इस महाकाव्य एपिसोड में, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद के महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आते हैं। धृतराष्ट्र के वनगमन के बाद, महाराज युधिष्ठिर राज-पाठ परीक्षित को सौंपकर, अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ महाप्रयाण का मार्ग अपनाते हैं, हिमालय की ओर। इसी बीच, कलयुग का आगमन होता है, और महाराज परीक्षित को धर्म को बचाने के लिए कलि पुरुष से लोहा लेना पड़ता है। यह एपिसोड धर्म, त्याग और आने वाले कलयुग की चुनौतियों को दर्शाता है और भविष्य के बड़े संघर्षों की नींव रखता है। #BhagavataPurana #Mahabharata #KaliYuga #KingParikshit #Pandavas #Mahaprasthana #Dharma #SpiritualJourney #HinduMythology
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00घृत्राश्ट्र, गांधारी और कुंती के वन्गमन के पश्चात सूने पड़े हस्तिनापूर के वैभव को महाराज युधिष्थिर ने अत्यंत भारी मन
00:08से पुनह संभाला।
00:11भले ही पांडवों ने राजपाट ग्रहन कर लिया था, किन्तु कुरुवंश के इस सूने महल में अब भी बीते युद्ध
00:18और अपनों के खोने की गहरी उदासी व्याप्त थी।
00:22धर्मराज युधिष्थिर के मन की इस दुविधा को दूर करने के लिए चारो भाईयों ने उन्हें राजधर्म का पालन करने
00:30और प्रजा के रक्षक बनने का स्मरण कराया।
00:34राज्यों की सुरक्षा और सुशासन के लिए अंत्य महाराज युधिष्थिर का आपचारिक राज्याभिशेक समारो अत्यंत भव्यता के साथ प्रारंभ हुआ
00:44पवित्र वैदिक मंत्रो चार और यग्य की दिव्य आहुतियों के बीच महाराज युधिष्थिर ने प्रजा के कल्यान की धर्म प्रतिग्याली
00:54सिन्हासन पर विराज मान होकर युधिष्थिर ने अपनी प्रजा को आश्वस्त किया कि उनका हर निर्ने केवल और केवल सत्य
01:02और न्याय की कसोटी पर ही कसा जाएगा
01:05महारानी द्रौपदी ने भी अपने समस्त कष्टों को भुला कर राजधर्म को सर्वोपरी मानते हुए महाराज का पूर्ण सहयोग करने
01:14का निश्चय किया
01:16हस्तिनापूर की प्रजा ने अपने प्रिय और धर्म प्रायन राजा का जयगोश किया जिससे संपूर्ण आकाश गूझ उठा
01:25भीमसेन ने सेनाप्ती और अन्नदाता की भूमिका निभाते हुए राज्य के निर्धनों और वंचितों के लिए अन्न और धन के
01:33भंडार खोल दिये
01:35महाबाहु अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष की प्रत्यंचा चड़ा कर राज्य की सीमाओं को अभेद्य और पूर्णत्य सुरक्षित कर दिया
01:43नकुल और सहदेव ने राज्य की शासन व्यवस्था और न्याय प्रणाली को पुन स्थापित कर प्रत्येक नागरिक के लिए समान
01:52अधिकार सुनिश्चित किये
01:54इस नए युग के उदे के साथ राज्य महल के भीतर नन्हें परीक्षित पालने में मंदमंद मुस्कुरा रहे थे जो
02:02कुरुवंश के भविश्य का एक मात्र संबल थे
02:06महाराज युधिष्ठिर और महाराणी द्रौपदी ने बालक के समीप जाकर उसके शांट और तेजस्वी मुख को अत्यंत वात्सल्य भाव से
02:14निहारा
02:16इसी शुब अवसर पर दिव्य आभा से युक्त परम ज्यानी महर्शी वेदव्यास का हस्तिनापूर के राजगरबार में शुभागमन हुआ
02:25महर्शी व्यास ने पांडवों को उपदेश देते हुए कहा कि समय निरंतर परिवर्तनशील है और उन्हें कलियुक के आगमन के
02:34लिए तैयार रहना चाहिए
02:36युधिश्थिर ने आदर पूर्वक बालक परीक्षित को महर्शी व्यास के चर्णों में लाकर उनसे दिव्य आशिर्वाद और मार्क दर्शन की
02:44प्रार्थना की
02:46महर्शी व्यास ने भविश्यवाणी की की यह बालक परम प्रतापी, अत्यंत धर्म प्रायन और महाराज युधिश्थिर की भांती ही एक
02:55न्यायप्रिय समराट बनेगा
02:57इस शुब भविश्यवाने के बाद महाराज युधिष्थिर ने बालक परीक्षित को हस्तिनापुर का भावी उत्तराधिकारी और युवराज घोशित कर दिया
03:07इस घोशना को सुनकर प्रजा का उत्साह चरम पर पहुँच गया और नगर के कोने-कोने में उत्सव का बातावर्ण
03:14छा गया
03:16महाराज युधिष्थिर ने संतोष की सांस ली क्योंकि वे जानते थे कि जब तक धर्म जीवित है तब तक उनके
03:24वन्ष का यह उत्तराधिकारी सदा सुरक्षित रहेगा
03:28इसके पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने महाराज युधिष्थिर और समस्थ पांडवों को द्वार का लोटने के अपने निर्ने से अवगत
03:37कराया
03:38द्वार का धीश के प्रस्थान का समाचार सुनते ही माता कुंती और सुभदरा के नेत्रों में विरह के अश्रुच हलक
03:45आए
03:47अपने प्राणप्रिय सखा श्री कृष्ण का हाथ थामकर अर्जुन भाव विभोर हो गए और उनके मुख से विदाई के शब्द
03:54भी न निकल सके
