इस एपिसोड में, भगवान श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन के साथ मगध की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ उन्हें क्रूर राजा जरासंध का सामना करना है। राजसूय यज्ञ के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा, जरासंध को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण एक अद्भुत कूटनीति रचते हैं। ब्राह्मणों के वेश में प्रवेश कर, वे जरासंध को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारते हैं। भीम और जरासंध के बीच एक भीषण कुश्ती का संग्राम छिड़ता है, जो कई दिनों तक चलता है। श्रीकृष्ण के रहस्यमय संकेत से भीम जरासंध के रहस्यमय जन्म की कमजोरी को समझते हैं और उसे पराजित कर मुक्त करते हैं। बंदी राजाओं को स्वतंत्रता मिलती है, और इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ की भव्य तैयारी शुरू होती है। यह एपिसोड धर्म की विजय और भगवान कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का साक्षी है। #JarasandhaVadh #KrishnaLeela #Bhima #RajsuyaYagya #Mahabharat #BhagavataPurana #HinduMythology #Krishna #Yudhishthira #Pandavas #Magadha #EpicBattle #Dharma #S3E68 #Puranas
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00:00देवभूमि द्वारका से निकल कर भगवान श्रीकृष्ण और उद्धव का दिव्यरत इंद्रप्रस्थ की विशाल प्राचीरों की ओर तीवर गती से
00:08बढ़ रहा था, जिसके आगमन की सूचना से धर्मराज युधिष्थिर का हृदय पुलकिथो उठा था.
00:15इंद्रप्रस्थ के द्वार पर पहुँचते ही धर्मराज युधिष्थिर अपने चारों पराक्रमी भाईयों भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ देव
00:24की नंदन का स्वागत करने के लिए आतुरता से खड़े थे, उनके चहरों पर श्रधा और हर्ष का अनुपम
01:00संगम झलक रहा था।
01:30एक अंतरनेहित चिंता की ध्वनी थी।
01:58पर शाल चुनोती को पहले ही जान चुके हों।
02:01अत्याचारों ने धर्मराज के राजसू यग्य के मार्ग को अवरुद्ध कर रखा है।
02:07उद्धव के कथन के पश्चात, पांडवों के बीच एक संक्षिप्त विचार विमर्ष हुआ, जहां भीम की आखों में युध की
02:15ललक और अर्जुन के मुख पर गहरी चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
02:20उस गेहन क्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने धैर्यपूर्वक पूरी सभापर अपनी दिव्यद्रिष्टी दोडाई, हर एक के मन के भावों को
02:28भापते हुए, मानों वे उनके भीतर चल रही हर हलचल को समझ रहे हुँ।
02:34अंतह अपनी मौन भंग करते हुए, भगवान श्रीकृष्ण ने गंभीरता से घोषणाकी की राजसुय यग्य की पूनता के लिए मगधराज
02:43जरासंध का वध अत्यंत आवश्चक है, यह एक ऐसी चुनोती थी जिससे बचना संभव नहीं था।
02:51उन्होंने समझाया कि जब तक जरासंध जीवित है और शक्तिशाली राजाओं को बंदी बना रहा है, तब तक कोई भी
02:59राजा युधिष्ठिर के प्रभुत्व को स्विकार नहीं करेगा, जिससे राजसुय यग्य का मूल उद्देश ही विफल हो जाएगा।
03:06यह सुनकर बलशाली भीम की आखों में अगनी प्रजवलित हो उठी और उन्होंने अपनी विशाल मुठी भीच कर तुरंत जरासंध
03:15से युध करने की अपनी तीवर इच्छा व्यक्त की, उनकी मांसपेशिया संकल्प से तनी हुई थी।
03:22इसके विप्रीत अर्जुन ने अपनी शांत, चिंतनशील मुद्रा बनाये रखी और अत्यंत व्यवहारिक स्वर में भगवान कृष्ण से पूछा की
03:31जरासंध जैसे अजे शत्रु को सीधे युध में पराजित करना कैसे संभव होगा, जिसकी शक्ती जगविख्यात है।
03:40अर्जुन की बात सुनकर, भगवान श्रीकृष्ण ने एक रहस्य में मुस्कान बिखेरी और सुझाव दिया की जरासंध से सीधे युध
03:48करने के बजाए, उसे ब्राहमनों के वेश में चुनौती दी जाए, जिससे उसका अहंकार उसे विनाश की ओर धकेल सके।
03:57उन्होंने विस्तार से बताया की जरासंध को जन्म से ही दो टुकडों में विभाजित कर दिया गया था, जिसे जरा
04:04नामक राक्षसी ने जोड कर जीवित किया था, और इसी कारण वह किसी भी सीधे युध में पराजित नहीं हो
04:11सकता, जब तक उसकी इस कमजोरी को लक्ष �
04:14न बनाया जाएं। तब श्री कृष्ण ने प्रस्ताव रखा कि वेस्वयन, बलशाली भीम और धनूर्धर अर्जुन तीनों ब्राहमनों के वेश
04:23में मगध जाएंगे और जरासंध को द्वंधव युध के लिए चुनोती देंगे।
04:44को समझते हुए, भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें धैर्य पूर्वक आश्वस्त किया कि उनकी विजय निश्चित है क्योंकि धर्म और
04:52न्याय उनके साथ हैं और उनका उद्देश्य स्वय धर्म की स्थापना करना है।
05:15धर्म की स्थापना के इस महत्वपूण क्षण में भगवान श्री कृष्ण अपने दो पराक्रमी बंधू भीम और अर्जुन के साथ
