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Building on the mysteries of the final breath, Garuda now asks Lord Vishnu about the harrowing journey of the soul immediately after death. This episode unveils the unseen path taken by the subtle body, its first terrifying encounters with Yama's formidable messengers (Yamdoots), and the intense psychological and environmental challenges it faces. Discover how the soul's accumulated karma dictates its initial destination and the profound impact of its final thoughts as it embarks on an arduous voyage towards the ultimate judgment. #GarudaPurana #SoulJourney #Afterlife #HinduMythology #Yama #Yamdoots #Karma #DeathAndBeyond #SpiritualJourney #Puranas #Vishnu #Mystery #FinalMoments #SubtleBody #जीवनऔरमृत्यु
Transcript
00:00हे प्रभु नारायन देह त्यागने के तुरंत बाद उस सुक्ष्म जीवात्मा की दशा कैसी होती है और वह अपने इस
00:07नए रूप में क्या अनुभव करता है।
00:11भगवान श्रीहरी ने मंद मुस्कान के साथ गरुड की ओर देखा और परम रहस्य में स्वर में जीवात्मा के उस
00:18पहले क्षण का वर्णन करना आरंभ किया।
00:22संसार में जब प्रान शरीर को छोड़ देते हैं तब वह पार्थिव शरीर चेतनाशून्य होकर काठ की भानती भूमी पर
00:29गिर पड़ता है।
00:32उसी क्षण उस मृत शरीर से अंगूठे के आकार का एक सुक्ष्म शरीर अत्यंत तीवर प्रकाश पुन्च की भानती बाहर
00:39निकलता है।
00:41वह नवजाद सुक्ष्म आत्मा हवा में तैरते हुए अचम्भित होकर नीचे अपने ही निर्जीव पड़े भौतिक शरीर को अपलक निहारती
00:50है।
00:52अपने परिजनों को रोते बिल्खते देखकर वह चिलाती है और उन्हें सांत्वना देने का प्रयास करती है परंतु उसकी आवाज
01:00उन तक नहीं पहुँचती।
01:03जब वह व्याकुल होकर अपने प्रियजनों को स्पर्श करने का यत्न करती है तो उसके सुक्ष्म हात शूने में से
01:10वैसे ही निकल जाते हैं जैसे वायू।
01:13पार्थिव बंधनों के अचानक तूटने से उस सुक्ष्म शरीर को प्रचंड प्यास और भूख की अनुभूती होने लगती है जिसे
01:21वह शांत नहीं कर पाता।
01:23वह जीवात्मा न तो प्रिथवी पर पैर जमा पाती है और नहीं कहीं जा पाती है बस एक भयावह असमंजस
01:32में हवा में डोलती रहती है।
01:35भगवान के इन वचनों को सुनकर परम ज्यानी गरुड के नेत्र करुणा और विस्मय से भर गए और वे और
01:42अधिक सुनने के लिए आतुर हो उठे।
01:45श्रीहरी बोले हे खगेश्वर यह सुक्ष्म शरीर केवल वासनाओं, कर्मों और मन से निर्मित होता है। इसलिए इसमें भौतिक इंद्रियों
01:55की शक्ती नहीं होती।
01:56उसी समय उस आत्मा के चारों और उसके संचित पापों और पुनियों का एक रहस्य में धुन्धला आभामंडल निर्मित होने
02:05लगता है।
02:18भयभीत होकर वह जीवात्मा पुनह अपने निश्प्रान शरीर में प्रवेश करने का प्रयास करती है। किन्तु यम के अद्रिशनियम उसे
02:27पीछे धकेल देते हैं।
02:30संसार से पूरी तरह कट जाने के इस दारोन सत्य को स्विकार करते हुए वह अभागा सुक्ष्म शरीर करोन करंदन
02:38कर उठता है।
02:40भौतिक नियमों से मुक्ठ होने के कारण उसे न तो हवा का स्पर्ष महसूस होता है और नहीं गुरुत्वा कर्शन
02:47का जिससे उसका मानसिक संताप और बढ़ जाता है।
02:52उस सुक्ष्म जीवात्मा की दृष्टी में अब प्रित्वी के समस्त रंग फीके पढ़कर धुंधले और मटमेले भूरे रंग में बदलने
03:00लगते हैं।
03:02सहसा आकाश का रंग बदलने लगता है और वह आत्मा अंतरिक्ष में किसी अग्यात भयानक संकट के आगमन की सुब्गुगाहट
03:11महसूस करती है।
03:13गरुर ने अत्यंत गंभीर होकर अपने विशाल पंखों को समेटा और प्रभु से पूछा की इसके बाद उस असहाई जीवात्मा
03:22का क्या हश्र होता है।
03:24भगवान विश्नु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी क्षितिच पर टिकाई और कहा तभी वहां यमलोक के भयानक दूतों का पहला भयानक प्रहार
03:33होता है।
03:35भयानक यमदूतों ने एक अद्रिष्य शक्ती के साथ उस जीवात्मा को चारों और से घेर लिया। मानो ब्रहमांड की सारी
03:43कुरूरता एक साथ एक ही पल में प्रकट हो गई हो।
03:47आत्मा ने भय और अनिश्चित्ता के एक तीवर भंवर में खुद को फनसा पाया, जहां हर दिशा से अद्रिष्य दबाव
03:55महसूस हो रहा था। उसे अपनी नई असहाय स्थिती का बोध होने लगा।
04:01भगवान विश्णु ने अपनी शांत मुद्रा में समझाया, हे गरुड इस क्षन जीवात्मा अपने स्थूल शरीर से मुक्त होकर सुक्ष्म