03:57महारानी द्रौपदी ने भी भगवान श्री कृष्ण के समक्ष हाथ जोड कर उनके द्वारा सदैव की गई रक्षा और कृपा
04:04के लिए कोटी-कोटी धन्यवाद अर्पित किया
04:08ध्राता भीम्त नकुल और सहदेव ने अत्यंत भारी मन से द्वार काधीश के चरण कमलों में अपना शीश नवाया
04:16भगवान श्री कृष्ण ने महाराज युधिश्ठिर के कंधे पर वात्सल्य पूर्वक हाथ रखकर उन्हे धर्म के पालन और अनासक्ती का
04:25अंतिम अमर संदेश दिया
04:27इसके बाद प्रभु ने अर्जुन को स्मरण कराया कि यह संसार और इसके संबंध केवल एक लीला हैं तथा आत्मा
04:35का परम लक्षे केवल मुक्ती है
04:39माता कुंती ने कानहा के चर्णों में प्रणाम करते हुए यह प्रार्थनाकी की विपत्ती हो या संपत्ती उनका मन सदा
04:47केवल श्रीकृष्ण के ध्यान में ही मगन रहे
04:51तत्पश्चात दारुक द्वारा चलाए जा रहे सुवर्ण रत पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापूर की अश्रुपूरित प्रजा को अंतिम आशीश
05:00देने लगे
05:01देखते ही देखते द्वार काधीश का वह दिव्य स्वर्ण रत हस्तिनापूर के विशाल द्वारों को पार कर संध्या की स्वर्णिन
05:09क्षितिज रेखा में उज़ल होने लगा
05:12महल के उचे जरोखों पर खड़े पांचों पांडव एक तक द्रिष्टी से दूर उरती धूल के कणों को देखते रहे
05:20जैसे ही श्रीकृष्ण की अनुकृती द्रिष्टी से दूर हुई हस्तिनापूर के विशाल प्रांगण में एक गहरा आध्यात्मिक शून्य और असीन
05:29निरवता छा गई
05:31महाराज युधिष्ठिर ने सूने सिनहासन कक्ष में टहलते हुए अनुभव किया कि कानहा के बिना यह राजसी वैभव और मुकुट
05:39केवल एक भारी दायत्मात्र है
05:43गांडी वधारी अर्जुन ने अपने धनुष को निहारते हुए यह सत्य स्विकार किया कि उनके धनुर्विद्या का सारा बल वास्तव
05:51में केवल श्री कृष्ण की दिव्य सत्ता ही थी
05:55राजप्रसाद के एकांट ग्रिह में एकत्रित होकर पाँचों भाईयों और माता कुंती ने यह विचार किया कि प्रभो की इस
06:03भूलोक पर अवतार लीला अब पूनता की ओर है
06:07उसी समय हस्तिनापूर की सीमाओ पर कल्यव के आगमन के सुक्ष्म और भयानत लक्षन स्पष्ट दिखाई देने लगे
06:15इन अलोकिक संकेतों को पहचान कर धर्मराज युधिष्ठिर को यह आभास हो गया कि अब उनके भी इस भौतिक संसार
06:23को त्यागने का समय निकट आ गया है
06:27पांचो पांडवों ने परस पर एक दूसरे का हाथ ठाम कर सांसारिक बंधनों और राजसी सुखों से मुक्त होकर महाप्रस्थान
06:35का मन बना लिया
06:38दूसरी ओर राजप्रांगन में निर्भैता से खेलता ननहा परीक्षित कुरुवंश के पुलुत्थान और आने वाले नए युग की भावी जोती
06:46बनकर चमक रहा था
06:48और पांडव अपने अंतर्मन को पूर्णत है भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में लीन करके अपनी अंतिम आध्यात्मिक यात्रा की
06:56पूर्वसंध्या में ध्यान मगन हो गए
07:00प्रातयकाल की पहली किरण के साथ समराट युधिष्ठिर परमध्यान से जागरित हुए और उनके मुख मंडल पर संसार से पूर्ण
07:08विरक्ती का अलौकिक प्रभाव दिखाई देने लगा
07:12महाराजा युधिष्ठिर ने अपने जीवन के अंतिम राजसी कर्तव्य को पूरा करने हेतु हस्तिनापुर के भव्य राजसभा मंडप में एक
07:20आपात कालीन विशेश सभा का आयोजन किया
07:24राजसभा में उपस्थित सभी मंत्रियों और गुरुजनों के समक्ष युधिष्ठिर ने अपने सन्यास और महाप्रस्थान के कठोर निर्नय की घोशना
07:33कर सब को स्तब्ध कर दिया
07:36युधिष्ठिर के वचनों को सुनकर पूरे राजदर्बार में मौन छा गया और वयोवरिध गुरु कृपाचार्य सहित समस्थ सभासदों की आखें
07:45वियोग की वेदना से नम हो गई
07:48युधिष्ठिर ने बालक परीच्षित को राजसिनहासन पर बैठा कर कुरुवंश के इस नन्हे चिराग का मस्तक चुमते हुए उसे हस्तिनापुर
07:56का नया समराट घोशित किया
07:59नन्हे राजा परीच्षित के संरक्षन और उन्हे धर्म नीती तथा अस्त्रशास्त्र की शिक्षा देने का महान दायत्व पूज्य गुरु कृपाचार्य
08:08को सौपा गया
08:10पवित्र वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच राजसुय मंडप में नन्हे परीच्षित का भव्य राज्याभिशेक संपन्न हुआ और समस्ट शक्तिया
08:19नए राजा को हस्तांतरित कर दी गई
08:23राज्याभिशेक के तुरंत बाद पांडवों ने अपने मस्तक से सुवर्ण मुकुट उतार दिये और दिव्य आभुष्णों तथा राजसी वस्त्रों का
08:31सर्वता त्याग कर दिया
08:33महारानी द्रौपदी ने भी अपनी दासी दासियों को विदा करके अपने अमूल्य आभुष्णों को उतार फेका और वैराग्यका मार्ग स्विकार
08:42कर लिया
08:44पाचो पांडव और द्रौपदी अब राजसी ठाटबाट छोड़ कर केवल व्रिक्षों की छाल से बने वलकल वस्त्रधारन किये हुए एक
