिक
24:00भी दया नहीं दिखाते
24:02तभी उस अंधकार में आकाश में यमराज की विशाल और उग्रचाया प्रकट होती है जो धर्मराज के रूप में कर्मों
24:10के अकाट्य फल की घोशना करती है
24:14इन पापियों के पेट इस घिनोने द्रव्य को पीने से फूल जाते हैं और अंदर ही अंदर तेजाप की तरह
24:21जलने लगते हैं जिससे वे असहनिय जलन से छटपटाते हैं
24:26उस गंदे कुंड में रहने वाले तीखे दानतों वाले भयानक कीड़े और जीव भी इन लाचार आत्माओं की जीब और
24:34होठोन को काटने दौरते हैं
24:37उन्हें समझ आ जाता है कि प्रित्वी पर कमाया गया सारा अवैध धन, सोने के महल और जूठी प्रतिष्ठा यहां
24:45उनका तनिक भी बचाव नहीं कर सकती
24:48गरुर देव अत्यंत दुखी और भयभीत मन से भगवान हरी की ओर देखते हैं और इस कठोर न्याय के पीछे
24:55के परम सत्य को समझने का प्रयास करते हैं
25:00भगवान विश्णु मुस्कुराते हैं और कहते हैं हे गरुर यह नरक सजा नहीं बलकि आत्मा का शुद्धिकरण हैं केवल इमानदारी
25:09और निस्वार्थ कर्म ही मनुष्य को इस मार्ग से बचा सकते हैं
25:14भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान को बनाय रखते हुए कहा परंतु हे गरुर यह शुद्धिकरण का मार्ग अभी और
25:22भी भयावा पड़ाव से होकर गुजरता है जहां कर्मों की क्रूरता का प्रतिशोध स्वया उस क्रूरता से भी अधिक भयानक
25:29होता है
25:31इसके पश्चात उन आत्माओं को सारमेदान नामक एक ऐसे नरक में धकेला जाता है जहां उन सभी क्रूर कर्मों का
25:39हिसाब चुकाया जाता है जिन्होंने अकारण ही दूसरों के जीवन में आद लगाई धर घोला या असहनिय पीडा पहुँचाई
25:48यह ऐसा लोक है जहां यम्दूत उन आत्माओं को एक विशाल अखाडे में धकेल देते हैं जहां से बचने का
25:56कोई मार्ग नहीं होता और केवल भयानक चीखें ही गुंजती हैं
26:01इस अखाडे में सैकडो विशालकाई और भूखे सार में नरक के कुत्ते अपनी लाल-लाल आखें चमकाते हुए नुकीले दात
26:10दिखाते हुए उन आत्माओं की प्रतीक्षा करते हैं
26:15जैसे ही आत्माए अखाडे में गिरती हैं इन भयानक कुत्तों का जुन्ड उन पर तूट पड़ता है उनकी चीखें नरक
26:22के भयानक सन्नाटे को और भी डरावना बना देती हैं
26:28प्रत्यक्षार में अपनी पैनी दाड़ों से उन आत्माओं के शरीर को नोचता है मानों वे अपने पिछले जन्म के पापों
26:35का मास खा रहे हुँ
26:38आत्माई चीखती हैं, बिल्खती हैं, भागने का प्रयास करती हैं, परंतु नरक के उस अखाडे की हर दिशा से केवल
26:46करूर सार में ही उन्हें घेर लेते हैं
26:50उनकी त्वचा, उनका मास, उनकी हर कोशिका को फार दिया जाता है, और फिर भी आत्मा को मृत्यू की शांती
26:57नहीं मिलती, क्योंकि उसे पुन्ह उसी पीडा के लिए पुनरजीवित किया जाता है
27:04यमदूत अपनी विशाल कदाओं से उन आत्माओं को वापस कुत्तों के बीच धकेलते रहते हैं, सुनिश्चित करते हुए कि कोई
27:11भी इस भयावा प्रतिशोध से बच न पाए
27:15गरुर देव का हरिदय इस भीशन ग्रिश्य को देख कर काम उठा, उनकी आखों में भयानक भय और असीम करुणा
27:23जलक रही थी
