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श्रीमद्भागवतम् की इस गाथा में, हम महाराज स्वायंभुव मनु के वंशज, उत्तानपाद और उनकी संतानों की कहानी में आगे बढ़ते हैं। जब छोटे ध्रुव को उसकी सौतेली माँ सुरुचि द्वारा अपमानित किया जाता है और उसे अपने पिता की गोद से दूर कर दिया जाता है, तो यह घटना उसके जीवन को एक नई दिशा देती है। बालक ध्रुव, दृढ़ संकल्प के साथ, भगवान विष्णु को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या का मार्ग चुनता है। देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में, ध्रुव मधुवन में गहन तपस्या में लीन हो जाता है, जिससे तीनों लोकों में हलचल मच जाती है। क्या ध्रुव अपनी भक्ति की शक्ति से भगवान विष्णु को प्रकट कर पाएगा और सर्वोच्च पद प्राप्त कर सकेगा? इस अविस्मरणीय यात्रा में उसके साथ जुड़ें! #DhruvaKatha #BhagavataPurana #VishnuBhakti #HinduMythology #PuranicTales #SanatanDharma
Transcript
00:00कप्रिल मुनी के सांख्य योग ज्ञान द्वारा अपनी माता देभूती को परम मुक्ती प्रदान करने के पश्चात संपूर्ण सिध्धलोक में
00:08ब्रहम जोती का अलौकिक प्रकाश फैल गया।
00:11गंदा नदी के पवित्र तट पर बर्गत के विशाल व्रिक्ष की चाया में बैठे शुकदेव गोस्वामी महाराच परीक्षित को स्वायंभूव
00:19मनु के पावन वंश की कथा सुनाना आरंभ करते हैं।
00:24शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित को बताया कि किस प्रकार प्रथम पुरुष स्वायंभूव मनु ने इस भूलोक पर धर्म, न्याय और
00:33मानव समाज की सुद्रिध नीव रखी।
00:36स्वायंभूव मनु और उनकी धर्मनिष्ठ महारानी शत्रूपा ने ब्रहमांड के विस्तार और वंश वृद्धी हेतु दो महान राजकुमारों, प्रियवरत और
00:45उत्तानपाद को जन्म दिया।
00:48बड़ा पुत्र प्रियवरत अत्यंत ज्यानी और वैरागी स्वभाव का था, जिसका मन सदैव संसार से परे भगवान वासुदेव की भक्ती
00:56में ही रमा रहता था।
00:58जब जगतपिता ब्रहमा जी ने प्रियवरत को स्रिष्टी संचालन का गुरुतर दायत्व सौपा, तब देवर्शी नारत के उपदेश से उन्होंने
01:07राजधर्म स्विकार किया।
01:09महान राजा प्रियवरत ने अपने अलोकिक स्वर्ण रथ पर सवार होकर पूरे ब्रहमांड की परिक्रमा की और साथ विशाल महासागरों
01:18तथा साथ द्वीपों का निर्मान किया।
01:21प्रियवरत के पश्चात स्वायंभुव मनु के दूसरे तेजस्वी पुत्र उत्तानपाद ने आर्यावर्थ के विशाल और समरिद सामराज्य का सिनहासन ग्रहेन
01:31किया।
01:32राजा उत्तानपाद अपनी अप्रतिन वीर्ता, न्याय प्रियता और कुशल शासन संचालन के कारण अपनी प्रजा के बीच एक आदश शासक
01:41के रूप में पूजे जाते थे।
01:44राजा उत्तानपाद का विवाह दो अत्यंत सुन्दर राजकुमारियों से हुआ था, जिनमें बड़ी रानी का नाम सुनीती और छोटी प्रिय
01:52रानी का नाम सुरुचि था।
01:55बड़ी महारानी सुनीती सदैव सात्विक विचारों और प्रभु भक्ती में लीन रहती थी, परंतु राजा उत्तानपाद का मोह छोटी रानी
02:04सुरुचि के प्रती अत्यधिक था।
02:07समय बीतने पर महारानी सुनीती की पवित्र कोक से एक परम तेजस्वी और अलोकिक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम
02:15ध्रुव रखा गया।
02:17बालक ध्रुव के जन्म पर पूरे ब्रहमावर्त राज्य में खुशिया मनाई गई, क्योंकि उस शिशु के मुखमंडल पर अध्वितिय आध्यात्मिक
02:25तेज चमक रहा था।
02:27कुछ समय पश्चात राजा की छोटी और अतिप्रिय रानी सुरुची ने भी एक सुन्दर बालक को जन्म दिया, जिसका नाम
02:35उत्तम रखा गया।
02:37रानी सुरुची के मोहपाश और सौंदर्य के वशीभूत होकर राजा उत्तानपाद धीरे-धीरे महारानी सुनीती और उनके पुत्रध्रुव की उपेक्षा
02:47करने लगे।
02:49राजमहल के एक एकांत भाग में साद्गी से रहते हुए महारानी सुनीती अपने पुत्रध्रुव को धर्म, सत्य और भगवान विश्नु
02:57की अनन्य भक्ती का पाठ पढ़ाती थी।
03:01छोटी रानी सुरुची के मन में यह इर्ष्या पनपने लगी कि कहीं जेश्ट पुत्र होने के कारण ध्रुव को भावी
03:08राज्य का उत्तराधिकारी न बना दिया जाए।
03:12सुरुची ने अपने रूप और प्रभाव का उप्योग करके राजा उत्तानपाद को पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर लिया और
