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विष्णु पुराण के इस अध्याय में देखिए श्रीराम के भव्य राज्याभिषेक और आदर्श 'रामराज्य' की महिमा! जानिए कैसे श्रीराम ने लव और कुश को राज्य सौंपकर अयोध्यावासियों के साथ सरयू नदी में प्रवेश कर बैकुंठ धाम के लिए महाप्रस्थान किया। इसके बाद सूर्यवंश की भावी पीढ़ी और राजा निमि के जनक वंश का रहस्य उजागर होता है। साथ ही, चंद्रदेव की उत्पत्ति, तारा-हरण से उपजे तारकामय संग्राम और महान सोमवंश (चंद्रवंश) के प्रथम सम्राट पुरूरवा के जन्म की अमर गाथा देखिए! #VishnuPurana #Ramrajya #Suryavansha #ChandraVamsha #Pururavas #HinduMythology
Transcript
00:00रावन का वध करने के पश्चात, श्री राम, माता सीता, लक्षमन, हनुमान और विभीशन के साथ दिव्य पुश्पक विमान पर
00:08सवार होकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।
00:12आकाश मार्ग से बहती पावन सर्यू नदी और अयोध्या नगरी का मनमोहक ग्रिशे देखकर श्री राम का हृदय अपनी जन्मभूमी
00:21के प्रती अपार प्रेन से भर जाता है।
00:25नदी ग्राम में तपस्वी रूप में रह रहे भरत, प्रभु राम की चरण पादुकाओं को सिर पर धारन किये पुश्पक
00:31विमान को आते देख भाव विभोर हो उठते हैं।
00:36पुश्पक विमान नंदी ग्राम की भूमी पर उतरता है और देवगन आकाश से नवनिर्मित उत्सव के प्रतीक स्वरूप पुश्पों की
00:44वर्षा करने लगते हैं।
00:4714 वर्षों के लंबे विरह के बाद श्री राम अपने प्रियभ्राता भरत को उठाकर अत्यंत भावुक होकर अपने हृदय से
00:55लगा लेते हैं।
00:57भरत अत्यंत श्रद्धा के साथ श्री राम की उन पवित्र चरण पादुकाओं को पुनह प्रभु के चरणों में अर्पित कर
01:05देते हैं।
01:07लक्षमन और शत्रुघन भी परसपर गले मिलकर आखों में हर शाश्रु लिये इस एतिहासिक शण का आनंद लेते हैं।
01:16माता सीता तीनों राज माताओं कोशल्या, सुमित्रा और कैकेई के चरण स्पर्ष कर उनका आशिरवाद प्राप्त करती हैं।
01:25श्री राम अपनी तीनों माताओं के चरणों में शीश नवाकर, उनके वातसल्य और स्नेह का आशिरवाद ग्रहन करते हैं।
01:35नगरवासी अयोध्या के प्रत्येक मार्ग को सुन्दर दीपों, तोर्णों और भव्य बंदनवारों से सजाकर प्रभु का भव्य स्वागत करते हैं
01:45अयोध्या की प्रजा अपने प्रिय राजा और रानी पर छटों से निरंतर पुष्प वर्षा करती हुई जय जयकार के नारे
01:52लगाती है
01:54महर्शी वशिष्ठ और अन्य पूजसंत श्री राम का राजभवन में स्वागत कर वैदिक मंत्रों चार के साथ शुभाशीश प्रदान करते
02:02हैं
02:04सुग्रीव और हनुमान द्वारा पवित्र नदियों से लाए गए जल से श्री राम का शास्त्रिय विधिविधान से पावन राज्याभिशेक स्नान
02:13कराया जाता है
02:15स्नान के उपरांथ श्री राम और माता सीता को अनुपम राजसी वस्त्रों और अलोकिक आभूशनों से सुसज्जित किया जाता है
02:25अयोध्या की भव्य राजसभा में समस्त्मुनी, राजा, वानर्वीर और नगर्जन प्रभू श्री राम के राज्याभिशेक के गवाह बनने एकत्रित होते
02:34हैं
02:35गुरु वशिष्ठ मंत्रो चार के बीच श्री राम के मस्तत पर सूर्यवन्ष का अलोकिक स्वर्ण मुकुट धारन कराते हैं
02:45सिनहासन पर विराजमान राजा राम और महारानी सीता की असीम कांती से संपूर्ण राजसभा आलोकित हो उठती है
02:54हनुमान अपने प्रभु के चर्णों के समीप अत्यंत भक्ती और विनमर्ता भाव से बैठकर निरंतर सेवा में लीन रहते हैं
03:03स्वर्ग से ब्रह्मा, शिव और इंद्रदेव पुश्पक वरिष्टी करते हैं तथा गंधर्व दिव्यातिदिव्य संगीत की मधुर धुन छेड़ते हैं
03:13लाखो दीपों की जोती से पूरी अयोध्या नगरी जगमगा उठती है और सर्वत्र धर्म तथा न्याय के रामराज्य का मंगल
03:21में उदे होता है
03:23श्री राम के न्यायप्रिय शासन में प्रकृती स्वयन प्रफुलित होकर प्रत्य कृतु में मीठे फल और सुगंधित पुश्परपन करने लगी
03:33अयोध्या का कोई भी नागरिक रोग, शोक या अकाल मृत्यु के भय से त्रस्थ नहीं था और चारों और केवल
03:40निरोग जीवन का उल्लास था
