00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभीलता अभिननन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक विद्या
00:11वाच्चस पती गुलाब खुठारी जी का शरील ही प्रम्हान श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आलेख
00:18जिसका शीशक है माही बनाती है भगवान, माता ही गर्भ में नई स्रिष्टी रचती है, माता गर्भी जनयती, गर्भ में
00:27वह शिशु के आत्मा को संसकारित करती है और अपने भुकतान से उसके शरीर का निर्बान करती है, गर्भ से
00:35बाहर आने पर वह उसी आत्मा को व्यक
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04:25પિતરિજ રસજ આતમજ આદી છેભાઓં સે યુગ્ત હોતાય ભાવાવા સ્યું વિદાસ્ય માતરિજાસ્તથા રસજા
04:50લોમ અસ્તિ નખ દંત શીરા સ્યું ધમની રેત આદી ઇસ્થરભાગ પિતાસે પ્રાપ્તથે શરીરકી પુષ્તિ બલ
05:20હોતિતિતિતિતિતિતિતિતિતિતિતતિતિતાં હોતતે વીજ્યે આરોગ્યે બલ મેધા આદી આદી હેંથે ઇંશ�
05:49પેર્ભર્યે માકા આચાર વીચાર જપધ્યાન સંગીત હસ્ણા રોના આદી હીશુકે મંણ કો આતાર
05:57દેતે યઈષોકે પૂણ વીકાસ માતા કેભૂર્જુંણ વીતિતીતયેતાયે દીતાર્જાણ વીરાગ્યેતયે
06:05Aishwarya, Yash, and Shri
06:07in six bhagwaka ropn
06:08gaurbh mei kardetiai
06:10maa gaurbh mei sutradhaar hai
06:12aur bahaar chitrikar
06:14gaurbh mei maata jaisa potion kar sakti hai
06:17vaisa koji orde nahi karkata
06:19vaa ahar, ras, bhavna
06:21aur sanskar dvara
06:22gaurbh mei bhaagke bij ropati hai
06:25tathaa gaurbh sei baahar
06:26is parashishikshan
06:28aur anushasan dvara
06:29us biji ko vriksh banaati hai
06:31maa kiya divyabhumika
06:34foreign
07:04आहार शिशु में स्वाभाविक इस्थिरता के रूप में धर्म बीज की स्थापना करता है।
07:09अपनी चेतना से मां उसमें ग्यान और वैराग्य का बीज बोती है।
07:13जागरुक माही शिशु को सही दिशा में प्रेडित कर सकती है।
07:17सकारात्मक भावों का चिंतन वमनन ही ज्यान और वैराग्य भावों के साथ उसके यश्प्राप्ति के मार्ग में सहायत बनते हैं।
07:26मा का हैस्पन्दन शिशु महसूस करता है। अतह मा का कर्तव्य है कि वह गर्भ काल में यथा नुरूप आहार
07:34विहार करें।
07:35गर्भ में शिशु मातर ग्राहक है तथा माधात्री हैं जबकि गर्भ से बाहर मा प्रकाशक और संड़क्षक बन जाती हैं।
07:43जिसके छत्रिचाया सही परिवेश ने स्नेह और अनुशासन में शिशु का पूर्ण विकास होता है।
07:50गर्व से बाहर आते ही माता के स्पर्ष में वह अपने अस्तित्व को सुरक्षित पाता है।
07:55यही आधारभूत विश्वास उसमें आंतरिक एश्वर्य स्थापित करता है।
08:26गर्व में सबकुष अवरोध ही था किन्तु बाहर मर्याद।
08:30मर्यादा में रहकर ही बालत धर्म वह वैराग्य भाव के पती जागरुप बनता है।
08:36गर्भस्त और भूमिष्ठ। दोनों ही अवस्थाओं में माही निर्मात्री हैं।
08:40जो गर्भ में जल तत्व की तरह चारों और समाहित रहकर गर्भ में रक्षिका बनती हैं।
08:46बाहर आने पर वह वायू तत्व के समान वेश्टन भाव के साथ गती प्रेधिना और दिशा प्रदान करती है।
08:53अपने आचरन, स्नेह संसकार और उर्जा से संतान को भगवत स्वरूप में प्रतिष्ठापित करने का महनीय कर्म करती है।
09:02नमस्कार।