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पिछले एपिसोड में, स्यमंतक मणि की गाथा समाप्त हुई और भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इस नए एपिसोड में, द्वारका में प्रेम और शक्ति की एक और महागाथा शुरू होती है। विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी, अपने भाई रुक्मी के विरोध के बावजूद, भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती हैं और उनसे विवाह करने का संकल्प लेती हैं। जब उन्हें शिशुपाल से विवाह करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो वे श्रीकृष्ण को एक मार्मिक संदेश भेजकर सहायता मांगती हैं। श्रीकृष्ण, रुक्मिणी के प्रेम और विश्वास से अभिभूत होकर, उन्हें स्वयंवर से हरण कर लाते हैं, और एक भयंकर युद्ध में रुक्मी तथा अन्य राजाओं को पराजित करते हैं। द्वारका में रुक्मिणी से विवाह के बाद, उनके पुत्र प्रद्युम्न का जन्म होता है, जो कामदेव के पुनर्जन्म थे। लेकिन यह खुशी अल्पकालिक होती है, क्योंकि शिशु जन्म के तुरंत बाद, मायावी शंबरासुर प्रद्युम्न का अपहरण कर लेता है, जिससे द्वारका में एक बार फिर शोक छा जाता है। जानिए श्रीकृष्ण के जीवन की इन महत्वपूर्ण घटनाओं और उनके दिव्य प्रेम तथा पितृत्व के इस संघर्ष को! #विष्णुपुराण #श्रीकृष्ण #रुक्मि
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00:00स्यमंतक मनी को पुनह प्राप्त कर और जामवंत की पुत्री देवी जामवती को अरधांगिनी बनाकर भगवान श्रीकृष्ण भव्य और दिव्य
00:08नगरी द्वारका में प्रवेश करते हैं।
00:12द्वार्का के नागरिक अपने प्रिय राजा श्री कृष्ण के कलंक मुक्त होने और उनकी विजय पर उच्सव मनाते हुए उन
00:19पर पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं।
00:23भगवान श्री कृष्ण द्वार्का की भव्य राज सभा में प्रवेश करते हैं, जहां उनकी दिव्य आभा से पूरा कक्ष प्रकाश
00:31मान हो उठता है।
00:33अपनी भूल और जूठे आरोप पर अत्यंत लजजित होकर महाराज सत्राजित द्वार्का के राज़गरबार में श्री कृष्ण के सम्मुख नत्मस्तक
00:42हो जाते हैं।
00:45भगवान श्री कृष्ण अत्यंत उदार्ता पूर्वक दिव्य और चमकीली स्यमन तक मनी को रोते हुए सत्राजित के हाथों में सौंप
00:53देते हैं।
00:55अपने पापों के प्रायश्चित और भगवान से संबंध स्थापित करने के लिए सत्राजित अपनी परम सुंदरी पुत्री सत्यभामा का विवाह
01:03श्री कृष्ण से करने का निर्णय लेते हैं।
01:07राजकुमारी सत्यभामा अपने विवाह की तैयारी करते हुए स्वयन को दिव्यवस्त्रों और सुवण आभूशनों से सुसजित कर रही हैं।
01:16द्वारका के भव्य विवाह मंडप में अगनी देव को साक्षी मानकर भगवान श्रीकृष्न और राजकुमारी सत्यभामा का पानि ग्रहन संसकार
01:26संपन होता है।
01:29देवी सत्यभामा और देवी जामवती के साथ भगवान श्री कृष्ण द्वारका के राजमहल में ग्रेह प्रवेश कर बड़ों का आशिरवाद
01:37लेते हैं
01:39यद्यपी स्यमन तक मनी को सत्राजित की तिजोरी में सुरक्षित रख दिया गया था किन्तु उसकी अलोकिक कांती लोभी लोगों
01:47के मन में लालच उत्पन्न कर रही थी
01:51यादव वन्ष के वीर अक्रूर और कृत्वर्मा एकांत में बैठ कर सत्राजित के पास मनी होने पर अपनी असहमती और
01:58असंतोष व्यक्त करते हैं
02:01लालच और इर्श्या की अगनी में जलता हुआ क्रूर योध्धा शद्धन्वा सत्राजित की हत्या कर मनी को चुराने का शड्यंत्र
02:09रचता है
02:12अज्यानता के अंधकार में राजा सत्राजित रात्री के समय अपने कक्ष में स्यमंतक मनी की सुरक्षा की चिंता में लीन
02:19है
02:21परधरात्री के सन्नाटे को चीरते हुए, क्रूर शत्धनवा अपने सैनिकों के साथ सत्राजित के महल पर अचानक धावा बोल देता
02:30है
02:31अपने प्राणों और मनी की रक्षा के लिए व्रिध सत्राजित और अत्याचारी सत्धनवा के बीच महल के भीतर ही भीशन
02:39युद्ध छिड़ जाता है
02:42शत्धनवा क्रूरता से राजा सत्राजित का वध कर देता है और चमक्ती हुई स्यमंतक मनी लेकर अंधकार में विलीन हो
02:49जाता है
02:51अपने पूजय पिता की क्रूर हत्या का समाचार सुनकर राजकुमारी सत्यभामा का हृदय गहरे शोक और प्रचंड क्रोध से भर
03:00जाता है
03:02विलाब करती हुई सत्यभामा भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचती हैं और अपने पिता के हत्यारे को दंडित करने की न्यायपूर्ण
03:10मांग करती हैं
03:13अपनी प्रिय पतनी के आसूओं को पोंचते हुए दयालू श्रीकृष्ण अपराधी शद्धन्वा का समूल नाश करने की भीशन प्रतिग्या लेते