03:43क्रिशकों के खेत सदा अन्न से परिपूर्ण रहते थे और धर्ती मा भरपूर फसल प्रदान कर संपूर्ण राज्य को धंधाने
03:51से समरिध करती थी
03:53हिंसक पशुभी अपनी क्रूरता त्याग कर एक ही घाट पर शान्त भाव से जल पीते थे और सर्वत्र अहिंसा का
04:01सामराज्य था
04:03चारों वर्ण अपने अपने धर्म और कर्तवियों का निष्ठा पूर्वक पालन करते हुए समाज को नैतिक मार्ग गर्शन प्रदान कर
04:11रहे थे
04:12नारियों का परम सम्मान होता था और प्रत्येक घर में देवी लक्षमी की क्रिपासे सुख शान्ती और समृद्धी का वास
04:20था
04:22रत्नजरित सिनहासन पर विराजमान भग्वान श्री राम और माता सीता अपनी प्रजा को अपने संतानों के समान स्नेह देते थे
04:31श्री राम स्वयन प्रत्येक नगर्वासी की चिंता सुनते और बिना किसी भेदभाव के त्वरित न्याय प्रदान करते थे
04:39ध्राता लक्षमन, भरत और शत्रुघन अपने स्वामी श्री राम के प्रशासनिक कारियों में अनन्य भक्ती भाव से सह्योग करते थे
04:48पूरे राज्ज में निरंतर वैदिक मंत्रों की पवित्र ध्वनी गूंजती थी और बड़े-बड़े यग्यों का अनुष्ठान होता था
04:57मेग समय पर मीठे जल की वर्षा करते थे और शीतल मंध हवा सर्वत्र दिव्यता का प्रसार करती थी
05:05व्यापारी निश्पक्षता और इमानदारी से व्यापार करते थे जिससे बाजार रत्न, वस्त्र और स्वर्ण सम्पदा से भरे रहते थे
05:15अयोध्या के बालवरिध सभी प्रसन्न थे और बच्चे स्वर्णजडित आंगनों में बेफिक्र होकर क्रीडा करते थे
05:23महर्शी वशिष्ट और कुल गुरुगण राजसभा में पधार कर धर्मशास्त्रों के अनुसार उत्तम राजनीती का परामर्श देते थे
05:32श्री राम प्रजा का हाल जानने के लिए स्वयन वेश बदल कर दूरदरास के क्षेत्रों और वनों का भ्रमन करते
05:39थे
05:41स्वर्ग से देवतागण अयोध्या के इस आदर्श शासन को देख कर श्री राम की मर्यादा पुरुशोत्तम के रूप में प्रशनसा
05:48करते थे
05:50कोशल राज्य की सीमा में अपराध, चोरी या असत्य का नामो निशान भी शेश नहीं रह गया था
05:58भगवान धन्वंतरी की अनुकमपा से सभी नागरिक, मानसिक और शारिरिक रूप से पूर्णतह स्वस्थ और उर्जावान थे
06:06माता सीता स्वयं अपने करक्मलों से ब्राहमनों और निर्धनों को भोजन तथा वस्त्रदान करती थी
06:14संपूर्ण प्रजाजय श्री राम का जैगोश करती हुई रामराज्य के इस स्वर्णिन युग को युगों-युगो के लिए अमर बना
06:22रही थी
06:23अयोध्या के राजसी वैभव को त्याग कर माता सीता महर्शी वालमीकी के शांत और पावन तपोवन में प्रकृती के सानिध्य
06:31में एक तपस्विनी का जीवन व्यतीत करने लगी
06:35परम ज्यानी महर्शी वालमीकी ने माता सीता को अपनी पुतरी के समान आश्रे दिया, जिससे संपूर्ण आश्रम का वातावर्ण अत्यंत
06:44पवित्र और दिव्य उर्जा से भर उठा
06:48एक अत्यंत शुब होर पावन नक्षत्र में माता सीता ने आश्रम की कुटिया में दो अत्यंत तेजस्वी और सुन्दर जुर्वा
06:56पुत्रों को जन्म दिया, जिससे संपूर्ण वन प्रदेश आलोकित हो उठा
07:01महर्शी वालमीकी ने नवजात शिशुओं पर पवित्र कुशा और लव से अभिमंतरित जल छिड़क कर उनका नामकरण क्रमशय कुश और
07:10लव किया
07:11माता सीता के ममतामई आचल में खेलते हुए दोनों राजकुमार लव और कुशवन के शांत वातावर्ण और वन्य जीवों के
07:19बीच अत्यंत तीवर गती से बढ़ने लगे
07:23महर्शी वालमिकी की छत्रचाया में दोनों बालकों ने अत्यंत अलपायू में ही वेदों, उपनिश्दों और समस्थ शास्त्रों का गूर ज्यान
07:32प्राप्त कर लिया
07:34शास्त्रों के साथ साथ महर्शी ने उन्हे धनुर्विद्या और अस्त्रशस्त्रों के संचालन में भी निपुन बनाया, जिससे वे अपराजे योध्धा
07:43के रूप में उभरने लगे
07:45दिव्य धनुषों को धारण कर जब लव और कुश लक्षे साथ ते, तो उनकी एकागरता और पराक्रम को देख कर
07:53स्वयन देवगण भी विस्मित रह जाते थे
07:56उधर अयोध्या के स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान श्री राम प्रजापालन के अपने कर्तवियों को निभाते हुए भी हृदय में माता
08:04सीता के वियोग की मौन वेदना सह रहे थे
08:08महर्शी वालमीकी ने दिव्य रामायन महाकाव्य की रचना की और लवकुष को उस अमरत्मई गाथा को मधुर स्वर में वीना