27:25उन्होंने भगवान विश्णों की ओर देखा, मानो यह पूछ रहे हों कि क्या कोई आत्मा इस अकल्पनिय कष्ट से कभी
27:32मुक्ती पा सकती है
27:35भगवान हरी ने धैर्य पूर्वक उत्तर दिया, गरुर यह कष्ट उन लोगों के लिए है, जिन्होंने दूसरों को जानबूच कर
27:43और निर्दैता से पीड़ा पहुचाई, उनके कर्मों का फल उन्हें यहीं भोगना पड़ता है
27:50वे आत्माए जिन्होंने इर्श्यावश या स्वार्थवश किसी के घर में आग लगाई, जिससे निर्दोशों की जान गई या उन्हें बेघर
27:58कर दिया गया, उन्हें यहां इस करूर यातना का सामना करना पड़ता है
28:04जिन्होंने धोखे से किसी को विष्ट दिया, भले ही वह सीधे मृत्यू न दे, परंतु शरीर को क्षीन कर असहनिय
28:11रोग दिये, उन्हें भी इसी नरक में घसीटा जाता है
28:16और वे, जिन्होंने अपनी शक्ती या क्रोध के मद में निर्बल प्राणियों को अकारण शारिरिक या मानसिक चोट पहुचाई, उनके
28:24लिए भी सारमेदान की यातना निश्चित है
28:28इन दुशकर्मों का फल उन्हें तब तक भोगना पड़ता है, जब तक उनके प्रत्येक पाप का कंकन उनक्रूर कुत्तों की
28:35भूख में भस्न न हो जाए
28:38यह केवल शारिरिक पीडा नहीं, बलकि अपने ही कर्मों के भयानक प्रतिविंद को देखने की मानसिक यातना भी है, जहां
28:46हर चीक उनके पापों का लेखा जोखा होती है
28:51गरूर देव ने अपने पंक सिकोडे, उनके शरीर में एक सिहरन दोड़ गई, उन्होंने समझा कि यह न्याय कितना कठोर,
28:59परंतु कितना आवश्चक है
29:02उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि वे कभी भी किसी प्राणी को अकारण पीड़ा नहीं पहुचाएंगे, और सदैव धर्म
29:10के मार्ग पर चलेंगे
29:12भगवान विश्णू ने गरूर के चहरे पर शान्ती देख कर अपनी दिव्यवानी में अगला अध्याय आरंभ किया, किन्तु हे गरूर
29:20यह केवल आरंभ है, क्योंकि इसके बाद भी कुछ ऐसे नरक हैं, जो आत्मा को उसकी कृतगंता और अधर्म का
29:28स्मरण कराते हैं
29:31भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए, ब्रहमांड के गहन रहस्यों को प्रकट करने के लिए एक और भयावा
29:39अध्याय का अनावरण किया, जिसका नाम है अविची मत नरक
29:44उन्होंने समझाया कि यह वह पाताल लोक है, जहां वे आत्माएं गिरती हैं, जिन्होंने संसार में जूठी गवाही देकर निर्दोशों
29:52के जीवन को नरक बना दिया या उन्हें धोखे से फसाया
29:57जैसे ही विश्णू ने वर्णन किया, एक अद्रिश बल पापियों की आत्माओं को एक ऐसे स्थान पर खीच रहा था
30:04जहां से कोई वापसी नहीं थी
30:07जह प्रवेश द्वार एक अथा खाई के मुख के समान था, जहां से केवल निराशा की गंध और अनंत गहराई
30:15की ठंडी हवा आती थी
30:17एक पापी आत्मा अपने पिछले कर्मों के भारी बोज से लदी हुई, कापते हुए उस कुए के किनारे लाई गई,
30:25उसकी आखों में अंतिम भय स्पष्ट जलक रहा था
30:29आत्मा ने चीखने का प्रयास किया, लेकिन उसके गले से केवल एक खामोश सिस्की निकली, जैसे वह समझ गई हो
30:37कि अब कोई उम्मीद नहीं बची है
30:41बिना किसी दया के यमदूतों ने उसे उस अथा खाई में धकेल दिया, जहां से वह अंथीन रूप से गिरती
30:48रही
