विष्णु पुराण के इस 19वें अध्याय में जानिए पृथ्वी के नीचे स्थित 7 अद्भुत पाताल लोकों का रहस्य और अनंत भगवान (शेषनाग) का दिव्य स्वरूप! क्या पाताल लोक स्वर्ग से भी अधिक सुंदर है? जानिए 28 नरकों की वास्तविक अवधारणा और कैसे भगवान विष्णु के नाम का स्मरण जीव को हर संकट और पाप से मुक्त कर सकता है।
#VishnuPurana #PatalaLoka #SheshaNaga #Ananta #HinduMythology #VishnuBhakti #SanatanDharma #CosmicMystery
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00:00भारतवर्ष के भव्य विवर्ण के पश्चात महर्शी मैत्रे ने महर्शी पराशर के चर्णों में प्रणाम करके प्रिथवी के नीचे छिपे
00:08रहस्यमेई पाताल लोकों के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की.
00:13महर्शी पराशर ने मंद मुस्कान के साथ मैत्रे के प्रश्न को स्वीकार किया और भूलोक के नीचे स्थित साथ विशाल
00:20पाताल लोकों की रचना का वर्णन आरंब किया
00:25पराशर ने बताया कि प्रिथवी की सतह से नीचे एक के उपर एक स्थित अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, प्रसातल
00:33और पाताल नाम के साथ अत्यंत समरिध और अध्भुत लोक विद्यमान है
00:39पहला लोक अतल है, जहां मै दानव का पुत्र बल निवास करता है, जिसकी मायावी शक्तिया और सम्मोहन विद्या संपूर्ण
00:47पाताल में प्रसिद्ध है
00:50अतल लोक स्वर्ण की भव्य अट्टालिकाओं, देधी प्यमान मनियों और अध्भुत उपवनों से सुसज्जित है, जहां मदिरा और आनंद का
00:59निरंतर प्रवाह रहता है
01:02दूसरा लोक वितल है, जहां भगवान शिव अपने हाटकेश्वर रूप में अपनी आध्याशक्ती देवी भवानी के साथ पाताल वासियों के
01:11कल्यान हेतु विराजमान है
01:14वितल लोक में भगवान शिव के प्रभाव से हाटक नामक दिव्य सुवर्ण की नदिया बहती है, जिनकी अगनी जैसी चमक
01:22से पूरा लोक आलोकित रहता है
01:26तीसरा लोक सुतल है, जो परम पावन और एश्वर यशाली है, जहां भक्त शिरोमनी दैत्यराज बली अपने धर्म और दानवीर्ता
01:34के कारण राज्य करते हैं
01:37सुतल लोक में स्वयन भगवान विश्णु वामन रूप में अपने परम भक्त महाराजा बली की रक्षा के लिए उनके राजद्वार
01:45पर गदाधारन किये सदा प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं
01:50चौथा लोक तलातल है जो महान दानव शिल्पी मय दानव का निवास स्थान है जो अपनी अलौकिक वास्तुकला और मायावी
01:59यंत्रों के लिए विख्यात है
02:02तलातल लोक में हवा में तैरते हुए अध्भुत, त्रिकोन, दुर्ग, यंत्रचालित, भवन और मायावी प्रकाश की किरने हर दर्शक को
02:10आश्चर यच्कित कर देती हैं
02:13पांचवा लोक महातल है, जहां कदरू के अनेक मनियुक्त क्रोधित नाग पुत्र जैसे कुहक, तक्षक, कालिया और सुशेन विशाल स्वरूप
02:22में निवास करते हैं
02:25महातल की विशाल अन्धकार्मई गुफाओं में सहसरों विशैले नाग विचर्ण करते हैं, जिनके फणों पर जड़ी दिव्यमनिया पूरे वातावर्ण को
02:34नीली और हरी रोशनी से चमकाती हैं
02:38छठा लोक रसातल है, जहाँ पणी नाम के शक्तिशाली दैत्य और दानव निवास करते हैं, जो देवताओं के प्राचीन शत्रू
02:46हैं और अत्यंत पराक्रमी माने जाते हैं
02:51प्रसातल के विशाल लोह दुर्गों में पराक्रमी दानव यूद्धा अपने दिव्यास्त्रों के साथ सैन्य अभ्यास करते हैं, जहाँ निरंतर युद्ध
02:59की गर्जना गूंजती रहती है
03:03सात्वा और सबसे गहरा लोग पाताल है, जिसे नागलोग की राजधानी माना जाता है, जहाँ दिव्यमनियों की रोशनी से कभी
03:11अंधकार नहीं होता
03:14पाताल लोग के केंद्र में नागराज वासुकी अपने विशाल स्वर्ण सिन्हासन पर विराजमान हैं, और उनके चारों और दिव्यनाग कन्याएं
03:22सुरीली धुन पर निर्थ्य करती हैं
03:26इन सातों पाताल लोकों के भी सबसे नीचे तमोगुन के आधार और संपूर्ण ब्रहमांड के धारक भगवान अनंत यानी शेशनाग
03:35विराजमान हैं
03:37सहस्र फणों वाले भगवान शेशनाग अत्यन्त सौमय और तेजोमय रूप में सुशोगित हैं, जो संपूर्ण प्रिथ्वी को राई के दाने
03:46के समान अपने एक फण पर धारन किये हुए हैं
03:50महर्शी पराशर के इस अलौकिक वर्णन को सुनकर महर्शी मैत्रे अत्यंत भाव विभोर हो गए और उन्होंने भगवान अनंत के