03:21हैं
03:23अपने ध्राता बल्राम के साथ भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्यरत पर सवार होकर पापी शद्धन्वा का पीछा करने के लिए निकल
03:32पड़ते हैं
03:34अपने प्राणों के भय से कापता हुआ पापी शद्धन्वा वेगवान अश्व पर सवार होकर अंधकार भरे वन की ओर प्राण
03:42बचाने के लिए तीवर गती से भाग रहा था, जबकि भगवान श्रीकृष्ण और बलशाली बलराम उसका अविचलित मन से पीछा
03:50कर रहे थे
03:52आकाश में बिजली की गती से दौरता हुआ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का दिव्यरत पापी शद्धन्वा को पकड़ने के लिए
03:59उनके अटूट संकल्प का साक्षी बन रहा था, जैसे कोई तीवरगामी वजर लक्षे की ओर बढ़ रहा हो
04:07भागते भागते अंतह शद्धन्वा का घोड़ा, ठककर प्रित्वी पर गिर पड़ा, और उसकी आखों में मृत्यू का स्पष्ट भय जलक
04:15रहा था, मानो काल का साया उस पर मंदरा रहा हो
04:20शद्धन्वा पैदल ही भागने का अंतिम प्रयास करता है, लेकिन शीधर ही भगवान श्री कृष्ण उसे पकड़ लेते हैं और
04:28उसका वध करने के लिए उद्यत होते हैं, जबकि बलराम को अभी भी मनी की उपस्थिती पर संदेह था
04:36जब भगवान श्री कृष्ण शद्धन्वा के निश्प्रान शरीर की तलाशी लेते हैं, तो बहुमुल्य स्यमन तक मनी वहां नहीं मिलती,
04:44जिससे सभी के मन में एक गहरा रहस्य और चिंता उत्पन्न होती है
04:50मनी न मिलने पर बलदेव बलराम, क्रोधित होकर और श्री कृष्ण पर मनी छिपाने का संदेह करके, उनसे अलग होकर
04:58मथुरा लोट जाते हैं, जिससे भायचारे में एक शनिक दरार पढ़ जाती है
05:04दुखद मन से भगवान श्री कृष्ण द्वार का लोटते हैं, जहां वे सत्यभामा को शद्धनवा के वध की सूचना देते
05:11हैं, लेकिन स्यमंतक मनी के अभी भी लापता होने की बात से उनकी चिंता और भी बढ़ जाती है
05:19इसी बीच भारतवर्ष के सुदूर पश्चिम में स्थित, भव्य महलों और हरे भरे उद्ध्यानों से सुशोभित विदर्भ देश की राजधानी
05:28कुंडिनपूर का रमनिय द्रिश एक नई गाथा के उद्भव का संकेत देता है
05:34विदर्भ के राजा भीश्मक एक न्यायप्रिय और धर्मात्मा शासक अपने भव्य राजधर्बार में स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान होकर प्रजा के
05:44कल्यान हेतु मंत्रियों और विद्वानों के साथ गंभीर विचार विमर्ष कर रही हैं
05:50इन विशाल महलों के भीतर अनुपम सुन्दरी और सदाचारिनी राजकुमारी रुकमिनी अपनी सक्खियों के साथ अत्यंत सौमय और शांत मुद्रा
05:59में दिखती हैं
06:00मानो वह किसी दिव्य कमल का साकार रूप हो
06:05राजकुमारी रुकमिनी ने भगवान श्रीकृष्ण के अध्भुत पराक्रम उनकी दैविय सुन्दर्ता और उनके परम गुनों के बारे में अंगिनत कथाए
06:13सुनी थी
06:14जिससे उनके हृदय में अगाध प्रेम अंकुरित हो चुका था
06:18वह अकसर भगवान श्रीकृष्ण के शौर्य और उनकी मनमोहक सुन्दर्ता के चित्रों को निहारती थी
06:25कल्पना में उन्हें अपना पती मान कर उनकी दिव्य चवी में पूरी तरह खो जाती थी
06:32मन ही मन रुकमिनी ने श्रीकृष्ण को ही अपना जीवन साथी स्विकार कर लिया था
06:37उनकी हर इच्छा, हर भावना में सिर्फ उनहीं का दिव्य वास्था जैसे कोई पवित्र नदी सागर की ओर प्रवाहित होती
06:45है
06:47तभी उनके बड़े भाई रुकमी एक अहंकारी और क्रोधी राजकुमार तीवर वेग से महल में प्रवेश करते हैं
06:54उनके चहरे पर चिंता और क्रोध के तीखे भाव स्पष्ट जलक रहे हैं
07:01रुकमी अपनी बहन के मन में पल रहे क्रिश्न प्रेम से अनभिग्य नहीं थे
07:05और वह इस बात पर अत्यंत क्रोधित थे क्योंकि उन्हें यह संबंध अपने परिवार की प्रतिष्ठा के विरुध लगता था
07:14रुकमी अपनी बहन रुकमिनी का विवाह चेदी नरेश शिशुपाल से कराना चाहते थे
07:20जो श्रीक्रिश्न के कट्टर शत्रु थे और अपनी क्रूरता के लिए जाने जाते थे
07:25एक ऐसा गठ बंधन जो शत्रुता को और गहरा कर देता
07:30रुक्मी अपनी बहन रुक्मिनी पर शिशुपाल से विवाह करने के लिए कठोर्ता से दबाव डाल रहे थे
07:37उनके शब्द तीखे और अडिक थे
07:39मानो यह एक अजे राजकिय फर्मान हो जिसे मानना ही होगा
07:45रुक्मिनी अपने भाई के इस करूर निर्नै से अत्यन्त दुखी और भैभीत थी
07:50उनकी आखों में अश्रु भराय थे क्योंकि उनका हृदय केवल भगवान श्री कृष्ण के लिए समर्पित था
07:58राजा भीश्मक अपनी प्रिय पुत्री के प्रेम और पुत्र की हटधर्मिता के बीच पन से हुए
08:04अत्यन्त दुविधा और चिंता में डूबे हुए दिख रहे थे
