पिछले एपिसोड में वेदों ने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का गान किया। अब, इस नए अध्याय में, हम एक रोमांचक और चेतावनी भरी कथा की ओर बढ़ते हैं – वृकासुर की कहानी। एक तपस्वी जिसने भगवान शिव को प्रसन्न कर एक भयानक वरदान प्राप्त किया, लेकिन उसका अहंकार उसे विनाश की ओर ले गया। जब स्वयं महादेव संकट में पड़ गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अद्भुत बुद्धि और माया से कैसे रक्षा की? देखिए कर्म, वरदान और बुद्धि के इस महासंग्राम में किसकी विजय होती है! #BhagavataPurana #ShriKrishna #Vrikasura #LordShiva #Mythology #HinduPuranas #DivineLeela #Bhakti #S3Ep87
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00:00शुतिस्तुती के अध्भुत और दिव्य समापन के पश्चात द्वार का नगरी के राजभवन में उपस्थित समस्त्रिशिगन, भक्तजन और राजसी सभासदगन
00:09परम सत्य की अलोकिक अनुभूती में लीन होकर अपने हृदय में गहन शांती और आनंद का अनुभव कर र
00:27दिलाओं को जानने की तीवर जिग्यासा जागरित हो उठी जो उनकी आखों में स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी।
00:34उनकी इस आध्यात्मिक भूख को देख कर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर और मंद मुस्कान बिखेरी जो सूर्य की प्रथम
00:43किरण के समान उनके मुखमंडल पर प्रकाशित हुई और उनकी करुणामई दृष्टी ने सभी जिग्यासूँ को आश्वासन प्र�
01:02जो धर्म और अधर्म के सुक्षम अंतर को उजागर करेगी। श्रीकृष्ण ने कहा कि यह कथावर्दान के दुरुपियोग और उसके
01:12विनाशकारी परिनामों पर केंद्रित होगी जो दर्शाएगी कि कैसे शक्ती का अंधाधुंध उपियोग स्वयं उसके दाता के लि�
01:32भूख के लिए तीनों लोकों में कुख्यात था। अपनी असीमित शक्ती की अभिलाशा में व्रिकासुर ने भगवान शिव को प्रसंद
01:41करने के लिए एक कठोर तपस्या करने का निर्नय लिया जिसकी क्रूर्ता और तीवर्ता ने स्वयं देवों को भी भयभीत
01:48कर दिया�
01:49उसका एक मात्र लक्ष था अध्वितिय शक्ती प्राप्त करना, जिससे वह तीनों लोकों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर सके और
01:58अपनी क्रूर इच्छाओं को बिना किसी बाधा के पूरा कर सके।
02:03वरिकासुर की यह तपस्या दिनों दिन और अधिक विकट होती गई, जिससे ब्रहमांड में कमपन होने लगा और उसकी उजा
02:11से प्रित्वी, आकाश तथा अन्य लोक भी धर्राने लगे।
02:15उसके तपकी प्रचंडता को देख कर स्वर्गलोक में उपस्थित, देवगन, चिंतित हो उठे और उन्होंने इस आसन्न संकट पर गेहन
02:25विचार विमर्ष करना प्रारंभ कर दिया।
02:28उसी समय कैलाश परवत पर भगवान शिव अपनी गेहन समाधी में लीन थे, जहां वे ब्रहमांड के भीतर शांत और
02:36अविचल भाव से ध्यानस्थ थे, उनके चारों और एक दिव्य शांती व्याप्त थी।
02:42व्रिकासुर की तपस्या इतनी उग्र हो चुकी थी कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह स्वयन स्रिष्टिक्रम को भंकर
02:50देगी और ब्रहमांडिय संतुलन को खत्रे में डाल देगी।
02:54उसके शरीर से अगनी की इतनी भीशन लप्ते निकलने लगी की वन पर्वत और नदिया सूखने लगी और समस्त वातावर्ण
03:03जलने के कगार पर पहुँच गया।
03:06इस विकट स्थिती से घबराकर देवगन परंपिता ब्रहमा के पास पहुँचे और उन्हें व्रिकासुर की भयानक तपस्या और उससे उत्पन
03:14हो रहे विनाशकारी प्रभावों के बारे में बताया।
03:19भगवान ब्रहमा ने देवों की व्यथा को धैर्य पूर्वक सुना और अपनी दिव्य अंतरग्रिष्टी से स्थिती की गंभीरता को समझा
03:27उनके मुख पर एक गंभीर चिंता की रेखा उभराई।
03:32ब्रहमा जी ने देवों को सलाह दी की वे कैलाश परवत पर जाकर भगवान शिव से इस संकट में हस्तक्षेप
03:39करने की प्रार्थ ना करें क्योंकी केवल वही व्रिकासुर की तपस्या को शांत कर सकते थे।
03:45व्रिकासुर ने अपनी तपस्या के अंतिम और सबसे भयानक चरण में प्रवेश किया, जहां उसने अपने शरीर के टुकडों को
03:53अगनी में अर्पित करना शुरू कर दिया, जिससे वह या तो वर्दान पाएगा या मृक्यू को प्राप्थ होगा.
04:00उसके इस अतिशय त्याग और अदमय संकल्प से ग्रवित होकर, भगवान शिव अपनी गहन समाधी से उठे और व्रिकासुर के
04:09समक्ष प्रकट होने का निर्णय लिया.
04:12अचानक एक प्रचन प्रकाश पुंच के साथ, भगवान शिव अपनी पूल्ण महिमा में व्रिकासुर के समक्ष प्रकट हुए, उनके दिव्यतेज
04:20से पूरा वातावर्ण आलोकित हो उठा.
04:24भगवान शिव को अपने समक्ष देखकर व्रिकासुर हत प्रब रह गया, उसकी आखों में अविश्वास और कृतग्यता के भाव थे,
04:32और वह अपने वर्दान की भयावर इच्छा को व्यक्त करने के लिए तयार था.