03:59चर्णों में ध्यान लगाया
04:01महर्शी पराशर ने अपने शिश्य मैत्रे को बताते हुए कहा कि प्रिथवी की सतह के नीचे साथ भव्य पाताल लोक
04:09विद्यमान हैं, जिनकी सुन्दर्ता और वैभव देवलोक से भी अधिक अध्भुत है
04:15महांदानव वास्तुकार मैदानव ने अपनी दिव्यमाया और स्थापत्य कला से इन साथों अधोलोकों में देदी प्यमान मनियों और स्वर्ण से
04:24जड़े हुए अध्भुत महलों का निर्मान किया था
04:28प्रथम पाताल अतल में असुर्बाल निवास करता है जहां रतनों से चमकती सड़के और कभी नमुर्जाने वाले दिव्य पुष्पों के
04:37उपवन हर ओर बिखरे हुए हैं
04:39अतल लोग के भीतर स्वर्ण और स्वटिक से निर्मित प्रासाद अपनी असीम अलौकिक कांती से संपूर्ण अंधकार को मिटा कर
04:48सदा प्रकाशमान रहते हैं
04:51द्वितिय पाताल वितल में भगवान हाटकेश्वर के रूप में महादेव विराजमान हैं जहां प्रजाप्ती द्वारा निर्मित स्वर्ण की नदिया धधकती
05:00हुई बहती हैं
05:03भगवान हाटकेश्वर की दिव्य उपस्थिती से वितल लोग की गुफाए पिघले हुए हाटक स्वर्ण की सुनहरी किर्णों से सर्वदा जगमगाती
05:11रहती है
05:13त्रीतिय पाताल सुतल में अत्यंत धर्मात्मा दैत्यराज बली का शासन है जिसे स्वयन श्री हरी विश्णों ने अपनी असीम क्रिपा
05:22से इंद्रलोक से भी अधिक समरिध बनाया है
05:26राजा बली अपने रत्नजडित सिनहासन पर बैठ कर संपूर्ण सुतल लोक में धर्म और दानशीलता की पावन परमपरा का पूर्ण
05:34निष्ठा से पालन करते हैं
05:38सुतल लोक के विशाल द्वारों पर स्वय भगवान विश्णु अपने गदाधर रूप में रक्षक बनकर खड़े हैं ताकि राजा बली
05:45के सामराज्य पर कोई संकट ना आ सके
05:48चतुर्थ पाताल तलातल में मायावी मैदानव का अध्वितिय किलास्थित है जो अनेक प्रकार की अस्त्रशस्त्र प्रनालियों और चमतकारी यंत्रों से
05:59सुरक्षित है
06:01तलातल के भव्य प्रांगण में मैदानव अपनी तंत्र विद्या और यंत्री करण की शक्ती से अलोकिक द्रिशों का निरंतर निर्मान
06:09करता रहता है
06:11पंचम पाताल महातल में अनेक मस्तकों वाले महान नागों का वास है, जिनकी फणों पर जग्मगाती मनिया पाताल के गहन
06:20अंधकार को भेद देती हैं
06:23कुहक, तक्षक और सुशेन जैसे महाप्राक्रमी नाग महातल की नीलम और पन्ना से बनी भूमी पर स्वच्छन्द रूप से विचर्ण
06:31करते हैं
06:32शष्ठ पाताल रसातल में महाबलशाली दैत्य और दानव निवास करते हैं, जो देवराज इंद्र के समान तेजस्वी और असीम शारिरिक
06:43बल से संपन्न हैं
06:45प्रसातल की विशाल पाशान गुफाओं में निवास करने वाले पणी नामक दानव अगाथ खजाने और दिव्यास्त्रों की अनवरत रक्षा करते
06:54हैं
06:56सब्तम और सबसे निचला लोग पाताल या नागलोग कहलाता है, जहां सर्पों के राजा वासुकी का अत्यंत एश्वर यशाली सामराज
07:04जिस्थापित है
07:06पाताल लोग की प्रत्येक अट्टालिका पर जड़े हुए महारत्न सूरिय और चंद्रमा के बिनाही संपूर्ण नगर को असीम उजियारे से
07:15सराबोर रखते हैं
07:18नागराज वासुकी अपने सहस्त्रफनों वाले च्छत्र के नीचे रत्नजडित राजसिनहासन पर विराजमान होकर पूरे नागलोग पर कुशलता से शासन करते
07:27हैं
07:29महर्शी नारद के अनुसार पाताल लोक के दिव्याति दिव्यसुख, सुन्दर कामिनिया, अपसराय और मनियों की आभा स्वर्ग लोक के वैभव
07:38को भी मात देती है
07:41महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि इन साथ पाताल लोकों के सबसे नीचे संपूर्ण स्रिष्टी को धारण करने वाले
07:49परम पुरुष भगवान अनंत शेशनाग विराजमान है
07:54पाताल लोकों में सरवाधिक वैभवशाली और पवित्र सुतल लोक की आभा स्वर्ग से भी अधिक अलौकिक तथा जादूई है
08:03दानवराज बली सुतल लोक के स्वर्ण सिन्हासन पर विराजमान होकर अपने राज्य में सत्य और धर्म का पालन करा रही
08:11है
08:12सुतल लोक की भव्य अटारिया, दिव्यास्त्रों से सुसजजित भवन और बहती स्वर्ण नदिया इस स्थान को अध्वितिय बनाती है
08:22महाराजा बली अपने अतीद को स्मरण करते हैं कि कैसे उनके भक्तिभाव ने साक्षात श्रीहरी को उनके द्वार तक खींच
08:30लाया था
08:32अतीद की स्मृतियों में वामन रूप धारी श्री विश्नु का तेजस्वी बटुक अवतार बली के महायग्य में पदारपण करता है