08:52सन्यासी के रूप में खड़े थे
08:55जैसे ही पांडवों ने प्रस्थान के लिए पहला कदम बढ़ाया वैसे ही एक निष्ठावान श्वान राजप्रांगण में प्रकट होकर उनके
09:03साथ चलने लगा
09:06हस्तिनापूर के नगरवासी अपने प्रियराजाओं को सन्यासी के रूप में महल छोड़ते देखकर सडकों पर उमड़ पड़े और चीतकार करते
09:14हुए रोने लगे
09:16समराट युधिष्ठिर ने अपनी अंतिम यात्रा पर जाने से पूर्व अश्रुपून प्रजाजनों को हाथ उठा कर आशिरवाद दिया और उन्हें
09:25धर्म के मार्क पर चलने का संदेश दिया
09:29हस्तिनापूर के विशाल द्वारों को पीछे छोड़ कर पांडव और द्रौपदी उत्तर दिशाकी और हिमालय के दुर्गम शिखरों के लिए
09:36महाप्रस्थान पत्थ पर निकल पड़े
09:40पांडवों के प्रस्थान करते ही आकाश में काले और दरावने बादल घिरने लगे जो संसार में कल्युग के आगमन का
09:47अनिष्टकारी संकेत दे रहे थे
09:51चायाओं में छिपा हुआ कल्युग का भयानक पुरुश्रूप श्रीकृष्ण के जाने और धर्म के कमजोर होने की प्रतीक्षा में अपनी
09:58राक्षसी मुस्कान बिखेर रहा था
10:02युधिष्ठिर ने वातावर्ण में तैर्ती हुई कल्युग की ठंडी और अधार्मिक आहट को महसूस किया और मन ही मन भगवान
10:09श्रीकृष्ण के नाम का जाप करने लगे
10:13सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़ कर पांडव अडिक संकल्प के साथ बीहर जंगलों, गर्जनाकर्ती नदियों और बर्फ से ढकी पहाडियों
10:21को पार करते गए
10:24उधर हस्तिनापूर के उचे प्रासाद से नए समराथ परीक्षित अपने पूर्वजों को दूर क्षितिज में उज़ल होते हुए गहरी आत्म
10:32प्रेना से देख रहे थे
10:34हाथ में धनुष थामकर महाराज परीक्षित ने अपने राज्य और धर्म की रक्षा करने तथा कल्यप के दुश्प्रभावों को मिटाने
10:43का द्रिड संकल्प लिया
10:45महाराज परीक्षित ने हस्तिनापूर की राजसभा में अपनी न्याय प्रियता और धर्म प्रायन शासन की घोशना की, जिससे पूरी प्रजा
10:54में अटूट सुरक्षा और संतोष का भाव जाग उठा
10:58गुरु कृपाचार्य और महात्मा युयुत्सु ने तरोन समराट को राजधर्म के गूढ रहसियों की दीख्षा देते हुए उनके संकल्प को
11:06और अधिक सुद्रेड और न्याय संगत बनाया
11:10उधर अनंत काल के गंतव्य की ओर बढ़ते हुए पाचो पांडव और द्रौपदी हिमालय की तुशार्मंडित चोटियों के बीच एक
11:18भयंकर बरफीले तूफान का सामना कर रहे थे
11:22इस अत्यंत दुर्गम और निर्जन बरफीले मार्ग पर चलते हुए अचानक एक रहस्य में श्वान उनके पीछे पीछे चलने लगा
11:30जो उनकी इस अंतिम यात्रा का एक मात्र साक्षी था
11:35महाप्रयान की इस अत्यंत कठिन और अलौकिक परीक्षा में सबसे पहले महारानी द्रौपदी का शरीर शिथिल पड़ गया और वे
11:44बर्फ की शीतल चादर पर गिर पड़ी
11:47व्याकुल होकर भीम ने द्रौपदी के पतन का कारण पूछा जिस पर धर्मराज युधिश्थिर ने बताया कि अर्जुन के प्रती
11:55उनका विशेश लगाव ही उनके इस पतन का कारण बना
11:59बिना पीछे मुड़े अपनी यात्रा जारी रखते हुए कुछ ही दूरी पर परम ज्यानी सहदेव अपने ज्यान के सुक्ष्म अभिमान
12:07के कारण संतुलन खोकर बर्फ में समा गए
12:11रूप और सौंदर्य में अद्वितिय नकुल भी अपने अतिशय रूप गर्व के बोज तले दबकर उस अनन्त बर्फीली खाई में
12:18गिर पड़े
12:20गांडीव धारी अर्जुन जो अपनी सर्वश्रिष्ट धनुर विद्या पर गर्व करते थे अपनी सांसारिक सीमाओं को स्विकार करते हुए अचानक
12:29उस बर्फीले शिखर पर धराशाई हो गए
12:33अंतह अपने असीम शारिरिक बल पर गर्व करने वाले महाबली भीम भी अपनी शक्ती के अभिमान के कारण भारी गर्जना
12:41के साथ हिम्शिला पर गिर पड़े
12:44समस्थ सांसारिक बंधनों और मोहमाया से सर्वता मुक्त होकर केवल धर्मराज युधिष्थिर उस रहस्य में श्वान के साथ सुमेरु परवत
12:53की ओर बढ़ते रहे
12:55हस्तिनापुर में महाराज परीक्षित ने प्रजा के कल्यान और सुक्सम्रिधी के लिए पवित्र अगनी में आहुती देते हुए एक भव्य
13:03अश्वमेध यग्यका शुभारंब किया
13:06उसी समय परमपूज महर्शी वेदव्यास ने राजसभा में प्रकट होकर परीक्षित को आशिरवाद दिया और उन्हें आगामी कल्यक के अंधकार्मई
13:16प्रभाव से सावधान रहने का निर्देश दिया
13:20उधर सुमेरु परवत के सर्वोच शिखर पर अचानक आकाश बादलों को चीर्ता हुआ स्वर्ण में आभासे चमक उठा और इंद्रदेव
13:29का दिव्यरत वहां उत्रा
13:31देवराज इंद्र ने रत से उतर कर महाराज युधिश्थिर का स्वागत किया और उन्हें सदे सीधे स्वर्गलोग चलने का आदरपूर्वक
13:40आमंत्रन दिया