04:38अपने भीतर पल रही घ्रेनित इच्छा को समेटे हुए, व्रिकासुर ने कापते होठों से महादेव से अपने वर्दान की मांग
04:46की.
04:47हे देवाधिदेव वह गर्जा, मुझे ऐसी शक्ती प्रदान करें कि मैं जिसके भी सिर को छूलू, वह क्षण भर में
04:55भस्म हो जाएं।
04:57शिव जिन्होंने अपनी प्रतिग्याओं और भक्तों के प्रती अपनी अटूट निष्ठा के लिए जाने जाते हैं।
05:16अब एक धर्म संकट में फस गए थे।
05:20वरिकासुर्प अपनी असीमित शक्ती की भूख से अंधा होकर, शिव के चहरे पर जिजक देखकर और भी अधीर हो उठा।
05:29उसने अपनी तपस्या का स्मरण कराया, जिसमें उसने स्वयं को अत्यधिक कष्ट दिये थे, मानो वह वर्दान उसका अधिकार हो।
05:38महादेव की प्रतिष्ठा दाव पर थी, और वे जानते थे कि एक बार दिये गए वचन को तोड़ना उनके सिध्धानतों
05:46के विरुद्ध होगा, चाहे परिनाम कुछ भी हो।
05:49अपनी समस्थ दिव्यता और करुणा को एकत्र करते हुए, शिव ने अंता व्रिकासुर की मांग को पूरा करने का निर्णय
05:57लिया, एक ऐसा निर्णय जिसके भयानक परिनाम होने वाले थे।
06:02एक गेहन उर्जा तरंग शिव के उठे हुए हाथ से निकली, सीधे व्रिकासुर की ओर प्रवाहित हुई, वर्दान को भौतिक
06:10रूप प्रदान करते हुए।
06:32जैसे ही वर्दान की शक्ती व्रिकासुर के शरीर में समाहित हुई, उसकी आखों में एक नई अधिक तीवर और क्रूर
06:40चमका गई।
07:02और फिर उसकी दुष्ट आखों ने धीरे धीरे महादेव की ओर घूमना शुरू कर दिया, मानो वह अपनी नई शक्ती
07:09का पहला शिकार खोज रहा हो।
07:12शिव के दिव्यध्यान ने तुरंट आने वाले खत्रे को भांप लिया, एक शीत लहर उनकी आत्मा से गुजर गई।
07:21एक राक्षसी चीख के साथ व्रिकासुर ने अपना हाथ शिव के सिर की ओर बढ़ाया, अपनी ही शक्ती को परखने
07:28के लिए उतावला।
07:30महादेव ने एक बिजली की गती से पीछे हटते हुए, अपने ही भक्त द्वारा दिये गए इस अप्रत्याशित खत्रे से
07:38बचने के लिए तेजी से पलायन किया।
07:41वरिकासुर अपनी नवनिर्मित शक्ती के मद में चूर अपने ही वर्दान के दाता के पीछे पागलपन की हद तक दोड़
07:49पड़ा।
07:49इस प्रकार तीनों लोकों के स्वामी शिव स्वया अपने ही दिये वर्दान से भयभीत होकर उस असुर से बचने के
07:57लिए इधरुधर भागने लगे, जिसे उन्होंने स्वयन शक्तिशाली बनाया था।
08:03महादेव अपनी ही स्रिष्टी के इस अकल्पनिय संकट से घबराये हुए, तीवर गती से आकाश गंगाओं के बीच से गुजरते
08:11हुए, प्राहत्रा ही कर रहे थे, मानो कोई साधारन जीव अपने प्राण बचाने को भाग रहा हो।
08:18पीछे-पीछे वरिकासुर अपनी विनाशकारी शक्ति के उनमाद में एक भयावह दहार के साथ शिव का पीछा कर रहा था,
08:27उसका लक्ष था अपने वर्दाता को ही भस्म कर देना।
08:32यह असाधारन द्रिश देख सभी देवता और सिद्धगन भय से काप उठे जब उन्होंने देखा कि स्वय महादेव अपने ही
08:40वर्दान से बचने के लिए ब्रहमांड में भटक रहे हैं।
08:45कैलाश के अधिपती महादेव जो कभी किसी से भयभीत नहीं होते थे, अब एक दुष्ट असुर के पीछे लगे होने
08:53से अत्यंत विचलित और भयभीत दिख रहे थे।
08:57वरिकासुर अपनी असीमित शक्ती के अहंकार में अंधा होकर स्वर्ग, पृत्वी और पाताल तीनों लोकों में शिव का पीछा कर
09:05रहा था, हर जगह को अपने आतंग से भरते हुए।
09:09यह विचित्र परिस्थिती, जिसमें दाता ही अपने दान से भयभीत था, समस्त ब्रहमांड के लिए एक गंभीर संकट बन गई
09:18थी।
09:19आखिरकार महादेव ने सहायता के लिए उस परम शक्ती का स्मरण किया, जो सदैव धर्म की रक्षा करती है और
09:27अपने भक्तों के संकट हरती है भगवान विश्णू।
09:31महादेव ने अपनी पूरी शक्ती लगा कर वरिकासूर से कुछ पल की दूरी बनाने में सफलता प्राप्त की और तुरंत
09:39वैकुंठ धाम की ओर प्रस्थान किया।
09:42इधर शेशनाग की शया पर विश्राम करते हुए भगवान विश्णू ने अपने दिव्य ज्यान से इस विकट स्थिती को ततकाल
09:50भाप लिया।
09:51उन्होंने महादेव के संकट को समझते हुए अपने अनंत करुणा से ब्रहमांड में हस्तक्षेप करने का निर्ने लिया।
10:00तुरंत ही श्रीहरी ने एक युवा तेजस्वी और शांतचित ब्रहमचारी का रूप धारन कर लिया जिसका उद्देश था असुर को
10:08छलना।
10:21ब्रहमचारी भगवान विश्नु वरिकासुर के मार्ग में प्रकट हुए एक अप्रत्याशित बाधा बन कर। वरिकासुर जो किसी भी बाधा को