08:16के साथ गाना सिखाया
08:19हाथों में वीना लिए जब दोनों भाई तपोवन के रिशियों की सभा में श्री राम की महिमा का गान करते
08:25तो सुनने वाले मुग्ध होकर अश्रु बहाने लगते थे
08:30धीरे धीरे उन दो तेजस्वी बालकों द्वारा गाय जाने वाले अनुपम रामायन गान की कीर्ती अयोध्या की सीमाओं को पार
08:38कर राजदर्बार तक जा पहुँची
08:41अयोध्या में आयोजित महायग्य के शुभ अवसर पर महाराज श्री राम ने उन दोनों तपस्वी बालकों को आदर पूर्वक अपने
08:49भव्य दर्बार में आमंत्रित किया
08:52समस्त राजसभा और मंत्रियों के सम्मुख लव और कुष ने अपनी मधुर और करुणाली वाणी में माता सीता के त्याग
09:00और वनवास की गाथा का भावुक गान प्रारंब किया
09:04उस दिव्य संगीत को सुनकर और बालकों के मुख पर अपने ही रूप की छवी देखकर प्रभु श्री राम की
09:11आखों से अश्रु बहने लगे और सत्य प्रकट हो गया
09:15माता सीता के प्रिथवी में समा जाने के ह्रिदय विदारक शन के पश्चात श्री राम ने अपने सूर्यवंश की गरिमा
09:23और सुरक्षा हेतु राज्य विभाजन का निर्ने लिया
09:27मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम ने अपने जेश्ट पुत्र लव का राज्या भिशेक कर उन्हें उत्तर कोसल की सुन्दर नगरी श्रावस्ती
09:35का स्वतंत्र शासक घोशित किया
09:38तत्पश्चात उन्होंने अपने छोटे पुत्रकुष का भव्य राज्याभिशेक किया और उन्हें दक्षिन कोसल की समरिध नगरी कुशावती का राज्य सौंप
09:47कर उत्तरदायत्व प्रदान किया
09:49दोनों नए राज्यों की प्रजाने अपने पराक्रमी और धर्मनिष्ट राजकुमारों का अपूर्व हर्शोललास के साथ स्वागत किया जिससे सूर्यवंश की
10:00कीर्ती चारों और फैल गई
10:02इस प्रकार अपने योग्य पुत्रों को राज्य की बागदोर सौंप कर श्री राम ने सूर्यवंश की अखंड परमपरा को अक्षोन
10:10रखा और प्रित्वी पर अपने दिव्य अवतार के अंतिम चरण की ओर बढ़े
10:16जब प्रित्वी पर श्री राम के मानव अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो गया, तब काल देव ने अयोध्या में प्रवेश
10:23कर प्रभु को उनके वैकुंठ लोटने के समय का स्मरण कराया
10:28काल देव के संदेश को अत्यंत गोपनिय रखने के लिए श्री राम ने द्वार पर लक्षमन को रक्षक नियुक्त किया
10:35और आज्यादी की उनके वार्तालाप में विघ्ण डालने वाले को मृत्युदंड मिलेगा
10:41उसी क्षन अत्यंत क्रोधी स्वभाव के महर्शि दुर्वासा राजद्वार पर पहुँचे और उन्होंने श्री राम से तुरंत मिलने की हट
10:49करते हुए पूरी अयोध्या को भस्म करने का श्राप देने की चेतावनी दी
10:55कुल के विनाश को बचाने और अपने भ्रात्रिधर्म का पालन करने के लिए लक्षमन ने स्वयंके प्राणों की परवाह न
11:03करते हुए प्रभु के कक्ष में प्रवेश कर महर्शी के आगमन की सूचना दी
11:09अपने वचन की मर्यादा की रक्षा के लिए लक्षमन ने अपनी इस भूल को स्विकार किया और श्री राम की
11:15आज्या का पालन करते हुए सर्यू नदी के पावन तट की ओर प्रस्थान किया
11:21सर्यु के शीतल जल में प्रवेश करते ही लक्षमन का पार्थिव शरीर विलीन हो गया और वे अपने वास्तविक स्वरूप
11:29अनंत शेशनाग के रूप में प्रकट होकर स्वर्गलोग की ओर बढ़ चले
11:34सहस्र फणों वाले तेजस्वी स्वर्णमी शेशनाग के रूप में लक्षमन का वह अलौकिक द्रिश देखकर समस्त देवगण और गंधरवों ने
11:42आकाश से पुश पवर्शा की
11:45प्रिय अनुज लक्षमन के प्रस्थान के बाद अत्यंत भावुक और वैराग्य से भरे श्री राम ने भी अपनी इस भूलोक
11:53लीला को समेटने का अंतिम निर्णे लिया
11:56श्री राम के इस महाप्रस्थान की सूचना पाकर भरत और शत्रुग्न भी इस संसार से विरक्थ हो गए और उन्होंने
12:04अपने प्रभु के साथ ही परमधाम जाने का द्रिड संकल्प किया
12:09जब अयोध्या वासियों को ग्यात हुआ कि उनके परम प्रिय राजा सदा के लिए उन्हें छोड़ कर जा रहे हैं
12:16तो वे सब व्याकुल होकर विलाप करते हुए उनके पीछे चल पड़े
12:21प्रभु राम ने अयोध्या के पशुपक्षियों, व्रिद्धों, स्त्रियों और समस्थ प्रजा को प्रेमपूर्वक अपने साथ चलने की अनुमती प्रदान की