08:07मानो वे एक कठिन धर्मसंकट का सामना कर रही हो
08:12अशान्थ हृदय से राजकुमारी रुकमिनी अपने एकांत कक्ष में भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे आएं और
08:21उन्हें इस विशम परिस्थिती से मुक्ती दिलाएं उनका प्रेम ही उनकी एक मात्र आशा थी
08:27व्याकुल राजकुमारी रुकमिनी ने अपने आसुओं को पोचकर अंत्य एक अत्यंत गोपनिय निर्नय लिया कि वे अपने प्राणप्री श्री कृष्ण
08:36को अपनी व्यथा का संदेश भेजेंगी
08:40कापते हाथों से उन्होंने भोजपत्र और स्वर्ण में लेखनी उठाई, मानों वह केवल पत्र नहीं बलकि अपने जीवन की अंतिम
08:48दोर थाम रही हो
08:51रुक्मिनी ने अपने हरिदय की अगाध प्रीती और पूर्ण समर्पन को शब्दों में पिरोना आरंभ किया, जिससे उनके नेत्रों से
08:59गिरे अश्रु भोजपत्र पर बिखर गए
09:02उन्होंने पत्र में लिखा कि जिस प्रकार सिंह का भाग गीदर स्पर्ष नहीं कर सकता, उसी प्रकार उनका यह समर्पित
09:10तन्मन केवल द्वारकाधीश के लिए ही सुरक्षित है
09:15राजकुमारी ने आगे लिखा कि विवाह से ठीक पहले वे कुल्देवी मा गौरी के मंदिर में पूजा के लिए जाएंगी
09:21और वही उनके हरण का सबसे उत्तम समय होगा
09:26उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी की यदि द्वारकाधीश उन्हें अपनाने नहीं आए तो वे विश्पान कर अपने प्राण त्याग देंगी पर
09:34किसी अन्यकी दासी नहीं बनेंगी
09:37अत्यंत जतन से रुक्मिनी ने उस पवित्र संदेश को मोड़ा और अपने आसूओं की बूंदों से उस गोपनिय पत्र को
09:45सील कर दिया
09:46इसके पश्चात उन्होंने राजप्रासाद के सबसे विश्वस्निय धर्म प्रायन और परम बुद्धिमान व्रिद्ध ब्राहमन सुननंद को एकांत में अपने कक्ष
09:56में बुलाया
09:58वह परम ज्यानी ब्राहमन राजकुमारी के उदास मुख और कक्ष में छाई गंभीर निरवता को देखकर तुरंत ही संकट की
10:06गहराई को भांप गया
10:09रुक्मिनी ने कापते हुए और आशा से भरी नजरों से देखते हुए वह अमूल्य और जीवंदायनी पत्र उस विप्रदेव के
10:16हाथों में सौंक दिया
10:19उन्होंने अत्यंत करोन स्वर में निवेदन किया कि वे बिनाक्षन गवाय तुरंत ही द्वार्का के लिए प्रस्थान करें क्योंकि उनके
10:27पास समय बहुत कम है
10:30राजकुमारी के निश्चल प्रेम और धर्मसंकट को देख कर उस दयालू ब्राहमन ने प्रतिज्या की कीवे अपने प्राणों की बाजी
10:38लगा कर भी यह संदेश पहुचाएंगे
10:42विप्रदेव ने उस गोपनिय पत्र को अत्यंत आदर पूर्वक अपनी सूती धोती के भीतर अपने वक्षस्थल के पास पूर्ण सुरक्षित
10:50रख लिया
10:51संध्या के धुन्धलके में महल के रक्षकों की आखों से बचते हुए वह वृद्ध ब्राहमन चुपचाप कुंदिनपूर के विशाल मुख्य
11:00द्वार से बाहर निकल गया
11:02उन्होंने घने जंगलों, उफन्ती नदियों और पथरीले रास्तों को पार करते हुए द्वारका की दिशा में अपनी अत्यंत कठिन यात्रा
11:10का आरंब किया
11:12उधर कुंदिनपूर में रुकमी और शिशुपाल के सैनिक पूरी तरह बेखबर होकर विवाह की तैयारियों और चौकसी में व्यस्थ थे
11:22भीशन धूप और ठंडी हवाओं की परवाह किये बिना वह कर्तव्यनिष्ट ब्राहमन केवल इश्वर के कार्ये को सिध्ध करने के
11:29लिए अनवरत चलता रहा
11:31कई दिनों की अथक यात्रा के पश्चात अंत्त उस ब्राहमन को सुदूर क्षितिच पर द्वारका नगरी के भव्यस्वर्णिम शिखर चमकते
11:40हुए दिखाई दिये
11:42ठके हुए परंतु उच्साहित कदमों से वह विप्रदेव द्वारका के भव्य राजदर्बार में प्रविष्ठ हुए और द्वारकाधीश से तुरंत मिलने
11:51की प्रार्थना की
11:53दिव्यस्वर्ण सिनहासन पर विराजमान भगवान श्रीकृष्ण ने उस ठके हुए ब्राहमन का परम आदर के साथ स्वागत किया और उनके
12:02नैनों में रुक्मिनी के प्रेम की पूरी गाथा तैर गई
12:05ठके हुए व्रिद्ध ब्राहमन ने अत्यंत श्रद्धा और कापते हाथों से राजकुमारी रुक्मिनी का वह अत्यंत गोपनिय प्रेम पत्र श्रीकृष्ण
12:14के पवित्र करक्मलों में सौंक दिया
12:18द्वारकाधी श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ उस पवित्र संदेश की स्वर्ण मुहर खोली और एकाग्रचित होकर रुक्मिनी के अक्षरों
12:27में छिपे भावों को पढ़ने लगे
12:29पत्र में अनकित रुक्मिनी के निश्काम, समर्पन और शिशुपाल के अधर्म से रक्षा करने की आकुल पुकार ने श्रीकृष्ण के
12:37हृदय को करुणामय तरंगों से भर दिया
12:41रुक्मिनी के अलौकिक प्रेम और अटूट विश्वास को पहचान कर श्रीकृष्ण को आभास हुआ कि वे कोई साधारन राजकुमारी नहीं,