10:31कुचलने का आदी था इस अचानक प्रकट हुए शांत युवा को देखकर कुछ पल के लिए ठिठक गया।
10:38ब्रहमचारी ने अत्यंत नमर्ता और मधूर्ता से वरिकासुर का अभिवादन किया, जैसे वह किसी सम्मानित अतिथी का स्वागत कर रहा
10:47हो।
10:47असुर ने अपने अहंकार में चूर होकर ब्रहमचारी की इस विनय को एक कमजोर की विनमर्ता समझा और उसकी ओर
10:56तिरसकार भरी द्रिश्टी से देखा।
10:59ब्रहमचारी ने अपनी मीठी वाणी से वरिकासुर से उसका परिचय पूछा और उसके भयानक युद्धोनमादी स्वभाव का कारण जानना चाहा।
11:09वरिकासुर अपनी शक्ती और क्रोध के मद में चूर बिना सोचे समझे अपने वर्दान और शिव का पीछा करने के
11:17अपने उद्देश के बारे में बढ़बढाने लगा।
11:21ब्रहमचारी ने धैर्यपूर्वक असुर की बात सुनी उसके अहंकार को बढ़ने दिया और फिर एक गंभीर प्रश्न के साथ उसे
11:29चुनौती दी।
11:30उन्होंने वर्रिकासुर से पूछा कि क्या उसे अपने वर्दान की शक्ती पर पूरा विश्वास है या क्या यह सिर्फ ध्रम
11:38हो सकता है।
11:40वर्रिकासुर ब्रहमचारी की बात सुनकर और अधिक क्रोधित हो उठा, उसकी आखों में अपमान की आग जल रही थी।
11:49ब्रहमचारी ने शांत स्वर में असुर के मन में संदेह बोते हुए शिव के वर्दान की शक्ती पर और अधिक
11:56प्रश्ण चेहन लगाए।
11:58अपने अहंकार और क्रोध के वर्ष में, वृकासुर ने तुरंथ ही वरदान की शक्ती का प्रदर्षन करने का निश्चे किया,
12:06ताकि ब्रहमचारी की चुनौती का मुहतोर जवाब दे सके।
12:11चतुराई से मुस्कुराते हुए ब्रहमचारी ने व्रिकासुर को सुझाव दिया कि वह पहले स्वयंपर वर्दान का परीच्षन करे यह देखने
12:19के लिए कि क्या यह वास्तव में काम करता है
12:24व्रिकासुर अपनी मूर्खता और उन्माद में अंधा होकर इस छोटे से प्रदर्शन के प्रस्ताव को स्विकार कर लेता है बिना
12:32किसी संशय के
12:34ब्रह्मचारी ने अपने दिव्य हाथों से एक सरल पर प्रतिकात्मक मुद्रा बनाते हुए अपने सिर को हलके से छुआ जैसे
12:42किसी अनुष्ठान का प्रदर्शन कर रहे हूँ
12:46बिना किसी विचार के व्रिकासुर ने ठीक वैसी ही गती की नकल की अपने विशाल और क्रूर हाथ को अपने
12:53ही सिर पर रखा
12:55जैसे ही व्रिकासुर ने अपने सिर को छुआ शिव का वर्दान तुरंत सक्रिय हो गया और उसका सिर भयानक लप्टों
13:03में धधक उठा
13:05एक तीवर चीख भयानक गर्द से भरी हुई, व्रिकासुर के गले से निकली, जैसे उसे अपनी भयंकर गलती का एसास
13:13हो रहा था
13:15शन भर में व्रिकासुर का विशाल शरीर जलते हुए अंगारों में बदलता हुआ, धीरे धीरे राख में विलीन होने लगा
13:24जैसे ही व्रिकासुर राख में बदल गया, ब्रहमचारी का रूप दिव्य प्रकाश में विलीन हो गया और वहां श्री कृष्ण
13:31स्वयां अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए एक शांत मुस्कान के साथ
13:37अपनी अंतिन सासे गिनते हुए, व्रिकासुर ने राख के धेर से उठते हुए दिव्य रूप को देखा, उसके हृदय में
13:44एक शनिक भाय और विस्मय समा गया
13:48और फिर एक अंतिन फुफकार के साथ व्रिकासुर का नामों निशान मिट गया, बस एक धेर राख और कुछ धधकते
13:56अंगार ही शेश रह गए
13:58परम देव श्री कृष्ण अपने दिव्य रूप में उस राख के धेर के उपर शांत भाव से खड़े थे, जिसने
14:05एक बार दुरदान्त व्रिकासुर को धारण किया था
14:09सुदूर कैलाश परवत पर भगवान शिव जो अब तक व्रिकासुर से भाग रहे थे, अचानक वातावर्ण में एक गहन शांती
14:18और बदलाव महसूस करते हैं
14:21देवी पारवती के साथ भगवान शिव उस दिशा में देखते हैं, जहां व्रिकासुर का अंत हुआ था, उनके चहरे पर
14:29शांती और कृतग्यता का भाव था
14:32श्री कृष्ण का दिव्य रूप विजय और शांती का प्रतीक बना हुआ था, जो ब्रहमाण में सद्भाव और व्यवस्था को
14:40पुनह स्थापित कर रहा था
14:42स्वर्ग के देवता, रिश्यमुनी और गंधर्व भगवान विश्णु के इस अध्भुत कृत्य की सराहना करने के लिए आकाश में प्रकट
14:50होते हैं
14:53अपना कार्य पूर्ण करने के पश्चात, भगवान विश्णु का दिव्य चतुर्भुज रूप धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन हो गया, जैसे
15:01वे अपने धाम को लोट रहे हों
15:04स्वर्ग के प्राणियों ने भगवान विश्णु की जैजैकार की, जिन्होंने अपनी अध्भुत माया से महादेव को संकट से बचाया और
15:12धर्म की स्थापना की