13:42युधिश्थिर ने उस वफादार श्वान को भी अपने साथ ले जाने की शर्ट रखी परंतु इंद्र ने एक सामान्य पशु
13:50को स्वर्ग में प्रवेश देने से स्पष्ट मना कर दिया
13:54अपने शर्णागत का परित्याग करने को महापाप बताते हुए युधिश्थिर में स्वर्ग के सुखों को ठुकराने और श्वान के साथ
14:02रहने का अडिग निर्णय लिया
14:03उसी क्षण वहश्वान अपने वास्तविक दिव्यस्वरूप में प्रकट हुआ जो स्वयन साक्षात धर्मराज यम थे और उन्होंने युधिश्थिर की सत्यनिष्ठा
14:14की प्रशनसा की
14:16देवताओं द्वारा बरसाए गए पुश्पों और मधुर संगीत के बीच धर्मराज युधिश्थिर सदे इंद्र के दिव्यरत में बैठकर परमधाम की
14:25ओर प्रस्थान कर गए
14:26अब हस्तिनापूर के भव्यस इनहासन पर विराजमान समराट परीक्षित ने अपने पूर्वजों की कीर्ती को अक्षुन रखते हुए कल्युप के
14:36विरुध धर्मयुध की पूरी तैयारी कर ली थी
14:40हस्तिनापूर की प्रजाने समराथ परीक्षित के न्यायपूर्ण शासन में एक नए स्वर्ण युग का अनुभव किया
14:46जहां धर्म की पता का हर दिशा में उची लहरा रही थी और चारों और शान्ती व्याप्ट थी
14:54उनके शासनकाल में खेतों में भरपूर फसले लहल हाती थी, नदिया निर्मल जल से परिपूर्ण थी और सभी प्राणी बिना
15:02किसी भय के सुक्षान्ती से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे
15:07परंतु इस स्वर्णिम शान्ती के भीतर, काल के अद्रिश्य हाथों ने एक सुक्षम पर घातक परिवर्तन की आहट भरना शुरू
15:14कर दिया था, जैसे दूर क्षितिच पर उमरते काले बादल
15:19समराट परिक्षित अपनी दिव्य अंतरग्रिष्टी से भावी संकट को भाप गए थे और जानते थे कि कल्यब का आगमन अब
15:27निकट है, जो धर्म की नीम को हिलाने आ रहा है
15:32उन्होंने रिशिमुनियों से गहन विचार विमर्ष किया, जो अपनी तपस्या के बल पर आने वाले अंधकार युग की चेताबनी दे
15:40रहे थे और धर्म की रक्षा के उपाई सुझा रहे थे
15:44समराट ने प्रतिग्या ली कि वह अपने पूर्वजों की भांती धर्म की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व नियोचावर कर देंगे, भले
15:52ही इसके लिए उन्हें स्वयंकाल से ही क्यों न युद्ध करना पड़े
15:57एक दिन जब समराट अपने राज्य की सीमाओ पर आखेट के लिए निकले थे, तो उन्होंने एक विचित्र और भयावध
16:05द्रिश्य देखा जिसने उनके हृदय को विचलित कर दिया
16:09उन्होंने देखा कि एक क्रूर और अधर्मी आकरिती, जिसकी आखों में दुष्टता चमक रही थी, एक नहसहाय बैल और गाय
16:18को अमानविय धंग से प्रताडित कर रही थी
16:21बैल जो की स्वय धर्म का प्रतीक था, तीन पैरों पर खड़ा था और चौथा पैर अधर्मी के वार से
16:28खंडित हो चुका था, जबकी गाय प्रित्वी माता का स्वरूप अश्रुधारा बहा रही थी
16:34यह द्रिश देखकर समराट परीक्षित का क्रोध ज्वाला मुखी की तरह भड़क उठा और उन्होंने तुरंट अपनी तलवार खीच कर
16:43अधर्मी को ललकारा
16:45परीक्षित ने गरच कर पूछा, दुष्ट, कौन है तू जो मेरे राज्ज में धर्म और प्रित्वी को प्रताडित करने का
16:53साहस करता है
16:55तेरा अंत निश्चित है
16:58अधर्मी जो स्वय कल्यूग का साक्षात प्रतीक था, समराट के शौर्य और तेज से भयभीत होकर थर्थर कापने लगा और
17:07उसने प्राणों की भीख मांगी
17:10कल्यूग ने अपनी वास्तविक पहचान प्रकट करते हुए कहा कि वह काल चक्र का एक अनिवार्य भाग है और उसका
17:17आगमन विधी का विधान है, जिसे टाला नहीं जा सकता
17:22परीक्षित दुविधा में पड़ गए क्या वह कल्यूग का वध कर दें और स्रिष्टी के नैसर्गिक चक्र को बाधित करें
17:29या उसे सीमित स्थान देकर धर्म की रक्षा का मार्ग खोजें
17:34दयालू समराट ने कल्यूग के प्राणों को बख्ष दिया, परंतु उसे आदेश दिया कि वह केवल उनहीं स्थानों पर निवास
17:41कर सकता है, जहां अधर्म, पाखंड और पाप का बोलबाला हो
17:47कल्यूग ने जुआ, मदिरापान, परस्त्रीगमन, हिंसा और सोने में अपना वास मांगा, और समराट ने उसकी प्रार्थना स्विकार कर ली,
17:56परंतु इन स्थानों पर उसकी शक्ती को सीमित कर दिया
18:00इस प्रकार कल्यूग को इस प्रित्वी पर अपना स्थान मिल गया, और वह धीरे-धीरे उन निर्दिष्ट स्थानों से अपनी
18:07माया फैलाना शुरू कर दिया
18:10समराट परीक्षित विजी भाव से हस्तिनापूर लोटे, परंतु उनके मन में यह विचार घर कर गया था कि उन्होंने भले
18:18ही कल्यूग को सीमित कर दिया हो, पर उसे पूर्णतह मिटा नहीं पाए
18:23फिर भी उन्होंने द्रिड संकल्प लिया कि जब तक उनका शासन रहेगा, वह धर्म की पताका को अविचलित रखेंगे और
18:32कल्यूग के दुश्प्रभावों से अपनी प्रजा की रक्षा करेंगे