05:24ब्राहमनों का वेश धारन कर एक गुप्त और पेरिलस यात्रा पर निकल पड़े, उनके हृद्यों में जरासंध के वद का
05:31द्रिड संक
05:33देवभूमी इंद्रप्रस्थ को पीछे छोड़ते हुए तीनों योद्धा अब विनमर ब्राहमनों के रूप में मगद की दुर्गम राहों की ओर
05:42बढ़ चले जहां हर कदम पर सावधानी और विवेक की आवश्शकता थी
05:47घने वन प्रांतों से गुजरते हुए उन्होंने अपनी ब्राहमन वेश्भूशा को अत्यंत सतर्कता से बनाये रखा किसी भी संदिग्ध द्रिष्टी
05:56से बचने के लिए साधारन और अविस्मनिय दिखते हुए
06:01एक क्षण के लिए भीम के द्रिढ मुख पर आतूर्ता की चाया उभी जबकि अर्जुन की पैनी द्रिष्टी ने आसपास
06:08के वन में छिपी हर हलचल को भाप लिया
06:12तब भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य मुस्कान और शांत वानी से उन्हें पुना धैर्य का पाथ पढ़ाया, स्मरण दिलाया
06:20की धैर्य ही सबसे बड़ा अस्त्र है
06:23अनेक दिनों की यात्रा के पश्चात, शितिच पर मगद की विशाल और अभेद्य भूमी प्रकट हुई, जिसके हृदय में कुरूर
06:31जरासंध का गड़ गिरिवरज स्थित था
06:35गिरिवरज मगद की राजधानी, अपनी विशालकाय प्राचीरों और पाँच प्राकृतिक पहाडियों से घिरी हुई एक दुर्गम नगरी थी, जिसकी भव्यता
06:44और सुरक्षा व्यवस्था किसी भी शत्रु को भयभीत कर देती थी
06:49तीनों ने मिलकर प्रवेश का एक ऐसा मार्ग धूढा, जहां वे साधारन तीर थेात्रियों या भिक्षूओं के समोह में बिना
06:57किसी विशेश ध्यान के घुल मिल सकें
07:01सुर्योदय के समय वे अन्य ब्राह्मनों और यात्रियों के बीच छिप कर मगत की राजधानी के बसलिंग द्वारों से भीतर
07:08प्रवेश कर गए, उनकी दिव्य आभा वेश के नीचे छिपी थी
07:13गिरिवरज की संकरी गलियों और चौड़े बाजारों में चलते हुए, उन्होंने शहर की जीवनशैली और जरासंध के सामराज्य की शक्ती
07:22का सुक्ष्मता से निरीच्षन किया, हर ओर शाही भव्यता और आतंक का मिलाजुला प्रभाव था
07:29अपनी योध्धा प्रकृती के विप्रीत, भीन को ब्राह्मनों की नम्र मुद्रा बनाये रखने में भीतर ही भीतर संधर्श करना पड़
07:37रहा था, उनकी हर मांस्पेशी चुनोती के लिए छटपटा रही थी
07:42श्री कृष्ण ने एक सटल संकेट से भीन को उनकी यात्रा के पवित्र उद्देश का स्मरण कराया, जिसने उनके भीतर
07:50की अगनी को शांत किया और उन्हें पुनह सन्यम में ले आया
07:55अंतह, उनकी द्रिष्टी जरासंध के भव्य और दुर्गम महल पर पड़ी, जो मगद के हृदय में एक अजे प्रतीक की
08:02तरह खड़ा था
08:04उन्होंने महल के प्रवेश मार्ग और उसके आसपास की गतिविधी का गेहन अध्ययन किया, जरासंध को चुनोती देने के लिए
08:12सही समय और रणनीती निर्धारित करते हुए
08:16अचानक एक शाही पहरेदार की पैनी द्रिष्टी उन पर पड़ी, परंतु कृष्ण की शांत उपस्थिती और उनके ब्राह्मन वेश ने
08:24किसी भी संदेह को तुरंत शांत कर दिया
08:28निडर होकर वे महल के बाहरी प्रांगण में प्रवेश कर गए जहां उन्हें शाही जीवन की चहल पहल और जरासंध
08:35के सैन्यबल का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ
08:39उन्होंने तै किया कि वे ब्राह्मनों के रूप में यग्य के लिए भिक्षा मांगने का बहाना बना कर सीधे जरासंध
08:46के सामने उपस्थित होंगे जिससे सीधे चुनौती दी जा सके
08:51इस निर्नायक क्षण में वे धीरे-धीरे महल के आंतरिक कक्षों की ओर बढ़े जहां उन्हें जरासंध के भव्य सिनहासन
08:59कक्ष तक पहुँचने की उम्मीद थी
09:02एक दर्बारी ने उन्हें क्षण भर के लिए रोका परंतु श्री कृष्ण के धैर्यपून उत्तर और उनकी आभाने उन्हें आगे
09:10बढ़ने की अनुमती दिलवाई
09:12और फिर वह क्षणा पहुचा जब तीनों अपने ब्राह्मन वेश में मगधराज जरासंध के भव्य दर्बार में प्रवेश कर गए
09:21जहां सैक्डों दर्बारी और सैनिक उपस्थित थे
09:26जरासंध के भव्य दर्बार में प्रवेश करते ही उनकी असाधारण आभा और असामान्य वेश भूशाने क्षण भर के लिए सैक्डों
09:34दर्बारी और सैनिकों की फुस्तुसाहट को सन्नाटे में बदल दिया
09:40राजसिनहासन पर विराजमान मगधराज जरासंध ने अपनी पैनी द्रिष्टी से उन्हें उपर से नीचे तक निहारा उसके चहरे पर भ्रम
09:48और संदेह के गहरे भाव उभराए
09:52जरासंध अपने सामराज्य की शक्ती और अपने विज्यों के अहंकार से भरा हुआ इन असामान्य ब्राहमनों की उपस्थिती से चकित
10:00और कुछ हद तक क्रोधित भी था
10:04श्रीकृष्ण धैर्य और शांत स्वभाव का प्रतीक धीमे कद्मों से आगे बढ़े उनकी आखें सीधे जरासंध की आखों में स्थिर्थीं
10:12जैसे कोई गहरा रहस्य उजागर करने को हो
10:17जरासंध ने अपनी भौहें चड़ा कर पूछा के ब्राहमनों आप कौन हैं और किस उद्देश से इस निशिद्ध समय पर
10:25मेरे दर्बार में प्रवेश किया है