15:15अपने ही दिये वर्दान की भयंकर शक्ती का प्रत्यक्ष अनुभव कर, भगवान शिव के मन में असहनिय भय व्याप्थ हो
15:22गया, क्योंकि वरिकासुर अब स्वयं उन्ही पर उस विनाशकारी शक्ती का प्रयोग करने को उद्धत था
15:29अपनी तपस्या का फल पाकर वरिकासुर उन्मत हो उठा और उसने तुरंट अपने वर्दान की शक्ती का प्रदर्शन महादेव पर
15:38ही करने का क्रूर निश्चय किया, जिससे तीनों लोग काप उठे
15:43अपने ही वर्दान से उपजे इस अभूत पूर्व संकट से बचने के लिए स्रिष्टी के संहार करता शिव को विवश
15:50होकर तीनों लोगों में पलायन करना पड़ा, क्योंकि स्वयंका वध करना स्रिष्टी के नियमों के विरुद्ध था
15:58महादेव के पीछे-पीछे वरिकासुर भी अपनी दानवी शक्ती का प्रदर्शन करते हुए एक विक्राल गरच के साथ आकाश को
16:06चीरता हुआ तीवर गती से उनका पीछा करने लगा
16:10भयभीत महादेव कभी कैलाश के बरफीले शिखरों पर तो कभी सुदूर वन प्रदेशों में अपनी योग माया से अग्रिश्य होते
16:18हुए वरिकासुर से बचने का प्रयास कर रहे थे
16:23वरिकासुर भी अपनी दानवी शक्ती के मद में चूर होकर बिना रुके हर लोक में महादेव का पीछा करता रहा
16:30जैसे कोई शिकारी अपने शिकार का पीछा कर रहा हो
16:35स्वर्ग के देवता, रिशिमुनी और गंधर्व जो महादेव के पलायन को देख रहे थे, उनकी आखों में भय और अविश्वास
16:43का गहरा भाव उमड़ाया
16:46देवलोक में एक अजीब सी खामोशी छा गई, जैसे कोई भयानक भविश्यवानी पूरी होने वाली हो और हर चहरे पर
16:54चिन्ता की गहरी लकीरें उभराई
16:57जैसे ही व्रिकासुर अपनी विक्राल गर्जना के साथ देवलोक के द्वार पर प्रकट हुआ, देवताओं के बीच हाहाकार मच गया
17:05और सभी दिशाओं में भगदर मचने लगी
17:09महादेव कभी स्वर्ग की उँचाईयों में, तो कभी प्रित्वी के घने जंगलों में, तो कभी पाताल के अंधेरे गुफाओं में
17:17छिपने का व्यर्थ प्रयास कर रहे थे
17:20व्रिकासुर भी अपनी मायावी शक्ती और प्रचंड वेग से महादेव का पीछा करता रहा, जैसे मृत्यू स्वयं उनके पीछे दौड
17:28रही हो
17:30सारे लोकों में आतंक छा गया, क्योंकि स्वयं महादेव संकट में थे और कोई भी देवता उनकी सहायता करने का
17:38साहस नहीं कर पा रहा था
17:41देवताओं की सभा में गेहन विचार विमर्ष होने लगा कि इस भयानक संकट का समाधान कैसे किया जाएं और किसकी
17:48शरण ली जाएं
17:50इंद्र अपने वजको कसकर पकड़े हुए अत्यंत चिंतित मुद्रा में देवताओं की ओर देखा, उनके चहरे पर भय और निराशा
17:58के भाव सपश्ट थे
18:01महादेव के इस असाधारन पलायन से देवलोक में हाहाकार मच गया और सभी देवता एक स्वर में ब्रहमाजी से इस
18:09विकट स्थिती का समाधान खोजने का आग्रह करने लगे
18:14स्रिष्टी के रच्चिता भगवान ब्रहमा अपने लोक में कमल पर आसीन इस ब्रहमांडी उथल पुथल को अपनी दिव्यद्रिष्टी से देख
18:22रहे थे
18:24उन्होंने अपनी समाधी तोड़ कर देखा तो उनके मन में गहन चिन्ता व्याप्थ हो गई कि यदि स्वयन शिव ही
18:31भस्म हो गए तो स्रिष्टी का संतुलन कैसे रहेगा
18:35ब्रहमा जी ने गंभीरता से विचार किया कि शिव का विनाश केवल उनका नहीं बलकि संपूर्ण स्रिष्टी का विनाश होगा
18:43जिससे तीनों लोकों में अराजकता फैल जाएगी
18:47इस विकट परिस्थिती में ब्रहमा जी ने तुरंट निर्ने लिया कि केवल भगवान विश्णु ही इस असाध्य संकट से महादेव
18:55को बचा सकते हैं
18:58स्रिष्टी के रक्षक विश्णु की शरण में जाने है तु ब्रहमा जी अपने कमल आसन से उठकर तीवर गती से
19:05क्शीर सागर की ओर प्रस्थान करने लगे
19:08ब्रहमा जी अपने कमल आसन को त्याग कर तीवर गती से उन असीन जलराशियों की ओर बढ़े जहां स्रिष्टी के
19:16पालन करता भगवान विश्णु निवास करते हैं, उनके मन में केवल महादेव की सुरक्षा का विचार प्रबल था
19:24कुछ ही क्षणों में ब्रहमा जी ने एक शीरसागर के दिव्यतट पर कदम रखा, जहां अनन्त श्वेट जलराशी और मंदार
19:31परवतों की अनुपम छटा मन को शान्ती प्रदान कर रही थी, किन्तु उनके हृदय में चिंता व्याप्ट थी
19:39ब्रहमा जी ने अत्यंत श्रद्धा और दीन्ता के साथ स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णु का आहवान किया, अपनी आखों में
19:48संपून ब्रहमांड की सुरक्षा की याचना लिये
19:52सहसा, शीरसागर की गहराईयों से एक दिव्य प्रकाश पुझ उभ्रा, जो धीरे धीरे आकार लेता हुआ, समस्त लोकों को प्रकाशित