03:20सुनिती को अधिकारों से वंचित कर दिया।
03:23पांच वर्ष के निर्दोश बालक ध्रुव अपने पिता के अगाध प्रेम की आस में राजमहल के प्रांगण में अन्य बच्चों
03:30के साथ निश्चल भाव से खेला करते थे।
03:34अब समय उस एतिहासिक खण के समीप पहुँच रहा था, जहां राजसभा में होने वाला एक कटू अपमान बालक ध्रुव
03:42के भाग्य को सदा के लिए बदलने वाला था।
03:45एक दिन जब महाराज उत्तानपाद अपने स्वर्ण सिनहासन पर विराज मान थे, तब नन्हा धुरुव अपने पिता के पास जाने
03:54की अभिलाशा लिए चंचल कदमों से राजसभा की ओर बढ़ा।
03:58राजसभा के मध्य भव्यरतनजडित सिनहासन पर राजा उत्तानपाद अपनी प्रियरानी सुरुची के पुत्र उत्तम को अत्यधिक्सने से अपनी गोद में
04:08बैठाए हुए थे।
04:10पिता के वक्ष से लपटने और उनकी गोद में बैठने की निर्दोश चाहत के साथ बालक धुरुव खिलखिलाते हुए सिनहासन
04:18की सीधियों की ओर आगे बढ़ा।
04:21धुरुव को देखते ही महाराज उत्तानपाद का पित्रहरदय प्रेम से भर गया, किन्तुरानी सुरुची के डर से वे अपने पुत्र
04:29को गोद में उठाने का साहस न कर सके।
04:33जैसे ही धुरुव ने सिनहासन पर चड़ने का प्रयास किया, महाराणी सुरुची का क्रोध से लाल चेहरा और अहंकार से
04:40भरी आखें उस अबोध बालक पर टिक गई।
04:44महाराणी सुरुची ने अत्यंत कठोरता से बालक धुरुव की बाह पकड़ी और उसे राजा उत्तानपात की गोद से दूर धकेलते
04:52हुए गरजना की।
04:54सुरुची ने भरी सभा में बालक धुरुव का उपहास उड़ाते हुए कहा कि मेरे गर्ब से जन्म न लेने के
05:01कारण तुम इस राज सिनहासन के योग्य नहीं हो।
05:05रानी सुरुची ने धुरुव के हृदय में कटुता घोलते हुए कहा कि यदि तुम्हें सिनहासन चाहिए तो तपस्या करके भगवान
05:13विश्नु को प्रसन्न करो और मेरे गर्ब से पुनह जन्म लो।
05:17इस निर्दई और अन्याय पूर्ण व्यवहार को देखकर पूरी राज सभासन रह गई, किन्तु सुरुची के भई से कोई भी
05:25सभासद एक शब्द न बोल सका।
05:50भरे नैनों और सिसकते हुए हृदय के साथ बालक ध्रुव राज सभासे निकल कर अपनी त्यागी माता सुनीती के साधारन
05:58कक्ष की ओर भागा।
05:59अपने रोते हुए बालक को देखकर माता सुनीती का ममतामई हृदय तडप उठा और उन्होंने तुरंत ध्रुव को अपनी गोद
06:08में समेट लिया।
06:10अपनी मा की छाती से लिपट कर ध्रुव ने सिस्कियों के बीच सौतेली मा सुरुची के बानों जैसे चुभने वाले
06:17एक एक कटु शब्द कह सुनाए।
06:19पुत्र के अपमान की बात सुनकर महारानी सुनीती की आखों से अश्रुबह निकले, किन्तु उन्होंने अपने धर्म और विवेक को
06:28विचलित नहीं होने दिया।
06:30माता सुनीती ने सन्यम पूर्वक ध्रुव से कहा कि सुरुची ने सत्य ही कहा है। संसार में केवल भगवान श्री
06:38हरी ही दुखियों का एक मात्र परम आश्रय है।
06:43सुनीती ने अपने पुत्र को ज्यान देते हुए कहा कि जो पद तुम्हें संसार का कोई राजा नहीं दे सकता,
06:50वह परमपद तुम्हें केवल भगवान विश्नु की भक्ती से प्राप्थ हो सकता है।
06:56अपनी माता के इन वचनों को सुनकर बालक ध्रूव के मन में निराशा के स्थान पर इश्वर भक्ती और अटूट
07:03संकल्प की एक दिव्यज्वाला प्रजवलित हो उठी।
07:07अबोध बालक ध्रूव ने उसी क्षन राजमहल के समस्त सुख सुविधाओं को त्याग कर घने वनों में जाकर श्री हरी
07:14की कठोर तपस्या करने का द्रिढ निश्चय कर लिया।
07:18माता सुनीती ने भरे मन और गर्व से सराबोर होकर अपने पांच वर्ष के पुत्र के मस्तक पर तिलत लगाया
07:26और उसे परम प्रभु की प्राप्ती के महान मार्ग पर जाने की आग्यादी।
07:32राजमहल के भव्यदवारों को पीछे छोड़ते हुए पांच वर्ष का बालक धुरुव बिना किसी भय के घंगोर और रहस्य में
07:39जंगल की ओर अपने पहले कदम बढ़ाता है।
07:43घंए व्रिक्षों की विशाल चाया और दरावनी खामोशी के बीच छोटा धुरुव मन में श्री हरी के ध्यान का संबल
07:51लिये निरंतर आगे बढ़ता रहा।
07:53जंगल के हिंसक और खुंखार पशु जैसे बाग और तेंदुए बालक धुरुव की अलोकिक सौमयता और संकल्प को देखकर शान्थ
08:02होकर पीछे हट गए।
08:04प्राचीन व्रिक्षों की जड़ों में लिप्टे विशैले सर्प भी धुरुग के निश्पाप और दिव्य आभा मंडल के समक्ष नत्मस तक
08:11होकर उसे आगे जाने का मार्ग देने लगे।