12:30जिससे वह महाप्रस्थान एक परम उच्सव में बदल गया
12:35अयोध्या की गलियों से निकलते हुए श्री राम के मुख मंडल पर एक अलौकिक शांत मुस्कान थी और उनके पीछे
12:42श्रद्धा और भक्ती का एक अनन्त सागर बह रहा था
12:47भरत और शत्रुगन अपने दोनों हाथ जोड़कर पूर्णत ध्यानमगन होकर अपने अगरच के चर्णों का अनुगम्न कर रहे थे जिनका
12:56तेज सूर्य के समान देधी प्यमान था
12:59इस महान यात्रा का साक्षी बनने के लिए आकाश मार्ग में ब्रह्मा, शिव, इंद्र और समस्थ 33 कोटी देवी देवता
13:07अपने दिव्य विमानों में एकत्रित हो गए
13:11जब यह विशाल जनसमोह पावन सर्यू नदी के विशाल और दिव्य तट पर पहुँचा, तो नदी का जल अलोकिक स्वर्ण
13:18और नीली किर्णों से जगमगा उठा
13:21श्री राम ने करुणा भरी द्रिष्टी से रोती हुई प्रजा को सांत्वना दी और उन्हें आश्वस्त किया कि उनके जाने
13:29के बाद भी उनका कल्यान निश्चित है
13:33ततपश्चात श्री राम ने अत्यंत शांत भाव से आगे बढ़कर सर्यू के पावन और शीतल जल में अपने चरण रखे,
13:41जिससे पूरी नदी में दिव्य तरंगें उठने लगी
13:45जैसे ही भरत, शत्रुग्न और अयोध्या की निश्काम प्रजाने भी उस पवित्र जल में प्रवेश किया, उनके भौतिक शरीर दिव्य
13:53जोती पुंज में परिवर्तित हो गए
13:56सर्यू के मध्य भाग से अचानक एक अत्यन्त तीवर और कोटी सूर्य समप्रभ दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ, जिसने संपून
14:05आकाश को आलोकित कर दिया
14:08उस दिव्य प्रकाश के भीतर से श्री राम अपने चतुर्भुज नारायन रूप में प्रकट हुए और माता लक्ष्मी तथा शेशनाक
14:16के साथ बैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गए
14:19श्री राम के बैकुंठ प्रस्थान के पश्चात, उनके जेश्ट पुत्र कुष ने अयोध्या का कार्यभार संभालते हुए सूर्यवंश की महान
14:28परमपरा को आगे बढ़ाया
14:31महाराजा कुष और उनकी पत्नी नाक कन्या कुमुद्वती ने धर्म और न्याय के पत्थ पर चलते हुए अयोध्या नगरी को
14:38पुनह परम वैभव से सुसज़ित किया
14:41समराट कुष के पश्चात उनके परम ज्यानी और पराक्रमी पुत्र अतिथी ने राजसिनहासन संभाला जिन्होंने अपनी प्रजाकी रक्षा अपने प्राणों
14:51से भी बढ़ कर की
14:54महर्शियों ने वैदिक मंत्रोच्चार और स्वर्ण कल्षों के पवित्र जल से राजा अतिथी का राज्याभिशेक करके उन्हें चक्रवर्ती समराट घोशित
15:02किया
15:04राजा अतिथी के धर्म प्रायन शासन में उनके शूरवीर पुत्र निशद का जन्म हुआ जो धनुर विद्या और शास्त्रों के
15:12महान ज्याता बने
15:14राजा निशद के पश्चात उनके प्रतापी पुत्र नल ने राज्य संभाला और सूर्यवन्श की कीर्टी को दसों दिशाओं में पहलाया
15:23महाराजा नल के उपरांट उनके अत्यंत विद्वान और तपस्वी पुत्र नभ ने अयोध्या के स्वर्ण सिनहासन को सुशोगित किया
15:32राजा नभ के पावन शासनकाल में उनके पुत्र पुंदरीक का जन्म हुआ, जिन्होंने विशाल यग्यों का अनुष्ठान कर राज्य में
15:40शांती स्थापित की
15:42राजा पुंदरीक के बाद उनके महान योध्धा पुत्रक्षेमधनवा ने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखते हुए प्रजा का पुत्रवत पालन
15:51किया
15:52समराठ शेमधनवा के पश्चात उनके शूर्वीर पुत्र देवानीक ने सूर्यवंशी ध्वच को सदैव उचा रखते हुए अपने पराक्रम से शत्रूओं
16:01को पराजित किया
16:02राजा देवानीक के उपरांत उनके धार्मिक पुत्रहीनगु ने सत्ता संभाली और वैदिक संस्कृती का पूरे आर्यावर्त में विस्तार किया
16:13इसके पश्चात रुरु, पारियात्र और दल जैसे प्रतापी राजाओं ने इक्षवा को वन्ष के गौरवमई इतिहास को अपने महान कारियों
16:22से आलोकित रखा
16:24समराट छल, उक और वजरनाभ ने भी अपने अद्भुत शौर्य से अयोध्या की पवित्र भूमी को अधर्म और असुरों से
16:32सुरक्षित रखा
16:34आगे चलकर राजा शंखन और व्यूशित आश्व ने अपने तपोबल से राज्ज में धंधान्य और समरिध्धी की वर्षा की
16:42वंश परंपरा आगे बढ़ते हुए राजा विश्वसह के पुत्र हिरन्यनाभ हुए जो एक महान योगी और महर्शी जैमिनी के प्रिय