08:41ननहें वामन देव ने राजा बली से केवल तीन पग भूमी का दान मांग कर संपूर्ण स्रिष्टी को विस्मित कर
08:48दिया था
08:50दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने बली को सचेट करते हुए दान देने से रोका परन्तु बली अपने दिये बचन से पीछे
08:57नहीं हटे
08:59राजा बली ने गुरु के निर्देश के विरुध जाकर भी अपने धर्म और सत्य के संकल्प को सर्वोप्री माना
09:07भगवान विश्णू ने अपना विशाल त्रिविक्रम रूप धारण कर दो ही पगों में समस्त प्रित्वी और आकाश को माप लिया
09:15तीसरे पक के लिए कोई स्थान न बचने पर दानवीर बली ने नमरता से अपना मस्तक वामन देव के चर्णों
09:23में जुका दिया
09:25भगवान वामन ने राजा बली के सिर पर अपना दिव्य चरण रख कर उन्हें पाताल के सुतल लोग का सार्वभाउम
09:32सम्राट बना दिया
09:34श्रीहरी ने बली की निशकाम भक्ती से प्रसन्न होकर सुतल लोग को इंद्रलोग से भी अधिक समरिध और सुरक्षित बना
09:42दिया
09:43भगवान विश्णु ने बली के प्रेम के वशी भूत होकर सुतल लोग के मुख्य द्वार पर स्वयं गदाधारी द्वारपाल बनना
09:51स्विकार किया
09:53हाथों में सुदर्शन चक्र और गदालिये श्रीहरी सदैव सुतल लोग की रक्षा में द्वार पर तैनात रहते हैं
10:01माता लक्षमी जब अपने स्वामी को द्वार पाल बने देखती हैं तो वे सुतल लोग पधार कर बली की महानता
10:08की साक्षी बनती हैं
10:11देवी लक्षमी ने राजा बली की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध कर उन्हें अपना भ्राता स्विकार किया और स्नेह का
10:19संबंध जोड़ा
10:21राजा बली ने अपनी बहन लक्षमी जी को सर्वस्व समर्पित करते हुए उनसे भगवान विश्णु की प्रसन्नता का वर्दान मांगा
10:30सुतल लोग के दैत्य और असुर अपने राजा बली के सत्य और श्रीहरी की क्रिपा से सर्वदा भयमुक्त जीवन व्यतीत
10:37करते हैं
10:39यह कथा सिद्ध करती है कि इश्वर की भक्ती में कुल या जन्म बाधक नहीं केवल मन की पवित्रता ही
10:47महत्वपूर्ण है
10:49राजा बली का त्याग और भगवान अनंत की सुरक्षा सुतल लोग को अनंत काल तक अमर और प्रकाश्मान बनाये रखती
10:57है
10:59महर्शी पराशर ने मैत्रे को यह आश्चर्य जनक सत्य बताया कि प्रित्वी के नीचे स्थित पाताल लोग अंधकार में नहीं
11:07बलकि स्वर्ग से भी अधिक व्यभवशाली है
11:11जैसे जैसे महर्शी पराशर पाताल का रहस्य खोलते हैं, एक अत्यंत अलोकिक और देदी प्यमान भूमी के द्रिश्य उभरने लगते
11:19हैं
11:21प्रथम पाताल लोक अतल में स्वटिक के भव्य महल और सुगंधित पुष्पों से लदे दिव्य उपवन सर्वत्र बिखरे हुए हैं
11:29इस सुन्दर भूभाग में वैभवशाली दैत्य और तेजस्वी नागराज पूर्ण शान्ती और एश्वर्य के साथ निवास करते हैं
11:39वितल नामक द्वितिय पाताल में पिघले हुए स्वर्ण की नदिया बहती हैं जो भूमी को अद्भुत सुनहरी चमक से भर
11:48देती हैं
11:50वहां उगे हुए अद्भुत व्रिक्ष और दिव्यकमल के फूल रतनों की भांती स्वयं प्रकाशित होकर वातावर्ण को सुर्भित करते हैं
11:59नितल लोक में दानव शिल्पी मय द्वारा निर्मित ऐसी नकाशीदार अट्टालिक आए हैं जो देव लोक के महलों को भी
12:07लजजित कर दें
12:09जब स्वर्ग के देवता पाताल के इस अभूत पूर्व वैभव को देखते हैं तो वे इंद्रपुरी के सौन्दर्य को भी
12:16भूल जाते हैं
12:19गभस्तिमान लोक में विशाल भूमिगत घाटिया रतनों के प्रजवलित प्रकाश से इस प्रकार प्रकाशित होती हैं जैसे स्वयन सूर्य वहां
12:27उदित हुआ हो
12:29पाताल की दिव्यनाग कन्याय मनियों से जड़े वस्त्र पहन कर वीना की मधुर धुन पर अत्यंत सुन्दर निर्थ्य करती हैं
12:38महातल नामक पंचम लोक में अनेक फणों वाले महानाग विशाल हीरे पन्नों के परवतों की रक्षा करते हैं
12:47प्रसातल में पराक्रमी दैत्य योध्धा स्वर्ण की विशाल सभाओं में बैठकर अमरितोपं पेयों का आनंद लेते हैं
12:55अंतिम और सबसे भव्य पाताल लोक में पहुँचकर संपूर्ण भूमी नागों की मनियों के दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठती हैं
13:05नागराज वासुकी रतनों से सुसज्जित स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान हैं और उनके चारों और विशाल फंधारी रक्षक खड़े हैं