08:15आकाश मार्ग से देवगन इस ननहे बालक की अभूत पूर्व भक्ती और अदमे साहस को देखकर उस पर अद्रिश्य पुष्पों
08:23की वर्षा करने लगे।
08:25उसी समय तीनों लोकों के परमग्यानी देवर्षी नारद वीना बजाते हुए एक अलोकिक स्वर्णिन प्रकाश पुंच के साथ वन में
08:34प्रकट हुए।
08:35देवर्षी नारद ने बालयोगी ध्रूव के दीप्तिमान मुख मंडल और उसकी आखों में जलती भक्ती की प्रचंड ज्वाला को अत्यंत
08:43कौतुक से देखा।
08:46नारद मुनी ने ध्रूव के संकल्प की परीक्षा लेने के लिए उसे वन की भयानक कठिनायों और उसकी कोमल आयू
08:53का स्मरण कराते हुए लोटने की सलाह दी।
08:57बालक ध्रूव ने देवर्शी को विनमरता पूर्वक प्रणाम करते हुए द्रिड स्वर में कहा कि अपमान के कलंक को मिटाने
09:04के लिए केवल श्री हरी का आशिरवाद ही उसका एक मात्र लक्ष है।
09:10वालक के अटूट निश्चय और अध्वितिय उत्तर को सुनकर देवर्शी नारत का हृदय वादसल्य और आनंद से भर उठा।
09:19नारत मुनी ने ध्रूव के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा और उसे परम कल्यानकारी द्वादशाक्षर मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाई
09:28की दीक्षादी।
09:30इसके पश्चात देवर्शी ने ध्रूव को पवित्र यमुना नदी के तट पर स्थित पावन मधुवन जाकर तपस्या करने का मार्ग
09:37प्रदर्शित किया।
09:59पवित्र मधुवन पहुँचकर ध्रूव ने यमुना नदी के शीतल और निर्मल जल में सनान कर स्वयं को मानसिक एवन शारिरिक
10:07रूप से शुद्ध किया।
10:29अपने कठोर तप के प्रथम चरण में ध्रूव एक पैर पर सीधे खड़े होकर बिनाडिगे स्थिर मुद्रा में श्री हरी
10:35का अन्वरत स्मरण करने लगा।
10:38बालक ध्रूव के इस उग्रतप से उत्पन दिव्य उर्जा से संपूर्ण मधुवन स्वर्णिम प्रकाश से जग्मगाने लगा और वातावर्ण कम्पित
10:47होने लगा।
10:48इस अद्वितिय और कठोर बालक पस्या से वैकुंठ धाम में विराजमान भग्वान श्री हरी विश्नु का हृदय अत्यंत द्रवित हो
10:57उठा।
10:58बालक ध्रुव की उग्र तपस्या से उठने वाली तपोगनी तीनों लोकों में फैलने लगी, जिससे व्यग्र होकर समस्थ देवता वैकुंठ
11:07धाम की ओर दौर पड़े।
11:09देवराज इंद्र ने हाथ जोड कर भग्वान श्री हरी विश्नु से प्रार्थनाकी की वे शीघर ही बालक ध्रुव को दर्शन
11:17देकर इस संपून ब्रहमांड को शांत करें।
11:21भग्वान विश्नु ने देवताओं को आश्वस्थ करते हुए कहा कि ध्रुव का तब किसी के सिनहासन को छीनने के लिए
11:28नहीं, बलकि केवल मेरी परम क्रिपा की प्राप्ती के लिए हैं।
11:33अपने अनन्य भक्त की पुकार सुनकर करुणामय श्री हरी अपने दिव्य वाहन गरुर पर सवार होकर धरातल की ओर प्रस्थान
11:41करने लगे।
11:43गरुर की दिव्य पंखों की फड़फडाहट से संपूर्ण गगन में अलौकिक संगीत और स्वर्णिन किर्णों का अध्भुत प्रसार होने लगा।
11:52इधर मधुवन में ध्यानमगन बालक ध्रूव के हरिद्यक्मल पर भगवान श्री हरी का वही चतुर्भुज रूप प्रजवलित रूप में दिखाई
11:59दे रहा था।
12:01सहसा ध्रूव के अंतर्मन से वह दिव्य रूप अंतरध्यान हो गया, जिससे व्याकुल होकर बालक ने अपनी आखें खोल दी।
12:10आखें खोलते ही ध्रूव ने देखा कि स्वयन साक्षात जगन्यनता भगवान श्री हरी विश्नु उसके ठीक सम्मुख खड़े हैं।
12:19भगवान के सर्वांग सुन्दर और अलौकिक रूप को देखकर बालक ध्रूव प्रेमाश्रूओं से भर गया और निश्पलक होकर उन्हें निहारने
12:28लगा।
12:29बालक ध्रूव प्रभू की स्तुती करना चाहता था, परंतु अबोध बालक होने के कारण उसके मुख से एक भी शब्द
12:37नहीं निकल पा रहा था।
12:39भक्त के मन की बात जानकर दयालू श्री हरी ने अपने पांच जन्य शंख को बालक ध्रूव के कपोल से
12:46स्पर्श करा दिया।
12:48शंख के स्पर्श होते ही बालक ध्रूव के भीतर समस्त वेदों और अलौकिक ज्यान का अगाध भंडार पल भर में
12:55प्रवाहित हो उठा।
12:57दिव्य ज्यान पाते ही ध्रूव ने अत्यंत मधूर एवन सारगर्भित संस्कृत श्लोकों में परम्पिता परमेश्वर की स्तुती आरंभ कर दी।
13:07ध्रूव के निशकाम और प्रेमपूर्ण स्तोत्र से अती प्रसन्न होकर भगवान विश्नु ने अपनी मधूर वानी में बालक को संबोधित
13:15किया।
13:16श्री हरी ने ध्रूव से कहा कि वह प्रित्वी पर 36,000 वर्षों तक न्यायपूर्वक धर्म का राज्य संचालित करेगा।