04:09शरीर में प्रवेश कर चुकी होती है, जिसमें मन, बुद्धी और अहंकार का वास होता है।
04:16उन्होंने आगे कहा, यह सुक्ष्म शरीर अपने पूर्व जन्म के सभी संसकार, कामनाय और स्मृतिया संजोय रखता है, परन्तु भौतिक
04:25इंद्रियों के अभाव में उन्हें पूरा करने में असमर्थ होता है।
04:30उधर आत्मा ने अपने प्रियजनों को पुकारने का प्रयास किया, उसके मुख से कोई शब्द नहीं निकला, मानो ध्वनी का
04:38संसार उसके लिए सदैव के लिए मौन हो गया हो।
04:42अपने विलाब करते हुए परिजनों को स्पर्श करने की इच्छा से वह उनके करीब गई, परन्तु उसका हाथ उनके भीतर
04:50से होकर गुजर गया, जैसे वह अस्तित्वहीन हो।
04:54भूख और प्यास की अद्रिश पीडा से व्याकुल होकर उसने अपने सामने रखे भोजन को देखा, परन्तु उसे चूने या
05:02ग्रहेन करने में सरवथा असमर्थ रही।
05:05इस असहनिय असहायता और तीवर निराशा ने आत्मा को अंदर तक जख जोर दिया, मानो वह एक अद्रिश पिंजरे में
05:14कैद हो गई हो, जहां उसकी हर इच्छा व्यर्थ थी।
05:18वह अपने प्रिजनों को फूट फूट कर रोते हुए देखती रही, उनके दुखों को महसूस करती रही, पर उन्हें दिलासा
05:25देने के लिए वह एक मात्र शब्द भी न कह सकी।
05:29तभी भयानक यमदूतों ने एक अद्रिश लोहे की रस्सियों से उस सुक्षम शरीर को कसकर बांध लिया, जिससे आत्मा की
05:38स्वतंत्रता पूरी तरह छिन गई।
05:41आत्मा ने उन अद्रिश बंधनों से मुक्त होने का भरसक प्रयास किया, परन्तु वह यमदूतों की अलौकिक शक्ती के आगे
05:49पूरी तरह निर्बल थी।
05:52यमदूतों ने अब उस बंधे हुए सुक्षम शरीर को निर्दैता से खीचना शुरू किया, उसे मृत्यू लोक के अंजान पत
05:59पर घसीटते हुए ले जाने लगे।
06:02आत्मा ने एक अंतिम बार अपने पुराने घर और रोते हुए परिवार की ओर देखा, उसकी आखों में अपार करुणा
06:10और वियोग का गहरा सागर उमड रहा था।
06:13धीरे धीरे परिचित द्रिश्य धुंधले पड़ने लगे और आत्मा को एक भयानक अज्यात मार्ग पर घसीटा जाने लगा, जहां केवल
06:22अंधकार और विरानता थी।
06:24भगवान विश्णों ने गंभीर स्वर में कहा, यह वही यात्रा है गरुड जहां जीवात्मा यमलोक के पहले द्वार की ओर
06:33बढ़ती है, एक ऐसा मार्ग जो केवल आत्माए ही देख पाती हैं।
06:39जैसे जैसे वह अज्यात मार्ग पर आगे बढ़ती गई, आत्मा के भीतर एक गेहन भय और एकाकीपन की भावना और
06:47भी तीवर होती चली गई।
06:50यमदूतों की भयानक आकरितिया उसके चारों और एक भयावा घेरा बनाये हुए थी, जिनकी मुख उपस्थिती ही आत्मा को आतंकित
06:59करने के लिए परियाप्त थी।
07:02उस सुक्ष्म शरीर ने मुक्ती के लिए मन ही मन तीवर प्रार्थनाय की, परंतु उसकी पुकारें उस विशाल निर्देई शुने
07:09में कहीं खो गई।
07:11समय और स्थान के बंधन से मुक्त होकर, यमदूतों ने उसे अनवरत आगे बढ़ाया, हर पल आत्मा को उसके सांसारिक
07:20अस्तित्व से दूर ले जा रहे थे।
07:23अन्तह आत्मा ने दूर क्षितिज पर यमलोक के पहले भयानक द्वार की एक धुन्धली सी आकरती उभरती हुई देखी, जो
07:31उसके अगले चरण की भयावह शुरुवात का संकेट था।
07:35जैसे ही वह सूक्षम शरीर उस धुन्धले द्वार की ओर बढ़ा, अचानक चारों ओर की हवा अत्यंत थंडी हो गई
07:43और यमलोक के भयानक यमदूतों की विशाल काली पर चाया उस पर हावी होने लगी।
07:48घोर अंधकार को चीरते हुए यमदूत अपने असली भयानक रूप में प्रकट हुए, जिनके परवताकार काले शरीर और धधकते अंगारों
07:59जैसी लाल आखे देखकर आत्मा काप उठी।
08:03एक यमदूत ने, जिसके सिर पर मुडे हुए भयानक सींग थे और हाथ में भारी लोहे का गदा था, अपनी
08:10बादलों की गड़गडाहट जैसी आवाज में आत्मा को उसके अंत का संदेश दिया।
08:16दूसरे विक्राल यमदूत ने, जिसके गले में नर्मुंडों की मालाय लटक रही थी, अपने हाथों में चमकते हुए प्राणहरता पाश
08:25को लहराते हुए आत्मा की ओर क्रूरता से देखा।
08:29भय से व्याकुल वह सुक्ष्म शरीर, जो केवल एक मध्धम नीली आभा के रूप में चमक रहा था। इन महाकाय
08:37और निर्दी रक्षकों के सामने अत्यंत छोटा और असहाय प्रतीत हो रहा था।
08:42मुख्य यमदूत ने अपने हाथों में कर्मों का एक काला आध्यात्मिक पत्रक खोला, जिससे निकलते ही उस पापी आत्मा के
08:51संचित दुशकर्म विशैली हरी अगनी की लप्टों में दहकने लगे।
08:55जैसे ही उन पापों का आहवान हुआ, उस शुने में आत्मा के अतीत के करूर और धोखेबास कर्मों की भयानक
09:03परचाया सजीव होकर उसे चारों ओर से घेरने लगी।
09:08घबराकर आत्मा ने वापस प्रित्वी लोग की और भागने का प्रयास किया, परंतु उसके पीछे का मार्ग एक विशाल दैवियस