20:01करने वाले भगवान विश्णु के मनोहर रूप में प्रकट हुआ
20:05भगवान विश्णु अपने श्यामलाम बुदाब शरीर चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये मन्धास्य के साथ ब्रहमा जी
20:14के समक्ष प्रकट हुए, उनकी उपस्थिती मात्र से ही समस्त चिंताएं मिट गई
20:20ब्रहमा जी ने करबध होकर महादेव पर मंदराते वरिकासुर के भयावह संकट और उसके द्वारा प्राप्त शिव के वर्दान की
20:28पूरी कथा, कापते स्वर में भगवान विश्णु को सुनाई
20:33भगवान विश्णु ने ब्रहमा जी को शांत किया और अपनी मोहिनी शक्ती से वरिकासुर को परास्त करने का आश्वासन दिया,
20:41जिससे ब्रहमा जी के मन को कुछ शांती मिली
20:45उन्होंने तुरंट एक गहन योजना बनाई, जिसमें वरिकासुर की मूर्खता और महादेव के वर्दान का दुरुपयोग ही उसकी हार का
20:53कारण बनेगा, यह सुनिश्चित किया
20:57अपनी माया का प्रयोग करते हुए, भगवान विश्णु ने अपने भव्य चतुर्भुजी रूप को त्याग कर एक युवा, तेजस्वी और
21:05निर्मल ब्रहमचारी का रूप धारन किया, जो अपनी साद्गी में भी अद्भुत था
21:11यह ब्रहमचारी एक साधारन श्वेत धोती और यग्योपवीत धारन किये हुए था, उसके मुख पर शान्त हास्य और आखों में
21:19ब्रहमांड का ज्ञान जलक रहा था, जो उसकी असली पहचान छिपाए हुए था
21:26ब्रहमचारी विश्णू ने तुरंत महादेव का पीछा करते हुए व्रिकासुर को खोज निकाला, जो अभी भी उनमत्थ होकर शिव को
21:34विनाश के कगार पर धकेलने का प्रयास कर रहा था
21:38व्रिकासुर एक भयंकर दानव जिसका विशाल शरीर क्रोज से लाल हो रहा था, महादेव के पीछे पागलों की तरह भाग
21:46रहा था, जबकि शिव अपनी शक्तीक्षीन होते देख भागने को विवश्थ थे
21:52व्रिकासुर से कुछ ही दूरी पर ब्रहमचारी, विश्णु ने अत्यंत शांत और सौमय भाव से उसे रोका, जैसे कोई रहगीर
22:01किसी अंजान व्यक्ती से भेंट कर रहा हो
22:05ब्रहमचारी ने मधुरवानी में व्रिकासुर से उसके उद्देश के बारे में पूछा, मानोवर इस दानव की क्रूरता से अनभिग्य हो,
22:13और उसे अपनी बातों में उलजाने का प्रयास किया
22:17व्रिकासुर अपनी शक्ती और महादेव के वर्दान के अभिमान में अंधा होकर ब्रहमचारी को अपनी दुष्ट योजना का पूरा विवर्ण
22:25देने लगा, जिसमें शिव को भस्न कर पार्वती को प्राप्त करना था
22:30चतुर ब्रह्मचारी ने वरिकासुर के अभिमान पर चोट करते हुए महादेव के वर्दान की सत्यता पर संदेह व्यक्त किया और
22:39कहा कि ऐसे वर्दानों पर पूरी तरह भरोसा करना मूर्खता हो सकती है
22:45उसने व्रिकासुर को चुनोती दी कि यदी उसे अपने वर्दान की शक्ती पर इतना विश्वास है तो वह पहले अपने
22:53ही सिर पर हाथ रख कर उसकी सत्यता की परीक्षा कर ले
22:58व्रिकासुर क्षण भर के लिए हिचका किन्तु अपनी मूर्खता और अहंकार के कारण ब्रह्मचारी के तर्क को स्विकार कर अपने
23:06ही वर्दान की शक्ती पर रखने का दुस्साहस करने लगा
23:10अंतह अपनी मूर्खता में अंधा होकर व्रिकासुर ने अपना शक्तिशाली हाथ स्वया अपने ही सिर पर रख दिया उस विनाशकारी
23:19वर्दान को परखने के लिए जिसका परिनाम उसे ज्यात न था
23:23शन भर में जैसे ही व्रिकासुर ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा महादेव के वर्दान की शक्ती ने उसे
23:31ततकाल भस्म कर दिया और वह एक धुए के गुबार में विलीन होकर राख में बदल गया
23:38व्रिकासुर के भस्म होते ही वहाँ एक अजीब सी शांती चा गई जहां कुछ क्षण पहले अहंकार और विनाश का
23:46तांडव चल रहा था अब केवल राख का धेर और धुए की हलकी लकीरें शेश थी
23:53ब्रहमचारी रूप में भगवान विश्नु अपनी गंभीर और शांत द्रिश्टी से उस राख के धेर को निहारते रहे मानो ब्रहमांड
24:01की सारी लीला उनके नेत्रों में समाहित हो
24:04फिर उनके होठों पर एक हलकी रहस्य में मुस्कान उभी जो त्रिलोक में न्याय और धर्म की पुनरस्थापना का मौन
24:13संकेत थी
24:14शन भर में उस ब्रहमचारी के शरीर से एक अलोकिक तेज फूट पड़ा जिससे उनके साधारन वस्त्रों की सीमाए तूटकर
24:23एक दिव्य रूप में बदलने लगी
24:26और खिर पलक जपकते ही वह ब्रहमचारी रूप लुप्त हो गया और वहां स्रिष्टी के पालक भगवान विश्णु अपने पूर्ण
24:34चतुर भुजी स्वरूप में प्रकट हुए