10:28श्रीकृष्ण ने एक गंभीर किन्तु मधूर स्वर में उत्तर दिया के मगधराच हम यात्री ब्राहमन हैं जो दूर देशों से
10:36आए हैं और आपसे एक विशेश याचना करने के लिए प्रस्तुत हुए हैं
10:43जरासंध ने तीनों की वेशभूशा और उनके असाधारन शारिरिक गठन पर गौर किया विशेशकर भीम के विशालकाई शरीर को देखकर
10:52उसके मन में गहरा संदेह उत्पन हुआ
10:55राजा जरासंध ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा तुम्हारे शरीर ब्राहमनों जैसे कोमल नहीं बलकी योध्धाउं जैसे सुद्रिड और बलशाली प्रतीत
11:05होते हैं अपनी असली पहचान बताओ
11:09भीन के चहरे पर अधीर्ता और क्रोध के सुक्षम भाव उभराए उनका हाथ अंजाने में अपने छिपे हुए गदा की
11:17ओर बढ़ा जिसे श्रीकृष्ण ने अपनी द्रिष्टी से तुरंत नियंत्रित कर लिया
11:22अरजुन अपने शांत और सतर्क स्वभाव के साथ दर्बार के प्रत्येक सैनिक और दर्बारी को स्कैन कर रहा था किसी
11:30भी संभावित खत्रे को भांपने के लिए तयार
11:34श्री कृष्ण ने अपने शांत स्वर को बनाये रखा, ये राजन, ब्राह्मन अपनी पहचान, अपने ज्ञान और कर्मों से बनाते
11:42हैं, हमारी याचना ही हमारी असली पहचान है
11:47जरासंध ने अपने सिनहासं से उठकर कहा, तुम्हारे शब्दों में रहस्य है, पर तुम्हारे शरीरों में युद्ध की पुकार, मैं
11:55तुम्हें अनुमती नहीं देता कि तुम मेरे दर्बार में इस प्रकार का चल करो
12:00इस पर श्री कृष्ण ने अपने ब्राहमन वेश को कुछ धीला किया, जिससे उनके दिव्यरूप की हलकी जलक मिली और
12:08उन्होंने कहा, तो सुनो मगध्राच, हम ब्राहमन नहीं, बलकि योध्धा हैं, और हम यहां एक युध्धनिमंत्रन लेकर आये हैं
12:18यह सुनकर जरासंध का मुख क्रोज से लाल हो गया, और उसकी आखें आग उगलने लगी, क्योंकि उसके सम्मान को
12:25चुनोती दी गई थी
12:28पूरे दर्बार में सन्नाट आचा गया, हर दर्बारी और सैनिक भाय और विस्मय से स्तंभित होकर इस अप्रत्याशित घोषणा को
12:36सुन रहा था
12:38जरासंध ने गरस्ते हुए कहा, तुम कौन हो, जो ब्राह्मन का वेश धरकर मेरे दर्बार में आकर मुझे युद्ध के
12:46लिए ललकार रहे हो
12:47यह क्षत्रिय धर्म का अपमान है
12:52श्रीकृष्ण ने शांत किन्तु द्रिड़ता से कहा, हम तुम्हें छल से चुनौती देने नहीं आये हैं, बलकि धर्म के मार्ग
12:59पर चलने के लिए विवश करने आये हैं
13:03जरासंध अपने अहंकार में चूर होकर व्यंग्य से हसा, तो बोलो, तुम तीनों में से कौन सा मूर्ख मुझे द्वंदव
13:11के लिए चुनौती देगा
13:13श्री कृष्ण ने शांत भाव से जरासंध को देखा, उनके मन में युधिष्थिर के राजसु यग्य और बंदी राजाओं के
13:20उध्धार का संकल्प अटल था
13:24मगधराज ने अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रखा और घोशना की बहुत हुआ यह प्रहसन
13:30यदि तुम युध चाहते हो, तो मैं तुम्हें वह दूँगा, मेरे राज्य की धर्ती तुम्हारे रक्ट से सीची जाएगी
13:38श्री कृष्ण ने अपने ब्राहमन वेश में शांत चित रहते हुए भी मगधराज जरासंद की युद्ध घोशना को एक गंभीर
13:47मुस्कान के साथ सुना, जिसकी गहराई में ब्रहमांड का अटल सत्य छिपा था
13:53फिर उन्होंने अपनी दिव्यवानी में कहा, महाराज, हम यहां याचकों के रूप में नहीं, बलकि उन राजाओं के उद्धार करता
14:01बन कर आये हैं, जिन्हें आपने अन्याय पूर्वक बंदी बना रखा है
14:07जरासंद का अहंकार क्रोध में बदल गया, उसकी आखें लाल हो गई और उसने अपनी तलवार पर अपनी पकड़ और
14:14कसली मानोक्षन भर में आक्रमण कर देगा
14:18श्री कृष्ण ने एक गहरी सांस ली और अपने मुख से उस सत्य का अनावरण किया जिसे जरासंद अभी तक
14:26अन्देखा कर रहा था
14:28यह सुनकर जरासंद के मुख पर पहले विस्मय और फिर भीशन क्रोध की रिखाएं उभराईं क्योंकि द्वारकाधीश का नाम उसके
14:36लिए चिर्शत्रु का प्रतीक था
14:39श्री कृष्ण ने अपने स्वर को और गंभीर करते हुए कहा
14:44उन्होंने आगे कहा
14:47सभी की द्रिश्टी भीम पर पड़ी जो एक चट्टान के समान अटर खड़ा था जिसकी भुजाओं में परवत हिला देने
14:55का सामर्थ्य स्पष्ट जलक रहा था
14:58जरासंध ने उफास भरी द्रिश्टी से भीम को देखा उसके विशालकाई शरीर पर व्यंगे करते हुए मानो उसकी शक्ती का
15:06आकलन कर रहा हो
15:08अपने अहंकार में चूर जरासंध स्वयं को अजे मानता था और किसी भी चुनोती को अपनी प्रतिष्ठा पर हमला समझता
15:17था
15:18अंता उसने एक क्रूर हंसी के साथ घोशना की
15:23भीम की आखों में प्रतिशोध की अगनी भड़क उठी उसने अपनी विशाल मुठियों को भीच लिया
15:29मानो क्षण भर में मगधराज को मिट्टी में मिला देगा
15:34परंतु श्री कृष्ण ने शांती से अपना हाथ भीम के कंधे पर रखा
15:38उसकी उग्रता को शांत करते हुए और उसे क्षण भर रुकने का संकेट दिया