09:16वर्नलाल उर्जा के चक्रवियू से हमेशा के लिए बंध हो चुका था।
09:21एक भयानक अट्टहास के साथ यमदूत ने अपने हाथ से लोहे की नुकीली जिजीर हवा में फेंकी जो सीधे जाकर
09:29उस असहाय आत्मा के गले में कस गई।
09:32उस आध्यात्मिक जिजीर के स्पर्श मात्र से आत्मा के भीतर असहनिय दर्द की तरंगे दोड गई। जिससे उसका सुक्ष्म शरीर
09:41पीडा से तडप उठा।
09:44दूसरे यम्दूत ने अपनी तीन नोक वाली चमकती हुई बर्ची को सीधे आत्मा के हृदय की ओर ताना ताकि उसके
09:52बचे हुए सांसारिक अहंकार का अंत किया जा सके।
09:56उसी क्षन यमलोग का वह शूने मार्ग अचानक एक अत्यंत भयानक, कंटीले और सुलकते हुए कोईलों से भरे पथ में
10:04बदल गया।
10:06यमदूतों ने जिजीर को पूरी ताकत से आगे खीचा, जिससे आत्मा को उस धधकती हुई और तीखी जमीन पर अपने
10:14पहले दर्गनाक कदम बढ़ाने के लिए विवश होना पड़ा।
10:18उस जलते हुए रास्ते की धूल से काले आध्यात्मिक नाग उत्पन होने लगे, जो फुफकारते हुए उस रोती बिल्खती आत्मा
10:27के पैरों को डसने के लिए आगे बढ़े।
10:30आत्मा ने रोते हुए एक आखिरी बार पीछे मुड़कर अपने प्रियजनों को पुकारना चाहा, परंतु उसके उत्तर में केवल यमदूतों
10:39का निर्गई और गुंजता हुआ हास्य ही सुनाई दिया।
10:43एक यमदूत ने अपनी भारी गदा को पूरी शक्ती से जमीन पर दे मारा, जिससे एक ऐसा तीवर जटका लगा
10:51कि आत्मा घुटनों के बल गिरने पर मजबूर हो गई।
10:55जैसे जैसे वे आगे बढ़े, उस सुष्म शरीर की चमक और अधिक फीकी पड़ती गई, जो उसके द्वारा संचित भारी
11:03और अन्याई पापों के बोज को दर्शा रही थी।
11:07अंतह यमलोक का वह विशाल लोहे का मुख्य द्वार उनके अत्यंत समीप आ गया, जिस पर पापियों के चिलाते हुए
11:15चेहरे उकेरे गए थे और जिसे भयानक जीव घेरे हुए थे।
11:20यमदूतों ने उसका पती हुई आत्मा को कुरूरता से खीच कर उस विशाल द्वार के भीतर धकेल दिया, जहां का
11:27वातावर्ण भट्टी की तरहे गर्म और दमगोंटू था।
11:31उस भयानक द्वार के भीतर कदम रखते ही, आत्मा को दूर क्षितिच पर न्याय के देवता धर्मराज यम के भव्य
11:38और दरावने सामराज्य का पहला साया दिखाई देने लगा, जहां उसका अंतिम न्याय होना था।
11:45उस विशाल द्वार को पार करते ही कापती हुई पापी आत्मा ने खुद को यमलोक के एक अत्यंत तप्त, कंटीले
11:53और सुलकते हुए मार्ग पर अकेले खड़ा पाया।
11:56तभी उस दंगोंटू और धहकते हुए लाल कोहरे के बीच से कुछ विशाल और भयानक आकरितिया उसकी और तेजी से
12:05बढ़ती हुई दिखाई देने लगी।
12:07कोहरे को चीरते हुए दो अत्यंत भयानक यमदूत सामने आये, जिनके कोईले जैसे काले शरीर परवतों की तरह विशाल और
12:16दरावने थे।
12:17उनके चहरे पर धधकती हुई भट्टी जैसी लाल आखें और बाहर निकले हुए पैने पीले नुकीले दांत देखकर आत्मा का
12:26हृदर भय से बैठ गया।
12:29अपने हाथों में भारी लोहे के कंटीले गदा और चम्चमाते हुए फास वाले यमपाश को घुमाते हुए वे उस पापी
12:37जिवात्मा की ओर लपके।
12:39भय भी थोकर जब आत्मा ने वापस भागने का प्रयास किया तो पीछे का विशाल लोहे का द्वार धधकते हुए
12:46अंगारों के धमाके के साथ हमेशा के लिए बंध हो गया।
12:51पहले यमदूत ने क्रोध में आकर एक ऐसी गगनभेदी गर्जना की जिससे नरक्की वे सुलक्ती हुई गुफाए और चट्टाने भी
12:59थर्थराने लगी।
13:01बिना कोई दया दिखाए, दूसरे यमदूत ने अपने हाथ का जलता हुआ यमपाश हवा में लहरा कर सीधे उस बेबस
13:09आत्मा की गर्दन पर फेंक दिया।
13:12जैसे ही वह गर्म लोहे का फंदा आत्मा के गले में कसा, असहनिय दर्द से तडपती हुई वह सुक्ष्म आत्मा
13:20घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ी।
13:22पहले यमदूत ने अपने भारी गदा को जमीन पर दे मारा, जिससे एक भयानक विस्फोट हुआ और आत्मा के पैर
13:31कंटीली लप्टों से घिर गए।
13:33अपनी गर्जती हुई आवाज में यमदूतों ने उसे धमकाते हुए कहा, हे पापी, तुने प्रिथवी पर धर्म का मखौल उड़ाया,
13:42अब अपने कर्मों का फल भुगतने के लिए तैयार हो जा।
13:46उसी क्षण यमदूतों के प्रभाव से उस सुलकते हुए धुए में आत्मा को अपने द्वारा किये गए पुराने पापों और
13:54क्रूरताओं के द्रिश दिखाई देने लगे।
13:57आत्मा ने थर्थराते हुए हाथ जोड कर दया की भीख मांगी परंतु उन कठोर स्वभाव वाले यमदूतों के क्रूर ठहाकों
14:06से पूरा मार्ग गुंज गुठा।
14:08बिना किसी देरी के दूसरे यमदूत ने उस जलते हुए लोहे के फंदे को क्रूरता से खीचा और उस चिल्लाती