13:15पाताल में नतीखी धूप होती है और नहीं अंधकार मई रात बलकी वहां सर्वत्र शीतल चंदरकांत मनियों का प्रकाश फैला
13:24रहता है
13:26अलोकिक पुष्पों की भीनी भीनी सुगंध सफेद संगमर्मर के बने विशाल स्तंभों और राजमार्गों में तैरती रहती है
13:45महर्शी पराशर स्पष्ट करते हैं कि भौतिक स्थान की उचाई नहीं बलकी वहां की विलासिता और शांती उसे स्वर्ग से
13:53महान बनाती है
13:56रिशी मैत्रे पाताल लोक के इस अद्भुत और आनंद दायक वर्णन को सुनकर अत्यंत आश्चर्य और भक्तिभाव से भर जाते
14:04हैं
14:06प्रिथवी की गहरायों में बसे ये सातों पाताल लोक एक भूमिगत आकाश गंगा की भांती अलोकिक जोती से सतक चमकते
14:14रहते हैं
14:16सातों पाताल लोकों के अतिसुक्ष्म और अंधकार्मय तलों को पार करते हुए
14:22चेतना सीधे ब्रहमांड के उस परम सनातन आधार की ओर बढ़ती है जहां अनंतकाल का निवास है
14:30पाताल के भी नीचे स्थापित यह अलोकिक धाम भगवान अनंत अर्थात श्री शेशनाग का है
14:36जिनकी दिव्य आभासे संपून पाताल लोक एक स्वर्णिन कांती से जगमगा उठता है
14:43हजार फणों से युक्त भगवान शेशनाग अपने मस्तक पर धारण किये हुए मनियों के प्रकाश से अंधकार के समुद्र को
14:51सहसा तिरोहित कर देते हैं
14:54शेशनाग के रूप में साक्षात भगवान श्री विश्नु विराजमान हैं जिनका नीलकमल समान दिव्य वर्ण और विशाल स्वरूप संपून ब्रहमांड
15:03को अचम्भित कर देता है
15:06आश्चर्य की पराकाश था यह है कि यह विशालकाय प्रिथवी भगवान अनंत के एक सहस्र फणों में से मात्र एक
15:14फण पर सरसों के छोटे से दाने की भांती टिकी हुई है
15:19इस अद्भुत गुरुत्वाकर्शन और ब्रहमांडिय संतुलन को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण विश्व उनके एक संकेट पर
15:28ही स्थिर खड़ा है
15:30श्वेत रेश्मी वस्त्रों और देदी प्यमान स्वर्ण आभूशनों से सुसजजित भगवान अनंत के गले में लाल कमलों की बनी विशाल
15:38जैमाला सुशोभित हो रही है
15:41उनकी शान्त और अत्यंत गंभीर श्वास प्रश्वास से ऐसी दिव्य तरंगे निकलती हैं जो समस्त लोकों को अपने अपने स्थानों
15:50पर स्थिर रखती हैं
15:53देवर्शी नारद अपनी वीना की मधूर जंकार के साथ भगवान शेशनाग के इस अलौकिक और अत्यंत पवित्रधाम में प्रवेश करते
16:01हैं
16:03वीना की लैबध ध्वनी पर देवर्शी नारद भगवान अनंत के असीन सामर्थ्य और अनंत गुनों का भाव विभोर होकर गायन
16:11करते हैं
16:14गंधर्व और अपसराय भी पाताल के इस परमधाम में उपस्थित होकर श्री हरी के इस शेशनाग स्वरूप की स्तुती में
16:21लीन हो जाते हैं
16:24इंद्रनील मनी की भान्ती चमक्ती भगवान अनंत की विशालकार परिधी संपून ब्रहमांडिय उर्जा के केंद्र के रूप में द्रिष्टि गोचर
16:32होती है
16:34अपने चतुर्भुज रूप में वेहल और मुसल धारण कर स्रिष्टी के नियंतरण और शक्ती के शाश्वत संतुलन का दिव्य प्रतीक
16:42बनते हैं
16:45प्रलैकाल आने पर भगवान अनंत की भुरुकुटी के मध्य से ही एकादश रुद्र प्रकट होकर समस्थ ब्रहमांडिय प्रलै का सूत्र
16:53पात करते हैं
16:55उनके सहस्र मुखों से निकलने वाली प्रल्यंकर अगनी समस्थ पाताल और पापों को भस्म कर पुनह नवस्रिजन का मार्ग प्रशस्थ
17:03करती है
17:05परंतु वर्तमान में उनका अत्यंत शांत और करुणामय स्वरूप समस्थ प्राणियों के कल्यान और स्रिष्टी की रक्षा के लिए तत्पर
17:13है
17:15साक्षात देवी प्रिथवी अपने उपर समस्थ जीवन को धारन कराने के लिए भगवान अनन्त के चर्णों में कोटि-कोटी प्रणाम
17:23अर्पित करती है
17:25देव, दानव, गंधर्व और नाग जाती के समस्थ प्राणी अपने समस्थ भेदों को भूल कर भगवान शेशनाग के चर्णों में
17:33भक्ति-भाव से नत्मस्तक है
17:37देवर्शी नारद यह अनुभव करते हैं कि सर्वव्यापी भगवान विश्नुही अनन्त शेशनाग के रूप में सम्पून जगत के अंतिम आधार
17:45स्तंभ है
17:48ब्रह्मांडिय नीली और स्वर्निम आभासे जगमगाता भगवान अनन्त का यह शाश्वत धाम समस्थ जीवों को संदेश देता है कि श्री
17:57हरी ही स्रिष्टी के एक मात्र परम रक्षक है
