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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक,
00:11वित्या वाचस्पती गुलाब कुठारी जी का, शरीर ही ब्रह्मान श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आलेक,
00:18जिसका शीशक है आत्म प्रकाश ही भगत्ता, गीता सिध्धन्त के अनुसार इश्वर अव्य पुरुष का वाचक है, यो लोकत रयम
00:28आविश्य विभर्त्य अव्य इश्वर है, वह असंग, अविकृत और सर्वत्र एक रूप से व्याप्त रहता हुआ भी अव्य कहा जात
00:37है, इश्वर को जीव भाव में लाने वाली इश्वर की विशेश शक्ति योग माया है, जिसके आवरण से ही अव्य
00:46पुरुष प्रत्येक प्राणी में रहता हुआ भी प्रकट भाव में नहीं आपाता, नाहम प्रकाशह सर्वस्य योग माया समावृत हा, संसार
00:56के सभी जी
00:57इसी योग माया से मोहित रहते हैं, सायास ही इस आवरण से मुक्त हो जाते हैं, किन्तु जिस जीव का
01:05बिना प्रयास ही यह आवरण हटा रहता है, अपनी शक्तियों के प्रभाव से वह भगवान कहलाने लगता है, यह अनावरण
01:15उस अव्यकी शक्तियों का ही होता है, जो प
01:27। प्रदिष्ठा है। एश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसहश्रिय ज्यान वैराग्ययोष्टैव संग्नामभग इति रणा।
01:38संपूण एश्वर्या, धर्म, यश्री, ज्यान और वैराग्या। ये छे शक्तियां ही भग कही जाती हैं।
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01:54Prakash yukd
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01:59४्रकाशित करने का सामर्थ्य आत्म जोती में ही रहता है।
02:29धर्म, ज्यान, आदी, छैर धर्म ही भम प्राप्ति के द्वार है।
02:33इन ही छवों की कारण भम भाव को मनुष्य पाता है और वही भगवान कहलाता है।
02:40मूलतह अव्याई के दो धातु हैं विद्या एवं कर्म।
02:44जो धर्म, ज्यान, वेरागे और आश्वत्य इन चार विद्या भावों से समन्वित रहता है।
02:51वही इश्वरत्म पाता है।
02:53कर्म भाव, स्रिष्टी भाव में लाने में सहायक हैं।
02:57जो राग, द्वेश, सम्मोह, अस्मिता और अविनिवेश इन चार अविद्या भावों से युक्त रहता है।
03:04अव्याई की पांच कलाओं में से आनन्द, विज्ञान और मन, मुक्ति साक्षी कलाएं हैं।
03:10तथा मन, प्राण और वाक, स्विष्टी साक्षी कलाएं हैं।
03:14आनन्द के साथ अव्य, ह्रदयस्थ इश्वर के सन्निकट, विज्ञान कला ही बुद्धी हैं।
03:21प्रिष्ण इसे व्यावसायात्मी का बुद्धी कहते हैं।
03:25अव्य के विद्या और अविद्या भावों की प्रतिष्ठा इसी बुद्धी में रहती हैं।
03:30यदि बुद्धी विद्या भावों से संपन्य हो जाती हैं, तो अविद्या रूप पापमा का आवरण स्वतह निव्रित हो जाता हैं।
03:39ủい Gu Guzzitte sere raag dvishat mak avan, gyan Buddhi sere sammonak avan,
03:45Ashvaryya Buddhi sere asmita avraan og dharma Buddhi sere abhi niva vesh avran hathjaat hen,
03:52sathah atma satsakshatkar ho zata hen.
03:56Judcasting pa rINGastha bhagways per haadha.
03:59E hi tree hai ki h Sri arch梦 twasach isshvara,
04:02hemari adhyatma sanstat ke saat satsara samvikasad samcod policial to nam.
04:06ुपितु परंपरा अर्थात सूर्य के माध्यम से होता है।
04:12शुर्ति कहती है निवेशयन्न मृतम मर्ट्यंच अर्थात सूर्य अमृत्व मर्थय दोनों भावों से युप्त है।
04:21सूर्य प्रित्वी लोक इस्थित मनुष्य में बुद्धी रूप से प्रवेश करता है। यह बुद्धी ही विज्ञान आत्मा है।
04:29सूर्य के अमर्द भाग से जहां बुद्धी में वैरागय आती चार विद्यभाव प्रकट होते हैं, वही मरत्य भाग से राग,
04:38द्वेश, आती, अविद्या भाग विक्सित हो जाते हैं।
04:42वेराग्य भाव का अर्थ है लौकिक समुन्नती के प्रती अपनी बुद्धी को सर्विथा उपेक्षा भाव से युक्त कर देना.
04:50पुत्र, कलत्र, बंधु, बांधव, अनुचर, पशु संपदा, राज्यव, वैभव आदी विशिष्ट संसाधन हैं जिनकी चाहना प्रत्यक व्यक्ति को होती हैं.