30:50जैसे ही वह आत्मा नीचे की ओर गिरी, उसके चारों और केवल असीम शून्य और अनन्त गहराई थी, कोई सहारा
30:58नहीं, कोई किनारा नहीं
31:01गिरते हुए आत्मा ने अपने जीवन के सभी जूट और धोखे को एक पल में अपनी आखों के सामने चमकते
31:08हुए देखा
31:10प्रत्येक असत्य शब्द एक पत्थर बनकर उसकी चेतना पर गिर रहा था, उसे और गहराई में धकेल रहा था
31:18अविचीमत की गहराई में गुरुत्वा कर्शन का कोई नियम नहीं था, केवल अनन्त गिरावट का अकलपनी अबोज
31:27उसके आसपास अन्य असंख्य आत्माई भी अनवरत गिर रही थी, जैसे धूल के कन हवा में तैर रहे हो, प्रत्येक
31:34अपने स्वयं के अंगिनत धोखे का फल भोग रही थी
31:39प्रत्येक ख्षन आत्मा को यह असहनिय अनुभूती होती थी, कि उसका पतन कभी समाप्त नहीं होगा, ठीक वैसे ही जैसे
31:47उसके जूट के परिनाम कभी समाप्त नहीं होते
31:52भगवान विश्णु का चहरा गंभीर था, फिर भी उनकी आखों में ब्रहमांडिय न्याय का एक शांत और अटल भाव था,
31:59जो गरूर को सत्य का महत्व समझा रहा था
32:03गरूर देव ने गहन चिंतन में अपने पंख और जुका लिए उनके मुख पर एक दर्गनाक स्विकृती का भाव था,
32:11जो हर जूट के भयानक परिनामों को समझ रहा था
32:15अविचीमत की अनन्ता आत्मा को मानसिक रूप से तोरने लगी, क्योंकि उसे कोई भौतिक पीड़ा नहीं थी, बलकि अनन्त अकेलेपन
32:24और पश्चाताप का अभिशाप था
32:27वह मदद के लिए हाथ बढ़ाती, लेकिन उसके हाथ केवल खालीपन को पकड़ पाते, कोई सतह नहीं, कोई सहारा नहीं,
32:36बस अन्थीन शून
32:38उसके अपने जूट की प्रतिध्वनी उस गहरे कुए में गूंजती रहती, जो हर पल उसकी आत्मा को चलनी करती रहती
32:46थी
32:47यह अनन्थ पतन उसके द्वारा दिये गए जूट की अनन्था का प्रतीक था, जिसके दुश्परिणाम कभी भी समाप्त नहीं हो
32:55सकते थे
32:57विश्णू ने अपनी कथा को विराम दिया, यह समझाते हुए कि अविची मत वह दंड है, जो जूट बोलने वालों
33:04और विश्वास घातियों को उनकी अनन्थ कृतगंता के लिए मिलता है, जिसके बाद भी कई और नरक शेश है
33:12भगवान विश्णू ने अविची मत नरक का वृत्तान्त समाप्त किया और उनकी प्रशान्त ग्रिष्टी क्षन भर के लिए गरूर पर्टी
33:20की, जैसे वे अगले भयावा रहस्य को उजागर करने से पहले एक गहरा विराम ले रहे हुँ
33:27गरूर जो पहले से ही अविश्वस्निय पीडाओं को सुनकर व्याकुल हो चुके थे, अब अपनी आखें उठाकर भगवान विश्णू की
33:35ओर देखा, उनके मन में भय और जिग्यासा का एक नया भंवर उमड रहा था
33:42विश्णू ने अपने आवाज में एक गंभीर और चेतावनी भरा स्वर भरते हुए कहा, गरूर अब मैं तुम्हें उस नरक
33:49के बारे में बताता हूँ जो उन अभागों के लिए हैं, जो इस जीवन में स्वयं को मदिरा में डुबो
33:55देते हैं और दूसरों को भी इस पाप
34:07प्रतिफल भोगना पड़ता है, गरूर के देखते ही देखते एक भयावा मार्ग उनके सामने प्रकट हुआ, जो सीधे अयहपान नरक
34:17की ओर जाता था, जहां की धर्ती भी पिगले हुए धातू की तरह तप रही थी, वहां यमदूतों का एक
34:25दल जिनकी देह अगनी के समान