18:01देवर्शी नारद अपनी दिव्यवीना की जंकार के साथ भगवान अनन्त शेशनाग की अगाध महीमा और उनके अनन्त स्वरूप का भावपूर्ण
18:10गायन करते हैं
18:13नारद जी बताते हैं कि यह विशाल ब्रहमांड भगवान शेशनाग के एक हजार फणों में से केवल एक फण पर
18:20सरसों के दाने के समान विश्रांग करता है
18:24पाताल लोग की सबसे अगाध और गुप्ट गहराईयों में भगवान अनन्त अपनी पूर्ण अलोकिक चेतना के साथ विराजमान है
18:34उनके एक हजार फणों पर दमक्ती हुरी मनिया पाताल के गहंतम अंधकार को भी अपने तेज से आलोकित कर देती
18:41हैं
18:43भगवान शेशनाग निरंतर योग निद्रा में लीन रहकर समस्थ स्रिष्टी के संतुलन और उसके अस्तित्व को संभाले हुए हैं
18:53महर्शी नारत स्विकार करते हैं कि देवता, गंधर्व और सिध पुरुष भी अनन्त के पूर्ण स्वरूप और गुनों की सीमा
19:01को नहीं जान सकते
19:03शेशनाग के मस्तक पर स्थित हर एक रत्न से बहती हुई कांती पाताल लोग के हर कोने में अमूर्थ सौंदर्य
19:10बिखेरती है
19:13भगवान विश्नु के इस साक्षात संकर्शन स्वरूप की शक्ती ही संपून जगत की स्थिती का मूल आधार है
19:21उनके नथुनों से निकलने वाली प्रत्येक उच्छवास की वायू पाताल लोक में विशुध प्राणशक्ती का संचार करती है
19:30जब कल्प का अंत और प्रलय का समय निकट आता है तब भगवान अनंत का यह शांत रूप भयानक रूप
19:37धारन करने लगता है
19:40प्रलय काल में स्रिष्टी का सहार करने के लिए भगवान शेशनाग की भेकुटियों से प्रल्यंकारी अगनी का प्राकट्य होने लगता
19:48है
19:49जब भगवान अनंत की विशाल आखें खुलती हैं तो उनमें से ब्रहमांड को भस्म करने वाला संकर्षन तेज निकलता है
19:59उनकी भोहों के मध्य से ग्यारह रुद्रों का प्रचंड रूप उत्पन होकर संपून ब्रहमांड में गर्जना करने लगता है
20:08संकर्षन नाम की वह महागनी त्रिलोक को अपने विक्राल पेट में समा लेने के लिए हाहाकार मचाती हुई बढ़ती है
20:17शेशनाग के मस्तक से निकली वह समवर्तक अगनी सातों पाताल लोकों के पाप और अंधकार को जला कर भस्म करने
20:24लगती है
20:27पाताल की विशाल गुफाय और सोने के महल उस प्रचंड रुद्रगनी की लप्तों में जल कर पिघलने लगते हैं
20:35नारद जी बताते हैं कि यह विनाश वस्तुतह नवस्रिष्टी की पूर्वपीठि का है जो अधर्म और काल का अंत करती
20:43है
20:44वह रुद्रगनी पाताल से उठकर भूलोक और भुवरलोक तक फैलती है और कालचकर को पूर्ण विराम देती है
20:53इस सम्पूर्ण महाविनाश के मध्यभी भगवान अनंत निर्विकार, अचल और अपने शाश्वत स्वरूप में स्थित रहते हैं
21:02देवर्शी नारधात जोड़कर भगवान अनंत शेशनाग के चर्णों में प्रणाम करते हैं, जिनकी क्रिपासे स्रिष्टी निरंतर पुनरजन्म लेती है
21:13महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि पाताल लोग के नीचे 28 मुख्य नरक स्थित हैं, जो आत्माओं को केवल
21:21दंड देने के लिए नहीं बल्कि उनके कर्मों का शोधन करने के लिए बने हैं
21:27ये नरक ब्रह्मांडिय न्याय की वह पवित्र और अचूक व्यवस्था हैं, जहां प्रत्येक जीव को उसके द्वारा किये गए पापों
21:35का यतोचित फल भोगना पड़ता है
21:39धर्मराज भगवान यमराज इस सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था के सर्वोप्रि स्वामी हैं, जो अपने भव्य सिनहासन पर विराजमान होकर निश्पक्ष रूप
21:48से स्रिष्टी के न्याय का संचालन करते हैं
21:52अपने विशाल श्यामवर्ण शरीर, प्रज्वलित नेत्रों और हाथ में कालपाश धारण किये यमराज धर्म के अटूट और निश्पक्ष स्तंभ प्रतीत
22:01होते हैं
22:03यमराज के समीप विराजमान चित्रगुप्ट अपनी रहस्यमई पुस्तक में हर प्राणी के अच्छे और बुरे कर्मों का सुक्ष्म लेखा जोखा
22:12निरंतर अंकित करते रहते हैं
22:15रौरव नरक में उन आत्माओं को लाया जाता है जिन्होंने दूसरों को धोखा दिया था जहां वे अपनी ही कुटिलताओं
22:23की अगनी में प्रजवलित होती हैं
22:26महारव नरक में भयानक रुरु जीव उन स्वार्थी और कुरूर मनुश्यों को दंदित करते हैं जिन्होंने अपने जीवन में असहाई
22:35जीवों को पीड़ा पहुचाई थी
22:38कुंभी पाक नरक में खौलते हुए तैल से भरे विशाल पात्रस्थित हैं जहां जीवों पर अत्याचार करने वाले अन्याई मनुश्यों
22:46की आत्मा का शोधन किया जाता है