14:16हुई आत्मा को घसीटना शुरू कर दिया।
14:20सुलगते हुए पत्थरों पर घिसटने के कारण उस सुख्षम शरीर को जो तीवर पीडा हो रही थी, वह संसार की
14:27किसी भी शारिरिक पीडा से करोडों गुना अधिक थी।
14:31पहले यमदूत ने अपने गदा को आत्मा के चहरे के समीप लाकर चेतावनी दी की यह तो केवल शुरुवात है
14:38और धर्मराज की सभा में उसका असली काल उसका इंतजार कर रहा है।
14:45गहन पश्चाताप और दुहक से भरी वह आत्मा रोने लगी, क्योंकि उसे समझा गया था कि प्रित्वी का उसका साराधन
14:53और जूठा अहमकार उसे इस न्याय से नहीं बचा सकता।
14:57क्रूर रक्षकों ने उसे जबरन खड़ा किया और लड़खडाते कदमों से उस अंथीन दहकते हुए तप्त मार्ग पर आगे बढ़ने
15:05के लिए मजबूर किया।
15:07धुंधले क्षितिच पर अब धर्मराज यम के भव्यक और काले पत्थरों से निर्मित भयानक महल की गगंचुंबी मीनारे साफ दिखाई
15:16देने लगी थी।
15:18अपनी भयानक नेती को स्वीकार करते हुए यमदूतों के कड़े पहरे में वह सिसकती हुई पापी आत्मा अपने अंतिम और
15:26निश्पक्ष न्याय की ओर बढ़ चली।
15:30यमदूतों ने अपनी जलती हुई मायावी रसी को उसका पती हुई जीवात्मा के गले में और अधिक कस दिया, जिससे
15:37उसकी बची-खुची सांसे भी घुटने लगी।
15:41उसने अपने सांसारिक घर और प्रियजनों की ओर अंतिम बार मुड कर देखने का प्रयास किया, लेकिन यमदूतों के करूर
15:49पाश ने उसे पीछे खीच लिया।
15:51एक विशालका यमदूत ने अपने वजर जैसे हाथों से उस अग्रिश्य दोरी को इतनी तेजी से जटका दिया कि जीवात्मा
16:00दर्द से तडप उठी।
16:02जैसे ही वह आत्मा तप्त काले पत्थरों पर घुटनों के बलगिरी, दूसरे भयानक यमदूत ने उसकी पीठ पर अपनी भारी
16:10गदा से प्रहार किया।
16:11उस मार के भयानक आघात से उस सुक्ष्म शरीर की आभा दरकने लगी और उससे नीली आध्यात्मिक उर्जा की बूंदे
16:20रिसने लगी।
16:22वे उसे घसीटते हुए यमलोक के बाहरी द्वार के भीतर ले गए, जहां की हवा दम घोटने वाली गंध और
16:29सुलक्ती हुई राख से भरी थी।
16:32आत्मा ने रोते हुए अपने पुत्रों और पत्नी का नाम पुकारा, लेकिन उसकी आबास उस भयानक घाटी की तूफानी हवाओं
16:41में खो गई।
16:42एक विक्राल बैल जैसे मुखवाले यमदूत ने उसकी बेबसी पर अट्टाहास किया और आगे फैले अनंत जलते हुए मार्ग की
16:51और इशारा किया।
16:53उसी क्षन कालपाश ने उसकी सुक्ष्म चेतना को इस तरह जक्रा कि उसके भीतर बची हुई आखिरी सांसारिक कामनाई भी
17:01जलकर राख होने लगी।
17:03जब वे उबलते हुए खून और मवाद से भरी वैतरनी की एक सहायक नदी के संकरे पुल से गुजरे तो
17:11आत्मा खौफ से काम उठी।
17:13काले पंखो वाले भयानक मायावी कौवे और शिकारी परलोकिक जीव आसमान में मंडराने लगे जो उसकी सुक्ष्म देह को नोचने
17:23का प्रयास कर रहे थे।
17:25अक्यधिक ठकान से जब वह अभागन आत्मा जमीन पर गिर पड़ी तो क्रूर रक्षकों ने उसे कोडों से मार कर
17:33फिर से उठने पर विवश किया।
17:35धीरे धीरे वे एक विशाल लोहे के महराब के पास पहुँचे जिस पर तराशे गए भयानक नर्मुंद चितरगुप्त के बही
17:43खाते के प्रतीक थे।
17:45उसने प्रार्थना करने के लिए अपने होट खोले लेकिन उसके सूखे गले और पापों के भारी बोज ने उसकी आवास
17:54को भीतर ही दबा दिया।
17:56यमदूतों के एक महाबली सेनापती ने, जिसने काले चमकीले कवच और मुकुट धारन किये थे, उसे चेताबनी दी की कर्म
18:05के नियम से कोई नहीं बच सकता।
18:07उसे फिर से एक ऐसे मैदान से होकर घसीटा गया, जो नुकीले लोहे के कांटों से भरा था, जिससे उसकी
18:15सुक्षम देह में असहनिय पीडा होने लगी।
18:18उस दहकती हुई जमीन से उठने वाला धुआ, उसकी आँखों के सामने उसके पूर्व जन्म के बुरे कर्मों के द्रिश
18:26बना कर उसे मानसिक रूप से प्रताडित करने लगा।
18:30अब उस पापी जीवात्मा को पूरी तरहा आभास हो चुका था कि ब्रहमांड के इन करूर दूतों के सामने उसकी
18:38कोई भी चतुराई काम नहीं आने वाली।
18:41धर्मराज यम का वह विशालकाय और भयानक महल अब बिलकुल सामने था जिसके विशालकाले द्वार एक भयानक गड़गराहट के साथ
18:50खुलने लगे।
18:52यमदूतों ने एक आखिरी और जोरदार धक्का देकर उसका पती हुई जंजीरों से बंधी जीवात्मा को न्याय के उस अंतिम
19:00और न्यायप्रिय कक्ष के भीतर धकेल दिया।
19:04भगवान विश्नुगरूर को बताते हैं कि यमराज के न्याय कक्ष में कर्मों का लेखा जोखा देखने के बाद पापी जीवात्मा
19:12को उस महा भयानक 86,000 योजन लंबे यमलोक के मार्ग पर भेज दिया जाता है।