34:28धधक रही थी, पापी आत्माओं को घसीकते हुए एक विशाल तक्तलाल भट्टी की ओर ले जा रहा था, भट्टी के
34:36भीतर अगनी की ज्वालाएं उनमत्त होकर नित्य कर रही थी, जहां लोहे के बड़े-बडे टुक्रे धीरे-धीरे पिगल कर
34:43उबलते हुए लावा में
34:45बदल रहे थे, यमदूतों ने एक विशेश भयानत मिश्रन तयार किया था, जिसमें पिघला हुआ लोहा, तामबा और अन्यधातुए असीमित
34:55ताप पर एक साथ उबल रही थी, एक पापी आत्मा जिसने अपने जीवन में मधोशी में कई पाप किये थे,
35:04को कुरूरता से
35:05खीच कर उस उबलते मिश्रन के पास लाया गया, उसकी आखों में असहनिय भय भरा हुआ था, यमदूतों ने उस
35:13आत्मा को एक विशाल लोहे के प्याले के सामने खड़ा किया, जिसमें से उबलता हुआ धातु भाप के साथ उपर
35:20उठ रहा था, जो उसकी तवचा को जला �
35:23रहा था, उस आत्मा ने चीखने की कोशिश की, लेकिन उसके गले से केवल एक दबी हुई सिस्की निकली, क्योंकि
35:32यमदूतों ने उसे कसकर पकड़ रखा था, एक क्रूर यमदूत ने एक बड़े कर्चुल में उबलता हुआ लोहा भर कर,
35:40आत्मा के मुह पर दबाव डाल
35:42और उसे जबरन अपना मुख खोलने पर मजबूर किया, जैसे ही पिघला हुआ लोहा उसके मुह में डाला गया, आत्मा
35:51के भीतर एक भयानक चीख गुंज उठी, जो किसी भी जीवित प्राणे की कलपना से परे थी, उबलते धातु ने
35:59उसके आंतरिक अंगों को जलाना श�
36:11पिघला हुआ लोहा उसके शरीर के हर छिदर से बाहर निकलने लगा, आखें, नाक, कान और अन्य अंगों से भी,
36:19जैसे वह भीतर से पूरी तरह पिघल रहा हो
36:22हर बार जब वह धातु उसके शरीर से बाहर निकलता, एक भयानक ध्वनी उत्पन होती, जैसे कोई जीव स्वय ही
36:31अपनी ही आग में जलकर नश्ठ हो रहा हो
36:35विश्णू ने समझाया कि यह दर्द केवल एक पल का नहीं था, बलकि यह आत्मा को बार-बार जहेलना पड़ता
36:41था, जब तक उसके पाप का एक-एक अनुभस्म न हो जाएं
36:46गरूर का हृदय दुहक और भय से भर गया, उन्हें यह विचार ही व्याकुल कर रहा था कि कोई भी
36:53जीव ऐसे भीशन गंड का पात्र कैसे बन सकता है
36:58विशनु ने कहा, यह शरीर एक पवित्र मंदिर है, गरूर और जब कोई इसे नशे के अंधकार में धकेल कर
37:05आत्मा को दूशित करता है, तो उसे यह शुद्धिकरन भोगना ही पड़ता है
37:11इस प्रकार अयहपान में आत्माय अनंतकाल तक अपने पापों के लिए उबलता लोहा पीती रहती हैं, उनके दर्द की चीखें
37:20नरक की दीवारों में गूंजती रहती हैं, यह एक चक्र है जिसका अंत केवल परम ज्यान से ही संभव है
37:28विश्णु ने शांत स्वर में कहा, परंतु गरुड यह केवल देह के दूशित होने का दंड नहीं, बलकि आत्मा के
37:36उस अहंकार का भी प्रायश्चित है जो धन के मद में चूर होकर दान धर्म से विमुख हो जाती है
37:43उन्होंने आगे बताया, ऐसे जीव जो विपुल संपत्ती के स्वामी होने पर भी दीन दुखियों को सुई की नोक जितना
37:51भी दान देने से कत्राते थे, उन्हें सूची मुख नामक नरक में अपने अभिमान का फल भोगना पड़ता है
37:59गरुर ने सिर जुका कर श्रद्धा पूर्वक पूछा, है प्रभुप उस नरक में आत्माओं को किस प्रकार के कश्टों का