22:49काल सूत्र नरक की जलती हुई तामबे जैसी बालुका उन अधर्मियों को तपाती है जिन्होंने अपने मातापिता और गुरुजनों का
22:58निरादर किया था
23:00असिपत्रवन नरक में तलवार के समान धारदार पत्तों वाले व्रिक्ष हैं जो विश्वास धातियों के शरीर को चीर कर उन्हें
23:08सत्य और धर्म का ज्यान कराते हैं
23:12सुकर्मुख नरक में अत्याचारी और ध्रश्ट शास्कों को भयंकर दबाव के बीच पीस कर उनके भारी अहंकार का विसर्जन किया
23:20जाता है
23:22अंधकूप नरक के घने और बीभत्स अंधकार में वेकरूर आत्माएं भटकती हैं जिन्होंने गुप रूप से निर्दोश जीवों को कश्ट
23:31पहुचाया था
23:33तप्तमूर्ती नरक में धधकती हुई लोहे की प्रतिमाएं उन पापियों का आलिंगन करती हैं जिन्होंने पवित्र धर्म मर्यादाओं का उलंगन
23:41किया था
23:43शालमली नरक में तीखे कांटों से ढखे विशाल वरिक्ष अधर्मियों के व्यभिचार और प्रलोभनों के दुश्परिनामों को स्पष्ट रूप से
23:51प्रकट करते हैं
23:54भयानक वैतर्नी नदी नरक के प्रवेश द्वार पर बहती है जिसकी रक्ट और अगनी से भरी लहरें केवल धर्मनिष्ठ आत्माओं
24:02को सुरक्षित पार जाने देती हैं
24:06यमराज के निश्थावान यमदूत बिना किसी पक्षपात के ब्रह्मांडिय नियमों का पालन करते हुए प्रत्येक आत्मा को उसके निर्धारित स्थान
24:14पर ले जाते हैं
24:16महर्शी पराशर समझाते हैं कि नरक का कष्ट वास्तव में आत्मा का अगनिप्रीक्षन है जो उसके पापों को धोकर उसे
24:25पुना निर्मल और पवित्र बनाता है
24:28इस कठोर दंड व्यवस्था के पीछे भी भगवान श्री हरी विष्णू की परम करुना चिपी है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में
24:36संतुलन और धर्म की रक्षा करती है
24:40रिशी मैत्रे हाथ जोड़कर अत्यंत श्रद्धा पूर्वक महर्शी पराशर के इस गहन और रहस्य में ज्यान को सुन रहे थे
24:48इस प्रकार 28 नर्कों का यह विधान इश्वर के अटूट न्याय और कर्म चक्र के शाश्वत सत्य का प्रत्यक्ष प्रमान
24:57है
24:59नार्की यह लोकों की भयानक विभीशिका वास्तव में आत्मा के लिए कोई अनंत गंड नहीं बलकि उसके पापकर्मों के मल
25:06को भस्म करने वाली एक परम पावन वैदिक अग्नियोश्धी है
25:12धर्मराज यमदेव अपने भव्य राज सिनहासन पर विराज मान होकर चित्रगुप्त की कर्म पुस्तिकाओं के माध्यम से प्रत्येक जीव के
25:20कर्मों का निश्पक्ष एवं परम न्यायपूर्ण मूल्यांकन करते हैं
25:25रौरव नामक नरक में अपने जीवन काल में दूसरों को प्रताडित करने वाले जीवों को उनकी अपनी ही दुष्टता से
25:33उत्पन हुए भयानक रुरु जीवों का सामना करना पड़ता है
25:38इस उग्रवातावर्ण में आत्मा जब अपने द्वारा दिये गए कश्टों का स्वया अनुभव करती है तब उसके भीतर के अहंकारी
25:46पाप का आवर्ण धीरे-धीरे छिन्नभिन होने लगता है
25:51महारोरव नरक में कपट और विश्वास घात करने वाले प्राणियों के अज्ञान रूपी आवर्ण को प्रचंड तापिय उर्जा और भयानक
25:59दिव्य सर्प जलाकर भस्म कर देते हैं
26:03यह कठोर यातना केवल एक शोधन प्रक्रिया है जहां प्रत्यक्षन का संताप आत्मा को उसकी मौलिक पवित्रता और सत्य के
26:12निकट वापस लाता है
26:14कुम्भी पाक नरक में खौलते हुए तामबे के विशाल पात्रों में हिंसा करने वाले जीवों के सुक्षम शरीरों को तपा
26:21कर उनके करूर स्वभाव का अंत किया जाता है
26:26यम्दूत कोई निष्ठोर दानव नहीं बलकि सृष्टी के नियम का पालन करने वाले वे कठोर वैध्य हैं जो आत्मा की
26:34आध्यात्मिक व्याधी का इलाज करते हैं
26:38जैसे अशुद्ध सोने को अगनी में तपा कर उसका मैल अलग किया जाता है ठीक वैसे ही नरक्की यात्नाए आत्मा
26:46को शुद्ध कंचन बना देती है
26:49परमज्यानी महर्शी शुकदेव राजा परीक्षित को समझाते हैं कि कर्म का यह चक्र दंड का नहीं बलकि परम करुणा में
26:57आत्म सुधार का अचूप विधान है
27:00जब तप्त कुंडों और अगनिप्थों से गुजर कर आत्मा का पापकर्म पूर्न तहक्षीन हो जाता है तब उसका सुक्ष्म शरीर
27:09निर्मल कांती से जगमगा उठता है
27:12पापों के भस्म होते ही नरक्का वह भयानक और अंधकार्मय द्रिश आत्मा के लिए शांत और शीतल प्रकाश में परिवर्तित
27:20होने लगता है