15:45जरासंध ने भीम की इस प्रतिक्रिया को अपनी जीत समझ कर एक और व्यंग्य भरी मुसकान दी
15:51मानो वह पहले ही युद्ध जीत चुका हो
15:55तब जरासंध ने अपनी शाही तलवार की मूट को छोड़ा और अपनी मुठिया भीचते हुए बोला
16:02महल के प्रांगण में एक भारी चुपी छा गई
16:06युद्ध की भीशन भविश्यवानी हवा में गूंज उठी मानो नियती अपना अगला प्रिष्ट पलट रही हो
16:13जरासंध ने अपना भारी शाही मुकुट उतारा और उसे एक सेवक को सौंक दिया
16:19युद्ध के लिए अपनी अंतिन तयारी करते हुए
16:23भीम ने भी अपने शरीर से उपरी वस्त्र हटा दिये
16:27उसकी लोहे जैसी मानस्पेशिया सूर्य के प्रकाश में चमक उठीन जो उसकी अदमय शक्ती का प्रमाण थी
16:35श्रीकृष्ण ने भीम की ओर एक सुक्ष्म प्रेरक मुस्कान के साथ देखा
16:40एक मौन स्वीकृती और आशिर्वाद जो उसे आगामी युद्ध के लिए और भी द्रिढ कर गया
16:48जरासंध ने गर्व से अपनी चाती चोड़ी की और युद्ध के लिए अपनी मुद्रा अपनाई उसकी आखों में विजय की
16:55अदमय ललक थी
16:57और भीम ने भी अपनी द्रिढता और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए अपनी युद्ध मुद्रा अपनाई जिसका एक-एक अंग
17:05मगधराज को चुनोती दे रहा था
17:08भीशन कुष्टी का आरंभ करते हुए भीम और जरासंध दोनों वजरसी द्रिढता के साथ एक दूसरे पर जपते जिनकी टक्कर
17:17से अखाडा गूंज उठा और धूल का बवंडर आसमान चुने लगा
17:22भीम ने अपनी संपूर्ण शक्ती को संकलित करते हुए जरासंध को अपनी पकड में कसलिया उसकी भुजाओं की मास्पेशिया परवतों
17:31सी उभराई और प्रित्वी काप उठी
17:34परंतु मगधराज जरासंध अपने सैकडों युद्धों के अनुभव के साथ भीम की पकड से अचानक ऐसे फिसला जैसे कोई नाग
17:43अपने खोल से निकलता है और पलटवार के लिए तैयार हो गया
17:48दोनों योध्धाओं के बीच भीशन थपड़ो और घूसों का आदान प्रदान शुरू हुआ जिनकी ध्वनी दूर-दूर तक फैली और
17:56दर्शकों के हृदय में कमपन पैदा कर गई
18:00युद्ध की इस भयंकर गर्जना के बीच श्रीकृष्ण ने शान्ति पूर्वक बैठते हुए अपनी दिव्यद्रिष्टी से पूरे घटनाक्रम को अवलोकन
18:09किया उनके मुख पर गेहन नीतिज्ञान की गमभीरता थी
18:13भीम ने अपनी अविश्वस्निय शारिरिक शक्ती का प्रदर्शन करते हुए जरासंध को एक जटके में उठाकर हवा में उच्छाल दिया
18:22जिससे मगधराज की आत्मा क्षन भर के लिए काप उठी
18:27परंतु जरासंध ने अपनी अनूठी देह संरचना का लाब उठाते हुए अप्रत्याशित रूप से भीम की पकड़ से छूट कर
18:35एक बिजलीसी तेजी से पलटवार किया और उसे जोर से धकेल दिया
18:40दर्शक दीरगा में बैठे राजा और प्रजाजन इस अकल्पनिय युद्ध को अपलक देखते रहे उनकी सासे मानो गले में ही
18:49अटक गई थी भय और विस्मय के मिश्रित भावों से उनकी आखे फटी जा रही थी
18:55सूर्य अपनी स्वर्णिम किरने समेट कर अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था और युद्ध का पहला दिन समाप्थ हुआ लेकिन
19:03दोनों योद्धा अभी भी अपनी पूरी शक्ती पर थे कोई पराजित नहीं हुआ था
19:09रात की खामोशी में जरासंध के शिविर में अहंकार की आग जल रही थी जबकी भीम ने अपने भाईयों और
19:17श्री कृष्ण के साथ अगले दिन की रणनीती पर मन्थन किया
19:22अगली सुबह रणभूमी में फिर से दोनों बलशाली योद्धाओं का आगमन हुआ उनकी आखों में नई उर्जा और विजय की
19:30प्रबल इच्छा चमक रही थी
19:33दूसरे दिन का युद्ध पहले से भी अधिक भीशन और निर्मम था जिसमें दोनों योद्धा एक दूसरे पर प्राणधा तक
19:40प्रहार करते रहे जिससे दर्शक भी काप उठे
19:45लंबे और ठका देने वाले इस संधर्श में भीम के शरीर पर धीरे धीरे ठकान के लक्षन दिखने लगे उसकी
19:52सासें तेज हो गई और उसकी चाल में थोड़ी शिथिलता आने लगी
19:58जरासंध ने भीम की इसक्षणिक कमजोरी को भाप लिया और अपने अनुभव का लाब उठाते हुए उस पर और भी
20:05प्रचंड वेक से आक्रमन करना शुरू कर दिया मानो वह उसे कुचल डालना चाहता हो
20:12इस निनायक्षण में श्री कृष्ण ने एक सूखे हुए तिनके को उठाया और उसे बीच से फारते हुए भीम की
20:20ओर देखा एक सुख्ष्म संकेट जो उसके लिए गहन अर्थ रखता था
20:25भीम ने अपने गुरु कृष्ण के इस गूड संकेट को तुरंत समझ लिया उसकी आखों में एक नई चमक आ
20:32गई और उसने अपने युद्ध की रणनीती में एक अप्रत्याशित परिवर्तन करने का निश्चय किया
20:39अब भीम ने अपनी कुरूर शक्ती को दिशा देते हुए जरासंध के शरीर के उनही स्थानों पर वार करना शुरू
20:47किया जो उसकी अनूठी देह संग्रचना के कारण कमजोर थे
20:52जरासंध अपने जीवनकाल में पहली बार इस तरह के अप्रत्याशित और लक्षित हमलों से चकित रह गया
20:58उसकी आखों में आश्चर्य और क्रोध के मिश्रिक भाव थे