12:49बलकि उनकी शाश्वत शक्ती देवी लक्ष्मी ही है
12:54श्रीकृष्ण के दिव्य कपोलों पर एक द्रेढ और कल्यानकारी मुस्कान तिर तैर आई और उन्होंने ब्राहमन को आश्वस्थ करते हुए
13:02रुक्मिनी की रक्षा का अटल संकल्प लिया
13:06बिना एक क्षण गवाए, श्रीकृष्ण ने अपने निश्थावान सार्थी दारुक को तुरंत अपना दिव्य गरुर्धवज रत सजाकर तयार करने का
13:15आदेश दिया
13:17सार्थी दारुक ने तीवर गती से वायू के समान वेगवान चार दिव्य गोडो, शैब्य, सुग्रीव, मेखपुष्प और बलाहक को स्वर्ण
13:25रत में जोत दिया
13:27उसी समय विशालकाय और परम पराक्रमी बलराम अपने विशाल हल और मुसल को धारन किये राजसभा में प्रविष्ठ हुए
13:36श्रीकृष्ण ने बलराम को रुकमिनी के पत्र की गाथा सुनाई और रुकमी, जरासंध तथा शिशुपाल के कुटिल शड्यंत्र से अवगत
13:45कराया
13:46अनुज के प्रती अन्याय और धर्म की अभहेलना सुनकर बलराम के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और उन्होंने विशाल
13:54यादव सेना को प्रस्थान का आदेश दिया
13:57सात्य की और कृत्वर्मा जैसे महाप्राक्रमी यादव योध्धा तुरंट अस्त्रशस्त्रों से सुसजित होकर युध के लिए तत्पर हो गए
14:07भगवान श्रीकृष्ण अपने भव्यस्वर्णिन गरुर्ध्वजरत पर आरूढ हुए और उनका रूप कोटी-कोटी सूर्यों के समान तेजस्वी प्रतीत हो रहा
14:16था
14:17सार्थी दारुक ने चाबुक लहराया और चारों दिव्य अश्व पवन की गती से दौरते हुए विदर्भ देश की ओर निकल
14:25पड़े
14:26उनके पीछे बलराम के नेत्रित्व में यादवों की चतुरंगिनी सेना ढोलनगाडों की गर्जना के साथ कुंदिनपूर की दिशा में आगे
14:34बढ़ी
14:36उधर विदर्भ की राजधानी कुंदिनकूर में राजकुमारी रुकमिनी और शिशुपाल के भावी विवाह की तैयारिया भव्य रूप से की जा
14:44रही थी
14:46राजा भीशमक अपने पुत्र रुकमी के हट के आगे विवश होकर भारी मन से चेदिराज दंभोश और शिशुपाल का स्वागत
14:54कर रहे थे
14:56दुष्ट शिशुपाल के साथ जरासंध, शाल्व और दंतवकर जैसे अनेक अधर्मी राजा अपनी अपनी चतुरंगिनी सेना लेकर कुंदिनपूर पहुँच चुके
15:05थे
15:07राजमहल के अपने एकांत कक्ष में, राजकुमारी रुकमिनी देवी पार्वती की प्रतिमा के समक्ष बैठकर अश्रुपूरित नेत्रों से श्रीकृष्ण के
15:16आगमन की प्रतीक्षा कर रही थी
15:19विदर्भ देश की ओर जाने वाले मार्ग पर श्रीकृष्ण का स्वर्ण रत परवतों और नदियों को लांगते हुए बिजलिया उत्पन्न
15:27कर रहा था
15:29फ्रिदय में अटूट संकल्प और नेत्रों में अलौकिक जोती लिए द्वारकाधीश श्रीकृष्ण अपनी अर्धांगिनी का उद्धार करने कुंडिनपूर की सीमा
15:38के अत्यंत निकट पहुँच गए
15:41कुंडिनपूर का विशाल और भव्य सामराज्य आज विभिन राज्यों से आये शक्तिशाली राजाओं और उनके ठाठ बाट से पूरी तरह
15:49गूँज रहा था
15:51चेदिराज शिशुपाल अपनी अपार सेना और अहंकार के साथ स्वयमवर में अपनी जीत सुनिश्चित मानकर विवाह की तयारियों में लीन
16:00था
16:01मगध नरेश जरासंध ने शिशुपाल और रुकमी को चेतावनी देते हुए महल की सुरक्षा को अत्यंत कड़ा करने का गुप्ट
16:09निर्देश दिया
16:11राजकुमार रुकमी अपनी बेहन के विवाह को लेकर अत्यंत उत्साहित था और उसने द्वार काधीश को पराजित करने की बड़ी
16:19ब्री डिंगे हाकना शुरू कर दिया था
16:22इधर राजमहल के भीतर उदास और विवश राजकुमारी रुकमिनी अपनी सक्खियों के साथ कुल देवी के मंदिर की ओर प्रस्थान
16:31करने लगी
16:33मंदिर जाने वाले पूरे मार्ग को सैनिकों ने घेर रखा था जिससे किसी भी अन्होनी की आशंका को पहले ही
16:40समाप्त किया जा सके
16:43राजकुमारी रुकमिनी ने कापते कदमों से माता अंबिका के प्राचीन और भव्य गर्भगरह में प्रवेश किया
16:50उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से माता पार्वती की दिव्य प्रतिमा के समक्ष घुटने टेक दिये और कृष्ण को पती रूप में
16:58पाने की अंतिम प्रार्थना की
17:01तभी मंदिर के भीतर माता अंबिका की दिव्य प्रतिमा से एक अलोकिक और स्वर्णिम प्रकाश पुंच प्रकट हुआ, जिसने रुक्मिनी
17:09को आशिर्वाद दिया
17:11उसी क्षणक मंदिर के बाहरी द्वार पर बिना किसी शोर के भगवान श्री कृष्ण का दिव्य स्वर्ण रत वायुकी गती
17:18से आकर रुका
17:21सार्थी दारुक ने रत की बागदोर संभाली और श्री कृष्ण रत पर खड़े होकर मंदिर से बाहर आने वाले मार्ग
17:28पर अपनी द्रिश्टी टिका दी
17:30पूजा संपन्नकर जैसे ही रुकमिनी देवी मंदिर की सीधियों से नीचे उतरी उनकी व्याकुल आखें केवल अपने प्रिये को ढूंड