16:51शिश्य बने
16:52महर्शी जैमिनी ने योगेश्वर हिरनेनाभ को सामवेद का गूड ग्यान और आध्यात्मिक विद्या प्रदान कर उन्हें परमसिद्ध बनाया
17:02कई पीढियों के पश्चात द्वापर युग में इसी महान सूर्यवंश में अत्यंत शक्तिशाली राजा ब्रिहत्बल का जन्म हुआ, जो कोसर
17:10देश के समराट बने
17:13समराट ब्रिहत्बल ने महाभारत काल के आगमन के साथ ही अपनी विशाल गजसेना, रथियतिर्थियों और धनुर्धरों को युद्ध के लिए
17:21सुसजित किया
17:23राजा ब्रिहदबल अपनी विशाल अक्षोहिनी सेना के साथ कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में पहुँचे और कौरव पक्ष की ओर से असाधारन
17:32वीर्ता का प्रदर्शन किया
17:34इस प्रकार त्रेटा युग के मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम का महान सूर्यवंश द्वापर युग के कुरुक्षेत्र युद्ध तक अपनी अटूट
17:43और गौरवशाली परंपरा को अक्षोन रखता है
17:48सूर्यवंश की प्रमुख शाखा के पश्चात अब कथा इक्षवाकु के प्रतापी पुत्र राजा निमी की ओर मुर्ती है
17:54जिन्होंने एक महान आध्यात्मिक परंपरा की नीम रखी
17:59धर्मनिष्ठ राजा निमी ने अपने राज्य में एक हजार वर्षों तक चलने वाले विशाल महायग्य का संकल्प लिया और महर्शी
18:07वशिष्ठ से प्रधान पुरोहित बनने का विनमर निवेदन किया
18:12महर्शी वशिष्ठ ने देवराज इंद्र के यग्य में व्यस्थ होने के कारण राजा निमी को अपने लोटने तक प्रतीक्षा करने
18:20का परामर्श दिया
18:22जीवन की अनित्यता को समझते हुए राजा निमी ने समय व्यर्थ न करते हुए महर्शी गौतम को अपना आचार्य नियुक्त
18:29कर यग्य का शुभारंभ कर दिया
18:32जब महर्शी वशिष्ट इंद्र का कार्य समाप्त कर वापस लोटे तो निमि द्वारा अन्य रिशियों से यग्य आरंभ होता देख
18:40वे भीशन क्रोध से भर उठे
18:43अपने अनादर से क्रोधित होकर महर्शी वशिष्ठ ने राजा निमी को बिना शरीर का यानी देहीन हो जाने का भयानक
18:51श्राप दे दिया
18:53राजानिमी ने भी निर्दोश होते हुए दिये गए, इस श्राप के उत्तर में महरशी वशिष्ट को भी शरीर त्यागने का
19:00प्रत्याघात श्राप दे दिया
19:03महर्शी वशिष्थ बाद में मित्रावरुन के दिव्यकुम्ध से पुनह एक नए स्वरूप में पुनर्जन्म लेकर जीवित हुए
19:11दूसरी और राजा निमी की सुक्ष्म चेतन आत्मा बिना भौतिक शरीर के ही अपने महान महायग्य के अंत तक उपस्थित
19:19रही
19:20यग्य के अंत में देवताओं ने राजा निमी को पुनह शरीर देने का प्रस्ताव रखा, किन्तु निमी ने सदैव के
19:27लिए समस्थ जीवों की पलकों में निवास करने का वर्दान मांगा
19:32राज्य को बिना राजा के असुरक्षित देखकर महर्शी गौतम और अन्य रिशियोंने राजा निमी के सनरक्षित पार्थिव शरीर को अपने
19:40सनरक्षन में लिया
19:43रिशियों ने वेद मंत्रों का सस्वर उच्चारण करते हुए राजा निमी की निर्जीव देह को अर्णी काष्ट के मंथन दंड
19:50से मतना प्रारंब किया
19:52उस अलोकिक शरीर मंथन की तीवर प्रक्रिया से एक अती तेजस्वी और अलोकिक बालक का चमतकारी प्राकट्य हुआ
20:01मंथन की प्रक्रिया से उत्पन होने के कारण उस दिव्य बालक का नामकरन मिथी किया गया
20:08बिना किसी गर्भ और मृत शरीर से जन्म लेने के कारण उन्हें जनक की उपाधी से विभूशित किया गया
20:16और क्योंकि उनके पिता निमी देहीन यानी विदे हो चुके थे इसलिए यह समस्त वंश विदे वंश के नाम से
20:23प्रसिध हुआ
20:25राजा मिथी ने आगे चलकर भव्य मिथिला नगरी की स्थापना की जो कालंतर में ज्ञान, कला और अध्यात्म का सर्वोत
20:33कृष्ट केंद्र बनी
20:35मिथिला के जनक वंश के सभी राजा देहा भीमान से मुक्त होकर राजर्शी कहलाए और संसार में रहते हुए भी
20:43पूर्णत है अनासक्त रहे
20:45इसी महान जनक परमपरा में आगे चलकर सीरध्वज जनक का जन्म हुआ जो जगत जन्नी देवी सीता के परम ज्ञानी
20:53पिता बने
20:55इस प्रकार मिठिला का यह विदेह राजवन्ष प्राचीन वैदिक इतिहास में ज्ञान, भक्ती और अनासक्ती की एक अमर मिसाल बन
21:03गया