24:37उनके दिव्य तेज से पूरा वातावर्ण आलोकित हो उठा, मानो सहसरों सूर्य एक साथ चमक उठे हो और उनकी उपस्थिती
24:46से ब्रहमाड में एक नई उर्जा का संचार हुआ
24:50एक गंभीर और मधुर ध्वनी आकाश में गूंच उठी जो सत्य और धर्म की विजय का उद्गोश करती थी और
24:58जिसने देवताओं के हृदय में शांती भर दी
25:01यह ध्वनी कैलाश परवत पर समाधिस्थ भगवान शिव तक भी पहुँची जो उस समय व्रिकासुर के भय से विचलित थे
25:11ततकाल उनके मन पर छाया हुआ भय और चिंता का बादल छंट गया और उनके हृदय में असीम शांती और
25:18निश्चिंतता का अनुभव हुआ
25:21देवी पारवती जो उनके समीक बैठी थी ने अपने स्वामी के मुखमंडल पर इस अचानक आय परिवर्तन को तुरंट भांप
25:29लिया
25:31महादेव ने अपनी पलके खोली उनकी तीसरी आख में एक दिव्य चमक थी और उनके नेत्रों में स्रिष्टी के घटनाक्रम
25:39का स्पष्ट ज्यान जलक रहा था
25:42उन्होंने तुरंट समझ लिया कि उनके परम्मित्र भगवान विश्णु ने अपनी माया से व्रिकासुर का अंतकर उन्हें संकट से मुक्त
25:50कर दिया है
25:52उनके मुक्ष से कोई शब्द नहीं निकला किन्तु उनकी आखों में एक गहरी कृतग्यता और स्नेह का भाव स्पष्ट परिलक्षित
26:00हो रहा था
26:02उसी क्षण आकाश से असंख्य देवता और दिव्य प्राणी उतरने लगे जो भगवान विश्णु की इस अग्धुत लीला के साक्षी
26:10बनने आये थे
26:12सभी देवताओं ने हाथ जोड़ कर भगवान विश्णु को प्रणाम किया और उनकी महिमा का गुनगान किया जिन्होंने स्रिष्टी को
26:21एक बड़े संकट से उबारा था
26:24भगवान विश्णु ने अपनी मधुर मुस्कान के साथ उनकी श्रद्धा को स्विकार किया जिससे समस्त लोकों में सकारात्मक उर्जा का
26:32संचार हुआ
26:34उन्होंने अपनी दिव्यवानी में समझाया कि कैसे अधर्म का मार्ग अंत्त स्वय ही अपने विनाश का कारण बनता है
26:43उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे सदैव धर्म और सज्जनों की रक्षा के लिए प्रकट होते रहेंगे जब भी
26:51प्रित्वी पर अधर्म बढ़ेगा
26:53अपनी लीला पूर्ण कर भगवान विश्णो धीरे-धीरे आकाश में उपर उठने लगे और उनके दिव्यस्वरूप की चमक धीरे-धीरे
27:02कम होती चली गई
27:04उनके अंतरधान होते ही ब्रह्मांड में शान्ती और सद्भाव पुनह स्थापित हो गया और सभी लोकों ने परमेश्वर की असीन
27:12शक्ती और करुणा का अनुभव किया
27:16व्रिकासुर्ख अपने नवीन वर्दान के उनमाद में अंधा होकर कैलाश की ओर तीवर गती से बढ़ रहा था जिसके मार्ग
27:24में कोई भी जीव भैभीत होकर काप उठता था
27:28तभी एक अध्भुत तेजोमय ब्रहमचारी उसके समक्ष प्रकट हुए जिनके मुख पर असीम शान्ती और बुद्धी का तेज चमक रहा
27:36था
27:38ब्रहमचारी ने विनमर्ता से वरिकासुर को संबोधित करते हुए उसकी क्रोधागनी को शांत करने का प्रयास किया और उसके आगमन
27:46का कारण पूछा
27:48अपनी शक्ति के घमंड में चूर वरिकासुर ने ब्रहमचारी को तुछ समझा और उसे अपने मार्ग से हटने की चेतावनी
27:56दी
27:58किन्तु ब्रहमचारी ने अपनी बुद्धिमत्ता से वरिकासुर के वर्दान की सत्यता पर संदेह व्यक्त किया
28:04उसके अहंकार को और अधिक उत्तेजत करते हुए
28:08उन्होंने कहा कि किसी वर्दान की वास्तविक शक्ती तभी सिध्ध होती है
28:13जब स्वयं उसे प्राप्त करने वाला उसका परीक्षन कर ले
28:18ब्रहमचारी ने चतुराई से वरिकासुर को उकसाया
28:21कि वह अपने ही सिर पर हाथ रखकर वर्दान की सत्यता सिध्ध करे
28:27उन्होंने यह भी तर्प दिया कि अगर वर्दान सच्मुच इतना शक्तिशाली है
28:32तो उसे स्वयं पर आजमाने में क्या भय है
28:36आमकार और मूर्खता में अंधा होकर वरिकासुर का मन ब्रहमचारी के शब्दों में उलच गया
28:42और वह इस चुनोती पर विचार करने लगा
28:46जैसे ही उसने अपने वर्दान पर संदे होता देखा
28:50उसका राक्षसी आहमकार क्रोध से और भी प्रजवलित हो उठा
28:55वह जोर से हसा अपनी असीमित शक्ती का प्रदर्शन करने के लिए उठसुक ब्रहमचारी को एक तुछ प्राणी समझ कर
29:04अपने वर्दान की अजैता को सिध्ध करने के लिए उसने अपना भारी और शक्तिशाली हाथ उपर उठाया
29:12ब्रहमचारी ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ सुक्षमता से वरिकासुर के स्वयें के सिर्की और इशारा किया
29:21आंकार और मूर्खता में अंधा होकर वरिकासुर ने एक पल भी न सोचा और तुरंत अपना ही हाथ अपने सिर
29:28पर रख लिया