17:39रही थी
17:41भीड के बीच से गुजरते हुए सहसा रुकमिनी की द्रिश्टी द्वार काधिश श्री कृष्ण के मनमोहक मुखमंडल पर जाकर ठहर
17:49गई
17:50श्री कृष्ण ने क्षन भर का भी विलंब न करते हुए अपने रत को सैनिकों की भीड को चीरते हुए
17:56आगे बढ़ा दिया
17:58रत को निकट आते देख रुकमिनी ने बिना किसी संकोच के अपना कोमल हाथ श्री कृष्ण के बढ़े हुए बलशाली
18:06हाथ में सौंक दिया
18:08एक ही जटके में श्री कृष्ण ने रुकमिनी को हवा में उठाते हुए अपने रत पर बिठा लिया जिससे वहां
18:15उपस्थित सभी राजा हक्के बक्के रह गए
18:19ग्वारकाधीश का यह अदमय साहस देखकर वहां खड़े रक्षक और राजा केवल मुखदर्शक बनकर हाहाकार मचाने लगे
18:27यह समाचार पाते ही शिशुपाल क्रोध से पागल हो उठा और उसने अपनी म्यान से तलवार निकाल कर बदला लेने
18:35की प्रतिज्या की
18:38जरासंध और रुक्मी ने ततकाल अपनी विशाल सेनाओं को रथ का पीछा करने और कृष्ण को बंदी बनाने का आदेश
18:45दिया
18:47परंतु भगवान श्री कृष्ण का दिव्यरत रुक्मिनी देवी को लेकर पवनवेक से उर्ता हुआ क्षितिच की ओर ओजल हो गया
18:54जिससे शत्रों का मानमर्गन हो गया
18:58रुक्मी, शिशुपाल और जरासंध की विशाल सेनाए धूल का भीशन बवंदर उडाती हुई श्री कृष्ण के रथ का पीछा करने
19:05लगी
19:07क्रोध में जलता हुआ शिशुपाल अपनी चम्चमाती म्यान से खड़ निकाल कर अपनी सेना को यादवों का सर्वनाश करने का
19:15गर्जनापूर्ण आदेश दे रहा था
19:18मागध नरेश जरासंध ने अपनी विशाल गदा हवा में लहराते हुए अपने हाथियों को तीवर गती से आगे बढ़ने का
19:26संकेत दिया
19:28अपनी बहन के हरण से अपमानित रुक्मी प्रतिशोध की ज्वाला में अंधा होकर अपने रथ को पवन की गती से
19:35हाक रहा था
19:37दूर क्षितिज पर श्री कृष्ण का दिव्य स्वन रत तीवर वेग से भाग रहा था जिसके पीछे काले बादलों की
19:44भांती शत्रु सेना चा रही थी
19:47भगवान श्री कृष्ण अत्यंत शान्त और मंद मुस्कान के साथ चार श्वेत घोडों की स्वन रास थामे रत को सही
19:54दिशा दिखा रहे थे
19:57देवी रुकमिनी ने भयभीत होकर पीछे मुड कर देखा जहां उनके भाई की सेना बाणों की वर्षा करती हुई आ
20:04रही थी
20:06तभी महाबली बलराम के नेत्रित्व में यादव सेना शत्रु का मार्ग रोकने के लिए एक विशाल धाल की भांती खड़ी
20:13हो गई
20:15बलराम जी ने अपने भयंकर हल और गदा को उठा कर शत्रुओं पर ऐसा प्रहार किया की धर्ती काम उठी
20:23दोनों गिशाल सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया और गगन भेदी बानों से सूर्य का प्रकाश भी ढग गया
20:32शिशुपाल ने बलराम जी पर दर्जनों अगनिबान चलाए जिन्हें बलराम ने एक ही जटके में नश्ट कर दिया
20:40जरासंद के हाथी यादव रथों से टकराए जिससे चारों और अस्त्रशस्त्रों की गूंज और भयंकर चीतकार फैल गई
20:49बलराम जी के सिन्हनाद से शत्रों के हाथी डर कर पीछे भागने लगे और शिशुपाल की सेना में भगदर मच
20:56गई
20:58पराजत होकर जरासंद और शिशुपाल की सेनाएं पीछे हटने पर मजबूर हो गई परंतु रुक्मी का क्रोध कम न हुआ
21:07रुक्मी ने अपनी सेना के मुख्य भाग से अलग होकर अकेले ही श्रीकृष्ण का पीछा करना जारी रखा
21:15उसने अपने धनुष पर बान चड़ा कर श्रीकृष्ण को ललकारा और युद्ध के लिए दुस्साहस दिखाया
21:22रुक्मिनी ने अपने भाई का हट देखकर कापते हाथों से श्रीकृष्ण से उसके जीवन की भीख मांगी
21:30भगवान श्रीकृष्ण ने अपने रथ को एक विशाल पहाडी टीले पर रोक दिया और गंभीर मुद्रा में पीछे मुडे
21:39रुक्मी अपने रथ से कूद कर अपनी धारदार म्यान से तलवार निकाल कर श्रीकृष्ण की ओर जप्टा
21:46प्रतिशोध की अगनी में जलते हुए रुक्मी ने भीशन प्रतिज्याकी की वह कृष्ण को हराए बिना कुंडिनपुर में प्रवेश नहीं
21:54करेगा
21:55अत्यंत क्रोध में भरकर रुक्मी अपनी चम्चमाती तलवार हवा में लहराते हुए सीधे भगवान श्रीकृष्ण की ओर आगे बढ़ा
22:05परम शांत और दिव्य मुस्कान के साथ भगवान श्रीकृष्ण अपने रत से नीचे उतरे और उस अहंकारी राजकुमार का सामना
22:13करने के लिए खड़े हो गए
22:16रुकमी ने अपनी पूरी शक्ती से श्रीकृष्ण पर पहला प्रहार किया लेकिन प्रभु ने अत्यंत सहज्टा से उसे अपने हाथ
22:24की मुद्रा से ही पीछे धकेल दिया
22:27दोनों योध्धाओं के बीच एक भीशन और तीवर द्वंद्व युद्ध छिड़ गया जहां रुकमी के प्रहारों की गती हवा में
22:35गूंजने लगी