18:36और इस प्रकार धर्म के संरक्षक समराट परीक्षित ने कल्यूग के आरंभिक चर्णों में एक युग का सूत्रपात किया, जो
18:44आने वाले समय के लिए एक मिसाल कायम करने वाला था
18:49हस्तिनापुर के स्वर्णिम आकाश पर धीरे धीरे एक अद्रिश अंधकार चाने लगा, जिसने पांडवों के प्रस्थान के बाद प्रित्वी के
18:57सुरक्षा चक्र को कमजोर कर दिया था
19:01जब युधिष्ठिर और उनके भाईयों ने हिमालय की दुर्गम बरफीली चोटियों की ओर महा प्रयान किया, तो उनके साथ ही
19:08द्वापर युग का अंतिम तेज भी इस धरा से विदा हो गया
19:13पांडवों की अनुपस्थिती में सामराज्य का भार संभाल रहे महाराज परीक्षित ने अपने सिन्हासन पर बैठे हुए ही कल्यक के
19:21अद्रिश्य और भारी प्रभाव को महसूस किया
19:25सरस्वती नदी के तट पर बैल के रूप में साक्षात धर्म केवल सत्य रूपी एक पैर पर खड़ा होकर अपनी
19:32दैनिय स्थिती पर आसू बहा रहा था
19:36वही समीक बैठी गाय रूपी प्रिथवी देवी अपने आसूओं से धर्ती को सींच रही थी क्योंकि उन्हें कल्यक के बढ़ते
19:44क्रूर पंजों से अपनी संतान की चिन्ता सता रही थी
19:48अंधकार के उस संधीकाल में कल्युक के अधिपती कली पुरुष ने एक उजड़े हुए धर्मस्तंभ पर खड़े होकर विनाशकारी अट्ठास
19:57किया
19:59हस्तिनापूर के यग्य कुंडों से उठने वाली पवित्र सुवासित अगनी अचानक मंद होने लगी और उसमें से काले रंग का
20:06विशैला धुआ निकलने लगा
20:09नगर के व्यस्त बाजारों में व्यापारियों ने धीरे-धीरे सत्य का परित्याग कर दिया और अनुचित लाब के लिए जूठे
20:16मापों का उप्योग करना शुरू कर दिया
20:20तपोवनों के शांत वातावर्ण में ध्यानमगन रिशियों के मन भी वासना और मोह की अद्रिश्य तरंगों से विचलित होने लगे
20:28प्रजा की रक्षा के लिए प्रतिबध महाराज परिक्षित अपने स्वर्ण रत पर सवार होकर राज्य की सीमाओं का निरीख्षन करने
20:36निकल पड़े
20:38एक ग्राम की सीमा पर महाराज ने देखा कि एक संपन्न व्यक्ती भोजन के लिए गिड़गिडाते हुए व्रिध भिखारी को
20:46लात मार रहा था जो दया के अंत का प्रतीक था
20:51राजसभा में मुख्य जोतिशी ने जलती मशालों के नीचे महाराज को चेताबनी दी की ग्रहों की चाल कलिब के करूर
20:58आगमन को सुनिश्चित कर रही है
21:01नगर के चौराहे पर जमा हुए नागरिक भयभीत होकर उत्तर दिशाकी और उठती लाल बिजली की गड़गडाहट को देख रहे
21:09थे
21:10राजा द्वारा दी गई सीमाओ के भीतर कली पुरुष ने सोने, मदिरा, क्रोध और हिंसा के ठिकानों में अपना स्थाई
21:18बसेरा बना लिया
21:20राजसी खजाने के कोने में रखी एक अभिशप्ट स्वर्ण मुकुट से एक हलकी लेकिन खतरनाक बैंडनी आभा फूट रही थी,
21:28जो सही समय का इंतजार कर रही थी
21:32धर्म रूपी बैल कांटेदार जाडियों के बीच अपने अंतिम पैर पर डग्मगाने लगा, मानो पृत्वी का पूरा भार अब असहनिय
21:40हो गया हो
21:42महारज परीक्षित ने प्रजा की रक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ती लगा कर एक महारक्षा यग्य का आयोजन किया, ताकि
21:50कल्यग के प्रभाव को रोका जा सके
21:53राजा के अथक प्रयासों के बावजूद, राज्य की बाहरी सीमाओं पर कल्युग का काला साया धीरे-धीरे बस्तियों को अपनी
22:01चपेट में लेने लगा
22:03गंगा और यमुना के संगम पर एकत्र हुए संतों ने हाथ जोड़कर भगवान विश्नु से प्रार्थनाकी की वे इस आगामी
22:11अंधकार युग में मानवता की चेतना को जीवित रखें
22:15इस प्रकार कल्युग के आगमन की इस संधी बेला में महाराज परीक्षित धर्म की जलती हुई मशाल बनकर खड़े रहे
22:24जो आने वाले घोर अंधकार से टक्राने के लिए तयार थी
22:29महाराज परीक्षित ने अपने पूर्वजों के गौरवशाली सामराज्ज में धर्म की पुनरस्थापना करने और सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए
22:37दिगविजय यात्रा पर निकलने का ग्रिढ निश्चय किया
22:42हस्तिनापूर के मुख्यद्वारों से महाराज परीक्षित का स्वर्ण रत और चतुरंगिनी सेना धोलनगाडों की गूंच के साथ चारों दिशाओं में
22:50धर्म का ध्वच फहराने के लिए प्रस्थान कर गई
22:54विभिन राज्यों से होते हुए महाराज परीक्षित का भव्य स्वागत हुआ जहां उन्होंने स्थानिय शासकों से भेंट कर उन्हें सत्य
23:02और न्याय के मार्ग पर चलने का संदेश दिया
23:06महाराज परीक्षित के संरक्षण में पूरे आर्यावर्त में पुना वैदिक मंत्रों की गूंच सुनाई देने लगी और यग्यों की पवित्र
23:15अगनी से संपूर्ण वायुमंडल शुद्ध हो गया
23:18अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए महाराज परीक्षित पवित्र सरस्वती नदी के हरे भरे और शांत मैदानों में पहुँचे जहां