21:03युद्ध का ताप और बढ़ गया, दोनों योध्धा अपनी पूरी क्षमता से लड़ रहे थे
21:09उनके शरीर की हर मांसपेशी, हर नस्तनाव से फटने को तयार थी
21:15ठकान ने दोनों महान योध्धाओं को घेर लिया था
21:18उनकी सासें उखड रही थी और उनके पैर लड़ खडाने लगे थे
21:23परन्तु फिर भी कोई भी हार मानने को तयार नहीं था
21:27ठकान के बावजूद दोनों महान योध्धाओं ने एक दूसरे पर और भी भयंकर प्रहार किये
21:34मानों उनके भीतर की अंतिम उर्जाभी ज्वाला मुखी सी फूट पड़ी हो
21:39इसी बीच श्रीकृष्ण की दृष्टी युद्ध भूमी पर टिकी थी
21:43उनके मन में एक गोपनिय रहस्य उभर रहा था
21:47जो इस महायुध का निरनायक मोर साबित होने वाला था
21:52सहसा श्रीकृष्ण ने भूमी से घास का एक सूखा तिनका उठाया
21:56उसे दो टुकडों में तोड़ा फिर उन्हें जोड कर दिखाया
22:00और अंत में उन्हें फिर से अलग कर दूर फेंक दिया
22:03मानों एक गूर संकेट दे रहे हो
22:07ठकान से चूर भीन ने अपनी पूरी शक्ती बटोरते हुए
22:11अचानक एक क्षण के लिए श्रीकृष्ण की ओर देखा
22:14और उनके इस रहस्यमय इशारे को अंजाने में ही सही देख लिया
22:20कृष्ण के उस सरल पर गहरे इशारे ने भीन के मन में
22:24एक अचानक स्फुरण पैदा किया जैसे गहन अंधकार में ज्यान का एक प्रकाशपुंच कौन्ध गया हो
22:31श्रीकृष्ण की स्मृती में मगद के राजा ब्रिहदरत की रानी का असहनिय प्रसव और उस भयावह जन्म की कथा जीवन
22:39थो उठी
22:39जो जरासंध के जीवन का मूल रहस्य था
22:43कई वर्ष पूर्व मगद की महारानी राजा ब्रिहदरत की प्रियपतनी भयंकर प्रसव पीडा से कराह रही थी
22:51राजमहल में आतंक और निराशा का माहौल चाया हुआ था
22:56फिर एक भयावक्षन आया जब रानी ने एक नहीं बलकि शरीर के दो आधे अधूरे टुक्रों को जन्म दिया
23:04जिससे वहां मौजूद सभी लोग भय और धेना से चीक उठे
23:08इस अमानविय द्रिश को देख कर दुखी महारानी ने कापते हाथों से उन अपूर्ण टुक्रों को ततकाल राजमहल से बाहर
23:17फैंकने का आदेश दिया
23:19राजा के सेवकों ने भयभीत होकर उन भयानक अपूर्ण टुक्रों को एक सुनसान और घने जंगल में जहां जंगली जानवर
23:28घूमते थे फैंक दिया
23:30रात्री के सन्नाटे में उसी भयावह जंगल से गुजरते हुए एक विशालकाय राक्षसी जरा ने अचानक उन दो विचित्र टुक्रों
23:39को जमीन पर पड़ा देखा
23:42अपने करूर स्वभाव के अनुरूप जरा राक्षसी ने उन टुक्रों को अपने विशाल हाथों में उठाया
23:48मानो कोई खिलो ना हो और उन्हें अपनी स्वभाविक प्रवरित्ती से खेलने लगी
23:54खेलते खेलते अंजाने में ही उसने उन दोनों टुकडों को एक साथ जोर दिया और अध्भुत रूप से वे एक
24:02पूर्ण शरीर बन गए
24:04जुडते ही वह शिशु तुरंत जीवन्थो उठा और एक तीवर चीक के साथ पूरे जंगल को अपने आगमन की सूचना
24:12दी जिससे राक्षसी जरा भी चौक गई
24:16जरा राक्षसी ने उस जीवित शिशु को सने से उठाया और उसे जरासंध नाम दिया जिसका अर्थ था जरा द्वारा
24:24जोडा गया और उसे राजा ब्रिहदरत को सौप दिया
24:28उस रहस्यमय जन्म के कारण जरासंध को केवल उसी तरीके से मारा जा सकता था जिससे उसे जीवन मिला था,
24:36उसके शरीर को दो टुकडों में फाड़ कर अलग कर देना
24:40यह गूड रहस्य केवल श्रीकृष्ण को ग्याद था और अब भीन को उनका संकेट समझ में आ गया था, जिससे
24:48उसके भीतर एक नई उर्जा का संचार हुआ
24:52भीन ने जरासंध को फिर से उठाया, इस बार उसकी पकड में एक अजीब सी निश्चित्ता और भयानक बल था,
25:00उसकी आखों में अब लक्ष साफ था
25:03पूरी शक्ती से गरचते हुए, भीम ने जरासंध के शरीर को बीच से पकड़ा और कृष्ण के संकेट के अनुरूप
25:11उसे दो विप्रीत दिशाओं में फार दिया
25:14मगध्राज जरासंध का अन्थ हो गया, उसके शरीर के दो टुकडे अलग-अलग दिशाओं में गिरकर धराशाई हो गये और
25:22राजसु यग्यकी पहली बाधा दूर हुई
25:26जरासंध के निश्परान दो खंडित शरीरों के धराशाई होते ही संपूर्ण मलभूमी में एक क्षण के लिए स्तब्धकारी सन्नाटा चा
25:34गया और मगध के सैनिक अवाक होकर देखने लगे
25:38पसीने और धूल से सने हुए महाबली भीन ने हामफते हुए मुड़कर अपने प्रभु श्रीकृष्ण की ओर देखा जिनकी एक
25:47सुक्ष्म लीला ने उन्हें यह एतिहासिक विजय दिलाई थी
25:51मंदमंद मुस्कुराते हुए श्रीहरी विष्णू के पूर्ण अवतार भगवान श्रीकृष्ण आगे बढ़े और अपने परम भक्त भीम सेन को स्नेहपूर्ण
26:00आलिंगन में बांध लिया
26:02हाथ में गांडीव धनुष धारण किये महाधनूर्धर अर्जुन भी निकट आये और अधर्म के इस विनाशकारी अंतपर भीम और कृष्ण
26:11को सादर नमन किया
26:13विज्जोत सव के तुरंत बाद श्रीकृष्ण ने बिना विलंब किये भीम और अर्जुन को मगड के उस अंधियारे कारागार की
26:21ओर चलने का निर्देश दिया जहां सहसरों राजा बंद थे