22:36क्रोध से अंधा होकर रुकमी बार-बार अपनी तलवार से प्रहार कर रहा था परंतु श्रीकृष्ण बिजली की भाती फुर्ती
22:44से हर वार से बचते रहे
22:47अगले ही क्षण श्रीकृष्न ने एक शक्तिशाली प्रहार से रुक्मी की भारी तलवार को बीच से दो टुक्रों में तोड़
22:54दिया
22:56अपनी तलवार तूटते देख रुक्मी ने तुरंत अपनी म्यान से एक तीखा खंजर निकाला और फिर से श्रीकृष्न पर जपटा
23:16अंकट में देख कर रत में बैठी रुक्मिनी का हृदय देहल उठा और वे दौरती हुई युद्ध भूमी में आ
23:22गई
23:24रुक्मिनी ने रोते हुए भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में गिर कर अपने अज्यानी भाई के जीवन की भीख मांगनी
23:31शुरू कर दी
23:32अपनी प्रियरुक्मिनी की आखों में आसु देख कर परम कृपालु श्री कृष्ण का हृदय अत्यंत द्रविथो उठा
23:41श्री कृष्ण ने रुक्मिनी की प्रार्थना स्विकार की, किन्तु उन्होंने निर्ने लिया कि इस अहमकारी योध्धा के घमंड को पूरी
23:49तरह नश्ट करना अनिवार्य है
23:52प्रभु ने अपनी तीखी तलवार से रुक्मी के सिर के आधे बाल और आधी मूच को अत्यंत अपमान जनक धंग
23:59से मुंड दिया
24:01अपनी इस परमपराजय और घोर अपमान पर रुक्मी पीडा और लज्जा से चीख उठा क्योंकि एक शत्रिय के लिए यह
24:09मृत्यू से भी बड़ा दंड था
24:12इसके बाद श्रीकृष्ण ने उस गर्वहीन और पराजित रुक्मी को उसके ही तूटे हुए रथ के पहिये से कसकर बांध
24:20दिया
24:21दूर खड़े शिशुपाल और अन्य राजाओं के सैनिक इस भयानक द्रिश्य को देखकर थर-थर कापने लगे
24:29रुक्मी की ऐसी दुर्दशा देखकर अन्य बचे हुए राजा और उनके सैनिक अपनी जान बचाकर रणभूमी से भाग खड़े हुए
24:38रुक्मीनी ने भारी मन से अपने बांधे गए भाई की ओर देखा, जो अब अपने अहंकार के विनाश का मूख
24:45साक्षी बना खड़ा था
24:47भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत प्रेमपूर्वक रुक्मिनी का हाथ थामा और उन्हें सांत्वना देते हुए पुन्ह अपने स्वर्ण रत पर बैठाया
24:57विजी श्रीकृष्ण और देवी रुकमिनी का दिव्यरत अस्थ होते सूर्य की स्वर्णिम किर्णों के बीच द्वारका की ओर प्रस्थान कर
25:05गया
25:07द्वारका के स्वर्ण द्वारों पर जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुकमिनी का दिव्यरत पहुचा, वैसे ही पूरी नगरी शंकनाद
25:15और दुन्दुभी की मंगल ध्वनियों से गूंश उठी
25:19महल के जरोखों और गलियों में खड़े द्वार कावासी अपने प्रिय प्रभु और उनकी नविवाहिता देवी पर रंगविरंगे सुगंधित पुष्पों
25:27की वर्षा करने लगे
25:30राजमहल के सिनहदवार पर माता देवकी और महाराज वसुदेव आर्ती की थाल सजाए अपनी पुत्रवधु और पुत्र की प्रतीक्षा में
25:39अत्यंत भावुक खड़े थे
25:41देवी रुक्मिनी ने अत्यंत संकोच और मर्यादा के साथ अपने कोमल चरण रत से नीचे उतारे जिससे पूरी भूमी पर
25:50अलोकिक सुगंध बिखर गई
25:53माता देवकी ने परमस नहमई मुस्कान के साथ श्रीकृष्ण और रुक्मिनी की आर्ती उतारी और उन्हें अनंतकाल तक सुखी रहने
26:01का आशीश दिया
26:04रुक्मिनी ने अपने दाहिने पैर से अक्षत से भरे कलश को स्पर्ष कर द्वारका के राजमहल में ग्रिह प्रवेश किया
26:11जिससे द्वारका में सुख सम्रिधी के नए द्वार कुल गए
26:15विवा मंडप को लाखो दियों की कतारों, दिव्य पारिजात, पुष्पों और रेश्मी वस्त्रों से ऐसा सजाया गया था मानो स्वयन
26:23देवलोक धर्ती पर उतर आया हो
26:27महर्शी गर्ग और वेद पाठी ब्राहमनों ने पवित्र अगनी कुंड के समक्ष बैठ कर ब्रहमांडिय उर्जा को जागरत करने वाले
26:34वेद मंत्रों का सस्वर पाठ आरंभ किया
26:38स्वर्णिन पीतांबर और चम्चमाते मयूर पंक से सुशोगित मुकुट धारन किये भगवान श्रीकृष्न मंद मुस्कान के साथ विवाह वेदी पर
26:47आकर विराजमान हुए
26:49लाल और सुनहरी जरी वाली रेशमी साडी और अलोकिक आभूष्नों से सजी देवी रुकमिनी अपनी सक्खियों के साथ मंदगती से
26:58मंदप की ओर बढ़ने लगी
27:00जब श्रीकृष्न और रुकमिनी विवाह वेदी पर एक दूसरे के समीप बैठे तब उनके चहरों पर जहलकता दिव्यतेज पवित्र अगनी
27:09की लप्टों से और भी अधिक दैदी प्यमान हो उठा
27:13मुख्य पुरोहित ने दोनों के दाहिने हाथों में मंगल कंगन बांध कर उनके जन्मजन मांतर के अटूट प्रेम और पवित्र
27:21बंधन को सुद्रिड किया
27:24मंतरो चार के बीच कन्यादान की पवित्र रस्म पूरी की गई जिसमें देवी रुकमिनी का हाथ जगदीश्वर श्री कृष्ण के
27:32हाथों में सौंक दिया गया