13:25इसके पश्चात प्रभू ने उसे एक ऐसे अविचल स्थान ध्रूव लोग का स्वामी बनाया, जो सब्तर्शियों और सभी नक्षत्रों से
13:33भी उपर स्थित है।
13:36इस महान वर्गान की घोशना होते ही गगन से गंधर्वों का गायन और देवताओं द्वारा पारिजात पुष्पों की वर्षा होने
13:44लगी।
13:45ध्रूव के मस्तक पर अपना अभय वर्देहस्त रखकर भगवान विश्नु मुस्कुराते हुए पुन्क अपने परम धाम वैकुंठ की ओर प्रस्थान
13:54कर गए।
13:55प्रभु के अंतरध्यान होने के बाद बालक ध्रूव का हृदय परम आनंद, शांती और पूर्ण कृतग्यता के भाव से सराबोर
14:03था।
14:04इस प्रकार एक पांच वर्ष के बालक ने अपने अटल संकल्प और अटूट भक्ती से वहस्थान प्राप्त किया जिसे आज
14:12भी पूरा ब्रह्मांड नमन करता है।
14:16वैकुंठनात के वर्दान से दीप्थ होकर बालक ध्रूव अत्यंत शांत चित्त से अपने पिता उत्तानपाद के राज्य की ओर वापस
14:24लोटने लगे।
14:26महाराज उत्तानपाद को जब अपने तेजस्वी पुत्र के लोटने का समाचार मिला, तो उनका हृदय गलानी और परम हर्ष के
14:34सागर में डूग गया।
14:36व्याकुल राजा नंगे पैर ही अपने महल से दौड पड़े और मार्ग में ही अपने प्रानप्रिय पुत्र को छाती से
14:44लगा कर फूट-फूट कर रोने लगे।
14:47माता सुनीती और सुरुची ने भी आगे बढ़कर बालक ध्रूव की आरती उतारी और ध्रूव के अलोकिक तेज ने महल
14:54के सारे द्वेश को सदा के लिए मिटा दिया।
14:58ध्रूव ने अत्यंत विनमर्ता से अपनी दोनों माताओं के चर्णों को स्पर्श किया, जिससे सिद्ध हुआ की सच्ची भक्ती हृदय
15:06से शत्रुता का समूल नाश कर देती है।
15:10जब महल में ध्रूव के युवराज पद के राज्याभिशेक की तैयारिया हो रही थी, तभी देवर्शी नारद मुनी अपनी वीना
15:17की तान छेड़ते हुए आकाश मार्ग से वहां प्रकट हुए।
15:22देवर्शी नारद ने राजसभा के सम्मुख ध्रूव के असाधारन संकल्प की प्रशंसा की और उस दिव्यक्षन का स्मरण कराया जब
15:30ध्रूव ने तपस्या के लिए वन का रुख किया था।
15:34नारद मुनी ने बताया कि किस प्रकार सौतेली माता के कटू वचनों से आहत होकर यह पांच वर्ष का बालक
15:42रात के घने अंधकार में अकेले ही प्रभू की खोज में निकल पड़ा था।
15:47बालक की परीक्षा लेने और उसका मार्ग दर्षन करने के लिए स्वयन देवर्षी नारद एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे ध्रूव
15:55के समक्ष प्रकट हुए थे।
15:57नारद मुनी ने पहले ध्रूव को डराया और संसार की असार्ता बताते हुए उसे पुनह अपने मातापिता के पास महल
16:05लोट जाने की सलाह दी थी।
16:08परंतु ध्रूव ने अत्यंत द्रिडता से कहा कि जब तक वे भगवान नारायन के दर्शन नहीं पा लेते, वे कदम
16:15भी पीछे नहीं हटाएंगे।
16:17ध्रूव के इस वजर जैसे अटूट संकल्प को देखकर देवर्शी नारत का हृदय अत्यंत प्रसन्नता और विस्मय से भर उठा।
16:27प्रसन्न होकर नारत मुनी ने ध्रूव के कान में परम कल्यानकारी द्वादशाक्षर मंत्र ओम नमो भगवते वासुदेवाय का गुप्त उपदेश
16:36दिया।
16:37इसके पश्चात देवर्शी ने ध्रूव को यमुना नदी के पवित्र तटपर स्थित मधुवन जाने का मार्ग दिखाया, जो तपस्या के
16:45लिए परम पावन स्थान था।
16:47मधुवन पहुँचकर ध्रूव ने कठोर तप आरंब किया, जहां उन्होंने केवल सूखे पत्ते खाकर और अंतह वायू पीकर अपनी इंद्रियों
16:57को पूरी तरह वश में कर लिया।
16:59जब नारद मुनी ने अपनी कठा समात की, तब पूरी राज सभा ध्रूव के इस अलोकिक तप और देवर्शी के
17:07पावन मार्ग दर्शन को सुनकर अश्रुपूल्ण हो उठी।
17:11महाराज उत्तानपाद ने गदगद कंट से देवर्शी नारत के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया, जिन्होंने उनके कुलको तारने वाले को
17:20सच्चा मार्ग दिखाया था।
17:21कुछ समय पश्चात महाराज उत्तानपाद ने ध्रुव को राज्यका स्वर्ण सिन्हासन सौंक दिया और स्वया आत्म कल्यान हेतु तपस्या करने
17:31वन चले गए।
17:33समराट ध्रुव ने कई सहसर वर्षों तक धर्म पूर्वक प्रित्वी पर शासन किया और उनका प्रत्यक कार्य देवर्शी नारत के
17:42दिये मूल मंत्र में ही स्थित रहा।
17:44अंतह अपनी लीला पूर्ण कर ध्रुव ने ब्रहमांड के उस सर्वोच स्थान ध्रुवलोक में प्रवेश किया, जो आज भी संपूर्ण