26:26जब कारागार के विशाल लोहे के द्वार तोड़े गए तब अंधेरी गुफा जैसी जेल में कैद बीस हजार पीडित राजाओं
26:34की द्रिश्टी पहली बार जगतपती श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप पर पड़ी
26:39वर्षों की अमानवी यातनाओं से ख्षीनकाय हुए वे सभी नरेश रोते हुए श्रीकृष्ण के श्रीचर्णों में गिरपड़े और मुक्तिदाता के
26:47आगमन पर धन्य हो गए
26:50अश्रुपूल्ण नेत्रों और कापते कंट से राजाओं ने भगवान वासुदेव की स्तुती करते हुए कहा कि उनके अवतार का उद्देश
26:58ही असहायों और भक्तों का उद्धार करना है
27:03सर्वस्मर्थ श्रीकृष्ण ने अपनी एक करुनामई द्रिष्टी और दिव्य इच्छा मात्र से उन सभी बीस हजार राजाओं की भारी लोहे
27:11की बेडियों को क्षण भर में खंडित कर दिया
27:14इसी बीच जरासंध का पुत्र सहदेव विनीत भाव से श्रीकृष्ण के समक्ष आया और उसने अपने पिता के कुकृतियों पर
27:22लजजित होकर सर्वेश्वर के चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया
27:27दयालू श्रीकृष्ण ने शोकाकुल सहदेव को अभय प्रदान करते हुए उसे तुरंत मगद के सिनहासन पर आसीन कर धर्म प्रायन
27:36राजा के रूप में उसका राज्स्तिलक किया
27:39नवराज्या भिशिक्त राजा सहदेव ने असीन कृतग्यता के साथ श्रीकृष्ण भीन और अर्जुन को दिव्यस्वर्ण रत बहुमूल्य रत्न और उत्तम
27:48अश्व उफारस्वरूप भेंट किये
27:51श्रीकृष्ण की आग्या से मुक्त हुए सभी बीस हजार राजाओं को दिव्यस नान कराया गया
27:57रेश्मी वस्त्र पहनाए गये और उत्तम व्यंजनों से उनका सत्कार किया गया
28:03नवजीवन प्राप्त कर परम प्रसन हुए उन सभी राजाओं ने धर्मराज युधिष्थिर के राजसु यग्य में अपना पूर्ण सहयोग देने
28:12और कर अर्पित करने की प्रतिग्याली
28:15मगध में धर्म की स्थापना कर श्रीकृष्ण भीम और अर्जुन दिव्यस्वन रत पर सवार होकर प्रस्थान करने लगे जबकी प्रजा
28:24उन पर पुश्पवर्शा कर रही थी
28:27वह अलोकिक रत दृत गती से पवन को चीरता हुआ मगध की सीमा पार कर भव्य और प्रकाश्मान इंद्रप्रस्थ नगरी
28:35की ओर बढ़ने लगा
28:37विजय का समाचार सुनते ही महाराजा युधिष्थिर अपने भाईयों और धौमे रिशी के साथ इंद्रप्रस्थ के मुख्य द्वार पर आकर
28:45श्री कृष्ण की प्रतीक्षा करने लगे
28:48रत के रुकते ही धर्मराज युधिष्थिर भाव विभोर होकर दौर पड़े और उन्होंने श्री कृष्ण के चर्णों को थामकर अश्रुपूर्ण
28:57नेत्रों से उनका धन्यवाद किया
29:00ततपश्चात युधिष्थिर ने अपने भ्राता भीन को सीने से लगा लिया और जरासंध जैसे महाबली का वध करने पर उनके
29:08अनुपम बलकी सराहना की
29:11जरासंध के अंत और बीस हजार राजाओं के समर्थन के साथ ही राजसूय यग्य का अंतिम मार्ग निश्कंटक हो गया
29:18और आकाश से देवताओं की पुश्पवर्शा होने लगी
29:23पराक्रमी जरासंध के उद्धार के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्थिर ने मगद के नए शासक के रूप में उसके
29:31धर्मात्मा पुत्र सहदेव को राजा बनाने का निर्णय लिया
29:36भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने करक्मलों से तेजस्वी सहदेव का राज्या भिशेक कर मगद की भूमी पर धर्म और न्याय
29:44के एक नए स्वर्णिन युग का शुभारंब किया
29:48बंदीग्रेह से मुक्थ हुए 20,000 राजाओं ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान श्रीकृष्ण के चर्णों में साष्टान दंडवत प्रणाम किया
29:56और उनके प्रती अपनी अटूट कृतज्यता व्यक्त की
30:00करुणा सागर श्रीकृष्ण ने उन सभी राजाओं को अभयदान दिया और उन्हें इंद्रप्रस्थ में आयोजित होने वाले धर्मराज युधिष्ठिर के
30:09भव्य राजसुई यग्य में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया
30:14विजय की दुन्दुभी बजाते हुए श्रीकृष्ण भीन और अर्जुन अत्यंत वैभवशाली रथों पर सवार होकर इंद्रप्रस्थ की ओर रवाना हुए
30:22जिससे चारों और विजय का घोश होने लगा
30:27इंद्रप्रस्थ के राजद्वार पर पहुँचते ही महारानी द्रौपदी ने स्वर्ण थाल में मंगल दीप सजाकर विजी वीरों की आरती उतारी
30:35और शंखध्वनी से उनका अभिनंदन किया
30:39राजसुय यग्य के परम पावन अफसर पर महर्शी वेदव्यास और अन्यत रिकालदर्शी रिशियों का इंद्रप्रस्थ में मंगल मैं आगमन हुआ
30:47जिससे संपूर्ण वातावर्ण वेद मंत्रों से गुन्जायमान होग उठा
30:52महान असुर शिल्पी मैदानव द्वारा निर्मित वह अलोकिक यग्यशाला अपनी दिव्य मनियों और मायावी जल्थल के द्रिश्यों से साक्षात स्वर्ग
31:01के समान प्रतीत हो रही थी
31:04महायग्य की दीक्षा लेकर धर्मराज युदिश्थिर ने सभा में उपस्थित सभी रिशियों और राजाओं से पूछा की इस यग्य में
31:12प्रतम पूजा अर्थात अगरपूजा के योग्य कौन है