05:03जो व्यक्ति इन लौकिक व्यभवं को तृनवत गिनता है तथा आत्म भाव में इस्थित हो जाता है वही प्रग्या भाव
05:13में प्रतिषित हो जाता है. आत्मन्येव आत्मना तुष्टह इस्थित प्रग्यस्तदोच्यते.
05:19Zakad Yañamad
05:22Pradyakhe-gPadyauffa singing the way
05:33When theexisting
05:36speaking, it
05:40अतिंद्रिय और इंद्रिय सापेक्ष दो प्रकाय का होता है
05:44ये दोनों ही ज्यान आप्द हैं
05:46किन्तु भगवत्ता अतिंद्रिय ज्यान से जुड़ी है
05:50चक्षु आदी इंद्रियों से जो ज्यान टत्यक्षु होता है
05:54वह भौतिक विश्व से संबद्ध है
05:57जबकि अतिंद्रिय ज्यान ही भग का वास्तविक स्वरूप है जिससे परोक्ष एवं अलोकिक सिधियां होती है
06:06अर्थात जो ज्यान आत्मा परमात्मा भूत भविश्य वर्तमान से संबद्ध है तथा जिसका ज्यान चक्षु आधी इंद्रियों से नहीं अपितु
06:18विशिष्ट तप दृष्टी से संभव है यही ज्यान भग श्रेणी में आता है
06:23अनिमा, महिमा, गरिमा, लगिमा, प्राक्ति, प्राकाम्य, इशित्व एवं वशित्व इन आठ सिधियों की समष्ठी ही एश्वर्य भग है
06:35यदि किसी मनुश्य में ये शक्तियां जन्मकाल से ही विद्यमान रहती है तो उसे इश्वर कहा जाता है
06:42अत्वा, यदि किसी ने योग क्रिया विशेश से ये सिधियां प्राप्त की हैं तो उसे योगी कहा जाता है
06:50यक्ष, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, पितर, एंद्र, प्राजापत्य, व्राम्भ
06:57इन आठों योनियों में जन्मकाल से ही ये सिधियां विद्यमान रहती है वस्तुतह इन आठों का संबन्ध इश्वर संस्था से
07:07है रस ब्रह्म है तथा बल माया है
07:10बल तत्व आत्माव वित्भेद से दो प्रकारका हैं
07:15आत्मबल स्वतंत्र और वित्बल आश्टित धर्म हैं
07:19आत्मबल एश्वर्य है तो वित्बल श्री है
07:22इश्वर सभी आय हुए जड़ चेतन भूतों में विद्यमान है
07:31यही ज्ञान अनिमा है
07:33इसी अनिमा भाव में आया हुआ इश्वर का महा विश्व रूप में परिनत होना ही भूमा भाव है
07:41उसी इश्वर ने संसारस्थ समस्त जीवों को अपनी सीमा में धारण किया है
07:48अत्ह यही उसका प्राक्ति भाव है
07:50सभी के बाहर भीतर स्वतंत्र रूप से यतेच विहार भाव के कारण उसका प्राकाम्य भाव स्वष्ट है
07:58वही अंतर्यामी सबका शाष्टा है यही उसका इश्व है
08:03सभी उसी सूत्रात्मा से बने हैं अत्हक
08:07क्रिया से सबको अपना वश्वर्ती बनाय रखना ही उसका वशित्म है
08:14प्राक्रतिक नित्य नियमों की समश्टी ही धर्म है
08:17जिस व्यक्ति की जन्मकाल से ही धर्म की और स्वाभाविक प्रव्रत्ती होती है
08:52Hakuna's personal life
08:52This truth is that the
09:04ुश्री नामक भग प्रिथ्वी के साथ जुडा है, शरीर कान्ती ही श्री है, शरीर का उपादान प्रिथ्वी है, इंच्यों भगों
09:13में से धर्म, ज्यान, वैराग्य और एश्वर्य की विकास भूमी सूर्य है,
09:18यश एवं श्री का संबंध परमेश्ठी मंडल से है, अध्यात्म के अनुसार श्री का संबंध स्थूल शरीर से तथा यश
09:28का संबंध मन से है, शेश चारों बुद्धी से संबंध है, प्रिथ्वी स्थूल शरीर का चंद्रमा मन का तथा सूर्य
09:36बुद्धी का प्रभव है अ
09:47चारों भगभाव स्रिष्टी व मुक्ति दोनों की प्राप्ति में सहायक बनते हैं, जबकि यश एवं श्री मर्त्य स्रिष्टी में ही
09:57जुड़े हैं, गीता में धर्म, ज्यान, वैराग्य एवं बुद्धी का ही योग द्रिष्टी से निरूपन किया गया है, क्योंकि ये
10:05चा
10:09प्राप्ति में भी इनकी महनिय भूमी का है, नमस्कार

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