27:34पानेग्रहन संसकार के क्षण में जैसे ही श्री कृष्ण ने रुकमिनी का हाथ थामा, वैसे ही स्वर्ग से अपसराय नृत्य
27:42करने लगी और गंधर्वों ने मधुर संगीत छेड़ दिया
27:46दोनों ने पवित्र अगनी के साक्षी भाव में साथ फेरे लिये और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के साथ वचनों
27:54को अपने जीवन का आधार स्विकार किया
27:57भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कोमल उंगलियों से देवी रुकमिनी की मांग में सिंदूर भरा, जिससे उनके सौभाग्य और अखन सुहाग
28:06की दिव्य भोशना हुई
28:08इसके पश्चात श्रीकृष्ण ने रुकमिनी के कंठ में मंगल सूत्र बांधा, जिसने उनके हृदय को सदा के लिए नारायन की
28:16अनन्य चेतना से जोड़ दिया
28:19आकाश में देवराज, इंद्र, भगवान, शिव और ब्रहमाजी ने प्रकट होकर इस दिव्य युगल पर कल्पवरिक्ष के सुगंधित पुष्प बरसाएं
28:28और देवताओं ने दुन्दुभी बजाई
28:31संपूर्ण सभा और द्वारका के समस्थ नागरिकों ने नव विवाहित युगल के चर्णों में शीष जुकाया और जय श्रीकृष्ण जय
28:39रुकमिनी के जैकारों से आकाश बुन्जाय मान कर दिया
28:42अंत में सिनहासन पर विराज मान श्रीकृष्ण और साक्षात महालक्ष्मी स्वरूपा रुकमिनी ने अपनी मंद मुस्कान से संपूर्ण चराचर जगत
28:52को शांती और मोक्ष का वर्दान दिया
28:56काल चक्र की मंद गती के साथ द्वारका नगरी में महाराज श्रीकृष्ण और महारानी रुकमिनी के धर्मप्रायन शासन के अधीन
29:04सुख, सम्रिध्धी और शांती का एक स्वर्ण युग आरंभ हुआ
29:09शीघर ही द्वारका के राजमहल में अपार हर्ष चा गया जब महारानी रुकमिनी ने गर्भ धारण किया और उनके मुख
29:17मंदल पर एक अलोकिक दिव्यतेज प्रकट होने लगा
29:21कैलाश परवत के हिमशिकरों पर विराजमान महादेव, शिव और माता पारवती ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस आने वाले अलोकिक जन्म
29:30को देखा और अत्यंत प्रसन्न हुए
29:33यह शिशु कोई और नहीं, बलकी साक्षात कामदेव थे, जिन्हें प्राचीन काल में देवताओं के कार्यहेतु समाधी भंग करने पर
29:42भगवान शिव के तीसरे नेत्र की क्रोधागनी ने भस्म कर दिया था
29:47कामदेव की पत्नी रती के विलाप से द्रवित होकर भगवान विश्णु ने उन्हें वर्दान दिया था कि द्वापर युग में
29:54कामदेव उनके ही पुत्र के रूप में पुनः शरीर धारण करेंगे
29:59पती के पुनरजन्म की प्रतीक्षा में व्याकुल देवी रती प्रित्वी लोग पर एक साधारण दासी का रूप धर कर उस
30:07शुब घडी की राह देख रही थी
30:10और फिर वह शुब रात्री आई जब आकाश में रोहिनी नक्षत्र उदित हुआ शीतल पवन बहने लगी और संपून द्वार
30:18का दिव्य प्रकाश से सराबोर हो उठी
30:22महारानी रुकमिनी के गर्भ से एक अत्यंत सुन्दर बालक का जन्म हुआ जिसकी देह से निकलने वाले अलौकिक प्रकाश ने
30:30सूतिकाग्रह को जग्म का दिया
30:33जगदीश्वर श्रीक्रिष्ण ने अपने नवजात पुत्र को अपनी भुजाओं में लिया और उनके मुख पर एक रहस्य में मुस्कान तैर
30:40गई क्योंकि वे बालक के पूर्वजन्म के रहस्य को जानते थे
30:45माता रुक्मिनी अपने पुत्र की अद्वितिय सुन्दर्ता को निहार कर मंत्रमुग्ध थी जिसका मुख मंडल उसके पिता के समान ही
30:54सम्मोहक और कांतियुग्ध था
30:56तभी देवर्शी नारद वीना की मधुर जंकार के साथ राजसभा में पधारे और उन्होंने बालक का नाम प्रद्युम्न घोशित करते
31:05हुए उसकी महानता का गान किया
31:08इस दिव्य जन्म के उल्लास में पूरी द्वार का नगरी को दीपों से सजाया गया और नागरिकों ने धोलनगाडों की
31:15थाप पर निरित्य कर आनंद उत्सव मनाया
31:19एकांट में देवर्शी नारद ने श्री कृष्ण और रुक्मिनी को स्मरण कराया कि यह शिशु कोई साधारन बालक नहीं बलकि
31:27स्वय कामदेव हैं जो अपनी पतनी रती के समीप लौट आये हैं
31:33स्वर्गलोग से देवराज इंद्र, अपसराओं और गंधर्वों ने द्वारका के उपर कल्पवरिक्ष के सुगंधित पुष्पों की वर्षा की जिससे संपूर्ण
31:42वातावर्ण सुवासित हो उठा
31:45किन्तु इस आनंद के पीछे देवर्षी ने एक गुप चेतावनी भी दी की कामदेव का पुरातन शत्रु महाबली राक्षस शंबरासुर
31:54इस बालक के प्राणों का प्यासा बनेगा
31:57दूर महेंद्र परवत के अंधकार मईगर्थ में विशाल और भयानक राक्षस राज शंबरासुर अपने लौह सिनहासन पर बैठा हुआ अपनी
32:06शक्ती के मद में चूर था
32:09तभी शंबरासुर के दुष्ट तांत्रिकों ने नक्षत्रों की गणना करके उसे सचेत किया कि उसका काल कामदेव का अवतार द्वारका
32:18में जन्म ले चुका है