17:53स्रिष्टी के लिए भक्ती का अमर प्रकाश स्तंभ है।
17:57ध्रुवलोक की इस अनन्त यात्रा के मूल में बालक ध्रुव की वह कठोर साधना थी, जब वे देवर्शी के आदेश
18:04पर यमुना तटके अत्यंत घने और दुर्गम मधुवन में प्रविष्ट हुए थे।
18:09इस बीहड वन में आकर पांच वर्शिय ननहे राजकुमार ने एक विशाल कदम व्रिक्ष के नीचे कुशासन बिछा कर दृड़ता
18:17से पदमासन धारण किया और अपनी इंद्रियों को वश में करने का निश्चय किया।
18:24अपने गुरु देवर्शी नारद के परम उपदेश को हृदय में धारण कर बालक धृवने ओम नमो भगवते वासुदेवाय के दिव्य
18:32महामंत्र का मानसिक जब आरंभ किया।
18:35तपस्या के पहले महीने में धृवने अपनी शारिरिक आवश्चक्ताओं को त्यागते हुए केवल तीन दिनों में एक बार कंदमूल और
18:43जंगली फलों का सेवन कर अपनी चेतना को भगवान विश्णु में लीन रखा।
18:49साधना के द्वितिय मास में बालक ने सूखे पत्तों और सूखी घास को केवल छै दिनों में एक बार ग्रहन
18:56किया, जिससे उनका ननहा शरीर बाह्य रूप से क्षीन किन्तु आंतरिक उर्जा से दीप्ध होने लगा।
19:03तीसरे महीने के प्रारंभ होते ही ध्रुव ने भोजन का पूर्ण परित्याग कर दिया और केवल नौ दिनों में एक
19:10बार यमुना का शीतल जल पीकर अपनी अखंड समाधी को जारी रखा।
19:16तबके चौथे महीने में बालक ने जल का भी त्याग कर दिया और केवल बारह दिनों में एक बार वायु
19:23का सेवन कर अपने प्राणों को भगवान के चर्णों में समर्पित कर दिया.
19:28ध्रुव की इस अगाध अहिंसा और तपोबल से प्रभावित होकर मधुवन के हिंसक सिंग और विशैले सर्प भी अपनी कुरूरता
19:36भूलकर उनके चारों और सुरक्षा घेरा बनाकर बैठ गए.
19:41पाँचवे महीने में ध्रुव ने अपनी श्वास को भी पूरी तरह रोक लिया और अपने मन को केवल आदिपुरुष भगवान
19:48विश्नु के विग्रह पर केंद्रित कर परम कुम्भक अवस्था में प्रवेश किया.
19:54बालक ध्रुव द्वारा श्वास रोकते ही संपूर्ण ब्रहमांड की श्वास भी अवरुद्ध होने लगी, जिससे समस्थ जीव जन्तुओं और वनस्पतियों
20:03का प्राण संकट में पढ़ गया.
20:04इस ननहे बालक के तपोबल से उत्पन प्रचंड आध्यात्मिक उश्मा के कारण तीनों लोग कामपने लगे और स्वर्ग के सिनहासन
20:14डोलने लगे.
20:16ब्रहमांड में हाहाकार मचने पर इंद्र आधी समस्थ भयभीत देवता तुरंत परंपिता ब्रहमाजी की शरण में पहुँचे और उनसे इस
20:24संकट के निवारण की प्रार्थना करने लगे.
20:28तब स्रिष्टिकर्ता ब्रहमाजी ने देवताओं को आश्वस्थ करते हुए कहा कि यह ब्रहमांडिय संकट केवल मधुवन में स्थित बालक धुरुव
20:36की अनन्य और अडिक भक्ती का ही परिनाम है.
20:41ब्रहमाजी के परामर्ष पर समस्थ देवता तुरंत शीर सागर पहुँचे और उन्होंने भगवान विश्णु से प्रार्थना की कीवे शीघ्र ही
20:49प्रित्वी पर जाकर अपने नन्हे भक्त की समाधी पूर्ण कराएं.
20:54अपने नन्हे भक्त की निश्चल पुकार और देवताओं की व्याकुलता सुनकर दयानिधी भगवान विश्णु गरुर पर आरूड होकर अत्यंत वेग
21:03से प्रित्वी के मधुवन की ओर प्रस्थान करने लगे.
21:07उस समय ध्रूव के हरिदय में चतुर्भुज भगवान विश्णु का वह दिव्य और परम तेजस्वी रूप निरंतर प्रकाशित हो रहा
21:14था, जिसमें वे खोए हुए थे.
21:18अचानक ध्यान की उस चरम अवस्था में ध्रूव के हरिद्याकाश से भगवान का वह मनमोहक विग्रह ओजल हो गया, जिससे
21:25व्याकुल होकर उन्होंने अपनी आखें खोल दी.
21:29जैसे ही बालक ने नेत्र खोले, उन्होंने देखा कि साक्षात चतुर्भुज नारायन अपने दिव्यशंक, चक्र, गदा और पद्म के साथ
21:38उनके सामने साक्षात खड़े हैं.
21:42साक्षात स्रिष्टी के स्वामी को अपने सम्मुख पाकर नन्हा बालक भाव विभोर हो गया, किन्तु अत्यधिक संकोच और ज्ञान के
21:50अभाव में वह उनकी स्तुती करने के लिए शब्द नहीं खोज पा रहा था.
21:55तब परमदयालू भगवान विश्णू ने स्नेहपूर्वक अपने दिव्य पांच जन्य शंक से ध्रुव के कपोल का स्पर्ष किया, जिससे उन्हें
22:04तुरंत वेदों के दिव्य ज्ञान और अनुपम वानी की प्राप्ती हो गई.
22:09दिव्य पांच जन्य शंक के स्पर्ष से ज्ञान प्राप्त होते ही बालक ध्रुव अत्यंत विनीत भाव से अपने करक्मल जोड
22:16कर भगवान नारायन की अलोकिक स्थुती करने लगे.