23:27दूर दूर तक केवल शांती का सामराज्य था
23:31अचानक महाराज की दृष्टी एक एकांत कोने पर पड़ी जहां एक अत्यंत कुरूप और काले रंग का व्यक्ति राजसी वेशभूशा
23:39धारन किये खड़ा था
23:41उस दुष्ट पुरुश के हाथ में एक विशाल गदा थी जिससे वह कुरूरता पूर्वक एक लाचार सफेद बैल पर प्रहार
23:49कर रहा था जो दर्च से कराह रहा था
23:52उस बैल के समीप ही एक अत्यंत दुर्बल और आसुओं से भरी हुई गाय खड़ी थी जो उस भयानक अत्याचार
24:00को देखकर थर-थर काप रही थी
24:03वह सफेद बैल और कोई नहीं बलकी स्वयन साक्षात धर्म थे जो कल्युग के प्रभाव से अपने तीन पैर खो
24:11चुके थे और केवल सत्य के एक पैर पर टिके थे
24:15वह दुर्बल और पीडित गाय साक्षात प्रिथवी देवी थी जो मनुश्यों के पापों और आसन्न कल्यव के अत्याचारों से अत्यंत
24:24व्याकुल और दुखी थी
24:27इस भयानक और हृदय विदारक ग्रिश्य को देख कर महाराज परीच्षित का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया और
24:35उन्होंने तुरंट अपने रत से चलांग लगा दी
24:39महाराज परीच्षित ने अपनी दिव्यधनुष और तलवार थामकर सिंग की तरह दहारते हुए उस पापी को ललकारा और उससे पशुओं
24:47पर अत्याचार करने का कारण पूछा
24:51महाराज परीच्षित का अत्यांत तेजस्वी और प्रतापी रूप देखकर वह क्रूर पुरुष भय से कामपने लगा और उसके हाथ से
24:59लोहे की गदा छूट कर जमीन पर गिर गई
25:03धर्म रूपी बैल और प्रित्वी रूपी गाय ने जब अपने रक्षक महाराज परीच्षित को देखा तो उनकी आखों में आशा
25:11की नई किरन जग्मगा हुठी
25:13जब उस दुष्ट ने देखा कि महाराज परीच्षित उसकी जीवनलीला समाप्त करने के लिए ततपर हैं तो वह तुरंट अपनी
25:21तलवार फिंक कर राजा के चर्णों में गिर गया
25:25महाराज परीच्षित ने अपनी तलवार को पीछे खीच लिया क्योंकि वे शर्णागत की रक्षा करने वाले एक न्यायप्रिय कुरुवन्शी राजा
25:34थे जो कभी निहत्थे पर वार नहीं करते थे
25:38कली पुरुष ने हाथ जोड़कर राजा से प्रार्थनाकी की वे ब्रहमा द्वारा रचित कल्यव के युग पुरुष हैं इसलिए उन्हें
25:46अपने सामराज्ज में रहने के लिए कोई स्थान प्रदान करें
25:50गेहन चिंतन के पश्चात महाराज परीक्षित ने कली पुरुष को केवल पांच दूशित स्थानों पर रहने की अनुमती दी ज्यूत
25:58क्रीडा, मध्यपान, कामुक्ता, हिंसा और सुवर्ण
26:03राजा की आग्या को स्वीकार करते हुए, कली पुरुष ने नमन किया और धीरे-धीरे अंधेरे की ओर प्रस्थान करते
26:11हुए उन पांच निशिद्ध स्थानों में विलीन हो गया
26:14कली पुरुष के प्रस्थान के बाद, महाराज परीक्षित ने धर्म रूपी बैल और पृत्वी देवी को सांत्वना दी और अपने
26:22सामराज्ज में पुनह शान्ती और न्याय की घोशना की
26:27धर्म रूपी बैल के खंडित अंगों को पुनह स्थापित करने हेतु महाराज परीक्षित ने सत्य, शौच, गया और दान रूपी
26:35चार स्तंभों का दिव्यस अंकल्प लिया
26:38पृत्वी रूपी गाय ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों से राजा परीक्षित की ओर देखा और भूमी पर पुनह सुक्सम्रिधी एवन शान्ती
26:46की आनंदमई वर्शा होने लगी
26:49अपने विजय अभियान को पूर्ण कर महाराज परीक्षित दिव्यस्वर्ण रत पर सवार होकर अपनी भव्य राजधानी हस्तिनापूर में प्रविष्ठ हुए
26:59हस्तिनापूर की प्रजाने द्वारद्वार पर दीख प्रजवलित कर और पुष्पों की वर्शा करके अपने न्यायप्रिय समराट का अभूत पूर्व स्वागत
27:08किया
27:09अपने पूर्वज पांडवों के रिधिवान स्वर्ण सिनहासन पर विराज मान होकर समराट परीच्षित ने धर्म की रक्षा और प्रजा के
27:17कल्यान की प्रतिग्याली
27:20राजसभा में उपस्थित क्रिपाचारिय और धौमे जैसे कुल्गुरूओं एवं प्रकांड रिशियों ने वेद मंत्रों के घोश के साथ युवा समराट
27:29को अपना आशिर्वाद प्रदान किया
27:32सामराज्य को पाप कर्मों से सर्वता मुक्त रखने हेतु महाराज परीच्षित ने गंगा के तट पर तीन महान अश्वमेध यग्यों
27:40का भव्य आयोजन किया
27:42प्रज्वलित यद्यकुंड की गगन्चुंबी अगनी शिखाओं में वेद पाठी ब्राहमनों ने मंत्रों चार के साथ पवित्र आहुतियां समर्पित की
27:52समराट परीच्षित की असीन भक्ती और निष्ठा से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र एवं अन्य देवता अग्रिश्य रूप में यग्यभाग ग्रहेन
28:01करने पधारे
28:02यग्य की पूर्णा हुती पर महाराज परीच्षित ने अंगिनत सुसज्जित गायों, सुवर्ण मुद्राओं और अन्नकादान निर्धन एवन सुलोग्य ब्राहमनों को
28:13किया