38:06सामना करना पड़ता है, जो ऐसी घोर कंजूसी करते थे
38:11विष्णू ने गंभीरता से उत्तर दिया, सूची मुख में यमदूत उन कृपन आत्माओं को पकड़ कर उनके शरीर को नुकीली
38:19सुयों से ऐसे बेठते हैं, जैसे कोई वस्त्र को सिलता है, प्रत्येक छेद उनके अहमकार और संचित पापों का हिसाब
38:27चुकाता है
38:29वहाँ नरक की काली, थंडी भूमी पर अंगिनत आत्माए पड़ी होती हैं, जिनका हर अंग अकलपनिय पीडा से काप रहा
38:38होता है, जब यमदूत निर्दैता से उन पर प्रहार करते हैं
38:43यमदूत, क्रोधित और अविचलित उन आत्माओं के हर जोड, हर मांस पेशी में सुया घुसाते हैं, उन्हें बार-बार खीचते
38:51और पुनह डालते हैं, जिससे शरीर का रोम-रोम व्यथा से चीतकार उठता है
38:58प्रत्यक आत्मा को लगता है, जैसे उसके अंदर का सारा अहंकार, उसकी सारी लालसा, सुई की हर चुभन के साथ
39:06धीरे-धीरे रिसकर बाहर निकर रही हो, एक अन्थीन शुद्धिकरण की प्रक्रिया
39:12यह द्रिश्य सुनकर गरूर का मन और भी व्याकुल हो उठा, उन्हें धन के अहंकार की भीशन परिंती का गेहन
39:19बोध हुआ
39:21विश्नु ने कहा, यह दंड उन लोगों के लिए है, जिन्होंने जीवन भर धन का संग्रह किया, उसे स्वयन तक
39:28सीमित रखा और कभी किसी जरुरतमंद की ओर सहानु भूती से नहीं देखा, उनकी आत्माओं को अब प्रत्येक वस्तु के
39:36महत्व का अनुभव कराया जाता
39:38है, इसके उपरांत उन पापी आत्माओं को शूल प्रोत नरक की ओर ले जाया जाता है, जहां उन जीवों का
39:46अन्थ होता है, जिन्होंने निर्पराध पशुओं का वध किया और उन्हें अकारण कष्ट पहुँचाया, विश्नु ने बताया, शूल प्रोत में
39:56वे आत्मा�
39:58प्रंजन या क्रूरता के लिए मासूम पशुओं की हत्या की उन्हें तीखे भालों पर टांग दिया जाता है, उनकी ही
40:05क्रूरता का दरपन बनकर। गरूर ने गहरी सांस ली, यह सुनकर उनका हृदय पशुओं के प्रती की गई क्रूरता के
40:13ऐसे भयानक प्रतिफल पर द�
40:55प्रिक्षों की भांती खड़े हैं।
40:58विश्णु ने कहा, ठीक उसी तरह जैसे इन आत्माओं ने अपने जीवन में असहार पशुओं को पीडा दी, अब उन्हें
41:05भी वैसी ही असहनिय यातना का अनुभव करना पड़ता है, जहां हर चीख उनके कृत्यों का प्रतिध्वनी है।
41:14गरुर ने गहन चिंतन में डूब कर कहा, हे प्रभु वास्तव में कर्मों का फल अत्यंत सुनिष्चित और अटल है,
41:21कोई भी जीव अपने कृत्यों से बच नहीं सकता।
41:25विश्णु ने करुना भरे स्वर में कहा, इसीलिए गरुर प्रतेक प्राणी के प्रतिधया और अहिंसा का भाव रखना ही सर्वोत्तम
41:33धर्म है, क्योंकि एक जीव की पीड़ा पूरे ब्रहमांड की पीड़ा होती है।
41:39नरक के ये द्वार उन आत्माओं के लिए खुलते हैं, जो भूल जाते हैं कि जीवन का हर क्षन कर्मों
41:46की एक अटूट श्रिंखला बुनता है, जिसका लेखा जोखा अंतर न्याय की तुला पर ही होता है।
41:53इस प्रकार विश्णू ने कर्मों के विधान और नरक के भीशन गंडों का वर्णन समाप्त किया, जिससे गरूर को धर्म
42:01और अधर्म के सुक्ष्म अंतर का गहरा ज्यान प्राप्त हुआ।

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