32:20यह सुनते ही शंबरासुर क्रोध से देहल उठा और उसने प्रतिज्याकी की वह उस बालक को पालने में ही समाप्त
32:28कर देगा
32:30द्वारका के महल में माता रुकमिनी ने अज्यात आशंका से कामप कर अपने सुकोमल शिशु प्रद्युम्न को अपनी चाती से
32:38और कसकर लगा लिया
32:40तब साक्षात नारायन रूप श्री कृष्ण ने रुकमिनी का हाथ ठाम कर उन्हें आश्वस्त किया कि धर्म की रक्षा के
32:47लिए नेती का मार्ग कोई नहीं बदल सकता और विजय अंतह सत्य की होगी
32:53जैसे ही मध्यरात्री की काली छाया द्वार का पर छा गई शंबरासुर की मायावी शक्तियों से प्रेरित एक भयानक और
33:01भारी कोहरा धीरे-धीरे महल की प्राचीर को अपनी चपेट में लेने लगा
33:07महल के भीतर रेश्मी पालने में सो रहा नवजात शिशु प्रद्युम्न अपने शरीर से एक दिव्य और कोमल गुलाबी सुनहरी
33:15आभा बिखेर रहा था जो उस घने अंधकार को भी मात दे रही थी
33:21अपनी आसुरी माया का प्रयोग करते हुए शंबरासुर ने खुद को एक काले धुएं के रूप में बदल लिया ताकि
33:28वह बिना किसी आहट के द्वारका के अभेद्य दिव्य सुरक्षा घेरे को पार कर सके
33:34महल के विशाल गलियारों में पहरा दे रहे वीर द्वारका के सैनिक उस मायावी धुएं के प्रभाव में आकर अचानक
33:41गहरी और अचेतन निद्रा के वश में होने लगे
33:45माता रुक्मिनी के अत्यंत भव्य और सुरक्षित शयनकक्ष में वह भयानक राक्षस शंबरासुर अपनी विशाल और दरावनी काया के साथ
33:54अंधकार से प्रकट हुआ
33:57अपनी धधक्ती लाल आखों से उस सोते हुए मासूम बालक को देखते हुए राक्षस के मन में अपनी मृत्यू के
34:05भय और विजय के उन्मात का एक भयंकर सैलाब उमड पड़ा
34:10शंबरासुर के काले जादू के प्रभाव से माता रुकमिनी एक गहरी अचेतन निग्रा में डूग गई और उनके हाथों की
34:17पकड़ अपने नवजात शिशु से धीरे से धीली हो गई
34:22अत्यंत क्रूरता और पूरी शान्ती के साथ शंबरासुर ने अपने विशाल नुकीले नाखुनों वाले हाथों को आगे बढ़ाया और उस
34:31दिव्य तेजस्वी शिशु को पालने से उठा लिया
34:35जैसे ही राक्षस ने बालक को छुआ, ननहे प्रद्युम्न ने अपनी आखें खोल दी और उनके भीतर से निकली एक
34:42शनिक दिव्य जोती ने उस पापी असुर को अंदर तक कमपा दिया
34:47अपने भय पर काबो पाते हुए, शंबरासुर ने बालक को एक काले कपड़े में लपेटा और महल की विशाल खिड़की
34:55से तूफानी और अंधेरी रात के आसमान में छलांग लगा दी
35:00द्वारका के ऊपर गरचते हुए काले बादलों के बीच उरते हुए, उस विशाल का राक्षस ने अपनी सफलता पर एक
35:08भयानक और अट्था स्पूर्ण गर्जना की जिससे पूरा आकाश देहल उठा
35:13नीचे विशाल और अनंत अरब सागर अपनी गगंचुम्बी लहरों के साथ उफन रहा था, मानो वह उस आने वाले दिव्य
35:21बालक के स्वागत और विनाश की इस लीला को भांप रहा हो
35:26समुद्र के सबसे गहरे और अशान्त हिस्से के उपर हवा में ठहर कर शंबरासुर ने उस असहाय बालक को अत्यंत
35:34घेना और कुरूरता से देखा, जिसे वह हमेशा के लिए मिटाना चाहता था
35:40अपनी पूरी ताकत के साथ उस पापी राक्षस ने नवजात शिशु प्रद्युम्न को सीधे उस थंडे और भयानक गर्जना करते
35:48हुए समुद्र की लहरों में नीचे फैंक दिया
35:52नेती के विधान के अनुसार समुद्र की अगाध गहराईयों में छिपे एक अत्यंत विशाल और प्राचीन मगरमच रूपी जलिये जीव
36:00ने उपर से गिरते हुए बालक को अपने विशाल जबडे में निगल लिया
36:05उधर द्वारका के महल में माता रुक्मिनी अचानक किसी अन्होनी की आशंका से काम कर जागी और घबरा कर उनका
36:13हाथ खाली पड़े ठंडे पालने पर गया
36:17अपने प्राणों से प्रिय पुत्र को गायब पाकर माता रुक्मिनी के कंट से निकली अत्यंत मर्मभेदी और कारुनिक चीख ने
36:25द्वारका के शांत महल को जखजोर कर रख दिया
36:29दूसरी और भगवान श्री कृष्ण शांत भाव से खिड़की के पास खड़े होकर गहरे सागर की और देख रहे थे
36:36क्योंकि वे जानते थे कि धर्म की पुनरस्थापना के लिए यह कश्ट दायक मार्ग आवश्चक था
36:43माता रुकमिनी के विलाप को सुनकर द्वारका के वासी और शाही परिवार के लोग महल के आंगन में एकत रहो
36:50गए और पूरी नगरी में शोक की एक गहरी लहर दौड गई
36:55समुद्र के अंथीन अंधकारमय गर्थ के भीतर उस विशाल मचली के पेट में सुरक्षित बंध शिशु प्रद्युमन के चारों और
37:03एक सुरक्षात्मक दिव्यचकर जागरत हो गया
37:06जिससे यह स्पष्ट था कि कामदेव के पुनरजन्म की लीला अब आरंभ हो चुकी है
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