28:14महाराज परीच्षित की धर्म पत्नी महारानी इरावती ने पूर्ण निष्ठा और भक्ती भाव के साथ सभी धार्मिक अनुष्ठानों में सहधर्मिनी
28:23के रूप में भाग लिया
28:25महाराज परीक्षित के प्रभाव से कल्युग के आगमन के पश्चात भी पूरे आर्यावर्त में सत्युग के समान धर्म और शान्ती
28:33का सामराज जस्थापित रहा
28:36यद्यपी कली पुरुष उन पांच दूशित स्थानों में गुप रूप से निवास कर रहा था परंतु परीक्षित के भैसे वह
28:43सिर उठाने में पूर्णत्य असमर्थ था
28:47राजा परीक्षित सदैव भगवान श्री कृष्ण के उस परम स्वरूप का ध्यान करते जिन्होंने उनकी माता उत्तरा के गर्भ में
28:55ब्रहमास्त्र से उनकी रक्षा की थी
28:58वे अपने प्रपितामह महारथी अर्जुन और युधिश्थिर के महान आदर्शों का निरंतर स्मरण करते हुए धर्म के मार्ग पर निशकंप
29:07होकर चलते रहे
29:09राजा परीक्षित के अतिपवित्र शासन काल में हिंसक पशुभी अपनी स्वाभाविक शत्रुता भूलकर नदियों के घाट पर एक साथ जल
29:17पीते थे
29:20नैमिशारने के पवित्र तपोवन में सूत गोस्वामी जी इस आलोकिक गाथा को शौनक जी महाराज और असी हजार रिशियों को
29:28सुना रहे थे
29:30शौनक आदी सभी मुनिगन परीच्षित के धर्म विजय और भगवान श्री कृष्ण की अहेतु की क्रिपा की कथा सुनकर परम
29:37आनन्दित हो उठे
29:39सूत जी ने स्पष्ट किया कि जो भी मनुष्य कली पुरुष पर विजय पाने वाले परीच्षित के इस चरित्र का
29:46श्रवन करता है वह कल्यग के दूशित प्रभावों से मुक्त रहता है
29:51इस प्रकार महाराज परीच्षित संपूर्ण भूमंडल पर सत्य और धर्म का अमर ध्वच फहराते हुए धर्मराज के सच्चे उत्तराधिकारी सिद्ध
30:01हुए
30:02महाराज परीच्षित ने जब अपने दिग्विजय अभियान के दौरान धर्म रूपी व्रिशब और प्रित्वी रूपी गाय को एक नीच शूद्र
30:10रूपी कली द्वारा प्रताडित होते देखा तो उनका क्रोध भड़क उठा
30:16अपने प्रजा की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले महाराज परीच्षित ने तुरंत रत से उतर कर कली का
30:23बद करने के लिए अपनी चमकती हुई तलवार म्यान से खींच ली
30:28सामने साक्षात यमराज के समान तेजस्वी और क्रोधित राजा को देख कर कली थर-थर कामपने लगा और उसने तुरंत
30:36अपने हथियार फेंक कर महाराज के चर्णों में आत्मस्मरपन कर दिया
30:48कली ने रोते हुए महाराज से प्रार्थनाकी की संपून भूमंडल पर केवल आपका ही शासन है
31:01इसलिए मुझे रहने के लिए कोई ऐसा स्थान प्रदान करें जहां मैं आपके भय के बिनाजी सकू
31:09महाराज परीक्षित ने कुछ क्षन विचार किया और फिर कली को पहला स्थान द्यूत अर्थात जुआ खेलने के स्थान प्रदान
31:16किये जहां कपट असत्य और कलह का वास होता है
31:21कली के निवास के लिए दूसरा स्थान महाराज ने पान अर्थात मदिरापान के अड़ों को बनाया, जहां मध्यपान के कारण
31:29मनुश्यों की बुद्धी और विवेक नश्ठ हो जाते हैं
31:34तीसरे स्थान के रूप में परीच्षित ने कली को स्त्रीसंग अर्थात विशावरित्ती और परस्त्री गमन के स्थान दिये, जहां चरित्र
31:42का पतन होता है और वासना हावी रहती है
31:46चौथा स्थान महाराज ने सूना अर्थात जीवहिंसा और पशुवद्शालाओं को दिया, जहां निर्दोष जीवों का खून बहता है और निर्दैता
31:56का सामराज्य होता है
31:59इन चार स्थानों को पाकर भी जब कली संतुष्ट नहीं हुआ, तब उसने महाराज से अपने जीवन्यापन के लिए कोई
32:07एक और विशेश स्थान देने की याचना की
32:10तब महाराज परीक्षित ने विचार कर कली को पाँचवा और सबसे शक्तिशाली स्थान जातरूप अर्थात सुवर्ण, सोना, प्रदान किया, जो
32:19कल्यब में बुराईयों का मुख्य केंद्र बनने वाला था
32:24स्वर्ण रूपी स्थान मिलते ही कली को एक साथ पाँच महापाप मिल गए असत्य, मद, काम, क्रोध और वैर जो
32:31मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं
32:35इन पाचों स्थानों को पाकर कली अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने चुपचाप उन स्थानों में जाकर अपना डेरा जमा लिया,
32:43जिससे सामान्य जन्मानस सुरक्षित हो गया
32:46कली पर पूर्ण नियंत्रन पाने के बाद महाराज परीच्षित ने उस पीडित व्रिशब रूपी धर्म के पास जाकर उसके तूटे
32:54हुए अंगों को देखा और उसे सांत्वना दी
32:58अपनी दिव्य शक्तियों और धर्म प्रायंता के बलपर महाराज ने धर्म के खोए हुए तीन पैरों तप शौच पवित्रता और
33:07दया को पुनह स्थापित कर दिया
33:10व्रिशब रूपी धर्म के चारों पैर पुनह सुद्रिड हो जाने से स्रिष्टी में सत्यक्त न्याय और सदाचार का संचार हुआ
33:17और कल्युक का प्रवेश पूरी तरह से रुप गया