19:19उस अत्यंत कठिन और लंबे मार्ग की शुरुवात में ही पापी जीवात्मा को तपते हुए लोहे के विशाल मैदानों पर
19:26पैर रखने के लिए विवश किया जाता है, जहां की गर्मी किसी धधक्ती भट्टी से भी अधिक भीशन होती है।
19:34उस मरुस्थल में अचानक अत्यंत तीवर और तप्त वायू चलने लगती है, जो पापी के शरीर को जुलसाते हुए उसकी
19:42तवचा को राख में बदलने का प्रयास करती है।
19:46आगे बढ़ते ही असिपत्र नामक एक भयानक वन आता है, जहां के व्रिक्षों के पत्ते तलवार की धार जैसे अत्यंत
19:54तीखे और नुकीले लोहे के बने होते हैं।
19:58जब वह जीवात्मा धूप से बचने के लिए उन व्रिक्षों की छाया में शरण लेती है, तब वे नुकीले पत्ते
20:06हवा के एक जोके से गिर कर उसके अंगों को छिन्नभिन कर देते हैं।
20:11इसके बाद यमदूत उस रोते हुए पापी को एक ऐसे मरुस्थल में खीच ले जाते हैं, जहां की रेट खौलते
20:19हुए तेल की तरहे गर्म और अत्यंत दाहक होती हैं।
20:23उस असहनिय तपन के बीच आकाश से विशालकाए और लोहे की चोच वाले भयानक गिद्ध और कौवे उतर कर उस
20:31पापी के अंगों को नोचने लगते हैं।
20:35आगे का मार्ग नुकीले कांटों और वजर के समान कठोर शलमली व्रिक्षों से भरा है, जिन पर यमदूत उस पापी
20:43शरीर को बार-बार पटकर लहुलुहान कर देते हैं।
20:47प्यास से व्याकुल होकर जब वह जीवात्मा पानी की एक बून्द के लिए गिड़गिडाती है, तब कुरूर यमदूत उसे पीने
20:55के लिए खौलता हुआ पिघला तामबा और पीप देते हैं।
21:00अत्यंत गर्मी के बाद अचानक उस आत्मा को एक ऐसे बर्फी लेक शेत्र में धकेल दिया जाता है, जहां की
21:07हाड़कम पाने वाली ठंड उसके अस्तित्व को सुन्न कर देती हैं।
21:12उस ठिठुरते हुए मार्ग पर बर्फ की दरारों से निकल कर भयानक विशैले सर्प और बिच्छु उस पापी जीवात्मा के
21:20शरीर को डसने लगते हैं।
21:23इस कश्टकारी यात्रा के मध्य में पापी आत्मा के सामने सौ योजन चोड़ी भयानक वैतर्नी नदी आती हैं, जिसका द्रिश
21:31देखकर ही प्रान कांप उठते हैं।
21:35उस वैतर्नी नदी के खौलते हुए रक्त और पीप के भीतर भयंकर घडियाल वजर जैसी चोचवाले पक्षी और मानसाहारी जलिये
21:43जीव तैरते रहते हैं।
21:46यमदूत उस पापी को बेरहमी से उस खौलती हुई नदी के बीच से खीच कर ले जाते हैं, जिससे वह
21:53बार-बार डूपता है और असहनिय पीडा पाता है।
21:58नदी को पार करने के बाद मार्ग में गेहन अंधकार का सामराज जाता है, जहां पापी को अपना हाथ भी
22:05दिखाई नहीं देता और वह भय से चिल्लाने लगता है।
22:10उस घोर अंधकार में अद्रिश्य हिंसक पशु और दानव उस डरे हुए पापी पर हमला कर उसके मास को नोचते
22:17हैं।
22:19इस असहनिय पीडा को भोगते हुए वह जीवात्मा अपने प्रित्वी लोग के पापों को याद कर रोती है और पच्चताती
22:27है कि उसने जीवन में धर्म का मार्ग क्यों नहीं चुना।
22:31आगे उन्हें वजर के समान कठोर और दहकते हुए परवतों पर चड़ना पड़ता है, जहांके नुकीले पत्थर पैर रखते ही
22:39हड्डियों को चूर कर देते हैं।
22:42भगवान विश्णुगरूर को समझाते हैं कि यह भीशन यात्रा किसी और के द्वारा दिया गया दंड नहीं, बलकि मनुष्य के
22:50अपने बुरे कर्मों का ही परिनाम है।
22:54इस प्रकार अनेक कष्टों को सहते हुए, अन्तव थकिहारी और तूटी हुई जीवात्मा यमलोक के मुख्य द्वार पर पहुँचती है,
23:02जहां धर्मराज उसका अंतिम न्याय करने वाले हैं।
23:07यमलोक के बाह्यक्षेत्र में पहुँचते ही एक तीवर और दहक्ती हुई वायू बहने लगती है, जो सुक्ष्म आत्मा के भीतर
23:15भूख और प्यास की प्रचंड ज्वाला भढ़का देती है।
23:20भगवान विश्नु वैकुंठ में गरुर देव को समझाते हैं कि स्थूल शरीर न होने के कारण भी सुक्ष्म शरीर में
23:27पाचों ज्यानेंद्रिया और उनकी अत्रिप्ट त्रिश्नाय पूर्ण रूप से जीवित रहती हैं।
23:34आत्मा के पारगर्शी सुक्ष्म उदर में अचानक एक तीवर, विनाशकारी अगनी भड़क उठती है, जिससे उसे ऐसा प्रतीत होता है
23:42मानों उसका संपूर्ण अस्तित्व भीतर से जल रहा हो।
23:47उसकी सुक्ष्म जहवा और कंठ में पिघले हुए सीसे जैसी भयानक प्यास भर जाती है, परंतु उस निर्जन मार्ग पर
23:55जल की एक बूंद भी उपलब्ध नहीं होती।
23:58यमलोक के भ्यामक वातावर्ण में आत्मा को दूर बहती हुई शीतल अमरित की नदिया और लजीज व्यंजनों के धेर आभासी
24:06रूप में दिखाई देने लगते हैं।
24:10प्यास से व्याकुल होकर जब वह आत्मा उस मायावी नदी की ओर जपटती है, तो उसके हाथों में केवल गर्म
24:17राख और जलते हुए अंगारे ही आते हैं।