31:17तब वयोवरिध भीश्म पितामह ने उठकर सस्वर घोष्णा की की समस्थ चराचर जगत के स्वामी द्वारकाधी श्री कृष्ण ही इस
31:26ब्रहमांड में अगरपूजा के एक मात्र अधिकारी है
31:31पितामह भीश्म की बात सुनते ही चेदिराज शिशुपाल के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और वह मर्यादा की सारी
31:38सीमाएं तोड़कर सभा के मध्य उठ खड़ा हुआ
31:42इश्या और मद में अंधा होकर शिशुपाल ने भगवान श्री कृष्ण को एक साधारन ग्वाला कहकर पुकारा और भीश्म सहित
31:50समस्त पांडवों को भी अपशब्द कहे
31:54धर्मराज युधिष्थिर ने अत्यंत विनमरता पूर्वक शिशुपाल को समझाने और शांत करने का प्रयास किया किन्तु उस अहंकारी राजा का
32:02क्रोध और अधिक बढ़ता चला गया
32:06भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत शांत चित्त से बैठे रहे क्योंकि उन्होंने शिशुपाल की माता को उसकी सो भूलों को क्षमा करने
32:14का वचन दिया था
32:16जैसे ही शिशुपाल ने अपनी सोवीन गाली पूरी की संपूर्ण सभा में अचानक एक भयानक सन्नाटा चा गया और भगवान
32:25श्रीकृष्ण के मुखमंडल पर गंभीर भाव उभराए
32:29अपनी मृत्यू को अत्यंत निकट देख कर भी शिशुपाल का अहंकार शांत नहीं हुआ और उसने अपनी म्यान से एक
32:37चमचमाती हुई तलवार खींच ली
32:39तभी भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी तरजनी उंदली पर ब्रह्मांड के सबसे विनाशकारी और शक्तिशाली अस्त्र दैदी प्यमान सुदर्शन चक्र का
32:49आहवान किया
32:51भगवान के संकेट पर सुदर्शन चक्र बिजली की गती से चला और क्षन भर में ही अभिमानी शिशुपाल का मस्तक
32:59धड़ से अलग होकर भूमी पर गिर गया
33:02शिशुपाल के प्रान पखेरू उरते ही उसके निर्जीव शरीर से एक अलोकिक दिव्य जोती निकली और भगवान श्री क्रिश्न के
33:10चर्नों में समाहित हो गई
33:11इस प्रकार समस्त विघनों के समाप्थ होने पर राजसुय यग्य की पवित्र अगनी प्रजवलित हुई और देवताओं ने इंद्रप्रस्थ पर
33:21पुश्पों की वर्षा आरंभ कर दी
33:24यग्यवेदी से उठती पवित्र अगनी की लप्तें आकाश को चूम रही थी पर देवों की द्रिष्टी अब मगद की ओर
33:31मुर्चुकी थी जहां एक नए अध्याय का आरंभ होना था
33:36मगद की अंधेरी कारागारों में जहां बीस हजार राजा वर्षों से बंदी थे अचानक एक अलोकिक कमपन और रहस्यमय चुप
33:45पीछा गई
33:47जरासंध के वद के बाद भयभीत पहरेदार अपने स्थान छोड़ कर भागने लगे जिससे बंदी राजाओं में असमंजस और आशा
33:55की नई किरन जगी
33:57वर्षों की कालिमा के बाद कारागार के एक तूटे द्वार से सूर्य की एक किरन भीतर आई जिसने राजाओं की
34:05आखों में विस्मय और मुक्ती का स्वपन जगाया
34:09अपनी आखों पर विश्वास न करते हुए शीन शरीर वाले राजाओं ने धीरे-धीरे सिर उठाए उनकी आखों में सदियों
34:17का अंधकार और अब एक असपष्ट आशा टिम्टिमा रही थी
34:21इसी क्षण भगवान श्री कृष्ण जिनकी त्वचा गहन नील बादलोसी थी और पराक्रमी भीनसेन जिनकी भुजाय लोहे के स्तंभोसी सुग्रिड
34:31थी कारागार के द्वार पर प्रकट हुए
34:34क्रिष्ण की दिव्य आभा और भीम के विशालकाय स्वरूप को देखकर बंदी राजाओं ने ततकाल अपने उधार करताओं को पहचान
34:43लिया और उनकी आखों से कृतज्यता के अश्रुबह निकले
34:48भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मधुर और शांत वाणी में उन्हें संबोधित किया के राजन अधर्म का नाश हुआ है
34:56अब आप सभी स्वतंत्र हैं
35:00श्री कृष्ण के आश्वासन से बलपाकर राजा धीरे धीरे अपनी कालकोठरियों से बाहर निकले उनके चहरे पर वर्षों बाद स्वतंत्रता
35:09की पहली मुस्कान खिली
35:11श्री कृष्ण के आदेश पर सेवकों ने तुरंत भोजन और जल की व्यवस्था की जिससे वर्षों के उपवास से कमजोर
35:19हुए राजाओं को ततकाल राहत मिली
35:23सभी राजाओं ने एक स्वर में भगवान श्री कृष्ण की स्तुती की उनके जैगोश से मगद की कारागार गूंज उठी
35:30जो अब मुक्ती का प्रतीक बन गई थी
35:34श्री कृष्ण ने उन्हें धर्म और न्याय के सिध्धानतों पर एक संख्षिप्ट प्रवचन दिया यह समझाते हुए कि किस प्रकार
35:42अधर्म का अंत सदैव सुनिश्चित होता है
35:46अब मगद के भविश्य का प्रश्ण उठा क्योंकि जरासंध के बिना यह राज्य अराजक्ता में डूब सकता था
35:54अपनी दूरद्रिष्टी का परिचय देते हुए श्री कृष्ण ने घोशनाकी की जरासंध का पुत्र सहदेव यद्यपी शत्रु का वन्शज था
36:02फिर भी उसे मगद का नया शासक बनाया जाएगा
36:06एक युवा शांत स्वभाव का राजकुमार सहदेव जो अपने पिता के करूर स्वभाव से भिन्न था श्री कृष्ण के समक्ष
36:15लाया गया
36:16श्री कृष्ण ने सहदेव को धर्मनिष्ट शासन करने, अपनी प्रजा की रक्षा करने और न्याय बनाय रखने का उपदेश दिया