27:23भगवान श्री हरी विष्णू की परम करुणा ही यमराज के इस कठोर नियम के पीछे छिपी हुई है जो किसी
27:30भी आत्मा को सदा के लिए नश्ट नहीं होने देती
27:34शुद्ध हो चुकी आत्माओं को यमदूत अत्यंत आदर के साथ उच्च लोकों की ओर या एक नवीन पवित्र पुनर्जन्म के
27:42लिए विदा करते हैं
27:44अनंत पाताल के सबसे निचले तल पर विराजमान भगवान शेशनाग की हजार फणो बाली ज्वालाए पूरे पाताल लोक के तापिय
27:53संतुलन को बनाए रखती हैं
27:56शोधन की अवधी समाप्त होते ही आत्मा पर चंदन और कमल की मंद सुगंद से युक्त शीतल दिव्य वायू का
28:04स्पर्श होने लगता है
28:06ध्रम और अहंकार का विनाश होने पर जीव को यह बोध होता है कि उसका दुख वास्तव में उसके अपने
28:13ही अनुचित कर्मों का दर्पन था
28:16यह कर्मविध्यान आत्मा को चेतना के एक नए स्तर पर ले जाता है जहां वह अपने अगले जन्म में धर्म
28:24के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर होती है
28:28धर्मराज यमदेव श्रीहरी विश्नु के इस सनातन न्याविधान को नमन करते हैं जो सम्पूर्ण ब्रहमांड में धर्म और संतुलन की
28:36रक्षा करता है
28:39इस प्रकार नार की ये लोक विनाश के स्थल नहीं बलकि समस्थ प्राणियों के कल्यान के लिए रचे गए दिव्य
28:46कर्मशोधन के परम पवित्र केंद्र हैं
28:49के मैत्रे नरक के भयंकर कष्टों और घोर अंधकार का वर्णन सुनकर भयभीत होने की आवश्चक्ता नहीं है क्योंकि इनसे
28:58मुक्ती का एक परम मार्ग भी है
29:01पापों के अंधकार से भरे उस नरक में जहां यमदूत पापी जीवात्माओं को अत्यंत कठोर दंड देते हैं
29:08वहां केवल हाहाकार और पीडा का सामराज्य होता है
29:14नरक के इन भीशन दुखों की कलपना मात्र से ही मैत्रे का हृदय कांप उठा और उन्होंने अत्यंत व्याकुल होकर
29:21गुरु पाराशर की ओर देखा
29:24तब परम ज्यानी महर्शी पाराशर ने अपने शिश्य को आश्वस्थ करते हुए अपने दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में उठाया
29:33पाराशर जी ने रहस्य प्रकट किया कि जो मनुष्य निरंतर भगवान श्री हरी के पवित्र नाम का स्मरण करता है
29:40उसके लिए नरक का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता
29:45संसार के समस्थ पापों और कश्टों को भस्म कर देने वाला भगवान विश्णु का नाम एक परम और अभेद्य दिव्य
29:52कवच की भांती कार्य करता है
29:55यदि कोई जीवात्मा नरक के द्वार पर भी भगवान विश्नु का नाम पुकारती है तो वहां की प्रल्यंकारी अगनी भी
30:03तुरंत शान्थ हो जाती है
30:06भगवान हरी के नाम की दिव्यध्वनी सुनते ही यमराज के भयानक दूट थर-थर कामपने लगते हैं और उस स्थान
30:14को छोड़ कर भाग जाते हैं
30:17स्वयन यमराज अपने दूटों को कठोर आदेश देते हैं कि वे कभी भगवान विश्नु के भक्तों के समीप जाने का
30:25दुस्साहस न करें
30:27यमराज के दूट अत्यंत विनीत होकर सुनते हैं कि जिसके हृदय में मधुसूदन निवास करते हैं वह यम के दंड
30:35से परे हो जाता है
30:37भगवान का भक्त जहां भी होता है वहा स्वयन सुदर्शन चक्र अद्रिश्य रूप से उसकी 2400 घंटे रक्षा करता है
30:47महर्शी पाराशर समझाते हैं कि श्री हरी इतने दयालू हैं कि वे एक बार भी सच्चे मन से पुकारने पर
30:54अनन्त जन्मों के पापों को क्षण भर में मिटा देते हैं
30:59वेकुंठ लोक में विराजमान वे परमेश्वर जो समस्त ब्रहमांड के स्वामी हैं अपने भक्तों के स्मरण मात्र से ही अत्यंत
31:07प्रसन हो जाते हैं
31:10चाहे वह निर्धन हो या धनी, ज्यानी हो या अज्यानी जो कोई भी श्री विश्णु का नाम लेता है वह
31:17सीधे वैकुंठ धाम का अधिकारी बन जाता है
31:21भगवान के नाम की शक्ती से नरक के जलते हुए खौलते तेल के कड़ाहे भी शीतल और सुवासित कमल के
31:28सरोगरों में परिवर्तित हो जाते हैं
31:31यह नामस्मरन केवल व्यक्ती की ही नहीं, बलकि संपूर्ण स्रिष्टी की समस्थ नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाला महाकवच है
31:42जैसे सूर्य के उदे होते ही घोर अंधकार और कोहरा विलीन हो जाता है, वैसे ही हरिनाम के उच्चारण से
31:49जन्मों के पाप नश्ठ हो जाते हैं