22:20परम्पिता परमेश्वर भगवान विश्नु अत्यंत मंद मुस्कान के साथ अपने इस नन्हे भक्त के मुख से निकले वेदमंत्रों और भक्तिमय
22:29वचनों को प्रेम पूर्वक सुनते रहे.
22:32स्थुती पूर्ण होने के पश्चात ध्रुव पुनह एक पैर पर खड़े होकर अपनी संपूर्ण चेतना को श्री हरी के चर्णों
22:39में विलीन करके ध्यान में लीन हो गए.
22:43जब ध्रुव ने प्राणायाम द्वारा अपनी सांसों को भीतर ही रोक लिया, तब उनके मस्तक से एक प्रचंड योगिक तेजोपुंच
22:51निकल कर गगन को भेदने लगा.
22:54बालक के एक पैर के दबाव से समस्त भूमंडल डग्मगाने लगा और प्रित्वी ऐसे जुकने लगी जैसे जल में तैरती
23:01हुई कोई नौका डोलती है.
23:04परवत शिकरों में विशाल दरारे पढ़ने लगी और साथ समुद्रों में उथल पुथल मच गई, जिससे समूचा मृत्यो लोक भैभीत
23:13हो उठा.
23:14धुरुव द्वारा अपनी श्वास को रोक लिये जाने से पूरे ब्रहमांड की प्राणवायु रुप गई और तीनों लोकों के जीवों
23:22का दम घुटने लगा.
23:24स्वर्गलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवता अचानक छाती में घुटन और असह्य दबाव महसूस करके अत्यंत व्याकुल होने लगे.
23:34देवलोक के नंदनकानन के कल्पवरिक्ष मुर्जाने लगे और पवन देव की गती ठप हो जाने से समस्थ दिशाओं में सन्नाट
23:42आचा गया.
23:44पत्यंत संकट में पढ़कर देवराज, इंद्र ने अमरावती की भव्य राजसभा में सभी प्रमुख देवताओं की आपात कालीन बैठक बुलाई.
23:53उसी समय देवर्शी नारद वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवताओं को बताया कि यह संकट बालक ध्रूव की उग्रत अपस्या
24:01के कारण उत्पन हुआ है.
24:04सक्त्य जानकर भैभीत, इंद्र और सभी देवता तुरंत इस घोर संकट के समाधान हेतु बैकुंठ धाम की ओर प्रस्थान करने
24:13लगे.
24:14दिव्य आकाश गंगाओं और दीप्तिमान नक्षत्रों को पार करता हुआ देवताओं का यह समूह गतिमान मेगों की भांती आगे बढ़ता
24:23गया.
24:24यात्रा करते हुए सभी देवताक शीर सागर के पवित्र तट पर पहुँचे जहां अलोकिक दूद की तरंगे स्वर्ण में आभा
24:32से चमक रही थी.
24:35वैकुंठ धाम के भव्यस्वर्ण द्वारों को पार करते ही देवताओं को परमशान्ती और अलोकिक प्रकाश की अनुभूती हुई.
24:43शीर सागर में शेशनाग की शया पर विराजमान भगवान विश्नु और माता लक्षमी के सम्मुख पहुँचकर सभी देवता दंडवत प्रणाम
24:52करने लगे.
24:54देवराज इंद्र ने अत्यंत कातर स्वर में प्रार्थनाकी की संपून ब्रह्मान का श्वास अवरुद्ध हो चुका है और स्रिष्टी विनाश
25:02की कगार पर है.
25:05देवताओं ने करबध होकर विन्ती की की वे बालक ध्रूव के इस प्रचंड योगबल से त्रिलोग की रक्षा करें और
25:12प्राणवायू का संचार पुनह प्रारंभ करें.
25:16भगवान विश्णू ने मंदमंद मुस्कुराते हुए देवताओं से कहा कि यह कोई संकट नहीं बलकी एक अबोध बालक का निश्चल
25:24और अनन्य प्रेम है.
25:26श्री हरी ने देवताओं को अभायदान देते हुए कहा कि वे स्वय ध्रूग के समक्ष प्रकट होकर उसकी तपस्या पूर्ण
25:34करेंगे और उसे अचल पद प्रदान करेंगे.
25:38वैकुंठ धाम में श्री हरी ने अपने परम वाहन पक्षी राज गरूड का स्मरण किया और मधुवन की ओर प्रस्थान
25:46करने की तैयारी की.
25:48भगवान विश्णों की आग्या पाते ही महाबली गरूड ने अपने विशाल स्वर्णमे पंखों को फैलाया, जिनकी फड़फडाहट से संपून ब्रहमांड
25:57में सामवेद की पवित्र ध्वनिया गूँज उठी.
26:01शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये हुए सर्वेश्वर श्री हरी मंदमंद मुस्कुराते हुए पक्षीराज गरोड की पीठ पर विराज मान
26:10हुए.
26:12वैकुंट से मृत्यू लोग की ओर गती करते हुए परमेश्वर का अतिप्राकृतिक तेज समस्थ तारों, नक्षत्रों और दिव्य लोकों को
26:19अलोकिक कान्ती से चमकाने लगा.
26:23जैसे ही भगवान विश्नो पृत्वी लोग के समीक पहुँचे, ध्रुव के योगबल से रुका हुआ त्रिलोग का प्राणवायु का प्रवाह
26:30तुरंत मुक्त हो गया और समस्थ जीव पुनह सुखपूर्वक सांस लेने लगे.
26:36आकाश मार्ग में उपस्थित ब्रह्मा, शिव और अन्य देवताओं ने परम प्रभु के आगमन मार्ग पर दिव्य पारिजात पुष्पों की
26:44वर्षा करके उच्सव मनाना प्रारंभ कर दिया.
26:48यमुना तटपर स्थित घने और पावन मधुवन में पक्षी राज गरूर का अवतरण हुआ, जिससे संपूर्ण वन शेत्र एक ही
26:56क्षण में स्वर्णिन आभासे जग्म का उठा.