29:30शन भर में एक तीवर ब्लाइंडिंग फ्लाश ओफ डिवाइन एनरजी दिव्य उर्जा का एक तीवर चकाचौंध कर देने वाला प्रकाश
29:38वरिकासुर के शरीर से फूट पड़ा
29:42वर्दान की शक्ती ने अब अपने ही धारक पर प्रहार किया और वरिकासुर ने भय और पीडा से एक भयानक
29:49चीख निकाली
29:51उसका विशाल शरीर तीवर गती से जलकर भस्म होने लगा एक पल में उसकी मांसपेशिया सूख गई और हड्या राख
29:59में बदलने लगी
30:02देखते ही देखते वह भयंकर वरिकासुर एक धधकती हुई राख के धेर में परिवर्तित हो गया जिसका अस्तित्व ब्रहमांड से
30:10मिट गया
30:11उसके विनाश के साथ ही ब्रहमांड में फैली अशांती धीरे धीरे शांत हो गई और एक दिवे शांती की लेहर
30:19चारों और फैल गई
30:21और इस प्रकार भगवान कृष्ण ने एक साधारन ब्रहमचारी के वेश में अपनी अद्भुत लीला से संसार को संकट से
30:29मुक्त कर दिया
30:32व्रिकासुर के भस्म होते ही भगवान शिव जो अब तक अपने प्राणों के भैसे काप रहे थे एक गहन श्वास
30:39लेकर निश्चिन्थ हुए और उनके मुख पर पुन्ह दिव्यतेज लौट आया
30:44धीरे धीरे कैलाश परवत पर छाय आतंत की काली छाया छंट गई और उसकी जगह एक अध्भुत शांती और पवित्रता
30:53का आभास होने लगा
30:54मानो प्रकृती भी इस संकट मोचन का स्वागत कर रही हो
30:59इस मुक्ती के क्षण को साक्षी बनाने के लिए देवी पारवती जिनका मुखमंडल अब तक चिन्ता से ग्रस्ट था पती
31:07की ओर देखकर अपनी आखें कृतग्यता से भर गई
31:12भगवान शिव ने अपनी जटाओं को व्यवस्थित करते हुए उस दिशा में देखा जहां ब्रहमचारी के वेश में भगवान कृष्ण
31:19ने अपनी लीला का समापन किया था
31:22ठीक उसीक्षन ब्रहमचारी के स्थान पर एक अलोकिक नीले प्रकाश का पुन्च प्रकट हुआ जोक्षन भर के लिए अपनी दिव्य
31:31आभासे पूरे ब्रहमांड को जगमगा कर अद्रिश्य हो गया
31:35यह देखकर शिव को तुरंत आभास हुआ कि यह कोई साधारन ब्रहमचारी नहीं बलकि स्वयन स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णु
31:44की मायावी लीला थी
31:47उनकी आखों में अपार कृतग्यता उमड पड़ी और उन्होंने अपने हाथों को जोड़ कर उस अद्रिश्य परम शक्ती के प्रती
31:55श्रधा पूर्वक प्रणाम किया जिसने उन्हें इस घोर संकट से उबारा था
32:00इधर तीनों लोकों में भी एक अध्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगा जब सभी देवगण, गंधर्व और अपसराय हर्शोलास से स्वर्ग
32:09से प्रिथवी की ओर उतरने लगे
32:12स्रिष्टी के रच्चिता, चतुर्मुख ब्रहमा भी अपने श्वेत हंस पर विराज मान होकर इस शुब अफसर पर अपनी उपस्थिती दर्स
32:20कराने हेतु पधारे
32:23देवर्शी नारद अपनी वीना महती के तारों को छेरते हुए, हरिनाम संकीर्तन करते हुए, अन्य देवताओं के साथ आकाश मार्ग
32:32से आपहुँचे
32:33सभी एकत्र हुए देवता और विशिगन अपनी अपनी आखों में श्रद्धा और आश्चर्य लिए आकाश की ओर देख रहे थे
32:42जहांसे अभी अभी परम्पिता विश्नु की लीला का समापन हुआ था
32:47तभी आकाश्वानी हुई एक गंभीर, मधुर और सर्वव्यापी ध्वनी जो स्वय भगवान विश्नु की थी जिसने शिव के संकट मोचन
32:56की पुष्टी की और धर्म की विजय का उद्धोश किया
33:00ब्रहमाजी ने सर्वप्रथम अपने चारों मुखों से भगवान विश्नु की अद्भुत बुद्धी उनके समय पर किये गए हस्तक्षेप और उनकी
33:09असीम करुणा की स्थुती करना प्रारंभ किया
33:13नारद मुनी ने अपनी महती वीना पर एक मधुर धुन छेड़ते हुए भगवान की मोहक लिलाओं और उनके भक्तवत्सर रूप
33:21का गुनगान करना शुरू कर दिया
33:24उनके साथ ही सभी देवगण, रिशी, गंधर्व और अपसराय भी मुक्तकंट से भगवान विश्णू की जय जयकार करने लगे जिससे
33:33पूरा ब्रह्मान विश्णू की जय के जयगोश से गुन्ध उठा
33:37स्वर्ग से पुष्पवरिष्टी होने लगी, दिव्य नगाडे बज उठे और शंकनाज से संपूर्ण, वातावर्ण, पवित्र और भक्तिमय हो उठा
33:47भगवान शिव ने भी अब पूर्णत, शांत और प्रसन्न चित्थ होकर एक बार फिर भगवान विश्णू का आभार व्यक्त किया
33:55और उनके असीम सनरक्षन को हृदय से स्विकार किया
34:00उन्होंने माया की शक्ती और भगवान विश्णू की परम रक्षा के महत्व पर गेहन चिंतन किया, जिसने उन्हें इस अन्होनी
34:07से बचाया था
34:09इस प्रकार सभी देवताओं की जैजैकार के बीच यह दिव्य सभा एक अद्भुत विजय और धर्म की पुनरस्थापना के प्रतीक