33:21दुखी पृत्वी रूपी गाय ने भी जब देखा कि उसका रक्षक धर्म अब पूर्ण रूप से सशक्त हो गया है
33:28तो उसके सारे कष्ट और आसु समाप्थ हो गए
33:32इस प्रकार महाराज परीच्षित ने अपने पूरे सामराज्ज में धर्म की पुनरस्थापना की और घोशना की की कोई भी मनुष्य
33:40कली के इन पांच स्थानों पर कदम न रखे
33:44संपूर्ण प्रजा ने महाराज के इस न्यायप्रिय निर्नै का हर्शोल लास के साथ स्वागत किया और कली के कुप्रभावों से
33:52दूर रहकर एक आदर्श जीवन जीने का संकल्प लिया
33:56परीच्षित के इस पावन और धर्म विजय चरित्र को सुनने वाले मनुष्य सदाकल्यव के दोशों से मुक्त रहते हैं और
34:04उनके जीवन में सदा सत्य और धर्म का वास होता है
34:09महाराज परीच्षित के न्यायपूर्ण शासन में युगो युगो तक चलने वाले धर्म के एक स्वर्णिम अध्याय का सूत्रपात हुआ जहां
34:17प्रजाने शांती और समरिधी का अनुभव किया
34:21धर्म के इस उतकर्ष को देखकर देवताओं ने स्वर्ग से पुष्प वर्षा की यह जानते हुए कि प्रिथवी पर एक
34:29ऐसे शासक का उदे हुआ है जो अधर्म के अंधकार को मिटाने में सक्षम है
34:35परंतु प्रिथवी के गर्भ में जहां कली पुरुष को सीमित किया गया था एक अद्रिश्य सुक्षम कमपन था जो आने
34:43वाले तूफानों की भविश्यवानी कर रहा था
34:46कली पुरुष जिसे महाराज परीच्षित ने केवल पांच स्थानों तक सीमित कर दिया था अपनी हार में भी एक शातिर
34:54मुस्कान छिपाए हुए था क्योंकि वह जानता था कि उसकी उपस्थिती मात्रही विनाश का बीज बोने के लिए परियाप्त है
35:04अद्रिश्य रूप से कली का प्रभाव उन स्थानों से रिस रहा था जहां उसे अनुमती मिली थी धीरे-धीरे मनुष्य
35:11के मन में लोग, क्रोध और चल की भावना को उत्तेजित कर रहा था
35:16महाराज परिक्षित अपने सिनहासन पर बैठे, धर्म के प्रतीक के रूप में चमकते रहे, प्रजाकी भलाई में लीम, आसन्न अद्रिश्य
35:25खत्रे से बेखबर
35:27प्रत्येक दिन बीटने के साथ धर्म की जड़े गहरी हो रही थी, पर साथ ही कली की नकारात्मक उर्जा भी
35:34सुक्षमता से भूमी में प्रवेश कर रही थी, भविश्य के लिए एक अद्रिश्य जाल बुन रही थी
35:42संतों और रिशियों ने भी यद्यपी धर्म का विजय घोश किया, अपने ध्यान में कल्यब के बढ़ते प्रभाव की सुक्षम
35:49तरंगों को महसूस किया, एक अनकहे भय से उनका हृदय भर गया
35:54यह एक ऐसी खामोश लड़ाई थी, जहां धर्म का प्रकाश अपनी पूरी शक्ती से चमक रहा था, पर अधर्म का
36:02अंधकार भी अपनी उपस्थिती से भविश्य के लिए चुनौती गढ़ रहा था
36:07कली पुरुष अपने एकांध कारावास में, अपने अंदर एक नई रणनीती को आकार दे रहा था, एक ऐसा चल जो
36:15परीक्षित के धर्मनिष्थ जीवन में एक अप्रक्त्याशित दुर्भाग्य लाएगा
36:21धर्म की विजय ने एक शनिक शान्ती प्रदान की थी, लेकिन यह शान्ती भविश्य के लिए एक गहरी परीक्षा का
36:28बीज भी छिपाए हुए थी, जिसका बोध किसी को नहीं था
36:33महाराज परीक्षित का अखंड विश्वास और उनकी धर्म प्रायनता ही उन्हें कल्यक के सुक्ष्म हमलों के प्रती समवेदन्शील बना रही
36:42थी
36:43राज्य में जहां हर तरफ धर्म के जैकारे गूंज रहे थे, वहीं अद्रिश्य रूप से मन के गुप्त कोनों में
36:50कली के विशैले विचार धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहे थे
36:55कली का स्वभाव ऐसा था कि वह प्रत्यक्ष युद्ध में पराजित होने के बाद भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रलोभन और
37:02भ्रम का जाल फैलाना जानता था
37:06धीरे-धीरे नेती के अद्रिश्य हाथों ने एक ऐसे घटनाक्रम की नीम रखी जो भविश्य में राजा के जीवन में
37:13एक अप्रत्याशित और गंभीर मोड लाएगा
37:17यह केवल समय की बात थी कि कली की सुक्ष्म शक्ती अपने सर्वोच प्रहार के लिए उचित अफसर की प्रतीक्षा
37:25करे जब परीक्षित की एकागरता भंग हो जाए
37:29इस प्रकार धर्म की विजय के बावजूद भविश्य के दुर्भाग्य की अद्रिश्य नीम कली पुरुष की चालाकी से धीरे धीरे
37:37पुष्ट हो रही थी
37:39हर एक क्षण धर्म के उतकर्ष के साथ साथ कली की चाया भी बढ़ती जा रही थी जो आने वाले
37:46समय में एक महान राजा के भाग्य को चुनौती देने वाली थी
37:51इस प्रकार यह निश्चित हो गया कि कली की उपस्थिती भले ही सीमित हो परीच्षित के जीवन में एक ऐसी
37:59परीच्षा का सूत्रपात करेगी जो उनके धर्म और न्याय की कसोटी बनेगी
38:04आथ यह कोई सन्योग नहीं था कि धर्म की इस चरम विजय के उपरान थी नेती ने परीच्षित के लिए
38:12एक अद्रिश्य परंतु अवश्यमभावी चुनौती का मार्ग प्रशस्त किया
Comments