21:05सूर्यवन्ष के पावन आख्यान के पूर्ण होने के पश्चात, अब समस्थ जगत को शितलता प्रदान करने वाले दिव्य सुमवन्ष की
21:13अमर गाथा का प्रारंभ होता है
21:16ब्रहमा जी के मानस पुत्र महात पस्वी महर्शी अत्री ने संसार के कल्यान हेतुरिक्ष परवत पर घोर तथा अनुपम तपस्या
21:24आरंभ की
21:26महर्शी अत्री के इस कठोर अनुष्ठान से उदित हुई ब्रहमांडी उर्जा ने तीनों लोकों को अलौकिक आध्यात्मिक चेतना से आलोकित
21:35कर दिया
21:35जब महर्शी अत्री अपनी तपस्या की उच्चतम समाधी अवस्था में पहुँचे तब उनके मन में परम आनंद का उद्वेलन होने
21:45लगा
21:46उस परम आनंद के अतिरेक में महर्शी अत्री के नेत्रों से भास्वर और जोतिर में अश्रुकन प्रवाहित होने लगे
21:54वे दिव्य अश्रुकन केवल जल की बूदे नहीं थी, बलकि उनमें सम्पूर्ण ब्रहमांड को प्रकाशित करने वाला अध्भुत सोम्तत्व विद्यमान
22:03था
22:04आकाश मार्ग में बहते उन अमूल्य जोतिर्मय अश्रुओं को दसों दिशाओं की अधिश्ठात्री देवियों ने अत्यंत भक्तिभाव से धारण किया
22:14किन्तु चंद्रमा के उस उग्र और असीम प्रभाव को दसों दिशाओं अधिक समय तक संभाल न सकी और वह तेजोमय
22:22पुंच प्रित्वी पर आगिरा
22:23तब स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा ने उस अनुपम सोंतेज को देख कर उसे अत्यंत यत्न से एकत्रित किया
22:33भगवान ब्रह्मा ने उस अलोकिक जोति पुंच को एक दिव्यरत पर स्थापित किया ताकि समस्त लोकों का कल्यान हो सके
22:42उसी परम पवित्र सोंतत्व से परम सुंदर, शांत और रजत्वर्नी कांती वाले देव श्रिष्ट चंद्रमा का प्राकट्य हुआ
22:51चंद्रमा का वह भव्यरत दस श्वेत और मनोजवी घोडों से युक्त होकर समस्ट अंतरिक्ष मंडल में तीवर गती से भ्रमन
22:58करने लगा
23:00भगवान श्री हरी की प्रेणा से चंद्रमा ने प्रित्वी की 21 बार परिक्रमा की और सर्वत्र अमरित्मई किर्णों का विस्तार
23:08किया
23:10चंद्रमा की उन्शीतल अम्रित किर्णों के स्पर्ष से प्रित्वी पर अनेक प्रकार की संजीवनी ओश्धिया और दिव्य वनस्पतिया उत्पन्न हुई
23:20सोंदेव के इस मंगलकारी प्राकट्य को देखकर देवगण, महर्शी और गंधर्व परम प्रसन्न होकर ब्रहमलोक में एकत्र हुए
23:29भगवान ब्रहमा ने वेद मंत्रों की पावन ध्वनी और मंत्रों चार के बीच चंद्रमा का भव्य राज्याभिशेक संपन्न किया
23:37पितामा ब्रहमा ने चंद्रमा को समस्ट नक्षत्रों, औश्धियों और ब्रहमनों का अधिपती और समराट घोशित किया
23:4727 नक्षत्र रूपी दिव्य देविया चंद्रमा की स्वामिनी और सहचरी बनकर उनके दिव्य दर्बार की शोभा बढ़ाने लगी
23:5527 चंद्रमा के शीतर प्रकाश ने संसार के ताप और अंधकार को नश्ट कर समस्ट प्राणियों के हृदय को सुख
24:03और शांती प्रदान की
24:0427 इस प्रकार देवराज चंद्रमा के राज्याभिशेक के साथ ही भारतिय वैदिक इतिहास में परम प्रतापी और पवित्र सुम्वंश का
24:13उदे हुआ
24:15अपार सौंदर्यत, सर्वोच सत्ता और देवगणों की निरंतर स्तुती से चंद्रमा के मन में धीरे-धीरे सुक्ष्म अहंकार का बीजारोपन
24:24होने लगा
24:25धीरे-धीरे इस दंभ ने चंद्रदेव के विवेक को पूरी तरह आच्छा दित कर दिया और वे धर्म के गूर
24:32पाठों तथा नैतिक मर्यादाओं को भूलने लगे
24:36एक दिन चंद्रदेव ज्यान और धर्म के भंडार देवगुरू ब्रहस्पती के पावन और शांट आश्रम में पधारे
24:44वहां चंद्रदेव की द्रिष्टी देवगुरु ब्रिहस्पती की अत्यंत रूपवती, शीलवती और पतिवर्ता पत्नी माता तारा पर पड़ी
24:53तारा के अनुपम लावन्य और अलौकिक आभामंडल को देखकर चंद्रमा का चित विचलित हो उठा और वे अनुचित कामवासना के
25:01वशीभूत हो गए
25:04मोहांध होकर चंद्रमा अपने उच्चिपद, देवगुरु के प्रतियादर और समस्त धर्म शास्त्रों के ज्यान को पूर्णत विस्मृत कर बैठे
25:13कामबान से बींधे चंद्रमा ने सर्वता अनुचित आचर्ण करते हुए माता तारा के समक्ष अपने मोह और आसक्ती को प्रकट
25:21किया
25:23देवी तारा ने चंद्रमा के इस नीच प्रस्ताव को ततकाल ठुकराते हुए उन्हे धर्म, गुरु मर्यादा और इसके भयंकर परिणामों
25:31का स्मरण कराया