24:22आत्मा की इस दुर्दशा को देख कर भयानक आकार वाले यमदूत ठहा के लगाते हैं और उसे अपनी लोहे की
24:29गदाओं से धकेलते हुए आगे बढ़ाते हैं।
24:33भगवान विश्नुस पष्ट करते हैं कि भौतिक मुख और अमाशय के अभाव में स्थूल अन्न और जल इस सुक्ष्म शरीर
24:41की त्रिशना को कभी शांत नहीं कर सकते।
24:44पाप कर्मों से उपजी यह आंतरिक भुख्मरी आत्मा के चारों और फैली नीली और सुनहरी प्रभावली को भी कश्टदायत लाल
24:53अगनी में बदलने लगती हैं।
24:56अत्यधिक वेदना से पीडित होकर वह जीवात्मा अपने पूर्वजन्म के लोभी स्वभाव और श्राध्धन करने की भूलों को याद करके
25:04फूट-फूट कर रोने लगती हैं।
25:08उसे आभास होता है कि प्रित्वी पर उसके वंश्जों द्वारा किये जाने वाले तरपन और पिंड दान के बिना यह
25:15यातना पलप्रतिपल बढ़ती ही जाएगी।
25:18यमलोग के मुख्यद्वार की असहय उश्णता हवा के प्रत्येक कन को पिढ़ली हुई अगनी में बदल देती हैं, जिससे आत्मा
25:26की प्यास सौ गुना अधिक बढ़ जाती है।
25:30जल की एक बून के लिए गिडगिडाती आत्मा की पुकार पर ध्यान दिये बिना, यमदूत उसे पाश में बांध कर
25:37कठोरता से खीचते रहते हैं।
25:40आत्मा जब भी मायावी अन्न को स्पर्ष करने का प्रयास करती है, उसके पारगर्शी हाथ निर्जीव हवासे होकर गुजर जाते
25:49हैं और केवल रिक्टता ही शेश रह जाती है।
25:53श्री हरी गरूर को बताते हैं कि केवल उचित मंत्रो चार के साथ दिये गए पिंडदान की आध्यात्मिक उर्जाही इस
26:01सुक्ष्म त्रिश्ना को आशिक शान्ती दे सकती है।
26:05परियाप्त धर्म और पुन्य के अभाव में उस पापी आत्मा का कंठ हजार मध्याहन सूरियों की तपन से भी अधिक
26:13भयानक रूप से सुक्ष्म चला जाता है।
26:17अंधीन क्षुधा और त्रिश्ना के प्रहार से थर्थर कापती हुई वह आत्मा यमलोक के विशाल लौह द्वार की दहलीज पर
26:24गिर पड़ती है।
26:26द्वार के चारों और मंदराती हुई काली चायाएं उसे याद दिलाती हैं कि कैसे उसने जीवन भर भूखे और प्यासे
26:35जीवों को भोजन देने से इनकार किया था।
26:38आत्मा को यह कटू सत्य समझाता है कि मनुष्य का भौतिक लालची मृत्यू के बाद अन्थीन आध्यात्मिक शुधा का रूप
26:46धारण कर लेता है।
26:49भूख, प्यास और पश्चाताप से पूरी तरह तूट चुकी वह आत्मा अंत्य धर्मराज के अंतिम न्याय कक्ष में प्रवेश करने
26:57के लिए विवश होकर आगे बढ़ती है।
27:01आत्मा जैसे ही आगे बढ़ती है। उसके सामने अन्थीन दर्पणों का एक भयानक मार्ग प्रकट होता है जो उसे उसके
27:09जीवन के हर एक क्रूर और स्वार्थी क्षन की याद दिलाता है।
27:14भयंकर यमदूत अपने विशाल, श्यामवर्ण, शरीरों और जलती हुई लाल आखों के साथ आत्मा पर प्रहार नहीं करते बलकि उसके
27:23कानों में उसके गुप्ट पापों को फुस्फुसाते हैं जिससे वह भय से काप उठती है।
27:30मानसिक माया जाल में आत्मा अपने प्रियजनों को प्रिथवी पर रोते हुए और फिर धीरे धीरे अपने जीवन में आगे
27:37बढ़ते हुए देखती हैं, जिससे उसे सांसारिक मोह की क्षन भंगुरता का गहरा एहसास होता है।
27:45उस व्यक्ती की चीखती हुई आत्मा की मानसिक छाया जिसे इस जीव ने अपने जीवनकाल में धोखा दिया था, अब
27:53उसके सामने आकर उसे गहरे पश्चातात की अगनी में जलाने लगती है।
27:59आत्मा के पैरों के नीचे की भूमी अचानक धने काले धुए के एक घूमते हुए बवंडर में बदल जाती है,
28:06जो उसके संचित बुरे कर्मों और मलिन विचारों का प्रतीक है।
28:11आकाश में चित्रगुप्त की एक विशाल दिव्य और जागरत आख दिखाई देती है, जो अगनी के अक्षरों में आत्मा के
28:19जीवन के हर एक अच्छे और बुरे कर्म का बही खाता हवा में लिख देती है।
28:25भयभीत आत्मा वहां से भागने का प्रयास करती है, लेकिन वह अपनी ही अधूरी और अन्थीन इच्छाओं से बनी पत्थर
28:34की चलती हुई दीवारों के एक चक्रव्यू में फंस जाती है।
28:39चक्रव्यू की पत्थरीली दीवारों से उन असहाय और गरीब लोगों के अद्रिश्य हाथ बाहर निकलते हैं, जिन्हें इसने कभी दान
28:47नहीं दिया था, और वे उसकी सुक्ष्म देह को पकड़ कर खीचने लगते हैं।
28:53आत्मा तपत नामक एक अत्यंत तीवर मानसिक ज्वर का अनुभव करती है, जो पश्चाताप और पूर्न लाचारी के कारण उसके
29:02सुक्ष्म शरीर के भीतर से ही उत्पन होता है।
29:06उसके अतीत के अहंकार का प्रतीक एक विशाल सोने का मुकुठ हवा में बिखर जाता है और लोहे की भारी
29:13तपती हुई जंजीरों में बदल कर उसके सुक्ष्म गले को जकड लेता है।
29:18मानसिक यातना की अगली अवस्था में चारों और एक बरफीला और अंधकार में शूनि छा जाता है जहां आत्मा स्वयंको