31:53गुरु के इस परम सत्य और आश्वासन को सुनकर मैत्रे का मन शान्थ हो गया और उन्होंने कृतग्यता पूर्वक अपने
32:01गुरु के चर्णों में मस्तक जुका दिया
32:04वे आदिपुरुष भगवान अनन्थ जो पाताल लोग के आधार हैं और जिन पर संपून ब्रहमांड तिका है, अपने भगतों को
32:12सदा अभय प्रदान करते हैं
32:16इसलिए हैं मैत्रे सभी भयों को त्याग कर केवल भगवान श्री हरी के नाम का आश्रय लोग क्योंकि यही जीवन
32:23का अंतिम और परम सत्य है
32:27पाताल और भगवान अनन्थ की महिमा का गान करने के बाद, परम ज्यानी महर्शी पराशर ने अपने प्रिय शिश्य मैत्रे
32:34को ब्रहमांड के उपरी लोकों की ओर ध्यान केंद्रित करने का संकेत दिया
32:40मैत्रे ने अपने गुरु के चर्णों में श्रधा पूर्वक प्रणाम करते हुए प्रार्थनाकी की वे अब सूर्य, चंद्रमा और अन्य
32:47नक्षत्रों की गतियों के रहस्य को विस्तार से प्रकट करें
32:52पराशर मुनि ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि पाताल से उपर उठकर अब हम उस सौर्मंडल की यात्रा करेंगे
33:00जहां साक्षात नारायन सूर्य देव के रूप में समस्थ स्रिष्टी को उर्जा प्रदान करते हैं
33:06प्रित्वी की सतह से उपर उठते ही सबसे पहले भुवरलोक आता है जहां सिद्धों और चार्णों का निवास है और
33:14जहां से पवन देव बादलों को नियंत्रित करते हैं
33:19इस वायुमंडल के परेश्वर्णमई सूर्य लोग की सीमा आरंभ होती है जहां भगवान सूर्य देव अपने दिव्य और असीम प्रकाश
33:28से संपूर्ण ब्रहमांड का अंधकार मिटाते हैं
33:32सूर्य देव का विशाल रत जो एक ही चक्र पर घूमता है साथ अत्यंत तेज गती वाले घोडों द्वारा खीचा
33:40जाता है जो साथ वेदों के चंदों के प्रतीक हैं
33:44यह दिव्य रत काल के चक्र को गतीमान रखता है जिससे दिन, रात, रितूओं और वर्षों का निर्मान होता है
33:52जो मनुश्यों के जीवन को अनुशासित करते हैं
33:56सूर्य के ठीक उपर चंद्र लोक स्थित है जहां शांती और शीतलता प्रदान करने वाले चंद्र देव अपने सोलह कलाओं
34:05वाले रत में विराजमान रहते हैं
34:08चंद्र देव की किरने प्रित्वी पर वनस्पतियों और औश्धियों को पोशन देती हैं जिससे समस्थ प्राणी जगत को जीवन और
34:16स्वास्थ्य प्राप्थ होता है
34:19चंद्र लोग के उपर नक्षत्रों और मंगल, बुध, ब्रिहस्पती, शुक्र और शनी जैसे ग्रहों के अपने अपने दिव्य लोग हैं
34:27जो अपनी निश्चित कक्षाओं में घूमते हैं
34:31पराशर रिशी ने समझाया कि ये सभी ग्रह और नक्षत्र आकाश में स्वतंत्र नहीं हैं, बल्कि वे एक अत्यंत विशाल
34:40शिशुमार नामक दिव्यतारामंडल से बंधे हुए हैं
34:44इस शिशुमार चक्र की पूँच के छोर पर साक्षात ध्रूव लोक स्थित है, जो समपूर्ण ब्रहमांड का सबसे स्थिर और
34:52पवित्र केंद्र माना जाता है
34:55यहां बालक ध्रूव, जिन्होंने मात्र पांच वर्ष की आयू में अपनी अनन्य भक्ती से भगवान विश्नु को प्रसन्न किया था,
35:03आज भी ध्यानमग नहें
35:07भगवान विश्नु ने ध्रूव की अडिक भक्ती से प्रसन्न होकर उन्हें इस सर्वोच पद पर स्थापित किया था, जो प्रलय
35:14के समय भी कभी नश्ट नहीं होता
35:17ध्रूव लोक से ही अद्रिश्य पवन रूपी रस्या बंधी हैं, जो सूर्य, चंद्रमा और सभी ग्रहों को अपनी-अपनी कक्षाओं
35:26में बिना गिरे घुमाती रहती हैं
35:29इसी परम पवित्र स्थान से देवी गंगा आकाश गंगा के रूप में निकलती हैं, जो भगवान विश्णु के चर्णों से
35:36उत्पन होकर समस्थ लोकों को पवित्र करती हैं
35:41मैत्रे यह जानकर विस्मित रह गए की कैसे संपूर्ण ब्रहमांड एक धागे में पिरोए गए मोतियों की तरह भगवान विश्णु
35:49की इच्छा और शक्ती से नियंत्रित है
35:52ध्रोग लोक के उपर क्रमशह महरलोक, जनलोक, तपोलोक और अंत्मे सत्यलोक स्थित हैं, जहां ब्रहमाजी और महान रिशिगंड निवास करते
36:02हैं
36:04ये सभी उच्छ लोक उन पवित्र आत्माओं के गंतव्य हैं, जो सांसारिक बंधनों से मुक्थ होकर केवल सत्य और धर्म
36:12के मार्ग पर चलते हैं
36:15अब पराशर ने मैत्रे से कहा कि वे उस परम ज्यान के अंतिम द्वार को खोलेंगे जहां वे विश्नु के
36:21विरात रूप और स्विष्टी के विलीनी करन के रहस्य को जानेंगे
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