25:33किन्तु अहंकार और कामवासना के अंधकार में डूबे चंद्रमा पर तारा की धर्म पूर्ण चेतावनियों का कोई प्रभाव न पड़ा
25:42धर्म का घोर उलंगन करते हुए चंद्रमा ने बलपूर्वक तारा का हाथ थाम लिया और मर्यादा की समस्थ सीमाओं को
25:50छिन्न भिन्न कर दिया
25:53पतिवर्ता देवी तारा ने स्वयन को छुडाने का निश्फल प्रयास करते हुए चंद्रमा के इस कुकृत्य का तीवर विरोध किया
26:01चंद्रदेव ने तारा के क्रंदन की तनिक भी परवाह न करते हुए उन्हें जबरन अपने दिवय चांदी के रथ में
26:08बैठाया और उर्चले
26:10जब देवगुरु ब्रहस्पती अपने आश्रम लोटे तो उन्हें संपूर्ण परिसर में केवल शांती का सन्नाटा और अनिश्ट का भान हुआ
26:20अपनी साध्वी पतनी के अफ़रण का सत्य जानकर ज्यानी देवगुरु ब्रहस्पती का हृदय तीवर क्रोध और संताप से प्रजवलित हो
26:28उठा
26:29अत्यंत क्रुद्ध होकर देवगुरु ब्रहस्पती ततकाल चंद्रमा के भव्य राजप्रासात पहुँचे और अपनी धर्म पतनी को लोटाने का कठोर आदेश
26:39दिया
26:41आमकार के मद में चूर चंद्रमा ने अपने गुरु देव के आदेश का उफास उड़ाया और देवी तारा को वापस
26:48सौंपने से साफ इनकार कर दिया
26:51चंद्रमा की इस धृष्टता पर परम ज्यानी ब्रहस्पती ने अत्यंत कुपित होकर उन्हें धर्मभरष्ट और महापापी होने का भयंकर शाप
27:00दिया
27:00गुरु पत्नी के अपहरण के इस घ्येनित महापाप की गुंजायमान तरंगों से तीनों लोक भयभीत होकर कामपने लगे
27:10स्वर्गलोक में देवराज इंद्र और समस्त देवता चंद्रमा के इस धर्म विरुद्ध आचर्ण को देखकर अत्यंत स्तब्ध और चिंताकुल हो
27:18गए
27:19चंद्रमा के इस दुस्साहस और ताराहरण के महापाप ने एक विनाशकारी ब्रहमांडिय महासंग्राम की आधारशिला रख दी
27:29देवराज इंद्र ने देवगुरु ब्रहस्पती के सम्मान और धर्म की पुनरस्थापना के लिए अपनी विशाल देवसेना के साथ युद्ध का
27:37शंकनाद कर दिया
27:39दूसरी और असुरगुरु शुक्राचार्य ने अपने तपोबल और अहंकार के वशीभूत होकर चंद्रमा का पक्ष लेते हुए असुरों को इस
27:48युद्ध में सम्मिलित होने का आदेश दिया
27:51भयानक रूप वाले दानवों और दैतियों का समोह अपने विशाल गदाओं और त्रिशूलों के साथ चंद्रमा की सहायता हेतु रणभूमी
28:00में आडटा
28:01अंतरिक्ष के विशाल प्रांगण में देव और दानव सेनाए एक दूसरे से टक्राई जिससे संपूर्ण ब्रहमांड भयानक गर्जना से गुझ
28:10उठा
28:11दोनों और से भयंकर अस्त्रशस्त्रों और दिव्यास्त्रों का प्रहार होने लगा जिससे आकाश में सहसरों सूर्यों के समान विनाशकारी ज्वालाय
28:21प्रजवलित हो गई
28:23एरावत हाथी पर सवार देवराज इंद्र अपने देधी प्यमान वजर से असुरों की पम्तियों को छिन्न भिन करने लगे
28:31असुर्गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या और आसुरी माया का प्रयोग करके रनभूमी में अंधकार और भ्यम का मायाजाल फैला
28:40दिया
28:42चंद्रमा ने भी अपने दिव्यध हनुष से बानों की वर्षा करते हुए देवताओं के तीवर प्रहारों का डटकर सामना किया
28:49युद्ध के विक्राल द्रिश को देखकर देवगुरु ब्रहस्पती ने वेद मंत्रों के उच्चारण द्वारा देवताओं की शक्ती और मनोबल को
28:58द्विगुनित कर दिया
29:00कैलास परवत से भगवान शिव इस महा विनाशकारी युद्ध को चिंताकुल नेत्रों से देखते हुए ब्रहमांड के अस्तित्व के लिए
29:08चिंतित्वो उठे
29:10महा युद्ध के तीवर प्रभाव से दिशाय डोलने लगी, नदिया और समुद्र उबलने लगे तथा ग्रहनक्षत्र अपने पत से विचलित
29:19होने लगे
29:21स्वर्ग लोग के गंधर्व, अपसराय और रिशी मुनी इस प्रल्यंकारी द्रिश्य को देख कर भै से कापते हुए रक्षा के
29:28लिए पुकारने लगे
29:30स्थिती को बेकाबू होते देख परमपिता ब्रहमा अपने हंस वाहन पर सवार होकर दिव्य जोती के साथ युद्ध भूमी के
29:38मध्य प्रकट हुए
29:40ब्रहमा जी ने अपने गंभीर स्वर में घोशना करते हुए चंद्रमा और शुक्राचार्य को तुरंत यह अधर्मपूर्ण युद्ध रोकने की
29:48चेतावनी दी
29:50उसी क्षन ब्रहमांड के पालनहार भगवान श्री हरी विश्नु पक्षी राज गरूर पर विराजमान होकर अपने अलोकिक नीले तेजोमय रूप