29:28इश्वर और संपूर्ण ब्रहमांड द्वारा पूर्णत है परित्यक्त महसूस करती है।
29:34अंधकार के बीच धर्मराज यमराज के विशाल और भयानक वाहन महिश के हापने की गूंच सुनाई देती है, जिसके प्रभाव
29:42से आत्मा का सुक्ष्म अस्तित्व पूरी तरह जम जाता है।
29:47जब वह थर्थराते हुए इश्वर से प्रार्थना करने का प्रयास करती है, तो उसके द्वारा जीवन भर बोले गए असतियों
29:55का भारी बोज उसके कंठ को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है।
30:00परोपकार और दान के वे सुनहरे अवसर जो उसने जीवन में गवा दिये थे, अब जलते हुए सुनहरे तीरों की
30:08तरह उसकी आखों के सामने आकर ओजल हो जाते हैं।
30:12नीले काले चमकीले चमरे जैसे शरीर वाले यमदूत आत्मा के सांसारिक वैभव और पदप्रतिष्ठा का उपहास उड़ाते हुए उसे याद
30:21दिलाते हैं कि यहां केवल धर्म ही काम आता है।
30:26उस जीव की अपनी अंतरात्मा अंदर से एक रोते हुए तेजस्वी सुनहरे बालक के रूप में प्रकट होती है, जो
30:34अब पूरी तरह से पापों की काली काईक से ढकी हुई है।
30:39उसकी आखों के सामने रक्त और आसूओं का एक विशाल लाल सागर उमरता है, जो उन सभी लोगों के दुहक
30:46का प्रतीक है, जिनहें उसने अपने जीवनकाल में सताया था।
30:51दूर कहीं बर्ष्ती हुई दिव्यमंदिरों की घंटियों की ध्वनी उसे उस आध्यात्मिक मार्ग की याद दिलाती है, जिसे उसने हमेशा
31:00अंदेखा किया, जिससे उसका मानसिक संताप दो गुना हो जाता है।
31:05आत्मा को अंतह यह परम सत्य ज्यात होता है कि बाहरी नरक केवल उसके अपने ही भीतरपल रहे इस भयंकर
31:13मानसिक अशांती और आत्मगलानी का बाहरी प्रतिबिम्भ है।
31:18पूरी तरह से ठकी हुई, तूटी हुई और अहंकार से रहित हो चुकी वह आत्मा अब यम्राज की अत्यंत भव्य
31:26और दरावनी न्यायसभा की दहलीस पर कापती हुई खड़ी होती है।
31:31भगवान विश्नु अपने परम वाहन गरूर को संबोधित करते हुए समझाते हैं कि कैसे एक धर्म प्रायन और पुन्यात्मा की
31:40मृत्यू का मार्ग पापी आत्माओं के विपरीट अत्यंत सुखद और प्रकाशमान होता है।
31:46प्रिथवी लोग पर वह पुन्यात्मा अपने जीवन के अंतिम खशनों में पवित्र मंत्रों और ईश्वर के नामों के मधुर उच्चारण
31:54के बीच अत्यंत शांत भाव से शया पर लेटी हुई है।
31:59उसके शरीर से प्राणों का निकास किसी हिंसक जटके के बिना अत्यंत सहच्चता से पैरों से उठकर मस्तक की ओर
32:07बढ़ने लगता है और मुख पर एक संतोश जनक मुस्कान छोड़ जाता है।
32:13अंतिम श्वास के साथ ही वह पवित्र जीवात्मा मस्तक के ब्रह मरंधर से एक अत्यंत देधी प्यमान स्वर्ण जोती के
32:21पुन्च के रूप में बाहर निकलती है।
32:24शरीर से मुक्थ होते ही वह जोतिर्मय आत्मा एक अत्यंत दिव्यक निर्मल और कांतियुक्ट सुक्ष्म शरीर धारन कर लेती है
32:33जो उसके सतकर्मों का सजीव प्रतीक है।
32:37तभी आकाश का अंधकार चीरते हुए भगवान विश्नु के दो परम तेजस्वी देवदूत अत्यंत शांत और सौमे रूप में वहां
32:45प्रकट होते हैं, जिनकी आभासे संपूर्ण कक्ष आलोकित हो उठता है।
32:51यमदूतों के भयानत पाश के विपरीट ये देवदूत उस पुन्यात्मा के सम्मुक अत्यंत विनमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर खड़े होते
32:59हैं और उसे अभाय का आशिरवाद देते हैं।
33:04उनके पीछे स्वर्ग से उत्रा हुआ एक दिव्य पुष्प विमान तैरता हुआ दिखाई देता है, जो विशुद्ध स्वटिक और सोने
33:11से निर्मित है, तथा दिव्य रतनों से जग्मगा रहा है।
33:16देवदूत अत्यंत आदर और स्ने के साथ उस पुन्यात्मा को उस प्रकाशमान विमान पर विराजने के लिए आमंत्रित करते हैं,
33:25मानों वे किसी परम्प्रिय अतिथी का स्वागत कर रहे हूं।
33:29जैसे ही विमान आकाश की ओर बढ़ता है, मंद सुगंधित पवन चलने लगती है और स्वर्ग के कल्पवरिक्ष तथा पारिजात
33:37के सुन्दर पुष्प विमान पर बरसने लगते हैं।
33:41वह पुन्यात्मा बिना किसी मोह, पश्चाताप या भय के अपने पार्थिव घर को पीछे छूटते हुए देखती है और उसके
33:50मन में केवल अनंत्शान्ती का वास होता है।
33:53मार्ग में देवलोग के गंधर्व अपने दिव्यवाद्यों से अत्यंत मधुर संगीत छेड़ते हैं और उस पुन्यात्मा के सदाचारी जीवन की
34:02गाथा गाकर उसका स्वागत करते हैं।
34:06स्वर्ग की अपसराएं बादलों के जुर्मुट से निकल कर उस दिव्य विमान के चारों और निर्थ्य करती हैं और उस
34:13पर स्वर्णिम अक्षक और पुष्पों की वर्षा करती हैं।
34:18उस दिव्य यात्रा के मार्ग को सुगम बनाने के लिए स्वयन सूर्य देव अपनी तीक्षन किरणों को शीतल और सुखदायक