27:00प्रभु के पावन चर्णों के स्पर्ष मात्र से सुखे व्रिक्ष हरे भरे हो गए, रंग बिरंगे सुगंधित पुष्प खिल उठे
27:07और हिंसक पशु अपने स्वाभाविक वैर्भाव को भूल कर शांत बैठ गए.
27:13वन के मध्य एक व्रिक्ष के नीचे, बालक ध्रुव अभी भी एक पैर पर खड़े होकर पूर्ण समाधी अवस्था में
27:20निश्चल एव कठोर तपस्या में लीन था.
27:24अचानक ध्रुव के अंतहकरण के हरिद्यत्मल पर निरंतर जलने वाली भगवान विश्णु की वह चतुर्भुज दिव्य जोती सहसा अंतरध्यान हो
27:32गई.
27:34अपने ध्यान में प्रभु की उस मनमोहक जाकी के गायब होने से व्याकुल होकर बालक ध्रुव ने अपनी योग समाधी
27:41तोड़ी और अपनी भौतिक आखें खोली.
27:45आखें खोलते ही ध्रुव ने देखा कि स्वयन साक्षात जगन्नाथ श्री हरी गरुर पर विराजमान होकर उसके ठीक सम्मुख खड़े
27:53हैं, जिनकी कांती करोडों सूरियों के समान दीप्तिमान थी.
27:58नीमनी के समान श्यामवर्ण, पीतामवर्धारी और शंक्च क्रगदापद्म से सुशोभित प्रभु के इस अलोकिक प्रत्यक्ष दर्शन से बालक ध्रुव भाव
28:08विभोर हो गया.
28:10बालक ध्रुव प्रभु की स्तुती करने के लिए आतुर हुआ, परंतु अत्यधिक आनंद और भक्तियाति रेक के कारण उसके कंट
28:17से शब्द नहीं निकल पा रहे थे.
28:20अपने इस अबोध और निश्चल बालक भक्त की व्याकुलता को समझ कर, करुणामय श्री हरी ने अपने दाहिने हाथ में
28:28लिए दिव्य पांच जन्य शंक से ध्रुव के कपोल को स्पर्श किया.
28:33दिव्य शंक का स्पर्श होते ही ध्रुव के भीतर संपूर्ण वेदों, शास्त्रों और ब्रहमांडिये ज्ञान का स्वतह स्फुरण हो गया
28:41और उसकी वानी को अलौकिक सामर्थ्य प्राप्थ हो गया.
28:45परमज्यान और अनुपम भक्ती से परिपूर्ण होकर बालक ध्रुव श्री हरी के श्रीचर्णों में दंडवत प्रणाम कर गिरपड़ा और उसके
28:53नेत्रों से अश्रु बहने लगे.
28:56ततपश्चात ध्रुवने करबध होकर अत्यंत मधुर्ण भक्ति पूर्ण और चंदोबध वानी में परमपिता परमेश्वर की प्रथम स्थुती का गान प्रारंभ
29:06किया.
29:07बालक के मुख से निकलते हुए इन अध्भुत और निश्चल मंत्रों को सुनकर आकाश से देवताओं ने दुन्दुभी बाजे बजाएं
29:15और पुश्पवर्शा तेज कर दी.
29:18भगवान विश्णु ने अपने इस महान बालभक्त को वात्सल्यमे द्रिश्टी से देखा और उसे वह अचल पद प्रदान करने के
29:26लिए उद्यत हुए, जिसकी लालसा संसार का कोई भी जीव करता है.
29:32भगवान विश्णु ने अपनी मेघ जैसी गंभीर किन्तु अत्यंत वात्सल्यमे वाणी में बालक ध्रूव को सम्बोधित किया.
29:40भगवान ने कहा कि ध्रूव की इस कठोर और निश्चल तपस्या ने तीनों लोकों के देवताओं और स्वय मुझे भी
29:47विस्मित कर दिया है.
29:50नारायन ने ध्रूव को ब्रहमांड के उस अचल और अविनाशी पद को देने की घोशना की, जो प्रलयकाल में भी
29:57कभी नश्ट नहीं होता.
30:00अंतरिक्ष के मध्य में एक परमदिव्य, देधी प्यमान और स्वर्णिम लोक प्रकट हुआ जिसे ध्रूवलोक के नाम से जाना गया.
30:09भगवान ने बताया कि संपूर्ण ब्रहमांड के नक्षत्र, ग्रह और सब्तर्शी मंडल इस ध्रूवलोक की निरंतर परिक्रमा करेंगे.
30:18इस ब्रहमांडिये द्रिश्य को देख कर बालक ध्रूव के नेत्र विस्मय और कृतगिता के आसों से भर गए.
30:26भगवान ने ध्रूव को प्रित्वी पर वापस लोट कर 36,000 वर्षों तक न्याय पूर्वक और धर्म पूर्वक शासन करने
30:33का वर्दान भी दिया.
30:36नारायन ने उसे आश्वस्त किया कि असीन वैभव और राजसी सुख भोगने के बाद भी उसका मन कभी भी माया
30:43के जाल में नहीं फसेगा.
30:46बालक ध्रूव ने अत्यंत संकोच और भक्ती के साथ अपने प्रभू के चर्णों में अपना मस्तक रख दिया.
30:53ध्रूव ने अत्यंत मधुरकंट से कहा कि उसे न तो राज्य की लालसा है और नहीं स्वर्ग की वह केवल
31:01प्रभू के चर्णों की अनन्य भक्ती चाहता है.
31:05भगवान ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि स्रिष्टी के संतुलन और धर्म की स्थापना के लिए तुम्हें इस राजा
31:13के कर्तव्य को स्विकार करना ही होगा.