29:59में अवत्रित हुए
30:01भगवान विश्नु के हाथ में घूमते हुए सुदर्शन चक्र की सहस्त्रों ज्वालाओं ने दोनों सेनाओं के अस्त्रशस्त्रों को निश्प्रभ कर
30:09दिया
30:10श्री हरी ने कठोर वानी में चंद्रमा को गुरुपतनी तारा को सहसम्मान लोटाने का आदेश देते हुए धर्म की मर्यादा
30:18का स्मरण कराया
30:20भगवान विश्नु के महातेज और ब्रहमा जी की आग्या को देख कर शुक्राचार्य ने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए चंद्रमा को तारा
30:29को लोटाने की सलाह दी
30:31लजजित और पराजित चंद्रमा ने देवी तारा को सादर लाकर देवगुरु ब्रहस्पती के समक्ष समर्पित कर दिया
30:39देव गुरु ब्रिहस्पती द्वारा तारा को स्वीकार करने के पश्चात तारकामय संग्राम समाप्थ हुआ और श्री हरी विश्णु ने समस्त
30:48लोकों को शांती का आशिरवाद दिया
30:52देवगुरु ब्रिहस्पती के आश्रम में लोटने के कुछ समय पश्चात देवी तारा के गर्भ में पल रहे दिव्य तेजस्वी शिशु
30:59का प्रभाव संपूर्ण वातावर्ण में परिलक्षित होने लगा
31:03शिशु के अलोकिक तेज को देखकर देवगण और ब्रिहस्पती दुविधा में पढ़ गए और उन्होंने तारा से उस भावी संतान
31:11के वास्तविक पिता के बारे में पूछा
31:15देवगुरु और देवताओं के समक्ष देवी तारा ने लज्जा त्याग कर सत्य प्रकट किया कि यह दिव्य शिशु चंद्रमा का
31:22ही अंश है
31:25तत्पश्चात देवी तारा ने एक परम तेजस्वी और रूपवान बालक को जन्म दिया जिसकी कांती से दसों दिशाय प्रकाशित हो
31:33उठी
31:34बालक के अध्वितिय सौंदर्य और अतुल्निय तेज को देखकर चंद्रमा ने अत्यंत प्रसंता पूर्वक उसे अपना पुत्र स्विकार कर लिया
31:44सरवग्य ब्रहमाजी ने बालक की अगाध बुद्धी और विद्वत्ता को देखकर उसका नामकरण बुद्ध किया जो बुद्धी और ज्यान के
31:53प्रतीक बने
31:54समय के साथ बुद्ध एक अत्यंत ज्यानी सुन्दर और तपोनिष्ठ राजकुमार के रूप में विक्सित हुए जिनकी ख्याती समस्त लोकों
32:03में फैल गई
32:05दूसरी और व्यवस्वक मनू की संतान इला जो अत्यंत रूपवती और धर्मात्मा थी अपनी नेती के मार्ग पर अग्रसर हो
32:13रही थी
32:15एक समय दिव्यवनों में भ्रमन करते हुए इला का साक्षातकार तपोनिष्ठ और परमज्ञानी बुद्ध से हुआ
32:23शांत और सुरमय प्राकृतिक वातावर्ण में बुद्ध और इला के बीच एकात्म और आत्मी प्रेम का बीजारोपन हुआ
32:32महर्शियों और देवों की उपस्थिती में बुद्ध और इला का पवित्र धर्म विवाह संपन हुआ जिसने एक नए वंश की
32:39नीम रखी
32:41विवाह के पश्चात इला ने एक अत्यंत वीर, तेजस्वी और कांतिमान पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम पुरूर्वा रखा गया
32:50पिता बुध ने बालत पुरूर्वा को समस्त वेद, शास्त्र, धनुर्विद्या और राजधर्म की गूड़ शिक्षा प्रदान की
32:59युवावस्था में पुरूर्वा ने कठोर तपस्या करके देवताओं से अमोग अस्त्रशस्त्र और सार्वभौम समराट बनने का वर्दान प्राप्त किया
33:08प्रयाग राज की पवित्र भूमी पर अत्यंत वैभवशाली अनुष्ठानों के साथ पुरूर्वा का चक्रवर्ती समराट के रूप में राज्या भिशेक
33:17हुआ
33:18देवराज इंद्र और समस्त देवगणों ने आकाश से पुष्पवर्शा करते हुए समराट पुरूर्वा के पराक्रम और धर्मनिष्ठा की भूरी-भूरी
33:27प्रशन साकी
33:28इस प्रकार समराट पुरूर्वा के सिन्हास नारोहन के साथ ही महान और पवित्र सोमवंश चंद्रवंश का आपचारिक प्रारंब हुआ
33:38इसी सोमवंश की पावन परंपरा में आगे चलकर ययाती, दुश्यंत, भरत, शांतनों, पांडव और कौर्वों जैसे महान प्रतापी राजाओं का
33:47जन्म होना निश्चित हुआ
33:50भगवान विश्नु के आशिर्वाद और ब्रहम देव के निर्देश से चंद्रवंश की यह गाथा धर्म और नीती की रक्षा के
33:57लिए संपूर्ण भारतवर्ष में प्रतिश्थित हुई
34:02सुर्यवंश की पूर्णता और सोमवंश के इस गौरवशाली उदे के साथ ही स्रिष्टी का यह नवीन युग इतिहास के पन्नों
34:09में स्वर्नाक्षरों में अंकित हो गया
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