34:25बनाकर मार्ग को आलोकित करते हैं।
34:29पित्री लोग की सीमाओं से गुजरते समय उस पुन्यात्मा के पूर्वस बादलों पर प्रकट होकर अत्यंत प्रसंता पूर्वक उसे आशिरवाद
34:38देते हैं और उसके सतकर्मों पर गर्व करते हैं।
34:43विमान ख्षीर सागर और दिव्य अमरित नदियों के उपर से अत्यंत सहज्टा से उड़ता है, जिनकी तरंगे आत्मा की आंतरिक
34:51पवित्रता को प्रतिबिंबित करती हैं।
34:55देवदूत उस पुन्यात्मा को बताते हैं कि प्रित्वी पर उसके द्वारा किये गए दान तप और दूसरों के प्रतिदया ही
35:02आज इस सुखद और दिव्य मार्ग के रूप में परिनत हुए हैं।
35:07अंतर बादलों के पार स्वर्ग लोग के विशाल स्वर्णिन द्वार दिखाई देने लगते हैं, जो विशुद्ध हीरों और मनियों से
35:15जड़े हैं और असीम दिव्य प्रकाश से चमक रहे हैं।
35:20भगवान विश्णु गरूर से कहते हैं कि धर्म की राह पर चलने वाले मनुष्य की आत्मा को मृत्यू का कोई
35:27भय नहीं होता, क्योंकि वह अंतर मेरे परमधाम को प्राप्त करती है।
35:32वह पुन्यात्मा अत्यंत कृतग्यता और परमानंद के साथ स्वर्ग के उन द्वारों में प्रवेश करती है, जहां उसे अनंत सुख,
35:41शान्ती और ईश्वर के सानिध्य का वर्दान मिलता है।
35:46जहां एक और पुन्यात्मा स्वर्ग के सुखों में लीन होती है, वहीं दूसरी और यह पापी जीवात्मा भैसे कापती हुई
35:54यम्दूतों के क्रूर पाश में बंधी यमलोक की भयानक सीमाओं की और घसीटी जा रही है
36:01यात्रा के अंत्में उस पापी जीवात्मा के सामने यमलोक का वह बाहरी मार गाता है, जहां चारों और सलफर की
36:09दुरगंध और असहनिय अंधकार फैला हुआ है
36:13तभी बादलों के पार से यमलोक के विशाल और डरावने लोहे के द्वार दिखाई देने लगते हैं, जो काले पत्थरों
36:20और नुकीले कांटों से घिरे हुए है
36:24क्रूर यम्दूत उस्थकीहारी और छट पताती हुई आत्मा को यमलोक की सीमा पर बने पहले जांच शिवर के सामने लाकर
36:32बेरहमी से घुटनों के बल गिरा देते हैं
36:36वहां तैनात यमलोक का मुख्य द्वारपाल जो एक भयानक और दैत्याकार दानव है, अपनी धधक्ती लाल आखों से उस पापी
36:45आत्मा को घूरता है
36:48द्वारपाल अपने हाथ में पकड़े विशाल कांटेदार गदा को जमीन पर पटकते हुए जोर से गरचता है और उस आत्मा
36:56के पापों का ब्यौरा मांगता है
36:59दूर तुरंथ ही एक काला और धुआ उगलने वाला चमडे का पत्र आगे बढ़ाते हैं, जिस पर उस मनुष्य के
37:07जीवन भर के पाप लिखे हुए है
37:10आत्मा अत्यंत व्याकुलता से पीछे मुड़ कर देखती है, पर उसे दूर दूर तक केवल अंधकार और पश्चाताप की भयानक
37:18परचाईया ही नजर आती है
37:21उस थंडी और भयानक जगहे पर हवाओं के चलने से ऐसी डरावनी आवाजें आती हैं, जैसे कोई दर्द से छटपटा
37:30रहा हो
37:31अचानक अंधकार से यमराज का भयानक शिकारी कुट्टा बाहर आता है, जिसकी आखें दहकते अंगारों की तरह चमक रही है
37:41वह विशाल का एक उत्ता आत्मा के पास आकर उसे सूंगता है और जोर से भौंकता है, जिससे पूरी धर्ती
37:49कांप उठती है
37:51तभी साय के समान दिखने वाला यमलोक का एक लिपिक जो चित्रगुप का सहायक है, हाथ में एक काली पट्टी
37:59लेकर आगे आता है
38:02वह लिपिक अपने पत्थर के आउजार से उस पट्टी पर आत्मा का नाम लिखता है, जिससे उस पर लाल रंग
38:09की आग जैसी चमक उभरती है
38:13पंजीकरन पूरा होते ही यमलोक के भारी द्वार धीरे-धीरे खुलते हैं, जिससे अंदर की जलती हुई दुनिया की भयानक
38:20जलक दिखाई देती है
38:23क्रूर यमदूत उस चीखती चिल्लाती आत्मा को खीचते हुए उन द्वारों के पार ले जाते हैं, जहां से वापस लोटने
38:31का कोई मार्ग नहीं है
38:34जैसे ही आत्मा का पैर्यम लोक की धर्ती पर पड़ता है, उसे ऐसा लगता है मानो हजारों सुया एक साथ
38:41उसके अंगों में चुब रही हो
38:45यम्दूत हनस्ते हुए उस आत्मा को ताना मारते हैं कि जब तुम धर्ती पर पाप कर रहे थे, तब तुमने
38:52धर्म के मार्ग को क्यों भुला दिया
38:55पापी जीवात्मा अपने कर्मों पर खून के आसूरोती है, पर अब बहुत देर हो चुकी है, और उसे अपने हर
39:02कर्म का हिसाब देना ही होगा
39:05आगे बढ़ते ही कोहरे के बीच से यमराज का विशाल और भव्य न्याय दर्बार दिखाई देने लगता है, जहां स्वय
39:12धर्मराज यम विराजमान है
39:16पापी जीवात्मा को उस विशाल न्याय सभा के मुख्य सोपानों पर खड़ा किया जाता है, जहां वह कापते हुए अपने
39:24अंतिन न्याय की प्रतीक्षा कर रही है

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