34:18के रूप में संपन्न हुई
34:20और फिर से ब्रहमांड में शांती और व्यवस्था का सामराज जिस्थापित हुआ, जो भगवान विश्णू की सर्वोच्चता और उनके न्यायपूर्ण
34:29शासन का शाश्वत प्रमार था
34:32किन्तु ब्रहमांडिय शांती के क्षणिक विराम के बीच एक नई आसुरी शक्ती का उदे हुआ, जिसने देवों और रिशियों की
34:40चिन्ताएं फिर से बढ़ा दी
34:43विरिकासुर नामक एक भयंकर असुर, जिसके नेत्रों में क्रूर्ता और हृदय में अहंकार भरा था, असीम शक्ती प्राप्त करने की
34:51लालसा में तीवर तपस्या में लीन हो गया
34:54इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
35:02उसकी कठोर तपस्या इतनी प्रचंड थी कि स्वयं तीनों लोकों में कमपन उत्पन होने लगा और अगनी की ज्वालाए उसके
35:10चारों और प्रचंड रूप से धधक उठी
35:13इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
35:21अंत्र उसकी अविचल निष्ठा से प्रसंड होकर आदिदेव महादेव शिव अपनी दिव्य महिमा के साथ उसके सम्मुख प्रकट हुए
35:31इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
35:39व्रिकासुर ने भय और कृतग्यता के मिश्रित भाव से महादेव को प्रणाम किया और फिर अत्यंत ध्रिष्टता से एक ऐसा
35:47वर्दान मांगा जो संपून स्रिष्टी को संकट में डाल सकता था
35:52उसने शिव से वर्मांगा कि जिस किसी के भी सिर पर वह अपना हाथ रखे वह तत्काल भस्म हो जाए
35:59और महादेव ने अपनी सरलता के कारण उसे तथास्तु कह दिया
36:05जैसे ही वर्दान मिला वर्रिकासुर के मन में अहंकार और संदेह का बीस पनप उठा और उसने तुरंट उस वर्दान
36:13की शक्ती को स्वयंदाता भगवान शिव पर ही आजमाने का दुस्सा हस किया
36:19आशुतोष शिव अपने ही दिये वर्दान के जाल में फंसकर वरिकासुर की ओर बढ़ते हुए देखकर अचमभित रह गए और
36:27अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे
36:30इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
36:38भयंकर वरिकासुर वर्दान की शक्ती से उनमत्त होकर कैलाश परवत की उची चोटियों और घाटियों से होते हुए भयभीत महादेव
36:47का पीछा करने लगा
36:50देवों के देव महादेव अपनी ही उदार्ता के कारण उत्पन हुए इस संकट से घबराकर संपून ब्रहमांड में सहायता के
36:58लिए भटकते हुए अन्य देवताओं के पास पहुँचे
37:02किन्तु ब्रहमा और इंद्र सहित कोई भी देवताव रिकासुर की अदमय शक्ती के समक्ष निस्सहाय थे और वे भगवान शिव
37:10को इस विकट परिस्थिती से बचाने में असमर्थ रहे
37:14अंतिम आशा के रूप में भगवान शिव ने स्रिष्टी के पालनहार भगवान विश्णू की शरणली जोक्षीर सागर में अनंत शया
37:23पर विराजमान थे
37:25इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
37:33सर्वव्यापी भगवान विश्णू ने अपनी योगमाया से व्रिकासुर की आसुरी बुद्धी और अहंकार को भांप लिया और उसे परास्थ करने
37:42की एक युक्ती रची
37:44शन भर में भगवान विश्णू एक दिव्य और आकरशक बालक ब्राहमन ब्रहमचारी का रूप धारण कर व्रिकासुर के मार्ग में
37:52प्रकट हुए
37:54इस पावन प्रसंग में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
38:02ब्रहमचारी ने मधुरवानी में व्रिकासुर की शक्ती की प्रशंसा की, किन्तु उसके वर्दान की सत्यता पर चतुराई से संदेह व्यक्त
38:10किया
38:10यह कहकर कि शिव अपनी सौमिता के कारण कभी कभी चल भी कर सकते हैं
38:17मायावी बुद्धी से परिपूर्ण उस ब्रहमचारी ने व्रिकासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखकर वर्दान की परीच्शा करने का
38:25सुझाव दिया
38:26ताकि उसे उसकी शक्ती का पूर्ण विश्वास हो जाएं
38:30आंकार और मूर्खता से अंधा होकर व्रिकासुर ने ब्रहमचारी के मीठे वचनों में फसकर बिना सोचे समझे अपना हाथ अपने
38:39ही सिर पर रख दिया
38:41शन भर में व्रिकासुर का दानवी शरीर अगनी के समान भस्म हो गया और वह भयंकर असुर वही भूमी पर
38:48राख के धेर में बदल गया जिससे ब्रहमांड भय मुक्त हुआ
38:53इस पावन प्रसंद में वर्दान, शक्ती और बुद्धी का महत्व की महिमा का वर्णन किया गया है
39:00इस प्रकार भगवान शिव संकट से मुक्त हुए और संपूर्ण ब्रहमांड में भगवान विश्नु की अलोकिक बुद्धी और धर्म की
39:09स्थापना की जैजैकार गूँच उठी जो असीम शक्ती पर विवेक की विजय का शाश्वक प्रमान थी