31:16आकाश में सबतर्शी मंदल के साथों महान रिशी प्रकट हुए और उन्होंने भगवान के इस दिव्य निर्णय पर पुष्पवर्शा करते
31:24हुए ध्रुव को नमन किया.
31:27भगवान विश्णु की चाती से एक अतितेजस्वी स्वर्ण किरन निकली और सीधे बालक ध्रुव के हृदय में समाहित हो गई.
31:36वर्दान देने के पश्चात भगवान विश्णु का विग्रह धीरे धीरे दिव्य प्रकाश पुंज में परिवर्तित होकर अंतरध्यान होने लगा.
31:45भगवान के चले जाने के बाद पाँच वर्ष का वह बालक अब एक महान तेजस्वी और शान्त तपस्वी के रूप
31:52में उठ खड़ा हुआ.
31:55मधुवन के सभी पशुपक्षी और व्रिक्ष उस परम सिध बालक के सम्मान में अत्यंत शान्त और नत्मस्तक हो गए.
32:03तभी वहाँ देवर्षी नारद अपनी वीना बजाते हुए और नारायन नारायन का मधुर संकीर्तन करते हुए प्रकट हुए.
32:12देवर्षी नारद ने ध्रुव को गले लगाया और उसे अपने पिता महाराज उत्तानपाद के पास वापस लोटने का निर्देश दिया.
32:21प्रस्थान करने से पूर्व ध्रुव ने उस पवित्र स्थान को श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया जहा उसने भगवान के साक्षात दर्शन
32:29किये थे.
32:31जैसे ही ध्रुव ने अपनी ग्रिहात्रा आरंब की, आकाश में नवनिर्मित ध्रुव तारा अपनी अनन्त और अचुक रोशनी बिखेरने लगा.
32:41तपोवन की पवित्र भूमी को प्रणाम कर बालक ध्रुव अत्यंत शान्त और तेजस्वी मुखमंडल के साथ अपने राज्य की ओर
32:49बढ़ने लगे.
32:50जब महाराज उत्तानपाद के महल में ध्रुव के सकुषल लोटने का समाचार पहुँचा, तो संपूर्ण राज्य में हर्ष और आश्चर्य
32:59की लहर दोड़ गई.
33:01समाचार सुनते ही महाराज उत्तानपाद का हरिदय पश्चाताप और असीम आनन से भर गया, और वे अपने सिनहासन से उठ
33:10खड़े हुए.
33:11ध्रुव के स्वागत के लिए महाराज, दोनों रानिया, मंत्री और सेनापती उतावले होकर नगर की सीमाओं की ओर दोड़ पड़े.
33:21पूरे नगर को फूलों की मालाओं, रंग बिरंगे ध्वजों और जलते हुए स्वर्ण दीपों से वधु की भांती सजाया गया
33:28था.
33:30जैसे ही नगर की सीमाओं पर बालक ध्रुव दिखाई दिये, उनका अलौकिक तेज देखकर सभी नागरिक श्रद्धा से नत्मस्तक हो
33:38गए.
33:39महाराज उत्तानपाद ने रत से उतर कर दोड़ते हुए अपने ननहे पुत्र को हृदय से लगा लिया और उनके अश्रुव
33:47का मस्तक भीग गया.
33:49माता सुनीती ने अपने प्राणप्रिय पुत्र को गले से लगाया, मानों उनके जीवन की खोई हुई सारी खुशिया वापस मिल
33:57गई हुँ.
33:59आमकार से मुक्त होकर रानी सुरुची ने धुरुव के चर्मों में सिर जुका दिया और धुरुव ने उन्हें अत्यंत आदर
34:06पूर्वक उठाया.
34:08धुरुव के छोटे भाई उत्तम ने दोड़ कर अपने भ्याता को गले लगाया, और दोनों भाईयों का प्रेन देखकर सबकी
34:15आखें नम हो गई.
34:18मंगल वाधियों, शंकनाद और वैदिक मंत्रो चार के बीच धुरुव ने एक भव्य सुसज्जित रत पर सवार होकर नगर में
34:25प्रवेश किया.
34:28महाराज उत्तानपाद ने धुरुव के ज्यान और भक्ती को देखकर उन्हें अपने जीवनकाल में ही राज्य का नया समराट घोशित
34:36कर दिया.
34:37धुरुव ने समराट बनकर अपनी प्रजा को अपनी संतानों की तरह पाला और धर्म के मार्ग पर चलते हुए न्यायप्रिय
34:45शासन किया.
34:47धुरुव के राज्य में न कोई अकाल था, न कोई रोग और चारों और केवल सुख, शान्ती और समरिध्धी का
34:54वास्था.
34:56भगवान विश्णू के अनन्य भक्त महाराज धुरुव ने अनेक बड़े यग्यों का अनुष्ठान कर देवताओं और रिशियों को संतुष्ट किया.
35:05अनेक वर्षों के सफल और यशस्वी शासन के बाद, महाराज धुरुव ने अपने पुत्र को राज्य सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम
35:13का मार्ग चुना.
35:15तपस्या में लीन धुरुव को लेने के लिए आकाश से एक अत्यन्त दिव्य और देदी प्यमान स्वन विमान पृत्वी पर
35:22उत्रा.
35:23विमान से उतर कर भगवान विश्णू के पार्शदों, नंद और सुनन्द ने महाराज धुरुव को प्रणाम किया और उन्हें वैकुन्थ
35:31ले जाने का आमंत्रन दिया.
35:34मृत्यू के सिर पर अपना पैर रख कर महाराज धुरुव अत्यन्त दिव्य रूप धारण कर उस स्वर्गिय रत पर सवार
35:41हो गए.
35:43भगवान विश्णू के वर्दान से धुरुव आकाश में धुरुव लोग के रूप में स्थापित हुए, जो प्रलै काल में भी
35:50नश्ट न होने वाला सर्वोच धाम है.
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