36:25सहदेव ने विनमरता पूर्वक श्री कृष्ण के वचनों को स्वीकार किया और मगद को धर्मानुसार संचालित करने की प्रतिग्याली
36:35ततपश्चात एक सादे किन्तु गरिमापून समारोह में श्री कृष्ण के आशिरवाद से सहदेव को मगद के सिनहासन पर प्रतिष्ठित किया
36:43गया जिससे राज्ज में शान्ती और व्यवस्था का नया युग आरंभ हुआ
36:49इस प्रकार श्री कृष्ण की कूटनीती और दूरदर्शिता से मगद में वर्षों की अशान्ती समाप्थ हुई और न्याय तथा धर्म
36:57का शासन पुनह स्थापित हुआ
37:00मुक्त हुए राजाओं ने अपने अपने राज्यों को प्रस्थान किया अपने साथ श्री कृष्ण के अतुलनिय पराक्रम और उनकी धर्मस्थापना
37:09की कहानी लेकर
37:11श्रीकृष्ण भीन और अर्जुन मगध में धर्म की पुनरस्थापना के पश्चात अपनी विजय यात्रा का अगला चरण आरंभ करते हुए
37:20इंद्रप्रस्थ की ओर अग्रसर हुए
37:22उनकी वापसी की यात्रा शांती और संतोष से भरी थी जहां उन्होंने अपनी कूटनीतिक जीत और शौर्यपूर्ण पराक्रम के अनुभवों
37:32को आपस में साजा किया
37:34इंद्रप्रस्थ के द्वार पर उद्साह से भरे नगरवासियों और पांडवों ने अपने विजी नायकों का भव्य स्वागत किया जिनके आगमन
37:43से राजधानी का वातावर्ण उद्सवमय हो उठा
37:47राजभवन में युधिष्ठिर ने तीनों को गले लगा कर उनका स्वागत किया और उन्होंने उद्साह पूर्वक जरासंध पर अपनी विजय
37:55और मगध में धर्म की स्थापना का विस्तृत वृत्तान्त सुनाया
37:59इस महान विजय के समाचार से पूरे इंद्रप्रस्थ में हर्शोल लास्चा गया जहां गलियों में लोकनृत्य, संगीत और मिष्ठान वितर्ण
38:09के साथ भव्य उद्सव मनाया गया
38:12अपनी विजय से उच्साहित और देवर्शी नारत के पूर्व के सुझाव को स्मरण करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसुई यग्य
38:21संपन्न करने का द्रिड संकल्क लिया, जिससे उनके सामराज्य का गौरव स्थापित हो सके
38:28युधिष्ठिर ने तुरंट अपने मंत्रियों, बंधों और कुल गुरुओं को बुलाकर राजसुई यग्य के विधिविधानों और चुनोतियों पर गेहन चर्चा
38:36की
38:38परमग्यानी महर्शी व्यास ने युधिष्ठिर के इस पुन्य संकल्प की सराहना की और राजसुई यग्य को सफलता पूर्वक संपन्न करने
38:46के लिए उन्हें विस्तृत मार्ग दर्शन और शुभ मुहूर्थ प्रदान किया
38:51तदुप्रांत इंद्रप्रस्ट के मुख्य चौक में उद्घोशकों ने राजसुई यग्य के भव्य आयोजन की घोशना की जिससे प्रजा में उद्साह
39:00और गौरव की लहर डौड गई
39:03शीघ्र ही इंद्रप्रस्ट के वास्तुकारों, शिल्पकारों और श्रमिकों की सेना ने यग्यशालाओं के निर्मान, महलों के नवीनी करण और नगर
39:12की साज सज्जा का कार्य आरंभ कर दिया
39:15राजसुय यग्य की आवश्शक्ताओं की पूर्ती हेतु, दूरदराज के प्रांतों से बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण, चान्दी, उत्तम वस्त्र और अन्य आवश्चक
39:25सामगरी इंद्रप्रस्थ लाई जाने लगी
39:28निमंतरन पत्रों को हस्त लिखित किया गया, जहां स्वर्ण स्याही से राजाओं, रिशिमुनियों और गण्मान्य व्यक्तियों के नाम अत्यंत कलात्मक
39:37धंग से उकेरे गए
39:39फिर अनुभवी और विश्वस्निय दूतों को इन निमंतरन पत्रों के साथ विभिन राज्यों की ओर घोडों पर सवार होकर तीवर
39:47गती से प्रस्थान करने का आदेश दिया गया
39:51दूतों ने दुर्गम मार्गों और विशाल सामराज्यों को पार करते हुए दूरदराज के राज्यों तक पांडवों के राजसु यग्य का
39:59पावन निमंतरन पहुँचाया
40:02विभिन राज्यों के राजाओं ने जिनमें मित्र और कुछ शत्रु भी शामिल थे पांडवों के इस निमंत्रन को प्राप्त किया
40:09जिनके चहरों पर आश्चर्य, सम्मान और विचारशीलता के भाव स्पष्ट थे
40:14इसी प्रकार आश्रमों में तपस्यारत रिशिमुनियों और गुरुकुलों के आचारियों को भी राजसू यग्य में सम्मिलित होने का निमंत्रन मिला,
40:24जिसे उन्होंने अत्यंत प्रसंता से स्विकार किया
40:29संपूर्ण आर्यावर्त में राजसुय यग्य के आयोजन की खबर फैल गई और हर कोई इस अद्वितिय एतिहासिक घटना का साक्षी
40:37बनने की उच्छुक्ता से प्रतीक्षा करने लगा
40:41इंद्रप्रस्थ एक अभूत पूर्व भव्यता में परिवर्तित हो रहा था जहां सडकों पर स्वर्णरत्न जडिक द्वार रंगीन पताकाएं और सुगंधित
40:50पुष्पों की मालाएं शोभाय मान थी
40:53श्रीकृष्ण ने अपनी अध्भुत दूरदर्शिता और संगठ नात्मक्षमता से राजसुय यग्य की प्रतेक तयारी का बारीकी से निरीच्षन और मार्ग
41:03दर्शन किया
41:04सुनिश्चित करते हुए कि सब कुछ त्रुटिहीन हो
41:07इस प्रकार राजसुय यग्य जो मात्र एक समारोह नहीं बलकी धर्म, न्याय और सार्वभौमिक प्रभुत्व की घोशना थी अपने भव्य
41:17आरंभ के लिए पूरी तरह से तयार था
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